भारत जैसे बड़े और विविध समाज में अफवाहें केवल सूचना की गलती नहीं होतीं, वे अक्सर सामूहिक व्यवहार को बदल देने वाली सामाजिक शक्ति बन जाती हैं. पिछले दो दशकों में कई बार ऐसा देखा गया है कि नमक, दाल, नींबू, प्याज या पेट्रोलजैसी चीजों की कमी की खबर फैलते ही लोग अचानक दुकानों पर टूट पड़ते हैं और जरूरत से कहीं ज्यादा खरीदारी करने लगते हैं. इस तरह की स्थिति को पैनिक बाइंग कहा जाता है.
2006 और 2016 में उत्तर भारत के कई हिस्सों में नमक को लेकर अचानक अफवाह फैल गई कि नमक बाजार से गायब हो जाएगा या बहुत महंगा हो जाएगा. परिणाम यह हुआ कि लोग रातों-रात दुकानों पर लाइन लगाकर नमक खरीदने लगे.
2006 में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के कई हिस्सों में अचानक यह अफवाह फैल गई कि नमक बाजार से गायब होने वाला है या बहुत महंगा हो जाएगा. कई जगह 5–10 रुपये किलो वाला नमक 50 से 100 रुपये किलो की रेट पर बिकने लगा.
सरकार और प्रशासन को सार्वजनिक घोषणा करके कहना पड़ा कि नमक की कोई कमी नहीं है. तब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी.
नवंबर 2016 में नोटबंदी के कुछ दिनों बाद फिर से उत्तर भारत में नमक महंगा होने और खत्म होने की अफवाह फैल गई. दिल्ली, यूपी, बिहार, उत्तराखंड और हरियाणा में दुकानों पर भीड़ लग गई. सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप मैसेज इस अफवाह के मुख्य कारण बताए गए. सरकार ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि नमक का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है.
यह केवल आर्थिक घटना नहीं है; इसके पीछे सामाजिक मनोविज्ञान काम करता है, इसके पीछे डर, असुरक्षा, भीड़-व्यवहार और अफवाहों का असर. खासकर भारतीयों की आदत है, कल पेट्रोल का दाम बढ़ेगा तो आज ही टंकी फुल करवा लो.
लॉ कडा उन की घोषणा होते ही लोगों ने बड़ी मात्रा में आटा, दाल, चावल और अन्य जरूरी चीजें खरीदना शुरू कर दिया. असल में उस समय वस्तुओं की आपूर्ति पूरी तरह बंद नहीं हुई थी, लेकिन अनिश्चित भविष्य की आशंका ने लोगों को अधिक खरीदारी करने के लिए प्रेरित किया.
पैनिक बाइंग का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है अफवाहों का तेज़ प्रसार.
आज सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप के दौर में अफवाह फैलाने यह प्रक्रिया और तेज़ हो गई है. एक गलत संदेश कुछ ही घंटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाता है और धीरे-धीरे विश्वसनीय सूचना जैसा दिखने लगता है. खासकर, सरकार विरोधी लोगों को इससे काफी मौका मिला है. आप अपने ही टाइम लाइन पर देखें तो आपको मोदी, भाजपा, सरकार विरोधी रुझान रखने वाले लोगों की वॉल पर सिलिंडर की कतारों वाली वीडियो या पोस्ट किसी न किसी रूप में दिख ही जाएगी. दूसरी तरफ, सरकार का बचाव करने वाले या मोदी या भाजपा समर्थक हास्यास्पद रूप से लकड़ी के चूल्हे के इस्तेमाल या उस पर बनी रोटियों के फायदे गिनवा रहे हैं और इसमें कई सारे अहमक लेकिन मशहूर एंकर भी शामिल हैं.
लेकिन अफवाहों से साथ एक बात यह है कि जब तक सरकार या प्रशासन सफाई देता है, तब तक बाजार में अफरातफरी फैल चुकी होती है.
सामाजिक मनोविज्ञान का एक सिद्धांत है ‘हर्ड बिहेवियर’ यानी झुंड की तरह व्यवहार करना. इसका मतलब है कि लोग अक्सर दूसरों को देखकर अपना निर्णय बदल लेते हैं.
अगर किसी व्यक्ति को यह खबर मिलती है कि नमक या दाल खत्म हो सकती है, तो वह शायद तुरंत प्रतिक्रिया न दे. लेकिन जब वह देखता है कि पड़ोसी, रिश्तेदार या बाजार के लोग तेजी से खरीदारी कर रहे हैं, तो उसे लगता है कि शायद वास्तव में संकट है.
इस तरह दूसरों का व्यवहार ही सबसे बड़ा संकेत बन जाता है और अफवाह सच जैसी लगने लगती है.
