Saturday, March 21, 2026

सेमल: पर्यावरण, वन्य जीवन और साहित्य और जीवन दर्शन का पेड़

मंजीत ठाकुर

इन दिनों सड़कों पर ऊंचे तने वाले तने हुए पेड़ों पर लाल बड़े और मांसल फूलों के खिलने का मौसम है. इन्हें देखकर मुझे हितोपदेश की कहानी याद आती है जो हमने आठवीं की संस्कृत की किताब में पढ़ी थी—

अस्ति गोदावरी तीरे एकः शाल्मलीः तरूः

गोदावरी नदी के किनारे सेमल का एक पेड़ था. कहानी में आगे क्या हुआ इसे छोड़िए पर पेड़ याद रह गया. यह पेड़ था सेमल का, जिसके फूलों से इन दिनों फिजां रंगीन है.

प्रकृति के पंचांग में वसंत केवल फूलों के खिलने का मौसम नहीं है; यह एक विराट उत्सव है, एक ऐसा समय जब पृथ्वी अपने मौन को तोड़कर रंगों और सुगंधों के माध्यम से बोल उठती है. आम में जब बौर आते हैं, जिसे हमलोग मिथिला में इसे आम में मंजर आना कहते हैं, तो आम की बौर की मादक गंध और पलाश की प्रचंड लपटों के बीच, एक और जादुई उपस्थिति होती है, जो अपनी भव्यता और निश्छलता में बेजोड़ है. यह उपस्थिति है सेमल की.

महाभारत के ‘शांति पर्व’ में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को ‘अहंकार के दुष्परिणाम’ समझाने के लिए एक कहानी सुनाते हैं.

हिमालय पर एक विशाल और प्राचीन शाल्मली (सेमल) का वृक्ष था. उसे अपनी विशालता और मजबूती पर बड़ा गर्व था. एक बार उसने पवन देव को चुनौती देते हुए कहा, “हे वायु! तुम दुनिया के बड़े-बड़े वृक्षों को उखाड़ फेंकते हो, लेकिन मेरा एक पत्ता भी नहीं हिला सकते. इसका अर्थ है कि मैं तुमसे अधिक शक्तिशाली हूँ.”

वायुदेव ने उसे बहुत समझाया कि उनकी शक्ति से ही जीवन चलता है, पर वृक्ष नहीं माना. अंत में, वायुदेव ने कहा कि वे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेंगे. सेमल के वृक्ष को अपनी भूल का आभास हुआ कि कल जब तेज आंधी आएगी, तो वह टूट जाएगा.

अपने मान की रक्षा के लिए उसने स्वयं ही अपनी टहनियाँ और पत्ते त्याग दिए ताकि वायु को टकराने का मौका न मिले.

जब वायुदेव आए, तो उन्होंने देखा कि वृक्ष पहले ही ‘नग्न’ और ‘शक्तिहीन’ हो चुका है. वायुदेव ने कहा, “अहंकार का अंत स्वयं के विनाश से ही शुरू होता है.” 

यह घटना आज भी भारतीय दर्शन में ‘विनम्रता’ के महत्व को दर्शाने के लिए उद्धृत की जाती है.

बहरहाल, सेमल रंग और सौंदर्य का एक तिलिस्म रचता है. यह विशाल, रक्तिम मशाल आसमान की तरफ सर उठाकर वसंत के आगमन की घोषणा करती है.

सेमल केवल एक पेड़ नहीं है; यह एक मौसम है, एक परंपरा है, एक ऐसा अनुभव है जो हमारी संस्कृति के रग-रग में समाया हुआ है.

इन दिनों, जब हवा गुनगुनी हो चली है और धूप में हल्की तपिश आ गई है, सेमल का मौसम अपने चरम पर है, चारों ओर एक रक्तिम और श्वेत उत्सव रच रहा है.




सेमल है कुदरत की रक्तिम कविता

वसंत के आते ही, सेमल का पेड़ एक नए रूप में अवतार लेता है. इसकी नग्न शाखाएँ, जो सर्दियों की ठिठुरन में सूखी और बेजान-सी लग रही थीं, अचानक गहरे लाल रंग के बड़े, कटोरे जैसे फूलों के गुच्छों से लद जाती हैं. ये फूल, मांसल और ठोस, जैसे प्रकृति के सिंदूर के पात्र हों, सीधे आकाश की ओर मुख किए हुए होते हैं.

सेमल के फूल का सौंदर्य इसकी सघनता और इसकी ज्वलंतता में निहित है. एक ही पेड़ पर सैकड़ों फूल, एक साथ खिलकर, एक ऐसा दृश्य रचते हैं जैसे कोई पेड़ों की शाखाएं आग की लपटों से जल रहा हो.

इन फूलों की रक्तिम आभा दूर से ही आँखों को चकाचौंध कर देती है, जैसे हवा में तैरता हुआ कोई विशाल अग्निकुंड.

सेमल के फूलों का खिलना केवल आँखों के लिए ही सुखद नहीं है; यह प्रकृति के अन्य प्राणियों के लिए भी एक बुलावा है.

जैसे ही ये फूल खिलते हैं, पेड़ पक्षियों के लिए एक महान सभा स्थल बन जाता है. मैना, कोयल, तोते, और अनगिनत अन्य पक्षी फूलों पर बैठते हैं, उनके पराग का आनंद लेते हैं, और एक-दूसरे से गुफ्तगू करते हैं. सेमल का पेड़ एक जीवित, जीवंत मंच बन जाता है, जहाँ वसंत का संगीत और नृत्य एक साथ चलता है. फूलों के गिरते ही, ज़मीन पर एक रक्तिम कालीन बिछ जाता है, जो किसी शाही बारात के लिए तैयार किया गया हो. इस कालीन पर चलना, जैसे वसंत के हृदय पर चलना हो.

लोककथाओं में सेमल को ‘पशु-पक्षियों का सराय’ कहा जाता है. चूंकि इसके फूल रसीले होते हैं और इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है, इसलिए भीषण गर्मी में जब जंगल के अन्य स्रोत सूख जाते हैं, तब सेमल के फूल पक्षियों और बंदरों की प्यास बुझाते हैं.



