Wednesday, February 25, 2026

पलाश : वसंत की आग में दहकता सौंदर्य

आप कभी चलिए मेरे साथ मधुपुर. जैसे ही आप जमुई स्टेशन पार करेंगे और दोनों तरफ जंगलों और ऊंची-नीची घाटियों का इलाका शुरू होगा, आपको विलक्षण चीज दिखेगी. झाझा, सिमुलतला, जसीडीह और मधुपुर... इस पूरे रास्ते में रेल लाईन के दोनों तरफ घाटी जंगलों से भरी है और अब, फरवरी में गरमाहट आने के बाद इन जंगलों में खिलते हैं पलाश.

जैसे ही फाल्गुन की ठंडी सुबहें ढलने लगती हैं और हवा में वसंत की हल्की सुगंध घुलने लगती है, धरती पर एक अद्भुत चमत्कार घटित होता है. न जाने कहाँ से अचानक हमारे जंगलों, खेतों की मेड़ों, नदी किनारों और पथरीली भूमि पर लाल-नारंगी आग की लपटों से सुलग उठती है. यह अग्नि किसी विनाश की नहीं, बल्कि सौंदर्य और जीवन के उत्सव की होती है. यही है पलाश का फूल.




संस्कृत में किंशुक और ढाक तथा अंग्रेज़ी में फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट. वसंत का सबसे प्रखर उद्घोषक है. जब अधिकांश वृक्ष अभी पत्तियों के बोझ से मुक्त होकर निर्वस्त्र खड़े होते हैं, तब पलाश अपनी नग्न शाखाओं पर अग्नि-सा सौंदर्य ओढ़ लेता है. ऐसा लगता है मानो धरती ने खुद अपने लिए केसरिया वस्त्र बुन लिए हों.

संस्कृत साहित्य में पलाश का उल्लेख अत्यंत भावपूर्ण ढंग से मिलता है. अमरकोश में कहा गया है-

किंशुकः पलाशो ढाकः

कालिदास ने अपने काव्य में पलाश को वसंत का प्रतीक बनाकर बार-बार उकेरा है. ऋतुसंहार में वे लिखते हैं-

“प्रफुल्लकिंशुकवनानि शोभन्ते”

(फूलों से भरे किंशुक वन शोभायमान हो उठे हैं.)

कालिदास के लिए पलाश केवल वृक्ष नहीं, ऋतुओं का जीवंत चरित्र है. मेघदूत में भी वह प्रकृति के चित्रण में पलाश की आभा को समाहित करते हैं. उनके यहाँ पलाश प्रेम, विरह और सौंदर्य तीनों का साक्षी है.

हिमालय की तराइयों से लेकर दक्कन के पठार तक, राजस्थान की शुष्क भूमि से लेकर मध्य भारत के जंगलों तक, हर जगह पलाश ने अपने लाल-नारंगी दस्तख़त छोड़े हैं. बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में तो पलाश मानो लोकजीवन का अभिन्न अंग है. बसंत आते ही गाँवों के बच्चे इसकी पंखुड़ियाँ बटोरते हैं और स्त्रियाँ इन्हें पूजा-पाठ में अर्पित करती हैं.

हमलोग होली के टाइम में खूब पलाश तोड़कर लाते थे. उनके फूलों को डंठल से अलग करते और फिर चूने का साथ मिलाकर पानी में उबालते थे. फिर जो ऐसा पक्का रंग तैयार होता था कि साइकिल पर झक्क सफेद कुरते-धोती में जाने वाले काका हों या कुरते-पाजामे में मौलाना चा, सब रंग जाते थे.

जिस पलासी के युद्ध ने भारत का इतिहास बदल दिया, असल में उसका नाम पलासी इसलिए ही पड़ा था क्योंकि उसके आसपास पलाश का बहुत घना जंगल था. हालांकि, अब इस इलाके में पलाश का जंगल छोड़िए, एक पेड़ तक नहीं बचा है.

