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Tuesday, June 23, 2020

हमलावरो की वजह से पिछले 500 साल में 32 बार नहीं हो पाई है पुरी की रथयात्रा

आखिरकार, कुछ शर्तों के साथ रथयात्रा हुई ही. नहीं होती, तो एक परंपरा टूटती, भक्तों और श्रद्धालुओं को निराशा होती. पर ऐसा नहीं है कि पहले कभी रथयात्रा बाधित न रही हो.

पुरी की रथयात्रा पर बनी पेटिंग सौजन्यः गूगल

श्रीजगन्नाथ मंदिर के इतिहास के अनुसार, पिछले 500 साल में अब तक 32 बार रथयात्रा स्थगित करनी पड़ी है. इसके अलावा, 5 मौके ऐसे भी रहे जब रथयात्रा को ओडिशा में ही पुरी के बाहर आयोजित करना पड़ा.

सेवकों ने चतुर्धा विग्रहों को (श्रीजगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन चक्र) चुपके से बाहर ले जाकर पुरी और खोरदा जिले के गांवों में रथयात्रा आयोजित की थी.

काला पहाड़ के आक्रमण के कारण 1568 से 1577 तक नौ साल तक लगातार रथयात्रा नहीं हुई थी. 1601 में मिर्जा खुर्रम आलम के कारण और 1607 में हाशिम खान के हमले के कारण रथयात्रा का आयोजन नहीं हो सका था. 1611 में मुग़ल सेनापति कल्याण मल के हमले के कारण भी रथयात्रा नहीं हो सकी थी. 

2019 में पुरी की रथयात्रा का विहंगम दृश्य (गूगल)

1622 में मुस्लिम हमलावर अहमद बेग के हमले के कारण भी रथयात्रा रोकनी पड़ी थी. 1692 से लेकर 1704 तक आक्रमणकारी इकराम खान के हमले के कारण 13 साल तक रथयात्रा नहीं हो सकी थी. 1735 में तकी खान के हमले के कारण तीन साल तक रथयात्रा स्थगित रही थी.

जय जगन्नाथ.

Thursday, December 19, 2019

नदीसूत्रः सोने के कणों वाली नदी स्वर्णरेखा की क्षीण होती जीवनरेखा

स्वर्णरेखा नदी में सोने के कण पाए जाते हैं, पर मिथकों में महाभारत से जुड़ी स्वर्णरेखा की जीवनरेखा क्षीण होती जा रही है. उद्योगों और घरों से निकले अपशिष्ट के साथ खदानों से निकले अयस्कों ने इस नदी के जीवन पर सवालिया निशान लगा दिया है. यह नदी सूखी तो झारखंड, बंगाल और ओडिशा में कई इलाके जलविहीन हो जाएंगे

हर नदी के पास एक कहानी होती है. स्वर्णरेखा नदी के पास भी है. झारखंड की इस नदी को वैसे ही जीवनदायिनी कहा जाता है जैसे हर इलाके में एक न एक नदी कही जाती है. पर झारखंड की यह नदी, अपने नाम के मुताबिक ही सच में सोना उगलती है.

यह किस्सा स्वर्णरेखा के उद्गम के पास के गांव, नगड़ी के पास रानीचुआं के लोकमानस में गहराई से रचा-बसा है कि अज्ञातवास के समय पांडव यहां आकर रहे थे, इसीलिए गांव का नाम पांडु है. खास बात यह है कि स्वर्णरेखा के उद्गम का नाम रानी चुआं इसलिए पड़ा क्योंकि एकबार जब इस निर्जन इलाके में रानी द्रौपदी को प्यास लगी तो अर्जुन ने बाण मारकर इसी स्थल से पानी निकाला था, जो आज भी मौजूद है. समय के साथ नदी का नाम स्वर्णरेखा पड़ गया.

वैसे भी मिथक सच या झूठ के दायरे से वह थोड़े बाहर होते हैं. यह पता नहीं कि पांडु गांव, पांडवों के अज्ञातवास और अर्जुन के बाण से निर्मित रानी चुआं की कहानी कितनी सच है? लेकिन यह मिथक कतई नहीं है कि स्वर्णरेखा झारखंड की गंगा की तरह है और गंगा की तरह ही इसको देखना अब रोमांचकारी कम और निराशाजनक ज्यादा हो गया है.

पर स्वर्णरेखा नदी से सोना निकलता जरूर है, पर यह कोई नहीं जानता कि इसमें सोना आता कहां से है. स्वर्णरेखा नदी में स्वर्णकणों के मिलने के कारण इस क्षेत्र के स्वर्णकारों के लिये इस नदी की खास अहमियत है. किंवदन्ती है कि इस इलाके पर राज करने वाले नागवंशी राजाओं पर जब मुगल शासकों ने आक्रमण किया तो नागवंशी रानी ने अपने स्वर्णाभूषणों को इस नदी में प्रवाहित कर दिया, जिसके तेज धार से आभूषण स्वर्णकणों में बदल गए और आज भी प्रवाहमान है.

आज भी आप जाएं तो नदी में सूप लिए जगह-जगह खड़ी महिलाएं दिख जाएंगी. इलाके के करीब आधा दर्जन गांवों के परिवार इस नदी से निकलने वाले सोने पर निर्भर हैं. कडरूडीह, पुरनानगर, नोढ़ी, तुलसीडीह जैसे गांवों के लोग इस नदी से पीढियों से सोना निकाल रहे हैं. पहले यह काम इन गांवों के पुरुष भी करते थे, लेकिन आमदनी कम होने से पुरुषों ने अन्य कामों का रुख कर लिया, जबकि महिलाएं परिवार को आर्थिक मदद देने के लिए आज भी यही करती हैं.

नदी की रेत से रोज सोना निकालने वाले तो धनवान होने चाहिए? पर ऐसा है नहीं. हालात यही है कि दिनभर सोना छानने वालों के हाथ इतने पैसे भी नहीं आते कि परिवार पाल सकें. नदी से सोना छानने वाली हर महिला एक दिन में करीब एक या दो चावल के दाने के बराबर सोना निकाल लेती है. एक महीने में कुल सोना करीब एक से डेढ़ ग्राम होता है. हर दिन स्थानीय साहूकार महिला से 80 रुपए में एक चावल के बराबर सोना खरीदता है. वह बाजार में इसे करीब 300 रुपए तक में बेचता है. हर महिला सोना बेचकर करीब 5,000 रुपए तक महीने में कमाती है.

395 किलोमीटर लंबी यह बरसाती नदी देश की सबसे छोटी अंतरराज्यीय (कई राज्यों से होकर बहने वाली) नदी है जिसके बेसिन का क्षेत्रफल करीब 19 हजार वर्ग किमी है. यह रांची, सरायकेला-खरसावां, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल) और बालासोर (ओडिशा) से होकर बहती है. पर जानकारों का कहना है कि यह नदी अब सूखने लगी है और इसके उद्गम स्थल पर यह एक नाला होकर रह गई है. जानकारों के मुताबिक, इस नदी में कम होते पानी की वजह से भूजल स्तर भी तेजी से गिरता जा रहा है. काटे जा रहे जंगलों की वजह से मृदा अपरदन भी बढ़ गया है.

हालांकि इस नदी पर बनने वाले चांडिल और इछा बांध का आदिवासियों ने कड़ा विरोध किया और यहां 6 जनवरी, 1979 को हुई पुलिस फायरिंग में चार आदिवासियों ने अपनी जान दे दी. परियोजना चलती रही और 1999 में इस परियोजना पर भ्रष्टाचार की कैग की रिपोर्ट के बाद इसे पूरे होने में 40 साल का समय लगा. परियोजना तो पूरी हुआ लेकिन इसमें चस्पां स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और बिजली मुहैया कराने के वायदे पूरे नहीं हुए.

इस नदी की बेसिन में कई तरह के खनिज हैं. सोने का जिक्र हम कर ही चुके हैं. पर इन सबने नदी की सूरत बिगाड़ दी. खनन और धातु प्रसंस्करण उद्योगों ने नदी को प्रदूषित करना भी शुरू कर दिया है. अब नदी के पानी में घरेलू और औद्योगिक अपशिष्टों के साथ-साथ रेडियोसक्रिय तत्वों की मौजूदगी भी है. खासकर, खुले खदानों से बहकर आए अयस्क इस नदी की सांस घोंट रहे हैं.

ओडिशा के मयूरभंज और सिंहभूम जिलों में देश के तांबा निक्षेप सबसे अधिक हैं. 2016 में किए गिरि व अन्य वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के मुताबिक, सुवर्ण रेखा नदी में धात्विक प्रदूषण मौजूद है. अब नदी और इसकी सहायक नदियों में अवैध रेत खनन तेजी पर है. इससे नदी की पारिस्थितिकी खतरे में आ गई है.

