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Monday, January 5, 2026

फिल्म समीक्षाः मानवीय संबंधों पर बनी बेहतरीन फिल्म केडी

इन दिनों मुझे तमिल फिल्में देखने का चस्का लग गया है. बेशक, दक्षिण भारतीय फिल्मों में पर लाउड होने का आरोप लगता है और ज्यादातर मामलों में सही हो होता है. पर अब हिंदी फिल्में लाउड हो रही हैं और ज्यादातर हिंदी फिल्मों में कथानक गुम हो रहा है.

बहरहाल, मैंने एक तमिल फिल्म के.डी. देखकर खत्म की. फिल्म नई है, 2019 में रिलीज हुई थी. लेकिन मुझे नहीं पता कि हम उत्तर भारतीय लोगों में से कितने लोगों ने इसे देखा है.

मेरा सुझाव, और मेरी सिफारिश है आप इस फिल्म को देखें.

फिल्म केडी का एक दृश्य. तस्वीरः प्राइम वीडियो


असल में, यह फिल्म कुरुप्पु दुर्रै नाम के एक बुजुर्ग की कहानी है. दुर्रै लंबे समय से कोमा में होता है और उसके घर वाले उसकी बीमारी बर्दाश्त नहीं पा रहे होते हैं. उसके बेटे दुर्रै को मार डालने की योजना बनाते हैं, आप चाहें तो इसे मर्सी कीलिंग कर सकते हैं. संयोग से उसी वक्त दुर्रै होश में आ जाता है और इस पूरी योजना को अपने कानों से सुन लेता है. कुरुप्पा दुर्रै मरने के डर से कम और बेटों की इस योजना से व्यथित होता है और उसी वक्त घर छोड़ देता है.

अगर आप फिल्मों के मिजाज को रंग के जरिए सूंघने लायक दर्शक हैं तो आप इस वक्त बीमारी भरे पीलेपन के कलर टोन को देखकर खुद बहुत उदास-से हो जाएंगे. बहरहाल, फिल्म में यह रंग ज्यादा देर तक तारी नहीं रहता. फिल्म रोने-धोने वाली या नैतिक शिक्षा देने वाली विज्ञापन सरीखी नहीं है. आगे कड़वे-मीठे आते हैं. मजा तो इसके बाद आता है.

घर से निकले कुरुप्पु दुर्रै एक मंदिर में कुट्टी से मिलते हैं. नागा विशाल ने कुट्टी की भूमिका की है. कुट्टी अनाथ है और वह मंदिर के बारामदे पर ही रहता है. दोनों एक-दूसरे के अकेलेपन के दोस्त बन जाते हैं. कुट्टी ही कुरुप्पु दुर्रै का नाम केडी रखता है और वह उसका मानवीय संबंधों पर फिर से भरोसा जगाने का काम करता है. कई बार तो मुझे कुट्टी को देखते हुए प्रेमचंद के किरदार हामिद की याद आई जो बूढ़ी अमीना का दादा जैसा बर्ताव करता है. यहां भी कुट्टी केडी के लिए बकेट लिस्ट तैयार करता है और कहता है कि मरने से पहले इनको पूरा करना है.

यह फिल्म इन दोनों दादा-पोते जैसे रिश्ते को बिल्कुल निजी और जीवन के निकट लाकर परदे पर उकेरती है और इन दोनों किरदारों की यात्रा में हंसी, उदासी, प्रेम, डर, और यहां तक कि गुस्से से भरे पल भी हैं. कुल मिलाकर निर्देशक मधुमिता ने जीवन को परदे पर ही उकेर दिया है. केडी के किरदार में मु रामास्वामी बेहद सहज और विश्वसनीय हैं और खासकर बकेट लिस्ट की एक विश यानी पसंदीदा व्यंजन मटन बिरयानी खाते वक्त उनके चेहरे पर अव्यक्त तृप्ति के जो भाव आते रहते हैं, उससे बढ़िया भाव मैंने क्लोज शॉट में बेहद कम ही देखे हैं.

फिल्म में कुछ भी फ्लैशी नहीं है, बल्कि कैमरे और संपादन की गतियों ने फिल्म की गति बनाए रखी है. संपादन और पृष्ठभूमि का संगीत इतना जादुई है कि अगर आप इसका व्याकरण पकड़ पाए तो खो जाएंगे. कुट्टी के किरदार में नाग विशाल ने क्या सामर्थ्य दिखाया है! यह एक आत्मविश्वास से भरे अनाथ बच्चे की भूमिका है, आत्मविश्वास न रहे तो वयस्कों की यह दुनिया उसे जीने भी देगी?

इन दो मुख्य कलाकारों के साथ पटकथा में कहानी के प्रवाह को बनाए रखने में कई और किरदार आते हैं. इसमें कोथू कलाकार, बिरयानी दुकानवाला, मंदिर का पुजारी और यहां तक कि केडी का पता खोजने के लिए लगाए गए प्राइवेट जासूस, सबने प्रवाह को बनाए रखा है.

कहानी में आपको अगर कुछ चुभ सकता है कि केडी के बाल-बच्चे इनते हृदयहीन कैसे हो सकते हैं? उनके किरदारों की कुछ और परते हो सकती थीं, पर यह बहुत बारीक-सा सवाल है. फिर भी ऐसा लगता ही नहीं कि परिवार मे किसी को केडी की कोई फिक्र थी या उससे जरा भी प्यार था. जबकि बाकी के सभी लोग मानते हैं कि केडी एक अच्छा इंसान और एक अच्छा पिता था. 

एक झोल यह भी है कि जब परिवार वालों को पता लगता है कि केडी कोमा से बाहर आ गया तब भी वे लोग उसको खोजने के लिए जासूस लगवाते हैं, वह भी इसलिए ताकि उसको पकड़कर यूथेनेशिया वाला अधूरा कर्मकांड पूरा किया जा सके. बहरहाल, पटकथा की इस कमजोरी से आंखें मूंद सकें तो बाकी फिल्म आला दर्जे की है. हो सके तो देखिए और बताइए कि आपको कैसी लगी.

ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइमवीडियो पर फिल्म मौजूद है.

#tamilcinema #manjitthakur #film #cinema #KDfilmreview #Indiancinema 

Wednesday, August 28, 2024

फिल्म कदैसी विवासायीः कृषि के नाम लिखा गया निर्देशक का प्रेमपत्र

मैं रोजाना आधा घंटा फिल्म (या वेब सीरीज़) देखता हूं. नियमित तौर पर. इस नियमितता में बहुत ऐसी चीजें देख लीं, जिससे मन उचाट हो गया. फिर कुछ अच्छी भी देखीं. इनमें विजय सेतुपति की हालिया रिलीज फिल्म महाराजा थी और उसके बाद ओटीटी के एआइ ने इशारा किया सेतुपति की अगली फिल्म देखें. नाम था कदैसी विवासायी. फिल्म 2021 की है इसलिए फिल्म देखने के बाद मुझे अफसोस हुआ कि यह फिल्म मैंने पहले क्यों नहीं देखी!

कदैसी विवासायी का दृश्य, सौजन्यः गूगल



मेरे लिए फिल्म की भाषा महत्वपूर्ण नहीं है. और मैं डबिंग की बजाए मूल भाषा में फिल्म देखना पसंद करता हूं. बहरहाल. कदैसी विवासायी में विजय सेतुपति सिर्फ कैमियो में हैं.

अमूमन हम दक्षिण भारतीय फिल्मों से उम्मीद रखते हैं कि वह काफी लाउड होगी. जिसमें जलती चिता से नायक उठ खड़ा होता, जिसमें पैर घुमाकर वह बवंडर उठा सकता है, जिसमें महिला उपभोग की सामान है. पर कदैसी विवासायी अलग है.

