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Saturday, February 3, 2018

ये जो देश है मेरा किताब बिंदु छिब्बर की समीक्षा

शिवपुरी में एक स्कूल की प्रिंसिपल और पढ़ाकू बिंदु छिब्बर ने ये जो देश है मेरा की समीक्षा लिखी है, उसको यहां शेयर करने से रोक नहीं पायाः


Manjit Thakur' s book ' Ye jo desh hai mera' for me, broke a spell of 'books bought but not read / finished' lately.

It is a non-fiction account of a few rural-tribal pockets and the sufferings and agony that lead to the poor going destitute or committing suicides.
The book is basically a study of five troubled areas. There are the poor landless farmers of bundelkhand, wrestling with the parched land, failing crops and indebtedness. Second are the tribals Seheriya, displaced from their native land and resources for an outlandish sanctuary.
The third chapter highlights the fascinating Dangariya-kondh tribes of Niyamgiri, who locked horns with Vedanta, the company that wanted to exploit for bauxite their sacred mountain Niyamgiri! Their united action through gram-sabhas proved their vehement stand against dacoity in the name of development! The pristine greenery of kalahandi belies their long combat against starvation. When land is over-exploited and forests are brutally razed, an entire local civilisation is put to death.
The fourth part of the book is about the sinking lands of coastal Orissa..a place called Satbhaya. The land rich in bio-diversity, mangroves, crocodile and breeding place of Ridley turtles is being gradually gobbled by the hungry sea. Some experts blame global warming,coastal erosion and building of artificial ports. Infertility of soil affected crops, caused poverty and malnutrition and resulted in a reluctant exodus.
The last chapter depicts the trials and tribulations of ethnic group called Santhals in lalgarh, West bengal. Struggling for livelihood, they were caught in the deathtrap of the administration, fear of naxalites and manipulating Marxist communists and predatory capitalists. Fear prevailed over the green haven abundant in natural resource but notorious for violence, starvation and despair.
The book is easy-to-read and replete with official statistics that assert its trustworthiness and anecdotes that move you to compassion.
In our democratic set-up, regional imbalances, corruption and apathy in the system, lack of far-sightedness and injustice are rampant. It would not be patriotic but foolish to deny it. It is an impartial, thought-provoking account of the challenges before the nation and more sensitivity is required to overcome them. 

I applaud the efforts ofManjit Thakur and recommend the book highly especially to the many idealistic youngsters I can see desirous of making a difference.


Sunday, July 17, 2016

पलायन के मर्ज़ की दवा क्या है!

बेहतर जिंदगी की उम्मीद में एक जगह से दूसरे जगह तक जाना, मनुष्य का स्वभाव रहा है। लेकिन आज के संदर्भ में स्थितियां उलट गई हैं। आज पलायन या प्रवास करने वालों की गिनती बहुत अधिक हो गई है। पलायन जहां प्रवास का नकारात्मक नज़रिए की तरफ इशारा करता है वहीं प्रवास अधिक सकारात्मक शब्द है।

आज, गांव से शहरों में आय़ा आदिवासी या दलित जब शहर में आता है तो उसे सांस्कृतिक रूप से एक खाई का सामना करना होता है। शहरों की परंपराएं और जीवन-मूल्य उसके गंवई परंपराओँ से अलग होते हैं। वैसे, पलायनों को कई दफा सकारात्मक भी माना जाता है। आखिर, शहरी उच्च और सुविधाभोगी मध्यवर्ग को
एक ऐसी आबादी चाहिए होती ही है, जो कम लागत पर उसके लिए घरेलू नौकर से लेकर मजदूरों तक का काम निबटाए। ऐसे में तर्क सामने आते हैं कि पलायन को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता और ऐसे पलायन को विकासवादी पलायन कहा जाता है। लेकिन सच तो यह है कि यह एक तरह से निराशावादी पलायन है क्योंकि
विकास की धारा में पीछे छूट गए लोग ही शहरों की तरफ पलायन करते हैं।

दिल्ली की ही मिसाल लीजिए। यहां आने वाली आबादी में बिहार से आने वाले छात्र और नौकरीपेशा लोगों के साथ बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के हिस्सों से आने वाले लोग है। राजस्थान से दिल्ली आए लोग हों, या फिर उत्तराखंड है, यह सब तभी आए हैं जब उन्हें उनकी ज़मीन पर किसी न किसी किस्म की समस्या का सामना करना पड़ा है।

