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Wednesday, June 20, 2018

पीयूष सौरभ की एक कविता

पीयूष सौरभ लखनऊ आर्ट ऐंड क्राफ्ट कॉलेज से ललित कला में परा-स्नातक हैं. जितनी सफाई से उनके ब्रश कैनवस पर चलते हैं, उतनी ही कारीगरी वह शब्दों के साथ भी करते हैं. मेरा सौभाग्य कि वह मेरे बचपने के मित्र हैं. हम सभी मित्रों के आग्रह पर उनने फिर से कविताई शुरू की है. आप से शेयर कर रहा हूं.

भावों की अभिव्यक्ति है,
या फिर, शब्दों का मेला है.
बांट रहा जब सुख-दुख सबसे
मन क्यों निपट अकेला है?

न होठों पर प्रेमगीत है.
ना तो विरह वेदना ही,
आशाओं के उजले तट पर
स्याह-सा ये क्या फैला है?

शुभ्र ज्योति है, शुभ्र है चिंतन
सब तो शुभ्र धवल सा है.
नयनों में तैर रहा क्या जाने
फिर भी कुछ मटमैला है.

--पीयूष सौरभ

Sunday, December 3, 2017

निपट अकेला मैं

मैं
निर्जन में,
झुकते कंधों वाला बरगद.
मोनोलिथ पहाड़ में
थोड़ी सी जगह में उग आया.

मैं,
निपट सुनसान में
खुद से बातें करता.
मेरी शाखों पर आकर बैठते तो हैं परिन्दे
मुझे भाता है
उनका आना-बैठना-कूकना-उछलना
पर, परिन्दें नहीं समझते मेरी भाषा
पेड़ की भाषा मैं मौन मुखर होता है.
जो समझ सके
पेड़ की भाषा
इंतजार कर रहा हूं
मैं

Tuesday, November 22, 2016

मैं हमेशा नहीं रहूंगा

तुम साथ रहोगे न हमेशा?
नहीं, तुम हमेशा नहीं रहोगे।

सूरज, धरती, चांद, सितारे
और भी जो हैं जगमग सारे
और सपनों की भी होती है एक उम्र।

साइंसदां कहते हैं सूरज हो या कोई भी तारा,
या खुद अपनी ही धरती
सब एक महाविस्फोट से हुए थे पैदा
और सबकी उम्र होती है

हर चीज़ एक दिन फ़ना हो जानी है

एक दिन दहकता सूरज भी
गुल हो जाएगा
जब इसके अंदर इसको जलाने वाली गैसें चुक जाएंगी
तब यह भी
धरती के आकार के हीरे में बदल जाएगा

और जानती हो न तुम
हीरा होता है कितना कठोर,
कितना चमकदार,
कितना निर्मम-निष्ठुर
और हीरे को चमकने के लिए भी
चाहिए होती है दूसरों की रौशनी

हां,
यह मैं हमेशा नहीं रहूंगा
लेकिन न हवा रहेगी
न पानी होगा
न कुछ और बचेगा
सोचो की प्रोटोन तक को जिंदगी की मिली है तय मियाद

इस जीवन में कुछ भी शाश्वत नहीं है।

मैं भी तुम्हारे ईश्वर की तरह नश्वर ही हूं
मैं हमेशा नहीं रहूंगा।

मंजीत ठाकुर

Thursday, November 10, 2016

मंगल ठाकुर की मैथिली कविताः दो

आबहु आऊ अहां अशेष,
बड़ सहलहुं अछि आब कलेष,
मेटल ठोप, बहल दृग अंजन
नहिं आओल अछि किछु संदेश।

बीतल दिन बीतल ऋतु चारि
अंकुर निकसल धरती फारि
पुलकित सब कुंठित हम छी
बाटि तकैत गेल फाटि कुहेस।

