सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

त्योहार की थाली पर धर्म का पहरा: क्या सिलीगुड़ी में खरीदारी भी सांप्रदायिक पहचान से तय होगी?

त्योहार की थाली पर धर्म का पहरा: क्या सिलीगुड़ी में आस्था और आजीविका के बीच खिंच रही है नई लकीर?

दुर्गापूजा बंगाल में केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कला, शिल्प, खान-पान, रोजगार और सामुदायिक जीवन का एक बड़ा उत्सव है. महीनों पहले से कुम्हार मूर्तियां बनाने लगते हैं, कलाकार पंडाल सजाने में जुट जाते हैं, कारीगर प्रतिमा के आभूषण तैयार करते हैं और छोटे दुकानदार त्योहार के कारोबार की उम्मीद में अपनी पूंजी लगाते हैं.

लेकिन इसी उत्सवी मौसम में सिलीगुड़ी से आई एक खबर ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है: क्या अब त्योहार की खरीदारी में भी दुकानदार का धर्म, उसके सामान की गुणवत्ता और कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण होने जा रहा है?

11 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित खबरों के अनुसार, सिलीगुड़ी में हिंदू जागरण मंच ने ऐसे पोस्टर लगाए, जिनमें लोगों से हिंदू दुकानों से बिरयानी और पूजा-सामग्री खरीदने की अपील की गई.

संगठन ने इसे आदेश नहीं, बल्कि हिंदू कारोबारियों को आर्थिक समर्थन देने की अपील बताया. दूसरी ओर, स्थानीय आलोचकों और वामपंथी नेताओं ने इस अभियान पर आपत्ति जताई और धार्मिक पहचान के आधार पर बाजार को बांटने की आशंका व्यक्त की.

यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके केंद्र में केवल एक पोस्टर या बिरयानी की दुकान नहीं है. सवाल उस आर्थिक व्यवहार का है, जिसमें ग्राहक और दुकानदार के बीच भरोसे, कीमत, गुणवत्ता और सेवा के रिश्ते की जगह धार्मिक पहचान लेने लगे.

‘अपील’ और सामाजिक दबाव के बीच की दूरी

किसी भी नागरिक को अपनी पसंद के दुकानदार से सामान खरीदने का अधिकार है. कोई व्यक्ति किसी खास कारोबार, स्थानीय उत्पाद या छोटे उद्यमी का समर्थन करना चाहे, तो इसमें अपने आप में कोई समस्या नहीं है. धार्मिक समुदायों के भीतर आर्थिक सहयोग की पहल भी लोकतांत्रिक समाज में चर्चा का वैध विषय हो सकती है.

लेकिन जब अपील यह कहने लगे कि सामान किस धर्म के व्यक्ति से खरीदना चाहिए, तब उसका सामाजिक अर्थ बदल जाता है. ऐसी अपील ग्राहक को केवल एक विकल्प नहीं देती; वह खरीदारी को धार्मिक निष्ठा की कसौटी भी बना सकती है.

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा. किसी दुकान को चुनना ग्राहक का निजी निर्णय है, लेकिन सार्वजनिक अभियान के जरिए दुकानदारों की धार्मिक पहचान के आधार पर खरीदारी को प्रोत्साहित करना एक व्यापक सामाजिक संदेश देता है.

यदि ऐसा संदेश बार-बार दोहराया जाए, तो दूसरे समुदाय के कारोबारी को ग्राहक खोने का डर हो सकता है. ग्राहक भी यह सोच सकता है कि किसी खास दुकान से सामान खरीदना उसके समुदाय के प्रति निष्ठा का प्रश्न बना दिया जाएगा.

फिलहाल सिलीगुड़ी में इस अभियान के कारण कितने कारोबारियों को वास्तविक आर्थिक नुकसान हुआ है, इसका प्रमाण उपलब्ध खबरों में नहीं दिया गया है. इसलिए नुकसान को घटित तथ्य की तरह पेश करना उचित नहीं होगा. लेकिन आर्थिक बहिष्कार की आशंका और बाजार में पैदा होने वाला सामाजिक दबाव अपने आप में गंभीर सवाल हैं.

त्योहारों की अर्थव्यवस्था किसी एक समुदाय की नहीं

दुर्गापूजा की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए पंडाल के सामने लगी रोशनी से आगे देखना होगा. इसमें मूर्तिकार, बांस और कपड़े के कारोबारी, बिजली मिस्त्री, बढ़ई, चित्रकार, फूल विक्रेता, दर्जी, खाद्य विक्रेता, परिवहनकर्मी और असंख्य छोटे उद्यमी शामिल होते हैं. इनमें अलग-अलग धर्मों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग काम करते हैं.

रिपोर्टों में इस बात का भी उल्लेख है कि दुर्गापूजा की सजावट और शोलापिथ के आभूषणों से जुड़े कारीगरों में मुस्लिम कारीगर भी शामिल हैं.

यह साझेदारी कोई असाधारण सामाजिक प्रयोग नहीं है. भारतीय त्योहारों की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक रूप से श्रम के इस परस्पर निर्भर रिश्ते पर टिकी रही है. पूजा किसी की आस्था हो सकती है, लेकिन उसके आयोजन में लगने वाला श्रम अनेक लोगों की आजीविका का साधन बनता है.

इसलिए सवाल यह नहीं है कि हिंदू व्यापारी को कारोबार क्यों मिले. सवाल यह है कि क्या उसे समर्थन देने का एकमात्र रास्ता मुस्लिम व्यापारी से दूरी बनाना है? क्या स्थानीय कारोबार को मजबूत करने के लिए धार्मिक पहचान को सामने लाना जरूरी है? क्या छोटे दुकानदारों की मदद के लिए बेहतर बाजार, उचित ऋण, प्रशिक्षण, डिजिटल भुगतान और ग्राहकों तक पहुंच जैसे विकल्प नहीं हैं?

यदि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना उद्देश्य है, तो वह प्रयास कारोबारियों की धार्मिक पहचान के बजाय उनकी जरूरतों और आर्थिक स्थिति पर आधारित होना चाहिए.

बिरयानी से बड़ा सवाल

इस विवाद में बिरयानी का उल्लेख प्रतीकात्मक महत्व रखता है. भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं होता; वह स्मृति, स्वाद, संस्कृति और सामाजिक मेलजोल का हिस्सा भी है.

बंगाल की खाद्य संस्कृति में अलग-अलग परंपराओं और समुदायों का योगदान रहा है. किसी व्यंजन को किसी एक धर्म की स्थायी संपत्ति मान लेना इस सांस्कृतिक इतिहास को संकुचित करना होगा.

बिरयानी बनाने वाला व्यक्ति हिंदू है या मुस्लिम, यह जानना ग्राहक का अधिकार हो सकता है, लेकिन इसे खरीदारी की अनिवार्य कसौटी बना देना एक अलग बात है.

इसी तरह पूजा-सामग्री की दुकान चलाने वाले की धार्मिक पहचान से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होना चाहिए कि वह गुणवत्तापूर्ण सामान उचित कीमत पर उपलब्ध करा रहा है या नहीं.

बाजार का एक बुनियादी सिद्धांत है कि ग्राहक अपने विवेक से निर्णय ले. जब इस निर्णय पर सामुदायिक दबाव हावी होने लगता है, तब बाजार केवल वस्तुओं के लेन-देन की जगह नहीं रहता; वह पहचान की राजनीति का मैदान बन सकता है.

