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Sunday, May 10, 2020

देवघरः बाबा बैद्यनाथ मंदिर का इतिहास और भूगोल

देवघर के बाबा मंदिर का इतिहास-भूगोलः भाग एक

मेरे मधुपुर का जिला होता है देवघर. देवघर जिला तो बहुत बाद में बना है पर इसका इतिहास बेहद पुराना है. पहले यह संताल परगना का हिस्सा था और उससे भी पहले वीरभूम का. उसकी चर्चा आगे की किसी पोस्ट में करुंगा, पर अभी चर्चा देवघर की उन वजहों से, जिसका लिए यह धाम मशहूर है. बाबा बैद्यनाथ. महादेव के इस मंदिर की गिनती बारह ज्योतिर्लिंगों में की जाती है. हालांकि, इससे मिलते जुलते नामों वाले शिवमंदिरों ने अलग दावा जताया है, मसलन महाराष्ट्र में वैद्यनाथ और उत्तराखंड में बैजनाथ महादेव ने. लेकिन ऐतिहासिक प्रमाण तो रावणेश्वर बैद्यनाथ के पक्ष में ही जाते हैं.



देवघर के बाबा मंदिर का परिसर. फोटो सौजन्य कन्हैया श्रीवास्तव

इस लिहाज से, हालांकि मानव विज्ञानी अलग ढंग से इसकी व्याख्या करेंगे और शायद इतिहासकार अलग ढंग से. पर, जब हम देवघर और आसपास के इलाकों फैले तीर्थस्थानों की ठीक से, और बारीकी से विवेचना करेंगे तो इसमें इतिहास और मानव विज्ञान के साथ अलग-अलग दृष्टिकोणों को एकसाथ मिलाकर देखना होगा.

शायद देवघर की चर्चा करते समय, हमें भारत विज्ञानियों, प्राच्यशास्त्रियों और मूर्तिकला विशेषज्ञों की राय को भी शामिल करना होगा. क्योंकि वे हमें हिंदू तीर्थों की महत्ता को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने का नजरिया प्रदान करते हैं. इनमें भारत विज्ञानी (इंडोलजिस्ट) और प्राच्यशास्त्री (ओरिएंटलिस्ट) खासतौर पर पौराणिक या लिखित उद्भव, इतिहास, मान्यताओं और मिथकों की तरफ ध्यान दिलाते हुए इसका ब्यौरा देते हैं. इसी तरह मूर्तिकला के विशेषज्ञ शिल्प शास्त्र की बारीकियों के जरिए कथासूत्र पकड़ने की कोशिश करते हैं.

पर जाहिर है मानव विज्ञानी बस्तियों की बसाहट और परंपराओं के बारे में लिखकर पड़ताल करते हैं. मेरी कोशिश रहेगी कि झारखंड के देवघर के बैद्यनाथ मंदिर के बारे में विभिन्न स्रोतों से (और कथाओं से) हासिल सूत्रों को इकट्ठा कर आपके सामने रखूं.

दिलचस्प यह होता है कि ऐसे तीर्थस्थलों के बारे में पढ़ते और लिखते समय आपको ऐसे सूत्र मिलते हैं कि आप इन केंद्रों को सभ्यता के विशद केंद्रों के बारे में जानते हैं. खासकर मेरा जुड़ाव देवघर से इसलिए भी अधिक रहा है क्योंकि तीसेक किलोमीटर दूर शहर मधुपुर मेरी जन्मस्थली है और देवघर का मंदिर हमारा साप्ताहिक आने-जाने का केंद्र रहा.

देवघर जैसे धार्मिक आस्था के केंद्रों की खासियत रही है कि इसने सदियों से लोगों को जाति, नस्ल, आर्थिक स्थिति, भौगोलिक दूरी और भाषायी दूरियों से परे आसपास के लोगों को जोड़ने का काम किया है. एस. नारायण और एल.पी. विद्यार्थी जैसे मानव शास्त्रियों ने देवघर के पुण्य क्षेत्र को विभिन्न जोन, सब-जोन और खंडों में बांटा है. इसमें कई मंदिरों के समूह भी हैं. नारायण ने बैद्यनाथेश्वर क्षेत्र को दो सब-जोन में बांटा हैः बैद्यनाथ और बासुकीनाथ.

दोनों ही महादेव मंदिरों ने अपने आस-पास के इलाकों में अपने स्वतंत्र श्रद्धा तंत्र विकसित कर लिए हैं. परंतु जानने वाले जानते हैं कि इस इलाके में श्रद्धा के केंद्र हैं, इसमें तीसरा केंद्र अजगैवीनाथ हैं. इन इलाकों को पुनः सब-क्षेत्रों में बांटा जा सकता है. हालाकि विद्यार्थी के अध्ययन में इससे छोटे खंडों और मंदिर समूहों की भी चर्चा है. उनके अध्ययन में 1969-71 के बीच इस इलाके में 95 मंदिर समूह पाए गए हैं. अगर हम इस जोन में सुल्तानगंज को भी जोड़ लें तो मंदिर समूहों की संख्या और अधिक बढ़ जाएगी. हालांकि, कांवर यात्रा के मार्ग के हिसाब से वर्गीकरण किया जाए ( गंगातट पर सुलतानगंज (बिहार) से लेकर बाबाधाम और बासुकीनाथ तक) तो अलग मंदिर समूह और जोन उभरकर आएंगे.

सुल्तानगंज में गंगा का जल लेकर चले कांवरिया देवघर में वह जल चढ़ाते हैं और उनमें से कुछ लोग थोड़ा गंगाजल बचाकर बासुकीनाथ तक जाते हैं और वहां जाकर उनकी यात्रा पूरी होती है. इस संदर्भ में, यह मंदिर क्षेत्र सुल्तानगंज से बासुकीनाथ तक माना जा सकता है. हालांकि बैद्यनाथ, बासुकीनाथ और अजगैवीनाथ मंदिरों का अपना स्वतंत्र श्रद्धा क्षेत्र है पर उनको सांस्कृतिक दृष्टि से अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि पौराणिक दृष्टि और सांस्कृतिक परंपराओं क लिहाज से यह एक जैसे ही हैं. सभी कांवरिया सुल्तानगंज (अजगैवीनाथ) से जल उठाते हैं और बैद्यनाथ और बासुकीनाथ पर उनको चढ़ाया जाता है.

पर यहां पर थोड़ा अंतर है. ऐसे श्रद्धालु जो बासुकीनाथ आते हैं उन्हें बैद्यनाथ जाना ही पड़ता है. पर बैद्यनाथ आने वाले बासुकीनाथ भी जाएं ऐसी कोई धार्मिक बाध्यता नहीं है. अगर भौगोलिक दृष्टि से बात करें तो इस पवित्र सर्किट में, बुढ़ै, काठीकुंड, चुटोनाथ (दुमका के पास), मालुती, पाथरोल, बस्ता पहाड़ और पथरगामा में योगिनी स्थान शामिल हैं. और इस पूरे सर्किट में बैद्यनाथ धाम देवघर का महादेव मंदिर केंद्रीय स्थान रखता है.




जारी...

Sunday, April 12, 2020

लॉकडाउन डायरीः अहिरन की चोरी करै, करै सुई की दान

लॉकडाउन के अकेलेपन ने हमसे बहुत कुछ छीना है तो बहुत कुछ दिया है. धरती की आबो-हवा भी थोड़ी साफ हुई है, पर इस बात का अलग तरह से विश्लेषण करने की भी जरूरत है. पीएम ही एकमात्र प्रदूषक नहीं है. इस साफ आबोहवा में हमें आत्मविरीक्षण करने की जरूरत है कि 15 अप्रैल के बाद क्या होगा और सबसे जरूरी, कोरोना के बाद की दुनिया हम कैसी चाहते हैं. 

लॉकडाउन का, आसमान जाने, कौन-सा दिन है. दो-ढाई हफ्ते बीत गए हैं. तारीखों के बीच की रेखा धुंधली होकर मिट गई है. शुक्र हो, शनीचर हो या इतवार... क्या फर्क पड़ना है! यहां तक कि इतने बड़े महानगर में माचिस की डिबिया जैसे फ्लैट में, जहां बमुश्किल ही सूरज की किरनें आती हैं, दिन और रात का फर्क भी खत्म हो गया है.

हम सब वक्त के उस विमान में बैठे हैं जो लगता है कि स्थिर है, पर आसमान में बड़ी तेजी से भाग रहा है. कइयों के लिए वक्त नहीं कट रहा, वे एक मिनट में पंखे के डैने कितनी बार घूमता है इसका ठट्ठा कर रहे हैं. पर, वक्त के साथ उनके ठट्ठे धीमे पड़ते जा रहे हैं.

हम सबके बीच अकेलेपन का स्वर अब सीलने लगा है, भींगने लगा है. जैसे जाड़ों की सुबह चाय की कप की परिधि पर जम जाता है. हम उदास भारी सांसें लिए बच्चों के साथ खेलने की कोशिश करते हैं. अपने कंप्यूटर पर हम बार-बार काम निबटाने बैठते हैं. काम खिंचता जाता है. नेट की स्पीड कम होती जा रही है. लोगों ने नेट पर फिल्में और वेबसीरीज देखनी शुरू कर दी है. समय की स्पीड की नेट की स्पीड की तरह हो गई है. बीच-बीच में समय की भी बफरिंग होने लगती है.


दिल्ली का आसमान, लॉकडाउन के दौरान, फोटोः मंजीत ठाकुर

बॉस का आदेश है, हमें अच्छी खबरें खोजनी चाहिए. कहां से मिलेंगी अच्छी खबर? दुनिया भर में मौत का आंकड़ा एक लाख के करीबन पहुंचने वाला है. एक लाख! हृदय कांप उठता है. एक लाख अर्थियां! एक लाख कब्रें! एक लाख परिवारों की पीड़ा. क्या आसमान का हृदय नहीं फट पड़ेगा?

मैं देखता हूं निकोटिन के दाग से पीली पड़ी मेरी उंगलियों से पीलापन मद्धम पड़ता जा रहा है. लग रहा है मेरी पहचान मिट रही हो. आखरी कश लिए तीन हफ्ते निकल गए हैं.

तीन हफ्तों में मैं जान गया हूं कि मेरी बिल्डिंग में मेरी फ्लैट के ऐन सामने दो लड़के रहते हैं, दोनों दिन भर सोते हैं और रात को उनके कमरे की रोशनी जलती रहती है. मुझे हाल ही में पता चला है कि एक पड़ोसी है जिसके घर में दो बच्चे हैं. उनमें एक रोज सिंथेसाइजर बजाता है. मुझे पता नहीं था. सुबह नौ बजे रोज कैलाश खेर की टेर ली हुई आवाज़ में सफाई के महत्व वाला गाना बजाती कूड़े की गाड़ी आती है. मैं पहले उसकी आवाज नहीं सुन पाता था.

मेरी बिटिया को ठीक साढ़े नौ बजे रात को सोने की आदत है और मुझे यह भी पता चला है कि उसको सोते वक्त लोरी सुनने की आदत है.

अच्छी खबरों की तलाश में आखिरकार एक अच्छी खबर मिलती है. कोरोना के इस दौर में भी सुकून की एक खबरः धरती मरम्मत के दौर से गुजर रही है. चीन का एसईजेड, जिसको दुनिया का सबसे प्रदूषित इलाका माना जाता था, वहां की हवा में नासा बदलाव देखता है. नासा कहता है वहां की हवा साफ हो रही है. नासा की खबर कहती है वेनिस के नहरों का पानी फिर से पन्ने की तरह हरा हो गया है जिसमें डॉल्फिनें उछल रही हैं. गांव के चौधरी की निगाह हर जगह है. बस चौधरी अपना गांव न बचा पाया. कल तक सुना था करीब 15 हजार अमेरिकी मौत के मुंह में समा गए. मैंने सुना है, अमेरिका अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर बहुत सतर्क रहता है. क्या सब निबट जाए तो अमेरिका, चीन से बदला लेगा? हम तीसरे विश्वयुद्ध की प्रतीक्षा करें?

