शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

सिंधु जल समझौता: पाकिस्तान के आरोप और भारत के खिलाफ नैरेटिव की राजनीति

इस लेख में जानिए

  • पानी को हथियार बनाने का आरोप: पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की जल नीति को किस तरह पेश कर रहा है?
  • यूरोप से इस्लामाबाद तक नैरेटिव की लड़ाई: सीमा-पार जल संसाधनों पर आयोजित सम्मेलनों और पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयासों में क्या संदेश दिया जा रहा है?
  • सिंधु जल समझौते में पानी का बँटवारा: पूर्वी और पश्चिमी नदियों के पानी के उपयोग के अधिकार भारत और पाकिस्तान को कैसे दिए गए?
  • धमकियाँ बनाम जलविज्ञान: चिनाब नदी के प्रवाह, रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं और भारत पर लगाए जा रहे आरोपों को समझना क्यों जरूरी है?
सिंधु जल समझौते पर नेतागण देश के अंदर चाहे जितने ताल ठोंक लें, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी बातें नहीं चलतीं. दूसरी बात, सिंधु का पानी रोक देंगे जैसे दक्षिणपंथी दावों से भी पाकिस्तान का पक्ष मजबूत होता है.

आजादी के बाद से ही पाकिस्तान फॉल्स नैरेटिव गढ़ने का उस्ताद रहा है. उसका आरोप है कि भारत पानी को हथियार बना रहा है.

असल में, ब्रसेल्स में “ट्रांसबाउंड्री वॉटर रिसोर्सेजः अ वीपनाइज्ड ग्लोबल कॉमन” नाम से आयोजित एक महत्वपूर्ण नीति सम्मेलन में सीमा-पार जल संसाधनों को ‘हथियार बनाए जा सकने वाला वैश्विक साझा संसाधन’ बताया गया. अब ध्यान दीजिए कि इस सम्मेलन का आयोजन किसने किया था! सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी स्टडीज (सीईपीएस) और और यूरोपीय संघ में पाकिस्तान के मिशन ने मिलकर.

अब यूरोपीय देश पानी की कमी से मर रहे किसानों और खासकर प्यास से तड़पते बच्चों की तस्वीरें देखकर पिघलने का नाटक करने में भी आला दर्जे के हैं. पर बात यहीं नहीं रुकी है.

इसी साल 30 जून को इस्लामाबाद के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार “द इंडस वॉटर ट्रीटीः एन इंस्ट्रूमेट ऑफ पीस ऐंड रीजनल स्टैबिलिटी” में पाकिस्तान ने सिंधु नदी की तुलना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक समुद्री चोकपॉइन्टस् से करने की कोशिश की.

पाकिस्तान का तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसे वैश्विक नियम बनाने चाहिए, जो ऊपरी धारा वाले देशों (अपर राइपेरियन कंट्रीज) को पानी का इस्तेमाल भूराजनीतिक दबाव के साधन के रूप में करने से रोकें.

लेकिन जिस तरह का भ्रामक नैरेटिव सेट किया जा रहा है उससे क्षेत्रीय सहयोग को नुक्सान ही होगा.

लेकिन, आस्तीनें चढ़ाकर शेखी बघारने में भी पाकिस्तानियों का मुकाबल बुड़बक से बुड़बक हिंदुस्तानी दक्षिणपंथी ट्रोल नहीं कर सकता.

एक पाकिस्तानी कैबिनेट मंत्री ने तो पश्चिमी नदियों (सिंधु जल समझौते वाली) पर पानी मोड़ने वाली संरचनाएं बनाने वाले किसी भी व्यक्ति के ‘हाथ काट देने’ की धमकी दी.

इसी तरह, जनरल असीम मुनीर ने अमेरिका के टैम्पा में पाकिस्तानी प्रवासियों को संबोधित करते हुए भारत के खिलाफ सीधे सैन्य और परमाणु हमले की धमकियां दीं.

इन धमकियों में उन्होंने चेतावनी दी कि सिंधु नदी बेसिन पर भारत द्वारा भविष्य में बनाए जाने वाले किसी भी बांध को नष्ट करने के लिए पाकिस्तान मिसाइल हमले कर सकता है.

इतना तो जाहिर है कि हिंदी मुहावरा कोश में ऐसी ही बकर को गीदड़भभकी कहा गया है.

आपको पता ही होगा फिर भी सोचा याद दिला दूं कि सिंधु जल संधि के तहत भारत को पूर्वी नदियों के पानी पर विशेष अधिकार मिला, जिसकी अनुमानित मात्रा 40.7 अरब घन मीटर (बीसीएम), यानी 33 मिलियन एकड़-फीट (एमएएफ) है.

वहीं पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के लगभग पूरे पानी के उपयोग का अधिकार दिया गया, जिसकी अनुमानित मात्रा 168 से 170 बीसीएम (135 से 140 एमएएफ) है.

गौर करने वाली बात यह है कि सिंधु नदी तंत्र के कुल पानी का केवल लगभग 19.6 प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है, जबकि इस हिस्से से संबंधित जलग्रहण क्षेत्र भारत में पाकिस्तान की तुलना में लगभग दोगुना है. इसके विपरीत, पाकिस्तान को लगभग 81 प्रतिशत पानी मिलता है, जबकि संबंधित जलग्रहण क्षेत्र का केवल लगभग आधा हिस्सा ही उसके क्षेत्र में आता है.

1941 की जनगणना के अनुसार, सिंधु नदी तंत्र के पानी पर निर्भर आबादी में पाकिस्तान की हिस्सेदारी करीब 2.5 करोड़ यानी 54 प्रतिशत थी, जबकि भारत में करीब 2.1 करोड़ यानी 46 प्रतिशत लोग इस जल प्रणाली पर निर्भर थे. भारतीय हिस्से की 46 प्रतिशत आबादी को सिंधु तंत्र के केवल 19.6 प्रतिशत पानी पर निर्भर रहना पड़ा, जबकि पाकिस्तान के पंजाब की 54 प्रतिशत आबादी को लगभग 80 प्रतिशत पानी मिला.

सिंधु नहर प्रणाली से सिंचित कुल 2.6 करोड़ एकड़ भूमि में से करीब 2.1 करोड़ एकड़ पाकिस्तान में और केवल 50 लाख एकड़ भारत में सिंचित होती थी.

विभाजन के बाद बने नए राजनीतिक माहौल ने न केवल भारत की खाद्य आपूर्ति व्यवस्था को बाधित किया, बल्कि सिंधु नदी तंत्र की सदियों पुरानी जल-भौगोलिक एकता को भी तोड़ दिया. इससे भारत के सिंधु बेसिन के उन कई मिलियन एकड़ क्षेत्रों के विकास पर गंभीर खतरा पैदा हुआ, जो अत्यंत शुष्क होने के बावजूद उपजाऊ थे.

इसके बावजूद, पाकिस्तान लंबे समय से ऐसी दलीलें देता रहा है, जिन्हें भ्रामक नैरेटिव ही कहा जाना चाहिए, बल्कि मैं तो कहता हूं कि यह पाकिस्तान के 1952 के उसके रुख से मिलता-जुलता ही कहूंगा. वही संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी मंत्री की हायतौबा. (पिछले पोस्ट को देखें)

बहरहाल, पाकिस्तान छाती पीटता है भारत, पाकिस्तान में सूखा पैदा करने के लिए नदी के प्रवाह को नियंत्रित करता है और मानसून के दौरान बाढ़ पैदा करने के लिए भी पानी के बहाव से छेड़छाड़ करता है. हमारे दक्षिणपंथी भारतीय सोशल मीडिया रणबांकुरे भी ऐसा दावा करके पाकिस्तान की बात को एक तरह से सपोर्ट ही करते हैं.

पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस नैरेटिव को जोर-शोर से उठाया है. विशेष रूप से चिनाब नदी के प्रवाह में होने वाले उतार-चढ़ाव को लेकर भारत पर ऊपरी धारा के देश के रूप में पानी को नियंत्रित करने के आरोप लगाए जाते हैं.