संविधान और नागरिकता का प्रश्न

भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों की रक्षा करता है. अनुच्छेद 15 राज्य को धर्म सहित कुछ आधारों पर भेदभाव करने से रोकता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को पेशा अपनाने, व्यापार करने और व्यवसाय चलाने का अधिकार देता है. इन प्रावधानों का कानूनी दायरा और निजी व्यक्तियों पर उनका लागू होना अलग-अलग प्रश्न हैं; इसलिए हर धार्मिक अपील को स्वतः असंवैधानिक घोषित करना सही नहीं होगा.

फिर भी संवैधानिक मूल्यों का सामाजिक महत्व अदालतों की व्याख्या तक सीमित नहीं है. समान नागरिकता का अर्थ है कि किसी व्यक्ति की आजीविका और सामाजिक प्रतिष्ठा केवल उसकी धार्मिक पहचान के कारण संदेह के घेरे में न आए.

लोकतंत्र में किसी संगठन को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता है. उसी तरह नागरिकों को उस विचार की आलोचना करने का भी अधिकार है. इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते समय भी संयम जरूरी है. पूरे हिंदू समाज को इस अभियान से जोड़ना उतना ही अनुचित होगा, जितना किसी समुदाय के सभी कारोबारियों को एक ही नजर से देखना.

क्या त्योहारों की अर्थव्यवस्था अगला कम्युनल प्लैशपॉइन्ट बनेगी?

सिलीगुड़ी के पोस्टर अपने आप में यह साबित नहीं करते कि बंगाल की त्योहार अर्थव्यवस्था धार्मिक आधार पर बंट चुकी है. लेकिन वे एक ऐसी प्रवृत्ति की ओर ध्यान खींचते हैं, जिसमें खाना खरीदना, दुकान चुनना, कारोबार करना जैसी रोजमर्रा की गतिविधियां सामुदायिक पहचान के चश्मे से देखी जाने लगती हैं.

इसका असर केवल अल्पसंख्यक दुकानदारों तक सीमित नहीं रह सकता. यदि ग्राहक की पसंद पर पहचान का दबाव बढ़ता है, तो कारोबारियों के बीच प्रतिस्पर्धा भी गुणवत्ता और कीमत से हटकर धार्मिक पहचान पर टिक सकती है.

अंततः नुकसान उन छोटे व्यवसायों का होगा, जिनके पास बड़े बाजारों और ग्राहकों तक पहुंच बनाने के सीमित साधन हैं.

प्रशासन की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है. उसे किसी वैध अपील पर केवल उसके राजनीतिक संदेश के कारण कार्रवाई करने के बजाय यह देखना चाहिए कि कहीं धमकी, जबरदस्ती, सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा या किसी के कारोबार को रोकने की कोशिश तो नहीं हो रही. साथ ही, राजनीतिक और सामाजिक संगठनों को भी समझना होगा कि उनके संदेशों का असर पोस्टर लगाने तक सीमित नहीं रहता.

दुर्गापूजा की असली शक्ति उसकी भव्यता में ही नहीं, बल्कि उस सामूहिक श्रम में भी है जो उसे संभव बनाता है.

पंडाल की सजावट करने वाले हाथों, प्रतिमा गढ़ने वाले कलाकारों और बाजार में सामान बेचने वाले छोटे कारोबारियों की आजीविका को धार्मिक खांचों में बांटना त्योहार के सामाजिक आधार को कमजोर कर सकता है.

सवाल यह नहीं कि किस धर्म की दुकान से खरीदारी हो. सवाल यह है कि क्या हम ऐसा बाजार चाहते हैं, जहां ग्राहक का फैसला उसकी पसंद से हो या उसकी धार्मिक पहचान से?

दुर्गापूजा की रोशनी तभी व्यापक अर्थ में उत्सव बनेगी, जब उसके उजाले में काम करने वाले हर कारीगर और कारोबारी को अपनी मेहनत के लिए सम्मान और अवसर मिले. त्योहार लोगों को जोड़ने का अवसर है—उसे आर्थिक बहिष्कार की परीक्षा में बदल देना किसी के भी हित में नहीं है.

क्या ऐसा करके हम एक और पाकिस्तान के विचार को सींच नहीं रहे हैं?

जगदंब अहिं अवलंब हमर 🙏 | माँ दुर्गा की भावुक स्तुति | मैथिली और हिंदी भक्ति गीत #Shorts





 जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर,

हे माए अहाँ बिनु आस केकर।
हे माए अहाँ बिनु आस केकर,
हे माए अहाँ बिनु आस केकर।
जँ माए अहाँ दुःख नै सुनबय,
तऽ जाय कहु ककरा कहबय।
करू माफ़ जननी अपराध हमर,
हे माए अहाँ बिनु आस केकर। 

जय माता दी! जय जगदंबे! 

“जगदंब अहिं अवलंब हमर” माँ दुर्गा के चरणों में समर्पित एक भावपूर्ण स्तुति है। इसमें माँ जगदंबा को अपना सहारा मानते हुए उनके प्रति श्रद्धा, विश्वास और समर्पण का भाव व्यक्त किया गया है।

मैथिली और हिंदी में गाई गई यह भक्तिमय प्रस्तुति माँ दुर्गा के भक्तों के लिए प्रेम, आस्था और आध्यात्मिक शांति का अनुभव है।

माँ जगदंबा सब पर अपनी कृपा बनाए रखें।

अगर यह स्तुति आपके हृदय को छू जाए, तो वीडियो को Like करें, अपने परिवार और मित्रों के साथ Share करें.

जय माँ दुर्गा! जय जगदंबे!

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शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

सोशल मीडिया पर विचार मुफ्त, लेकिन पहुँच महँगी! क्या एल्गोरिद्म तय करेगा कि हम क्या पढ़ें और क्या सोचें?

  • इस लेख में जानिए
  • विचार मुफ्त, पहुँच महँगी: X, Facebook और Instagram पर पेड सदस्यता तथा प्रीमियम सुविधाएँ आम यूजर की दृश्यता को कैसे प्रभावित कर सकती हैं? 
  • एल्गोरिद्म का अदृश्य संपादक: सोशल मीडिया पर कौन-सी पोस्ट दिखाई देगी और कौन-सी पीछे रह जाएगी, यह कैसे तय होता है?
  • लेख बनाम रील्स: क्या वीडियो और मौलिक सामग्री को प्राथमिकता देने वाली नीतियाँ गंभीर लेखन की पहुँच को प्रभावित करती हैं?

डिजिटल लोकतंत्र और जवाबदेही: क्या सोशल मीडिया कंपनियों को अपने एल्गोरिद्म, पेड रीच और सामग्री वितरण के नियम अधिक पारदर्शी बनाने चाहिए?

सोशल मीडिया पर विचार मुफ्त, लेकिन उनकी पहुँच महँगी! क्या एल्गोरिद्म तय करेगा कि हम क्या पढ़ें और क्या सोचें?

आपको याद होगा, आज से 15-16 साल पहले जब फेसबुक पर साइन इन किया था, तो उसमें लिखा थाः इट्स फ्री ऐंड विल बी फ्री. पर अब वो बात कहां!

एक समय था जब ट्विटर, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आम आदमी को अपनी बात कहने का लगभग मुफ्त मंच देते थे. आज सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धीरे-धीरे भुगतान करने की क्षमता पर निर्भर होती जा रही है?

एक दौर था जब ट्विटर पर कोई पत्रकार, लेखक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता या आम नागरिक अपने विचार लिखता था. फेसबुक पर कोई लंबा लेख साझा करता था, कोई कविता लिखता था, कोई राजनीतिक टिप्पणी करता था.