हमारा जब उपनयन हुआ था तो भिक्षाटन के समय कौपीन पहने हमने हाथ में पलाश का दंड ही रखा था. पलाश दंड का ऋषियों के लिए अगर महत्व रहा है. वैदिक काल में पलाश की लकड़ी से यज्ञकुंडों के उपकरण बनाए जाते थे. शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि पलाश को पवित्र वृक्ष माना जाता था. यज्ञ की अग्नि में पलाश की समिधा डालना शुभ समझा जाता था. यह वृक्ष तपस्या, साधना और संयम का प्रतीक बन गया.

प्राचीन भारत में पलाश से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे. होली के अवसर पर पलाश के फूलों से तैयार किया गया केसरिया रंग त्वचा के लिए सुरक्षित होता था. यह परंपरा आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में जीवित है. आधुनिक रासायनिक रंगों के बीच पलाश का प्राकृतिक रंग मानो हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है.

लोकसाहित्य में पलाश का स्थान अत्यंत भावुक है. भोजपुरी, अवधी, बुंदेली और छत्तीसगढ़ी गीतों में पलाश प्रेम, विरह और प्रतीक्षा का प्रतीक है. कहीं यह प्रिय की लाल चुनरी बन जाता है, तो कहीं विरहिणी नायिका के हृदय की ज्वाला.

पलाश का फूल देखने वाला व्यक्ति अनायास ही ठहर जाता है. उसकी दृष्टि कुछ क्षणों के लिए संसार से कट जाती है. लाल-नारंगी पंखुड़ियों में जैसे सूर्य का अंश समा गया हो. यह रंग केवल आँखों को नहीं, आत्मा को भी आलोकित करता है.

पलाश की छाल, फूल और बीज आयुर्वेद में औषधि की तरह इस्तेमाल तो होते हैं ही, रक्तशोधक, सूजन-नाशक और त्वचा रोगों में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है.

पलाश केवल एक पेड़ नहीं, एक ऋतु है. यह वसंत का घोष है, इतिहास की स्मृति है, साहित्य की पंक्ति है, लोकगीत की धुन है और साधना की अग्नि है. इसके फूलों में भारत की आत्मा झलकती है — रंगों में, विश्वास में, परंपरा में और सौंदर्य में.

जब अगली बार आप कहीं निर्जन पथ पर पलाश को दहकते देखें, तो क्षणभर ठहर जाइए. समझिए कि यह केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि सदियों से बहती भारतीय संस्कृति की मौन कविता है, जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाती है.

Wednesday, January 21, 2026

भूतों की अभूतपूर्व कथा- भाग दो

मेरी मां भूतों को 'हवा-बताश' कहती है. हम भूतों के बारे में सुनते तो हैं लेकिन यह पहचान कैसे हो कि कोई हवा-बताश भूत ही है?

परंपराओं के लिहाज से, कम से कम तीन ऐसे अचूक टेस्ट हैं जिनसे आप भूत को पहचान सकते हैं. सबसे पहले, भूतों की कोई परछाई नहीं होती. मतलब यह कि तेज धूप या रोशनी में भी भूतों का साया नहीं बनता. इसी बात पर एकठो शेर याद आ रहा है, जिसे सवा सेर एक्टर-डायरेक्टर गुरुदत्त ने फिल्म 'प्यासा' में माला सिन्हा को देखते हुए कहा थाः जो मैं चलूं तो साया भी अपना साथ न दे...

जलील मानिकपुरी का है शायद, इच्छा हो तो कमेंट में इस शेर को पूरा कर दें. बहरहाल, दत्त साहब भूत नहीं थे, भले ही 'साया' उनके साथ नहीं था. पर 'प्रॉपर भूतों' की परछाईं नहीं बनती.

दूसरी बात, भूत अपने आसपास हर अल्लम-गल्लम चीज बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन जलती हुई हल्दी की गंध नहीं बर्दाश्त कर सकता. भारत और दुनिया के कई हिस्सों में हल्दी से भूत भगाए जाते हैं.