जाहिर है कि ऐसे आरोप सिंधु नदी की वास्तविक जलवैज्ञानिक परिस्थितियों और रन ऑफ द रिवर जलविद्युत परियोजनाओं के स्थापित संचालन तंत्र की अनदेखी करते हैं और फर्जी हैं.

आगे कभी मौका लगा तो सिंधु जल समझौते में अमेरिका और यूरोपीय दवाब की भी चर्चा करेंगे जिसकी वजह से यह अन्यायपूर्ण समझौता भारत को करना पड़ा था.

#IndusWatersTreaty #सिंधुजलसमझौता #IndiaPakistan #WaterDispute #Pakistan #Geopolitics #IndusRiver #ChenabRiver #IndiaPakistanRelations #जलविवाद 
 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सिंधु जल समझौते के तहत भारत और पाकिस्तान को कितना पानी मिलता है?

उत्तर: सिंधु जल समझौते, 1960 के तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों के जल के उपयोग का अधिकार मुख्यतः भारत को दिया गया, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग मुख्यतः पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। इन नदियों के पानी की मात्रा मौसम और प्रवाह के अनुसार बदलती है, इसलिए दोनों देशों के हिस्से को केवल एक निश्चित प्रतिशत के रूप में समझना उचित नहीं है।

प्रश्न 2: पाकिस्तान भारत पर सिंधु नदी का पानी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप क्यों लगाता है?

उत्तर: पाकिस्तान का तर्क है कि ऊपरी धारा में स्थित भारत अपनी जलविद्युत परियोजनाओं और बाँधों के जरिए नदी के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। भारत की परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद रहा है। हालाँकि, किसी परियोजना के वास्तविक प्रभाव का आकलन उसके तकनीकी डिजाइन, संचालन नियमों, संधि की शर्तों और जलवैज्ञानिक आँकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3: क्या भारत सिंधु नदी तंत्र की पश्चिमी नदियों का पानी पूरी तरह रोक सकता है?

उत्तर: नहीं, ऐसा सामान्यीकृत दावा करना सही नहीं होगा। सिंधु जल समझौते के तहत भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ निर्दिष्ट उपयोगों की अनुमति है, जिनमें घरेलू और गैर-उपभोगी उपयोग, निर्धारित कृषि उपयोग तथा संधि की शर्तों के अनुरूप जलविद्युत उत्पादन शामिल हैं। रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएँ बिजली उत्पादन के लिए नदी के प्रवाह का उपयोग करती हैं, लेकिन उनका प्रभाव परियोजना की संरचना और संचालन पर निर्भर करता है। इसलिए पानी रोकने या प्रवाह नियंत्रित करने से जुड़े दावों की जाँच तकनीकी प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।

सिंधु जल समझौता: 1948 में पाकिस्तान ने कैसे गढ़ा भारत के खिलाफ झूठा नैरेटिव?

  • इस लेख में जानिए

    • 1948 के नहर जल विवाद की पृष्ठभूमि
    • भारत और पाकिस्तान के बीच जल बँटवारे का विवाद
    • संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के दावों की पड़ताल
विभाजन के बाद, अविभाजित पंजाब की 143 नहरों में से केवल 12 नहरें पूर्वी पंजाब (भारत) को आवंटित की गईं, जबकि 131 नहरें पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) को मिलीं.

सबसे अधिक लाभदायक और तकनीकी रूप से व्यवहार्य योजनाएँ पश्चिमी पंजाब में स्थित थीं, जिससे पूर्वी पंजाब, विशेष रूप से नदियों से दूर स्थित क्षेत्रों में, विकास से काफी वंचित रह गया.

भारत के हिस्से में आया सिंधु घाटी का मैदानी इलाका पाकिस्तान के मैदानों की तुलना में काफी कम विकसित थे.
अधिकांश बड़ी नहरें पूरी तरह से पाकिस्तान में स्थित थीं और कुछ पूरी तरह से भारत में। ऊपरी बारी दोआब नहर (यूबीडीसी) एकमात्र प्रमुख नहर प्रणाली थी जिसका उद्गम माधोपुर हेडवर्क्स में था, लेकिन अब विभाजन के बाद इस पर से कई स्थानों पर सीमा गुजर रही थी.

कई यूबीडीसी चैनलों के निचले हिस्से जो पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) की ओर जाते थे, उन्हें मध्य बारी नहर के नाम से जाना जाता था।

मध्य बारी दोआब नहर (सीबीडीसी) को पूर्वी पंजाब (भारत) में स्थित उन नहरों के ऊपरी हिस्सों से पानी प्राप्त करना पड़ता था। दीपालपुर नहर, जो विशेष रूप से पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) की जल आपूर्ति करती थी, का जल स्रोत फिरोजपुर में स्थित था।

विभाजन के बाद, पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) के आग्रह पर, पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब के दो मुख्य अभियंताओं ने 20 दिसंबर, 1947 को यूबीडीसी और फिरोजपुर हेडवर्क्स की यथास्थिति को 31 मार्च, 1948 तक बनाए रखने के लिए एक समझौता किया.

जानबूझकर या अनजाने में, पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) ने 31 मार्च, 1948 तक सेंट्रल बारी दोआब नहर और दीपालपु नहर को पानी की आपूर्ति के संबंध में पूर्वी पंजाब के साथ किसी भी समझौते पर बातचीत करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया.

किसी भी समझौते के अभाव में, पूर्वी पंजाब ने 1 अप्रैल, 1948 को पश्चिम पंजाब में सीबीडीसी के लाभ के लिए अपनी सुविधाओं का उपयोग बंद कर दिया.

सेंट्रल बारी दोआब नहर और दीपालपुर नहरों से पाकिस्तान के कुल सिंचित क्षेत्र के केवल छह प्रतिशत हिस्से की सिंचाई होती थी.

तत्कालीन पाकिस्तान के सेक्रेट्री जनरल और बाद में प्रधानमंत्री बने चौधरी मोहम्मद अली ने कहा था: "...पश्चिमी पंजाब के कुछ हिस्सों में कर्तव्य की उपेक्षा, आत्मसंतुष्टि और सामान्य विवेक की कमी थी - जिसके पाकिस्तान के लिए विनाशकारी परिणाम हुए."

Water has practically dried near #Akhnoor after significant reduction in water levels due to India's suspension of the Indus Waters Treaty. People have no memory of crossing the river on foot.

पाकिस्तान ने यह झूठा नैरेटिव गढ़ा कि भारत ने 1 तारीख को अपने प्रतिनिधि के समक्ष सभी छह नदियों का पानी बंद कर दिया था.

16 दिसंबर, 1952 को सुरक्षा परिषद की बहस में पाकिस्तान के प्रतिनिधि एम. ज़फरुल्ला खान ने कहा: "...1 अप्रैल, 1948 को... भारत ने उन नदियों का पानी रोक दिया जो पाकिस्तान में बहती थीं."

विडंबना यह है कि बैठक के रिकॉर्ड से पता चलता है कि सुरक्षा परिषद के किसी भी स्थायी या अस्थायी सदस्य ने इस बयान की सत्यता पर कोई संदेह नहीं जताया।

1952 में पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद में पूरी तरह से झूठा विवरण प्रस्तुत किया.

यह स्पष्ट है कि 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, भारत ने 31 मार्च, 1948 तक के नौ महीनों के दौरान इन छह नदियों में से किसी पर भी ऐसी कोई संरचना नहीं बनाई थी जो इन सभी छह नदियों के जल को नियंत्रित कर सके.