वेनिस की नहरें तो साफ हो गईं और अपने हिंदुस्तान में क्या होगा? गंगा-यमुना साफ होगी? मुंबई के जुहू बीच पर भी दिखेगी डॉल्फिन? पर नीला आसमान तो सबको दिख रहा है. दिल्ली में लोग सुपर मून, पिंक मून की तस्वीरें सोशल मीडिया पर उछाल रहे हैं. कुछ कह रहे हैं उन्हें परिंदो की आवाज़ें सुनाई देने लगी हैं. लोग खिड़कियों के पास बैठे परिंदे देख रहे हैं.

मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली स्काईमेट जैसी एजेंसी कह रही है, गुरुग्राम से लेकर नोएडा तक पार्टिक्युलेट मैटर (पीएम) की मौजूदगी हवा में कम हुई है. यह कमी लॉकडाउन से पहले के दौर के मुकाबले 60 फीसद तक है.

जाहिर है, यह लॉकडाउन का असर है. तो फिर 15 अप्रैल के बाद क्या होगा? हालांकि प्रदूषण का स्तर नीचे गया है पर यह तो सिर्फ पीएम के स्तर में कमी है. वैज्ञानिक स्तर पर देखें, तो कारें प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह है. कम से कम दिल्ली में तो ऐसा ही है. पर किसी भी सियासी मसले के हल के लिए सिर्फ पीएम (प्रधानमंत्री) और किसी भी प्रदूषणीय मसले के लिए पीएम (पार्टिक्युनलेट मैटर) के भरोसे रहना अनुचित होगा. हमको सल्फर ऑक्साइड आधारित और नाइट्रोजन ऑक्साइट आधारित प्रदूषकों पर भी नजर रखनी चाहिए.

अभी तो प्रदूषण के मसले पर हमारी आपकी स्थिति वैसी ही है, जैसे कबीर कह गए हैं

अहिरन की चोरी करै, करै सुई की दान

ऊंचे चढ़ि कर देखता, केतिक दूर बिमान.

लोग लोहे की चोरी करते हैं और सूई का दान करते हैं. तब ऊंचे चढ़कर देखते हैं कि विमान कितनी दूर है. अल्पदान करके हम सोच भी कैसे सकते हैं कि हमें बैकुंठ की ओर ले जाने वाला विमान कब आएगा?

हमने प्रदूषण को लेकर कुछ नहीं किया. न हिंदुस्तान ने, न चीन ने, न इटली ने...न चौधरी अमेरिका ने. हमने साफ पानी, माटी और साफ हवा के मसले को कार्बन ट्रेडिंग जैसे जटिल खातों में डालकर चेहरे पर दुकानदारी मुस्कुराहट चिपका ली है. कोप औप पृथ्वी सम्मेलनों में हम धरती का नहीं, अपना भला करते हैं.

याद रखिए, यह कयामत का वक्त गुजर जाएगा. बिल्कुल गुजरेगा. फिर खेतों में परालियां जलाई जाएंगी और तब हवा में मौजूद गैसों की सांद्रता ट्रैफिक के पीक आवर से समय से कैसे अलग होती हैं उसका विश्लेषण अभी कर लें तो बेहतर.

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Tuesday, February 4, 2020

पिछले साल रहा मौसम बेहाल, अब खेती में राहत की उम्मीद

2019 का साल अति प्राकृतिक घटनाओं का साल रहा. अतिवृष्टि, लू के थपेड़े और चक्रवातों के बाद बारी हिमपात और शीतलहर. पर अब सर्दियों में हुई ठीक-ठाक बारिश से इस बार रबी की फसल बढ़िया होने की उम्मीद जगी है. सरकार की कोशिश अब इसके जरिए मंदी से निपटने की होनी चाहिए

मंदी और कृषि क्षेत्र में तमाम आशंकाओं के बाद एक खुशखबरी मिल रही है. 2020 की पहली फसल कटाई में रबी की पैदावार बेहतर हो सकती है और जाहिर है इससे किसानों को राहत मिलेगी. मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली निजी एजेंसी स्काइमेट ने रबी रिपोर्ट, 2020 जारी करते हुए अच्छी पैदावार की उम्मीद जाहिर की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में मॉनसून और मॉनसून के बाद के सीजन में अच्छी बारिश हुई है. रबी उत्पादक प्रमुख राज्यों में भी जनवरी के पहले पखवाड़े में पर्याप्त बरसात हुई है इससे फसल की सेहत को काफी फायदा मिला है.

लेकिन 2019 में मौसम से जुड़े मामले कुछ ठीक नहीं रहे थे.

2019 का साल अति प्राकृतिक घटनाओं का साल रहा. देश को लू के थपेड़ों के बाद अतिवृष्टि, और चक्रवातों के बाद बारी हिमपात और शीतलहर का सामना करना पड़ा था. पर अब सर्दियों में हुई ठीक-ठाक बारिश से इस बार रबी की फसल बढ़िया होने की उम्मीद जगी है. सरकार की कोशिश अब इसके जरिए मंदी से निपटने की होनी चाहिए

पिछले 25 साल के मुकाबले हालांकि, मॉनसून अधिक रहा था और मानक बरसात से 110 फीसद अधिक बारिश हुई थी. गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र को बाढ़ का सामना करना पड़ा था. इसके साथ ही कुल मिलाकर 9 चक्रवातीय तूफान भी आए थे. यही नहीं, करेला नीम पर तब चढ़ा जब दिसंबर महीने में उत्तर भारत में शीतलहर की सबसे लंबी अवधि भी रिकॉर्ड की गई. हिमालयी राज्य़ों में अक्तूबर से लेकर दिसंबर तक भारी हिमपात भी दर्ज किया गया. पिछले साल अप्रैल से जून के महीने में मॉनसून से पहले भारी लू भी चली थी. जबकि, मॉनसून के बाद अक्तूबर से दिसंबर तक की अवधि में अतिवृष्टि भी हुई.

हालांकि इस बढ़िया बरसात ने देश के जलाशयों का पेट भर दिया है. इसका असर रबी की अच्छी बुआई पर पड़ा था. मिट्टी में नमी की मौजूदगी ने फसल उत्पादकता पर भी असर डाला है. और इस बार इस असर को सकारात्मक मानना चाहिए. हालांकि, रबी की पैदावार पर सर्दियों का तापमान भी प्रभावित करता है और अच्छा जाड़ा पड़ने से वह भी सकारात्मक ही रहा है.

स्काइमेट की रिपोर्ट के मुताबिक, गेहूं की पैदावार में इस सीजन में करीबन 10.6 फीसद की बढ़ोतरी होगी और पिछले सीजन के 10.21 करोड़ टन के मुकाबले इस बार उपज 11.30 टन के आसपास रहने की उम्मीद है.

मौसम के मद्देनजर चने और धान की पैदावार में भी बढ़ोतरी होगी. तिलहन की फसल भी अच्छी होने की उम्मीद है जिससे खाद्य तेलों की मौजूदा महंगाई को थामा जा सकेगा. जाहिर है, किसानों की परेशानी के दौर में यह एक बढ़िया खबर तो है पर आगे की भूमिका सरकार को निभानी होगी जो किसानों की उपज को सही तरीके से खरीदे. किसानों के पास क्रयशक्ति बढ़ेगी तो बाजार में छाई मंदी से भी निपटा जा सकेगा.

Monday, January 13, 2020

कार्बन उत्सर्जन और पानी की कमी के बहाने ऊंटों को मारने का ऑस्ट्रेलिया का प्रपंच

ऑस्ट्रेलिया ने तय किया है कि अगले पांच दिनों में दस हजार ऊंटों को गोली मार की खत्म कर दिया जाएगा. वजह इतनी है कि ऊंट पानी बहुत पीते हैं. ऑस्ट्रेलिया ऊंटों को मारने के पीछे अपना कार्बन फुटप्रिंट कम करने की वजह भी बता रहा है. पर क्या यह वाकई तार्किक है या बहाना है?


खबर ऑस्ट्रेलिया से है और बेहद हृदय विदारक है. ऑस्ट्रेलिया में अधिकारियों ने तय किया है कि अगले पांच दिनों में दस हजार ऊंटों को गोली मार कर खत्म कर दिया जाएगा. वजह इतनी है कि ऊंट पानी बहुत पीते हैं. ऑस्ट्रेलिया ऊंटों को मारने के पीछे अपना कार्बन फुटप्रिंट कम करने की वजह भी बता रहा है. पर क्या यह वाकई तार्किक है या बहाना है?

अधिकारियों की योजना है कि इन ऊंटों को मारने के लिए हेलिकॉप्टर लगाए जाएंगे. पर दावानल से परेशान ऑस्ट्रेलिया का यह कदम अबूझ मालूम पड़ रहा है.



प्रतीकात्मक तस्वीर

न्यूज एजेंसी आइएएनएस को अनांगू पित्जानत्जारा यान्कुन्त्याजारा (एबोरिजनल आबादी के लिए बना स्थानीय और विरल आबादी का इलाका) के कार्यकारी बोर्ड सदस्य मारीटा बेकर ने बताया है कि कान्यपी के उनके इलाके में ये ऊंट उनके समुदाय के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे थे.

बेकर के मुताबिक, ये ऊंट उनके एयरकंडीनर तोड़ देते थे (पानी की तलाश में) और घरों की बाड़ को भी नुक्सान पहुंचा रहे थे.

एक ऐसे देश (और महादेश) में, जहां, बकौल सिडनी विश्वविद्यालय के शोधार्थियों के, नवंबर से लगी दावानल में 4.80 करोड़ जानवर जलकर मर गए हों, बेकुसूर ऊंटों का जान से मारने का फैसला समझ से परे है.

असल में ऐसे संकटग्रस्त देश में जिसका मुखिया अभी हवाई में छुट्टियां मना रहा है, आखिर ऊंटों को मारना कितना न्यायसंगत है? वजह और तर्क सिर्फ वही नहीं है जो बताई जा रही हैं.

ऑस्ट्रेलिया में ऊंटो को हमेशा से नफरत की निगाह से ही देखा जाता रहा है. उनको आक्रमणकारी प्रजाति (इनवैसिव स्पीशीज) माना जाता है और उनके साथ करीबन वैसा ही बरताव होता है जैसा हम भारत में खर-पतवार या चूहों के साथ करते हैं.

ऊंट एक बार में, वो भी तीन मिनट में करीब 200 लीटर पानी पी जाते हैं. समझिए 20 बाल्टी. पानी के संकट से जूझते महादेश में इतना पानी वाकई काफी है. यही नहीं, ऑस्ट्रेलिया के अधिकारियों का कहना है कि वहां के दस लाख ऊंट सालाना 20 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं. यानी हर ऊंट के लिहाज से दो टन सालाना. इसको ध्यान में रखें तो एक और दिलचस्प आंकड़ा है, एक छोटी कार सालाना 4.6 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करती है. एक बेचारे ऊंट से करीबन दोगुना. इसलिए अगर एक ऊंट को मारकर आप कार्बन क्रेडिट हासिल करना चाहते हैं तो इस आंकड़े पर निगाह डालिए.

चूंकि ऑस्ट्रेलिया दुनिया भर में अमेरिका के बाद दूसरा सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जक देश है तो उस पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का भी दबाव है. पर इसके लिए कार की संख्या कम करने की बजाए उसे ऊंटों को मारना अधिक मुफीद लग रहा है.

विडंबना यह है कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार कार्बन उत्सर्जन कम करने के वास्ते न तो अपने कोयला आधारित उद्योगों पर लगाम लगाने को तैयार है न ऑटोमोबाइल्स पर. गौरतलब यह भी है कि ऑस्ट्रेलिया में कोयला आधारित उद्योग सालाना करीबन 53.4 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन करता है. कोयला खनन ऑस्ट्रेलिया के लिए बेहद अहम है, पर कार्बन और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में इसका हिस्सा इसकी पूरी अर्थव्यवस्था से भी अधिक है.

दुनिया भर में अगर यह तर्क चल निकला तो सोचिए जरा दक्षिण एशिया में क्या होगा. इस तर्क के मुताबिक तो भारत-बांग्लादेश-थाईलैंड-श्रीलंका-नेपाल जैसे धान उत्पादक देशों के किसानों को भी गोली मारनी होगी क्योंकि उनके धान के खेतों में पानी की भी खपत होती है और धान के खेतों के साथ उनके पशुधन से सबसे अधिक मीथेन उत्सर्जित होता है. यह बात दूर की कौड़ी है पर फिलहाल जान ऊंटों की जा रही है क्योंकि ऊंट न तो विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं, न बोल सकते हैं. उनको दौड़ाकर गोली मारना आसान भी है.