उस पोस्ट को कितने लोग पढ़ेंगे, यह काफी हद तक उसके नेटवर्क, पाठकों की दिलचस्पी और उस समय की प्लेटफॉर्म व्यवस्था पर निर्भर करता था. बेशक, तब भी एल्गोरिद्म और व्यावसायिक हित मौजूद थे, लेकिन आज की तरह प्रीमियम सदस्यता और पेड सुविधाओं का इतना स्पष्ट बाजार सामने नहीं था.

अब तस्वीर बदल चुकी है. ट्विटर, जो अब X है, से लेकर फेसबुक और इंस्टाग्राम तक, सोशल मीडिया कंपनियों ने सदस्यता, वेरिफिकेशन बैज और प्रीमियम सुविधाओं के जरिए कमाई के नए रास्ते बना लिए हैं.

सवाल इन सुविधाओं के अस्तित्व से नहीं, बल्कि उस असमानता से है जो इनके कारण सूचना और विचारों की पहुँच में पैदा हो सकती है.




ब्लू टिक: पहचान का प्रतीक या डिजिटल विशेषाधिकार?

एलन मस्क के स्वामित्व वाले X पर ब्लू टिक का अर्थ बदल चुका है. पहले यह मुख्य रूप से किसी अकाउंट की प्रामाणिकता, सार्वजनिक पहचान और उल्लेखनीयता की पुष्टि से जुड़ा था.

अब ब्लू टिक मुख्यतः प्रीमियम सदस्यता से जुड़ा है. प्रीमियम सदस्यता में जवाबों को प्राथमिकता देने जैसी सुविधाएँ भी शामिल हैं. यानी भुगतान करने वाले यूजर को कुछ ऐसे उपकरण मिलते हैं जो उसकी प्लेटफॉर्म पर उपस्थिति को प्रभावित कर सकते हैं.

लेकिन यहाँ एक जरूरी सवाल उठता है. अगर किसी लेखक के पास पैसे देकर प्रीमियम सदस्यता लेने का विकल्प नहीं है, तो क्या उसके विचारों को समान अवसर मिल रहा है? क्या उसकी पोस्ट केवल इसलिए पीछे रह सकती है कि दूसरे यूजर के पास जवाबों में प्राथमिकता पाने जैसी सुविधा है?

इसका अर्थ है कि जब मार्केटिंग और रीच की सुविधाएँ सिर्फ भुगतान करने वाले यूजर्स के लिए उपलब्ध हों, तो डिजिटल समानता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

फेसबुक और इंस्टाग्राम पर भी Meta Verified जैसी सशुल्क सेवाएँ उपलब्ध हैं. इनमें वेरिफिकेशन, अकाउंट सुरक्षा और सहायता जैसी सुविधाएँ शामिल हैं.

Meta ने भारत में सेवा शुरू करते समय स्पष्ट किया था कि वहाँ सदस्यता के साथ अतिरिक्त रीच देने की सुविधा शामिल नहीं होगी. लेकिन क्या यह सच है?

लेख पीछे, वीडियो आगे: क्या पढ़ने की संस्कृति बदल रही है?

सोशल मीडिया पर एक और बदलाव दिखाई देता है. तस्वीरें, छोटे वीडियो और रील्स अक्सर लंबी लिखित पोस्ट की तुलना में अधिक लोगों तक पहुँचती दिखाई देती हैं. खासकर उन प्लेटफॉर्मों पर जहाँ वीडियो देखना, स्क्रॉल करना और तुरंत प्रतिक्रिया देना यूजर के अनुभव का प्रमुख हिस्सा है.

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि लिखित विचार अब अप्रासंगिक हो गए हैं? बिल्कुल नहीं. राजनीति, इतिहास, समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति जैसे विषयों पर गंभीर आलेखों की अपनी अहमियत है.

समस्या तब पैदा होती है जब किसी प्लेटफॉर्म की वितरण-व्यवस्था पाठक का ध्यान आकर्षित करने वाले प्रारूपों को अधिक अवसर देती है और गहरे विश्लेषण की पहुँच सीमित हो जाती है.

Meta ने मार्च 2026 में फेसबुक पर मौलिक सामग्री और Reels को प्राथमिकता देने की अपनी नीति के बारे में जानकारी दी थी.

कंपनी के अनुसार, ओरिजनल वीडियो को अधिक रीच देने और दोहराई गई या कम मौलिक सामग्री की पहुँच घटाने पर काम किया जा रहा है. यह इस बात का उदाहरण है कि प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिद्म के जरिए तय करते हैं कि किस प्रकार की सामग्री को अधिक अवसर मिलेगा. लेकिन यह बात भी पूरी तरह सही नहीं है.

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वीडियो लोकप्रिय क्यों हैं. सवाल यह भी है कि क्या लिखित विचारों, गंभीर बहस और लंबे विश्लेषण को भी उतनी ही पारदर्शी और न्यायसंगत वितरण-व्यवस्था मिलती है?

एल्गोरिद्म का अदृश्य संपादक कौन है?

सोशल मीडिया पर संपादक की भूमिका का एक हिस्सा एल्गोरिद्म निभाता है. वही तय करने में मदद करता है कि यूजर के सामने कौन-सी पोस्ट आएगी, किसे सुझाया जाएगा और किस सामग्री को कम दृश्यता मिलेगी.

X ने अपने अनुशंसा तंत्र का कुछ कोड सार्वजनिक भी किया है, लेकिन पूरे प्लेटफॉर्म पर हर पोस्ट को मिलने वाली वास्तविक पहुँच को केवल एक नियम से नहीं समझा जा सकता.

यहीं एक बड़ी लोकतांत्रिक चुनौती पैदा होती है. यदि किसी पोस्ट को कम लोग देखते हैं, तो क्या वह इसलिए पीछे रह गई कि उसमें लोगों की दिलचस्पी नहीं थी? क्या उसकी प्रस्तुति कमजोर थी? क्या वह किसी नीति के तहत सीमित की गई? या उसके सामने ऐसी सामग्री थी जिसे एल्गोरिद्म ने अधिक प्रासंगिक मान लिया?

इन सवालों के जवाब हमेशा यूजर को नहीं मिलते.

पेड बूस्ट से पैदा होता फिल्टर बबल

पेड बूस्ट इस तस्वीर का दूसरा पहलू है. विज्ञापन के जरिए कोई व्यक्ति, कंपनी, राजनीतिक दल या संगठन अपनी सामग्री को अधिक लोगों तक पहुँचा सकता है.

बेशक, यह वैध व्यावसायिक सुविधा है, लेकिन इससे यह अंतर पैदा होता है कि किसके पास अपनी बात फैलाने के लिए अतिरिक्त बजट है और किसके पास केवल अपने शब्द.

इसका अर्थ यह है कि डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र में दृश्यता के कई रास्ते हैं, पर एल्गोरिद्मिक चयन पर और कुछ सीधे भुगतान से मिलने वाली रीच एक तरह से सोशल मीडिया के कथित लोकतांत्रिक स्वरूप को बाधा पहुंचाती है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल पोस्ट लिख देने का अधिकार नहीं है. सार्वजनिक बहस में उस पोस्ट के दिखाई देने और सुने जाने की संभावना भी मायने रखती है. जब दृश्यता के नियम अस्पष्ट हों, तो प्लेटफॉर्म की जवाबदेही का सवाल उठना चाहिए.

एलन मस्क और भारत-विरोधी सामग्री का सवाल

इस बहस का एक राजनीतिक पहलू भी है. एलन मस्क सिर्फ X के मालिक नहीं हैं; वे वैश्विक कारोबारी हितों और राजनीतिक शक्ति के बीच सक्रिय रहने वाले उद्योगपति भी हैं. भारत के साथ उनके कारोबारी संबंधों में टेस्ला, स्टारलिंक और भारतीय बाजार से जुड़े कई सवाल शामिल रहे हैं.