बिहार में शिक्षा की गत बुरी होने के बाद छात्रों ने बड़ी संख्या में दिल्ली का रूख किया था। राजद के शासन के पंद्रह साल के बदतरीन दौर में बिहार प्रतिभाशाली लड़कों का क़ब्रिस्तान जैसा हो गया था और फिर नौकरी के
लिए दिल्ली आने वाले युवाओं की तादाद बढ़ती गई। पिछले दो दशक में दिल्ली में रह रहे प्रवासियों की गिनती करीब 40 लाख के आस-पास पहुंच गई है।

दोनों राज्यों के बुंदेलखंड के लोग पानी और रोज़गार, अकाल और भुखमरी से दिल्ली का रास्ता नापने को मजबूर हुए। मैं यहां सिर्फ दिल्ली की मिसाल दे रहा हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि सारे लोग सिर्फ दिल्ली ही आए हैं। ऐसा ही उत्तराखंड और राजस्थान के साथ भी हुआ।

पलायन का यह किस्सा असंतुलित विकास की वजह से हुआ है। देश के समग्र विकास में पीछे छूटे लोग ही पलायन करते हैं। इस विकास में न तो इस छूट गए वर्ग की न तो कोई हिस्सेदारी होती है और न ही कोई भूमिका। 

तो सवाल है कि इस समस्या को किस रूप में देखा जाना चाहिए? पहली बात तो यही कि हमें इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या यह पलायन परंपरागत है? या किसी नीतिगत योजना के तहत होने वाला विस्थापन? अगर विस्थापन अपरिहार्य है, बेहद जरूरी ही है तो क्या इसके तहत पुनर्वास की कोशिशें ईमानदार हैं?
इसकी पड़ताल मीडिया को तो करनी ही चाहिए जो अमूमन किसी स्कूप की तलाश में रहता है, साथ ही आला अधिकारियों को भी इसकी जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए।

दूसरा सवाल है कि क्या अगर पलायन रोकना मुमकिन नहीं है, तो इसे बेहतर प्रबंधन के ज़रिए नियंत्रित किया जा सकता है? अगर हां, तो कैसे? इसके लिए कौन से राजनीतिक और नीतिगत कदम उठाए जाने चाहिए? आखिर बड़े से बड़े शहर में भी विकास की संभावनाएं एक वक्त के बाद सीमित हो जाती हैं। छोटे शहरों
का ढांचागत विकास इंतजामों के अभाव में रूका पड़ा है। ऐसे में क्या हम इन सीमित शहरी संसाधनों के बूते पलायन को रोक सकते हैं? नहीं। तो इस समस्या के प्रबंधन की दिशा में कारगर बुनियादी नीतियां और व्यवस्थाएं क्या होंगी?

तीसरा सवाल यह है कि क्या महानगरों की तरफ बढ़ते पलायन से वहां के स्थानीय संसाधनों को हक को लेकर वर्ग विशेष के बीच टकराव की स्थिति नहीं बनेगी? जवाब हैः बनेगी। जैसा कि हम महाराष्ट्र खासकर मुंबई में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को लेकर एक खास मानसिकता वाले लोगों की बातचीत में इस देख ही सकते हैं।

तो क्या पलायन को रोकने के लिए माइक्रो स्तर पर खाद्य सुरक्षा इत्यादि को बढ़ावा देकर और कमजोर तबकों को सामाजार्थिक शोषण से मुक्ति दिलाने के कड़े कदम नहीं उठाए जा सकते हैं? मोदी सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम उठाए तो हैं लेकिन उनके नतीजे आने में वक्त लगेगा। और हां, यह काम सिर्फ मनरेगा के ज़रिए नहीं हो सकेगा। स्किल इंडिया के नतीजे आने में पांच साल का वक्त लेगा और अगर देश विनिर्माण में ठीक-ठाक प्रगति कर पाया तो ग्रामीण स्तर पर रोज़गार का प्रबंध हो पाएगा।

फिलहाल, तो बुंदेलखंड हो या बिहार का ठेठ गंवई शख्स, पलायन के बाद उसके लिए शहरी उपभोक्तावाद के नए झमेले में फंसने के सिवा कोई चारा नहीं, जो उनकी तहज़ीब, उनकी परंपराओं, मूल्यों सबको एक साथ लील रहा है। और हर चीज़ से महरूम यही शख्स हमारे-आपके यहां का शहरी गरीब है, जिसके शोषण का सिलसिला गांवों में होने वाले जातिवादी शोषण से कम खतरनाक नहीं।

मंजीत ठाकुर

Wednesday, November 23, 2011

कभी पूजे जाते थे पलायन करने वाले-भाग दो

....पिछली पोस्ट से आगे...