सेमल के फूलों का सौंदर्य और उनकी बहुतायत ने प्राचीन काल से ही कवियों और साहित्यकारों को आकर्षित किया है. संस्कृत साहित्य में वसंत का वर्णन सेमल के बिना अधूरा है. महाकवि कालिदास ने अपने विख्यात ग्रंथ ‘ऋतुसंहार’ में वसंत ऋतु का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है, जहाँ वे सेमल के फूलों का उल्लेख करते हैं:

प्रफुल्लचूतद्रुमकोरकाणां विकाशिनां शाल्मलिपादपानाम्.

चकास्ति लोकेऽयमतुल्यरागः सर्वत्र संचारिणि पुष्पकाले॥”


(ऋतुसंहार, वसंत-वर्णनम्, श्लोक 7)

इस श्लोक का अर्थ है: “जब आम के पेड़ों पर बौर खिल रहे होते हैं और सेमल के पेड़ फूलों से लद जाते हैं, तब इस अतुलनीय प्रेममय पुष्प-काल में सब कुछ देदीप्यमान हो उठता है.” यहाँ ‘शाल्मलि’ सेमल के लिए प्रयुक्त संस्कृत शब्द है, जो इस पेड़ की प्राचीनता और साहित्यिक महत्ता को दर्शाता है.

झारखंड के इतिहास में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए ‘उलगुलान’ (विद्रोह) के दौरान भी पेड़ों का बड़ा महत्व था. हालांकि साल का पेड़ मुख्य था, लेकिन सेमल के लाल फूलों का उपयोग अक्सर संदेश भेजने या ‘क्रांति के रंग’ के रूप में लोकगीतों में किया जाता था. सेमल की रुई के उड़ने को अक्सर ‘आजादी के सपनों’ के फैलने की उपमा दी गई है.

भारतीय जनमानस में सेमल से जुड़ा एक बहुत प्रसिद्ध मुहावरा है “सेमल का फूल होना.” इसका अर्थ है— ‘किसी ऐसी चीज पर मोहित होना जिसका परिणाम शून्य या व्यर्थ हो.’

यह लोककथा एक तोते पर आधारित है जो सेमल के बड़े और सुंदर फूल को देखकर इस उम्मीद में बैठा रहता है कि जब यह फल बनेगा, तो उसे मीठा गुदा मिलेगा. लेकिन अंत में जब फल फटता है, तो केवल ‘रुई’ निकलती है जो हवा में उड़ जाती है. यह मुहावरा संसार की माया और मोह के झूठे आकर्षण को दर्शाने के लिए सदियों से इस्तेमाल होता आ रहा है.

बहरहाल, मौसम में गरमाहट बढ़ती है तो सेमल के फूलों का स्थान फल लेने लगते हैं. कली से फल बनने की यह प्रक्रिया एक और चमत्कार है. फल, जो शुरू में छोटे और हरे होते हैं, धीरे-धीरे बढ़ते हैं और एक विशिष्ट आकार ले लेते हैं.

कुछ समय बाद, जब धूप और तेज हो जाती है, ये फल पककर फट जाते हैं. और तब शुरू होता है सेमल का एक और अद्भुत मौसम. रुई का मौसम.

फलों के फटने से सफेद, रेशमी रुई के अनगिनत गुच्छे हवा में तैरने लगते हैं. यह जैसे हवा में उड़ते हुए श्वेत बादल हों, या तैरते हुए सपने.

सेमल की रुई का उड़ना, वसंत के अंत और ग्रीष्म के आगमन का संकेत है. हवा शांत हो जाती है, और केवल ये श्वेत गुच्छे हवा में तैरते हुए दिखाई देते हैं. यह एक शांत, मौन उत्सव है.

बच्चे इन उड़ते हुए गुच्छों के पीछे भागते हैं, उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं, जैसे किसी परी को पकड़ने की कोशिश कर रहे हों. सेमल की रुई को ‘शाल्मली-रुई’ भी कहा जाता है, जो अपने रेशमीपन और कोमलता के लिए प्रसिद्ध है. हालांकि, इसे फ्री या नश्वर कहा जाता है, क्योंकि इसका कोई स्थायी उपयोग नहीं है, जैसे सूती रुई का होता है. यह रुई केवल कुछ दिनों के लिए हवा में तैरती है और फिर गायब हो जाती है.

यही नश्वरता सेमल की रुई को साहित्यिक प्रतीक बनाती है. यह जीवन की व्यर्थता, सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता, और भौतिक वस्तुओं के प्रति मोह को दर्शाती है.

‘भर्तृहरि-शतकत्रय’ में एक श्लोक है-

शाल्मलीतरुणि प्रोद्यत्कुसुमे शुकसङ्गतिः।

केवलं फललोभेन फले सति तु तूलिका॥

यानी, सेमल के वृक्ष पर खिले हुए (लाल और आकर्षक) फूलों को देखकर तोता उस पर बड़ी आशा के साथ आता है. वह वहाँ केवल भविष्य में मिलने वाले मीठे फल के लोभ में रुकता है, लेकिन अंततः जब फल पकता है, तो उसमें से केवल तूला (रुई) निकलती है.

सेमल केवल एक फूल और रुई देने वाला पेड़ नहीं है; यह एक बहुआयामी विरासत है. इसकी लकड़ी हल्की और टिकाऊ होती है, जिसका उपयोग माचिस की तिल्लियाँ, पैकिंग बॉक्स, और अन्य घरेलू वस्तुएँ बनाने में किया जाता है. इसकी छाल, पत्ते, और फूल कई औषधीय गुणों से भरपूर हैं, जिनका उपयोग आयुर्वेद में विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है.

सेमल के तने पर काँटे होते हैं, जो इसे एक सुरक्षात्मक घेरा प्रदान करते हैं, जैसे कोई योद्धा अपनी सुरक्षा के लिए हथियार धारण किए हो. यह काँटेदार तना, इसे “जंगल का रक्षक” बनाता है.