इस नदी बेसिन के मध्यवर्ती इलाके में यूरेनियम के निक्षेप है. यूरेनियम खदानों के लिए मशहूर जादूगोड़ा का नाम तो आपने सुना ही होगा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेडियोसक्रिय तत्व इस खदान के टेलिंग पॉन्ड से बहकर नदी में आ रहे हैं.

जमशेदपुर शहर, जो इस नदी के बेसिन का सबसे बड़ा शहर है, का सारा सीवेज सीधे नदी में आकर गिरता है. और अब इसके पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घटती जा रही है और नदी के पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) तय मानक से अधिक हो गया है, जबकि बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड मानक से कम होना चाहिए. झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्वर्णरेखा नदी के पानी के नमूने की जांच कराई तो पता चला कि अधिकतर जगहों पर पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम पाई गई.

स्थिति यह है कि स्वर्णरेखा नदी का पानी जानवरों और मछलियों के लिए सुरक्षित नहीं है. जानवरों और मछलियों के लिए पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड की मात्रा 1.2 मिलीग्राम से कम होनी चाहिए, जबकि 7.0 मिलीग्राम प्रति लीटर तक है. इसकी वजह से काफी संख्या में मछलियां नदी में मर रही हैं इसके साथ ही साथ जानवरों को भी कई तरह की बीमारियां हो रही हैं.

स्वर्णरेखा और खरकई नदियों का संगम, जमशेद पुर के ठीक पास में है और यहां आप लौह अयस्क के कारखानों से निकले स्लग को देख सकते हैं. हालांकि, भाजपा नेता (अब बागी) सरयू राय ने 2011 में इसे लेकर जनहित याचिका दायर की थी, और तब टाटा स्टील ने जवाब में कहा कि यह स्लग शहर की जनता को स्वर्णरेखा की बाढ़ से बचाने के लिए जमा किया गया है. हाइकोर्ट ने टाटा को यह जगह साफ करने को कहा था. हालांकि इस पर हुई कार्रवाई की ताजा खबर नहीं है.

इस इलाके में मौजूद छोटी और बड़ी औद्योगिक इकाइयों, लौह गलन भट्ठियों, कोल वॉशरीज और खदानों ने नदी की दुर्गति कर रखी है.

बहरहाल, खेती, पर्यटन और धार्मिक-आध्यात्मिक केंद्र के नजरिए से सम्भावनाओं से भरे स्वर्णरेखा नदी में उद्गम से लेकर मुहाने तक, इस इलाके में पांडवों से लेकर चुटिया नागपुर के नागवंशी राजाओं से जुड़े मिथकों का प्रभाव कम और हकीकत के अफसाने ज्यादा सुनाई पड़ते हैं. मृत्युशैय्या पर पड़ी जीवनरेखा स्वर्णरेखा की आखिरी सांसों में फंसे अफसाने.

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Thursday, April 11, 2019

सत्ता की हसरत में कसरत करते पटनायक

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक बहत्तर साल के हैं, फिर भी जिम में हिंदी फिल्मों के नायकों की तरह सारी कसरतें कर रहे हैं. बीजू पटनायक से विरासत में सत्ता हासिल करने वाले तकरीबन राजकुमार और संपूर्ण मितभाषी नवीन पटनायक को आखिर अपनी कसरत करते हुए वीडियो क्यों जारी करना पड़ा. उनकी पार्टी ने यह वीडियो जारी किया, कई पत्रकारों को बुलाकर वर्जिश करते हुए वीडियो बनवाए, इंटरव्यू भी दिया. सवाल हैः क्यों? जवाब है सियासत. सियासत ऐसी शै है जो, नेताओं से जो न करवा ले सो कम.

बहत्तर साल की उम्र में नवीन पटनायक अपनी सेहत को लेकर परेशान हों न हों (आसमान उनके अच्छी सेहत बख्शे), अलबत्ता सेहत को लेकर चल रही अटकलों से पटनायक परेशान थे.

सोमवार को उन्होंने एक टीवी चैनल को एक्सरसाइज करते हुए भी इंटरव्यू दिया. बाद में टहलते हुए (वाक दि टाक) भी बातचीत की. पटनायक बेहद सावधान हैं कि ऐसा कुछ न दिखे जिससे किसी को उनकी सेहत पर टिप्पणी का मौका मिल पाए. तो फिर उनके स्वास्थ्य पर यह चर्चा कैसी? पटनायक इसका ठीकरा पूर्व सांसद भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और केंद्रपाड़ा से लोकसभा प्रत्याशी बैजयंत पांडा पर फोड़ते हैं. पटनायक कहते हैं, सेहत को लेकर अफवाह फैलाने उन्हीं ने फैलाई है.

ओडिशा के मुख्यमंत्री अभी लोकसभा और विधानसभा दो मोर्चे पर भाजपा की चुनौती से मुकाबिल हैं. और जनता के बीच उनके बीमार होने की खबरें, उनके सियासी भविष्य पर सवालिया निशान लगा सकती थीं. पहले भी उनकी सेहत पर सवाल उठाए जाते रहे हैं. सवाल यह भी उठते थे कि नवीन पटनायक के बाद कौन. जाहिर है ऐसे सवाल चुनाव से जूझ रहे नेता को परेशान करने के लिए काफी होते हैं. इन सवालों पर पटनायक का जवाब होता थाः वारिस तो बीजेडी और ओडिशा के लोग तय करेंगे. पर सियासी गलियारों में उनकी बहन गीता मेहता का नाम उछलने लगा था.

अटकलें थीं कि नवीन पटनायक की गिरती सेहत के कारण हो सकता है कि गीता मेहता कमान संभाल लें. पर पहले तो पटनायक ने गीता मेहता के राजनीति में न आने की बात कही, फिर अपनी फिटनेस को साबित करने वाले वीडियो के साथ आए.

बहरहाल, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उनकी सेहत और ओडिया ज्ञान को चुनावी मुद्दा बना डाला है. पिछली कुछ सभाओं में शाह ने यह भी कहा कि अबकी बार सीएम ऐसा हो जिसे खूब ओडिया आती हो.

पटनायक इस पर भी रक्षात्मक मुद्रा में आए और एक टीवी चैनल को बताया कि उनकी ओडिया भाषा कुछ लोग नाहक सवाल उठाते हैं. जबकि उन्हें ओडिया आती है. बदले में वह भाजपा पर कंधमाल का मामला उछाल रहे हैं. सवाल घूम-फिरकर यही आता है कि बजाए जनता की सेहत के ओडिशा में नवीन पटनायक की सेहत चुनावी मुद्दा क्यों है और अगर है तो उसका जवाब देने की जरूरत क्या थी?

असल में, ओडिशा में भाजपा धुआंधार रैलियां कर रही हैं और उसकी रणनीति है कि वह इस बार ओडिशा में अपनी सीटों की गिनती बढ़ाए. पिछली लोकसभा में ओडिशा से भाजपा को महज एक सीट मिली थी. बाकी की बीस सीटें नवीन पटनायक के खाते में थीं. खराब सेहत का सवाल नवीन पटनायक के जादू को कमजोर कर सकता है और लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनावों में अब तक वोट उन्हीं के नाम पर पड़ते रहे हैं.

अगर सियासत के रणक्षेत्र में नवीन पटनायक जैसा महारथी सेहत के नाम पर कमजोर दिखा तो जाहिर है वोट भी कम पड़ेंगे. वोटर यह तो नहीं चाहेगा कि उनका नेता बीमार हो.

ऐसे में ओडिशा में जब कांग्रेस नई तैयारी के साथ मैदान में है और भाजपा नई चुनौती के रूप में सामने है. नवीन पटनायक खुद को फिट बताने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. वीडियो उनकी फिटनेस साबित भी कर रहा है, पर उसके साथ ही यह भी साबित कर रहा है कि इस बार पटनायक के लिए चुनावी चुनौती पिछली बार की तुलना में कहीं अधिक कठिन है और वे उसे हल्के में नहीं ले सकते.

बहरहाल, बिना इस बात पर कोई शक किए कि नवीन पटनायक चुस्त-दुरुस्त हैं. जिम वाली सारी कसरतें ठीक-ठाक कर ले रहे हैं. वजन उठा पा रहे हैं. यह कसरत पांचवीं बार लगातार मुख्यमंत्री बनने और सत्ता में लौटने की उनकी हसरत भी पूरी कर देगा. चुनांचे, हमें बस एक सवाल कोंच रहा है कि सेहतमंद मुख्यमंत्री की जनता की सेहत की हालत क्या है.