1952 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि सुरक्षा परिषद को गुमराह करने में सफल रहे. एम. ज़फरुल्ला खान ने जल प्रवाह को रोकने की व्यवस्था और इन छह शक्तिशाली नदियों के जल को छह सप्ताह तक नियंत्रित करने या संग्रहित करने की भारत की क्षमता का उल्लेख नहीं किया, और न ही उनसे सुरक्षा परिषद में इस बारे में कोई प्रश्न पूछा गया.
इस झूठे विवरण के माध्यम से, 1952 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि सुरक्षा परिषद और विश्व को गुमराह करने में सफल रहे.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सिंधु जल समझौता कब हुआ था?

उत्तर: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते पर 19 सितंबर, 1960 को कराची में हस्ताक्षर किए गए थे। विश्व बैंक ने इस समझौते की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस समझौते से पहले, 1948 में दोनों देशों के बीच पंजाब की नहरों के पानी को लेकर विवाद हुआ था।

प्रश्न 2: 1 अप्रैल, 1948 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद क्यों हुआ था?

उत्तर: पंजाब के विभाजन के बाद कुछ नहर प्रणालियों के जलस्रोत भारत में थे, जबकि उनसे सिंचित होने वाले क्षेत्र पाकिस्तान में स्थित थे। 31 मार्च, 1948 को अंतरिम व्यवस्था समाप्त होने के बाद पूर्वी पंजाब ने सेंट्रल बारी दोआब और दीपालपुर नहरों के लिए अपनी जलापूर्ति बंद कर दी। इस विवाद के समाधान के लिए दोनों देशों के बीच 4 मई, 1948 को अंतर-डोमिनियन समझौता हुआ।

प्रश्न 3: क्या भारत ने 1 अप्रैल, 1948 को सिंधु नदी प्रणाली की सभी छह नदियों का पानी रोक दिया था?

उत्तर: यह दावा 1948 के नहर जल विवाद से संबंधित घटनाओं का व्यापक वर्णन नहीं करता। उस समय विवाद विशेष रूप से सेंट्रल बारी दोआब और दीपालपुर नहरों की जलापूर्ति को लेकर था। पाकिस्तान के प्रतिनिधि एम. ज़फरुल्ला खान ने 16 दिसंबर, 1952 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत पर नदियों का पानी रोकने का आरोप लगाया था। इस दावे की ऐतिहासिक पड़ताल करते समय 1948 के समझौतों, राजनयिक पत्राचार और सुरक्षा परिषद के मूल अभिलेखों को साथ पढ़ना आवश्यक है।

रविवार, 9 अगस्त 2026

कहानी कश्मीर कीः शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?

कश्मीर की कहानी- भाग एक

आज जब अनुच्छेद 370 को संशोधित किए ठीक 7 साल गुजर गए हैं. कश्मीर को लेकर कुछ बातों का पुनरावलोकन जरूरी है. इसमें से शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू के अद्भुत प्रेम को समझना महत्वपूर्ण है, जिसने कश्मीर के एक गुट के नेता को ऐसे समय में केंद्रीय मंच पर पहुंचा दिया, जब ध्यान पूरी तरह से राष्ट्र निर्माण पर होना चाहिए था।

शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू की निष्ठा से भारत के हितों को चोट

कश्मीर की पहली राजनीतिक पार्टी, ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन 1932 में हुआ था. लेकिन 1939 में यह अधिक तटस्थ 'नेशनल कॉन्फ्रेंस' में बदल गई. शेख अब्दुल्ला इसके संस्थापक-अध्यक्ष बने.

पार्टी अध्यक्ष रहते अब्दुल्ला नेहरू के संपर्क में आए और उनकी बार-बार की मुलाकातों ने उस यारी की नींव रखी जो इतिहास पर अपनी एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ने वाली थी, जो भारत के लिए लगभग घातक साबित हुई.

अब्दुल्ला और नेहरू के बीच एक सहज और त्वरित रिश्ते के पीछे की एक संभावित वजह है कि नेहरू का कश्मीर के साथ संबंध महज राजनैतिक नहीं, बल्कि बेहद निजी भी था, इसके साक्ष्य उन खतों में मिलते हैं जिसमें उन्होंने उस स्थान की यात्रा करने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त की है, जिसे वह अपनी मातृभूमि कहते हैं.

संभव है कि अब्दुल्ला ने सोचा होगा कि सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में उन्हें एक समान विचारों वाला सहयोगी मिल गया है.

1936 में अब्दुल्ला को लिखे नेहरू के पत्र, जिसे 30 जून, 1936 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित किया गया था, में लिखा थाः

आपके लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप मुझे अपनी मातृभूमि पर आमंत्रित करें, क्योंकि वहाँ जाने की इच्छा मेरे भीतर हमेशा मौजूद रहती है. अब मुझे वहां गए 19 साल हो गए हैं और मैं अक्सर वहां लौटने के लिए उत्सुक रहता हूं, लेकिन परिस्थितियाँ मेरे लिए बहुत अलग रही थीं और उसकी वजह से मैं ऐसा नहीं कर पाया... भारत की बड़ी समस्याओं ने मुझे भारत के इस हिस्से से बांधे रखा है. जैसा आप जानते हैं, वे समस्याएँ अंततः कश्मीर को भी प्रभावित करती हैं, क्योंकि कश्मीर का भाग्य शेष भारत के साथ जुड़ा हुआ है. यदि भारत आजाद हुआ तो कश्मीर उस आजादी में शामिल होगा.

नेहरू और शेख अब्दुल्ला के राजनैतिक विचारों में बहुत सी बातें साझा थीं और इसलिए 1937 में लाहौर में उनकी मुलाकात के बाद दोनों का गठजोड़ और अधिक गहरा हो गया.
 
अपनी मनुहार की शक्ति का इस्तेमाल करके नेहरू ने अब्दुल्ला को उत्तर-पश्चिम सरहद की यात्रा पर अपने साथ चलने के लिए मना लिया. नेहरू की कश्मीर की बाद की यात्राओं से अब्दुल्ला की लोकप्रियता में उनका विश्वास मजबूत होता गया.

मई-जून 1940 में, नेहरू ने खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ कश्मीर का दौरा किया, जो दो दशकों से अधिक समय में अपनी मातृभूमि की उनकी पहली यात्रा थी.

1945 में कश्मीर के एक अन्य दौरे में, नेहरू का स्वागत नावों के विहंगम जुलूस के साथ किया गया. इस दौरे में, नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में भाषण देते हुए नेहरू ने अब्दुल्ला के नेतृत्व पर भी मुहर लगा दी.

उनके शब्दों में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में स्वतंत्र कश्मीर की उम्मीदों का प्रतिबिंब झलक रहा थाः

‘इसके (नेशनल कॉन्फ्रेंस) दरवाजे हर कश्मीरी के लिए खुले हैं... कश्मीर बहुत खूबसूरत जगह है और जो लोग यहाँ रहते हैं वे बड़े किस्मत वाले हैं. लेकिन असली खुशकिस्मती उसी दिन आएगी, जब लोगों के पास आजादी होगी... मुझे उम्मीद है कि शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के दूरदर्शी नेतृत्व में, यह अपना मकसद हासिल करने में कामयाब होगी.’

शेख अब्दुल्ला के संबंध में नेहरू की दो ग़लतफ़हमियाँ

अब्दुल्ला के साथ अपनी शुरुआती बातचीत के दौरान नेहरू के मन में दो बेहद महत्वपूर्ण गलतफहमियाँ पैदा हुईं जो बाद में भारत के हितों के लिए हानिकारक साबित होने वासी थीं. पहली ग़लतफ़हमी थी, पूरे कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की अपार लोकप्रियता में उनका अटूट विश्वास था.

जम्मू और कश्मीर क्षेत्र में कश्मीर घाटी, जम्मू क्षेत्र और लद्दाख क्षेत्र शामिल थे. अब्दुल्ला का प्रभाव सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बीच सीमित था और क्षेत्र की अन्य मुस्लिम जातियों और जम्मू और लद्दाख के अन्य समुदायों के बीच उनकी अपील नगण्य थी या कोई अपील थी ही नहीं.