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Wednesday, December 11, 2019

झारखंड में बाबूलाल मरांडी अभी नहीं तो कभी नहीं

झाविमो के नेता बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे हैं. भाजपा छोड़ने के बाद उन्हें कुछेक सियासी कामयाबियां जरूर मिलीं पर 2009 के बाद से उन्होंने एक भी चुनाव नहीं जीता है. चार चुनावों में लगातार पराजय का मुंह देख चुके मरांडी के लिए झारखंड विधानसभा का यह चुनाव करो या मरो जैसी स्थिति है


झारखंड (Jharkhand) जब बिहार से अलग हुआ था तो पहले मुख्यमंत्री बने थे बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi). तब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) (Bhartiya Janata Party) के वे झारखंड (Jharkhand) के कद्दावर नेता माने जाते थे. पर 2006 में उन्होंने गुटबाजी का आरोप लगाकर पार्टी छोड़ दी और तब से उके सियासी करियर पर ग्रहण लगना शुरू हो गया है. पिछले दस साल से यानी 2009 के बाद बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi) कोई चुनाव नहीं जीत पाये हैं.

मरांडी (babulal Marandi) लगातार चार चुनाव हार चुके हैं. उन्होंने अपना आखिरी चुनाव 2009 में जीता था. तब वे कोडरमा से सांसद चुने गये थे. कोडरमा से 2004 और 2006 के उपचुनाव में जीतकर लोकसभा पहुंचे थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में वे दुमका चले गये जहां शिबू सोरेन ने उन्हें हरा दिया था.

2014 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने धनवार और गिरिडीह से परचा दाखिल किया था पर दोनों ही जगह से उनको पराजय का मुंह देखना पड़ा था. 2014 के बाद उनकी पार्टी के छह विधायक टूटकर भाजपा (Bhartiya Janata Party) में शामिल हो गए थे. इससे उनकी पार्टी और छवि दोनों को गहरा धक्का लगा था. लगातार चुनाव हारने से भी मरांडी (babulal Marandi) की छवि कमजोर नेता के तौर पर बनती जा रही है और दिखने लगा है कि अब बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi) वह नेता नहीं रहे जो झारखंड (Jharkhand) स्थापना के वक्त थे.

2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कोडरमा से फिर से किस्मत आजमाई पर भाजपा (Bhartiya Janata Party) की अन्नपूर्णा देवी ने उन्हें करारी शिकस्त दी थी. और इस बार यानी 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में भी उनके लिए मुकाबला कोई बहुत आसान नहीं है.

झारखंड (Jharkhand) के गिरिडीह जिले के राजधनवार विधानसभा क्षेत्र में इस बार झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi) की प्रतिष्ठा दांव पर है. इस सीट पर उन्हें तीन मजबूत उम्मीदवारों से चुनौती मिल रही है. इन चुनौतियों को देखकर सवाल पूछा जा रहा है कि क्या बाबूलाल मरांडी को इस बार चुनावी जीत मिल पाएगी? यहां 12 दिसम्बर को मतदान होना है.

अब बाबूलाल मरांडी के सामने अपने राजनीतिक कद को बरकरार रखने के साथ ही अपनी पार्टी झाविमो का अस्तित्व कायम रखने की भी चुनौती है. इस कारण यहां का मुकाबला दिलचस्प बना हुआ है, जिस पर पूरे राज्य की नजर है.

राजधनवार सीट पर अभी तक जो स्थिति उभरकर सामने आई है, उसके मुताबिक इस बार इस क्षेत्र में मुख्य मुकाबला झाविमो के मरांडी और भाकपा (माले) के मौजूदा विधायक राजकुमार यादव के बीच माना जा रहा है. परंतु भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) (Bhartiya Janata Party) के लक्ष्मण प्रसाद सिंह, निर्दलीय अनूप सौंथालिया और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के निजामुद्दीन अंसारी इस मुकाबले को बहुकोणीय बनाने में पूरा जोर लगाए हुए हैं.

मरांडी को इस इलाके में 2014 के विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में हार का सामना करना पड़ा था. भाजपा (Bhartiya Janata Party) ने वर्ष 2014 के तीसरे स्थान पर रहे पूर्व पुलिस अधिकारी लक्ष्मण प्रसाद सिंह को एक बार फिर उम्मीदवार बनाया है, जबकि झामुमो ने निजामुद्दीन अंसारी को अपना प्रत्याशी बनाया है. भाकपा (माले) की ओर से मौजूदा विधायक राजकुमार यादव एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं.

पिछले विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में राजकुमार ने मरांडी को 10 हजार से अधिक मतों से पराजित किया था. असल में, राजधनवार ऐसी सीट है, जिस पर जातीय समीकरण को साधना बेहद अहम है. इस सीट पर यादव, मुस्लिम और भूमिहार के मतदाता यहां निर्णायक साबित होते हैं.

इस चुनाव में इस क्षेत्र में कुल 14 प्रत्याशी हैं. लेकिन चुनाव झाविमो, झामुमो, भाजपा, भाकपा (माले) और निर्दलीय अनूप सौंथालिया को ही जानकार प्रमुख उम्मीदवारों में गिन रहे हैं.

क्षेत्र में सभी प्रमुख उम्मीदवारों की पकड़ अलग-अलग क्षेत्रों में है. आइएएनएस के मुताबिक, इस विधानसभा क्षेत्र में गांवा इलाके में भाकपा (माले) के प्रत्याशी की चर्चा अधिक है तो तिसरी में झाविमो, धनवार बाजार और धनवार ग्रामीण में भाजपा, झामुमो और निर्दलीय अनूप सौंथालिया की चर्चा सर्वाधिक है.

झाविमो के प्रत्याशी और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी आइएएनएस से कहते हैं कि "इस क्षेत्र में विकास कार्य पूरी तरह ठप है. आज भी लोग पानी, सड़क, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं. ऐसे में जनता सब देख रही है और चुनाव में जवाब देगी."

लेकिन मौजूदा विधायक राजकुमार यादव जीत का दावा करते हैं. उनका कहना है कि पंचायतों और गांवों में किसानों के लिए तालाब बनाए गए हैं और गांवों में बिजली पहुंचाई गई है. सड़कें बनी हैं. उन्होंने हालांकि यह भी माना कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है.

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Friday, September 13, 2019

हैप्पी हिंदी डे ड्यूड

ऐतिहासिक रूप से हिंदी के साथ कई समस्याएं हैं और मौजूदा दौर में यह समस्याएं अधिक गहरी हो गई है. पहली समस्या इसके दिवस का मनाया जाना है. अंग्रेजी भाषा का भी कोई दिवस है इस बारे में मुझे ज्ञात नहीं है. अगर हो, तो समझदार लोग ज्ञानवर्धन करें. कुछ वैसे ही जैसे महिलाओं की सशक्तिकरण के लिए दिवस तो मनाया जाता है पर संभवतया कोई मर्द दिवस नहीं है. अस्तु.

हिंदी के साथ दूसरी समस्या यह है कि हिंदी में सामान्य पाठक वर्ग का घनघोर अभाव है. हिंदी में पढ़ते वही हैं जो लिखते हैं यानी लेखक हैं. यानी कि साहित्य या राहित्य, जो भी मुमकिन हो लिख डालते हैं.

हिंदी क्षेत्र का सामान्य छात्र हिंदी में लिखे को पढ़ना प्रायः अपमानजनक, अति अपमानजनक या घोर अपमानजनक मानता है. इसको आप पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण की तरह अधिक इंटेंस मानते चलें. वह अंग्रेजी में चेतन भगत पढ़ लेगा पर हिंदी में अज्ञेय, जैनेंद्र या ऐसे ही किसी दूसरे लेखक का नाम सुनकर हंस देगा. हाल में मीडिया के छौनों (समझें, छात्रों) के साथ बातचीत का मौका मिला. उनको हिंदी लिखने का मतलब शुद्ध हिंदी बताया गया था. हिंदी की शुद्ध हिंदी वाली छवि क्या है? संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्द लिखा जाना? क्या वाकई हिंदी में वैसा लिखा गया है या लिखा जाता है? मुझे लगता है एतद् द्वारा वाली हिंदी अब सरकारी विज्ञप्तियों के अलावा कहीं बची नहीं है.

बचे हिंदी के लेखक. उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूल में पढते हैं (गलत नहीं है अंग्रेजी पढ़ना) अंग्रेजी बोलते हैं (यह भी गलत नहीं) अंग्रेजी से मुहब्बत करते हैं (किसी भी भाषा से मुहब्बत करें गलत नहीं है) पर अपने ही हिंदी में लिखने वाले पिता के लेखन को कुछ तुच्छ-सा, घटिया-या, दोयम दर्जे का या अत्यधिक शास्त्रीय समझते हैं

इतनी देर में आप समझ गए होंगे कि हिंदी से मेरा मतलब महज हिंदी व्याकरण या कविता संग्रह या अभिव्यक्ति की आजादी को सातवें आसमान तक ले जाने वाले उपन्यास नहीं है. मेरा तात्पर्य हिंदी में लिखे कुछ भी से है. विज्ञान भी, और इतिहास भी. पर सामान्य जन का मन हिंदी में लगे भी कैसे? हिंदी में लिखने का मतलब सीधे-सीधे साहित्य वह भी दुरूह भाषा से लगा लिया जाता है.

जो हिंदी में लिखता है वह क्या सिर्फ कविता लिखेगा, या कहानी? या उपन्यास? यह मानिए कि हिंदी में स्तरीय नॉन-फिक्शन खासकर इतिहास, भूगोल, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, राजनीति पर लेखन कम होता है. जो होता है उसकी कीमत औसत हिंदी पाठक की जेब से बाहर की होती है. बात रही स्तरीय अनुवाद की. हिंदी में स्तरीय अनुवाद करने वाले लोग मुट्ठी भर हैं. जो करते हैं प्रकाशक उनको भुगतान करना नहीं चाहते. अनुवादक को न तो पर्याप्त सम्मान मिलता है और न पैसा. प्रकाशक सस्ते में अनुवाद कराने के चक्कर में पूरी कृति का तिया-पांचा हो जाने देते हैं.

एक अन्य बात हिंदी पट्टी के अधिकतर लोगों की मुफ्तखोरी की मानसिकता की भी है. हिंदी वाले जो लोग पढ़ना चाहते हैं, वह खरीदना नहीं चाहते. वह चाहते हैं गणतंत्र दिवस परेड या प्रगति मैदान के ट्रेड फेयर के पास की तरह किताब भी उनको मुफ्त में मिल जाए. वह एहसान जताएं, देखो मैंने तुम्हारी किताब पढ़ी.

एक अन्य बड़ी समस्या भाषा की है. हिंदी के ज्यादातर लेखक ऐसी भाषा लिखते हैं (मेरा मतलब दुरूह से ही है) कि सामान्य पाठक सर पकड़कर बैठ जाता है. (ऐसी समस्या अंग्रेजी में नहीं है) हिंदी के विरोधी ज्यादा हैं इसलिए हिंदी में सरल लिखने का आग्रह टीवी और डिजिटल माध्यम में अधिक रहता है. यह आग्रह कई बार दुराग्रह तक चला जाता है.

देश में 3 फीसदी अंग्रेजी बोलनेवाले लोगों के लिए चल रही अंग्रेजी मीडिया में मीडियाकर्मियों की तनख्वाह हिंदी वालों से कर लें तो उड़ने वाले सभी हिंदी पत्रकार भी औकात में आ जाएंगे. अंग्रेजी में फां-फूं करने वाले औसत छात्र भी इंटरव्यू में शीर्ष पर बैठते हैं. बाकी देश में हिंदी की स्थिति क्या है यह वैसे किसी बालक से पूछिएगा जो हिंदी माध्यम से यूपीएससी वगैरह की परीक्षा में बैठता है.