स्नेहसिक्त लोचन स्वामी के
आलिंगन दुनू प्राणी के
नयन कलश में भरल अश्रु-जल
पुलकित मन अर्पण प्राणेश।

मूल मैथिली कविताः मंगल ठाकुर

हिन्दी अनुवादः मंजीत ठाकुर

अब आ जाओ मेरे अशेष
सहा न जाए विरह क्लेश
मिटी बिन्दी और बह गए अंजन
मिला न कुछ तेरा संदेश।

बीते दिन, बीते ऋतु चार
हरियाई धरती भी अपार
पुलकित सब, मुझे विरह-विषाद
बाट देखती रहा न शेष।

स्नेहसिक्त लोचन वाले तुम
आलिंगन लोगे कब, सुन तुम
नयन कलश में भरे अश्रु-जल
पुलकित मन अर्पण प्राणेश।








Wednesday, October 5, 2016

आवारा झोंकेः दो

समंदर के पानी में हज़ार मछलियां
लेकिन हर मछली
तन्हा है। 


जंगल में होते हैं हज़ार पेड़
पर हर पेड़ मिट्टी में धंसा
और तन्हा है।
आसमान में उड़ते बादल के दोस्त भी
बरस कर मिल जाते मिट्टी में
और एक बादल रह जाता है पीछे
हवा में झूमता
तन्हा है।

आवारा झोंकेः एक

जब भी रंगता हूं अपना घर,
बड़े ब्रांड्स के रंगों से सजाता हूं
कि जैसे कोई इंद्रधनुष हो
पर एक कमरा रह जाता है खाली
काली दीवारों वाला
जहां रहता हूं मैं,
तन्हा
खुद के साथ।

Tuesday, December 15, 2015

आओ फिर से पुकारो मुझको

आओ फिर से पुकारो मुझको
बंद किवाड़ों पर हल्के से दस्तक तो दो
किवाड़ें मन की कहां बंद होती हैं।
किवाड़ो पर लगे सांकल को खटखटाना इक बार
सांकल देह के होते, मन पे नहीं होते
या किसी अनजान राह पर जाकर इकबार
नाम लेकर फुसफुसाकर ही आवाज़ देना


आओ फिर से पुकारो मुझको

मार प्यार की थापें

बंद किवाड़
लगा है सांकल
मार प्यार की थापें

आसमान को बंद कहां
कर पाओगे तुम पट के भीतर
गगन मुक्त है
पवन मुक्त है
मुक्त हमेशा मोर व तीतर
आओ अंतरमन में झांके
मार प्यार की थापें

बरगद अब भी बुला रहा है
घाट प्रतीक्षा में है
गंगा जल को बांध बनाकर
बांध न पाया कोई
चाहे कितने बंद किवाड़
मन नारंगी की फांकें
मार प्यार की थापें




Monday, April 7, 2014

अलविदा!!



याद करो,
बरगद का वो पेड़,
जिसके नीचे, चायवाला दूध औंटता चाय बनाता है...
काशी पर लिखी किताब,
बरगद के पेड़ को मुंहजबानी याद है।

उसी रेलिंग से टिककर,
नाक छूते मेरे हाथों को
तुमने रोका था कई दफा
मेरी लिखावट में मौजूद है तेरी ही तरावट,
बरगद के पेड़ को वह कहानी याद है।

तुम्हारे कमरे में
जो खिड़की है, वो नहीं खुलती
आम के उस पेड़ के नीचे
जहां खड़ा होकर रस्ता तकता हूं
अस्सी के घाट पर मेरे सुनाए किस्से
बरगद के पेड़ को घाट और रवानी याद है।

मेरे हर लफ्ज पर,
तुम्हारा ही असर है,
कोई तो कह गया है,
इक आग का दरिया है और पार जाना है
बिना इसके
बरगद के पेड़ को जिंदगी है बेमानी, याद है।