1945 तक, नेहरू अब्दुल्ला के प्रति इतने आसक्त हो गए थे कि उन्होंने पार्टी के कैडर के खिलाफ धार्मिक असहिष्णुता के सभी आरोपों को खारिज कर दिया.

असल में, नेहरू ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के निर्णयों को प्रभावित करने या देश से अलग होने के जोखिम के मद्देनजर हिंदुओं से इसमें शामिल होने का आग्रह किया.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को कहीं अधिक सख्त सलाह दी. नेहरू की सलाह थी: 'यदि गैर-मुस्लिम कश्मीर में रहना चाहते हैं, तो उन्हें नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल हो जाना चाहिए या देश को अलविदा कह देना चाहिए.'

अपने उसी दौरे में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं की एक सभा को संबोधित किया और यही सलाह दोहराईः


‘मैं सलाह दूंगा कि अधिक संख्या में इसमें (नेशनल कॉन्फ्रेंस) शामिल होइए और इसके फैसलों पर प्रभाव डालिए। उन्हें निष्क्रिय दर्शक और आलोचक ही नहीं बने रहना चाहिए. यह स्पष्ट है, और यहां तक कि एक बच्चे को भी पता होना चाहिए, कि यदि आप देश की जनता के साथ नहीं खड़े होंगे तो महाराजा और अंग्रेज आपको हमेशा गुलाम बनाकर रखेंगे.’

असल में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को यह याद दिलाते हुए एक कड़ी चेतावनी दी थीः ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस एक असली राष्ट्रीय संगठन है और भले ही एक हिंदू इसका सदस्य ने बने, तो भी यह ऐसा ही रहेगा. अगर पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, यदि पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, तो कोई भी सुरक्षा उपाय और महत्व उनकी रक्षा नहीं करेगा.’

कांग्रेस पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता की ओर से दी गई नेहरू की सलाह का कश्मीरी हिंदुओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जो अपने साथ पिछले पलायन की पीढ़ीगत स्मृति लेकर आए थे.

अब्दुल्ला को लेकर नेहरू के मन में दूसरी गलतफहमी, जो घटनाओं की एक श्रृंखला से शुरू हुई थी, और जिसका अंत इसमें शामिल सभी लोगों के लिए त्रासद रूप से हुआ था, 1946 में अब्दुल्ला द्वारा शुरू की गई कश्मीर छोड़ो (क्विट कश्मीर) आंदोलन था. (तस्वीर देखिए, 30 मई, 1946 में हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में शेख अब्दुल्ला के 'पूर्ण उत्तरदायी सरकार' को छोड़कर 'कश्मीर छोड़ो' शुरू करने का दस्तावेजीकरण किया गया था.)

यह आंदोलन महाराजा हरिसिंह के अधीन ‘पूर्ण उत्तरदायी सरकार’ के लिए पूरे समर्थन से वादाखिलाफी था. इस आंदोलन के दौरान नेहरू द्वारा अब्दुल्ला को सक्रिय समर्थन दिया गया था और इसने महाराजा के साथ उनके रिश्तों में खटास लानी शुरू कर दी और इससे इन घटनाओं के लिए मंच तैयार हो गया जो 1947 में देखने को मिलने वाली थीं.

शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और नेहरू की हिरासत-

जब कश्मीर छोड़ो आंदोलन ने गति पकड़ ली, तो हरि सिंह ने 20 मई, 1946 को शेख अब्दुल्ला को दिल्ली के रास्ते में गिरफ्तार कर लिया. अब्दुल्ला नेहरू के अनुरोध पर उनसे मिलने दिल्ली जा रहे थे.

कुछ ही दिनों बाद, 26 मई को एक सार्वजनिक संबोधन में इस गिरफ्तारी की नेहरू ने तीखी आलोचना की थी.
इस भाषण में, नेहरू ने न केवल राज्य प्रशासन को फटकार लगाई, बल्कि इसकी तुलना कुख्यात जलियांवाला बाग नरसंहार के साथ कर दी. (चित्र देखिए जिसमें दो क्लिप हैं.)
 


उन्होंने प्रशासन पर असहमतियों को दबाने का आरोप लगाया और यह दावा करके भावनात्मक लहर पैदा की कि ऑल-इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने संवैधानिक प्रमुख के रूप में शासक के अधीन एक सरकार का समर्थन किया—जो अब्दुल्ला के 'कश्मीर छोड़ो' का विरोधाभास है—और श्रीनगर को उन्होंने 'मुर्दों का शहर' बताया.
नेहरू ने अपने संबोधन में अब्दुल्ला के प्रति अटूट समर्थन व्यक्त किया और उन्हें पूरे कश्मीर में बेहद लोकप्रिय नेता बताया.

बहरहाल, एक महीने के भीतर ही, नेहरू को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि 26 मई के उनके संबोधन में किए गए दावे झूठे थे हालांकि, इस समय तक पर्याप्त नुक्सान हो चुका था. (चित्र देखिए ) 




#कश्मीरकीकहानी #Jammuandkashmir #ManjitThakur 

FAQ
1. शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?
2. कश्मीर भारत में विलय क्यों नहीं चाहता था?
3. कश्मीर के भारत में विलय पर पंडित नेहरू की क्या राय थी?

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

गंगा जल संधि पर भारत को बांग्लादेश के साथ क्या सुलूक करना चाहिए? दिसंबर में होना है रिन्यू

बांग्लादेश को उम्मीद है कि उसकी तमाम भारत विरोधी रवैए के बावजूद, भारत गंगा जल संधि को नवीनीकृत करने के लिए सकारात्मक सहयोग देगा. आप ध्यान दें कि बांग्लादेश के साथ गंगा जल संधि 1996 में हुई थी और इसका नवीकरण इसी साल दिसंबर में होना है.
 
इस संधि पर बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के पहले कार्यकाल के दौरान हस्ताक्षर किया गया था. बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबेद इस्लाम को विश्वास है कि 'भारत इसके महत्व को समझेगा और उसी के अनुरूप आगे बढ़ेगा.'

अब प्रश्न है कि भारत विरोधी रवैए के बावजूद बांग्लादेश इतना आश्वस्त क्यों है? ध्यान रखना चाहिए कि बांग्लादेश और भारत के बीच गंगा सहित 54 प्रमुख नदियों का जल साझा है.

भारत में बांग्लादेश के पूर्व उच्चायुक्त तारिक ए. करीम ने हाल में कहा था कि 1996 की गंगा जल संधि ने यह दिखाया कि ‘‘संवेदनशील मुद्दों पर भी’’ सहयोग संभव है. अब बांग्लादेश को भारत विरोधी रुख भी अपनाना है, लगभग पाकिस्तान भी बन जाना है और पानी भी चाहिए. ऐसा कैसे होगा?

पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता फिलहाल निलंबित है और इसकी वजह से पूरे पाकिस्तान को दिक्कत हो रही है ऐसा पाकिस्तान के लोग मानते हैं. भारत का विपक्ष (और कुछ झंडू यूट्यूबर) भले ही शक कर रहा है और पूछ रहा है कि सिंधु का जल रखोगे किधर? तो मेरा प्रश्न यही है कि अगर संधि को खटाई में डालने से पाकिस्तान की मिर्च नहीं लगी है तो पानी के नाम पर जंग की धमकी वहां की सेना से लेकर बिलावल भुट्टो तक काहे दे रहे हैं?

खैर, बांग्लादेश पर लौटिए. वहां की मंत्री शमा ओबेद इस संधि को लेकर विश्वास जता रही हैं कि 'भारत इन बातों और इस साझा हित को ध्यान में रखते हुए सही निर्णय लेगा, ताकि हमारे द्विपक्षीय संबंधों को किसी भी तरह की क्षति न पहुंचे।'

द्विपक्षीय संबंधों को क्षति पहुंचने की इतनी चिंता है तो भारत के परम शत्रु पाकिस्तान का बगलबच्चा बनने से बचना चाहिए था. अगर भारत इस पानी वाले मसले पर बांग्लादेश की बांह नहीं मरोड़ता है तो इसे कूटनीतिक फेलियर माना जाना चाहिए.