मान्यता है कि जब भक्त प्रह्लाद को खंभे से बांधा गया था, तो वह खंभा सेमल का ही था. भगवान की कृपा से वे कांटे प्रह्लाद के लिए कोमल बन गए. आज भी कई गाँवों में होली जलने के बाद उस सेमल के डंडे को जलने से बचाकर सुरक्षित निकाल लिया जाता है, जो प्रह्लाद की विजय का प्रतीक माना जाता है.

इसकी दृढ़ता और विशालता भी इसे एक विशेष स्थान देती है. यह एक ऐसा पेड़ है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है, और एक अनूठे तरीके से सौंदर्य और उपयोगिता दोनों प्रदान करता है. सेमल का पेड़, अपनी रक्तिम मशाल और श्वेत सपनों के साथ, हमारे लिए प्रकृति की उस शक्ति का प्रतीक है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखती है और एक अनूठे तरीके से सौंदर्य और उपयोगिता दोनों प्रदान करती है.

आज जब हम सेमल के मौसम का आनंद ले रहे हैं, तो हमें इस बहुमूल्य विरासत को सहेजने और उसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता है. यह केवल एक पेड़ नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारे साहित्य, और हमारी परंपराओं का एक अभिन्न हिस्सा है.

सेमल का मौसम हमें यह याद दिलाता है कि सौंदर्य और उपयोगिता दोनों एक साथ रह सकते हैं, और यह कि प्रकृति के हर पहलू में एक गहरा संदेश छिपा होता है. आइए, इस रक्तिम और श्वेत उत्सव को मनाएँ, और सेमल की विरासत को अगली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें. सेमल का मौसम एक बार फिर आएगा, अपनी रक्तिम मशाल और श्वेत सपनों के साथ, और हमें फिर से एक नया संदेश देगा.


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Saturday, March 14, 2026

अफवाह, डर और बाजार: भारत में पैनिक बाइंग का सामाजिक मनोविज्ञान

आज रसोई गैस सिलिंडर देश की कथित कमी देश की सबसे महत्वपूर्ण समस्या बनी दिख रही है. जिसकी टाइम लाइन पर जाइए, यही दिख रहा है. मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसी समस्या नहीं होगी, या यह निरी झूठ है. पर इसी के बहाने आज की पोस्ट अफवाहों के आधार पर होने वाली पैनिक बाइंग और उसकी साइकोलजी पर.

भारत जैसे बड़े और विविध समाज में अफवाहें केवल सूचना की गलती नहीं होतीं, वे अक्सर सामूहिक व्यवहार को बदल देने वाली सामाजिक शक्ति बन जाती हैं. पिछले दो दशकों में कई बार ऐसा देखा गया है कि नमक, दाल, नींबू, प्याज या पेट्रोलजैसी चीजों की कमी की खबर फैलते ही लोग अचानक दुकानों पर टूट पड़ते हैं और जरूरत से कहीं ज्यादा खरीदारी करने लगते हैं. इस तरह की स्थिति को पैनिक बाइंग कहा जाता है.

2006 और 2016 में उत्तर भारत के कई हिस्सों में नमक को लेकर अचानक अफवाह फैल गई कि नमक बाजार से गायब हो जाएगा या बहुत महंगा हो जाएगा. परिणाम यह हुआ कि लोग रातों-रात दुकानों पर लाइन लगाकर नमक खरीदने लगे.

 

2006 में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के कई हिस्सों में अचानक यह अफवाह फैल गई कि नमक बाजार से गायब होने वाला है या बहुत महंगा हो जाएगा. कई जगह 5–10 रुपये किलो वाला नमक 50 से 100 रुपये किलो की रेट पर बिकने लगा.

सरकार और प्रशासन को सार्वजनिक घोषणा करके कहना पड़ा कि नमक की कोई कमी नहीं है. तब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी.

नवंबर 2016 में नोटबंदी के कुछ दिनों बाद फिर से उत्तर भारत में नमक महंगा होने और खत्म होने की अफवाह फैल गई. दिल्ली, यूपी, बिहार, उत्तराखंड और हरियाणा में दुकानों पर भीड़ लग गई. सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप मैसेज इस अफवाह के मुख्य कारण बताए गए. सरकार ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि नमक का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है.

यह केवल आर्थिक घटना नहीं है; इसके पीछे सामाजिक मनोविज्ञान काम करता है, इसके पीछे डर, असुरक्षा, भीड़-व्यवहार और अफवाहों का असर. खासकर भारतीयों की आदत है, कल पेट्रोल का दाम बढ़ेगा तो आज ही टंकी फुल करवा लो.

लॉ कडा उन की घोषणा होते ही लोगों ने बड़ी मात्रा में आटा, दाल, चावल और अन्य जरूरी चीजें खरीदना शुरू कर दिया. असल में उस समय वस्तुओं की आपूर्ति पूरी तरह बंद नहीं हुई थी, लेकिन अनिश्चित भविष्य की आशंका ने लोगों को अधिक खरीदारी करने के लिए प्रेरित किया.

पैनिक बाइंग का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है अफवाहों का तेज़ प्रसार.

आज सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप के दौर में अफवाह फैलाने यह प्रक्रिया और तेज़ हो गई है. एक गलत संदेश कुछ ही घंटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाता है और धीरे-धीरे विश्वसनीय सूचना जैसा दिखने लगता है. खासकर, सरकार विरोधी लोगों को इससे काफी मौका मिला है. आप अपने ही टाइम लाइन पर देखें तो आपको मोदी, भाजपा, सरकार विरोधी रुझान रखने वाले लोगों की वॉल पर सिलिंडर की कतारों वाली वीडियो या पोस्ट किसी न किसी रूप में दिख ही जाएगी. दूसरी तरफ, सरकार का बचाव करने वाले या मोदी या भाजपा समर्थक हास्यास्पद रूप से लकड़ी के चूल्हे के इस्तेमाल या उस पर बनी रोटियों के फायदे गिनवा रहे हैं और इसमें कई सारे अहमक लेकिन मशहूर एंकर भी शामिल हैं.

लेकिन अफवाहों से साथ एक बात यह है कि जब तक सरकार या प्रशासन सफाई देता है, तब तक बाजार में अफरातफरी फैल चुकी होती है.