निर्देशक एम. मणिकंदन की मैं पहली फिल्म देख रहा था. इंटरनेट से सर्च किया तो पता चला कि उन्होंने काका मुत्तई, कुट्टरामे थंडानई और आंदावन कट्टलाई नाम की तीन और फिल्में बना रखी है. और मैंने तय किया है उनकी यह तीन फिल्में भी देखूंगा.

बहरहाल, अभी कदैसी विवासायी की बात. कदैसी विवासायी तमिल शब्द है, जिसका अर्थ है आखिरी किसान.

निर्देशक किसी हड़बड़ी में नहीं दिखते. फिल्म में पहले दस मिनट तक एक भी संवाद नहीं है. क्रेडिट के साथ निर्देशक बहुत आराम से, और उससे भी अधिक बारीकी से आपको ले जाकर एक ठेठ तमिल गांव में बिठा देता है. और इस बीच वह आपको इस गांव के खेत-खलिहानो, गली-गलियारों, मवेशियों और पगडंडियों, मुरगों और मैनाओं, बकरियों और यहां तक कि पत्थरों से परिचित करवा देता है.

यह फिल्म एक त्रासदी की कथा कहती है, लेकिन यह त्रासदी नल्लांडी नाम के इस आखिरी किसान (कदैसी विवासायी) की नहीं है, यह त्रासदी उस समाज, हमारे गांवों और किसानों की है. उनके छिनते परिवेश, उनकी जीवनशैली, उनके पारंपरिक बीज भंडारों, उनके सदियों पुराने कीट प्रबंधन के तरीकों, खेती के तौर तरीकों के खत्म होते जाने की है. यह फिल्म इशारा करती है कि यह सब बड़े एहतियात के साथ, बड़े बारीकी से और व्यवस्थित तरीके से खत्म किया गया है.

फिल्म की शुरुआत में मुरुगन (यानी उत्तर के कार्तिकेय) की बेहद पुरानी स्तुति के बीच गांव का परिवेश स्थापित किया गया है. जिसमें उड़ानें भरते मोर हैं, खेतों में उतरती भेड़ें हैं, पैनोरमिक व्यू में पूरा गांव है. एक ठेठ हिंदुस्तानी गांव, जिसमें खपरैल के मकान हैं, जिसमें कद्दू-खीरा है, जहां हाट लगता है और वहां से हमारा नायक नल्लांडी सांप काटे का इलाज करने वाले कुछ पारंपरिक बूटियां और कुछ सब्जियां तो खरीद लाता है लेकिन खाद-बीज की दुकान में उसका सामना अजीब परिस्थिति में होता है.

यहां फिल्म अपना पहला पक्ष रखती है. किसान दुकान में खल्ली (मुझे लगता है कि वह नारियल की खल्ली थी या सरसों की) चखकर देखता है और कहता है कि इसमें तो तेल बचा ही नहीं, मेरे बैल क्या खाएंगे. यह ग्रामीण संसाधनों के दोहन पर संक्षिप्त टीप है क्योंकि दुकानदार कहता है कि आजकल के कोल्हू में बूंद-बूंद तेल निकाल लिया जाता है. बहरहाल, उस बीज की दुकान में किसान को टमाटर के पारंपरिक बीज नहीं मिलते. संकर बीज ऐसे हैं जिनके टमाटरों में आगे बीज नहीं होंगे...

यह जीएम बीजों के बढ़ते चलन पर इशारा है जिसकी गिरफ्त में हमारा किसान समाज आता जा रहा है.

वैसे, इस फिल्म का केंद्रीय विषय आत्मनिर्भरता की ओर है. फिल्म किसानी को किसी बहुत ऊँचे आसन पर बिठाने की कोशिश नहीं करती कि किसान ऐसे हैं जिसकी कभी आलोचना नहीं की जा सकती या अन्नदाता किसान की श्रद्धा में हम सबको झुक जाना चाहिए. यह फिल्म सीधा कहती है कि किसानों के साथ जो हजारों साल की परंपराएं चली आ रही हैं उस सहज और सरल जीवन को यूं ही, उपभोक्तावाद खत्म न कर दे.

हालिया वक्त में हमारे ऊपर किसानहितैषी फिल्मों की बमबारी-सी हुई थी. ऐसी फिल्में जिसमें माचो हीरो छाती ठोंककर खुद को किसान कहता है. लेकिन, इससे न किसान का भला हुआ न फिल्म के दर्शक का.

कदैसी विवासायी आपके अपने पंखों में अंदर छिपाकर ले जानी वाली फिल्म है, जो सीन-दर-सीन रगों में उतरती है. इसके हरियाले रंग, इसके ड्रोन एरियल शॉट्स, इसके ट्रैक शॉट्स... कैमरे का काम कमाल का है. यह फिल्म असल में कृषि के नाम लिखा गया निर्देशक का प्रेम पत्र है.

कदैसी विवासायी में कोई विलेन नहीं है. इसमें कोई आततायी नहीं है. बेशक आप कुछ किरदारों पर शैतान होने का लेबल चस्पां कर सकते हैं. मिसाल के तौर पर, वह पुलिस अधिकारी जो किसान (नल्लांडी) को सवाल-जवाब के लिए थाने ले जाता है और इसका अंत हमारे कथानायक किसान की न्यायिक हिरासत होती है.

कोई और फिल्म होती तो ये पुलिस अधिकारी, सिपाही, थानेदार शैतान की चरखी होते. और हमारा कथानायक किसान एक पीड़ित और मजबूर व्यक्ति. लेकिन निर्देशक मणिकांदन इस मोह से बच निकले हैं.

इस फिल्म में हर किरदार मानवीय है. और यही वजह है कि अदालत में न्यायिक हिरासत में उस किसान को भेजने वाली सत्र न्यायाधीश एक पुलिस वाले को इस किसान के खेतों को सींचने का आदेश देती है. अनिच्छुक पुलिसवाला सींचने जाता है और फिर उसको इसका आनंद मिलता है. पुलिस के मानवीय चेहरे को दिखाता हुआ एक ही शॉट काफी हैः सिंचाई के लिए खेत पर पहुंचा पुलिसवाला अपनी वर्दी उतारकर पंप सेट के नीचे नहाता है और मुदित मन दिखता है.

नायक किसान, नल्लांडी को खुद आत्मदया से पीड़ित बेचारा किसान नहीं है. वह थोड़ा ऊंचा सुनता है और अगर सिनेमाई मेटाफर समझते हैं तो समझिए कि आसपास की बदलती दुनिया के शोर को वह न सुन रहा है न समझ रहा है और इसलिए चकित है.

वह समझ नहीं पाता कि भेड़े चराने के लिए जा रहा चरवाहा दूसरे साथी को व्हॉट्सऐप लोकेशन क्यों मांग रहा है, वह चकित है कि उसके खानदान के पोते क्यों किसानी का क-ख-ग भी नहीं जानते. उसके कुछ नौजवान परिजन हैं जो उसे दादा कहते हैं, पर उन्हें खेतों में धान की सिंचाई के बारे में नहीं पता.

यह फिल्म बहुत सरल और नर्म है. जैसे गोयठे की आग होती है. लेकिन यह परंपराओं से कटे समाज की तरफ एक सख्त संदेश देती है. फिल्म में सूखाग्रस्त गांव में बारिश के लिए लोकदेवता की पूजा होनी है. पर लोकदेवता की पूजा की शर्त होती है कि गांव के हर जाति के लोग इसमें शामिल होंगे, तभी पूजा सफल होगी.

नल्लांडी को उस लोकदेवता के भोग के लिए धान उपजाने का जिम्मा दिया जाता है. और उसकी खेती की जो डिटेलिंग निर्देशक ने पेश की हैः भई, वाह.