क्षिणी मध्य-प्रदेश और खानदेश के सिवनी, छिंदवाडा, चंद्रपुर के गोंड साम्राज्य में तालाब बनवाने के लिए बनारस के कारीगरों को बुलवाया गया था. ये लोग विस्थापित होकर यहीं बस गए और उन्होंने न सिर्फ गांव-गांव में हजारों तालाब बनाए, बल्कि पानी के वितरण की एक चाकचौबंद व्यहवस्था भी निर्मित की. इस व्यवस्था में तालाब के कारण विस्थापित होने वालों को तालाब के पास की जमीन देने और गांव के भूमिहीन को पानी के वितरण की समिति का मुखिया बनाने जैसे प्रावधान थे.

मर्जी और मजबूरी में पलायन, विस्थापन की ऐसी कहानियां ऊपरी तौर पर भले ही दाल-रोटी के लिए रोजगार के लिहाज से की गई लगती हों, लेकिन इनमें वैसी गरीबी, दयनीयता दिखाई नहीं देती जैसी आज के थोकबंद पलायन में पग-पग पर दिख जाती है. परदेस जाकर रोजी-रोटी कमाना तो हमेशा मजबूरी में ही हुआ करता है, मगर यह आज की तरह अपने आत्मसम्मान को बेचकर नहीं होता था. आमंत्रित या जजमानी करने वाला समाज भी पलायन करने वालों की मजबूरी का उपहास उडाने के बजाए उनकी क्षमताओं, हुनर का सम्मान करता था.

ऐसा पलायन, विस्थापन समाज को आपस में एक-दूसरे को समझने का मौका देता था. जहां एक तरफ खेतिहर मैदानी समाज पहाड़ी आदिवासियों के रहन-सहन, खान-पान और कठिन हालातों से निपटने की आदतें सीखता था, वहीं दूसरी तरफ सुदूर आंध्र, उत्तराखंड या ओडीशा के लोग उसे नई तकनीकें सिखाते थे. कुंए से पानी निकालने के लिए रहट की तकनीक मध्य-प्रदेश के किसानों को पंजाब से करीब सौ साल पहले विस्थापित होकर आए लोगों ने सिखाई थी.

ऐसा नहीं है कि आज के पलायनकर्ता, विस्थापित हुनरमंद नहीं हैं. अपने-अपने इलाकों में खेती-किसानी और दूसरे रोजगार करने वाले ये लोग सीखने, समझने में माहिर होते हैं. आखिर बुंदेलखंड में बेहद संवेदनशील पान, परवल और सब्जियों की खेती और हाल में आया पीपरमेंट ऐसे लोगों की बदौलत ही फला-फूला है.

दूसरे इलाकों की तरह शिक्षा में बदहाल, लगभग पिछड़ा माने गए पर्यटन क्षेत्र खजुराहो के दर्जनों युवा आजकल फ्रेंच, जर्मन, पुर्तगाली जैसी भाषाएं सीख रहे हैं. इसी बुंदेलखंड में कपड़े, धातु और मिट्टी के कलात्मक कामों की लंबी परंपरा रही है. ऐसी हुनरमंद आबादी को उनके घर के आसपास ही काम उपलब्ध करवाया जा सकता है. सरकारें विकास को केवल भारी-भरकम बजट आकर्षित करने का जरिया मानती हैं, लेकिन क्या समाज और उसके साथ जुड़ी ढेरों औपचारिक-अनौपचारिक संस्थाएं ऐसा कर सकती हैं?
 

कभी पूजे जाते थे पलायन करने वाले

---राकेश दीवान
( भोपाल में राकेश दीवान जी से मुलाकात हुई, एक सेमिनार मेँ। मेरी फिल्म पर उनकी प्रतिक्रिया वाकई उत्साह बढाने वाली थी। उनका यह लेख बिना छापे मन नहीं मान रहाः गुस्ताख)

पलायन की चपेट में चकरघिन्नी होते लोगों को यह जानकारी चौंका सकती है कि एक जमाने में हुनरमंद पलायन करने वालों को पूजा भी जाता था. अपने-अपने इलाकों की मौजूदा बदहाली के बवंडर में फंसकर दाल-रोटी कमाने के लिए सैकडों मील दूर, अनजान इलाकों में जाने वाले आज भले ही शोषित, गरीब और बेचारे कहे-माने जाते हों, लेकिन एक समय था जब उन्हें उनकी श्रेष्ठ कलाओं, तकनीक के कारण सम्मान दिया जाता था. 