2019–2020 तो आप शायद भूल ही गए होंगे जब प्याज और दाल की जमाखोरी शुरू हो गई थी. हालांकि यह पूरी तरह अफवाह नहीं थी, लेकिन प्याज और दाल की कीमतों में अचानक उछाल के कारण लोगों ने बड़े पैमाने पर खरीदारी शुरू कर दी.
कई शहरों में लोगों ने महीनों का स्टॉक खरीद लिया. सरकार को आयात और स्टॉक लिमिट जैसे कदम उठाने पड़े.
मार्च 2020 में जब देश में कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन की घोषणा हुई, तब लोगों ने दाल, आटा, नमक, तेल, मसाले और सूखी सब्जियों का बड़े पैमाने पर स्टॉक करना शुरू कर दिया. कई शहरों में दुकानों पर लंबी कतारें लग गईं. सरकार और राज्यों को बार-बार कहना पड़ा कि खाद्य आपूर्ति बाधित नहीं होगी.
2022 में गर्मियों के दौरान नींबू की कीमत अचानक कई शहरों में 300–400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई. सोशल मीडिया पर खबरें फैलने लगीं कि नींबू की भारी कमी हो गई है. कई जगह लोगों ने नींबू खरीदकर स्टॉक करना शुरू कर दिया. सोशल मीडिया पर बौद्धिक समझी जाने वाली लेखक-लेखिकाओं तक ने नींबू-राग गाना शुरू कर दिया था.
2023 में टमाटर की कीमत 200 रुपये किलो तक पहुंचने पर लोगों ने टमाटर, प्याज और मसालों की अतिरिक्त खरीदारी शुरू कर दी. कई घरों में धनिया और सूखे मसालों का स्टॉक जमा किया गया.
2024 में अरहर दाल और कुछ मसालों के दाम बढ़ने की खबरों के बाद कई शहरों में लोगों ने दाल और मसालों की ज्यादा मात्रा में खरीदारी शुरू कर दी. सरकार को स्टॉक सीमा और आयात बढ़ाने जैसे कदम उठाने पड़े.
इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखाई देता है: अफवाह या कीमत बढ़ने की खबर, सोशल मीडिया या लोकल चर्चा से डर का फैलना, लोगों द्वारा जरूरत से ज्यादा खरीदारी, सरकार या प्रशासन द्वारा सफाई
दिलचस्प बात यह है कि कई बार असली कमी बाद में पैदा होती है.
जब हजारों लोग एक साथ जरूरत से ज्यादा खरीदारी करते हैं, तो दुकानों का स्टॉक जल्दी खत्म हो जाता है. इससे बाजार में यह संदेश जाता है कि वस्तु सचमुच कम हो गई है. इस तरह पैनिक बाइंग खुद ही कृत्रिम कमी पैदा कर देती है.
उदाहरण के लिए, नींबू या प्याज की कीमतें बढ़ने पर लोग अचानक अधिक मात्रा में खरीदने लगते हैं, जिससे बाजार में मांग अचानक बढ़ जाती है और कीमतें और ऊपर चली जाती हैं.
पैनिक बाइंग के पीछे एक गहरा कारण सिस्टम पर भरोसे की कमी भी है.
अगर लोगों को भरोसा हो कि सरकार, बाजार और आपूर्ति प्रणाली स्थिर है, तो वे घबराहट में खरीदारी नहीं करेंगे. लेकिन जब लोगों को लगता है कि व्यवस्था कमजोर है या सूचना विश्वसनीय नहीं है, तो वे अपने स्तर पर सुरक्षा तलाशने लगते हैं.
इसलिए पैनिक बाइंग केवल बाजार की समस्या नहीं, बल्कि विश्वास की सामाजिक समस्या भी है.
मीडिया और सोशल मीडिया दोनों इस स्थिति को प्रभावित करते हैं.
अगर किसी वस्तु की कीमत बढ़ने की खबर सनसनीखेज तरीके से दिखाई जाती है, तो यह भी घबराहट पैदा कर सकती है. वहीं जिम्मेदार पत्रकारिता अफवाहों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
स्पष्ट, त्वरित और भरोसेमंद सूचना पैनिक बाइंग को काफी हद तक रोक सकती है.
सबसे जरूरी यह है कि समाज समझे कि जरूरत से ज्यादा खरीदारी केवल व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं, बल्कि सामूहिक संकट पैदा कर सकती है.
अगर समाज यह समझ ले कि घबराहट की जगह विवेक से काम लेना ही सबसे बड़ा सुरक्षा उपाय है, तो शायद नमक, दाल या नींबू जैसी साधारण चीजें भी कभी राष्ट्रीय चिंता का विषय नहीं बनेंगी.