खैर, शुक्रिया कीजिए हिंदी सिनेमा का कि हिंदी का प्रसार किया. टीवी का भी. पर यहां भी हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन को छोड़कर बाकी सभी लोग अपने संवाद रोमन में और फिल्म की पटकथा का बाकी ब्योरा अंग्रेजी में लेते हैं. इंटरव्यू देने में भी उन्हें अंग्रेजी ही मुफीद लगती है. अंग्रेजी में कुछ भी बोलने वाले की बात को गौर से सुनना और हिंदी में गहरी अच्छी बात को भी हल्के में लेना भारतीय मानसिकता का वही पक्ष है जिसे गोरा रंग सुंदर लगता है और गहरा रंग असुंदर. हिंदी पट्टी की मानसिकता वही है जिसकी वजह से चमड़ी के रंग को गोरा बनाने वाली क्रीमें बाजार में सबसे ज्यादा बिकती हैं.

बुरा लगेगा पर, हिंदी के प्रसार खासकर सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के भाषणों में हिंदी लाने का अहम काम नरेंद्र मोदी ने किया है. आप को चुभेगी यह बात पर सच है.

आखिरी बात, ऊंचे दर्जे के साहित्यकारों ने हिंदी के प्रसार के लिए कुछ भी नहीं किया है. हो सकता है समृद्धि आई हो हिंदी के खजाने में. पर प्रसार तो नहीं हुआ. आजकल नई वाली हिंदी भी है, जिसमें मैं नयापन खोजता रह गया.

बहरहाल, नई हो, पुरानी हो, तमिल, तेलुगू, बंगाली, बिहारी, मैथिली, ओडिया..चाहे जिस भी लहजे में हो, हिंदी हिंदी ही है. रहेगी. हो सकता है अगले 50 साल में हिंदी विलुप्त हो जाए. कम से कम लिपि तो खत्म हो ही जाए. लेकिन तब तक अगर बाजार ने इसे सहारा दिए रखा तो चलती रहेगी, चल पड़ेगी. तब तक के लिए हैप्पी हिंडी डे ड्यूड.

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Monday, September 9, 2019

पुस्तक समीक्षाः सूखे पत्तों का राग मर्मस्पर्शी गिरहों को आहिस्ते से खोलता है.

गुरमीत बेदी का कथा संग्रह 'सूखे पत्तों का राग' में 14 कहानियां हैं. इस किताब कि कहानियां वर्तमान दौर में लिखी जा रही अधिकांश कहानियों से कुछ अलग एवं उम्दा हैं. कुछेक कहानियों को छोड़ दें तो, सभी कहानियों में लेखक ने पहाड़ों और पर्वतीय राज्य और शहरों का परिवेश बनाये रखा है. पहली कहानी पुल से लेकर आखिरी कहानी चिड़िया तक यह साफ झलकता है.

ज्वारभाटा कहानी में एक विधवा स्त्री के अपने मृत पति के लिए प्रेम का खूबसूरती से वर्णन किया गया है, वहीं पांचवी कहानी खिला रहेगा इंद्रधनुष में एक युवा जोड़े की मर्मस्पर्शी प्रेम कहानी है, जो किसी को भी भावुक कर सकती है.

नींद से बाहर में आज के समाज में सोशल मीडिया से मनुष्य के पारिवारिक जीवन में पड़ते प्रभाव का उल्लेख प्रभावी रुप से किया गया है. एक रात कहानी में एक पुत्र का मां के प्रति लगाव के बारे में तो, हवा में ठिठकी इबारत के माध्यम से समाज में होती बेमेल शादियों के बारे में जिक्र किया गया है.

सूखे पत्तों का राग कहानी में हेम सिंह का भोलापन हंसाता और गुदगुदाता तो है ही इसके साथ-साथ गरीबी में भी हार नहीं मानने की उसकी आदत पाठक के मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं. आखिरी कहानी चिड़िया एक अकेली लड़की की कहानी है जो एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका है. अकेली लड़की के बारे में समाज क्या सोचता है इस बारे में कहानी अपने तरीके से बात कहती है. 

इस कहानी के माध्यम से जो सच सामने आता है वह दिल दहला देने के लिए काफी है.





सूखे पत्तों का राग किताब की कुछ कहानियों को छोड़ दें तो ज्यादातर कहानियां मर्मस्पर्शी हैं, जो भावुक करने के साथ-साथ मानस पटल पर एक गहरा असर डालती हैं. कहीं-कहीं इस किताब में मुद्रण की गलतियां भी हैं. कहानी पढ़ने में रुचि रखने वालों के लिए एक अच्छी किताब है. चूंकि गुरमीत बेदी की यह दूसरी ही किताब है फिर भी इस संग्रह की प्रतीक्षा बहुत दिनों से थी.

लेखक गुरमीत बेदी ने अपनी इस किताब में आसान भाषा का चयन किया है, जिससे किसी भी कहानी को समझने में किसी प्रकार कि मुश्किल नहीं होती है. यह हिंदी के पाठकों से इतर दूसरे भाषा-भाषियों तक पहुंच बना पाएगी.

किताबः सूखे पत्तों का राग
लेखकः गुरमीत बेदी
प्रकाशनः भावना प्रकाशन
मूल्यः 250 रुपए
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Tuesday, September 3, 2019

बूम बूम बूमराह

भारत ने वेस्टइंडीज को टेस्ट सीरीज में हरा दिया. पहला टेस्ट मैच 318 रनों के अंतर से हराना बड़ी बात है. पर बड़ी बात यह भी है कि भारत ने दूसरा टेस्ट मैच भी 257 रनों से जीत लिया. पर यह ऐसी खबर है जिसे आपने सुबह से पढ़-सुन लिया होगा.

पर असली खबर हैं भारत के यॉर्करमैन जसप्रीत बूमराह. एंटीगा टेस्ट में बूमराह ने महज 7 रन खर्च करके 5 विकेट उड़ा लिए. पहली पारी में भले ही इशांत शर्मा जलवाफरोश हुए हों पर दूसरी पारी में भारत का हाथ ऊंचा किया बूमराह ने ही. दूसरे जमैका टेस्ट में बूमराह ने पहली पारी में हैटट्रिक समेत 6 और दूसरी पारी में एक विकेट लिया.

बुमराह टेस्ट में हैटट्रिक लेने वाले तीसरे भारतीय गेंदबाज बने, जबकि कैरेबियाई धरती पर यह कारनामा करने वाले वह पहले भारतीय गेंदबाज हैं. दूसरे टेस्ट के दूसरे दिन शनिवार को उन्होंने वेस्ट इंडीज के खिलाफ हैटट्रिक सहित 6 विकेट झटके, वह भी सिर्फ 16 रन देकर. बुमराह ने यह कारनामा पारी के 9वें ओवर की दूसरी गेंद पर डारेन ब्रावो (4), तीसरी गेंद पर शाहमार ब्रूक्स (0) और चौथी गेंद पर रोस्टन चेज (0) को आउट कर किया. 

इस तरह जसप्रीत बुमराह टेस्ट में हैटट्रिक लेने वाले तीसरे भारतीय गेंदबाज बने, जबकि वेस्ट इंडीज में हैटट्रिक लेने वाले पहले भारतीय बने. 

बुमराह से पहले भारत के लिए हरभजन सिंह (रिकी पॉन्टिंग, एडम गिलक्रिस्ट और शेन वॉर्न) ने 2001 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कोलकाता में हैटट्रिक ली थी. वह टेस्ट में हैटट्रिक लेने वाले पहले भारतीय बने थे. उनके बाद यह कारनामा तेज गेंदबाज इरफान पठान (सलमान बट्ट, यूनिस खान और मोहम्मद यूसुफ) ने 2006 में पाकिस्तान के खिलाफ किया था. यह मैच कराची में खेला गया था. ओवरऑल यह टेस्ट क्रिकेट की 44वीं हैटट्रिक है.

कम रन देकर ज्यादा से ज्यादा विकेट लेना किसी भी गेंदबाज का सपना होता है. एंटीगा में कारनामा करना जसप्रीत बूमराह के लिए कोई पहली बार का मसला नहीं था. बुमराह सबसे कम रन देकर टेस्ट की एक पारी में 5 या इससे ज्यादा विकेट लेने वाले भारतीय गेंदबाज बन गए. बुमराह से पहले यह रिकॉर्ड वेंकटपति राजू के नाम था, जिन्होंने 1990 में श्रीलंका के खिलाफ चंडीगढ़ में 12 रन देकर 6 विकेट चटकाए थे.

टेस्ट मैच की एक पारी में जसप्रीत बूमराह ने ऐसा कारनामा चौथी बार किया है जब उन्होंने पांच या इससे ज्यादा विकेट हासिल किए हैं. उनको यह उपलब्धि चार अलग-अलग दौरों में हासिल हुई है. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और अब वेस्टइंडीज दौरे पर यह उपलब्धि हासिल की. बुमराह भारत ही नहीं, एशिया के पहले ऐसे गेंदबाज बन गए हैं, जो इन चार देशों के हर दौरे में पांच विकेट लिए हैं.

जरा बूमराह की गेंदबाजी देखिए, बगूले की तरह उड़ान भरते और रन अप लेते समय उनकी देहभाषा देखिए. किसी भी तेज़ गेंदबाज की बनिस्बत उनका रन अप छोटा है पर तेजी कम नहीं. और जितनी तेजी है उससे भी अधिक सटीक गेंदे डालते हैं. खासकर यॉर्कर.

अभी भारत की गेंदबाजी में धार आई है. मोहम्मद शमी भले ही पारंपारकि अंदाज में गेंदबाजी करते हैं लेकिन वह एक छोर पर बल्लेबाजों की नकेल डाले रहते हैं. जाहिर है, उसके बाद बूमराह अपनी नेज़े जैसी तीखी गेंदों से बल्लेबाज को पवेलियन भेजने पर उतारू रहते हैं. इशांत की स्विंग और जाडेजा की स्पिन अपने तरीके से रन रोके रहते हैं.

एक दफा पांच विकेट ले लेना शायद उतनी बड़ी बात नहीं, पर कप्तान अगर मुश्किल घड़ी में बारंबार बूमराह को ही गेंद पकड़ाए तो मैदान में उनकी भूमिका की अहमियत साफ हो जाती है.

बूमराह पर विश्वास इसलिए भी है कि वह सिर्फ रफ्तार की सौदागरी नहीं करते. गेंदें सटीक भी डालते हैं और हवा में उसे घुमाते भी हैं. अमूमन उनकी गेंद टप्पा खाने के बाद कांटा भी बदलती है. विकेट भारतीय परिस्थितियों का हो या फिर विदेशी सरजमीं पर भारी मौसम वाला, बूमराह ने लाल और सफेद दोनों गेंदों को अपने मन मुताबिक स्पीड और घुमाव दिया है.

पर बूमराह ने क्रिकेट के तीनों फॉरमेट में अपनी गेंदबाजी से चमत्कृत किया है. आऩे वाले दिनों में भारतीय क्रिकेट उन पर अपनी निगाह बनाए रखेगा बल्कि आंख मूंदकर भरोसा भी करता रहेगा.

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Friday, November 23, 2018

क्या सारे मनुष्य आनुवंशिक रूप से एक हैं या हमारी नस्लें अलग हैं?

आज की दुनिया में मौजूद सभी मनुष्य होमो सेपियन्स (आत्मश्लाघा से ग्रस्त हम लोगों ने खुद को होमो जीनस से ताल्लुक रखने वाले सेपियन्स यानी बुद्धिमान मान लिया है) हैं. लेकिन इसके अलावा और भी आदिम प्रजातियां रही हैं जो हम जैसी थीं.

25 लाख साल पहले पूर्वी अफ्रीका में वानरों का प्रारंभिक जीनस ऑस्ट्रालोपीथिकस था. मजबूत कद-काठी के निएंडरथल्स थे. इंडोनेशिया के होमो सोलोऐंसिस थे. इसके अलावा होमो रुडोल्फेंसिस, होमो एर्गास्टर (कामकाजी मनुष्य) और सीधे खड़े होने वाले होमो इरेक्टस थे. अमूमन भ्रांतिवश इन सबको एक ही सीधी वंशावली के पूर्वज मान लिया जाता है, जिससे हम विकसित हुए. (मनु-शतरूपा, आदम-हव्वा, एडम-ईव वाले प्लीज इस पोस्ट को नजरअंदाज करें)

पाठ्यपुस्तकों में अभी तक माना जाता है कि एर्गास्टर ने इरेक्टस को जन्म दिया, इरेक्टस ने निएंडरथल्स को और फिर निएंडरथल्स से हम लोग हुए. यह एकरैखीय मॉडल इस गलत धारणा को जन्म देता है कि किसी खास क्षण में किसी एक ही किस्म के मनुष्य पृथ्वी रहते थे.