शुक्रवार, 12 जून 2026

क्या टीएमसी के भीतर की हलचल सिर्फ सत्ता का गणित है, या सुरक्षा की राजनीति भी?

आपने कभी सोचा है कि तृणमूल के सांसदों-नेताओं का अचानक हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? आंखों में काबा वाली गायिका-अभिनेत्री घोष को अचानक अयोध्याजी कैसे प्रिय हो गए और कित-कित-कित-कित वाले कल्याण को ममता की छांव से बाहर अपना कल्याण कैसे दिखने लगा?

मुझे शक है कि यह सुनियोजित राजनैतिक कदम है. जिसमें ममता खुद को बलिदान करता हुआ दिखा रही हैं. अब अगर, ममता पर कोई कार्रवाई य कार्यवाही होती है तो शहीद की भूमिका ओढ़ने में उन्हें जरा भी वक्त नहीं लगेगा. आखिर, पैर पर प्लास्टर बांधकर और माथा फुड़वाकर बहते खून की धार के साथ चुनावी अभियान को नई शक्ल देनी वाली ममता इतनी सरल राजनीतिज्ञ तो नहीं.

हम और आप होते तो फूटे कपार को पहले रूमाल से पोंछते—और ममता के लिए रुमाल तो क्या धोती तक उपलब्ध हो जाती—और तब ही प्राथमिक चिकित्सा के लिए अस्पताल जाते. यह मिसाल इसलिए क्योंकि ममता छोटी बात को तूल देकर उसे ‘हूल’ में बदल देने की क्षमता वाली नेता हैं.

अगर टीएमसी के एक बड़े धड़े ने एनडीए को समर्थन देने की बात की है या ऐसा रुख दिखा रहे हैं, तो समझिए उनको बचाने की जद्दोजहद है.

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के रुख में जो बदलाव देखने को मिला है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सिर्फ राजनीतिक अवसरवाद है, या इसके पीछे कोई गहरी चिंता भी काम कर रही है.

इस पर ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बंगाल में कटमनी, तोलाबाजी और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर जनता का गुस्सा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है और स्थानीय टीएमसी नेताओं की पिटाई से लेकर सर मूंडकर सड़क पर दौड़ाने तक के वीडियो सामने आ रहे हैं.

मैं दोहरा रहा हूं आंखों में काबा वाली सयोनी घोष से लेकर कित-कित-कित वाले कल्याण बनर्जी तक अचानक ममता के विरोधी हो गए, यह बात कम से कम मुझे पच नहीं रही है.

पार्टी के भीतर मचे इस 'महा-विखंडन' को महज एक राजनीतिक असंतोष कहना वास्तविकता को नजरअंदाज करना होगा. यह दरअसल अस्तित्व बचाने की वह जद्दोजहद है, जहाँ नेता अपनी विचारधारा से अधिक अपनी 'सुरक्षा' को प्राथमिकता दे रहे हैं.

इस विद्रोह का नेतृत्व चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय जैसी वरिष्ठ नेता कर रही हैं, जो सीधे तौर पर संकेत देता है कि यह कोई छिटपुट असंतोष नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पलायन है.

सत्ता परिवर्तन के बाद पाला बदलने वाले नेताओं की मंशा को समझना कठिन नहीं है. राजनीति के जानकार मानते हैं कि बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद, राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति और 'बुलडोजर संस्कृति' (जो देश के अन्य हिस्सों में देखी गई है) के डर ने इन नेताओं को एनडीए के सुरक्षा घेरे में जाने के लिए मजबूर कर दिया है. इसे आप अपनी गर्दन बचाने के लिए पहना गया 'सुरक्षित कवच' कह सकते हैं.

आपके मन में सहज प्रश्न उठेगा कि ये लोग सीधे भाजपा में क्यों नहीं शामिल हो गए? आपको याद हो कि बंगाल भाजपा में नए नेताओं की भर्ती पर रोक लगा दी गई है. दूसरी तरफ, वॉशिंग मशीन वाली बात इतनी दफा कही जा चुकी है कि खुद भाजपा में जाने में इन्हें शर्म आ रही होगी और भाजपा वालों को इनको शामिल करने में. तीसरी और मार्के की बात है कि टीएमसी का यह धड़ा अपनी बार्गेनिंग पावर बनाए रखना चाहता है.

एनडीए में शामिल होकर टीएमसी के इस धड़े को कुछ न कुछ तो मिलता रहेगा. पार्टी में शामिल होने पर वैचारिक रूप से ‘हृदये मदीना’ और कित-कित भूल जाना होगा. भाजपा का नफा यह है कि राज्यसभा में शक्ति बढ़ेगी, राष्ट्रपति चुनाव आने वाले हैं उसमें किसी विशेष व्यक्ति के राष्ट्रपति चुने जाने के लिए जरूरी संख्याबल मिलेगा और हां, नीतीश और नायडू की बार्गेनिंग पावर को कम किया जा सकेगा.

तो, हृदय परिवर्तन सिर्फ गांधी के टाइम होते थे. अब सिर्फ स्टांस चेंज होता है. टीएमसी वालों का ये मूव सिर्फ कॉलगेट का सुरक्षा चक्र है. ममता शहीद के भाव में आएंगी और बंगाल के लोगों के ममत्व को अपने पाले में वापस लाने के लिए पहले एफआइआर के बाद सड़क पर आएंगी. आखिर जेपी की कार की बोनट पर कूद कर डांस करने वाली और भरी संसद में सपा सांसद दारोगा प्रसाद सरोज का गट्टा (कॉलर) पकड़ लेने वाली ममता दी अभी अपनी कला भूली तो नहीं होंगी.

सलमान काला हिरण खान की फिल्म सुल्तान का वह संवाद तो याद ही होगा आपकोः मैंणे पैलवाणी छोड्डी है, लड़ना नीं भूल्या.

गुरुवार, 7 मई 2026

कतरनी चावल चूड़ा और देवघर का पेड़ा

कुछ खुशबुएँ ऐसी होती हैं जो समय की धूल में भी धुंधली नहीं पड़तीं. वे हमारी इंद्रियों के किसी गुप्त झरोखे में दुबक कर बैठ जाती हैं और एक मामूली से स्पर्श मात्र से पूरे अतीत को पुनर्जीवित कर देती हैं.

पिछली बार जब मैंने गोविंदभोग चावल पर लिखा था तो कई लोगों ने उस चावल जैसा चावल देश के अन्य हिस्सों में होने की बात कही थी. लेकिन यकीन मानिए, गोविंदभोग चावल यूनीक है और इसलिए उसे जीआइ टैग मिला है.
बहरहाल, कुछ लोगों ने कतरनी चावल की याद दिलाते हुए उस पर लिखने के लिए भी कहा था. और कतरनी के बारे में सोचते हुए मुझे सबसे पहले उसकी खुशबू याद आई.

बिहार के ‘अंग क्षेत्र’ (भागलपुर और बांका) के खेतों में जब कतरनी का धान पकता है, तो उसकी सोंधी महक केवल हवा में नहीं तैरती, बल्कि वह उस माटी के संस्कार और आतिथ्य का उद्घोष करती है.

यह केवल एक अन्न नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अस्मिता है. आज के इस मशीनी जमाने में जब ‘फास्ट फूड’ ने थालियों पर कब्ज़ा कर लिया है, तब कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का मिलन एक ऐसी सात्विक तृप्ति प्रदान करता है, जिसकी तुलना किसी भी वैश्विक व्यंजन से नहीं की जा सकती.