पर गांव में पूजा के लिए कुम्हार से बरतन और मूर्तिंयां बनवानी है. पर कुम्हार तो अपना पेशा छोड़ चुका है. उसके चाक की मरम्मत और धो-पोंछ को बड़े करीने से निर्देशक ने पेश किया है. रासायनिक कीटनाशकों ने किस तरह नुक्सान पहुंचाया है, वह सब एक स्टेटमेंट की तरह आता है.

असल में, यह फिल्म ही सरल नहीं है, यह सरल लोगों के बारे में कही गई एक कहानी भी है. यहां तक कि फिल्म में एक मोर की हत्या करने वाला शख्स भी असल में शैतान नहीं है.

इस फिल्म में बार-बार मुरुगन का संदर्भ आता है. मुरुगन यानी कार्तिकेय. यह भी है कि किस तरह विनायागर (गणेश जी) ने माता-पिता का चक्कर लगाकर मुरुगन को हराया था. इस फिल्म में यह संदर्भ बहुत दिलचस्प है. मोरों का रेफरेंस बारंबार आता है. पर शायद इसलिए नहीं है कि फिल्म हमें मुरुगन की पूजा करने की ओर प्रवृत्त करती है. ऐसा इसलिए क्योंकि तमिलनाडु के कई हिस्सों में मुरुगन कृषि के देवता भी माने जाते हैं.

मोटे तौर पर फिल्म सतत विकास के संदर्भ में परंपरागत खेती की अहमियत को दिखाती है.

फिल्म में इस कथा के समांतर एक कथा रामैय्या की भी है. थोड़े सनक से गए सात्विक प्रेमी के किरदार में विजय सेतुपति दिखते हैं. उन्हें देखना विजुअल डिलाइट है. कैमियो किरदार है, पर जितनी देर हैं आपको बांधे रखते हैं.

फिल्म की खास बात है कि इसमें ज्यादातर अभिनेताओं ने पहली बार अभिनय किया है. पर वह सभी कई दफा बगैर संवाद के भी भाव संप्रेषित करने में सफल रहे हैं. हमारा 83 वर्षीय किसान अपनी बर्बाद हो चुकी फसल के सामने जब जाता है, तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी है. न चीखना, न चिल्लाना, न आंसू... पर कैमरा जब चेहरे को क्लोज-अप में ले जाता है तो ऐसा भाव दिखता है जो कलेजे को छील देगा. उसकी बात आप गांठ बांध कर रख लीजिए कि चावल का एक दाना भी जीवित प्राणी है.

फिल्म में कोई नाटकीय मोड़ नहीं है. यह कथा नदी के प्रवाह की तरह बहती है. आपमें सिनेमा देखने का शऊर पैदा करती है ये फिल्म. कुछ फिल्में आप फॉरवर्ड कर-करके देखते हैं, लेकिन मेरा दावा है कि इस फिल्म को आप पीछे करके देखेंगे. कुछ दृश्य और कुछ संवाद आपको ऐसा करने के लिए मजबूर कर देंगे.

अगर दृश्यों के जरिए आप संकेत समझें तो आपके लिए मेरी तरफ से एक गौरतलब दृश्य हैः हमारे किसान नल्लांडी को अपनी देह में लगी धूल-मिट्टी से कोई फर्क नहीं पड़ता, पर अंगूठे का निशान देने के लिए लगी स्याही को वह हर हाल में मिटाने की कोशिश करता है. यह अकेला शॉट... एक पन्ने के संवाद पर भारी है. यह निर्देशक के दस्तखत हैं.

#filmreview #cinemaupdates #tamilcinema #KadaisiVivasayi 

Wednesday, May 1, 2024

लापता लेडीज अच्छे विषय पर बनी अच्छी फिल्म, पर निर्देशकीय कपट साफ दिखता है

मंजीत ठाकुर
लापता लेडीज का एक दृश्य. साभारः गूगल



लापता लेडीज को जिसतरह हिंदी जगत के उदार बुद्धिजीवियों का समर्थन मिला है, वह दो वजहों से है- पहला, कुछ झोल के बावजूद कहानी सार्थक विषय पर बनी है. दूसरा, फिल्म की निर्देशक किरण राव हैं. 

एक बात कहूं? मुझे ये समझ में नहीं आया, फिल्म के पहले सीन में परदे पर 'निर्मल प्रदेश' लिखकर क्यों आता है? मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश लिखने में क्या परेशानी थी? क्योंकि छत्तीसगढ़ का जिक्र तो बार-बार आया है!

चूंकि, किरण राव पाए की निर्देशक हैं, इसलिए उन्होंने ऐसा अनजाने में किया होगा ऐसा लगता नहीं है.

एक और अहम बात, क्या फूल और पुष्पा (नाम की ओर ध्यान दीजिए, दोनों के नाम पर्यायवाची हैं, पटकथा में इतनी महीन बात का ध्यान रखा गया है) का नाम 'शबनम' और 'शगुफ्ता' हो सकता था! क्या फिल्म का एक किरदार 'घूंघट' के खिलाफ और दूसरा 'हिजाब' के खिलाफ लड़ सकता था!

नहीं लड़ सकता था.

नहीं लड़ सकता था क्योंकि ऐसा करते ही किरण राव कट्टर उदारवादी ब्रिगेड की लाडली नहीं रह पातीं.

लापता लेडीज को सोशल मीडिया पर स्वयंभू आलोचकों की काफी तारीफ मिल ररही है. तारीफ के लिए पोस्टों की भरमार के बीच--हालांकि, मैंने इस फिल्म को पिछले दो दिनों में दो बार देखा, और मुझे बहुत पसंद आई. लेकिन, विषय और संदेश और फिल्म को बरतने को लेकर लेकिन मैं देश की 140 करोड़ जनता का ध्यान फिल्म की एक गलती की तरफ दिलाना चाहता हूं. 

आरक्षी अधीक्षक एसपी को कहते हैं, इंस्पेक्टर को नहीं


गांव के दारोगा के नाम के आगे लिखा है, 'श्री श्याम मनोहर, पुलिस अधीक्षक.' देहात के थाने में पुलिस अधीक्षक क्या कर रहा है? आप करोड़ों की लागत से फिल्म बना रहे हैं, आप हिंदी प्रदेश के हृदय स्थल से एक मार्मिक विषय उठा रहे हैं और आपको हिंदी शब्दावली में पुलिस अधीक्षक नहीं पता? एसपी समझते हैं? ऊंचे दरजे की निर्देशक और आला किस्म के पटकथा लेखक लोग भाषा के मामले में मार खा जाए. जा के जमाना. हिंदी की यही गति?

किरण राव के प्रशंसकों को बुरा लगेगा. बेशक फिल्म पर्दा प्रथा पर है. सशक्त और मजबूत है. कैमरा वर्क बढ़िया है. लेकिन... लेकिन मेरे दोस्तों और सखियो, कहानी में झोल ये है कि फूल कुमारी की देवरानी ने बारात में जाकर फूलकुमारी को देखा था. कैसे? 

कहानी जिस इलाके में बुनी गई है वहां बारात में औरते नहीं जाती हैं, क्योंकि समाज दकियानूसी है (और यही बात तो निर्देशक बता रही हैं, है न?) तो फिर फूलकुमारी की देवरानी ने उसका स्केच कैसे बना दिया? शब्दभेदी बाण की तर्ज पर शब्दभेदी स्केच? कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि शादी से पहले देख आई होगी. इसका सीधा अर्थ है आपको सिनेमा का व्याकरण नहीं पता. सिनेमा में दर्शक को दिखाना पड़ता है, कोई किरदार ईमानदार है तो बताना नहीं, दिखाना होता है. एक्ट के जरिए.

साथ ही, प्रदीप (जो कि ब्राह्मण है), यानी जया का हसबैंड, उसकी मां भी बारात गई थी. इतने दकियानूसी समाज में मां बारात जाने लगी? कब से?  इसको कहते हैं कहानी में झोल. आप पहले से निष्कर्ष निकाल कर बैठेंगे तो ऐसे ही जबरिया मोड़ लाने होंगे कहानी में. 