महाकौशल, गोंडवाना और बुंदेलखंड समेत देश के कोने-कोने में बने तालाब, नदियों के घाट, मंदिर इसी की बानगी हैं. सुदूर आंध्रप्रदेश के कारीगर पत्थर के काम करने की अपनी खासियत के चलते इन इलाकों में न्यौते जाते थे. काम के दौरान उनके रहने, खाने जैसी जरूरतों की जिम्मेदारी समाज या घरधनी उठाता था और काम खत्म हो जाने के बाद उनकी सम्मानपूर्वक विदाई की जाती थी. गोंड रानी दुर्गावती के जमाने में बने जबलपुर और उसके आसपास के बड़े तालाब, नदियों पर बनाए गए घाट इन पलायनकर्ताओं की कला के नमूने हैं. 
गुजरात से ओडीशा तक फैली जसमाओढन की कथा किसने नहीं सुनी होगी? इस पर अनेक कहानियां, नाटक लिखे, प्रदर्शित किए गए हैं, लेकिन कम लोग ही जानते हैं कि यह जसमाओढन और उनका समाज पलायन करने वालों का समाज था. परंपरा से ओडीशा, छत्तीसगढ़ के कारीगर मिट्टी के काम में माहिर माने जाते हैं. बडे तालाबों, कुओं की खुदाई के लिए इन्हें आमंत्रित किया जाता था और इनके साथ भी आंध्र के पत्थर के कारीगरों की तरह सम्मानजनक व्यवहार किया जाता था.
कभी पूजे जाते थे पलायन करने वाले


तालाब बनाने वाले पलायनकर्ताओं में छत्तीसगढ़ के रमरमिहा संप्रदाय के लोग भी शामिल हैं, जो अपने पूरे शरीर पर रामनाम के गोदने गुदवाते हैं. तालाब रचने के अपने बेहतरीन काम के कारण इन्हें दूर-पास के इलाकों में सादर बुलाया जाता है.

एक जमाने में दुरूह यात्राओं की कठिनाइयों को झेलते बंजारे देश भर में पालतू पशुओं और मसालों के व्यापार की गरज से लंबी दूरियां तय किया करते थे. बीच-बीच में उनका बसेरा तो हो जाता था, लेकिन जानवरों को पानी पिलाने कहां जाएं? ऐसे में वे अपनी हर यात्रा के ठौर-ठिकानों के आसपास तालाब खोदते जाते थे. लाखा बंजारे का बनवाया बुंदेलखंड के सागर का विशाल तालाब इन्हीं में से एक है. ऐसे अनेक जलस्रोत इन पलायनकर्ता बंजारों के पारंपरिक मार्ग पर आज भी देखे, उपयोग किए जाते हैं.

छत्तीसगढ़ के जशपुर में पानी के तेज बहाव से बनी बरसों पुरानी आटा पीसने की चक्की उत्तराखंड से पलायन करके आए पंडितों की सलाह पर बनी थी. ये पंडित आदिवासी, मराठा राज्यों, जमींदारियों में पंडिताई के लिए आते थे और अपने जजमानों को हिमालय के पहाड़ों में आजमाई गई कुछ-न-कुछ नई तकनीक दे जाया करते थे.

खेती को उद्योग का दर्जा दिलाने और इस नाते कटाई, बोनी, निंदाई, गुड़ाई आदि के लिए तरह-तरह की मशीनों की तरफदारी करते लोगों की नजरों से कुछ साल पहले तक दिखाई देते चैतुए अब ओझल हो गए हैं. पलायन की मार से बदहाल हो रहे बुंदेलखंड, मालवा, महाकौशल इन्हीं चैतुओं की दम पर अपनी खेती किया करते थे. आसपास के अपेक्षाकृत कम पानी के एकफसली और आमतौर पर आदिवासी इलाकों से ये लोग कटाई के चैत मास में आते थे और इसीलिए उन्हें चैतुआ कहा जाता था. 