तो फिर उनका क्या हुआ? इस बारे में दो परस्पर विरोधी सिद्धांत है या ठीक-ठीक कहें तो अनुमान हैं. पहला है संकरण सिद्धांत (इंटरब्रीडिंग थियरी) जो आकर्षण, सेक्स और दो प्रजातियों के आपस में घुलने-मिलने की कहानी है. जैसे ही अफ्रीका से आए लोग दुनिया में फैले (कैसे, यह अगली किसी पोस्ट में) उन्होंने दूसरी मनुष्य आबादियों के साथ मिलकर प्रजनन किया और आज के लोग इसी संकरण का नतीजा हैं.

इसके उलट, प्रतिस्थापन सिद्धांत (रिप्लेसमेंट थियरी) बिलकुल अलहदा कहानी कहता है--असामंजस्य, विकर्षण और शायद जाति संहार की कहानी. इस अनुमान के मुताबिक, सेपियन्स और दूसरे मानव प्रजातियों की शारीरिक रचनाएं भिन्न थीं, संभावना है कि इनके सहवास के ढंग और शारीरिक गंध भी अलग रही होगी. अगर एक निएंडरथल जूलिएट और सेपिसन्स रोमियो के बीच इश्क़ भी हो जाता तो वे जननक्षम बच्चे पैदा नहीं कर सकते थे. दोनों आबादियां पूरी तरह विलग बनी रहीं और निएंडरथल या तो मार दिए गए या मर गए और उनके जीन भी उन्हीं के साथ मर गए. यानी सेपियन्स ने पिछली तमाम प्रजातियों की जगह ले ली. इस तरह आज के हम सब मनुष्यों का उद्गम पूरी तरह पूर्वी अफ्रीका में आज से 70 हजार साल पहले हुआ.

लेकिन अगर प्रतिस्थापन सिद्धांत सही है तो हम सब जिंदा लोगों का आनुवंशिक वजन एक जैसा है और इसतरह नस्लीय रूप से भेदभाव गलत ठहरता है. लेकिन अगर संकरण सिद्धांत सही है तो अफ्रीकियों, यूरोपियनों और एशियाईयों के बीच हजारों साल पुराने आनुवंशिक भेद हैं. यह राजनैतिक डायनामाइट है, जो विस्फोटक नस्लभेदी सिद्धांतों के लिए पर्याप्त बारूद मुहैया करा सकता है.


Friday, March 9, 2018

नीमः सकुचाते फूलों का वह वीतराग झरना

याद आता नीम के नीचे रखे
पिता के पार्थिव शरीर पर
सकुचाते फूलों का वह वीतराग झरना
– जैसे माँ के बालों से झर रहे हों –
नन्हें नन्हें फूल जो आँसू नहीं
सान्त्वना लगते थे.


कविताः कुंवर नारायण
फोटोः मंजीत ठाकुर

फोटोः मंजीत ठाकुर

Sunday, March 4, 2018

फूटा घट-घट घटहिं समाना

अभिनेत्री श्रीदेवी के अचानक निधन से पूरा देश सदमे में आ गया था. 24 फरवरी की रात अचानक खबर आई कि दुबई में श्रीदेवी का हार्ट अटैक से निधन हो गया. खबर सुनते ही बॉलीवुड के तमाम सितारे सोशल मीडिया पर शोक जताने लगे और उन्हें श्रद्धांजलि देने लगे. लेकिन श्रीदेवी के निधन पर जिस तरह से मीडिया कवरेज हुई उससे अभिनेता ऋषि कपूर थोड़े नाराज भी दिखे.

उन्होंने ट्वीट किया, "अचानक श्रीदेवी 'बॉडी' कैसे बन गईं? सारे टीवी चैनल दिखा रहे हैं कि बॉडी आज रात मुंबई लाई जाएगी. अचानक आपकी पहचान खत्म हो गई और बॉडी बन गई."

थोड़ी देर के लिए मीडिया कवरेज को छोड़ दीजिए, तो ऋषि कपूर की इस नाराजगी का जबाव भारतीय परंपरा और मनीषा में मिलता है. हिंदू जीवन धर्म में जन्मतिथियों के मनाने की परंपरा है और पुण्यतिथि सिर्फ पिता की मनाई जाती है. क्योंकि पिता की मृत्यु की घटना जीवन से जुड़ी है. भारतीय परंपरा कहती हैकि मृत्यु के अनंतर ही पिता का सारा ऋण पुत्र को हस्तांतरित होता है.

कोई सामान्य हिन्दू श्राद्ध की सारी विधियां पूरी करे या न करे, दाह संस्कार के बाद पीपल के पेड़ के नीचे एक घड़ा जरूर बांधता है. उस घड़े में नीचे छोटा-सा छेद कर दिया जाता है. प्रतिदिन उस घड़े में पानी भरा जाता है और यह अपेक्षा की जाती है कि पानी निरंतर पीपल की जड़ में गिरता रहे. उस घड़े के पास प्रतिदिन दीपक जलाया जाता है.

यह जीवन की साधना है.

महाप्रयाण के लिए गया जीवन ही उस घड़े के रूप में सनातन काल की शाखाओं में उतने दिनों तक लटका दिया जाता है जितने दिन प्रतीक रूप में उसे नया जन्म ग्रहण कर लेना है. और तब इस प्रतीक की जरूरत नहीं रह जाती है. इस प्रतीक की सार्थकता खत्म हो जाती है तो इसे भी फोड़ दिया जाता है, 'फूटा घट-घट घटहिं समाना'. एक चेतन व्यक्ति समष्टि में, सृष्टि में वापस चला जाता है.

विज्ञान पढ़ने वाले लोग जानते होंगे, हम सभी मूलतः ऊर्जा से बने हैं. हम एनर्जी का पार्ट हैं. उस एनर्जी या ऊर्जा को जो इस अखंड ब्रह्मांड में व्याप्त है और हर ओर प्रवाहित हो रही है. ऊर्जा के संरक्षण का सिद्धांत कहता है, 'ऊर्जा का न तो नाश हो सकता है न उसका सृजन किया जा सकता है. वह सिर्फ रूपांतरित हो सकता है.'

क्या भौतिकी का यह सामान्य नियम आपको गीता के श्लोकों की याद दिला रहा है? बिलकुल सही, हम सभी ऊर्जा का हिस्सा हैं और उसी में चले जाते हैं. आप चाहें तो इसको 'पंचतत्वों में विलीन हो जाना' भी कह सकते हैं.

क्षिति जल पावक गगन समीरा,

पंच रचित अति अधम शरीरा।

शरीर के भौतिक अवशेषों को गंगा की धारा में या तीर्थ में प्रवाहित करने के पीछे भी जीवन की निरंतरता की खोज की भावना है. भस्मीभूत अवशेष एक अध्याय की समाप्ति के प्रतीक भर हैं, वे पूरी तरह अशुचि हैं. अपवित्र हैं. उन्हें छूने भर से आदमी अपवित्र हो जाता है, क्योंकि आदमी मृत्यु को छूने के लिए नहीं बना है. वह जीवन का प्रतीक है. इसलिए मृत्यु अशौच है, अपवित्र है. आदमी की देह जीवन के पार जीवन की खोज के लिए साधन है. भारतीय परंपरा कहती है ऐसे साधन देवताओं तक को मयस्सर नहीं है.

लेकिन बदलते वक्त में चलन उल्टा हो गया है. भस्मियां पवित्र हो गई हैं. उनको ताम्र कलशों में रखा जाने लगा है. चुपचाप शांति से प्रवाहित करने की बजाय बड़े-बड़े जुलूस निकाले जाते हैं. उनको एक जगह नहीं, जगह-जगह प्रवाहित करने का चलन चल पड़ा है. मृत्यु की पूजा भोंडे तरीके से शुरू हो गई.

दिवंगतों की मूर्तियों की स्थापना की जाने लगी हैं. मंदिर बनने लगे हैं. जो चला गया, उसकी पार्थिव आकृति इतिहास के लिए भले जरूरी हो, पर उसकी पूजा क्यों?

श्रीदेवी के मामले में उनका काम ही अनुकरणीय है. सिनेमा की कला में उनका योगदान ही सराहा जाना चाहिए. शरीर तो रीत गया, फूट गया (घड़े की तरह) तो उसकी पूजा क्यों?

यह श्लोक ऋषि कपूर ने नहीं सुना हो तो सुनना चाहिए,

न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं न पुनर्भवम।

कामये दुःख ऋतांना केवलमार्स्त्तिनाशनम्।।

यानी, न मैं राज्य चाहता हूं न स्वर्ग, न पुनर्जन्म के चक्कर से मुक्ति. मैं केवल दुखितों के पीड़ा हरने का अवसर चाहता हूं.

जो कुछ भी जैसा जीवन चारों तरफ है, उसकी साझेदारी यही हिन्दू सनातन परंपरा का मूल तत्व है. दर्शन है.

ऐसे में श्रीदेवी का कार्य ही उनकी पहचान है. बाकी जो बचा हुआ है, पांच तत्वों वाला, वह घड़ा है रीता हुआ, खाली हुई देह है, बॉडी है. मैं जानता हूं कि संवेदनशील ऋषि कपूर बेहद शोकाकुल हैं पर उऩको श्रीदेवी के पार्थिव शरीर को 'बॉडी' कहने पर नाराज नहीं होना चाहिए.

(यह लेख इंडिया टुडे में प्रकाशित हो चुका है, कृपया कहीं और प्रकाशित न करें)

Tuesday, January 9, 2018

पंचम दा की याद में

मुझे याद है कि मैं अक्षय कुमार की कोई मसाला फिल्म देख रहा था. शायद खिलाड़ी 786 थी. अक्षय अपनी कन्यामित्र असिन के साथ एक डिस्कोथे में जाते हैं और पंचम दा उर्फ राहुलदेव बर्मन की तस्वीर देखकर नाचने से पहले जूते उतार देते हैं.

पंचम दा को यह सम्मान वाकई पूरा फिल्मोद्योग देता है. वह उसके हकदार भी थे.

फिर याद आते हैं कुछ गाने, जो हममें से हरेक ने कभी न कभी, दोस्तों के कहने पर जबरिया या कभी अकेले में खुद ब खुद गुनगुनाए जरूर होंगे. चिनगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाए..यह गाना तो तकरीबन बेसुरे लोग भी गा ही लेते हैं. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना..यह गाना भी बेहद लोकप्रिय है, और हर पाठक को याद होगा. इसी तरह, पिया अब तो आजा... की तड़कती-फड़कती धुन हर एफएम पर हफ्ते में चार बाज बज ही जाता है.

राहुल कोलकाता में जन्मे थे. इनके बारे में यही कहा जाता है बचपन में जब ये रोते थे तो इनकी रूलाई में संगीत का पांचवां सुर सुनाई देता था और शायद इसीलिए इनको पंचम कहा गया. इनको पंचम पुकारने वाले भी लीजेंड ही थे. अशोक कुमार.

पंचम दा की पीठ पर परंपरा का बक्सा लदा था. पिता सचिन देव बर्मन जैसे नामी-गिरामी संगीतकार थे, जिनकी धुनों में अमूमन त्रिपुरा और बंगाल के किसानों मछुआरों की करूण तान पहचानी जा सकती हैं. एसडी बर्मन की आवाज में भी वो दर्द था, कि जब वो ओ रे मांझी कहकर आलाप लेते, तो कलेजा बिंध जाता. उनमें लोकगीतों का सोंधापन था.

राहुलदेव को अपने पिता की साया से निकलना था. साथ ही, उस विरासत को साथ ले चलना था जो बालीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल कोलकाता से ली थी और बाद में उस्ताद अली अकबर खान से सरोद सिखते वक्त रखा था.