बहरहाल, जिन दिनों फिल्म बन रही थी, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकारें थीं और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की. उदार निर्देशक ने इसी वजह से छत्तीसगढ़ का तो नाम लिया लेकिन इन दोनों राज्यों का नहीं.

बहरहाल, फिल्मों के किरदार अधिकतर उच्चवर्गीय सवर्ण हैं, इसलिए इस कंप्लीट फिल्म के तौर पर यह फिल्म मुझे मुत्तास्सिर नहीं कर पाई है. हां, निर्देशकीय कपट के बावजूद बेशक देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज में मौजूद पर्दाप्रथा पर यह एक नश्तर चुभोती है और उस लिहाज से उल्लेखनीय है.

आपको मेरी दृष्टि संकीर्ण लगेगी. हो सकता है कुछ लोग मुझे कुछ घोषित भी कर दें. पर जब आप कहानी को छीलते हैं तो ऐसे छीलन उतरती है. 

किसी एक ने मुझसे कहा भीः फिल्म मनोरंजन के लिए देखते हो या इन सब बातों पर गौर करने? दूसरे ने टिप्पणी कीः बड़े संदेश के पीछे छोटी बातों पर ध्यान मत दो.

हम देते हैं ध्यान. क्योंकि हमें एफटीआइआइ में यही सिखाया गया हैः हाउ टू रीड अ फिल्म.

Tuesday, April 25, 2023

वेब सीरीज जुबिली का मीन-मेख

इससे पहले कि आप मेरी तरफ से जुबिली की मीन-मेख पढें, पहली बात, जुबिली देखी जा सकती है. सीरीज अच्छी है. लेकिन...

यह लेकिन शब्द जो है, वह आगे कई मीन-मेखों, छिद्रान्वेषणों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. तो जिनको जुबिली बहुत पसंद आई हो, वे लोग आगे न पढ़ें. जिनको परपीड़ा से सुख मिलता है, पढ़ते रहें. जुबिली भले ही फिल्मों की कहानी से जुड़ी है, पर यह धीमी है, और यह आपको उदासियों से भर देगा.

दूसरी बात, (पहली बात मैंने पहली लाईन में ही कह दी है) कि किसी भी सीरीज को सिर्फ इसलिए नहीं देखा जा सकता है, या देखा जाना चाहिए कि निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाणी है. बेशक, मोटवाणी पाए के निर्देशक हैं. काम सलीके से करते हैं. लेकिन...

लेकिन, जुबिली में कई लूप होल्स निर्देशक महोदय ने छोड़े हैं. फिल्मों पर आधारित सीरीज को जरूरत से ज्यादा फिल्मी बनाना हो, और कई चीज को तो इतनी बार दोहराया गया है कि ऊबाऊ होने लगती है चीजें.



मसलन, मदन कुमार के स्क्रीन टेस्ट को इतनी बार दोहराया गया है कि फॉरवर्ड करके देखना पड़ा. पहले एपिसोड में एक ऊबाऊ मुजरा भी है. पूरी सीरीज में संवाद भारी भरकम हैं कई बार संगीत कर्णप्रिय नहीं, बोदा भी लगता है. लेकिन...

लेकिन, जब तक आप जुबिली देखते हैं आप इसके किरदारों के साथ रहते हैं. हर किरदार को देखकर मन में एक सवाल तो उठता है, अरे ये किस के जैसा गढ़ा गया है या असल जिंदगी में यह है कौन? देविका रानी? अशोक कुमार? हिमाशु राय? देव आनंद या राज कपूर? नरगिस या सुरैया?

इस सीरीज में आपको कुछ बेहतरीन अदाकारी देखने को मिलेगी. इसलिए इसको एक ही रात में बिंज वॉच करके बदमजा न करें. बढ़िया से चबा-चबाकर खाएं. लेकिन...

लेकिन, आपने मोटवाणी की लुटेरा देखी है तो आपको जुबिली वैसी ही लगेगी. वैसे ही धीमे-धीमे एक आदमी के कत्ल की कहानी खुलती है और मदन कुमार उर्फ अपारशक्ति खुराना की दुविधा नजर आती है. अपारशक्ति खुराना ने बढ़िया अभिनय किया है. बढ़िया इसलिए क्योंकि वह अब तक इस तरह के गंभीर किरदार में नजर नहीं आए थे. लेकिन..

अपार शक्ति खुराना पहले कुछ एपिसोड में तो गंभीर और एकरस किरदार में ठीक लगते हैं पर बाद में बोरिंग लगने लगते हैं. उनकी किरदार पर लेखक को थोड़ा और काम करना चाहिए था. बिनोद दास के किरदार को बनाकर लेखक और निर्देशक ने उसको अनाथ छोड़ दिया. प्रसेनजीत अपने किरदार के हर फ्रेम में शानदार लगे हैं. लेकिन...

काश कोई अदिति राव हैदरी को समझा पाता कि आदमी (इस केस में अभिनेत्री) के मुखमंडल पर दुई ठो भाव ही नहीं रहते. एक होंठ आपस में चिपके हुए और दूसरा चवन्नी भर होंठ खुले हुए. लकड़ी जैसा फेस (फेस सुंदर है, भाव के अर्थ में कह रहे हैं) बनाकर कैसे एक्टिंग की है इनने? कास्टिंग किसने की है मुकेश छाबड़ा ने? लेकिन...

अदिति राव हैदरी के बर्फ की सिल्ली जैसी अदाकारी के सामने वामिकी गब्बी ने क्या जोरदार अभिनय किया है. अब आप गेस करते रह जाएंगे कि यह नरगिस है या सुरैया! उसी तरह जय खन्ना के किरदार में सिद्धांत कभी देव आनंद तो कभी राज कपूर बनने की कोशिश करते हैं. पर चालढाल से वह देव साहब जैसे ही दिखते हैं. लेकिन..
लेकिन आज आप लिखकर रख लीजिए, यह बंदा आगे बड़ा नाम करेगा. इसमें संभावनाएं बहुत हैं. इसमें स्टार बनने की क्षमता है. ऐसा इसलिए क्योंकि बंदे ने अपने हर जज्बात दिखाए हैं. खुशी, उदासियां, आंसू, नाच, खिलखिलाहट. सिद्धांत अभी करियर के शुरुआती दौर में ही हैं. इस लिहाज से उनका काम उम्दा है. लेकिन...

जुबिली के बारे कई समीक्षकों ने भांग खाकर तगड़ी राइटिंग बताई है. भक्क. आपको लूप होल बताता हूं. जमशेद खान का मेकअप मैन, उसके कत्ल के बाद उससे जुड़े सामान इकट्ठे करता है. कहां और कैसे? लेखक उसको सीधे मुंबई ले आता है. कैसे? चलिए बंदा न्याय के लिए बंबई आता है, पर उसके बाद उसको फोन की रिकॉर्डिंग सुनते हुए दिखाया जाता है वह भी रूसी जासूसों के साथ. कैसे?

यह सही है कि लेखकों को कुछ भी लिखने की छूट होती है. लेकिन...

जुबिली का कालखंड 1947 से 1953 का है और उसमें सिनेमास्कोप की बात होती है. लगभग ठीक ही है क्योंकि भारत में सिनेमास्कोप की पहली फिल्म कागज के फूल थी जो 1959 में रिलीज हुई थी. लेकिन...

आप को ध्यान देना चाहिए कि दुनिया की पहली सिनेमास्कोप फिल्म द रोब थी, जो 1953 में रिलीज हुई थी. शायद अमेरिकी में इस तकनीक के आने से पहले ही भारत में यह तकनीक मोटवाणी जी ले आए हैं.