भारत के कुछ बड़े कारोबारी समूहों के साथ मस्क के तनाव और भारतीय बाजार में स्टारलिंक की संभावनाओं को लेकर विवाद सबकी निगाहों में हैं. इससे भारत में उनके कारोबारी हितों और सार्वजनिक बयानों पर चर्चा फिर तेज हुई. इस विवाद में राहुल ने मस्क का पक्ष लिया है, इससे कई कोण, संभावनाओं और आशंकाओं को बल मिलता है.

ऐसे माहौल में एक प्रश्न उठाना अनुचित नहीं है: अगर किसी प्लेटफॉर्म का मालिक किसी देश की सरकार, उसके नियामकों या कारोबारी व्यवस्था से असहमत हो, तो क्या उसके निजी हित उस प्लेटफॉर्म की नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं?

क्या आपकी वॉल पर दनादन सीजेपी प्रोटेस्ट के वीडियो, रील और पोस्ट आ रहे हैं? क्या यह सोची-समझी चाल या रणनीति नहीं हो सकती है?

क्या एलन मस्क प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से खफा हैं और इसी कारण X पर भारत-विरोधी सामग्री को बढ़ावा दे रहे हैं?

यह भी जरूरी है कि भारत सरकार की आलोचना, किसी सरकारी नीति का विरोध, भारत की सामाजिक समस्याओं पर रिपोर्टिंग और देश के प्रति शत्रुतापूर्ण दुष्प्रचार को एक ही श्रेणी में न रखा जाए.

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना वैध अभिव्यक्ति है. किसी देश के बारे में झूठी या भ्रामक सूचना फैलाना एक अलग मामला है.

फिर भी, एक बुनियादी सवाल अपनी जगह कायम है: जब एक निजी कंपनी करोड़ों लोगों के सूचना-संसार को प्रभावित कर सकती है, तो उसके मालिक की व्यक्तिगत पसंद, कारोबारी हित और राजनीतिक संबंध कितने पारदर्शी हैं? और अगर एल्गोरिद्म में पक्षपात का संदेह पैदा हो, तो उसकी स्वतंत्र जाँच कैसे होगी?
डिजिटल लोकतंत्र को पारदर्शिता चाहिए

सोशल मीडिया ने आम नागरिक को आवाज दी है. किसी छोटे शहर का पत्रकार, किसी गाँव का शिक्षक, कोई स्वतंत्र लेखक या सामाजिक कार्यकर्ता बिना बड़े मीडिया संस्थान के भी अपनी बात लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है. इस उपलब्धि को कम करके नहीं आँका जा सकता.

लेकिन इसी उपलब्धि के साथ एक नया जोखिम भी आया है. मंच मुफ्त हो सकता है, पर ध्यान सीमित है. पोस्ट लिखना मुफ्त हो सकता है, पर उसे अधिक लोगों तक पहुँचाने के साधन समान नहीं हैं. और एल्गोरिद्म की व्यवस्था इतनी जटिल हो सकती है कि यूजर को यह समझ ही न आए कि उसकी सामग्री क्यों दिखाई गई या क्यों नहीं दिखाई गई.

इसलिए सोशल मीडिया कंपनियों से कुछ बुनियादी सवाल पूछे जाने चाहिए. क्या वे अपने अनुशंसा तंत्र के प्रमुख नियमों को स्पष्ट करती हैं? क्या यूजर समझ सकता है कि उसकी पोस्ट की पहुँच किन कारणों से प्रभावित हुई?

क्या शोधकर्ताओं को गोपनीयता सुरक्षित रखते हुए स्वतंत्र अध्ययन के लिए पर्याप्त डेटा मिलता है? क्या भुगतान करने वाले और मुफ्त यूजर के बीच दृश्यता के अंतर को साफ-साफ बताया जाता है?

ये सवाल किसी एक कंपनी, एक नेता या एक विचारधारा तक सीमित नहीं हैं. ये डिजिटल सार्वजनिक जीवन की गुणवत्ता से जुड़े सवाल हैं.

लोकतंत्र में हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार होना चाहिए. लेकिन अगर कुछ कंपनियाँ ही यह तय करने लगें कि कौन-सी आवाज कितनी दूर तक सुनाई देगी, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग भी उतनी ही जरूरी हो जाती है.

क्योंकि विचारों की दुनिया में सबसे बड़ा विशेषाधिकार केवल बोल पाना नहीं, बल्कि सुना जाना है. और जब सुनाई देने की संभावना बाजार, एल्गोरिद्म तथा निजी शक्ति के मेल से तय होने लगे, तब सवाल पूछना किसी एक प्लेटफॉर्म के खिलाफ अभियान नहीं—लोकतांत्रिक समाज की जरूरत है.

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: क्या सोशल मीडिया पर पैसे देने से पोस्ट की पहुँच बढ़ती है?
उत्तर: यह प्लेटफॉर्म और सदस्यता की सुविधाओं पर निर्भर करता है। X Premium में जवाबों को प्राथमिकता देने जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। वहीं, विज्ञापन के माध्यम से पोस्ट को अधिक लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। लेकिन किसी भी सशुल्क सुविधा से हर पोस्ट की पहुँच बढ़ने की गारंटी नहीं मिलती।

प्रश्न 2: सोशल मीडिया एल्गोरिद्म क्या होता है?
उत्तर:
सोशल मीडिया एल्गोरिद्म उन प्रणालियों का समूह है जो यह तय करने में मदद करता है कि यूजर को उसकी फीड, सर्च और सुझावों में कौन-सी सामग्री दिखाई जाए। इसमें यूजर की गतिविधि, सामग्री की प्रासंगिकता और प्लेटफॉर्म के अन्य संकेतक भूमिका निभा सकते हैं।

प्रश्न 3: क्या Facebook और Instagram पर Meta Verified लेने से अधिक रीच मिलती है?
उत्तर: Meta Verified में सत्यापित बैज, अकाउंट सुरक्षा और सहायता जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। भारत में व्यक्तिगत यूजर्स के लिए Meta Verified शुरू करते समय Meta ने अतिरिक्त रीच को सदस्यता का हिस्सा नहीं रखा था। कुछ व्यावसायिक योजनाओं में खोजे जाने और ग्राहकों से जुड़ने के लिए अतिरिक्त सुविधाएँ हो सकती हैं। इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि हर Meta Verified सदस्य को स्वतः अधिक रीच मिलती है।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

सिंधु जल समझौता: पाकिस्तान के आरोप और भारत के खिलाफ नैरेटिव की राजनीति

इस लेख में जानिए

  • पानी को हथियार बनाने का आरोप: पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की जल नीति को किस तरह पेश कर रहा है?
  • यूरोप से इस्लामाबाद तक नैरेटिव की लड़ाई: सीमा-पार जल संसाधनों पर आयोजित सम्मेलनों और पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयासों में क्या संदेश दिया जा रहा है?
  • सिंधु जल समझौते में पानी का बँटवारा: पूर्वी और पश्चिमी नदियों के पानी के उपयोग के अधिकार भारत और पाकिस्तान को कैसे दिए गए?
  • धमकियाँ बनाम जलविज्ञान: चिनाब नदी के प्रवाह, रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं और भारत पर लगाए जा रहे आरोपों को समझना क्यों जरूरी है?
सिंधु जल समझौते पर नेतागण देश के अंदर चाहे जितने ताल ठोंक लें, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी बातें नहीं चलतीं. दूसरी बात, सिंधु का पानी रोक देंगे जैसे दक्षिणपंथी दावों से भी पाकिस्तान का पक्ष मजबूत होता है.