Wednesday, March 7, 2018

एक पाठक की नज़र से "ये जो देश है मेरा"

मेरी किताब, ये जो देश है मेरा पर समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी है, मेरे अनुज सदृश रामकृपाल झा ने, 

एक सामान्य पाठक जब किसी क़िताब को पढ़ना शुरू करता है और पढ़ते हुए उसे ख़त्म करता है, इन 3-4 घंटे के दौरान वह लेखक द्वारा प्रस्तुत कथा, कथानक और कथ्य में अपने आप को खोजते हुए लगातार जुड़े रहने का यत्न करता है। अगर लेखक अपनी प्रस्तुति से पाठक को इन 3-4 घंटे तक जोड़ने में सफल रहता है तो क़िताब सफल मानी जाती है । (इस विचार पर मतभिन्नता हो सकती है )

"ये जो देश है मेरा" कोई कहानी , उपन्यास या उपन्यासिका नहीं है। यह किताब भुखमरी, विस्थापन और सूखे के दंश को झेलते हुए उन लाचार किसान, आदिवासियों और विस्थापितों के दर्द को समेटे हुए आंकड़ों और भावनाओं की एक रिपोर्ट है, (रिपोर्ताज) जिसे पढ़ते हुए आप कई मर्तबा भावुक होंगे और शायद झुंझला जाएंगें।

पांच हिस्से में लिखी गई यह रिपोर्ट शुरुआत में अपनी कसावट, बेहतर आंकड़े और सुंदर शब्द संयोजन के साथ सामने आती है। बुंदेलखंड के सूखे से जूझते हुए किसान, किसान के परिवार और उससे होती हुई आत्महत्या के आंकड़े हृदयविदारक हैं।

पढ़ते हुए यह एहसास होने लगता है कि खेती जुआ समान ही तो है। किसान बैंकों से कर्ज लेते हैं, कर्ज के पैसे से बीज बोते हैं, फ़सल उग आती है और फिर सूखा पड़ जाता है। स्थिति अब भयावह हो जाती है। ना खाने को पैसे बचते हैं ना कर्ज़ चुकाने को! बाकी जो शेष बच जाता है वो फांसी का फंदा होता है जिसे किसान किसी शर्त पर ठुकरा नहीं सकता है।

कई मामले में राज्य सरकारों ने इसे गृह क्लेश का भी कारण बताया है ।

मेरे समझ से गाँव में रहने वाले लोगों में गृह क्लेश के ज्यादातर मामलों का अगर पोस्टमार्टम किया जाए तो यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि ग़रीबी गृह क्लेश का प्रमुख कारण है ।

जब एक माँ, अपने नई ब्याही बेटी और दामाद का अपने घर में स्वागत कुल जमा एक किलो अनाज से करती है और यह रिपोर्ट आप पढ़ रहे होते हैं तब आपके अंदर कुछ चटक रहा होता है जिसे केवल आप महसूस करते हैं ।

रिपोर्टर की रिपोर्ट आगे बढ़ती है जहाँ,
जब एक जवान बेटी अपने शादी में होने वाले खर्चे के लिए अपने पिता द्वारा लिए जाने वाले संभावित कर्ज और परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले विभीषिका से चिंतित होकर (पिताजी को आत्महत्या ) एक दिन चुपचाप डाई (बालों में लगाया जाने वाला रसायन) पीकर मरने की कोशिश करती है और पूरा तंत्र कुछ नहीं कर पाता है। ये सब पढ़ते हुए आप भन्नाकर रह जाते हैं !

लोग आत्महत्या कैसे कर लेते हैं एक आध की बात हो तो ठीक है पर मुआमला जब दहाई नहीं सैंकड़ों में हो तो विषय चिंताजनक और ध्यान देने योग्य होती है ।

मैंने घास की रोटियों पर न्यूज़ चैनलों की कई बार रिपोर्टिंग देखी है किंतु इस विषय को गौर से पढ़ते हुए यह सोचना बेईमानी लगती है कि हम जो पढ़ रहे हैं वो सिर्फ सच है,सच के सिवा कुछ भी नहीं है ।

यह सच है की सूखे के इस प्रेत को यूँ ही नहीं आना पड़ा है। लोगों ने प्रकृति और पर्यावरण का अनुचित दोहन करते हुए ढ़ोल और मृदंग की थाप पर इसे आमंत्रण दिया है जो अब ब्रह्मपिशाच सा बन गया है ।

हालांकि लेखक ने यह जिक्र नहीं किया है आखिर कैन और बेतवा नदी के किनारे बसे इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों ने कभी इन दोनों नदियों पर बांध बनाने को लेकर कोई मांग क्यों नहीं उठाई है जिससे किसानों को सूखे की समस्या से थोड़ी बहुत निजात मिल जाती / हुई होगी।

8000 कूनो पालपुर वनवासी के विस्थापन के साथ क़िताब का मध्य भाग में  थोड़ी ढीली हो जाती है इसके ये मायने नहीं है कि आंकड़े ग़लत और उलूल जुलूल हो जाते हैं। लेखक अपनी भावनाओं को हम जैसे पाठकों के सामने लाने में थोड़े से चूक गए हैं।

पर जैसे ही ये रिपोर्ट नियामगिरी के पहाड़ों और उनके असली हकदारों के बीच पहुंचती है आप जंगल के हरियाली और प्रकृति के बीच कहीं खो से जाते हैं। यहाँ सब कुछ वास्तविक है। महिलाओं और पुरुषों के फ़ैशन भी समानान्तर हैं। 

शहरीकरण के दौर से जूझती एक संभ्रांत महिला और नियामगिरि की एक आदिवासी महिला के बीच लेखक द्वारा की गई ईमानदार तुलना आपको भाव-विभोर कर देती है। एक आदिवासी कन्या की मुस्कुराहट उसके धंसे गालों में से सफ़ेद झांकते दांत मिलियन डॉलर वाली स्माईल की मिथक को सत्यापित करने वाली रिपोर्ट आपके चेहरे पर मुस्कुराहट की एक लकीर सी छोड़ देती है।

ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव से समुद्री जल स्तर के बढ़ने से डूब रहे तटीय प्रदेश की कहानी है सतभाया। समुद्र गाँव को लगातार डुबाए जा रहा है और साथ में डूब रही है लोगों की भावनाएँ। लोग बाग मजबूर हैं विस्थापन के लिए। घर छोड़कर चले जाना कितना कष्टदायक होता है यह बताते हुए सतभाया के विस्थापित भावुक हो जाते हैं ।

खैर !

पांच रिपोर्टों को समेटे यह रिपोर्ताज देश की मुख्यधारा को छोड़ उन लोगों की कहानी है जो जल, जंगल और जमीन से जुड़े रहना चाहते हैं और ताउम्र किसी भी कीमत पर अपने जंगल देवता को छोड़ना पसंद नहीं करते हैं । सरकारें इन्हें मुआवजा तो देती है पर इनके बेहतरी के लिए क्या करती है यह सरकार ही जानती है। कुल मिलाकर यह रिपोर्ताज़ भावनओं और मजबूरियों से बुनी एक स्वेटर है जिसे पहनकर आप भावविभोर हो जाएंगे ।


Sunday, February 11, 2018

ये जो देश है मेरा की गौरव झा की समीक्षा

आज सुबह ही यह किताब पढ़कर खत्म की, तो सोचा दो-चार लाइनें लिख दी जाएं इस किताब के बारे में, जिसे हमारे मामा ने लिखा है। यह देश के जमीनी हकीकत की कहानियां हैं, जो उन्हें पत्रकारिता के दौरान अनेक जगह में किये गए यात्राओं से मिली हैं। उन जानकारियों, अनुभवों को उन्होंने बहुत रिसर्च के बाद किताब की शक्ल दी है।

इस किताब में भारत के पांच हिस्सों और वहां के लोगों का दर्द ए हाल बयां किया गया है। बुंदेलखंड (मध्य प्रदेश/उत्तरप्रदेश) के लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं, कूनो पालपुर (मध्य प्रदेश) के सहरिया जनजाति पर अभ्यारण्य की वजह से  विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है, नियामगिरि (ओडिशा) के डंगरिया-कोंध जनजाति पर बॉक्साइट खनन के लिए विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है, सतभाया पंचायत (ओडिशा) के लोगों को बढ़ते समंदर का खतरा परेशान किये हुए है, लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) के लोगों को नक्सलियों-पुलिस-राजनीतिक पार्टी के कैडर का खतरा हमेशा परेशान करता रहता है।