राम कपूर ने कमीने किस्म के फाइनेंसर के रोल में बहुत प्रभावित किया. वह एक तरह से फिल्मी दुनिया के आलोक नाथ होते जा रहे थे. यह वैराइटी बढ़िया लगी. उनके किरदार को लेखक ने गहराई नहीं दी.

सेट-फेट, सिनेमैटोग्राफी तो बढ़िया है लेकिन आपको एक राज की बात बताऊं. इस्मत चुगताई का एक उपन्यास है, अजीब आदमी. मोटे तौर पर देवानंद और गुरुदत्त के जीवन से किरदार उठाए हैं उसमें इस्मत आपा ने. बेहतरीन उपन्यास है. जुबिली में जय खन्ना का किरदार उपन्यास के धर्मदेव से मिलता है और फाइनेंसर वालिया का किरदार उपन्यास के निर्माता किरदार वर्मा से.

कसम से, पढ़कर देखिएगा उपन्यास.

हो सकता है कि आने वाले सीजन में वर्मा जी ओह सॉरी, वालिया साहब का किरदार किसी हीरोईन के धोखे का शिकार होकर दिवालिया हो जाए, उपन्यास में ऐसा इच हुआ था. साहित्य का ऐसा प्रेरणा के रूप में ऐसा इस्तेमाल भी करते हैं फिल्म वाले. लेकिन...

मदन कुमार को पूरी सीरीज में 967 बार बहनचोद कहा गया है. ऐसा क्यों? एकाध बार तो ठीक है, वेबसीरीज को सर्टिफिकेट ही गालियों से मिलता है इसलिए मान लेते हैं. पर हर किसी के मुंह से मदन कुमार को गाली दिलवाई है मोटवाणी ने.

यह बात कुछ जमी नहीं. इसलिए जुबिली देखिए जरूर लेकिन....

Monday, December 26, 2022

फिल्म समीक्षाः कांतारा लोककथा और वर्तमान की समस्या के कमाल का मिश्रण है

मंजीत ठाकुर

लोककथाओं को फिल्मी परदे पर उतारना बहुत मुश्किल नहीं है. लेकिन जब उसी लोककथा और आमजनों के विश्वास को आधुनिक समाज की समस्याओं के साथ मिलाकर समाधान के आयाम के तौर पर पेश किया जाए तो मुश्किलें आती हैं.

इस लिहाज से कांतारा देखना विस्मयकारी है. खासकर, इसके शुरुआती बीस मिनट और आखिरी के बीस मिनट तो आह्लादकारी सिनेमाई अनुभव है.

फिल्मों को कहानी के आधार पर खारिज किए जाने का आम चलन है हिंदुस्तान में. खासतौर पर कांतारा में फिल्म में नायिका के प्रति नायक का बरताव नारी विमर्श के झंडाबरदारों के लिए इस फिल्म को खारिज किए जाने का एक आधार बन रहा है. लेकिन, इस मानक पर नब्बे फीसद भारतीय सिनेमा स्त्री-विरोधी है. हां, वामपंथी फिल्मकारों की कथित प्रगतिशील फिल्में भी इसके आधार पर खारिज की जा सकती हैं. पर कांतारा में मुद्दा वह नहीं है.

किसी भी फिल्म के लेखन बारे में सबसे अच्छी बात यही होती है कि पहले आधे घंटे में आपयह अनुमान लगा ही न पाएं कि फिल्म का खलनायक कौन है. कांतारा इस मामले में सौ फीसद बेहतरीन पटकथा है कि आप यह तय ही न कर पाएं कि आखिर खलनायक कौन है और इसके काम का मंतव्य क्या है.

सबसे बेहतर बात यह भी है कि आपको क्लाइमेक्स में जाकर चीजों का पता लगना शुरू होता है.

कांतारा की एक बड़ी खासियत इसकी कमाल की सिनेमैटोग्राफी और इसका रंग संपादन है. कांतारा देखते हुए, मैं दोबारा कहता हूं कि आपको अद्भुत सिनेमाई अनुभव होगा.

इस फिल्म में लोककथा की भावभूमि को लेकर स्थानीय लोगों के अधिकारों की बात की गई है. आरआरआर की भावभूमि भी यही थी लेकिन वह इतिहास के कथ्य की ओर मुड़ गई, कांतारा लोककथा का सहारा लेती है.

आखिर, वनभूमि के अधिकार को लेकर आप बगैर वैचारिक टेक लिए कोई फिल्म बना सकते हैं क्या? साथ ही उसको हिट कराने का माद्दा भी है क्या? इस फिल्म में स्थानीय भूमि माफिया या जमींदारों, सरकार के वन विभाग के कामकाज और स्थानीय लोगों के वनोपज पर अधिकार का संघर्ष बुना गया है और क्या खूब बुना गया है.

एक मिसाल देखिएः फिल्म में एक स्थानीय व्यक्ति अपन झड़ते बालों के लिए किसी पौधे की जड़ लेकर आ रहा होता है और वन अधिकारी मुरलीधर उसको रोकता है और एक थप्पड़ मारते हुए कहता है, ‘तुम्हें क्या लगता है ये जंगल तुम्हारे बाप का है?’ आपको क्या लगता है? इसका उत्तर क्या होन चाहिए?

जिसतरह से हमारे आदिवासी हजारों सालों से जंगल के साथ रहते आए हैं, चाहे वह कूनो-पालपुर के सहरिया हों या नियामगिरि के डंगरिया-कोंध, उस लिहाज से तो इस सवाल का एक ही और संक्षिप्त सा उत्तर हैः हां. आखिर स्थानीय लोगों का जंगल की उपज पर अधिकार होना ही चाहिए, क्योंकि इन आदिवासियों की संस्कृति उस जंगल के नदी-पहाड़ और वनस्पतियों के साथ गुंथी हुई है.

ऐसे में वन अधिकारी और स्थानीय लोगों का संघर्ष शुरू होता है. वन अधिकारी के पास उस जंगल को रिजर्व फॉरेस्ट में तब्दील करने का सरकारी आदेश है और पर्यावरण की रक्षा के लिए यह जरूरी भी है. वन अधिकारी ईमानदार है, वह जंगल के जानवरों की रक्षा करना चाहता है और स्थानीय लोग शिकार. स्थानीय लोगों के मन में भी शिकार किसी द्वेषवश नहीं है, यह तो उनकी संस्कृति का हिस्सा है और आप संस्कृति को बदलने वाले और उसको रोकने वाले होते कौन हैं!

यहां आकर फिल्म आपको सोचने विचारने के लिए एक मुद्दा देती है. आप ऐसे मुद्दे फिल्म के बाद दिमाग में नहीं बिठा पाते तो फिर फिल्म देखने के तौर तरीके बदल लीजिए.

फिल्म के नायक शिवा, जिसकी भूमिका फिल्म के निर्देशक ऋषभ शेट्टी ने निभाई है, भूता कोला की खानदानी परंपरा के हैं. लेकिन शिवा इस अनुशासन में नहीं बंधते. बिहार जैसे राज्यों में भूता कोला की तरह ही कुछ सिद्ध लोगों पर देवी या देवता या स्थानीय देवताओं का आगमन होता है. भगता खेलना कहते हैं उसको.

उधर, वन अधिकारी शिकार खेलने पर बंदिश लगाता है तो उसके साथ ही गांववाले उसका मजाक उड़ाने के लिए शिकार करना बढ़ा देते हैं. क्या आपको ऐसी मिसालें भारत के हर हिस्से के जंगलों से नहीं मिलतीं?

निर्देशक ने कर्नाटत के तुलुनाडु इलाके की लोककथा को कमाल के रंगों के जरिए परदे पर पेश किया है. इस मामले में इसकी जोड़ की दूसरी फिल्म बस मराठी तुंबाड की है, जहां बारिश के मेटाफर का इस्तेमाल किया गया था.