आजादी के बाद से ही पाकिस्तान फॉल्स नैरेटिव गढ़ने का उस्ताद रहा है. उसका आरोप है कि भारत पानी को हथियार बना रहा है.

असल में, ब्रसेल्स में “ट्रांसबाउंड्री वॉटर रिसोर्सेजः अ वीपनाइज्ड ग्लोबल कॉमन” नाम से आयोजित एक महत्वपूर्ण नीति सम्मेलन में सीमा-पार जल संसाधनों को ‘हथियार बनाए जा सकने वाला वैश्विक साझा संसाधन’ बताया गया. अब ध्यान दीजिए कि इस सम्मेलन का आयोजन किसने किया था! सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी स्टडीज (सीईपीएस) और और यूरोपीय संघ में पाकिस्तान के मिशन ने मिलकर.

अब यूरोपीय देश पानी की कमी से मर रहे किसानों और खासकर प्यास से तड़पते बच्चों की तस्वीरें देखकर पिघलने का नाटक करने में भी आला दर्जे के हैं. पर बात यहीं नहीं रुकी है.

इसी साल 30 जून को इस्लामाबाद के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार “द इंडस वॉटर ट्रीटीः एन इंस्ट्रूमेट ऑफ पीस ऐंड रीजनल स्टैबिलिटी” में पाकिस्तान ने सिंधु नदी की तुलना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक समुद्री चोकपॉइन्टस् से करने की कोशिश की.

पाकिस्तान का तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसे वैश्विक नियम बनाने चाहिए, जो ऊपरी धारा वाले देशों (अपर राइपेरियन कंट्रीज) को पानी का इस्तेमाल भूराजनीतिक दबाव के साधन के रूप में करने से रोकें.

लेकिन जिस तरह का भ्रामक नैरेटिव सेट किया जा रहा है उससे क्षेत्रीय सहयोग को नुक्सान ही होगा.

लेकिन, आस्तीनें चढ़ाकर शेखी बघारने में भी पाकिस्तानियों का मुकाबल बुड़बक से बुड़बक हिंदुस्तानी दक्षिणपंथी ट्रोल नहीं कर सकता.

एक पाकिस्तानी कैबिनेट मंत्री ने तो पश्चिमी नदियों (सिंधु जल समझौते वाली) पर पानी मोड़ने वाली संरचनाएं बनाने वाले किसी भी व्यक्ति के ‘हाथ काट देने’ की धमकी दी.

इसी तरह, जनरल असीम मुनीर ने अमेरिका के टैम्पा में पाकिस्तानी प्रवासियों को संबोधित करते हुए भारत के खिलाफ सीधे सैन्य और परमाणु हमले की धमकियां दीं.

इन धमकियों में उन्होंने चेतावनी दी कि सिंधु नदी बेसिन पर भारत द्वारा भविष्य में बनाए जाने वाले किसी भी बांध को नष्ट करने के लिए पाकिस्तान मिसाइल हमले कर सकता है.

इतना तो जाहिर है कि हिंदी मुहावरा कोश में ऐसी ही बकर को गीदड़भभकी कहा गया है.

आपको पता ही होगा फिर भी सोचा याद दिला दूं कि सिंधु जल संधि के तहत भारत को पूर्वी नदियों के पानी पर विशेष अधिकार मिला, जिसकी अनुमानित मात्रा 40.7 अरब घन मीटर (बीसीएम), यानी 33 मिलियन एकड़-फीट (एमएएफ) है.

वहीं पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के लगभग पूरे पानी के उपयोग का अधिकार दिया गया, जिसकी अनुमानित मात्रा 168 से 170 बीसीएम (135 से 140 एमएएफ) है.

गौर करने वाली बात यह है कि सिंधु नदी तंत्र के कुल पानी का केवल लगभग 19.6 प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है, जबकि इस हिस्से से संबंधित जलग्रहण क्षेत्र भारत में पाकिस्तान की तुलना में लगभग दोगुना है. इसके विपरीत, पाकिस्तान को लगभग 81 प्रतिशत पानी मिलता है, जबकि संबंधित जलग्रहण क्षेत्र का केवल लगभग आधा हिस्सा ही उसके क्षेत्र में आता है.

1941 की जनगणना के अनुसार, सिंधु नदी तंत्र के पानी पर निर्भर आबादी में पाकिस्तान की हिस्सेदारी करीब 2.5 करोड़ यानी 54 प्रतिशत थी, जबकि भारत में करीब 2.1 करोड़ यानी 46 प्रतिशत लोग इस जल प्रणाली पर निर्भर थे. भारतीय हिस्से की 46 प्रतिशत आबादी को सिंधु तंत्र के केवल 19.6 प्रतिशत पानी पर निर्भर रहना पड़ा, जबकि पाकिस्तान के पंजाब की 54 प्रतिशत आबादी को लगभग 80 प्रतिशत पानी मिला.

सिंधु नहर प्रणाली से सिंचित कुल 2.6 करोड़ एकड़ भूमि में से करीब 2.1 करोड़ एकड़ पाकिस्तान में और केवल 50 लाख एकड़ भारत में सिंचित होती थी.

विभाजन के बाद बने नए राजनीतिक माहौल ने न केवल भारत की खाद्य आपूर्ति व्यवस्था को बाधित किया, बल्कि सिंधु नदी तंत्र की सदियों पुरानी जल-भौगोलिक एकता को भी तोड़ दिया. इससे भारत के सिंधु बेसिन के उन कई मिलियन एकड़ क्षेत्रों के विकास पर गंभीर खतरा पैदा हुआ, जो अत्यंत शुष्क होने के बावजूद उपजाऊ थे.

इसके बावजूद, पाकिस्तान लंबे समय से ऐसी दलीलें देता रहा है, जिन्हें भ्रामक नैरेटिव ही कहा जाना चाहिए, बल्कि मैं तो कहता हूं कि यह पाकिस्तान के 1952 के उसके रुख से मिलता-जुलता ही कहूंगा. वही संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी मंत्री की हायतौबा. (पिछले पोस्ट को देखें)

बहरहाल, पाकिस्तान छाती पीटता है भारत, पाकिस्तान में सूखा पैदा करने के लिए नदी के प्रवाह को नियंत्रित करता है और मानसून के दौरान बाढ़ पैदा करने के लिए भी पानी के बहाव से छेड़छाड़ करता है. हमारे दक्षिणपंथी भारतीय सोशल मीडिया रणबांकुरे भी ऐसा दावा करके पाकिस्तान की बात को एक तरह से सपोर्ट ही करते हैं.

पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस नैरेटिव को जोर-शोर से उठाया है. विशेष रूप से चिनाब नदी के प्रवाह में होने वाले उतार-चढ़ाव को लेकर भारत पर ऊपरी धारा के देश के रूप में पानी को नियंत्रित करने के आरोप लगाए जाते हैं.

जाहिर है कि ऐसे आरोप सिंधु नदी की वास्तविक जलवैज्ञानिक परिस्थितियों और रन ऑफ द रिवर जलविद्युत परियोजनाओं के स्थापित संचालन तंत्र की अनदेखी करते हैं और फर्जी हैं.

आगे कभी मौका लगा तो सिंधु जल समझौते में अमेरिका और यूरोपीय दवाब की भी चर्चा करेंगे जिसकी वजह से यह अन्यायपूर्ण समझौता भारत को करना पड़ा था.

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सिंधु जल समझौते के तहत भारत और पाकिस्तान को कितना पानी मिलता है?