पंचम दा का संगीत देखिए तो उसमें जैज़, हिंदुस्तानी और सुगम का सुखद मिश्रण दिखेगा. आखिर हम में से कितने लोग हैं जिनके दिलों के तार जावेद अख्तर की लिखी और पंचम दा के सुरों में पिरोई, एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा से झनझना न जाते हों.

पिता सचिन देव बर्मन ने बचपन से ही आरडी को संगीत के दांव-पेंच सिखाने शुरू कर दिए थे. वरना, नौ साल का बच्चा क्या संगीत सुरों के पेचो-खम को साधकर धुन तैयार कर सकता है!

पंचम ने किया था.

उनका पहला कंपोजिशन महज नौ साल की उम्र में आया था. गीत था, ”ऐ मेरी टोपी पलट के”. इसे फिल्म “फ़ंटूश” में उनके पिता ने इस्तेमाल किया. छोटी सी ही उम्र में पंचम दा ने “सर जो तेरा चकराये …” की धुन तैयार कर लिया जिसे गुरुदत्त की फ़िल्म “प्यासा” में ले लिया गया.

लेकिन कहा न, जो चुनौती थी पिता के साए से निकलने की, उसे उन्होंने निभाया. उनका संगीत उनके पिता के संगीत से अलहदा था. दोनों की शैली अलग थी. आरडी हिन्दुस्तानी के साथ पाश्चात्य संगीत की मिलावट भी करते थे. तीसरी मंजिल के ओ हसीना जुल्फों वाली जाने जहां से शुरू करिए और शोले के महबूबा होते हुए 1942 अ लव स्टोरी तक आइए. आपको सब दिख जाएगा.

राहुलदेव ने क्या हिंदी क्या बंगला, न्होंने तो तमिल, तेलुगू, मराठी न जाने कितनी भाषाओं में गीतों को संगीतबद्ध किया. करियर की शुरूआत में वह अपने पिता के संगीत सहायक थे.

उनकी खुद की आवाज का जादू तो घलुए (फाव में) में है.

उन्होंने अपने पिता के साथ मिलकर कई सफल संगीत दिए, जिसे बकायदा फिल्मों में प्रयोग किया जाता था.

बतौर संगीतकार आर डी बर्मन की पहली फिल्म 'छोटे नवाब' (1961) थी जबकि पहली सफल फिल्म तीसरी मंजिल (1966) साबित हुई. जिसमें शम्मी कपूर के डांस स्टेप्स कहर बरपा कर रहे थे.

लेकिन असल में एक तिकड़ी थी. राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आरडी बर्मन की. इस तिकड़ी ने 70 के दशक में पूरे भारत में धूम मचा दी थी.

इस दौरान सीता और गीता, मेरे जीवन साथी, बांबे टू गोवा, परिचय और जवानी दीवानी जैसी कई फ़िल्मों आईं और उनका संगीत फ़िल्मी दुनिया में छा गया.

सत्तर के दशक की शुरुआत तक आर डी बर्मन भारतीय सिनेमा जगत के एक लोकप्रिय संगीतकार बन गए थे. उन्होंने लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे बड़े कलाकारों से अपने फिल्मों में गाने गवाए. 1970 में उन्होंने छह फिल्मों में अपना संगीत दिया, जिसमें कटी पतंग काफी कामयाब रही.

बाद में, यादों की बारात, हीरा पन्ना, अनामिका जैसी बड़ी कामयाब फिल्में भी राहुल देव के संगीत से सजी.

लेकिन आरडी बर्मन ने संगीत प्रेमियों को जितना दिया, उससे कहीं ज़्यादा देने के काबिल थे. हमें उनसे जो मिला वो तो उनके ख़ज़ाने का छोटा सा हिस्सा था.

असल में, जीनिसय लोगों के साथ ऐसा होता ही है कि गुजरते वक्त के साथ उनकी महत्ता बढ़ती जाती है. इसलिए झनकार बीट से लेकर खिलाड़ी 786 तक अगर फिल्मी दुनिया उनकी श्रद्धा के फूल भेंट कर रही है, तो इसमें हैरत की बात कुछ भी नहीं.

चलते-चलते उनकी संगीतबद्ध फिल्म इजाज़त के गीत की कुछ पंक्तियां आपके लिए, जो शायद उनकी परंपरा में अलहदा किस्म का इजाफा करती हैं,

एक सौ सोलह चांद की रातें,

एक तुम्हारे कांधे का तिल,

गीली मेंहदी की खुशबू,

झूठ-मूठ के शिकवे कुछ.

वो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो.



Tuesday, November 11, 2014

जनकपुर रेल, जो अब भी छुक-चुक चलती है...


मैं जापान गया था और बुलेट ट्रेन देख रहा था, तो इसके बरअक्स मेरे जेह्न में दो-तीन ट्रेनें कौंध गई थीं। पहली, दिल्ली वाली मेट्रो, जो चलती तो धीमी हैं लेकिन शहरी सार्वजनिक परिवहन की बढ़िया मिसाल हैं। 

दूसरी, हमारी सामान्य रेलगाड़ियां, जो लेटलतीफी का पर्याय बनी हुई हैं। खासकर, जिन पर चढ़कर, सॉरी लदकर और ठुंसकर बिहारियों-यूपी वालों की भीड़ अपने घर को जाती है, कभी दिवाली पर कभी छठपूजा में। 

तीसरी ट्रेन है, मेरे गृहनगर मधुपुर से आसनसोल को चलने वाली डीएमयू ट्रेनें, जिनमें रोजाना चलने वाले मुसाफिर चढ़ते हैं, जिनकी खिड़कियों में साइकिलें और दूध के डब्बे लटके होते हैं।

लेकिन इन सबसे ज्यादा याद आई मुझे जयनगर से जनकपुर के बीच चलने वाली ट्रेन की।

जिनको नहीं पता, वैसे लोगों के लिए बता दें कि जयनगर बिहार में है, नेपाल की सरहद पर है और यहां तक भारतीय रेल से पहुंचने के बाद, जनकपुर-जो कि नेपाल में है-तक पहुंचने का एक मात्र ज़रिया यही ट्रेन है।

नेपाल जाने के लिए पासपोर्ट और वीज़ा की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि उससे कहीं अधिक मशक्कत करनी होती है।

पहली मशक्कत टिकट लेने के लिए होती है। ट्रेन में कुल सात डब्बे हैं तो मुसाफिरों की जबरदस्त भीड़ होती है। जनरल बोगी में, जब मैं पिछली दफा गया था, तो बीस नेपाली रूपये का टिकट है। इस क्लास का टिकट आप नहीं ले पाएंगे। बता दें, कि एक भारतीय रूपया नेपाली एक रूपये साठ पैसे के बराबर होता है।

दूसरा विकल्प है, पहली श्रेणी का टिकट लेना। इसकी कीमत, पचास नेपाली रूपये है। इसका टिकट तो, मैं शर्त बद सकता हूं, आप क़त्तई नहीं ले पाएंगे। इन दोनों में से कोई भी टिकट आप ले पाएं, तो चैंपियन समझिए।

यही है अलबेली रेल, जयनगर से जनकपुर। फोटो सौजन्यः मधेशी प्राइड


नैरोगेज की यह ट्रेन खिलौना ट्रेन से अधिक कुछ नहीं। यानी, रेल पटरी की कुल चौड़ाई 76 सेंटीमीटर है।

भारत और नेपाल के बीच इस रेल मार्ग की शुरूआत साल 1928 में हुई थी। वैसे तो इस रेललाईन की कुल लंबाई 51 किलोमीटर है, और रेल की पटरी जनकपुर नहीं, बल्कि उससे आगे बीजलपुरा तक जाती है। लेकिन कई दशकों से ट्रेन जनकपुर तक ही जाती है। जितना मुझे याद है, मैंने अपने बचपन से आजतक इस ट्रेन को जनकपुर से आगे नहीं जाते देखा।

मेरा ननिहाल जनकपुर के पास है, इसलिए इस ट्रेन से मेरा बचपन का नाता है।
मुझे याद है कि पहले इस रेल का संचालन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन ऑफ नेपाल-जनकपुर रेलवे करती थी। लेकिन साल 2004 से इस कंपनी का सरकारीकरण कर दिया गया, और कंपनी का नाम नेपाल रेलवे कॉरपोरेशन लिमिटेड कर दिया गया।

इस रूट पर सिर्फ पैसेंजर ट्रेन चलती है। माल ढुलाई नहीं होती। वैसे, मेरा तजुर्बा तो यही है कि भारत के चिड़ियाघरों में चलने वाली खिलौना ट्रेनों से भी सुस्त यह गाड़ी चल भी कैसे पा रही है।

सात डिब्बे, हमेशा ठसाठस भरे। नेपाल के जनकपुर और आसपास के लोग खरीदारी करने जयनगर आते हैं। सिर्फ यही नहीं, नेपाल का मधेसी इलाका और मिथिला सांस्कृतिक रूप से बेहद नजदीक हैं और उनमें रोटी-बेटी का रिश्ता भी है।

ऐसे में आवागमन बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, अच्छे भले लड़कों की कीमत (दहेज) सिर्फ इसलिए कम हो जाती हैं अगर लड़की भारत से हो और लड़का नेपाल से।

बहरहाल, यह रेल लाईन दो खंडो में बंटी हुई है। जयनगर से जनकपुर 28.8 किलोमीटर और जनकपुर से बीजलपुरा 22 किलोमीटर।

जनकपुर से बीजलपुरा के बीच यातायात बहुत दिनों से बंद है।

इतनी जानकारी मैंने इसलिए दी है ताकि आपको यह पता चले कि आखिर यह रेललाईन आखिर है क्या बला...बाकी मेरे बचपन के कुछ तजुर्बे हैं, जो अगली पोस्ट में शेयर करूंगा।

Thursday, January 30, 2014

नानी की कहानी

सुशील झा

सुशील झाः बीबीसी में वरिष्ठ पत्रकार है, लेखन में एक चमक है। उनका नानी वाला यह संस्मरण शब्दो की जादूगरी का नमूना है। 


हमरी हुई एक ठो नानी। नानी बुढ़िया नहीं थी। ठां भी नहीं थी। लेकिन हमको मां जइसन लगती।

चूंकि हम जब बच्चे थे, तो हमरी मां जवान थी। और हम फिलिम देखते तो हमको लगता कि मां तो निरूपा राय होती है। तो समझिए कि हमरी नानी हमरी निरूपा राय थी। हम अपनी मां को अपनी बड़की बहन जैसा ट्रीट करते थे।

पल्लू पकड़ के चुप्पे रहते जब कुछ चाहिए होता। नानी से डिमांड करते। अचार खाना है, भुट्टा खाना है। रोटी खाना है। नानी मुंह में ठूंस के खिलाती।

डांटती और खाने के बाद पानी का लोटा लेके खड़ी रहती...कहती...डकर के पानी पी। लेकिन नानी मिलती गांव में। साल में एक बार। नानी सिर्फ साड़ी पहनती और आंगन भर में नाचती फिरती।

ज्यादा लाड़ आता तो गाल पकड़ के गाने लगती। हम बड़े हुए तो शरमाते हुए पूछे नानी से, नानी, तुम मां की तरह ब्लाउज क्यों नहीं पहनती हो।

नानी बोली—तुम्हारी शादी में पहनेंगे। फिर बताई कि पुराने जमाने में कोई नहीं पहनता था। अब शहर में ब्लाउज न पहनना असभ्यता की निशानी है। गजब प्रोग्रेसिव देश है रे बाबा, खैर नानी को ही सबसे पहले बताए कि प्रेम हुआ है। नानी भुच्च देहाती, बोली—जल्दी बियाह कर लो। वरना प्रेम खत्म हो जाएगा।

माई बाबू से वही लड़ी, और बोली, तुम्हारा छोटका बचवा समझदार है। शादी करने दो। मामा लोग नानी को खरचा में दुई सौ रूपया देते महीना का। और अनाज ढेर। उसी में नानी पैसा बचाकर चार धाम घूम आई थी। जब हम कमाए लगे तो हम पूछे नानी से, बोलो क्या चाहिए। नानी बोली, चप्पल खरीद देओ। पांव फयट जाता है। हम नानी का चप्पल खूब पहिने हैं। हमरा पांव नानी का पांव बराबर है। नानी को चप्पल खरीद दिए थे, और पैसा भी देकर आए थे।