फिल्म के हर फ्रेम में आप कर्नाटक की माटी की खुशबू को देख सकते हैं. जीवनशैली, खानपान और जंगल अपने अदम्य रूप में. खासकर, भूतआराधने से फिल्म में रहस्य का पुट बढ़ता है और हम कांतारा की स्टोरी में अंदर जाते हैं.

सिनेमैटोग्राफी में अरविंद एस. कश्यप ने कमाल किया है और कर्नाटक के उस इलाके के चप्पे-चप्पे को लेंस में कैज किया है. और संगीत भी शानदार है.

लेकिन फिल्म की शुरुआत में जहां नैरेटिव सेट होता है, वहां के क्षण आपको दोबारा आह्लादकारी लगेंगे जब आप आखिरी बीस मिनट को भी गौर से देखेंगे.

आखिरी बीस मिनटों में भीषण संग्राम होता है और तभी कांतारा के वह स्थानीय देवता फिर से प्रकट होते हैं. उन पलो मे ऋषभ शेट्टी ने अतुलनीय अभिनय किया है. आप उसे महसूस कर पाएंगे अगर आप फिल्म में रंगों की अहमियत और कलरिस्ट की मेहनत, शेट्टी के प्रचंड अभिनय के पीछे उसको ऊपर ले जाने वाले संगीत और कैमरे की निगाह को बारीक तरीके से देख पाएंगे.

पटकथा में बेशक, बीच में कुछ हल्की सी ढील है. पर वह न हो तो फिल्म बेहद गंभीर हो जाती.

कुल मिलाकर कांतारा देखना एक आह्लादकारी सिनेमाई अनुभव है.

Sunday, June 5, 2022

फिल्म समाक्षाः जिद, जुनून और कामयाबी का किस्सा है फिल्म कौन प्रवीण तांबे

प्रवीण तांबे! कौन प्रवीण तांबे! क्रिकेटर? यह नाम, जिस पर बायोपिक बन गई, हर शख्स के मुंह से पहला सवाल यही, कौन था प्रवीण तांबे. और बेशक, इस फिल्म का शीर्षक शानदार है.

भारत में इन दिनों आइपीएल का महोत्सव चल रहा है और इन्हीं दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म डिज्नी+ हॉटस्टार रिलीज हुई है फिल्म कौन प्रवीण तांबे. क्रिकेट पर इन दिनों बहुत सारी फिल्में आई हैं और बहुत सारी कतार में भी हैं. क्रिकेटरों पर बायोपिक के लिहाज से, धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी सबसे बड़ी हिट रही. डाक्यूमेंट्री के लिहाज से सचिन पर बनी डॉक्यूमेंट्री भी अपने किस्म का शायद पहला ही मामला था कि लोग थियेटर में वृत्तचित्र देखने गए. हालांकि, सचिन पर बनी फिल्म देर से बनी थी. उस फिल्म को 1999 में बनना चाहिए था.

कौन प्रवीण तांबे में निर्देशक सफल रहे हैं क्योंकि इस फिल्म के बायोपिक होते हुए भी इसमें एक ठोस कहानी है. कहानी में उतार और चढ़ाव है, ट्विस्ट है. और इसी के बरअक्स 83’ बतौर निर्देशक कबीर खान की नाकामियों में गिनी जाएगी, क्योंकि उसमें एक इमोशनल आर्क नहीं था. हालांकि, संभावनाएं अपार थी.

बहरहाल, कौन प्रवीण तांबे एक खिलाड़ी की जिद और जुनून की कहानी है. क्रिकेट में सैकड़ों लोग अगर नाम कमाते हैं तो हजारों लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें कहीं मौका नहीं मिलता. और उसके पीछे कई वजहें होती हैं. प्रवीण तांबे की खास बात यह थी कि उनकी लड़ाई अपनी बढ़ती उम्र से थी.

इस फिल्म की खासियत यह भी है कि खेलों पर बनी अन्य बायोपिक के मुकाबले इसका ट्रीटमेंट अलहदा किस्म का है. इस फिल्म का क्राफ्ट अलग है. खिलाड़ियों को (मेरी कॉम से लेकर कपिल तक) लार्जर दैन लाइफ चित्रित करने के लिए उनके हीरोइज्म की घटनाओं को और भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. फिल्म कौन प्रवीण तांबे में यह सब कुछ नहीं है. फिल्म की खासियत इसकी कहानी का तानाबाना है. बेशक, जो थोड़ा लंबा है, और इसको संपादन के जरिए और अधिक चुस्त बनाया जा सकता था लेकिन इसके बावजूद यह फिल्म आपको अपने साथ लेकर सुख और दुख की यात्रा पर चलती है.

इस फिल्म में अचानक कुछ नहीं घटता. इसमें आपको लगता है कि एकदम साधारण दिखने वाला नायक आखिर कामयाब होगा भी या नहीं. श्रेयस तलपड़े इससे पहले नागेश कुकूनूर की फिल्म इकबाल में भी क्रिकेटर की भूमिका निभा चुके थे और इसलिए उनके लिए यह भूमिका बहुत मुश्किल नहीं थी. लेकिन तलपड़े ने भावप्रवण एक्टिंग की है. संवाद एकदम सामान्य हैं और उनको कहीं भी नाटकीयता से बचाया गया है. वैसे, श्रेयस तलपड़े को प्रॉस्थेटिक्स का कहीं सहारा नहीं लेना पड़ा. वह अपने चेहरे पर बहुत आसानी से मासूमियत, हंसी और बेचारगी के भाव प्रकट करते हैं.

इस फिल्म की खासियत इसके सभी किरदारों का सहज अभिनय है. चाहे वह नायिका (फिल्म मे तांबे की पत्नी) अंजलि पाटिल हों या कोच की भूमिका में आशीष विद्यार्थी. लेकिन इस फिल्म में एक किरदार ऐसा है जिसके बगैर यह फिल्म अधूरी मानी जाएगी. वह हैं खेल पत्रकार की भूमिका में परमब्रत चटर्जी. गोल और मासूम चेहरे वाले इस अभिनेता को आप विद्या बालन वाली कहानी समेत कई फिल्मों में देख चुके होंगे. लेकिन, इस में वह खेल पत्रकार बने हैं जिनके चरित्र की कई परतें हैं. उनमें नेगेटिव शेड भी है पर वह कहीं भी अतिनाटकीय नहीं हुए. बल्कि अंडर प्ले ही किया है. चेहरे के मांसपेशियों में उतना ही खिंचाव, उतनी ही गति, जितनी की जरूरत है. कई सीन में मुझे चटर्जी में इरफान की झलक दिखाई दी.

असल में, इस फिल्म में कहीं भी कहानी से भटकती नहीं है. जयप्रद देसाई ने बायोपिक में जीवन के हर पहलू को समेटने में थोड़ी ढील नहीं दी होती तो फिल्म और अधिक चुस्त भी हो सकती थी. पर अभी भी आपको कहीं से बोर नहीं करेगी.

लेकिन इस फिल्म का टेक अवे क्या है? टेक अवे है नायक के रूप में, एक कॉमन मैन का उभार. बिना हवा में उड़े, बिना तूफान लाए, बिना माथे पर पत्थर उठाए, बिना प्रॉस्थैटिक और वीएफएक्स के नायक आपके दिल में सहजता से उतर जाता है. आपको अपने मुहल्ले के, अपने बहुत सारे प्रतिभावान खिलाड़ियों की याद आएगी, जो शायद रणजी तक खेल सकते थे, पर नौकरी, परिवार और समाज ने उनको रोक दिया होगा.

प्रवीण तांबे के जीवन की एक ही साध थी, उनको बस एक रणजी मैच खेलना था. उम्र की वजह से उनका चयन रणजी में नहीं हो चुका और तब आया आईपीएल का दौर. राजस्थान रायल्स की तरफ से उनका चयन राहुल द्रविड़ ने 2013 के आइपीएल संस्करण में किया. अपने पहले मैच में पहले ओवर में तांबे ने हैटट्रिक विकेट लेकर रॉयल्स को जीत दिलाई थी. और उस वक्त उनकी उम्र 41 साल की थी.