कतरनी: सुगंध का स्वर्ण-अक्षत

भागलपुर और बांका की जलोढ़ मिट्टी में जब कतरनी धान के पौधे लहलहाते हैं, तो उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है. कतरनी चावल अपने छोटे कद, तीखे और सुगंधित दानों के लिए विश्वविख्यात है. इसे जीआई टैग प्राप्त है, जो इसके विशिष्ट होने की मुहर लगाता है. लेकिन इसका महत्व केवल सरकारी दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं है.
यह टैग क्यों महत्वपूर्ण है?

जीआई टैग मिलने का अर्थ यह है कि ‘कतरनी’ नाम का उपयोग केवल उसी चावल के लिए किया जा सकता है जो भागलपुर और बांका के भौगोलिक क्षेत्र में पारंपरिक विधियों से उगाया गया हो. यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी शुद्धता की गारंटी देता है और स्थानीय किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य दिलाने में मदद करता है.

कतरनी चावल को 28 मार्च, 2018 को आधिकारिक तौर पर भारत सरकार के भौगोलिक उपदर्शन रजिस्ट्री (जीआइ रजिस्ट्री) द्वारा जीआई टैग प्रदान किया गया था.

इस चावल के पंजीकृत रूप से मालिकाना हक भागलपुर जिला कतरनी धान उत्पादक संघ के पास है और उसके उत्पादन का इलाका भागलपुर, बांका और मुंगेर जिलों के विशिष्ट क्षेत्र हैं.

बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर ने कतरनी चावल के जीआई टैगिंग की प्रक्रिया में मुख्य तकनीकी भूमिका निभाई थी. मार्च, 2018 की सरकारी रिपोर्टों में बिहार के चार कृषि उत्पादों (कतरनी चावल, जर्दालु आम, मगही पान और शाही लीची) को एक साथ जीआई टैग मिलने का उल्लेख है.

अंग की लोक-संस्कृति में कहा जाता है कि कतरनी का धान जब घर आता है, तो पड़ोसी को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती; खुशबू खुद गवाही दे देती है. यह चावल जब पकता है, तो इसके दाने किसी श्वेत मोती की भांति चमकते हैं. इसकी मिठास और कोमलता इसे ‘चावलों की महारानी’ बनाती है. यह वह चावल है जिसे केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि मन को तृप्त करने के लिए खाया जाता है.


चूड़ा: सघन तपस्या का मधुर फल

कतरनी के धान से जब ‘चूड़ा’ (चिड़वा, पोहा) तैयार किया जाता है, तो यह एक लंबी प्रक्रिया और सघन धैर्य का परिणाम होता है. कतरनी के धान को हल्के गर्म पानी में भिगोकर, भूनकर और फिर लकड़ी के ओखल या मिल में कूटकर जो पतले, कागज़ जैसे झिलमिलाते चूड़े निकलते हैं, वे अद्भुत होते हैं.

कतरनी चूड़ा की विशेषता यह है कि यह अत्यंत सुपाच्य और स्निग्ध होता है. इसकी महक कच्चे धान की सोंधी खुशबू को समेटे रहती है.

बिहार के खान-पान में ‘दही-चूड़ा’ का स्थान सर्वोपरि है. मकर संक्रांति हो या जेठ की दुपहरी में मेहमान का स्वागत, चूड़ा-दही और चीनी/गुड़ का मेल एक मुकम्मल भोजन है. लेकिन जब यह चूड़ा कतरनी का हो, तो वह भोजन से ऊपर उठकर एक ‘अनुभव’ बन जाता है.

अंग से बाबाधाम: कतरनी और पेड़े का दिव्य संबंध

अब बात करते हैं उस ‘त्रिवेणी’ की, जो भागलपुर, सुल्तानगंज और देवघर के बीच बहती है. अंग प्रदेश की सीमाएं देवघर (झारखंड) की पहाड़ियों से जा मिलती हैं. यह संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और स्वादजन्य भी है.

सावन का महीना हो और सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर कांवड़िए जब बाबाधाम (देवघर) की ओर प्रस्थान करते हैं, तो उनकी पोटली में अक्सर ‘कतरनी का चूड़ा’ होता है. यात्रा के दौरान जब वे विश्राम करते हैं, तो मोटी मलाई वाली दही और कतरनी चूड़ा उनका मुख्य संबल बनता है.

लेकिन इस स्वाद की पूर्णता तब होती है, जब इसमें देवघर के विश्वविख्यात ‘पेड़े’ का समावेश होता है.
देवघर का पेड़ा, जो शुद्ध खोया और चीनी के मंद आंच पर कैरेमलाइज्ड होने से बनता है, अपनी एक विशिष्ट भूरी आभा और सोंधी मिठास के लिए जाना जाता है.

स्वाद का रसायन: चूड़ा-दही और पेड़ा

अंग क्षेत्र की मेहमानी में एक विशिष्ट परंपरा है—’दही-चूड़ा-पेड़ा’. कतरनी चूड़ा: जो आधार है, जो सुगंधित और हल्का है. गाढ़ा दही: जो शीतलता और क्रीमी टेक्सचर प्रदान करता है. और इसके साथ देवघर का पेड़ा, जो मिठास का वह चरम है, जो इस पूरे भोजन को एक ‘शाही डेजर्ट’ में बदल देता है.

अक्सर लोग दही-चूड़ा में चीनी या गुड़ मिलाते हैं, लेकिन मुझ जैसे पारखी लोग पेड़े को चूड़े के साथ मसलकर खाते हैं.

पेड़े की वह सोंधी मिठास जब कतरनी की खुशबू और दही की खटास के साथ मिलती है, तो मुँह में रसों का एक ऐसा विस्फोट होता है जिसे शब्दों में बांधना कठिन है. पेड़े का दानेदार होना और चूड़े का करारापन एक अद्भुत विरोधाभास पैदा करता है जो स्वाद की ग्रंथियों को झंकृत कर देता है.

सांस्कृतिक ताना-बाना और विरासत

भागलपुर का रेशम और यहाँ की कतरनी, दोनों ही सूक्ष्मता के प्रतीक हैं. वहीं देवघर का पेड़ा उस भक्ति और श्रद्धा का अंश है जो बाबा बैद्यनाथ के चरणों से जुड़ा है.

जब कोई व्यक्ति देवघर से लौटता है, तो उसके पास प्रसाद के रूप में पेड़े होते हैं और जब वह भागलपुर से गुजरता है, तो झोले में कतरनी चूड़ा. इन दोनों का साथ होना दो संस्कृतियों के मिलन का प्रतीक है.

जाहिर है, यह सब लिखते हुए मैं उस समय में लौट गया हूं, जब जीवन की गति धीमी थी. जब खेतों से अनाज सीधे ओखल तक आता था और पेड़े शुद्ध दूध से घंटों कढ़ाई में जलकर बनते थे. आज ‘पैकेज्ड’ और ‘इंस्टेंट’ के युग में कतरनी और देवघर के पेड़े का यह मेल हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है.

कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का यह कनेक्शन केवल भोजन की बात नहीं है; यह अंग और संथाल परगना के बीच के मधुर रिश्तों का सेतु है. यह माँ के हाथों से सानकर खिलाए गए उस ग्रास की याद है, जिसमें ममता का नमक और संस्कार की खुशबू मिली होती है.

यदि आप कभी अंग प्रदेश की यात्रा पर हों और दोपहर की सुनहरी धूप में आपको कोई कतरनी चूड़ा, गाढ़ी दही और देवघर के पेड़े परोस दे, तो समझियेगा कि आप केवल खाना नहीं खा रहे, बल्कि आप उस प्राचीन सभ्यता का हिस्सा बन रहे हैं जिसने स्वाद को भी ईश्वर की आराधना के समान पवित्र माना है. कतरनी की महक और पेड़े की मिठास, यही है हमारे अंग का असली गौरव, जो सदियों से हमारी जीभ पर एक मीठी याद बनकर अमर है.