सामाजिक मनोविज्ञान का एक सिद्धांत है ‘हर्ड बिहेवियर’ यानी झुंड की तरह व्यवहार करना. इसका मतलब है कि लोग अक्सर दूसरों को देखकर अपना निर्णय बदल लेते हैं.

अगर किसी व्यक्ति को यह खबर मिलती है कि नमक या दाल खत्म हो सकती है, तो वह शायद तुरंत प्रतिक्रिया न दे. लेकिन जब वह देखता है कि पड़ोसी, रिश्तेदार या बाजार के लोग तेजी से खरीदारी कर रहे हैं, तो उसे लगता है कि शायद वास्तव में संकट है.

इस तरह दूसरों का व्यवहार ही सबसे बड़ा संकेत बन जाता है और अफवाह सच जैसी लगने लगती है.

2019–2020 तो आप शायद भूल ही गए होंगे जब प्याज और दाल की जमाखोरी शुरू हो गई थी. हालांकि यह पूरी तरह अफवाह नहीं थी, लेकिन प्याज और दाल की कीमतों में अचानक उछाल के कारण लोगों ने बड़े पैमाने पर खरीदारी शुरू कर दी.

कई शहरों में लोगों ने महीनों का स्टॉक खरीद लिया. सरकार को आयात और स्टॉक लिमिट जैसे कदम उठाने पड़े.

मार्च 2020 में जब देश में कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन की घोषणा हुई, तब लोगों ने दाल, आटा, नमक, तेल, मसाले और सूखी सब्जियों का बड़े पैमाने पर स्टॉक करना शुरू कर दिया. कई शहरों में दुकानों पर लंबी कतारें लग गईं. सरकार और राज्यों को बार-बार कहना पड़ा कि खाद्य आपूर्ति बाधित नहीं होगी.

2022 में गर्मियों के दौरान नींबू की कीमत अचानक कई शहरों में 300–400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई. सोशल मीडिया पर खबरें फैलने लगीं कि नींबू की भारी कमी हो गई है. कई जगह लोगों ने नींबू खरीदकर स्टॉक करना शुरू कर दिया. सोशल मीडिया पर बौद्धिक समझी जाने वाली लेखक-लेखिकाओं तक ने नींबू-राग गाना शुरू कर दिया था.

2023 में टमाटर की कीमत 200 रुपये किलो तक पहुंचने पर लोगों ने टमाटर, प्याज और मसालों की अतिरिक्त खरीदारी शुरू कर दी. कई घरों में धनिया और सूखे मसालों का स्टॉक जमा किया गया.

2024 में अरहर दाल और कुछ मसालों के दाम बढ़ने की खबरों के बाद कई शहरों में लोगों ने दाल और मसालों की ज्यादा मात्रा में खरीदारी शुरू कर दी. सरकार को स्टॉक सीमा और आयात बढ़ाने जैसे कदम उठाने पड़े.

इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखाई देता है: अफवाह या कीमत बढ़ने की खबर, सोशल मीडिया या लोकल चर्चा से डर का फैलना, लोगों द्वारा जरूरत से ज्यादा खरीदारी, सरकार या प्रशासन द्वारा सफाई

दिलचस्प बात यह है कि कई बार असली कमी बाद में पैदा होती है.

जब हजारों लोग एक साथ जरूरत से ज्यादा खरीदारी करते हैं, तो दुकानों का स्टॉक जल्दी खत्म हो जाता है. इससे बाजार में यह संदेश जाता है कि वस्तु सचमुच कम हो गई है. इस तरह पैनिक बाइंग खुद ही कृत्रिम कमी पैदा कर देती है.

उदाहरण के लिए, नींबू या प्याज की कीमतें बढ़ने पर लोग अचानक अधिक मात्रा में खरीदने लगते हैं, जिससे बाजार में मांग अचानक बढ़ जाती है और कीमतें और ऊपर चली जाती हैं.

पैनिक बाइंग के पीछे एक गहरा कारण सिस्टम पर भरोसे की कमी भी है.

अगर लोगों को भरोसा हो कि सरकार, बाजार और आपूर्ति प्रणाली स्थिर है, तो वे घबराहट में खरीदारी नहीं करेंगे. लेकिन जब लोगों को लगता है कि व्यवस्था कमजोर है या सूचना विश्वसनीय नहीं है, तो वे अपने स्तर पर सुरक्षा तलाशने लगते हैं.

इसलिए पैनिक बाइंग केवल बाजार की समस्या नहीं, बल्कि विश्वास की सामाजिक समस्या भी है.

मीडिया और सोशल मीडिया दोनों इस स्थिति को प्रभावित करते हैं.

अगर किसी वस्तु की कीमत बढ़ने की खबर सनसनीखेज तरीके से दिखाई जाती है, तो यह भी घबराहट पैदा कर सकती है. वहीं जिम्मेदार पत्रकारिता अफवाहों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

स्पष्ट, त्वरित और भरोसेमंद सूचना पैनिक बाइंग को काफी हद तक रोक सकती है.

सबसे जरूरी यह है कि समाज समझे कि जरूरत से ज्यादा खरीदारी केवल व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं, बल्कि सामूहिक संकट पैदा कर सकती है.

अगर समाज यह समझ ले कि घबराहट की जगह विवेक से काम लेना ही सबसे बड़ा सुरक्षा उपाय है, तो शायद नमक, दाल या नींबू जैसी साधारण चीजें भी कभी राष्ट्रीय चिंता का विषय नहीं बनेंगी.

Thursday, February 26, 2026

AI के भय और इसके अत्यधिक इस्तेमाल पर छोटी टीप

आजकल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पर लिखा जाने वाला लगभग हर दूसरा लेख किसी मर्सिए की तरह लगता है. हर किसी का ऐलान है, यह तकनीक आपकी नौकरी छीन लेगी, आपका दिमाग़ खोखला कर देगी या पूरी सभ्यता की ज्ञान-प्रणाली को ही ध्वस्त कर देगी और कुछ लेखों में तो तीनों काम एक साथ होने का पूर्वानुमान भी है. सोशल मीडिया इन अंदेशों को तेजी से फैलाता है, भले ही खुद सोशल मीडिया एआइ के दम पर उड़ान भरता है.