आपको पढ़कर यह भी पता चलेगा कि ऐसा नही है कि इन परेशानियों के निपटारे के लिए सरकारों ने प्रयास नही किये। ढेरों प्रयास किये गए और किये जा रहे हैं। बजट आवंटित किए जा रहे हैं, स्थानीय लोग भी प्रयास कर रहे हैं। पर एक चीज की कमी हर जगह दिख रही है वह है उन योजनाओं के क्रियान्वयन में कमी, लापरवाही, लूट-खसोट, अनियमितता।

उन जगहों के इतिहास, भूगोल, वर्तमान और भविष्य के बारे में काफी विस्तार से चर्चा की गई है।

आमलोगों से बातचीत करके उनकी समस्या को सामने रखने का बेहतरीन प्रयास आपको किताब में दिखेगा। हर इलाके के परेशानियों को आंकड़ों सहित दर्शाने के कारण उसे समझना आसान हुआ है, कई बारीक जानकारियां मिलेंगी आपको उन जगहों के बारे में, परिस्थिति के बारे में इस किताब को पढ़कर।

साथ में यह भी पता चलता है कि लेखक ने इसके लिए कितनी मेहनत की होगी।

एक बार जब आप किताब पढ़ना शुरू कीजियेगा तो आपको उन क्षेत्रों के बारे में जानने की इच्छा इतनी बढ़ जाएगी कि बिना खत्म किये किताब छोड़ना मुश्किल होगा। आपके भी जेहन में ये सवाल आएगा कि विकास के मायने सबके लिए एक ही पैमाने से तय किये जा सकते हैं क्या??

बेहतरीन किताब को लिखने के लिए मामा जी को बधाई। जय हो,शुभ हो।

Sunday, January 14, 2018

ये जो देश है मेरा

मित्रों, मेरी किताब 'ये जो देश है मेरा' छपकर आ गई है. यह किताब  पांच लंबी रिपोर्ताज का संकलन है. मेरी यह किताब मेरी लंबी यात्राओं का परिणाम है.इनमें बुंदेलखंड, नियामगिरि, सतभाया, कूनो-पालपुर और जंगल महल जैसे हाशिए के इलाकों की कहानियां हैं.

बुंदेलों की धरती बुंदेलखंड को अपनी प्यास बुझाने लायक पानी हासिल हो पाएगा या दशकों लंबा सूखा हमेशा के लिए आत्महत्याओं और पलायन के अंतहीन सिलसिले में बदल जाएगा? 

मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर के जंगलों के सरहदी इलाके में बसा टिकटोली गांव डेढ़ दशक में दोबारा जमीन से उखड़ेगा या बच जाएगा? उड़ीसा का नियामगिरि पहाड़ अपनी उपासक जनजातियों के बीच ही रहेगा या अल्युमिनियम की चादरों में ढल कर मिसाइलों और बमबार जहाजों के रूप में देशों की जंग की भट्ठी में झोंक दिया जाएगा? 
उड़ीसा का ही सतभाया गांव अपनी जादुई कहानियों के साथ समुद्र की गोद में दफ्न हो जाएगा, या उससे पहले ही उसे बचा लिया जाएगा? मैंने इन्ही सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की है. कोशिश की है कि इसे दिलचस्प तरीके से लोककथाओं के सूत्र में पिरोकर आप तक पहुंचाया जाए.

आप इसे पढ़कर फीडबैक देंगे तो मेरा उत्साहवर्धन होगा.

दिल्ली के विश्व पुस्तक मेला में किताब के साथ प्रवीण कुमार झा

Tuesday, August 16, 2016

जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहां हैं...

शिकायत करना हम देशवासियों का शगल है। लेकिन मैं कोई शिकायत करने नहीं जा रहा। वाकिया तब का है, जब मैं उड़ीसा के एक दौर पर जा रहा था। हिलती-डुलती गाड़ी के एसी के दूसरे दर्ज़े में बैठा था। कोशिश कर रहा था कि मैं अपने लैपटॉप पर कोई फ़िल्म ही देख डालूं। सामने की सीट पर एक बुजुर्गवार बैठे थे। साथ में उनका घरेलू कामगार था, किसी उड़िया जनजाति का लड़का था। बच्चा ही था। बुजुर्गवार की पत्नी साथ में थीं। 

बुजुर्ग दंपत्ति के कपड़ों से लगता था, काफी साधारण घरों के रहे होंगे। खादी का मोटा कुर्ता, धोती कभी सफेद रही होगी। गले में खादी का मोटा गमछा। रंग ताम्रवर्णी। बाल श्वेत हो चले। भौंहे तक सफ़ेद। बीवी के हाथों में कांच की चूड़ियां। बैंगनी रंग की साधारण सूती साड़ी। दोनों के पांव में हवाई चप्पलें। नौकर के पैरों में जो हवाई चप्पल है उस पर फेसबुक लिखा है।

मैं भी गपोड़ हूं और शायद सामने बैठे बुजुर्गवार भी। ट्रेन अभी स्टेशन से बाहर निकल कर आईटीओ भी न पार कर पाई होगी कि हम दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई थी। और तब तक होती रही, जब तक हम भद्रक न पहुंच गए। पत्नी सारे रास्ते चुप बैठी रही। एक गंवई पत्नी की तरह।

कोच अटेंडेंट आता है। मुझसे बात करते वक्त उसके अंदर एक वित्तीय आदर है। उस आदर में शाम को मेरे उतरने के वक्त मिलने वाली टिप की उम्मीद का बोझ है। वही अटेंडेंट आकर उनसे ऐसे बात करता है मानो बहुत दिनों से जानता हो। पूछता है, बहुत दिनों बाद आए।

मैं पूछता हूं, आप दिल्ली बार-बार आते हैं क्या। हां। इसके बाद बातचीत महंगाई, नक्सल, जनजातियों की समस्या, वेदांता, कोरापुट, नक्सल, राहुल गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह तक पहुंच जाती है। बुजुर्गवार को महीन जानकारियां हैं।

मेरे बारे में बहुत पूछताछ करते हैं। कहां के हो, कौन है घर में...लेकिन इस पूछताछ में एक बुजुर्गाना लाड़ और आह्लाद है। अब मैं पूछता हूं आप..? तब बताते हैं कि उनका नाम अनादिचरण दास है। पांच बार सांसद रह चुके हैं। आखिरी बार सन् 91’ लोकसभा जीते थे। पहली बार 71’ में जीते थे। अपने बारे में बस इतना ही बताते हैं।

मैं सादगी देखकर दंग हूं। अब तो हाल यह है कि पहली बार विधायक बनकर लोग खदानें खरीद रहे हैँ। निर्दलीय मुख्यमंत्री ने सुना दक्षिण अफ्रीका में सोने की खान खरीद डाली थी। मेरे ही गृह राज्य का सीएम रहा था वह। और यहां, पांच बार सांसद चुना जा चुका शख्स हवाई चप्पल पहन रहा है! एसी के दूसरे दर्जे में सफर कर रहा है! चेहरे पर दबंगई का कोई भाव नहीं!

मैं सोचता हूं आजादी का जश्न पूरे भारत में मनाया गया होगा। लेकिन, पटवारी से लेकर विभिन्न मंत्री भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। वह बुझे मन से कहते हैं, किसी ने कहा है राज्यसभा की सीट सौ करोड़ में बिकती है। हामी भरने के सिवा कोई चारा नहीं है मेरे पास।

रात में गूगल किया था मैंने, अनादि चरण दास को खोजा गूगल पर। मिल गए। उड़ीसा के जाजपुर सीट से सन् 1971, 1980 और 1984 में कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ी, विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ जनता दल गए, वहीं से दो बार 1989 और 1991 में चुनाव जीता। 1996 में फिर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन जनता दल की आंचल दास से चार हजार वोटों से हार गए। फिर उम्र के तकाजे के साथ राजनीति छोड़ दी। जाजपुर-कोरापुट इलाके में अनादिचरण दास एक मजबूत उम्मीदवार माने जाते थे। लेकिन, उनके पास आज दौलत के नाम पर कुछ नहीं।

कह रहे थे कि हर महीने वंचितों, गरीबों, जनजातियों के आर्थिक उत्थान के लिए हर महीने योजना आयोग (यात्रा के वक्त योजना आयोग था, नीति आयोग नहीं बना था) और सोनियां गांधी को चिट्ठी लिखते थे। पता नहीं पढ़ी भी जाती थी या नहीं। पेट्रोल के दाम बढ़ाने के पक्ष में हैं, कहते है इसका पैसा एससी-एसटी बच्चों की शिक्षा के लिए करना चाहिए।