तीसरी बात, एक जेनुइन भूत हमेशा नकिया कर बोलता है. हो सकता है इसी वजह से मध्ययुगीन नाटकों और आधुनिक अंग्रेजी में 'बकवास' के लिए 'पिशाच भाषा' (लैंग्वेज ऑफ गॉब्लिन) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.
कुछ भूतों का गला सुई जितना पतला होता है, लेकिन वे एक बार में कई गैलन पानी पी सकते हैं. मादा भूतों (सॉरी दैनिक भास्कर, आप फीमेल टीचर लिखते हैं इसीलिए मैंने मादा भूत लिखा है, वरना फीमेल टीचर को 'शिक्षिका' और मादा भूत को 'भूतनी' कहा जाता है). हां, तो मादा भूतों, ओह भूतनियों का एक प्रकार होता है, चुड़ैल और चुड़ैलों के के पैर पीछे की ओर मुड़े होते हैं.

तो जिस नकियाती हुई औरत ने आपको हद से ज्यादा सताने की चेष्टा की हो, उसके पैर अवश्य देखने की कोशिश करें. लेकिन सावधानी से.

कुछ, जैसे ब्राह्मण भूत (ब्रह्मराक्षस टाइप के) गेहुंआ रंग के होते हैं या कुछ, जैसे किसी गोरे यूरोपियन का भूत काले दिखते हैं, और जरूरत से ज्यादा डरावने होते हैं.

इस तरह के एक मशहूर भूत का ठिकाना कलकत्ता की एक गली में था और वह ब्रिटिश काल में चर्चा में था और उस गली को उसी भूत के नाम पर जाना जाता था. बहरहाल, भूतों के कई प्रकार भी होते हैं. मसलन, बंगाल में ऑर्डिनरी भूत क्षत्रिय, वैश्य, या शूद्र वर्ग का सदस्य होता है. ब्राह्मण भूत, या ब्रह्मदैत्य, बिल्कुल अलग तरह का होता है. सामान्य किस्म के भूत ताड़ के पेड़ों जितने लंबे होते हैं, आमतौर पर पतले और बहुत काले होते हैं. वे पेड़ों पर रहते हैं लेकिन उन पेड़ों की तरफ रुख नहीं करते जहां ब्रह्मराक्षस या ब्रह्मदैत्य रहते हैं.

भूतों के प्रकारों पर अगली पोस्ट में चर्चा करूंगा.






Monday, January 5, 2026

फिल्म समीक्षाः मानवीय संबंधों पर बनी बेहतरीन फिल्म केडी

इन दिनों मुझे तमिल फिल्में देखने का चस्का लग गया है. बेशक, दक्षिण भारतीय फिल्मों में पर लाउड होने का आरोप लगता है और ज्यादातर मामलों में सही हो होता है. पर अब हिंदी फिल्में लाउड हो रही हैं और ज्यादातर हिंदी फिल्मों में कथानक गुम हो रहा है.

बहरहाल, मैंने एक तमिल फिल्म के.डी. देखकर खत्म की. फिल्म नई है, 2019 में रिलीज हुई थी. लेकिन मुझे नहीं पता कि हम उत्तर भारतीय लोगों में से कितने लोगों ने इसे देखा है.

मेरा सुझाव, और मेरी सिफारिश है आप इस फिल्म को देखें.

फिल्म केडी का एक दृश्य. तस्वीरः प्राइम वीडियो


असल में, यह फिल्म कुरुप्पु दुर्रै नाम के एक बुजुर्ग की कहानी है. दुर्रै लंबे समय से कोमा में होता है और उसके घर वाले उसकी बीमारी बर्दाश्त नहीं पा रहे होते हैं. उसके बेटे दुर्रै को मार डालने की योजना बनाते हैं, आप चाहें तो इसे मर्सी कीलिंग कर सकते हैं. संयोग से उसी वक्त दुर्रै होश में आ जाता है और इस पूरी योजना को अपने कानों से सुन लेता है. कुरुप्पा दुर्रै मरने के डर से कम और बेटों की इस योजना से व्यथित होता है और उसी वक्त घर छोड़ देता है.