लेकिन सोचिए जरा. लोग वास्तव में क्या कर रहे हैं? लोग इन दिनों लगभग हर काम के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. जो लेखक ‘मौलिक सोच के खात्मे’ की चेतावनी देते हैं, वही इससे ईमेल लिखवाते हैं और लेख संपादित कराते हैं. जो पेशेवर विशेषज्ञता के पतन का रोना रोते हैं, वही इससे कानूनी धाराएं और टैक्स से जुड़े सवाल पूछते हैं. यहां एक विरोधाभास है, और इससे भागने के बजाय इस पर ठहरकर सोचने की ज़रूरत है.

 

यह स्थिति सहज नहीं है. कभी तो इसका भाषा मॉडल ज्ञान-कर्म, लेखन और शायद मानव चिंतन की नींव को ही कमजोर करता लगता है और कभी उसी की मदद से लोग डॉक्टर की पर्ची समझने की कोशिश कर रहे होते हैं। यह तो सचमुच अद्भुत है.

तकनीकी डर कोई नई बात नहीं है. इतिहास में नई तकनीकों को लेकर घबराहट की लंबी और कुछ हद तक हास्यास्पद परंपरा रही है. जब 1830 के दशक में ब्रिटेन में रेल आई, तो डॉक्टरों ने गंभीरता से चेतावनी दी कि मानव शरीर इतनी गति सह नहीं पाएगा. ‘रेलवे मैडनेस’ जैसी बीमारी की खबरें छपने लगीं. एक अमेरिकी यात्री तो कथित पागलों से बचने के लिए रिवॉल्वर लेकर चलता था.

रानी विक्टोरिया ने भी 1842 में पहली रेल यात्रा के बाद लिखा कि उन्हें यह बहुत पसंद आई, लेकिन वे गति से चिंतित थीं. उन्होंने दिन में 40 और रात में 30 मील प्रति घंटा की सीमा तय कर दी.

किताबों के आने पर भी ऐसी ही चिंता हुई थी. 1481 में वेनिस के संपादक हियरोनिमो स्क्वार्सियाफिको ने कहा था कि छपाई अशिक्षित लोगों के हाथों में पड़ गई है और सब कुछ बिगाड़ रही है. उन्होंने लिखा कि किताबों की अधिकता लोगों को ‘कम अध्ययनशील’ बना देती है और यह बात उन्होंने एक छपी हुई किताब में लिखी.

बीसवीं सदी में टेलीविजन को लेकर भी ऐसी ही बातें और गप चली. न्यूटन मिनो ने 1961 में इसे हिंसा और मूर्खता से भरा बताया. बाद में उन्होंने कहा कि वे असल में ‘लोकहित’ की याद दिलाना चाहते थे.

इसका मतलब यह नहीं कि डर बेबुनियाद थे. हर बदलाव में कुछ नुकसान भी हुए. इंग्लैंड के हथकरघा बुनकरों की दुनिया ही खत्म हो गई थी. नुकसान असली थे. असली सवाल यह है कि समाज सुरक्षा-व्यवस्था बनाता है या नहीं. एआई के मामले में तकनीक आ चुकी है, लेकिन नियम नहीं. असली समस्या यही है.

एक और भ्रम यह है कि हम औज़ार और उसके उपयोग को एक मान लेते हैं. चाकू रोटी भी काट सकता है और हत्या भी कर सकता है. दोष चाकू का नहीं, इस्तेमाल करने वाले का होता है. एआई भी ऐसा ही है.

गलत सूचना और प्रचार भी एआई की देन नहीं हैं. 1994 में रवांडा नरसंहार भड़काने वाला रेडियो स्टेशन साधारण तकनीक से चलता था.

एआई ने अमानवीयता नहीं बनाई, बस उसे नया मंच दिया है. इसलिए नियम ज़रूरी हैं. सवाल तकनीकी नहीं, राजनीतिक हैं. लेकिन एक बात जो अक्सर छूट जाती है: एआई जितना नुकसान कर सकता है, उतनी ही मुक्ति भी दे सकता है. अंग्रेज़ी लंबे समय तक ज्ञान के पहरेदार की तरह काम करती रही. अब एआई उस बाधा को तोड़ रहा है. जो लोग इसे ‘अप्रामाणिक’ कहते हैं, वे वही हैं जिनके पास पहले से संसाधन थे. यह वर्गीय तर्क है.

हैलुसिनेशन यानी गलत जानकारी देना एक समस्या है, लेकिन टीवी चैनलों और सरकारों ने यह काम पहले से किया है. कम से कम एआई की गलतियों को पहचाना जा सकता है.

सबसे गंभीर समस्या है एआई का पक्षपात. नौकरी, कर्ज़, जमानत या इलाज में इसका इस्तेमाल भेदभाव को स्थायी बना सकता है. समाधान मशीन को दोष देना नहीं, व्यवस्था सुधारना है.

इससे मुझे एक बड़ा सवाल लगा—अगर हमारी बनाई प्रणालियां पहले ही यह सोचें कि सवाल ही गलत तो नहीं, तो क्या होगा?

यही असली बहस है. डर भी सच है, संभावना भी. सवाल यह है कि हम इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं. इतिहास बताता है कि हम गलतियां करते हुए भी आगे बढ़ते हैं. यह लापरवाही का बहाना नहीं, बल्कि थोड़ी जिज्ञासा और कम डर के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा है.

(फ्रंटलाइन के संपादकीय लेख का अनूदित और संपादित अंश)

Wednesday, February 25, 2026

पलाश : वसंत की आग में दहकता सौंदर्य

आप कभी चलिए मेरे साथ मधुपुर. जैसे ही आप जमुई स्टेशन पार करेंगे और दोनों तरफ जंगलों और ऊंची-नीची घाटियों का इलाका शुरू होगा, आपको विलक्षण चीज दिखेगी. झाझा, सिमुलतला, जसीडीह और मधुपुर... इस पूरे रास्ते में रेल लाईन के दोनों तरफ घाटी जंगलों से भरी है और अब, फरवरी में गरमाहट आने के बाद इन जंगलों में खिलते हैं पलाश.