Thursday, February 6, 2014

धीरेन्द्र पुंडीर की एक ज़रूरी कविता

यह कविता सुशांत झा के माध्यम से मिली है, धीरेन्द पुंडीर की लिखी है, पढ़ा तो अच्छा लगा, शेयर करने का लोभ संवरण नहीं कर पाया--गुस्ताख

ताक़त में कुछ भी ग़लत नहीं होता।

मैं तुमको यहां नीचे खड़ा दिखता हूं,
नीचा नहीं हूं मैं यहां खड़ा होकर भी।

हां, मेरे फैसले अब मैं नहीं ले रहा,
लेकिन फ़ैसले ले रहे हैं जो,

उन्हें जानता हूं मैं।

मेरी ही कुछ उल्टी चालो ने,
यहां, 
ला पटका है मुझे

वरना तो कम नहीं थी
सत्ता के शतरंज की
मेरी समझ

मैंने कुछ ग़लतियां की,
कुछ छोटी, कुछ बड़ी

अपनो को धोखा दिया
अजनबियों को जी भर कर लूटा

बेसहारों को दोनों हाथों लपेटा
भीड़ में नारे लगाए, उनका भविष्य बेचते हुए
मौका मिलते ही धक्का दिया आगे वाले को

मैं समझता रहा,
ये बड़ी ग़लतियां की हैं मैने।

नहीं बदले शब्द
बॉस के कहने पर

हां कई बार झूठ तो लिखा
सच की ही तरह

लेकिन उसमें नुक्ते डाल दिए अपनी समझ से

वो जताते है ंऐसे जैसे
महज देह भर है लड़कियां, औरतें

चादर तौलिए और कपड़े बदलते हैं जैसे
ऐसे ही बदली जाती हैं औरतें

यह अच्छी बात नहीं है, कह बैठा कई बार मैं
हो सकता है ये उतना गलत नहीं होता

अगर मैंने कहा होता अकेले में
मैंने बक दिया भीड़ में

जिसकी इच्छा नहीं है
उसको नौकरी-तरक्की के नाम पर

बिस्तर पर बिछाना ठीक नहीं
सोचा ये छोटी गलतियां है मेरी
यूंतो सब कुछ ठीक करने की कोशिश की मैंने
अपने झूठ को नया समय
लालच को जरूरत, लूट को मजबूरी
बॉस के पैरों में लोटने को एक्सरसाईज कह कर छिपाया

हर किताब खरीदी मैंने
जो बड़े लोगों की शेल्फ में थी

फोन में थे ताकतवर लोगों के नाम-नंबर
समझ में ठीक था

ताकत की तुला के इशारे सही समझता था
हवा के बदलने से पहले बदल लेता था पाला

किस्मत के मारों को नाकारा
भीख मांगते लोगों को काहिल

भूख के खिलाफ आवाज उठाते आदमियों को
ढोंगी ग़द्दार विदेशी एजेंट लिख सकता था

खूबसूरत वंदना को बदल सकता था निंदा में
समझ में थोड़ी सी बस गड़बड़ हो गई

जिसे मैं समझता था बड़ी गलतियां वो तो गुण थे
जिसे समझता रहा छोटी
वो बड़े अवगुण थे

समझ के इस फेर से 
फिर गया मेरा समय

मैं फैसले देता था जिनके बारे में
उठाकर फेंक दिया गया मुझे उसी भीड़ में

समझ गया हूं मैं
हर वक्त हाथ चलने थे

दूसरों के गले पर और जेब पर
नारो और नींद दोनों में करनी थी

ताकत की पूजा
ताकत में कुछ भी गलत नहीं होता
ताकत से कुछ भी गलत नहीं होता।।




Thursday, January 31, 2013

इंद्रधनुषी कविताः नीला


अगर जीवन है
तो सपने हैं
सपने हैं, 
तो प्यार है

प्यार है, 
दुलार है,
जीना है 
तो वेदना भी
संवेदना भी

हंसो तो भी, रो दो तब भी
कुछ रसीला है, कुछ पनीला है
प्यार तो दूब पर गिरे 
ओस-सा गीला है