गुरूदत्त की फिल्म प्यासा का एक गीत याद आ रहा है, जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहां हैं....ईमानदारी को गूगल पर खोजता हूं। इसे खोजने में तो गूगल भी नाकाम है।

Monday, January 4, 2016

सतभाया का शेष


जलवायु परिवर्तन पर बहुत चर्चाएं हुआ करती हैं, लेकिन इसका हम पर और आप पर क्या असर होगा इसको समझना बेहद अहम है। आज मैं आपको एक ऐसे गांव का किस्सा सुनाना चाहता हूं जिसके बारे में पाठकों को जानना बेहद जरूरी है।

सतभाया एक पंचायत है, ओडिशा के केन्द्रपाड़ा जिले में। इस पंचायत में राजस्व रिकॉर्ड्स के मुताबिक डेढ़ दशक पहले तक सात गांव हुआ करते थे। सतभाया, गोविन्दपुरू, कानपुरू, शेकपुरू जैसे गांव थे जहां हर भारतीय गांव की तरह घरौंदो जैसे घर थे, नारियल के पेड़ थे, लोग थे। भीतरकनिका नैशनल पार्क और गहिरमाथा घड़ियाल रिज़र्व के भीतर बसा यह पंचायत समंदर के किनारे था। जी हां, था...क्योंकि अब इस पंचायत में महज डेढ़ गांव बचे हैं।

साढ़े पांच गांव समंदर की पेट में समा चुके हैं। जानकार इसकी वजह समुद्र के जलस्तर में आई बढ़ोत्तरी को बताते हैं। साल 1921 के राजस्व रिकॉर्ड बताते हैं कि सतभाय़ा पंचायत में करीब 1021 वर्ग किलोमीटर रकबा था, अब यह सौ वर्ग किलोमीटर से भी कम बचा है।

आप सतभाय़ा गांव जाएंगे तो समंदर में डूबे ट्यूब वैल की पाईप, स्कूल की डूबी हुई छत भी दिख सकती है। मैंने गांव के बुजुर्गों से बात की तो पता चला पंद्रह-सोलह साल पहले तक समंदर गांव से डेढ़ मील दूर था। लेकिन समंदर अब हर साल अस्सी मीटर आगे बढ़ जाता है।

सतभाया गांव और आगे बढ़ रहे विकराल समुद्र के बीच एक रेत की दीवार-सी है, जो गांव वालों की रक्षा कर रही है। बगल में कानपुरू है, जो आधा डूब चुका है। समंदर का पानी खेतों में घुसकर माटी को खारा बना चुका है। खेती चौपट हो गई है। घर-दुआर डूब चुके हैं। इन गांवों में रह रहे लोगों के बच्चों का ब्याह भी नहीं हो रहा।

हालांकि राज्य सरकार ने कई बार गांव में बचे लोगों को हटाने की कोशिश की है, लेकिन गांव के लोग मानने को तैयार नहीं है। इसकी दो वजहें हैं, विस्थापित पांच गांव के लोग केन्द्रपाड़ा हाइवे के किनारे रहने को मजबूर है, घर-बार तो छिना ही, रोजी-रोटी की दिक्कत भी है और स्थानीय लोगों के साथ सामाजिक संघर्ष भी है।

दूसरी वजह है कि सतभाया में एक प्राचीनकालीन पंचवाराही मंदिर है। गांव के लोगों की उनके साथ इस मंदिर को भी दूसरी जगह स्थापित कर दिया जाए। फिलहाल, योजना फाइलों में घूम रही है।

समंदर की बढ़त रोकने की कोई योजना भी सरकार के पास नहीं है। ओडिशा के पर्यावरणविदों का कहना है कि दुनिया के किसी हिस्से में हो रहे प्रदूषण से धरती का तापमान बढ़ रहा है और इसका फल भुगतना पड़ रहा है बेचारे गांववालों को, जिनकी इस ग्लोबल वॉर्मिंग में कोई हिस्सेदारी नहीं है। पर्यावरणविद् भागीरथ बेहरा कहते हैं कि यह भी तय नहीं किया जा सका है कि आखिर गहिरमाथा रिजर्व और भीतरकनिका नैशनल पार्क पर इसका क्या असर पड़ने वाला है।

बड़ा सवाल है कि आखिर ओडिशा में ही ऐसा क्यों हुआ। इसका भी जवाब हैः असल में विकास की अंधी दौड़ में समंदर के किनारे के मैंग्रोव के जंगल कटते चल गए। मैंग्रोव समुद्री किनारों के लिए प्राकृतिक तटबंध का काम करते हैं और वनस्पति का छाजन होने से अपरदन और कटाव जैसी घटनाएं कम होती हैं।

असल में एक कयास यह भी है कि समुद्री बढ़त का यह मामला किसी प्लेट टेक्टॉनिक गतिविधि यानी भूमि की स्थिति में हलचल होने से भी हुई हो सकती है। यह सब वैज्ञानिक बातें हैं और इसको पलटा नहीं जा सकता है। मेरी चिंता उन लोगों की है जो सड़को के किनारे रह रहे हैं। या उन गांववालों की, जो अपने बच्चों को वह प्रार्थना रटवाते हैं जिसमें कानपुरू और सतभाया के बच्चे ईश्वर से इस आपदा को टालने की गुहार करते नजर आते हैं। सतभाया के लोग गांव को अभी भी छाती से चिपटाए हैं, शायद इसलिए कि एक बार निकले तो पुरखों की यह भूमि उनको दोबारा नजर भी नहीं आएगी।

बच्चों की प्रार्थना में करूणा है। यह इलाका 1997 में महाचक्रवात भी झेल चुका है। इन बच्चों की तालीम और भविष्य की तो छोड़िए, इन्हें दो जून को रोटी की चिता ज्यादा बड़ी लग रही है।

रिपोर्टिंग करते समय रोना अच्छी बात नहीं। मैं अपनी पनियाई आंखों से अपनी पत्रकारिता में यह नुक्स झेल सकता हूं। उम्मीद है कि सतभाया के लोगों की आवाज़ ऊपर तक पहुंचेगी, उस ईश्वर तक, जिन से वो प्रार्थना कर रहे हैं। मुझे उस ऊपर तक आवाज़ पहुंचाने से ज्यादा दिलचस्पी है, जो कुरसी पर बैठक ईश्वर बने बैठे हैं और लाखों लोगों का भविष्य तय करते हैं।

Monday, September 2, 2013

एक शाम होटल ताज पैलेस वाया गांव जारपा, नियामगिरि

दिल्ली। जगहः दरबार हॉल, होटल ताज पैलेस। वातानुकूलित हॉल, रंग-बिरंगी रोशनी। मेरी औकात को अच्छी-तरह समझता बूझता वेटर मेरे पास आकर मुझे जूस, और रोस्टेड चिकन के लिए पूछता है। किसी ट्रैवल मैगजीन ने पुरस्कारों का आयोजन है।

आयोजन शुरू होने में देर है। कई होटल वालों को पुरस्कार मिलना है। कयास लगाता हूं कि ये वो लोग होंगे जो उक्त पत्रिका में विज्ञापन देते होंगे। एक मंत्री भी आने वाले हैं, दो फिल्मकार हैं। जिनमें से एक के नाम पर पुरस्कार है, दूसरे को पुरस्कार दिया जा रहा है।

बिजली की चमक मुझे चौंधियाती है। बगल की टेबल पर बैठी एक लड़की ने काफी छोटी और संकरी हाफ पैंट पहनी है। उसके पेंसिल लेग्स दिख रहे हैं। उसकी किसी रिश्तेदार ने पता नहीं किस शैली में साड़ी पहनी है, ज्यादा कल्पना करने के लिए गुंजाईश नहीं छोड़ी है। साथ में तेरह-चौदह साल का लड़का अपनी ही अकड़-फूं में है।

दोनों सम्माननीया महिलाओं के बदन पर चर्बी नहीं है। हड्डियां दिख रही हैं, कॉलर बोन भी। डायटिंग का कमाल है। जी हां, मैं उक्त महिला के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए उनके बदन की चर्बी नाप रहा था। वो बड़ी नज़ाकत से जूस का सिप ले रही हैं। वो हाफ पैंट वाली कन्या बार टेंडर से कुछ लाकर पी रही है...शायद वोदका है। वो  कैलोरी वाला कुछ नहीं खा रहीं।