उसके बाद साल नाना जी की मौत हुई फिर नानी मुस्कुराई नहीं। हम जाते तो बोलती, आब हम नय जीयब। नानी को दिल की बीमारी थी। लेकिन कभी अस्पताल नहीं गई। झाड़-फूंक करवाती। बायां हाथ खिंचता था। हमको बहुत साल बाद पता चला कि बायां हिस्सा खिंचने का मतलब दिल की बीमारी होती है।

फिर नाना जी की बरसी के छठे दिन नानी ठकुरबाड़ी गई। रात में सोते समय बोली गंगा जल दो। मामा ने मुंह में गंगाजल डाला और नानी चली गई। नाना जी के पास।

हम तब से अपने नानी गांव नहीं गए। हमको नानीगांव नानी के बिना सूना लगता है। हमको नानी की बिना ब्लाउज के स्तन याद आते हैं। मुझे लगता है मैं उन्हीं का दूध पीकर बड़ा हुआ हूं। नानी का मरना मां के मरने जैसा लगता है। पता नहीं क्यों। हम तब रोए नहीं थे क्योंकि हम नौकरी करते थे। हमको लगा रोना मर्द की निशानी नहीं है।


हम तब मर्द थे...अब इंसान हुए हैँ। तो कभी कभी नानी को याद करके रो लेते हैं। 

Thursday, July 4, 2013

लालू-नीतीश-पासवान पुराण भाग-दो

कुमार आलोक लेख को किस्सागोई के अंदाज़ में कहना जानते हैं। लालू की शैली और उनकी राजनीति पर न जाने कितना कुछ लिखा गया है, लेकिन कुछ किस्से ऐसे हैं, जो सुने नहीं गए, या कम सुने गए। यह लालू पर उनके अपने तजुर्बे का कुछ हिस्सा है।--गुस्ताख




लालूजी के बारे में ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं। वे खुद में एक बडे आइकन हैं। 90’ में सत्तासीन हुए लालू के बारे में छह-सात साल तक कोइ सोच भी नहीं सकता था कि बिहार की गद्दी से कोई इस आदमी को जुदा कर सकता है।

लालू के भदेसपन से चिढ़ते थे  बौद्धिक

शुरूआती दौर में जहां राजनीतिक हलके में उन्हें मसखरा कहा गया, वहीं बौद्धिक तबके ने ताश का तिरपनवां पत्ता करार दिया। लेकिन लालू की लोकप्रियता बढती ही गई।

आखिर, इस व्यक्ति में खास क्या है। सबसे खास था कि लालू ने अपने वोट बैंक की नब्ज थाम ली थी। एक वाकया है, सन् 2000 के आसपास गरीब रैली हुई थी। लालू इसके प्रचार-प्रसार के सिलसिले में बिहार में जगह जगह सभाओं के माध्यम से जनता को भारी संख्या में पटना आने की दावत दे रहे थे।

लालू मेरे कस्बे में भी आये। शाम हो गई, अंधेरा पसर रहा था। लालू ने ज्यादा भाषण नहीं दिया, भाषण समाप्त करते ही रथ पर सवार अपने सहयोगी से कहा, ‘अरे जरा उ बिदेश से जो कैमरा लाए है दो हमको’। वस्तुतः वो कैमरा नही बल्कि जापानी टॉर्च था जिसकी लाइट ब्लिंक करती थी और सायरन की-सी आवाज निकलती थी।

लालू ने अपने श्रोताओं से कहा, देखो भाई, ये कैमरा हम विलायत से लाए है और ये तुम लोगों का फोटू खिंचेगा। जब कल रैली समाप्त होगी तो मैं इसकी रिकॉर्डिंग देखूंगा। तब हमको पता चल जाएगा कि तुम लोगों में से कौन-कौन रैली में नही पहुंचा है। लालू ने उस टार्च को घुमाना शुरु किया।

मेरे साथ भीड़ में एक दूध बेचने वाला इन्सान पटना से अपना दूध बेचकर वापस अपने गांव जा रहा था। लालू जी चूंकि भाषण दे रहे थे तो बेचारा ठहरकर लालू जी का भाषण सुन रहा था।

जैसे ही टार्च की रौशनी उसके मुख पर पड़ी, उसने कहा अरे बाप रे बाप लालू जी फोटुकवा खिंच लिये कल बेटी के यहां जाना था ..अब तो हमें रैली में जाना ही होगा। खैर, पढे लिखे लोग तो लालूजी की इस नौटंकी को समझ रहे थे लेकिन भोली भाली जनता को झांसा देना कहां का न्याय है।

जब लालू सत्ता में थे, तो कहा जाता था कि लालू अगर कुत्ते के गले में भी लालटेन डाल देंगे तो वे सीधा संसद या विधानसभा पहुंच जाएगा। इसी क्रम में उन्होने पत्थर तोडने वाली औरत भगवतिया देवी को संसद में प्रवेश करा दिया।
लालू के मुख्यमंत्री बनते ही एकाएक कई मसखरे-भाट पैदा हो गये । उन्हीं में से एक चारण-भाट थे ब्रहदेव आनंद पासवान। पहले वो मच्छर चालीसा लिख चुके थे। बाबा चूहरमल जयंती पर उन्होने लालू चालीसा पढकर सुनाया।

लालू का ये चालिसा फुटपाथ से लेकर ट्रेन में फेरी लगाने वाले तक बेचने लगे। मशहूर गायक बालेश्वर का भी गीत खूब प्रचलित हुआ ..बोकवा वोलत नइखें ..केतनो खीयाइ हरियरी...। खैर बालेश्वर के गीत में आलोचनात्म तथ्यों की भरमार थी लालू के लिये।

लेकिन किस्मत चमकी मच्छर चालिसा के लेखक की। उन्हें लालू ने राज्यसभा के लिये नामित कर दिया। ब्रहदेव आनंद पासवान को लोग कुदरबेंट भी कहते थे। 18 महिने के बाद इस मसखरेबाज का टर्म ओवर हुआ और लालू ने फिर इन्हें बाबा चूहरमल के पास भेज दिया।

संसद में रिपोर्टिंग के लिये जाता हूं तो मच्छर चालीसाबाज वहां हमेशा मिल जाते है ...शायद पंशन-वेंशन के चक्कर में। वहीं 1991 में पटना लोकसभा सीट से प्रत्याशी थे पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल। लालू के वोट बैंक के लोगों ने कहा कि लालू जी इ तो पंजाबी हैं हमरे जात का नहीं है ..वोट कैसे दें इसको.....तब लालू ने कहा कि अरे गुजरलवा गुर्जर हैं माने दिल्ली के गोवार हैं,.वोट दो मजे में.. लालू के समर्थकों ने बैलेट बॉक्स में इतना वोट डाल दिया कि आज तक उसका परिणाम नही आया।

लालू ने बहुतो को बनाया लेकिन वैसे लोगों को बिसरा दिया जो लालू प्रसाद को देवता मानते थे। उन्हीं में से एक थी रामरती देवी।

शुरुआती दौर में लालू की हर सभा की शुरुआत रामरति के गीतों से होती थी। कबीरपंथी हैं वो। रात को लालू जी का सर दर्द करता था तो रामरती लालू के बाल में तेल लगाती थी और कबीर के भजन सुनाया करती थी। लालू उससे हर साल राखी बंधवाते थे।

चितकोहरा पुल के निचे मुसहरों की बस्ती में झोंपडा बनाकर रहती थी। सन 2000 में रामरति की बेटी की शादी थी, बतौर मुख्यमंत्री राबड़ी देवी गई भी थीं।

कहा जाता है कि राबडी जी ने पूछा रामरती दीदी बाथरुम कहां है। रामरति ने कहा कि दीदी हमलोग खुले में शौच करते है। फिर क्या था, अगले दिन रामरती का झोंपडा कोठे में तब्दील हो गया।

रामरती के एक बेटे को राबडी ने सरकारी नौकरी भी दी । मैने लालू के दल में ऐसा प्रतिबद्ध व्यक्तित्व नहीं देखा ।

जब 2005 में रामरति ने लालू जी से कहा कि सिंधिया विधानसभा सीट से हमरो लडा द साहेब। लेकिन साहेब ने रामरती को टिकट ना देकर एक माफिया को दे दिया। रामरति की श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई, साहेब के प्रति श्रद्धा आज भी पहले जैसी ही है।

---जारी
           


Sunday, June 30, 2013

लालू-पासवान-नीतीश पुराण भाग-एक

 ये आलेख कुमार आलोक का है। कुमार आलोक, राजनीति कवर करने वाले विचारवान पत्रकार हैं। खासकर वामपंथी राजनीति पर खास नजर भी रखते हैं और श्रद्धा भी। बिहार में लालू युग के बाद की घटनाओं पर अपने तजुरबे को हमारे साथ साझा कर रहे हैं। 
कुमार आलोक

शाहनवाज हुसैन ने पटना में एक रैली को संबोधित करते हुये कहा कि नीतिश सत्ता से बाहर रह ही नहीं सकते। वो सन् 1995 का हवाला दे रहे थे, जब समता पार्टी बिहार में लालू के मुकाबले बुरी तरीके से पिट गई थी। चुनाव परिणामों के बाद नीतिश ने कहा था कि अब वो राजनीति छोड़कर किताब लिखेंगे।

कुछ दिनों बाद खबर आई कि नीतिश बिहार में रहकर ही लालू सरकार के खिलाफ सड़क पर संघर्ष करेंगे। बात आई-गई हो गई। बिहार में उनका भाजपा के साथ गठबंधन हुआ और केंद्र में एनडीए की सरकार बनी।

नीतिश कुमार को अटल बिहारी बाजपेयी का आशीर्वाद प्राप्त था। उन्हें रेल मंत्री के पद से नवाजा गया। बिहार में रहकर संघर्ष करने की बात हवा में रह गई।

नीतिश और लालू के बीच आपसी वैमनस्य इतना था कि रेल डिब्बों में लालू की जाति के दूधिया लोगों को नीतिश के आदेश पर आरपीएसएफ डंडों से पीटते थे। रेल के विभिन्न मलाईदार पदों पर नीतिश ने अपनी जाति के लोगों को चुन-चुन कर बिठाया। हां, नीतिश को इतना आभास था कि लालू को भविष्य में पछाड़ा जा सकता है।

लालू कहा करते थे कि वोट के लिए विकास पैमाना नहीं, जातिगत समीकरण हैं। इस नब्ज को पकडकर नीतिश ने बिहार में रेल के विकास पर बहुत काम किया। पहली बार जब लालू पशुपालन घोटाले में जेल गये तो बेउर जेल उनके समर्थ उन्हें दूल्हे की तरह बिठाकर जेल के दरवाजे पर ले गये।

समर्थक नारे लगा रहे थे कि जेल का फाटक टूटेगा, लालू यादव छूटेगा। राजनीति में परिवारवाद की मुखालफत करने वाले लालू को अपनी पार्टी के किसी नेता पर विश्वास नहीं रहा। बातें हवा में चल रही थी। कयास लगाए जा रहे थे कि लालू के जेल जाने के बाद सीएम का पद कौन संभालेगा।

टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर छपी कि रंजन प्रसाद यादव, जयप्रकाश नारायण यादव या आर के राणा में से किसी एक को लालू गद्दीनशीं करेंगे। अगले दिन जनसत्ता ने छापा कि अंदरखाने में लालू ने बिहार की कमान अपनी पत्नी को सौंप दी है।

इस खबर पर राजद और अन्य दलों के नेता खूब हंसे। अगले दिन विधायक दल की बैठक हुई। किसी को इसका आभास भी नहीं था कि राबड़ी देवी को नेता चुन लिया जाएगा। हालांकि सब पूर्व-नियोजित ही था। लालू के सबसे विश्वस्त श्याम रजक ने राबडी के नाम का प्रस्ताव किया ..भला किसमें दम था इसका विरोध करने का।
राबड़ी मुख्यमंत्री बनीं और लालू जेल-यात्रा पर निकल गये।

साहब के लिये खैनी मांगकर लाने वाली राबड़ी, सीएम क्वॉर्टर के आस-पास के लोगों से सीधे बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं। अनपढ और सियासत की गलियों से अनजान राबड़ी के लिये ये एक डरावना मंज़र रहा होगा।