जैसे ही फाल्गुन की ठंडी सुबहें ढलने लगती हैं और हवा में वसंत की हल्की सुगंध घुलने लगती है, धरती पर एक अद्भुत चमत्कार घटित होता है. न जाने कहाँ से अचानक हमारे जंगलों, खेतों की मेड़ों, नदी किनारों और पथरीली भूमि पर लाल-नारंगी आग की लपटों से सुलग उठती है. यह अग्नि किसी विनाश की नहीं, बल्कि सौंदर्य और जीवन के उत्सव की होती है. यही है पलाश का फूल.




संस्कृत में किंशुक और ढाक तथा अंग्रेज़ी में फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट. वसंत का सबसे प्रखर उद्घोषक है. जब अधिकांश वृक्ष अभी पत्तियों के बोझ से मुक्त होकर निर्वस्त्र खड़े होते हैं, तब पलाश अपनी नग्न शाखाओं पर अग्नि-सा सौंदर्य ओढ़ लेता है. ऐसा लगता है मानो धरती ने खुद अपने लिए केसरिया वस्त्र बुन लिए हों.

संस्कृत साहित्य में पलाश का उल्लेख अत्यंत भावपूर्ण ढंग से मिलता है. अमरकोश में कहा गया है-

किंशुकः पलाशो ढाकः

कालिदास ने अपने काव्य में पलाश को वसंत का प्रतीक बनाकर बार-बार उकेरा है. ऋतुसंहार में वे लिखते हैं-

“प्रफुल्लकिंशुकवनानि शोभन्ते”

(फूलों से भरे किंशुक वन शोभायमान हो उठे हैं.)

कालिदास के लिए पलाश केवल वृक्ष नहीं, ऋतुओं का जीवंत चरित्र है. मेघदूत में भी वह प्रकृति के चित्रण में पलाश की आभा को समाहित करते हैं. उनके यहाँ पलाश प्रेम, विरह और सौंदर्य तीनों का साक्षी है.

हिमालय की तराइयों से लेकर दक्कन के पठार तक, राजस्थान की शुष्क भूमि से लेकर मध्य भारत के जंगलों तक, हर जगह पलाश ने अपने लाल-नारंगी दस्तख़त छोड़े हैं. बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में तो पलाश मानो लोकजीवन का अभिन्न अंग है. बसंत आते ही गाँवों के बच्चे इसकी पंखुड़ियाँ बटोरते हैं और स्त्रियाँ इन्हें पूजा-पाठ में अर्पित करती हैं.

हमलोग होली के टाइम में खूब पलाश तोड़कर लाते थे. उनके फूलों को डंठल से अलग करते और फिर चूने का साथ मिलाकर पानी में उबालते थे. फिर जो ऐसा पक्का रंग तैयार होता था कि साइकिल पर झक्क सफेद कुरते-धोती में जाने वाले काका हों या कुरते-पाजामे में मौलाना चा, सब रंग जाते थे.

जिस पलासी के युद्ध ने भारत का इतिहास बदल दिया, असल में उसका नाम पलासी इसलिए ही पड़ा था क्योंकि उसके आसपास पलाश का बहुत घना जंगल था. हालांकि, अब इस इलाके में पलाश का जंगल छोड़िए, एक पेड़ तक नहीं बचा है.

हमारा जब उपनयन हुआ था तो भिक्षाटन के समय कौपीन पहने हमने हाथ में पलाश का दंड ही रखा था. पलाश दंड का ऋषियों के लिए अगर महत्व रहा है. वैदिक काल में पलाश की लकड़ी से यज्ञकुंडों के उपकरण बनाए जाते थे. शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि पलाश को पवित्र वृक्ष माना जाता था. यज्ञ की अग्नि में पलाश की समिधा डालना शुभ समझा जाता था. यह वृक्ष तपस्या, साधना और संयम का प्रतीक बन गया.

प्राचीन भारत में पलाश से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे. होली के अवसर पर पलाश के फूलों से तैयार किया गया केसरिया रंग त्वचा के लिए सुरक्षित होता था. यह परंपरा आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में जीवित है. आधुनिक रासायनिक रंगों के बीच पलाश का प्राकृतिक रंग मानो हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है.

लोकसाहित्य में पलाश का स्थान अत्यंत भावुक है. भोजपुरी, अवधी, बुंदेली और छत्तीसगढ़ी गीतों में पलाश प्रेम, विरह और प्रतीक्षा का प्रतीक है. कहीं यह प्रिय की लाल चुनरी बन जाता है, तो कहीं विरहिणी नायिका के हृदय की ज्वाला.

पलाश का फूल देखने वाला व्यक्ति अनायास ही ठहर जाता है. उसकी दृष्टि कुछ क्षणों के लिए संसार से कट जाती है. लाल-नारंगी पंखुड़ियों में जैसे सूर्य का अंश समा गया हो. यह रंग केवल आँखों को नहीं, आत्मा को भी आलोकित करता है.

पलाश की छाल, फूल और बीज आयुर्वेद में औषधि की तरह इस्तेमाल तो होते हैं ही, रक्तशोधक, सूजन-नाशक और त्वचा रोगों में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है.

पलाश केवल एक पेड़ नहीं, एक ऋतु है. यह वसंत का घोष है, इतिहास की स्मृति है, साहित्य की पंक्ति है, लोकगीत की धुन है और साधना की अग्नि है. इसके फूलों में भारत की आत्मा झलकती है — रंगों में, विश्वास में, परंपरा में और सौंदर्य में.

जब अगली बार आप कहीं निर्जन पथ पर पलाश को दहकते देखें, तो क्षणभर ठहर जाइए. समझिए कि यह केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि सदियों से बहती भारतीय संस्कृति की मौन कविता है, जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाती है.

Wednesday, January 21, 2026

भूतों की अभूतपूर्व कथा- भाग दो

मेरी मां भूतों को 'हवा-बताश' कहती है. हम भूतों के बारे में सुनते तो हैं लेकिन यह पहचान कैसे हो कि कोई हवा-बताश भूत ही है?