बाद में वह रणजी में भी चुने गए. और आईपीएल के कई संस्करणों में अलग अलग टीमों से खेले. अभी वह कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम में सपोर्ट स्टाफ में हैं. बेशक, यह फिल्म यह भी स्थापित करती है कि उम्र तो महज एक संख्या और आईपीएल ने देश की बहुत सारी क्रिकेटिंग प्रतिभाओं को उचित स्थान दिलाया है.

जिद और जुनून आखिरकार कैसे कामयाबी भी दिलाती है, यह देखना और प्रेरणा भी हासिल करनी हो तो यह फिल्म देखनी चाहिए.

फिल्मः कौन प्रवीण तांबे?

ओटीटीः डिज्नी+हॉटस्टार

निर्देशकः जयप्रद देसाई

अभिनेताः श्रेयस तलपड़े, अंजलि पाटिल, आशीष विद्यार्थी, परमब्रत चटर्जी, छाया कदम, हेमंत सोनी, अरुण नालावड़े.

Thursday, February 27, 2020

हवा को बांधने वाले उत्साही लड़के की कहानी द बॉय हू हार्नेस्ड द विंड

द बॉय हू हार्नेस्ड द विंड मलावी के एक ऐसे गांव को बचाने वाले लड़के की कहानी है जहां भुखमरी है और भयानक सूखा है. उम्दा अभिनय, शानदार पटकथा और बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी इस फिल्म में दर्शक को अंत तक बांधे रखती है. यह फिल्म एक राजनीतिक टिप्पणी भी है

कुछ फिल्मों को सिर्फ इसलिए भी देखना चाहिए क्योंकि उनमें एक ऐसा संदेश होता है, जो मुश्किल वक्त में भी इंसान को जिंदा रहने की वजहें देती हैं. लेकिन अगर किसी फिल्म में एक मजबूत और प्रेरणास्पद कथाक्रम के साथ ही, शानदार सिनेमैटोग्राफी और बेजोड़ संपादन और उम्दा अभिनय भी हो तो बात ही क्या!

किसी को पता नहीं था कि लेखक-निर्देशक चिवेटेल ज्योफोर अपने पहले ही शाहकार में ऐसा कमाल कर गुजरेंगे. ऐसी कहानी, जिसमें राजनीतिक टिप्पणी है, पर वह लाउड नहीं है, ऐसी कहानी जिसमें त्रासदी है, भूख है, पर वह इंसान को बेचारा साबित नहीं करती. बल्कि तमाम बाधाओं के बीच प्रतिभा के विस्फोट और संसाधन जुटाने की चतुराई के साथ एक पिता और पुत्र के पीड़ाओं के बीच एकदूसरे के साथ खड़े होने की कथा कहती है.

फिल्म में कमाल की किस्सागोई है जिसमें संवेदनशीलता और सहानुभूति दोनों भावनाएं गजब तरीके से पिरोई गई हैं. कहानी में प्रवाह है.

फिल्म द बॉय हू हार्नेस्ड द विंड का वीडियो ग्रैब


असल में, ज्योफोर ने मलावी नाम के देश के एक इंजीनियर विलियम कंक्वाम्बा की असली कहानी को रूपहले परदे के लिए ढाला है और इस कहानी में परत दर परत आप गरीबी, सूखा, गृहयुद्ध और भुखमरी को उघड़ता देखते हैं. मलावी में कथित तौर पर लोकतंत्र आने के बाद राजनैतिक नेतृत्व का रवैया भी उधेड़ा गया है.

फिल्म की शुरुआत एक ऐसे लॉन्ग शॉट से होती है जहां हरी फसल के फोरग्राउंड में मलावी के आदिवासी कबीलों के पारंपरिक वेषभूषा में आते दिखते हैं. इनकी मेहमानवाजी कबीले के सरदार के जिम्मे है. अगले शॉट में मक्के की पकी फसल है जिसकी कटाई के दौरान ही नायक विलियम के दादाजी की मौत हो जाती है. गरीबी से जूझ रहे गांव में हर तरफ सूखा और गरीबी है और निर्देशक आहिस्ते से अपनी बात को शॉट्स के बेहतर संयोजन से बता जाते हैं. विलियम अपने गांव में रेडियो के लिए छोटे विंड टरबाइन के जरिए बिजली का इंतजाम करते हैं. यहां निर्देशक ज्योफोर थोड़ी रचनात्मक छूट लेते हैं, पर ज्योफोर की रचनात्मकता इस सृजनात्मक छूट का औचित्य साबित भी करती है, जो कहानी को दृश्यात्मक बनाने के लिहाज से जरूरी भी थी कि सूखे ग्रस्त गांव में कुआं सूखा नहीं था और उसका पानी खेतों तक पहुंचाने के लिए बड़े पवनचक्की की जरूरत होती है.



हालांकि बड़ी पवनचक्की बनाने के वास्ते विलियम को अपने पिता की एकमात्र पूंजी साइकिल की जरूरत है. और यहीं नायक के साथ पिता के रिश्तों में तनाव आता है. पिता इस नए प्रयोग के लिए न जाने क्यों अपनी साइकिल देने से मना करता है और यह जाने क्यों पुत्र के साथ उसकी प्रतिस्पर्धी भावना है.

इस फिल्म में निर्देशक-लेखक ज्योफोर ने खुद ट्राइवेल (विलियम के पिता) का किरदार निभाया है. यह ऐसा चरित्र है जो एक किसान और पिता के तौर पर दहशत के साए में जीता है. उनके अभिनय में गजब की गहराई है. उनकी आंखों में उनका किरदार दिखता है. उनके पुत्र विलियम के किरदार में मैक्सवेल सिंबा हैं और वह इस फिल्म की जान हैं.

फ्रेम दर फ्रेम आप बगैर किसी संवाद से जबरिया सुझाए बिना जानते जाते हैं कि विलियम का यह गांव गरीबी और भुखमरी से जूझ रहा है. यहां भी जमीन के मालिकान जमीनों के सौदे करने की कोशिश करते हैं. सियासी लोग हमेशा की तरह सनकी, हिंसक और भ्रष्ट दिखाए गए हैं जो एक हद तक सही भी है.

इन सबके बीच विलियम के भीतर तकनीक को लेकर कुदरती रुझान है और स्कूली शिक्षा को सरकार की मदद के अभाव में स्कूल दर स्कूल बंद होते हैं और वहां विलियम स्कूल की लाइब्रेरी की मदद लेता है. वहीं एक किताब से उसे लगता है कि बिजली की मदद से वह गांव को बचा ले जाएगा.

सिंबा अपने अभिनय में परिपक्वता से उभरे हैं और वह बतौर अभिनेता कहीं भी ज्योफोर से उन्नीस नहीं बैठते. फिल्म में हर फ्रेम की लाइटिंग चटख है और आपको बांधे रखती है. सिनेमैटोग्राफर डिक पोप ने रंगों का खास खयाल रखा है.

यह फिल्म हाल ही में नेटफ्लिक्स पर भारतीय दर्शकों के लिए उपलब्ध है. और पूरी फिल्म की कहानी में उतार-चढ़ाव के बीच, हालांकि आपको लगता है कि विलियम आखिर में कामयाब होंगे ही, पर साइकिल के पहिए की मदद से बनी पवनचक्की जब हवा के साथ तेज घूमती है तो आपकी दिल की धड़कनें बढ़ती हैं और कुछेक सेकेंड के सिनेमैटिक साइलेंस के बाद जब कुएं पर लगा और विलियम के बनाए मोटर की पाइप से पानी आने लगता है तो फिल्म के किरदारों के साथ आपका मन में रोमांच में कूदने लग जाने का करने लगेगा.