उत्तर: सिंधु जल समझौते, 1960 के तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों के जल के उपयोग का अधिकार मुख्यतः भारत को दिया गया, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग मुख्यतः पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। इन नदियों के पानी की मात्रा मौसम और प्रवाह के अनुसार बदलती है, इसलिए दोनों देशों के हिस्से को केवल एक निश्चित प्रतिशत के रूप में समझना उचित नहीं है।

प्रश्न 2: पाकिस्तान भारत पर सिंधु नदी का पानी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप क्यों लगाता है?

उत्तर: पाकिस्तान का तर्क है कि ऊपरी धारा में स्थित भारत अपनी जलविद्युत परियोजनाओं और बाँधों के जरिए नदी के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। भारत की परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद रहा है। हालाँकि, किसी परियोजना के वास्तविक प्रभाव का आकलन उसके तकनीकी डिजाइन, संचालन नियमों, संधि की शर्तों और जलवैज्ञानिक आँकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3: क्या भारत सिंधु नदी तंत्र की पश्चिमी नदियों का पानी पूरी तरह रोक सकता है?

उत्तर: नहीं, ऐसा सामान्यीकृत दावा करना सही नहीं होगा। सिंधु जल समझौते के तहत भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ निर्दिष्ट उपयोगों की अनुमति है, जिनमें घरेलू और गैर-उपभोगी उपयोग, निर्धारित कृषि उपयोग तथा संधि की शर्तों के अनुरूप जलविद्युत उत्पादन शामिल हैं। रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएँ बिजली उत्पादन के लिए नदी के प्रवाह का उपयोग करती हैं, लेकिन उनका प्रभाव परियोजना की संरचना और संचालन पर निर्भर करता है। इसलिए पानी रोकने या प्रवाह नियंत्रित करने से जुड़े दावों की जाँच तकनीकी प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।

सिंधु जल समझौता: 1948 में पाकिस्तान ने कैसे गढ़ा भारत के खिलाफ झूठा नैरेटिव?

  • इस लेख में जानिए

    • 1948 के नहर जल विवाद की पृष्ठभूमि
    • भारत और पाकिस्तान के बीच जल बँटवारे का विवाद
    • संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के दावों की पड़ताल
विभाजन के बाद, अविभाजित पंजाब की 143 नहरों में से केवल 12 नहरें पूर्वी पंजाब (भारत) को आवंटित की गईं, जबकि 131 नहरें पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) को मिलीं.

सबसे अधिक लाभदायक और तकनीकी रूप से व्यवहार्य योजनाएँ पश्चिमी पंजाब में स्थित थीं, जिससे पूर्वी पंजाब, विशेष रूप से नदियों से दूर स्थित क्षेत्रों में, विकास से काफी वंचित रह गया.

भारत के हिस्से में आया सिंधु घाटी का मैदानी इलाका पाकिस्तान के मैदानों की तुलना में काफी कम विकसित थे.
अधिकांश बड़ी नहरें पूरी तरह से पाकिस्तान में स्थित थीं और कुछ पूरी तरह से भारत में। ऊपरी बारी दोआब नहर (यूबीडीसी) एकमात्र प्रमुख नहर प्रणाली थी जिसका उद्गम माधोपुर हेडवर्क्स में था, लेकिन अब विभाजन के बाद इस पर से कई स्थानों पर सीमा गुजर रही थी.

कई यूबीडीसी चैनलों के निचले हिस्से जो पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) की ओर जाते थे, उन्हें मध्य बारी नहर के नाम से जाना जाता था।

मध्य बारी दोआब नहर (सीबीडीसी) को पूर्वी पंजाब (भारत) में स्थित उन नहरों के ऊपरी हिस्सों से पानी प्राप्त करना पड़ता था। दीपालपुर नहर, जो विशेष रूप से पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) की जल आपूर्ति करती थी, का जल स्रोत फिरोजपुर में स्थित था।

विभाजन के बाद, पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) के आग्रह पर, पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब के दो मुख्य अभियंताओं ने 20 दिसंबर, 1947 को यूबीडीसी और फिरोजपुर हेडवर्क्स की यथास्थिति को 31 मार्च, 1948 तक बनाए रखने के लिए एक समझौता किया.

जानबूझकर या अनजाने में, पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) ने 31 मार्च, 1948 तक सेंट्रल बारी दोआब नहर और दीपालपु नहर को पानी की आपूर्ति के संबंध में पूर्वी पंजाब के साथ किसी भी समझौते पर बातचीत करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया.

किसी भी समझौते के अभाव में, पूर्वी पंजाब ने 1 अप्रैल, 1948 को पश्चिम पंजाब में सीबीडीसी के लाभ के लिए अपनी सुविधाओं का उपयोग बंद कर दिया.

सेंट्रल बारी दोआब नहर और दीपालपुर नहरों से पाकिस्तान के कुल सिंचित क्षेत्र के केवल छह प्रतिशत हिस्से की सिंचाई होती थी.

तत्कालीन पाकिस्तान के सेक्रेट्री जनरल और बाद में प्रधानमंत्री बने चौधरी मोहम्मद अली ने कहा था: "...पश्चिमी पंजाब के कुछ हिस्सों में कर्तव्य की उपेक्षा, आत्मसंतुष्टि और सामान्य विवेक की कमी थी - जिसके पाकिस्तान के लिए विनाशकारी परिणाम हुए."

Water has practically dried near #Akhnoor after significant reduction in water levels due to India's suspension of the Indus Waters Treaty. People have no memory of crossing the river on foot.

पाकिस्तान ने यह झूठा नैरेटिव गढ़ा कि भारत ने 1 तारीख को अपने प्रतिनिधि के समक्ष सभी छह नदियों का पानी बंद कर दिया था.

16 दिसंबर, 1952 को सुरक्षा परिषद की बहस में पाकिस्तान के प्रतिनिधि एम. ज़फरुल्ला खान ने कहा: "...1 अप्रैल, 1948 को... भारत ने उन नदियों का पानी रोक दिया जो पाकिस्तान में बहती थीं."

विडंबना यह है कि बैठक के रिकॉर्ड से पता चलता है कि सुरक्षा परिषद के किसी भी स्थायी या अस्थायी सदस्य ने इस बयान की सत्यता पर कोई संदेह नहीं जताया।

1952 में पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद में पूरी तरह से झूठा विवरण प्रस्तुत किया.

यह स्पष्ट है कि 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, भारत ने 31 मार्च, 1948 तक के नौ महीनों के दौरान इन छह नदियों में से किसी पर भी ऐसी कोई संरचना नहीं बनाई थी जो इन सभी छह नदियों के जल को नियंत्रित कर सके.

1952 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि सुरक्षा परिषद को गुमराह करने में सफल रहे. एम. ज़फरुल्ला खान ने जल प्रवाह को रोकने की व्यवस्था और इन छह शक्तिशाली नदियों के जल को छह सप्ताह तक नियंत्रित करने या संग्रहित करने की भारत की क्षमता का उल्लेख नहीं किया, और न ही उनसे सुरक्षा परिषद में इस बारे में कोई प्रश्न पूछा गया.
इस झूठे विवरण के माध्यम से, 1952 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि सुरक्षा परिषद और विश्व को गुमराह करने में सफल रहे.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सिंधु जल समझौता कब हुआ था?

उत्तर: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते पर 19 सितंबर, 1960 को कराची में हस्ताक्षर किए गए थे। विश्व बैंक ने इस समझौते की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस समझौते से पहले, 1948 में दोनों देशों के बीच पंजाब की नहरों के पानी को लेकर विवाद हुआ था।

प्रश्न 2: 1 अप्रैल, 1948 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद क्यों हुआ था?