परंपराओं के लिहाज से, कम से कम तीन ऐसे अचूक टेस्ट हैं जिनसे आप भूत को पहचान सकते हैं. सबसे पहले, भूतों की कोई परछाई नहीं होती. मतलब यह कि तेज धूप या रोशनी में भी भूतों का साया नहीं बनता. इसी बात पर एकठो शेर याद आ रहा है, जिसे सवा सेर एक्टर-डायरेक्टर गुरुदत्त ने फिल्म 'प्यासा' में माला सिन्हा को देखते हुए कहा थाः जो मैं चलूं तो साया भी अपना साथ न दे...

जलील मानिकपुरी का है शायद, इच्छा हो तो कमेंट में इस शेर को पूरा कर दें. बहरहाल, दत्त साहब भूत नहीं थे, भले ही 'साया' उनके साथ नहीं था. पर 'प्रॉपर भूतों' की परछाईं नहीं बनती.

दूसरी बात, भूत अपने आसपास हर अल्लम-गल्लम चीज बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन जलती हुई हल्दी की गंध नहीं बर्दाश्त कर सकता. भारत और दुनिया के कई हिस्सों में हल्दी से भूत भगाए जाते हैं.

तीसरी बात, एक जेनुइन भूत हमेशा नकिया कर बोलता है. हो सकता है इसी वजह से मध्ययुगीन नाटकों और आधुनिक अंग्रेजी में 'बकवास' के लिए 'पिशाच भाषा' (लैंग्वेज ऑफ गॉब्लिन) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.
कुछ भूतों का गला सुई जितना पतला होता है, लेकिन वे एक बार में कई गैलन पानी पी सकते हैं. मादा भूतों (सॉरी दैनिक भास्कर, आप फीमेल टीचर लिखते हैं इसीलिए मैंने मादा भूत लिखा है, वरना फीमेल टीचर को 'शिक्षिका' और मादा भूत को 'भूतनी' कहा जाता है). हां, तो मादा भूतों, ओह भूतनियों का एक प्रकार होता है, चुड़ैल और चुड़ैलों के के पैर पीछे की ओर मुड़े होते हैं.

तो जिस नकियाती हुई औरत ने आपको हद से ज्यादा सताने की चेष्टा की हो, उसके पैर अवश्य देखने की कोशिश करें. लेकिन सावधानी से.

कुछ, जैसे ब्राह्मण भूत (ब्रह्मराक्षस टाइप के) गेहुंआ रंग के होते हैं या कुछ, जैसे किसी गोरे यूरोपियन का भूत काले दिखते हैं, और जरूरत से ज्यादा डरावने होते हैं.

इस तरह के एक मशहूर भूत का ठिकाना कलकत्ता की एक गली में था और वह ब्रिटिश काल में चर्चा में था और उस गली को उसी भूत के नाम पर जाना जाता था. बहरहाल, भूतों के कई प्रकार भी होते हैं. मसलन, बंगाल में ऑर्डिनरी भूत क्षत्रिय, वैश्य, या शूद्र वर्ग का सदस्य होता है. ब्राह्मण भूत, या ब्रह्मदैत्य, बिल्कुल अलग तरह का होता है. सामान्य किस्म के भूत ताड़ के पेड़ों जितने लंबे होते हैं, आमतौर पर पतले और बहुत काले होते हैं. वे पेड़ों पर रहते हैं लेकिन उन पेड़ों की तरफ रुख नहीं करते जहां ब्रह्मराक्षस या ब्रह्मदैत्य रहते हैं.

भूतों के प्रकारों पर अगली पोस्ट में चर्चा करूंगा.






Monday, January 5, 2026

फिल्म समीक्षाः मानवीय संबंधों पर बनी बेहतरीन फिल्म केडी

इन दिनों मुझे तमिल फिल्में देखने का चस्का लग गया है. बेशक, दक्षिण भारतीय फिल्मों में पर लाउड होने का आरोप लगता है और ज्यादातर मामलों में सही हो होता है. पर अब हिंदी फिल्में लाउड हो रही हैं और ज्यादातर हिंदी फिल्मों में कथानक गुम हो रहा है.

बहरहाल, मैंने एक तमिल फिल्म के.डी. देखकर खत्म की. फिल्म नई है, 2019 में रिलीज हुई थी. लेकिन मुझे नहीं पता कि हम उत्तर भारतीय लोगों में से कितने लोगों ने इसे देखा है.

मेरा सुझाव, और मेरी सिफारिश है आप इस फिल्म को देखें.

फिल्म केडी का एक दृश्य. तस्वीरः प्राइम वीडियो


असल में, यह फिल्म कुरुप्पु दुर्रै नाम के एक बुजुर्ग की कहानी है. दुर्रै लंबे समय से कोमा में होता है और उसके घर वाले उसकी बीमारी बर्दाश्त नहीं पा रहे होते हैं. उसके बेटे दुर्रै को मार डालने की योजना बनाते हैं, आप चाहें तो इसे मर्सी कीलिंग कर सकते हैं. संयोग से उसी वक्त दुर्रै होश में आ जाता है और इस पूरी योजना को अपने कानों से सुन लेता है. कुरुप्पा दुर्रै मरने के डर से कम और बेटों की इस योजना से व्यथित होता है और उसी वक्त घर छोड़ देता है.

अगर आप फिल्मों के मिजाज को रंग के जरिए सूंघने लायक दर्शक हैं तो आप इस वक्त बीमारी भरे पीलेपन के कलर टोन को देखकर खुद बहुत उदास-से हो जाएंगे. बहरहाल, फिल्म में यह रंग ज्यादा देर तक तारी नहीं रहता. फिल्म रोने-धोने वाली या नैतिक शिक्षा देने वाली विज्ञापन सरीखी नहीं है. आगे कड़वे-मीठे आते हैं. मजा तो इसके बाद आता है.

घर से निकले कुरुप्पु दुर्रै एक मंदिर में कुट्टी से मिलते हैं. नागा विशाल ने कुट्टी की भूमिका की है. कुट्टी अनाथ है और वह मंदिर के बारामदे पर ही रहता है. दोनों एक-दूसरे के अकेलेपन के दोस्त बन जाते हैं. कुट्टी ही कुरुप्पु दुर्रै का नाम केडी रखता है और वह उसका मानवीय संबंधों पर फिर से भरोसा जगाने का काम करता है. कई बार तो मुझे कुट्टी को देखते हुए प्रेमचंद के किरदार हामिद की याद आई जो बूढ़ी अमीना का दादा जैसा बर्ताव करता है. यहां भी कुट्टी केडी के लिए बकेट लिस्ट तैयार करता है और कहता है कि मरने से पहले इनको पूरा करना है.