सच में संवेदनाओं का रंग 
नीला है।

Sunday, January 20, 2013

बैंगनी


यूं तो
कई रंग हैं, जीवन में
लेकिन बैंगन-सी
या जामुन-सी
लगता है जैसे हरियाला पहाड़ भी
क्षितिज से मिलकर
हो जाए जामुनी

सूरज की तरफ देख कर
फूंक मारूं पानी के फव्वारे
तू रंग पहला नजर आए
वो हैं बैंगनी

वो रंग है जो उल्लास का
प्यार की प्यास का।

Monday, December 3, 2012

भोपाल गैस त्रासदीः दो कविताएँ

ह भीड़ नहीं - भेड़ें थी ।
कुछ जमीन पर सोए सांसें गिन रही थीं।
दोस्तों का रोना भी नसीब न था।
 

चांडाल नृत्य करता शहर,
ऐ दुनिया के लोग;
अपना कब्रगाह या श्मशान यहां बना लो।
 

अगर कुछ न समझ में न आए तो,
एक गैसयंत्र और यहां बना लो।
 

मुझे कोई अफसोस नहीं,
हम तो पहले से ही आदी थे इस जहर के,
फर्क सिर्फ इतना था,
कल तक हम चलते थे, आज दौड़ने लगे।
कफ़न तो मिला था,
पर ये क्या पता था?
एक ही कफ़न से दस मुर्दे जलेगें,
जलने से पहले बुझा दिये जायेगें,
और फिर
दफ़ना दिये जाएंगें।



कवि का नामः पता नहीं कर पाए,
[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता, 2 दिसम्बर, 1987]
 

लती ट्रेनों में,
जिन्दा लाशों को ढोनेवाला,
ऐ कब्रगाह- भोपाल!
तुम्हारी आवाज कहाँ खो गई?
 

जगो और बता दो,
इतिहास को।
तुमने हमें चैन से सुलाया है,
हम तुम्हें चैन से न सोने देगें।
 

रात के अंधेरे में जलने वाले,
ऐ श्मशान भो-पा-ल....
जगो और जला दो,
उस नापाक इरादों को।
जिसने तुम्हें न सोने दिया,
उसे चैन से सुला दो।



[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता, 28 दिसम्बर, 1987]


दोनों कविताएं सौमित्र भाई के सौजन्य से हासिल हुई हैं। भोपाल त्रासदी की बरसी पर मासूमों और निर्दोष जानों को समर्पित....

Thursday, November 15, 2012

बाल ठाकरे पर कविता

बाल ठाकरे के निधन की खबरें आ रही हैं, और बहुत कुछ मन में आ रहा है, वो बाद में सविस्तार लिखूंगा, लेकिन पहले याद आ रही है बाबा नागार्जुन की यह कविताः

बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !

कैसे फासिस्‍टी प्रभुओं की --
गला रहा है दाल ठाकरे !

अबे संभल जा, वो आ पहुंचा बाल ठाकरे !

सबने हां की, कौन ना करे !
छिप जा, मत तू उधर ताक रे !

शिव-सेना की वर्दी डाटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे !
सभी डर गये, बजा रहा है गाल ठाकरे !
गूंज रही सह्यद्रि घाटियां, मचा रहा भूचाल ठाकरे !
मन ही मन कहते राजा जी; जिये भला सौ साल ठाकरे !
चुप है कवि, डरता है शायद, खींच नहीं ले खाल ठाकरे !
कौन नहीं फंसता है, देखें, बिछा चुका है जाल ठाकरे !
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे !

बर्बरता की ढाल ठाकरे !
प्रजातंत्र के काल ठाकरे !
धन-पिशाच के इंगित पाकर ऊंचा करता भाल ठाकरे !
चला पूछने मुसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे

Sunday, November 4, 2012

टाइम मशीन


टाइम मशीन

चाहता हूं,
वक़्त की मशीन में थोड़ा पीछे चलूं.
कुछ लकीरें खींचू, कुछ मिटाऊं
कुछ तस्वीरें बनाऊं

कुछ साल पीछे चलूं.
बचपन नहीं,
झेल लिया है बहुत कसैलापन पहले ही
नौजवानी भी नहीं,
जब चिंता में घुला करता था रात-दिन

उन दिनों में
ले चले वापस मुझे
टाइम मशीन

पैरों के नीचे चरपराहट हो,
कुछ सूखे पत्तों की
और नंगी टहनियों पर टूसे आ रहे हों,
कुछ कोमल पंखुडियों-से

आहिस्ते से
वह आकर पकड़ ले मेरा हाथ
और चूम ले शाइस्तगी से
मेरी गरदन पर का तिल।
जिसे छूकर कहा था उसने कभी,
पता है तुम्हारी गरदन पर
एक तिल बड़ा खूबसूरत है।

टाइम मशीन,
ले चले मुझे
कुछ वक्त पीछे
शायद मिटा सकूं कुछ
उन धब्बों को
और उन सतरों को,
जहां मैंने जितना लिखा है
उससे कहीं अधिक काटा है।
मेरे जीवन में,
जितना ज्वार है, जितना भाटा है

चाहता हूं
कुछ लाईनों की ही सही, 
कर दूं फेरबदल। 
ऐ वक़्त,
थोड़ी तो मोहलत दे मुझे।
 

Wednesday, October 31, 2012

एक अच्छी कविता

दुर्गम वनों और ऊंचे पर्वतों को जीतते हुए,
जब तुम अंतिम ऊंचाई को भी जीत लोगे,

जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब,
तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में,
जिन्हें तुमने जीता है।

जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे,
और कांपोगे नहीं...
जब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क नहीं
सब कुछ जीत लेने में..
और अंत तक हिम्मत न हारने में...


---कुंवर बेचैन

Saturday, September 15, 2012

रजनी सेन की एक कविताः तेरी मेरी बात मिले

(रजनी सेन डीडी न्यूज़ में एंकर हैं, लेकिन उनके भीतर एक मखमली कवयित्री भी है। आज उनकी एक कविता आप लोगो ंके साथ शेयर कर रहा हूं)



न की दीवारें जब भी दरकीं
न थामने वाले हाथ मिले,
खुद में उलझे उलझे रहे वो
जब भी मेरे साथ मिले

                            भरी दुपहरी जब भी देखा
                             देखा अजनबी आंखों से
                             कहने को सपनों से उनके
                             सपने मेरे हर रात मिले

पूछती है दुनिया ये सारी कौन हूं मैं
और   कौन है  वो?
सुबह जिनके तकिये के सिहराने
मेरे भीगे जज़बात मिले

                      अफसानों का लंबा रस्ता
                      सफर अभी करना है बहुत
                       क्या जाने किस मोड़ पर फिर से
                       तेरी मेरी बात मिले।

Saturday, April 21, 2012

कविताः दरमियां

कहते हैं यह मुक़द्दर का ढकोसला है,
जो हमारे दर्मियां फ़ासला है।

न कहीं तुम हो,
न कहीं मैं हूं
ना कहीं कोई कारवां है।

कुछ नहीं है।

लगता है ऐसा कि
मेरे पास अब कुछ भी नहीं है।
जो भी था,
ज़ाया कर चुका हूं
जिंदगी नोनी की तरह
मुझको खा चुकी है।

आहिस्ता-आहिस्ता
चौकड़ी उठ गई है
शराब की वो बोतल हूं मैं
जो पी जा चुकी है।

(ऩोनी- मिट्टी का नमक जो ईंट को खराब कर देता है)