मै शरीर से दरबार हॉल में हूं। मन मेरा अभी भी नियामगिरि में हूं, जरपा गांव में। मेरे दिलो-दिमाग़ में अभी जरपा गांव ताजा़ है। हरियाली का पारावार। जीवन में इतनी अधिकतम हरियाल एक साथ देखी नहीं थी। नियामगिरि  के जंगलो में डंगरिया-कोंध जनजाति रहती है। मर्द औरतें दोनों नाक में नथें पहनती हैं, महिलाएं भी कमर के ऊपर महज गमछा लपेटती हैं कपड़े के नाम पर। दो वजहें हैं--अव्वल तो उनकी परंपरा है, और उनको जरूरत भी नहीं। दोयम, तन ढंकने भर को कपड़े उपलब्ध हैं।

तन भी कैसा। कुपोषण से गाल धंसे हुए। डोंगरिया-कोंध लोगों की आबादी नहीं बढ़ रही क्योंकि छोटी बीमारियों में भी बच्चे चल बसते हैं। गांव में सड़क नहीं, पीने का पानी नहीं, बिजली वगैरह के बारे में तो सोचना ही फिजूल है। जारपा तक जाने में हमें जंगल में बारह किलोमीटर चढ़ना पड़ा।

अभी तो नियामगिरि बवाल बना हुआ है। वहां का किस्सा-कोताह यह है कि वेदांता नाम की कंपनी को लान्जीगढ़ की अपनी रिफाइनरी के लिए बॉक्साइट चाहिए। नियामगिरि में बॉक्साइट है। लेकिन नियामगिरि में आस्था भी है। डोंगरिया-कोंध जनजाति के लिए नियामगिरि पहाड़ पूज्य है, नियाम राजा है।

तो छियासठ साल बाद, सरकार को सुध आई कि इन डोंगरिया-कोंध लोगों का विकास करना है, उनको सभ्य बनाना है। इसके लिए इस जनजाति को जंगल से खदेड़ देने का मामला फिट किया गया। योजना बनाने वाले सोचते हैं कि भई, जंगल में रह कर कैसे होगा विकास?

लेकिन डोंगरिया-कोंध को लगता है विकास की इस योजना के पीछे कोई गहरी चाल छिपी है। कोंध लोगों को अंग्रेजी नहीं आती, विकास की अवधारणा से उनका साबका नहीं हुआ है, उनको ग्रीफिथ टेलर ने नहीं बताया कि जल-जंगल-जमीन को लूटने वाली मौजूदा अर्थव्यवस्था आर्थिक और पर्यावरण भूगोल में अपहरण और डकैती अर्थव्यवस्था कही जाती है।

डोंगरिया कोंध जनजाति के इस लड़ाके तेवर पर नियामगिरि सुरक्षा समिति के लिंगराज आजाद ने कहा था मुझसे, आदिवासियों के बाल काट देना उनका विकास नहीं है। आदिवासी अगर कम कपड़े पहनते हैं और यह असभ्यता की निशानी है,तो उन लोगों को भी सभ्य बनाओ जो कम कपड़े पहन कर परदे पर आती हैं।

लिगराज आजाद को शायद यह इल्म भी न रहा होगा कि कम कपड़े पहने लोग सिर्फ सिनेमाई परदे पर ही नहीं आते। कम कपड़े पहनना सच में सभ्यता की निशानी है, कम कपड़ो से व्यक्तिगत तौर पर मुझे कोई उज्र नहीं है। लेकिन किसी को इसी आधार पर बर्बर-असभ्य कहने पर मुझे गहरी आपत्ति है।

दरबार हॉल की महिला के उभरे हुए चिक-बोन्स और डंगरिया लड़की के गाल की उभरी हुई हड़्डी में अंतर है। वही अंतर है, जो शाइनिंग इंडिया में है, और भारत में। इन्ही के भारत का निर्माण किया जा रहा है। 66 साल बाद याद आया कि भारत का निर्माण किया जाना है।

मन में सवाल है, अब तक किस भारत का उदय हुआ, किसकों चमकाया आपने, जो शाइनिंग है वो किसकी है। वेदांता, पॉस्को, आर्सेलर मित्तल ने किसके लिए लाखों करोड़ लगाया है भला।

मेरे खयालों का क्रम टूटता है, वह वोदका पीने वाली कम कपड़ो वाली कन्या और सिर्फ साड़ी (ब्लाउज स्लीवलेस था) कहने आदरणीया महिला मेरी तरफ देख रही हैं...मैं उनकी मुस्कुराहट पर नज़र डालता हूं, नकली है, बनावटी है। कसरत की वजह से धंसे गालों में रूज़ की लाली है, नकली है। जरपा गांव में मेरे पत्तल पर भात और पनियाई दाल डालने वाली आदिवासी कन्या की मुस्कुराहट याद आ रही है...उसके धंसे गालों में से सफेद दांत झांकते थे, तो लगा था यही तो है मिलियन डॉलर स्माइल। उसकी मुस्कुराहट...झरने के पानी की तरह साफ, शगुफ़्ता, शबनम की तरह पाक।

जरपा तुम धन्य हो।




Thursday, August 15, 2013

जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहां हैं...



शिकायत करना हम देशवासियों का शगल है। मैं कोई शिकायत करने नहीं जा रहा। हिलती-डुलती गाड़ी के एसी के दूसरे दर्ज़े में बैठा हूं। उड़ीसा जा रहा हूं। सामने की सीट पर एक बुजुर्गवार बैठे हैं। साथ में उनका घरेलू कामगार है, किसी उड़िया जनजाति का लड़का है। बच्चा ही है। बुजुर्गवार की पत्नी साथ में है

बुजुर्ग दंपत्ति के कपड़ों से लगता है काफी साधारण घरों के हैं। खादी का मोटा कुर्ता, धोती कभी सफेद रही होगी। गले में खादी का मोटा गमछा। रंग ताम्रवर्णी। बाल श्वेत हो चले। भौंहे तक सफ़ेद। बीवी के हाथों में कांच की चूड़ियां। बैंगनी रंग की साधारण सूती साड़ी। दोनों के पांव में हवाई चप्पलें हैं। नौकर के पैरों में जो हवाई चप्पल है उस पर फेसबुक लिखा है।

मैं भी गपोड़ हूं और शायद सामने बैठे बुजुर्गवार भी। हम दोनों के बीच आईटीओ पार करते ही बातचीत शुरू हो गई थी। अभी हम भद्रक पहुंचने वाले हैं पत्नी सारे रास्ते चुप बैठी है। एक गंवई पत्नी की तरह।

कोच अटेंडेंट आता है। मुझसे बात करते वक्त उसके एक वित्तीय आदर है। उस आदर में शाम को मेरे उतरने के वक्त मिलने वाली टिप की उम्मीद का बोझ है। वही अटेंडेंट आकर उनसे ऐसे बात करता है मानो बहुत दिनों से जानता हो। पूछता है, बहुत दिनों बाद आए।

मैं पूछता हूं, आप दिल्ली बार-बार आते हैं क्या। हां। इसके बाद बातचीत महंगाई, नक्सल, जनजातियों की समस्या, वेदांता, कोरापुट, नक्सल, राहुल गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह तक पहुंच जाती है। बुजुर्गवार को महीन जानकारियां हैं।

मेरे बारे में बहुत पूछताछ करते हैं। कहां के हो, कौन है घर में...लेकिन इस पूछताछ में एक बुजुर्गाना लाड़ और आह्लाद है। अब मैं पूछता हूं आप..? तब बताते हैं कि उनका नाम अनादिचरण दास है। पांच बार सांसद रह चुके हैं। आखिरी बार सन् 91 लोकसभा जीते थे। पहली बार 71 में जीते थे। अपने बारे में बस इतना ही बताते हैं।

मैं सादगी देखकर दंग हूं। अब तो हाल यह है कि पहली बार विधायक बनकर लोग खदानें खरीद रहे हैँ। पांच बार सांसद चुना जा चुका शख्स हवाई चप्पल पहन रहा है। एसी के दूसरे दर्जे में सफर कर रहा है। चेहरे पर दबंगई का कोई भाव नहीं है।

मैं सोचता हूं आजादी का जश्न पूरे भारत में मनाया जा रहा होगा। लेकिन, पटवारी से लेकर विभिन्न मंत्री भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। वह बुझे मन से कहते हैं, किसी ने कहा है राज्यसभा की सीट सौ करोड़ में बिकती है। हामी भरने के सिवा कोई चारा नहीं है मेरे पास।

रात में गूगल किया था मैंने, अनादि चरण दास को खोजा गूगल पर। मिल गए। उड़ीसा के जाजपुर सीट से सन् 1971, 1980 और 1984 में कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ी, विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ जनता दल गए, वहीं से दो बार 1989 और 1991 में चुनाव जीता। 1996 में फिर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन जनता दल की आंचल दास से चार हजार वोटों से हार गए। फिर उम्र के तकाजे के साथ राजनीति छोड़ दी। जाजपुर-कोरापुट इलाके में अनादिचरण दास एक मजबूत उम्मीदवार माने जाते थे। लेकिन, उनके पास आज दौलत के नाम पर कुछ नहीं।