उत्तर: पंजाब के विभाजन के बाद कुछ नहर प्रणालियों के जलस्रोत भारत में थे, जबकि उनसे सिंचित होने वाले क्षेत्र पाकिस्तान में स्थित थे। 31 मार्च, 1948 को अंतरिम व्यवस्था समाप्त होने के बाद पूर्वी पंजाब ने सेंट्रल बारी दोआब और दीपालपुर नहरों के लिए अपनी जलापूर्ति बंद कर दी। इस विवाद के समाधान के लिए दोनों देशों के बीच 4 मई, 1948 को अंतर-डोमिनियन समझौता हुआ।

प्रश्न 3: क्या भारत ने 1 अप्रैल, 1948 को सिंधु नदी प्रणाली की सभी छह नदियों का पानी रोक दिया था?

उत्तर: यह दावा 1948 के नहर जल विवाद से संबंधित घटनाओं का व्यापक वर्णन नहीं करता। उस समय विवाद विशेष रूप से सेंट्रल बारी दोआब और दीपालपुर नहरों की जलापूर्ति को लेकर था। पाकिस्तान के प्रतिनिधि एम. ज़फरुल्ला खान ने 16 दिसंबर, 1952 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत पर नदियों का पानी रोकने का आरोप लगाया था। इस दावे की ऐतिहासिक पड़ताल करते समय 1948 के समझौतों, राजनयिक पत्राचार और सुरक्षा परिषद के मूल अभिलेखों को साथ पढ़ना आवश्यक है।

रविवार, 9 अगस्त 2026

कहानी कश्मीर कीः शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?

कश्मीर की कहानी- भाग एक

आज जब अनुच्छेद 370 को संशोधित किए ठीक 7 साल गुजर गए हैं. कश्मीर को लेकर कुछ बातों का पुनरावलोकन जरूरी है. इसमें से शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू के अद्भुत प्रेम को समझना महत्वपूर्ण है, जिसने कश्मीर के एक गुट के नेता को ऐसे समय में केंद्रीय मंच पर पहुंचा दिया, जब ध्यान पूरी तरह से राष्ट्र निर्माण पर होना चाहिए था।

शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू की निष्ठा से भारत के हितों को चोट

कश्मीर की पहली राजनीतिक पार्टी, ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन 1932 में हुआ था. लेकिन 1939 में यह अधिक तटस्थ 'नेशनल कॉन्फ्रेंस' में बदल गई. शेख अब्दुल्ला इसके संस्थापक-अध्यक्ष बने.

पार्टी अध्यक्ष रहते अब्दुल्ला नेहरू के संपर्क में आए और उनकी बार-बार की मुलाकातों ने उस यारी की नींव रखी जो इतिहास पर अपनी एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ने वाली थी, जो भारत के लिए लगभग घातक साबित हुई.

अब्दुल्ला और नेहरू के बीच एक सहज और त्वरित रिश्ते के पीछे की एक संभावित वजह है कि नेहरू का कश्मीर के साथ संबंध महज राजनैतिक नहीं, बल्कि बेहद निजी भी था, इसके साक्ष्य उन खतों में मिलते हैं जिसमें उन्होंने उस स्थान की यात्रा करने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त की है, जिसे वह अपनी मातृभूमि कहते हैं.

संभव है कि अब्दुल्ला ने सोचा होगा कि सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में उन्हें एक समान विचारों वाला सहयोगी मिल गया है.

1936 में अब्दुल्ला को लिखे नेहरू के पत्र, जिसे 30 जून, 1936 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित किया गया था, में लिखा थाः

आपके लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप मुझे अपनी मातृभूमि पर आमंत्रित करें, क्योंकि वहाँ जाने की इच्छा मेरे भीतर हमेशा मौजूद रहती है. अब मुझे वहां गए 19 साल हो गए हैं और मैं अक्सर वहां लौटने के लिए उत्सुक रहता हूं, लेकिन परिस्थितियाँ मेरे लिए बहुत अलग रही थीं और उसकी वजह से मैं ऐसा नहीं कर पाया... भारत की बड़ी समस्याओं ने मुझे भारत के इस हिस्से से बांधे रखा है. जैसा आप जानते हैं, वे समस्याएँ अंततः कश्मीर को भी प्रभावित करती हैं, क्योंकि कश्मीर का भाग्य शेष भारत के साथ जुड़ा हुआ है. यदि भारत आजाद हुआ तो कश्मीर उस आजादी में शामिल होगा.

नेहरू और शेख अब्दुल्ला के राजनैतिक विचारों में बहुत सी बातें साझा थीं और इसलिए 1937 में लाहौर में उनकी मुलाकात के बाद दोनों का गठजोड़ और अधिक गहरा हो गया.
 
अपनी मनुहार की शक्ति का इस्तेमाल करके नेहरू ने अब्दुल्ला को उत्तर-पश्चिम सरहद की यात्रा पर अपने साथ चलने के लिए मना लिया. नेहरू की कश्मीर की बाद की यात्राओं से अब्दुल्ला की लोकप्रियता में उनका विश्वास मजबूत होता गया.

मई-जून 1940 में, नेहरू ने खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ कश्मीर का दौरा किया, जो दो दशकों से अधिक समय में अपनी मातृभूमि की उनकी पहली यात्रा थी.

1945 में कश्मीर के एक अन्य दौरे में, नेहरू का स्वागत नावों के विहंगम जुलूस के साथ किया गया. इस दौरे में, नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में भाषण देते हुए नेहरू ने अब्दुल्ला के नेतृत्व पर भी मुहर लगा दी.

उनके शब्दों में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में स्वतंत्र कश्मीर की उम्मीदों का प्रतिबिंब झलक रहा थाः

‘इसके (नेशनल कॉन्फ्रेंस) दरवाजे हर कश्मीरी के लिए खुले हैं... कश्मीर बहुत खूबसूरत जगह है और जो लोग यहाँ रहते हैं वे बड़े किस्मत वाले हैं. लेकिन असली खुशकिस्मती उसी दिन आएगी, जब लोगों के पास आजादी होगी... मुझे उम्मीद है कि शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के दूरदर्शी नेतृत्व में, यह अपना मकसद हासिल करने में कामयाब होगी.’

शेख अब्दुल्ला के संबंध में नेहरू की दो ग़लतफ़हमियाँ

अब्दुल्ला के साथ अपनी शुरुआती बातचीत के दौरान नेहरू के मन में दो बेहद महत्वपूर्ण गलतफहमियाँ पैदा हुईं जो बाद में भारत के हितों के लिए हानिकारक साबित होने वासी थीं. पहली ग़लतफ़हमी थी, पूरे कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की अपार लोकप्रियता में उनका अटूट विश्वास था.

जम्मू और कश्मीर क्षेत्र में कश्मीर घाटी, जम्मू क्षेत्र और लद्दाख क्षेत्र शामिल थे. अब्दुल्ला का प्रभाव सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बीच सीमित था और क्षेत्र की अन्य मुस्लिम जातियों और जम्मू और लद्दाख के अन्य समुदायों के बीच उनकी अपील नगण्य थी या कोई अपील थी ही नहीं.

1945 तक, नेहरू अब्दुल्ला के प्रति इतने आसक्त हो गए थे कि उन्होंने पार्टी के कैडर के खिलाफ धार्मिक असहिष्णुता के सभी आरोपों को खारिज कर दिया.