अगर आप फिल्मों के मिजाज को रंग के जरिए सूंघने लायक दर्शक हैं तो आप इस वक्त बीमारी भरे पीलेपन के कलर टोन को देखकर खुद बहुत उदास-से हो जाएंगे. बहरहाल, फिल्म में यह रंग ज्यादा देर तक तारी नहीं रहता. फिल्म रोने-धोने वाली या नैतिक शिक्षा देने वाली विज्ञापन सरीखी नहीं है. आगे कड़वे-मीठे आते हैं. मजा तो इसके बाद आता है.

घर से निकले कुरुप्पु दुर्रै एक मंदिर में कुट्टी से मिलते हैं. नागा विशाल ने कुट्टी की भूमिका की है. कुट्टी अनाथ है और वह मंदिर के बारामदे पर ही रहता है. दोनों एक-दूसरे के अकेलेपन के दोस्त बन जाते हैं. कुट्टी ही कुरुप्पु दुर्रै का नाम केडी रखता है और वह उसका मानवीय संबंधों पर फिर से भरोसा जगाने का काम करता है. कई बार तो मुझे कुट्टी को देखते हुए प्रेमचंद के किरदार हामिद की याद आई जो बूढ़ी अमीना का दादा जैसा बर्ताव करता है. यहां भी कुट्टी केडी के लिए बकेट लिस्ट तैयार करता है और कहता है कि मरने से पहले इनको पूरा करना है.

यह फिल्म इन दोनों दादा-पोते जैसे रिश्ते को बिल्कुल निजी और जीवन के निकट लाकर परदे पर उकेरती है और इन दोनों किरदारों की यात्रा में हंसी, उदासी, प्रेम, डर, और यहां तक कि गुस्से से भरे पल भी हैं. कुल मिलाकर निर्देशक मधुमिता ने जीवन को परदे पर ही उकेर दिया है. केडी के किरदार में मु रामास्वामी बेहद सहज और विश्वसनीय हैं और खासकर बकेट लिस्ट की एक विश यानी पसंदीदा व्यंजन मटन बिरयानी खाते वक्त उनके चेहरे पर अव्यक्त तृप्ति के जो भाव आते रहते हैं, उससे बढ़िया भाव मैंने क्लोज शॉट में बेहद कम ही देखे हैं.

फिल्म में कुछ भी फ्लैशी नहीं है, बल्कि कैमरे और संपादन की गतियों ने फिल्म की गति बनाए रखी है. संपादन और पृष्ठभूमि का संगीत इतना जादुई है कि अगर आप इसका व्याकरण पकड़ पाए तो खो जाएंगे. कुट्टी के किरदार में नाग विशाल ने क्या सामर्थ्य दिखाया है! यह एक आत्मविश्वास से भरे अनाथ बच्चे की भूमिका है, आत्मविश्वास न रहे तो वयस्कों की यह दुनिया उसे जीने भी देगी?

इन दो मुख्य कलाकारों के साथ पटकथा में कहानी के प्रवाह को बनाए रखने में कई और किरदार आते हैं. इसमें कोथू कलाकार, बिरयानी दुकानवाला, मंदिर का पुजारी और यहां तक कि केडी का पता खोजने के लिए लगाए गए प्राइवेट जासूस, सबने प्रवाह को बनाए रखा है.

कहानी में आपको अगर कुछ चुभ सकता है कि केडी के बाल-बच्चे इनते हृदयहीन कैसे हो सकते हैं? उनके किरदारों की कुछ और परते हो सकती थीं, पर यह बहुत बारीक-सा सवाल है. फिर भी ऐसा लगता ही नहीं कि परिवार मे किसी को केडी की कोई फिक्र थी या उससे जरा भी प्यार था. जबकि बाकी के सभी लोग मानते हैं कि केडी एक अच्छा इंसान और एक अच्छा पिता था. 