यह फिल्म इन दोनों दादा-पोते जैसे रिश्ते को बिल्कुल निजी और जीवन के निकट लाकर परदे पर उकेरती है और इन दोनों किरदारों की यात्रा में हंसी, उदासी, प्रेम, डर, और यहां तक कि गुस्से से भरे पल भी हैं. कुल मिलाकर निर्देशक मधुमिता ने जीवन को परदे पर ही उकेर दिया है. केडी के किरदार में मु रामास्वामी बेहद सहज और विश्वसनीय हैं और खासकर बकेट लिस्ट की एक विश यानी पसंदीदा व्यंजन मटन बिरयानी खाते वक्त उनके चेहरे पर अव्यक्त तृप्ति के जो भाव आते रहते हैं, उससे बढ़िया भाव मैंने क्लोज शॉट में बेहद कम ही देखे हैं.

फिल्म में कुछ भी फ्लैशी नहीं है, बल्कि कैमरे और संपादन की गतियों ने फिल्म की गति बनाए रखी है. संपादन और पृष्ठभूमि का संगीत इतना जादुई है कि अगर आप इसका व्याकरण पकड़ पाए तो खो जाएंगे. कुट्टी के किरदार में नाग विशाल ने क्या सामर्थ्य दिखाया है! यह एक आत्मविश्वास से भरे अनाथ बच्चे की भूमिका है, आत्मविश्वास न रहे तो वयस्कों की यह दुनिया उसे जीने भी देगी?

इन दो मुख्य कलाकारों के साथ पटकथा में कहानी के प्रवाह को बनाए रखने में कई और किरदार आते हैं. इसमें कोथू कलाकार, बिरयानी दुकानवाला, मंदिर का पुजारी और यहां तक कि केडी का पता खोजने के लिए लगाए गए प्राइवेट जासूस, सबने प्रवाह को बनाए रखा है.

कहानी में आपको अगर कुछ चुभ सकता है कि केडी के बाल-बच्चे इनते हृदयहीन कैसे हो सकते हैं? उनके किरदारों की कुछ और परते हो सकती थीं, पर यह बहुत बारीक-सा सवाल है. फिर भी ऐसा लगता ही नहीं कि परिवार मे किसी को केडी की कोई फिक्र थी या उससे जरा भी प्यार था. जबकि बाकी के सभी लोग मानते हैं कि केडी एक अच्छा इंसान और एक अच्छा पिता था. 

एक झोल यह भी है कि जब परिवार वालों को पता लगता है कि केडी कोमा से बाहर आ गया तब भी वे लोग उसको खोजने के लिए जासूस लगवाते हैं, वह भी इसलिए ताकि उसको पकड़कर यूथेनेशिया वाला अधूरा कर्मकांड पूरा किया जा सके. बहरहाल, पटकथा की इस कमजोरी से आंखें मूंद सकें तो बाकी फिल्म आला दर्जे की है. हो सके तो देखिए और बताइए कि आपको कैसी लगी.

ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइमवीडियो पर फिल्म मौजूद है.

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Sunday, December 28, 2025

टेस्ट में टी-20 का मजा. बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच दो दिन में फिनिश

बेशक, एशेज में चौथा टेस्ट् इंग्लैंड के लिए ऑस्ट्रेलिया में 14 साल बाद जीत की खुशबू लेकर आया पर मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (एमसीजी) की पिच बॉक्सिंग डे एशेज टेस्ट के बाद जांच के दायरे में आ गई है, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच यह मैच महज़ दो दिनों के भीतर ही खत्म हो गया.

चारों पारियों में कोई भी टीम 175 रन का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई. इंग्लैंड को चौथी पारी में 175 रन बनाने थे, जो उन्होंने बैजबॉल के नाम पर टी-20नुमा आड़े-तिरेछे शॉट खेलकर खींच-तान कर बना लिए. मुझे इस मैच में इंग्लैंड के बल्लेबाजों में सूर्य कुमार यादव का अक्स दिखा, जिसमें कला कम और दम अधिक होता है. पर यह विकेट गेंदबाजों के लिए जन्नत थी.

विकेट पर 10 मिमी घास थी और टप्पा खाने के बाद गेंद केले की तरह घुमाव ले रही थी. करीबन 30 फीसद रन बल्ले की कन्नी लगकर स्लिप या लेग स्लिप में फिसलकर बने.

पूरे मैच के दौरान विकेट पर सीम मूवमेंट रही और बल्लेबाज़ों की नाक में दम रहा. मैच में कुल 142 ओवरों में 36 विकेट गिरे, जिसमें तेज़ गेंदबाज़ों का पूरी तरह दबदबा रहा और एक भी ओवर स्पिन गेंदबाज़ी का नहीं डाला गया.
हालांकि, पर्थ टेस्ट के मुकाबले इस टेस्ट में पांच गेंदे अधिक डाली गईं. इंग्लैंड के कप्तान बेन स्टोक्स ने अपनी राय बेबाकी से रखी है और संकेत दिया कि यदि ऐसी पिच दुनिया के किसी और हिस्से में तैयार की जाती, तो उस पर कड़े सवाल खड़े होते.

वैसे, दिलचस्प बात यह है कि पिछले महीने पर्थ में खेले गए टेस्ट को ,जो तीसरे दिन तक भी नहीं पहुँच सका आईसीसी ने “बहुत अच्छी” पिच की रेटिंग दी थी, जो सर्वोच्च रेटिंग है.

बहरहाल, मैं यह तय नहीं कर पा रहा था कि मैं लाइव मैच देख रहा हूं या हाइलाइट. यह भी हो सकता है कि आइसीसी टी-20 के दौर में टेस्ट मैचों को जीवन्त और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए ही ऐसे विकेट तैयार करवाने के निर्देश दे रहा हो.