Sunday, March 4, 2012

कविताः आदमी होना

ज़मीं भेज देती है,
कोमल पंखों वाली चिड़िया को,
आसमां के आंगन में,
उन्मुक्त उड़ने के लिए।

आसमां भेज देता है,
जमीं के पास,
रुई के फाहों से बादलों को
इधर-उधर भटकने के लिए।

उपवन भेज देता है,
कलियों को.
रंगों भरे फूलों के चमन में,
तितलियों संग से चटखने के लिए,

हम न जाने क्यों
रोकते हैं,
अपने फूल से बच्चों को
पड़ोस के आंगन में खेलने के लिए।

Tuesday, February 28, 2012

थी, हूं, रहूंगी... वर्तिका नन्दा का कविता संग्रह


र्तिका नंदा आईआईएमसी में हमें पढ़ाती थीं। उनकी दृष्टि में हम संस्थान से निकलने के बाद भी बने रहे ...कविताएं तब भी लिखती थीं, हमें भी पूछती थीं कि कविताएं लिख रहे हो या नहीं। कविता लिखना अंग्रेजी मुहावरे के मुताबिक हमारे कप की चाय नहीं है।

कविता लिखने की कोशिश करना एक बात है और उसे एक रिद्म में स्थापित करना दूसरी। हम बेहद ठेठ हैं, लेकिन वर्तिका नंदा की कविताएं आवां पर पकी औरतों के किस्से हैं।

बहुत दिनों तक उन्होंने अपराध पत्रकारिता की। असर कविताओं पर भी है। छनकर और मथकर जो निकला है वह किसी मुलम्मे का मोहताज नहीं। उनकी कविताओं पर मेरी टिप्पणी अभी जल्दबाजी होगी, इनकी किताब पुस्तक मेले में लोकार्पित की जा रही है।

उन्ही कि किताब की भूमिका से---

"थी, हूं, रहूंगीः भूमिका"
यह पहला मौका है जब कविता की कोई किताब पूरी तरह से महिला अपराध के नाम है। सालों की अपराध की रिपोर्टिंग का ही यह असर है कि अपराध पर कुछ कविताएं लिखी गईं।

मेरे लिए औरत टीले पर तिनके जोड़ती और मार्मिक संगीत रचती एक गुलाबी सृष्टि है और सबसे बड़ी त्रासदी भी। वह चूल्हे पर चांद सी रोटी सेके या घुमावदार सत्ता संभाले  सबकी आंतरिक यात्राएं एक सी हैं।
इस ग्रह के हर हिस्से में औरत किसी न किसी अपराध की शिकार होती ही है। ज्यादा बड़ा अपराध घर के भीतर का जो अमूमन खबर की आंख से अछूता रहता है। यह कविताएं उसी देहरी के अंदर की कहानी सुनाती हैं। यहां मीडिया, पुलिस, कानून और समाज मूक है। वो उसके मारे जाने का इंतजार करता है और उसके बाद भी कभी-कभार ही क्रियाशील होता है।  
हां, मेरी कविता की औरत थक चुकी है पर विश्वास का एक दीया अब भी टिमटिमा रहा है।

दुख के विराट मरूस्थल बनाकर देते पुरूष को स्त्री का इससे बड़ा जवाब क्या होगा कि मारे जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद वह मुस्कुरा कर कह दे - थी. हूं.. रहूंगी...।
अपराधी समाज और अपराधों को बढ़ाते परिवारों को यही एक औरत का जवाब हो सकता है..होना चाहिए भी

जब तक अपराध रहेंगें, तब तक औरत भी थी, है और रहेगी

वर्तिका नन्दा


विश्व पुस्तक मेले में हॉल नंबर 11 पर उपलब्ध:

किताब का नाम  थी. हूं..रहूंगी...
कवयित्री  वर्तिका नन्दा
कवर - लाल रत्नाकर
प्रकाशक  राजकमल
मूल्य  250 रूपए