एक झोल यह भी है कि जब परिवार वालों को पता लगता है कि केडी कोमा से बाहर आ गया तब भी वे लोग उसको खोजने के लिए जासूस लगवाते हैं, वह भी इसलिए ताकि उसको पकड़कर यूथेनेशिया वाला अधूरा कर्मकांड पूरा किया जा सके. बहरहाल, पटकथा की इस कमजोरी से आंखें मूंद सकें तो बाकी फिल्म आला दर्जे की है. हो सके तो देखिए और बताइए कि आपको कैसी लगी.

ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइमवीडियो पर फिल्म मौजूद है.

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Sunday, December 28, 2025

टेस्ट में टी-20 का मजा. बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच दो दिन में फिनिश

बेशक, एशेज में चौथा टेस्ट् इंग्लैंड के लिए ऑस्ट्रेलिया में 14 साल बाद जीत की खुशबू लेकर आया पर मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (एमसीजी) की पिच बॉक्सिंग डे एशेज टेस्ट के बाद जांच के दायरे में आ गई है, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच यह मैच महज़ दो दिनों के भीतर ही खत्म हो गया.

चारों पारियों में कोई भी टीम 175 रन का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई. इंग्लैंड को चौथी पारी में 175 रन बनाने थे, जो उन्होंने बैजबॉल के नाम पर टी-20नुमा आड़े-तिरेछे शॉट खेलकर खींच-तान कर बना लिए. मुझे इस मैच में इंग्लैंड के बल्लेबाजों में सूर्य कुमार यादव का अक्स दिखा, जिसमें कला कम और दम अधिक होता है. पर यह विकेट गेंदबाजों के लिए जन्नत थी.

विकेट पर 10 मिमी घास थी और टप्पा खाने के बाद गेंद केले की तरह घुमाव ले रही थी. करीबन 30 फीसद रन बल्ले की कन्नी लगकर स्लिप या लेग स्लिप में फिसलकर बने.

पूरे मैच के दौरान विकेट पर सीम मूवमेंट रही और बल्लेबाज़ों की नाक में दम रहा. मैच में कुल 142 ओवरों में 36 विकेट गिरे, जिसमें तेज़ गेंदबाज़ों का पूरी तरह दबदबा रहा और एक भी ओवर स्पिन गेंदबाज़ी का नहीं डाला गया.
हालांकि, पर्थ टेस्ट के मुकाबले इस टेस्ट में पांच गेंदे अधिक डाली गईं. इंग्लैंड के कप्तान बेन स्टोक्स ने अपनी राय बेबाकी से रखी है और संकेत दिया कि यदि ऐसी पिच दुनिया के किसी और हिस्से में तैयार की जाती, तो उस पर कड़े सवाल खड़े होते.

वैसे, दिलचस्प बात यह है कि पिछले महीने पर्थ में खेले गए टेस्ट को ,जो तीसरे दिन तक भी नहीं पहुँच सका आईसीसी ने “बहुत अच्छी” पिच की रेटिंग दी थी, जो सर्वोच्च रेटिंग है.

बहरहाल, मैं यह तय नहीं कर पा रहा था कि मैं लाइव मैच देख रहा हूं या हाइलाइट. यह भी हो सकता है कि आइसीसी टी-20 के दौर में टेस्ट मैचों को जीवन्त और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए ही ऐसे विकेट तैयार करवाने के निर्देश दे रहा हो.

Saturday, December 13, 2025

भूतों की अभूतपूर्व कथा- भाग एक

 


भूतों के बारे में आपने सुना तो होगा ही. लेकिन कुछ दिलचस्प बातें मैंने इकट्ठी की है. हॉरर स्टोरी नहीं सुना रहा, सिर्फ परंपराएं इकट्ठी कर रहा हूं. मसलन, भूतों की परिभाषा क्या है? भूत कौन होते हैं?

असल में, भूत एक आम शब्द है जिसमें कई तरह की बुरी आत्माएँ शामिल हैं जिन्हें अलग-अलग करके समझने की कोशिश करेंगे. हालाँकि, पहले आम तौर पर भूतों में पाए जाने वाले कुछ आम लक्षणों के बारे में बात करना अधिक दिलचस्प होगा.