अंग की धरती पर कतरनी का उगना केवल एक कृषि प्रक्रिया नहीं, बल्कि माटी के साथ किया जाने वाला एक प्रेम-अनुष्ठान है. आधुनिकता की आंधी के बावजूद, भागलपुर और बांका के गाँवों में आज भी कतरनी को सहेजने की विधियाँ वैसी ही हैं जैसी पूर्वजों के समय में थीं.

असल में, कतरनी चावल की पैदावार विशिष्ट पारंपरिक विधियों से की जाती है जो इस चावल की सुगंध और स्वाद को अक्षुण्ण रखती हैं:

पहली बात कि कतरनी की पैदावार के लिए विशिष्ट भूखंड का चयन किया जाता है. स्थानीय (और भौगोलिक रूप से) इसे दिआरा और तारी की माटी कहा जाता है.

कतरनी हर कहीं नहीं उग सकती. अंग के किसान आज भी पारंपरिक रूप से उन्हीं खेतों को चुनते हैं जहाँ गंगा या उसकी सहायक नदियों का पानी लौट चुका हो. विशेषकर ’तारी’ (ऊँची भूमि) और ’बलगाथ’ (हल्की दोमट) मिट्टी इसके लिए श्रेष्ठ मानी जाती है.

मान्यता है कि इस मिट्टी में मौजूद विशिष्ट खनिजों के कारण ही कतरनी में वह ‘2-AP’ नामक सुगंधित तत्व विकसित होता है.

पारंपरिक खेती में कतरनी के साथ यूरिया या रासायनिक खाद का प्रयोग वर्जित माना जाता है.

गाँवों में किसान आज भी ’गोबर की खाद’ और ’खेत की पुरानी कचवा’ (सड़ी हुई घास-फूस) का उपयोग करते हैं. तकनीकी रूप से यह सच है कि अधिक नाइट्रोजन (यूरिया) डालने से धान की लंबाई तो बढ़ जाती है, लेकिन उसकी मूल सुगंध कम हो जाती है. इसीलिए अंग के किसान ‘कम पैदावार’ मंजूर करते हैं, लेकिन ‘कम सुगंध’ नहीं.
कतरनी की रोपाई का समय बहुत महत्वपूर्ण है. सावन के आगमन के साथ ही इसके ’बिचड़े’ (नर्सरी) तैयार किए जाते हैं. पारंपरिक विधि में रोपाई के समय दो पौधों के बीच एक निश्चित दूरी रखी जाती है, ताकि हवा का संचार सही हो.

पारंपरिक ढेंकी, मशीनी युग में इसे कौन याद रखता है!


किसान रोपाई के समय अक्सर लोकगीत (कजरी) गाते हैं, जो इस थकाऊ काम को एक उत्सव बना देता है. साथ ही, बरहमासा गीत भी होते हैं.

फसल की कटाई और ‘अदहन’ का ध्यान

कतरनी को काटने का एक विशिष्ट समय होता है. जब बालियां सुनहरी हो जाएं और उनमें दूध सूखकर दाना कड़ा हो जाए, तभी इसे काटा जाता है. अधिक देर करने पर दाने खेत में ही झड़ने लगते हैं. कटाई के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में ’अदहन देना’ कहते हैं.

कतरनी चूड़ा बनाने की प्राचीन ‘भट्टी’ विधि

कतरनी का असली जादू उसके चूड़े में है, जिसे बनाने की पारंपरिक विधि आज भी मशीनों को मात देती है. सबसे पहले धान को बड़े लोहे के कड़ाहों में रात भर भिगोने के बाद आधा उबाला जाता है. यह प्रक्रिया बहुत सावधानी से की जाती है ताकि दाना फटे नहीं.

उबले हुए धान को मिट्टी के चूल्हे पर बालू के साथ भूना जाता है. यहाँ ‘अंदाज’ ही सब कुछ है; जरा सी चूक चूड़े को जला सकती है या उसे कच्चा छोड़ सकती है.

हालाँकि अब मशीनें आ गई हैं, लेकिन आज भी कुछ पुराने घरों में ’ढेंकी’ (लकड़ी का भारी लीवर) का प्रयोग होता है. ढेंकी से कूटा हुआ चूड़ा मोटा होता है, लेकिन उसकी मिठास और खुशबू मशीन वाले चूड़े से कहीं अधिक होती है.

कतरनी को लोहे के साइलो में नहीं, बल्कि मिट्टी से बनी ‘कोठी’ या ’बखार’ में रखा जाता है. मिट्टी के ये पात्र तापमान को नियंत्रित रखते हैं, जिससे कतरनी की सुगंध लंबे समय तक सुरक्षित रहती है.

अंग के गाँवों में कतरनी का उत्पादन कोई ‘बिजनेस’ नहीं, बल्कि एक ‘विरासत’ है. यहाँ का किसान अपनी फसल को संतान की तरह पालता है. कतरनी की वह विशिष्ट महक दरअसल उस किसान के पसीने, गंगा की माटी और ढीकी की थाप का सामूहिक संगीत है.

(तस्वीरें ढेंकी-जो अब दुर्लभ है. तथा कतरनी चावल की हैं. देवघर के पेड़े तो अब अमेजन पर भी उपलब्ध हैं)

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

पुस्तक चर्चाः डोढ़ाय चरित मानस आम आदमी का महाकाव्य और भारतीय लोकतंत्र का कच्चा चिट्ठा

मैं लंबे समय से कथा और कथेतर पढ़ता आ रहा हूं. माटी की अद्बुत गंध की वजह से रेणु जी का लेखन बहुत पसंद रहा है और रेणुजी के बारे में भाई गिरीन्द्रनाथ झा से सुनना आह्लादकारी अनुभव रहा है.

इस महीने की शुरुआत में पटने में राजकमल के किताब उत्सव में गिरीन्द्रनाथ बारं-बार डोढ़ाय चरित मानस का जिक्र कर रहे थे. रही-सही कसर सत्यानंद निरुपम ने पूरी कर दी. नतीजतन, किताब उत्सव में ही मैंने सतीनाथ भादुड़ी का उपन्यास डोढ़ाय चरित मानस खरीद लिया और अड्डे पर विमान का दो-ढाई घंटे इंतजार करते हुए 35-40 पेज पढ़ डाले.

किताब पढ़ने की यह गति? नहीं. मैं उस किताब की भाषा से चमत्कृत हो गया था. मूल बांग्ला में लिखा यह उपन्यास उन जादुई हाथों की सरस्वती कलम से अनूदित हुआ है कि असल जैसा मजा आ जाता है. रेणुजी जैसी भाषा. वैसी ही शब्दावली. वैसे ही तेवर.

राजकमल प्रकाशन ने डोढ़ाय चरित मानस को
फिर से प्रकाशित किया है
                                  
असल में, हिंदी और भारतीय भाषाओं के साहित्य में कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ना भर एक पाठकीय अनुभव नहीं, बल्कि समय और समाज के भीतर उतरने की एक यात्रा होता है. डोढ़ाय चरित मानस ऐसी ही कृति है.
यह उपन्यास अपने समय के साथ-साथ हमारे समय को भी उतनी ही तीक्ष्णता से पढ़ता है. इसे पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि हम किसी बीते हुए भारत की कहानी नहीं, बल्कि आज के भारत की जड़ों को पढ़ रहे हैं.

सतीनाथ भादुड़ी का यह उपन्यास शीर्षक से ही एक दिलचस्प छल करता है. ‘चरित मानस’ यह शब्द आते ही स्मृति में सिर्फ भगवान श्रीराम की छवि उभरती है, जहाँ नायक एक आदर्श पुरुष है, मर्यादा का प्रतीक. लेकिन यहाँ भादुड़ी जिस ‘चरित’ को लिखते हैं, उसका नायक है डोढ़ाय.

एक साधारण, उलझा हुआ, परिस्थितियों में बहता हुआ मनुष्य.

यह शीर्षक दरअसल एक विडंबनात्मक उद्घोषणा है: यहाँ कोई राम नहीं है, यहाँ मनुष्य है, अपने सारे दोषों, कमजोरियों और भ्रमों के साथ.