पलायन या प्रवास

साल के दो-तीन महीने पलायन करने वाले इन चैतुओं को रबी के संपन्न इलाकों से न सिर्फ भरपूर अनाज और मजदूरी मिलती थी, बल्कि उनके रहने, खाने की व्यवस्था भी की जाती थी. कई जगहों पर तो साल-दर-साल आते रहने की वजह से उनका स्थायी नाता तक बन जाता था.

आमतौर पर सुंदर, गहरे रंगों के परिधानों से सजे-धजे राजस्थान के गाडिया लुहार सडकों के किनारे आज भी दिखाई पड़ जाते हैं. कहा जाता है कि कभी किसी राजा से अनबन हो जाने के कारण इन लोगों ने विरोधस्वरूप काले कपड़े पहनकर लगातार घुमन्तू बने रहने का प्रण लिया था. यह प्रण आज भी बरकरार है और उंट, बकरी समेत अपने बाल-बच्चों, घर-गृहस्थी के साथ सतत पलायन करते ये गाडिया लुहार गांव-गांव में खेती, कारीगरी के लोहे के जरूरी औजार बनाते दिख जाते हैं.

ऐसा नहीं रहा है कि लोग अपनी-अपनी जड़-जमीनों को छोडकर केवल मौसमी पलायन के लिए ही दो-चार महीने का प्रवास करते रहे हैं. अपनी काबिलियत के बल पर उन्हें बिना प्रमाणपत्र के स्थायी निवासी बनने का निमंत्रण भी दिया जाता था और कभी-कभी तो वे उन इलाकों के राजा तक बन जाते थे. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव राज का इतिहास ऐसे ही बैरागियों के बसने का इतिहास रहा है.

ये बैरागी हरियाणा, पंजाब से उनी कपड़े, कंबल आदि लाकर गांव-गांव बेचते थे और फुरसत मिलने पर भजन गाया करते थे. गर्म कपड़ों के व्यापार ने उनकी गृहस्थी संभाली, लेकिन भजन गायन ने उन्हें राजा बना दिया. असल में सुरीले भजन गाने पर उन्हें समाज से जो एक-एक पैसा मिलता था, उसे वे जोड़ते जाते थे और कई बार तो यह रकम इतनी अधिक हो जाती थी कि छोटे-मोटे राजा, जमींदार उनसे कर्ज तक ले लिया करते थे.

राजनांदगांव से सटी छूरा रियासत के आदिवासी राजा द्वारा अपने राजपाट को गिरवी रखकर लिए गए ऐसे ही कर्ज में स्थिति कुछ ऐसी बनी कि चुकारा नहीं हो पाया. कर्ज में डूबते-उतराते महाबली अमरीका से लेकर टुटपुंजिए पाकिस्तान तक से उलट छूरा के राजा को कर्ज में डूबी रियासत नामंजूर थी, लेकिन गली-मुहल्ले में भजन गाने वाले बैरागियों को भी राजपाट की झंझटों से कोई मोह नहीं था. भारी मान-मनुहार के बाद बैरागियों ने आखिर राजनांदगांव में अपना चमीटा गाड़ दिया और सबसे पहला काम किया-विशाल रानीताल बनवाने का. बाद के इतिहास में इन बैरागी राजाओं के रेल लाइन डलवाने, अनेक तालाब खुदवाने, अकाल में देश की शुरूआती कपडा मिल ‘सेंट्रल क्लॉथ मिल’ (जो बाद में शॉ वालेस कंपनी की मिलकियत में ‘बंगाल-नागपुर क्लॉथ मिल’ उर्फ ‘बीएनसी’ के नाम से मशहूर हुई) बनवाने जैसे अनेक लोकहित के काम दर्ज हुए.

लगभग ऐसी ही कहानी मंडला जिले के उत्पादक हवेली क्षेत्र की भी है, जहां गोंड राजाओं ने कृषि में पारंगत लोधी जाति को बसाया था. लोधियों ने जंगल साफ करके खेत-तालाब बनाने की तजबीज के जरिए इलाके को बेहतरीन पैदावार का नमूना बना दिया. यहां भी बाद में इन्हीं लोधियों ने राज स्थापित किया और वीरांगना अवंतिबाई जैसी रानियां बनीं. ये वे ही अवंतीबाई हैं, जिनके नाम पर आज का विशाल बरगी बांध बनाया गया है. 




....जारी