असल में, नेहरू ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के निर्णयों को प्रभावित करने या देश से अलग होने के जोखिम के मद्देनजर हिंदुओं से इसमें शामिल होने का आग्रह किया.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को कहीं अधिक सख्त सलाह दी. नेहरू की सलाह थी: 'यदि गैर-मुस्लिम कश्मीर में रहना चाहते हैं, तो उन्हें नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल हो जाना चाहिए या देश को अलविदा कह देना चाहिए.'

अपने उसी दौरे में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं की एक सभा को संबोधित किया और यही सलाह दोहराईः


‘मैं सलाह दूंगा कि अधिक संख्या में इसमें (नेशनल कॉन्फ्रेंस) शामिल होइए और इसके फैसलों पर प्रभाव डालिए। उन्हें निष्क्रिय दर्शक और आलोचक ही नहीं बने रहना चाहिए. यह स्पष्ट है, और यहां तक कि एक बच्चे को भी पता होना चाहिए, कि यदि आप देश की जनता के साथ नहीं खड़े होंगे तो महाराजा और अंग्रेज आपको हमेशा गुलाम बनाकर रखेंगे.’

असल में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को यह याद दिलाते हुए एक कड़ी चेतावनी दी थीः ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस एक असली राष्ट्रीय संगठन है और भले ही एक हिंदू इसका सदस्य ने बने, तो भी यह ऐसा ही रहेगा. अगर पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, यदि पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, तो कोई भी सुरक्षा उपाय और महत्व उनकी रक्षा नहीं करेगा.’

कांग्रेस पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता की ओर से दी गई नेहरू की सलाह का कश्मीरी हिंदुओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जो अपने साथ पिछले पलायन की पीढ़ीगत स्मृति लेकर आए थे.

अब्दुल्ला को लेकर नेहरू के मन में दूसरी गलतफहमी, जो घटनाओं की एक श्रृंखला से शुरू हुई थी, और जिसका अंत इसमें शामिल सभी लोगों के लिए त्रासद रूप से हुआ था, 1946 में अब्दुल्ला द्वारा शुरू की गई कश्मीर छोड़ो (क्विट कश्मीर) आंदोलन था. (तस्वीर देखिए, 30 मई, 1946 में हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में शेख अब्दुल्ला के 'पूर्ण उत्तरदायी सरकार' को छोड़कर 'कश्मीर छोड़ो' शुरू करने का दस्तावेजीकरण किया गया था.)

यह आंदोलन महाराजा हरिसिंह के अधीन ‘पूर्ण उत्तरदायी सरकार’ के लिए पूरे समर्थन से वादाखिलाफी था. इस आंदोलन के दौरान नेहरू द्वारा अब्दुल्ला को सक्रिय समर्थन दिया गया था और इसने महाराजा के साथ उनके रिश्तों में खटास लानी शुरू कर दी और इससे इन घटनाओं के लिए मंच तैयार हो गया जो 1947 में देखने को मिलने वाली थीं.

शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और नेहरू की हिरासत-

जब कश्मीर छोड़ो आंदोलन ने गति पकड़ ली, तो हरि सिंह ने 20 मई, 1946 को शेख अब्दुल्ला को दिल्ली के रास्ते में गिरफ्तार कर लिया. अब्दुल्ला नेहरू के अनुरोध पर उनसे मिलने दिल्ली जा रहे थे.

कुछ ही दिनों बाद, 26 मई को एक सार्वजनिक संबोधन में इस गिरफ्तारी की नेहरू ने तीखी आलोचना की थी.
इस भाषण में, नेहरू ने न केवल राज्य प्रशासन को फटकार लगाई, बल्कि इसकी तुलना कुख्यात जलियांवाला बाग नरसंहार के साथ कर दी. (चित्र देखिए जिसमें दो क्लिप हैं.)
 


उन्होंने प्रशासन पर असहमतियों को दबाने का आरोप लगाया और यह दावा करके भावनात्मक लहर पैदा की कि ऑल-इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने संवैधानिक प्रमुख के रूप में शासक के अधीन एक सरकार का समर्थन किया—जो अब्दुल्ला के 'कश्मीर छोड़ो' का विरोधाभास है—और श्रीनगर को उन्होंने 'मुर्दों का शहर' बताया.
नेहरू ने अपने संबोधन में अब्दुल्ला के प्रति अटूट समर्थन व्यक्त किया और उन्हें पूरे कश्मीर में बेहद लोकप्रिय नेता बताया.

बहरहाल, एक महीने के भीतर ही, नेहरू को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि 26 मई के उनके संबोधन में किए गए दावे झूठे थे हालांकि, इस समय तक पर्याप्त नुक्सान हो चुका था. (चित्र देखिए ) 




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FAQ
1. शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?
2. कश्मीर भारत में विलय क्यों नहीं चाहता था?
3. कश्मीर के भारत में विलय पर पंडित नेहरू की क्या राय थी?

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

गंगा जल संधि पर भारत को बांग्लादेश के साथ क्या सुलूक करना चाहिए? दिसंबर में होना है रिन्यू

बांग्लादेश को उम्मीद है कि उसकी तमाम भारत विरोधी रवैए के बावजूद, भारत गंगा जल संधि को नवीनीकृत करने के लिए सकारात्मक सहयोग देगा. आप ध्यान दें कि बांग्लादेश के साथ गंगा जल संधि 1996 में हुई थी और इसका नवीकरण इसी साल दिसंबर में होना है.
 
इस संधि पर बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के पहले कार्यकाल के दौरान हस्ताक्षर किया गया था. बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबेद इस्लाम को विश्वास है कि 'भारत इसके महत्व को समझेगा और उसी के अनुरूप आगे बढ़ेगा.'

अब प्रश्न है कि भारत विरोधी रवैए के बावजूद बांग्लादेश इतना आश्वस्त क्यों है? ध्यान रखना चाहिए कि बांग्लादेश और भारत के बीच गंगा सहित 54 प्रमुख नदियों का जल साझा है.

भारत में बांग्लादेश के पूर्व उच्चायुक्त तारिक ए. करीम ने हाल में कहा था कि 1996 की गंगा जल संधि ने यह दिखाया कि ‘‘संवेदनशील मुद्दों पर भी’’ सहयोग संभव है. अब बांग्लादेश को भारत विरोधी रुख भी अपनाना है, लगभग पाकिस्तान भी बन जाना है और पानी भी चाहिए. ऐसा कैसे होगा?

पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता फिलहाल निलंबित है और इसकी वजह से पूरे पाकिस्तान को दिक्कत हो रही है ऐसा पाकिस्तान के लोग मानते हैं. भारत का विपक्ष (और कुछ झंडू यूट्यूबर) भले ही शक कर रहा है और पूछ रहा है कि सिंधु का जल रखोगे किधर? तो मेरा प्रश्न यही है कि अगर संधि को खटाई में डालने से पाकिस्तान की मिर्च नहीं लगी है तो पानी के नाम पर जंग की धमकी वहां की सेना से लेकर बिलावल भुट्टो तक काहे दे रहे हैं?

खैर, बांग्लादेश पर लौटिए. वहां की मंत्री शमा ओबेद इस संधि को लेकर विश्वास जता रही हैं कि 'भारत इन बातों और इस साझा हित को ध्यान में रखते हुए सही निर्णय लेगा, ताकि हमारे द्विपक्षीय संबंधों को किसी भी तरह की क्षति न पहुंचे।'

द्विपक्षीय संबंधों को क्षति पहुंचने की इतनी चिंता है तो भारत के परम शत्रु पाकिस्तान का बगलबच्चा बनने से बचना चाहिए था. अगर भारत इस पानी वाले मसले पर बांग्लादेश की बांह नहीं मरोड़ता है तो इसे कूटनीतिक फेलियर माना जाना चाहिए.