कहते हैं कि हर महीने वंचितों, गरीबों, जनजातियों के आर्थिक उत्थान के लिए हर महीने योजना आयोग और सोनियां गांधी को चिट्ठी लिखते हैं। पता नहीं पढ़ी भी जाती है या नहीं। पेट्रोल के दाम बढ़ाने के पक्ष में हैं, कहते है इसका पैसा एससी-एसटी बच्चों की शिक्षा के लिए करना चाहिए।

गुरूदत्त की फिल्म प्यासा का एक गीत याद आ रहा है, जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहां हैं....ईमानदारी को गूगल पर खोजता हूं। इसे खोजने में तो गूगल भी नाकाम है।

Thursday, February 7, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः उड़ीसा से वापसी


 ट्रेन में बैठे तो गप्पबाज़ी शुरू हो गई। हमारे साथ वाले कूपे में बैठे ते शशि सहाय। गज़ब के फोटोग्रफर। दूसरी तरफ, विज्ञापन फिल्मों और फीचर फिल्मों में अभिनय़ कर चुके (और कर रहे) भूपिन्दर पंत।

भुवनेश्वर से निकले तो मन में यादें थी, बुद्ध के दांतों के अवशेष जो हमने म्यूज़ियम में देखे थे। सोने का ख़ज़ाना, जो खुदाई में हासिल हुआ था। महिलाएं इतना सारा गहना एक साथ देखकर अभिभूत थीं, और कुछ आधुनिका-अंग्रेज़ीदां पत्रकार आम महिलाओं के इस आभूषण-प्रेम पर छींटाकशी में व्यस्त।

हरहाल, बुद्ध से जुड़ी कथा शुरू हुई। कलिंग या उत्कल (पालि में उक्कला) या ओद्र से महात्मा बुद्ध का संबंध उनके जीवन काल में ही शुरु हो गया था। इसका ज़िक्र इसलिए भी, क्योंकि कई लोग मानते रहे हैं कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण के दो सौ साल बाद अशोक के कलिंग पर हमले से ही बौद्ध धर्म और कलिंग का रिश्ता जुड़ता या शुरू होता है।

अंगुत्तरनिकाय के अनुसार, महात्मा बुद्ध के पहले शिष्यों में से, तपुसा और भल्लिका उक्कला के शहद-व्यापारी थे। वे लोग अपनी 500 बैलगा़ड़ियों में शहद भरकर मध्यदेश की यात्रा पर थे। तभी उनकी मुलाकात गया (आज के बोधगया) में बुद्ध से हुई, जो बोधि प्राप्ति के बाद बोधगया में अपने सातवें हफ़्ते में थे। दरअसल, उनका बोधगया में सातवें हफ्ते का वह आख़िरी दिन भी था।

तपुसा और भल्लिका ने उन्हे चावल और शहद भेंट किया था। महात्मा बुद्ध ने आठ अंजलि  भरकर अपने केश उन्हें उपहार में दिए थे। इन केशों को दोनों शिष्यों ने अपने गृहनगर में स्तूपों में सुरक्षित रख दिए थे। ये स्तूप केश-स्तूप कहलाए।

हाल में उड़ीसा के जाजपुर ज़िले में तारापुर में हुई खुदाई में ये केश-स्तूप निकले हैं। बौद्ध साहित्य तस्दीक करते हैं कि केश-स्तूप सबसे पहले बने स्तूपों में से थे। खुदाई में दो स्तंभ निकले हैं जिनपर केश-स्तूप और भिक्खू तपुसा दानम् खुदा है।

अब इस बात पर शोध चल रहा है कि क्या अपने पहले शिष्य के आमंत्रण पर बुद्ध स्वयं यहां आए थे, और यह स्थान बुद्ध के जीवनकाल में ही आकर्षण का केन्द्र बन चुका था।

वैसे, इतिहास के लिहाज से, कलिंग में आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्से भी शामिल थे। कलिंग की सबसे पुरानी बस्तियों में तोशाली कलिंगनगर (शिशुपालगढ़) थे।  कलिंगनगर आज भुवनेश्वर के पास ही में था। तीसरी सदी ईसापूर्व में कलिंगनगर को अशोक ने अपनी राजधानी बनाया था, (कलिंग सूबे का) और पहली सदी ईसापूर्व में तोशाली को खारवेल की राजधानी बनने का गौरव हासिल हुआ था।

खारवेल के वंशजों के दौरान इसी मध्य उड़ीसा के इलाके का जिक्र रोमना भूगोलवेत्ता प्लिनी ने पहली सदी ईसापूर्व में अपनी किताब में किया है।

प्लिनी लिखता है,कलिंग का राजकीय शहर पार्थालिस (तोशाली) है। इनके साम्राज्य में 60,000 पैदल, 1000 घुड़सवार, 700 हाथी हैं जो यु्द्ध के दौरान शहर की रक्षा करते हैं।

जातक कथाओं के मुताबिक, चौथी और तीसरी सदी ईसापूर्व में, कलिंग का राजधानी का जिक्र दंतापुरम् के नाम से है। दंतापुरम् से ही बौद्धों के सबसे महत्वपूर्ण अवशेष, महात्मा बुद्ध के दांत श्रीलंका ले जाए गए थे।

उत्तर-गुप्त काल में भारत के पूर्वी तट पर कई छोटे-छोटे राज्यों का प्रादुर्भाव हुआ। सातवीं सदी में, चीनी यात्री ह्वेन सांग ने पूर्वी भारत में तीन तटीय इलाकों का ज़िक्र किया है। ये थे, ऊ-चा (ओद्र, मध्य उड़ीसा), कोंग-ऊ-तो(कंगोडा, आज का गंजाम जिला) और कि-लिंग-किया (कलिंग)। इसके मुताबिक, उत्तरी उड़ीसा ओद्र था और मध्य उड़ीसा उत्कल।

कहानी में काफी कुछ बाकी था। शशि सहाय, कैमरे की लेंस पोछते हुए किस्सा जारी रखे हुए थे। कभी हिंदी में तो कभी अंग्रेजी में। उनके साथ का फ्रेंच अर्ध-पत्रकार मुंह बाए हुए सुन रहा था।

पटरियों की आवाज़ में आस्थावानों को ओम् मणि पद्मे हुं सुनाई देने लगा था। 

हमें तो अपने बिहार की याद आने लगी थी। हमको सुबह गया पहुंचना था...जहां से हमारी नालंदा और राजगीर की यात्रा शुरु होने वाली थी।


Wednesday, January 30, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः उड़ीसा में

रत्नागिरि, सूरज की तिरछी किरणों में

हरिदासपुर उतरे, तो छोटे से स्टेशन पर भारी भीड़ जमा थी। कौतूहल से ताकती-निहारती औरतें, लंबी गाड़ियों को छू-भर लेने की तमन्ना से उसके आसपास मंडराते छोकरे। मुंह में गुटखा दबाए मोबाइल पर उड़िया फिल्मी गाने बजाते चंट किशोर। बीड़ी धूंकते बूढ़े। लेकिन सबके चेहरे पर मुस्कुराहट।

हमारे साथी देशी-विदेशी सैलानी तो गेंदे की मालाओं से लद गए।

हरिदासपुर से हम सीधे ललितगिरि गए। ललितगिरि को पिकनिक स्पॉट जैसा माना जा सकता है। उत्खनन स्थल के ऐन पहले, आप पारंपरिक उडिया गांवो का दीदार कर सकते हैं। यह कटक से केन्द्रापाड़ा की तरफ जाने के रास्ते में है।

उदयगिरि, यहां पुष्पगिरि नामक विख्यात विश्वविद्यालय था

 ललितगिरि में स्तूपों के अवशेष मिले हैं। कुछ मजदूर अब भी उत्खनित अवशेषों की साप-सफाई में लगे थे। उड़ीसा में टूरिज़म महकमा उसे प्रोडक्ट बनाकर बेचने को बहुत उत्सुक है।

वहां से हमारी बस निकली तो सीधे रत्नागिरि...। स्कूली छात्रो का हुजूम कतार बनाकर खड़ा था। बच्चों को स्कूली यूनिफॉर्म में स्वागत के लिए खड़ा देखकर, मुझे लगा कि ओडिशा टूरिज़म ने इनको क्योंकर खड़ा कर दिया है।

मैंने एक बुजुर्गवार से बात की, पता चला ये स्वागत इंतज़ाम गांववालों ने अपनी मर्जी से किया है। पर्यटन बढ़ेगा तो उनके गांव का विकास होगा।