साथ ही रहा होगा, पार्टी के अंदर ही सीएम पद का ख्वाब देख रहे तमाम नेताओं के विद्रोह का डर। तब राबडी ने अपने दोनों प्यारे भाईय़ों के हाथों बिहार की कमान अघोषित रुप से सौंप दी। एक राजनीतिक अपराधी था तो एक शुद्ध गंवई अपराधी।

साधु तो राजनीति सीख गये थे लेकिन सुभाष को लगता था कि कमाने का तरीका रंगदारी, अपहरण और ट्रांसफर-पोस्टिंग से ही हो सकता है।

लालू के इन दो लाडले सालों ने गदर मचाया कि बिहार की जनता की नजरों में हीरो रहे लालू की छवि ज़ीरो की हो गई।

मुझे याद है कि सुभाष यादव का कार्यक्रम अगर बिहार के किसी कोने में आपको लेना है तो सुभाष की ये शर्त होती थी कि आने के बाद उन्हें सिक्कों से तौला जाये । 85 किलो के सुभाष यादव को अगर सिक्कों से तौला जाए तो आप उसकी कीमत का आकलन कर लीजिए।

हां, एक बात जरूर थी कि जिस किसी छुटभैये ने युवा हृदय-सम्राट (?) सुभाष यादव का कार्यक्रम ले लिया, वह उस इलाके या जिले का डॉन हो गया। अब वो अफसर से लेकर दुकानदारों तक से सारी वसूली इकट्ठा करता, और उसमें से अपना हिस्सा काटकर सुभाष बाबू को पहुंचाया करता।

जनता की नजरों में राजद की सरकार दिन-ब-दिन गिरती जा रही थी। इधर, नीतिश एनडीए में रहकर बतौर रेलमंत्री जो काम कर रहे थे, वो लोगों को दिखने लगा।

बिहार की जनता को विकास का पहला टेस्ट नीतिश ने रेल में काम करके चखाया। इसके बावजूद लालू इतने कमजोर नही हुए थे। फरवरी, 2005 में विधानसभा चुनावों में खंडित जनादेश मिला। नीतिश, सरकार बनाने की जुगत लगा रहे थे। अगर वो जोड़-तोड़कर सरकार बना लेते तो उनका भी हाल मधु कोडा सरीखा होता।
लालू को ये क़त्तई बर्दाश्त नहीं था। लालू को उस समय भी यह लग रहा था कि बिहार उनके परिवार की जागीर है। केंद्र में यूपीए के साथ सांठ-गांठ करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

राष्ट्रपति शासन के दौरान बूटा सिंह और उनके दो पुत्रों बंटी और लवली ने मिलकर वही काम किया, जो साधु और सुभाष राबड़ी के लिये किया करते थे। यही कारण रहा कि अक्तूबर के चुनाव में जनता ने नीतीश के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की मुहर लगाकर लालू और पासवान को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

Tuesday, June 11, 2013

मोदी, नए जमाने के आडवाणी हैं।


अब आडवाणी बीता हुआ युग हैं। मुझे नहीं पता कि आडवाणी के मन में क्या है, लेकिन सबसे ताज्जुब की बात है कि आडवाणी खुद को सेक्युलर घोषित करने में कामयाब हो गए, और विभिन्न राजनैतिक दलों में उनकी स्वीकार्यता भी साबित हो गई है। यानी एनडीए प्लस की बात हो तो आडवाणी मोदी की बनिस्बत ज्यादा स्वीकार्य होंगे। 

इस्तीफा आडवाणी का तुरूप का पत्ता है। 
इस्तीफा, आडवाणी के तुरुप का पत्ता है।
 बहरहाल, बीजेपी के हालिया मूव पर गौर करें तो देखेंगे कि मोदी को प्रचार समिति की कमान सौंपकर मोदी की अहमियत साबित कर ही दी गई है। लेकिन, यह भी ध्यान देने लायक बात है कि पार्टी ने उनको अभी तक प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। वह ऐसा कदम होगा जिससे पार्टी को सिर्फ मोदी के नाम पर वोट खींचने होंगे, फिर भी मोदी पोस्टर बॉय तो बन ही चुके हैं।

लेकिन क्या मोदी का भविष्य भी आडवाणी सरीखा ही होगा..? मोदी की भी छवि आडवाणी सरीखी ही है, आडवाणी भी विभाजनकारी और उग्र-आक्रामक राजनीति के लिए जाने जाते थे और मोदी ने भी अपनी वक़त 2002 के गुजरात दंगों के बाद ही बढ़ाई। ध्यान दीजिए कि आडवाणी ने 80 और 90 के दशक में रथयात्राएं की थीं, और तब उनका भी ध्रुवीकरण पैदा करने में असर आज के मोदी जैसा ही था।

अस्सी और नब्बे के दशक में आडवाणी ने रथयात्राओं के ज़रिए देश में जनता को ध्रुवीकृत किया था, जिसके बाद दंगों का इतिहास है। इन यात्राओं का परिणाम अय़ोध्या में विवादित ढांचे के ध्वंस में हुआ था। इसका एक परिणाम 1993 में मुंबई धमाकों में हुआ था। बहरहाल, 1984 में  दो सीटों से 1996 में 161 सीटों तक पहुंचाने में आडवाणी का वाजपेयी के साथ मिलकर किया योगदान बीजेपी के इतिहास में अविस्मरणीय होना चाहिए था।

सबको पता ही है कि इतनी मेहनत के बावजूद जब पीएम चुनने का वक्त आया तो पार्टी ने अटल बिहारी वाजपेयी पर मुहर लगाई थी। वाजपेयी की छवि उदार थी, यह कहने की जरूरत नहीं।
तो क्या मोदी को भी क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व के इस दौर में ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है?

सन् 1991 के आम चुनाव में, राष्ट्रीय दलों का कुल मतदान में वोट शेयर 81 फीसद था। लेकिन साल 2009 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते है कि कांग्रेस को 29 फीसद और बीजेपी को 19 फीसद वोट मिले हैं।

मोदी को पीएम प्रत्याशी घोषित करके शायद बीजेपी को हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद होगी। हालांकि हिंदू वोट शायद ही कभी ध्रुवीकृत होते हैं। यह हमेशा जातियों में बंटकर वोट करता है। कभी जाट बनकर, कभी लिंगायत, कभी यादव और कम्युनिस्ट बनकर।

वैसे मोदी को हल्के में नहीं लिया जा सकता, लेकिन फिलहाल तो उनको पीएम इन वेटिंग ही रहना पड़ेगा...ठीक आडवाणी की तरह।

Thursday, February 7, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः उड़ीसा से वापसी


 ट्रेन में बैठे तो गप्पबाज़ी शुरू हो गई। हमारे साथ वाले कूपे में बैठे ते शशि सहाय। गज़ब के फोटोग्रफर। दूसरी तरफ, विज्ञापन फिल्मों और फीचर फिल्मों में अभिनय़ कर चुके (और कर रहे) भूपिन्दर पंत।

भुवनेश्वर से निकले तो मन में यादें थी, बुद्ध के दांतों के अवशेष जो हमने म्यूज़ियम में देखे थे। सोने का ख़ज़ाना, जो खुदाई में हासिल हुआ था। महिलाएं इतना सारा गहना एक साथ देखकर अभिभूत थीं, और कुछ आधुनिका-अंग्रेज़ीदां पत्रकार आम महिलाओं के इस आभूषण-प्रेम पर छींटाकशी में व्यस्त।

बहरहाल, बुद्ध से जुड़ी कथा शुरू हुई। कलिंग या उत्कल (पालि में उक्कला) या ओद्र से महात्मा बुद्ध का संबंध उनके जीवन काल में ही शुरु हो गया था। इसका ज़िक्र इसलिए भी, क्योंकि कई लोग मानते रहे हैं कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण के दो सौ साल बाद अशोक के कलिंग पर हमले से ही बौद्ध धर्म और कलिंग का रिश्ता जुड़ता या शुरू होता है।

अंगुत्तरनिकाय के अनुसार, महात्मा बुद्ध के पहले शिष्यों में से, तपुसा और भल्लिका उक्कला के शहद-व्यापारी थे। वे लोग अपनी 500 बैलगा़ड़ियों में शहद भरकर मध्यदेश की यात्रा पर थे। तभी उनकी मुलाकात गया (आज के बोधगया) में बुद्ध से हुई, जो बोधि प्राप्ति के बाद बोधगया में अपने सातवें हफ़्ते में थे। दरअसल, उनका बोधगया में सातवें हफ्ते का वह आख़िरी दिन भी था।

तपुसा और भल्लिका ने उन्हे चावल और शहद भेंट किया था। महात्मा बुद्ध ने आठ अंजलि  भरकर अपने केश उन्हें उपहार में दिए थे। इन केशों को दोनों शिष्यों ने अपने गृहनगर में स्तूपों में सुरक्षित रख दिए थे। ये स्तूप केश-स्तूप कहलाए।

हाल में उड़ीसा के जाजपुर ज़िले में तारापुर में हुई खुदाई में ये केश-स्तूप निकले हैं। बौद्ध साहित्य तस्दीक करते हैं कि केश-स्तूप सबसे पहले बने स्तूपों में से थे। खुदाई में दो स्तंभ निकले हैं जिनपर ‘केश-स्तूप’ और ‘भिक्खू तपुसा दानम्’ खुदा है।

अब इस बात पर शोध चल रहा है कि क्या अपने पहले शिष्य के आमंत्रण पर बुद्ध स्वयं यहां आए थे, और यह स्थान बुद्ध के जीवनकाल में ही आकर्षण का केन्द्र बन चुका था।

वैसे, इतिहास के लिहाज से, कलिंग में आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्से भी शामिल थे। कलिंग की सबसे पुरानी बस्तियों में तोशाली कलिंगनगर (शिशुपालगढ़) थे।  कलिंगनगर आज भुवनेश्वर के पास ही में था। तीसरी सदी ईसापूर्व में कलिंगनगर को अशोक ने अपनी राजधानी बनाया था, (कलिंग सूबे का) और पहली सदी ईसापूर्व में तोशाली को खारवेल की राजधानी बनने का गौरव हासिल हुआ था।

खारवेल के वंशजों के दौरान इसी मध्य उड़ीसा के इलाके का जिक्र रोमना भूगोलवेत्ता प्लिनी ने पहली सदी ईसापूर्व में अपनी किताब में किया है।

प्लिनी लिखता है, “कलिंग का राजकीय शहर पार्थालिस (तोशाली) है। इनके साम्राज्य में 60,000 पैदल, 1000 घुड़सवार, 700 हाथी हैं जो यु्द्ध के दौरान शहर की रक्षा करते हैं।”

जातक कथाओं के मुताबिक, चौथी और तीसरी सदी ईसापूर्व में, कलिंग का राजधानी का जिक्र दंतापुरम् के नाम से है। दंतापुरम् से ही बौद्धों के सबसे महत्वपूर्ण अवशेष, महात्मा बुद्ध के दांत श्रीलंका ले जाए गए थे।

उत्तर-गुप्त काल में भारत के पूर्वी तट पर कई छोटे-छोटे राज्यों का प्रादुर्भाव हुआ। सातवीं सदी में, चीनी यात्री ह्वेन सांग ने पूर्वी भारत में तीन तटीय इलाकों का ज़िक्र किया है। ये थे, ऊ-चा (ओद्र, मध्य उड़ीसा), कोंग-ऊ-तो(कंगोडा, आज का गंजाम जिला) और कि-लिंग-किया (कलिंग)। इसके मुताबिक, उत्तरी उड़ीसा ओद्र था और मध्य उड़ीसा उत्कल।

कहानी में काफी कुछ बाकी था। शशि सहाय, कैमरे की लेंस पोछते हुए किस्सा जारी रखे हुए थे। कभी हिंदी में तो कभी अंग्रेजी में। उनके साथ का फ्रेंच अर्ध-पत्रकार मुंह बाए हुए सुन रहा था।

पटरियों की आवाज़ में आस्थावानों को ओम् मणि पद्मे हुं सुनाई देने लगा था। 

हमें तो अपने बिहार की याद आने लगी थी। हमको सुबह गया पहुंचना था...जहां से हमारी नालंदा और राजगीर की यात्रा शुरु होने वाली थी।