परिभाषा के मुताबिक, "प्रॉपर भूत ऐसी आत्मा है जो हिंसक तरीके से मरे हुए लोगों की होती है. चाहे वह मौत दुर्घटना से हो, आत्महत्या से हो या मौत की सज़ा पाए लोगों से।"

ऐसी आत्माएं भी भूतों की श्रेणी में आती हैं अगर मौत के बाद उसका ठीक से अंतिम संस्कार न किया गया हो.
बहरहाल, बहुत सारी ऐसी आत्माओं का (भय से) कई इलाकों में पूजा-पाठ भी किया जाता है. कई स्थान पर उन्हें मनुख देवा का दर्जा मिला है. बाघ का शिकार हुए लोगों का अस्थान बघौत कहा जाता है. बिजली गिरने से मरे लोगों का अस्थान 'बिजलिया बीर' के नाम से प्रसिद्ध है. ताड़ के पेड़ से गिरे इंसान का अस्थान 'ताड़ बीर' के नाम से और सांप काटने से मरे व्यक्ति का अस्थान नगैया बीर के नाम से जाना जाता रहा है.

जनरल कनिंघम ने (मैं एक किताब के अनुवाद के सिलसिले में उनके विवरणों को देख रहा था), हाथी के महावत के अस्थान (श्राइन) का जिक्र किया है, जो पेड़ से गिरकर मर गया था, उसी तरह, एक ब्राह्मण की मौत गाय के ढूंसने से हो गई थी, उसका भी अस्थान बनाया गया था, एक कश्मीरी महिला, जिसका एक पैर था और जिसकी मृत्यु दिल्ली से अवध जाते समय थकान से हो गई थी, उसके भी अस्थान का जिक्र कनिघम ने किया है.

भूतों के कई प्रकार हैं. चुड़ैल, किच्चिन, बैताल, प्रेत, जिन्न, ... इनके बारे में आपकी क्या राय और क्या जानकारी है और क्या आपका कोई अनुभव रहा है? भूतों के प्रकार या उनसे जुड़े किस्से हो तो वह भी साझा करें.


(नोटः पोस्ट के साथ चस्पां भूत की तस्वीर एआइ जनरेटेड है. भूत का फोटो आजतक ले नहीं पाया हूं, अतएव तस्वीर को प्रतीकात्मक ही समझें.)








Thursday, December 11, 2025

15 करोड़ की किताब, साहित्य है या पब्लिसिटी का मजाक!

मैं रत्नेश्वर जी से बहुत बार नहीं मिला हूं। इस बार सुना कि उन्होंने 15 करोड़ की किताब लिख डाली। उनके लिए यह कोई नई बात नहीं। पिछली बार रत्नेश्वर जी ने, जब हमारी मुलाकात हुई थी, तब तीन करोड़ रुपए एडवांस में लिए थे, ऐसा उन्होंने बताया था। अगर यह कदम महज खबर बनाने के लिए थी तो खबर बन गई। पर अब आगे की बात। 

कुछ महीने पहले शैलेश भारतवासी जी ने आदरणीय विनोद कुमार शुक्ल को तीस लाख रुपए का रायल्टी का चेक सौंपा था। चेक प्रदान करते हुए तस्वीरें थी। तीस लाख भी हिंदी साहित्यकार के लिए लगभग मूं बा देने की स्थिति थी। रत्नेश्वर जी भी स्पष्ट कर दें कि पंद्रह करोड़ का क्या मसला है? प्रकाशक ने दिए? आपने प्रकाशन के लिए दिए? इतने रकम की बिक्री? मतलब थोड़ा स्पष्ट कर देते तो हम ज्वलनशील लोगों के कलेजे को ठंडक पड़ती।

लोकसभा 2025- जब संसद में राहुल गांधी की बात पर अमित शाह को आया तेज गुस्सा