हमारे हाथों में छात्रों ने गुलाब का फूल दिया था। कांटे लगे ही थे डंठलो में, खरीदा हुआ नहीं था...किसी न किसी के बागीचे का था। मन प्रसन्न हो गया। फूलवाले की दुकान से खरीदा गुलाब इतना ख़ूबसूरत होता है कि नक़ली लगता है।

बहरहाल, स्थानीय पत्रकारों और न जाने कहां से आ जुटे लोगों ने तोशाली ग्रुप (उड़ीसा सरकार के साथ पीपीपी मॉडलपर टूरिज़म के काम में लगा होटल समूह) के खाने का बंटाधार कर दिया। हमारे साथियों में कईय़ो को खाना नहीं मिल पाया।

खाना नहीं खा सकने वाले लोगों में हम नहीं थे। ऐसी भीड़ में खाना बटोर कर खा लेने का हमारा दिल्ली वाला पत्रकारीय प्रशिक्षण बहुत काम आता है। पहले तो हम रेकी कर लेते हैं, और यह मन में बिठा लेते हैं कि ससुर क्या-क्या नहीं खाना है। और उधर का रूख़ ही नहीं करते।

लोगों के कतार में आने से ऐन पहले हम अंग्रेजी के बॉयल्ड राइस अर्थात् भात और दाल के साथ सिर्फ सलाद और मटन या चिकन (जो भी उपलब्ध हो) से थाली भर कर कोने में खिसक लेते हैं।

जब बाकी लोग अपनी थाली में रोटी, रायता, दाल, नामालूम किस्म की सलादें, हरी चटनी, प्याज, सूख चला खीरा, करीने से कुतरी मिर्च, भात, कम उबली सब्जी वगैरह के मेन्यू का डिमॉन्स्ट्रेशन दिखाते हुए खाने की जद्दोजहद में लगते हैं, मैं सीधे मिठाई की तरफ लपकता हूं। मिठाई के साथ मेरा मोह आदिम है।

रत्नागिरि में खीर के साथ कलाकंद था। अद्भुत। मुंह में लिया तो आनंद अखंड घना था।

खैर, रत्नागिरि के उत्खनन अवशेष देखने के बाद सूरज छिपने लग गया था। हमारे साथ एक बेहद प्रतिबद्ध कैमरामैन थे, खुद डीडी के गोपाल दास और एक अन्य किसी एजेन्सी के लिए, धीरज। हर शै को अपने फ्रेम में कैद कर लेने के लिए ललायित।

रत्नागिरि में सूरज की तिरछी रोशनी में भग्नावशेष बहुत खूबसूरत लग रहे थे। धीरज और गोपाल बहुत धैर्य से एक एक पल कैद कर रहे थे। हेंतमेंत में वहां से निकले, तो उदयगिरि के लिए गए, जहां पहुंचने तक द्वाभा फैल चुकी थी।

खुदाई में वहां स्तूप तक आने के लिए इस्तेमाल आने वाली पगडंडी भी मिली है। कई मूर्त्तियां, स्तूप, अवशेषों पर जो टीला बन गया उस पर काली का एक मंदिर भी था।

मुझे लगा कि इतिहास के दरीचों में सैर कर रहा हूं।

वापसी में हम साढे आठ बजे तक भुवनेश्वर पहुंचे। ट्रेन पहले से ही प्लेटफॉर्म नंबर एक पर खड़ी थी। अपने कूपे में जाने के साथ ही हमें लगा कि हम कितना थक चुके हैं...अटेंडेंट ने सूप का प्याला रख दिया था।

भुने हुए चने एक बार फिर हमने खरीद ही लिए थे...अब सूप कौन पीता भला?


Monday, January 28, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः ललितगिरि, उदयगिरि, रत्नागिरि

रत्नागिरि, उदयगिरि, और ललितगिरि...उम्मीद ये थी कि भुवनेश्वर सुबह-सुबह पहुंच जाएंगे। लेकिन, भारतीय रेल जिंदाबाद। हम दोपहर एक बजे, हरिदासपुर उतरे। ये कटक से पहले एक बेहद छोटा स्टेशन था।

स्थानीय लोगों ने भारी भीड़ जमा रखी थी। हमारे आने पर स्वागत का इंतज़ाम भी था।

हरिदासपुर से बस वगैरह से पहले ललितगिरि ले जाया गया हमें। दिन भर में हमें ललितगिरि, रत्नागिरि, उदयगिरि और धौलागिरि देखना था।

ये तीनों जगहें, महात्मा बुद्ध से सीधे तौर पर जुड़ी हुई नहीं हैं। लेकिन, इनका संबंध विदेशों में बौद्ध धर्म के विस्तार में रहा है। बौद्ध धम्म अगर एक विश्व धर्म के रूप में अपनी जगह बना सका, तो इसकी बड़ी वजह कलिंग पर अशोक की चढ़ाई रही और कलिंग की एक बड़े वाणिज्यिक केन्द्र के रूप में ख्याति रही।

ललितगिरि में उत्खनित स्थल, उड़ीसा

यह बुद्ध के कुशईनगर में महापरिनिर्वाण के महज दो सौ साल के भीतर ही हुआ। कलिंग का युद्ध 261 ईसापूर्व में हुआ, कहा जाए तो इसने विश्व इतिहास की दिशा बदलने में बड़ी भूमिकी निभाई।

धौलागिरि तो हम जा ही नहीं पाए, सांझ घिर आई थी। पता चला, यही वो जगह थी, जहां अशोक-कलिंग युद्ध हुआ था। आश्चर्यजनक रूप से कलिंग के सम्राट्, जिसे 'महोदधिपति' यानी 'समंदर का राजा' (स्रोतः रघुवंश) और बौद्ध साहित्य 'मंजूश्रीमूलकल्प' के मुताबिक कलिंग सागर में मौजूद सारे द्वीपों का स्वामी 'कलिंगोदरा' कहा गया है--उसके नाम का जिक्र  कहीं नहीं मिला।

ललितगिरि में उत्खनित स्थल, फोटोः इप्सिता बनर्जी


धौलागिरि, भुवनेश्वर के पास है। यहां सन् 1837 में उत्खनन में एक शिलालेख मिला है, जिसे ईसापूर्व 273-236 में यहां अशोक के आदेश से शांतिस्तूप बनाकर स्थापित किया गया था। इसमें मागधी-प्राकृत में ब्राह्मी लिपि में लेखन किया गया है।

उड़ीसा के इन इलाकों में सन् 639 में चीनी यात्री ह्वेन सांग भी आया था। उसने अपने वृत्तांत में लिखा था, कि इस इलाके में यानी आज के जाजपुर, केन्द्रापाड़ा और कटक ज़िले में उसे सौ भी ज्यादा स्तूप मिले। इनमें से तारापुर का केश-स्तूप, लंगुडी पहाडियों में स्थित अशोक स्तूप और रत्नगिरि, उदयगिरि ललितगिरि और पुष्पगिरि (मशहूर विश्वविद्यालय) में विहारों की श्रृंखला सबसे महत्वपूर्ण थी।

ये विहार महायान और वज्रयान शाखा के थे।

रत्नागिर और ललित गिरि में भग्नावशेषों और खुदाई में निकले ढांचों को देखने के बाद बौद्ध धर्म के थेरवाद--जो स्तूपों की सामान्य ढंग से पूजा करते थे--से महायान और वज्रयान (तांत्रिक बौद्ध धर्म) के विकास को परिलक्षित किया जा सकता है।

ललितगिरि के स्तूप से महात्मा बुद्ध के शरीर के कुछ अवशेष भी मिले हैं...जो अब भुवनेश्वर में भारतीय पुरात्त्व सर्वेक्षण के संग्रहालय में रखे गए हैं। हमने इनका भी दीदार किया।


वैसे, धातु वंश के मुताबिक, कलिंग के राजा गुहशिव ने, जो बुद्ध के अवशेषों के रूप में प्राप्त उनके दांतो की पूजा करता था, मगध के राजा पांडु के डर से उन दांतो को अपनी बेटी हेममाला और दामाद दंतकुमार के साथ श्रीलंका के अपने मित्र राजा महासेना के पास भिजवा दिया। उसकी बेटी और दामाद सन् 310 में अनुराधापुर पहुंचे थे, और पवित्र दांतों को महासेना को सौंप दिया था।

खैर, रत्नागिरि, उदयगिरि और ललितगिरि के इतिहास पर थोड़ी रोशनी डालना जरूरी था, ताकि इनका ऐतिहासिक महत्व स्पष्ट हो सके। मेरा वहां का अनुभव कल लिखूंगा।

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