सतीनाथ भादुड़ी


डोढ़ाय कोई असाधारण पात्र नहीं है. वह न तो क्रांतिकारी है, न दार्शनिक, न ही कोई नैतिक नायक. वह वही है, जो भारत के गाँवों में हर जगह दिखाई देता है. एक ऐसा आदमी, जो परिस्थितियों के साथ बहता है, कभी इधर, कभी उधर.

लेकिन भादुड़ी की ताकत यही है कि वे इसी ‘साधारण’ को असाधारण बना देते हैं.

डोढ़ाय का जीवन दरअसल उस दौर के भारतीय समाज का दर्पण बन जाता है, जहाँ स्वतंत्रता आंदोलन की ऊँची-ऊँची बातें गाँव की जमीन पर आकर अजीब-सी विडंबनाओं में बदल जाती हैं.



इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत इसका राजनीतिक दृष्टिकोण है. लेकिन, यह राजनीति ऊपर से नहीं, नीचे से देखी गई है. यहाँ गांधी, कांग्रेस, आंदोलन ये सब मौजूद हैं, लेकिन केंद्र में नहीं हैं. केंद्र में है वह आदमी, जो इन सबके बीच फँसा हुआ है.

डोढ़ाय राजनीति को समझने नहीं जाता, राजनीति उसे घेर लेती है. वह कभी आंदोलन का हिस्सा बनता है, कभी उससे दूर चला जाता है, कभी उसका इस्तेमाल होता है, और कभी वह खुद दूसरों का इस्तेमाल करता है. इस पूरे खेल में आदर्श धीरे-धीरे छीजते जाते हैं और बचती है सिर्फ एक कच्ची, असहज सचाई.

भादुड़ी का व्यंग्य यहाँ बहुत धारदार है, लेकिन वह शोर नहीं करता. वह चुपचाप, लगभग सहज ढंग से हमारे सामने खुलता है. यह व्यंग्य किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर है. उस राजनीति पर, जो जनता के नाम पर चलती है, लेकिन जनता को ही सबसे ज्यादा भ्रमित करती है.

इस लिहाज से देखें तो यह उपन्यास आगे चलकर राग दरबारी जैसी कृतियों की जमीन तैयार करता दिखाई देता है. फर्क बस इतना है कि जहाँ ‘राग दरबारी’ में व्यंग्य खुलकर सामने आता है, वहीं भादुड़ी के यहाँ वह धीमे-धीमे रिसता है.

उपन्यास का आंचलिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है. यह सिर्फ एक राजनीतिक कथा नहीं, बल्कि गाँव के जीवन का सूक्ष्म दस्तावेज़ है. भाषा, बोली, रीति-रिवाज, सामाजिक संबंध सब कुछ इतनी बारीकी से दर्ज है कि पाठक को लगता है, वह किसी गाँव में बैठा यह सब देख रहा है.

भादुड़ी की भाषा में एक तरह की ‘लोक गंध’ है. वह सजावटी नहीं है, लेकिन बेहद प्रभावी है. यह भाषा अपने आप में एक सांस्कृतिक प्रतिरोध भी है, क्योंकि यह उस समय के साहित्यिक मानकों से अलग रास्ता चुनती है. और जैसा, गिरीन्द्र बता रहे थे, यह रेणुजी की औपन्यासिक कथा-भूमि का प्रीक्वल है.

लेकिन इस उपन्यास को सिर्फ आंचलिकता तक सीमित करना उसके साथ अन्याय होगा. इसकी असली शक्ति इसके दार्शनिक अंतरतम में है.

डोढ़ाय का जीवन हमें बार-बार यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या मनुष्य वास्तव में अपने निर्णयों का स्वामी है, या वह सिर्फ परिस्थितियों का परिणाम है? क्या वह सच में कोई रास्ता चुनता है, या रास्ते उसे चुन लेते हैं? यह सवाल उपन्यास में कहीं सीधे नहीं पूछा गया, लेकिन हर घटना, हर मोड़ पर यह हमारे सामने खड़ा हो जाता है.

डोढ़ाय का चरित्र इसी संदर्भ में बेहद जटिल हो जाता है. वह न तो पूरी तरह निर्दोष है, न पूरी तरह दोषी. वह कभी सहानुभूति जगाता है, तो कभी झुंझलाहट. लेकिन शायद यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी सफलता है. यह हमें किसी एक नैतिक निष्कर्ष तक नहीं पहुँचने देता. यह हमें मजबूर करता है कि हम मनुष्य को उसकी पूरी जटिलता में देखें.

यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि भादुड़ी अपने पात्रों के साथ कोई नैतिक निर्णय नहीं सुनाते. वे उन्हें जज नहीं करते. वे सिर्फ उन्हें प्रस्तुत करते हैं. जैसे वे हैं. यह दृष्टिकोण अपने आप में बहुत आधुनिक है. यह हमें याद दिलाता है कि

साहित्य का काम सिर्फ उपदेश देना नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं को उजागर करना भी है.

अगर इस उपन्यास की तुलना करनी हो, तो हिंदी में गोदान का नाम स्वाभाविक रूप से आता है. लेकिन ‘गोदान’ जहाँ किसान जीवन की त्रासदी को अधिक भावुक और नैतिक धरातल पर प्रस्तुत करता है, वहीं ‘डोढ़ाय चरित मानस’ उस त्रासदी को एक राजनीतिक और विडंबनात्मक परिप्रेक्ष्य में देखता है. यहाँ करुणा है, लेकिन वह करुणा भी एक तरह की बेचैनी के साथ आती है.

आज के समय में इस उपन्यास को पढ़ना एक अलग ही अनुभव है. जब हम लोकतंत्र, राजनीति और आम आदमी की बात करते हैं, तो अक्सर हम बड़े सिद्धांतों और आदर्शों की बात करते हैं. लेकिन भादुड़ी हमें उस जमीन पर ले जाते हैं, जहाँ ये आदर्श टूटते हैं, बिखरते हैं और कई बार अपना अर्थ ही खो देते हैं.

संभवतया, अपने कथा वितान को अधिक तानने के लिए ही भादुड़ी डोढ़ाय को अपने गांव के मरनाधार से उठाकर (भगाकर) कोयरीटोला में जाकर स्थापित करते हैं. अपने मूल गांव में जहां बहुत सारे किरदार हैं, बौका बाबा हैं, रमिया है. महतो हैं, छड़ीदार हैं. रबिया है, नायब है, वहीं कोयरी टोला में भी सगिया नायिक है, मोसम्मात है, गिदन है, बाबू साहेब हैं.

राजनीति और जातीय कोण इस कथा को अधिक जटिल और अधिक परतदार बनाते हैं.

यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र सिर्फ चुनावों और नारों का खेल नहीं है, बल्कि वह उन लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी से बनता है, जिनकी आवाज़ अक्सर कहीं दर्ज ही नहीं होती.

‘डोढ़ाय चरित मानस’ इस मायने में सिर्फ एक उपन्यास नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ है. यह हमें उस भारत से मिलवाता है, जो अक्सर इतिहास की किताबों में नहीं मिलता. यह हमें बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ एक महान कथा नहीं था, बल्कि उसमें असंख्य छोटी-छोटी कहानियाँ थीं. भ्रम की, संघर्ष की, और कई बार विफलताओं की.

भादुड़ी की यह कृति इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह हमें अपने समय को समझने का एक आईना देती है. यह आईना चमकदार नहीं है, उसमें धुंधलापन है, खरोंचें हैं. लेकिन शायद सच हमेशा ऐसा ही होता है.

अगर आपने डोढ़ाय चरित मानस नहीं पढ़ा है और आप साहित्य के अनुरागी हैं तो आपको पहली फुरसत में यह किताब पढ़नी चाहिए. राजकमल ने नए कलेवर में इसी साल फिर से उतारा है.