इस फिल्म की यही कामयाबी है.

हिंसा, भूख, त्रासदियों के दौर में अ बॉय हू हार्नेस्ड द विंड सपने देखने और उन्हें साकार करने की गाथा है.

फिल्मः द बॉय हू हार्नेस्ड द विंड

निर्देशकः चिवेटल ज्योफोर

कहानीः विलियम कम्कवम्बा

पटकथाः चिवेटल ज्योफोर

अभिनेताः मैक्सवेल सिंबा, चिवेटल ज्योफोर

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Friday, July 13, 2018

उम्मीदों और आशाओं का नया पाठ है 102 नॉट आउट

आसानी से कहे जाने वाली इस फिल्म के खत्म होने पर आप थोड़े भावुक हो सकते हैं. लेकिन आपके पास तब जिंदगी को महज बिताने नहीं बल्कि जीने के कुछ गुर होते हैं. 
फिल्म 102 नॉट आउट की कहानी नएपन के साथ जिंदगी जीने का फलसफा देती है .फोटो सौजन्यः गूगल


भारतीय खासकर हिंदी फिल्मों की कई जरूरतों में से सबसे अहम हैः एक निहायत खूबसूरत नायिका. चलिए '102 नॉट आउट' में नायिका तो नहीं है. दूसरी प्रमुख शर्त हैः कई सारे नाटकीय दृश्य. 102... में यह भी नहीं है. गाने, हम्म...नहीं ही हैं. डायलॉगबाजीः नहीं है. नाचगानेः नहीं है. सीरियल किसिंगः नहीं है. मारधाड़ नहीं है. पात्र भी तीन ही हैं. 

तो आखिर क्या है 102 नॉट आउट में!

इसमें अमिताभ हैं. और हैं ऋषि कपूर. दोनों का सर्वोत्कृष्ट अभिनय है. शानदार सिनेमैटोग्रफी है, उम्दा संपादन है. कसी हुई पटकथा और नयापन लिए कहानी है.

'102 नॉट आउट' मुख्यधारा हिंदी सिनेमा के परिपक्वता की ओर बढ़ने का संकेत देने वाली कई फिल्मों में से एक है. फिर भी अलहदा है.

जिंदगी जीने का तरीका हमारी फिल्में पुराने समय से बताई जाती रही हैं. जागते रहो में राज कपूर ने बिना ज्यादा संवादों के यह कहा था और उसी फिल्म में मोतीलाल सड़क पर, जिंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या..कहते हुए फलसफे बता रहे थे.

याद आऩे वाली फिल्मों में ऐसा ही संदेश आनंद ने दिया. मुख्यधारा में थोड़े सतही ढंग से यही कल हो न हो ने कहा...

'102 नॉट आउट' इसी संदेश को थोड़े अलहदा मिजाज के साथ कहती है. 102 साल के पिता और 75 साल के बेटे की कहानी में फिल्म हर दृश्य में ताजा बनी रहती है. हर दृश्य में एक नयापन और एक नए किस्म का प्रयोग है. क्या आपको यह बात दिलचस्प नहीं लगेगी कि सौ साल से अधिक उम्र का बाप अपने बेटे को वृद्धाश्रम सिर्फ इसलिए भेजना चाहता है क्योंकि वह दुनिया में सबसे ज्यादा जीने वाले इंसान का रिकॉर्ड तोड़ना चाहता है. उसे लगता है कि बुजुर्गवार जैसे बरताव वाला उदासीन-सा उसका बेटा माहौल को खुशनुमा नहीं रहने दे रहा.

बाप द्वारा बेटे को वृद्धाश्रम भेजने का यह नायाब आइडिया हमारे आसपास की जिंदगी के छोटे-छोटे प्रसंगों को अपने साथ बुनती चलती है और फिर आपको गुदगुदाती है. नहीं, आप इसे कॉमिडी फिल्म न समझें. यह फिल्म जीवन का उत्सव है. बहरहाल, पुत्र बने ऋषि कपूर वृद्धाश्रम जाने से बचने के लिए पिता की हर शर्त पूरी करते हैं. और उनके जीवन में जिंदगी का रस फिर से प्रवाहित होने लगता है.

मासूम से संवाद. छोटे-छोटे दृश्य...आपको हर सीन के बाद फिल्म में मजा आने लगता है. यह फिल्म मैंने थियेटर में नहीं देखी. मौका निकल गया. अमेजन प्राइम वीडियो पर मैं ने सोचा इसे दो चार बार में देख लूंगा लेकिन फिल्म ने ऐसा बांधा कि फिर मैं उसके तानेबाने (जो कि बेहद सरल हैं) से बाहर ही नहीं निकल पाया.

सोचिए जरा पिता के उस किरदार के बारे में, जो अपने बेटे के सामने एक पौधे में फूल उगाने के लिए पखवाड़े भर की मोहलत देता है. पहले से नाउम्मीदी से घिरा बेटा फिर भी उस पौधे की सेवा करता है, कि फूल खिलेंगे. शर्त लगाने वाला पिता जानता है पखवाड़े भर में फूल नही आएंगे, पर उम्मीद जिंदा रहे इसके लिए वह फूल लगे हुए पौधे वाले गमले को बिना फूल वाले मूल गमले से बदल देता है. पिता-पुत्र का यह रिश्ता हमें क्या एक मजबूत संदेश नहीं देता?
उम्मीदों और आशाओं का नया पाठ है यह फिल्म.

अमिताभ से बेहतरीन अभिनय की तो उम्मीद थी ही, लेकिन हाल तक पूरे बाजू का स्वेटर पहनकर स्विट्जरलैंड की हसीन वादियों में नायिका के साथ बोल राधा बोल करने वाले ऋषि कपूर का आला दर्जे का अभिनय छूता है. फिल्म का शीर्षक पिता के लिए है, पर किरदार में जो गहराई बेटे में है, वह लेखक की सृजनात्मकता का कमाल है. फिल्म की शुरूआत में आपको कंधे झुकाए ऋषि कपूर दिखते हैं जो आखिरी दृश्यों तक आते-आते आत्मविश्वास से भर जाते हैं.

अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर करीब तीन दशक के बाद एक साथ किसी फिल्म में आए हैं. ‘102 नॉट आउट’ में बच्चन से पंगों के अलावा जिमित त्रिवेदी के साथ उनका लव-हेट रिलेशनशिप भी आपको मजा देगा. अपनी भूमिका में त्रिवेदी भी अच्छा अभिनय करते हैं और सिनेमा के दो दिग्गजों की मौजूदगी में भी अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं.

सबसे बड़ी बात कि फिल्म में सिर्फ तीन किरदार हैं. साथ मुंबई भी है. आप उसे भी एक किरदार की तरह देख सकते हैं. असल में यह फिल्म एक नाटक पर आधारित है, जिसे सौम्य जोशी ने लिखा है. सरल होते हुए भी इस फिल्म के संवाद कमाल के हैं.

आसानी से कहे जाने वाली इस फिल्म के खत्म होने पर आप थोड़े भावुक हो सकते हैं. लेकिन आपके पास तब जिंदगी को महज बिताने नहीं बल्कि जीने के कुछ गुर होते हैं.

102 नॉट आउट आज के दौर की सबसे जरूरी फिल्मों में से एक है.

Thursday, June 14, 2018

ओस में गीले हरसिंगार जैसी ताज़ी फिल्म है अक्तूबर

इस सिनेमाई कविता को आप पांच-दस बरस बाद भी देखेंगे तो इसके भाव उतने ही शाश्वत रूप से ताजा होंगे, जितने ओस में गीले खुद हरसिंगार के फूल. 

कभी बहुत खूबसूरत सिनेमाई कविता देखने का मन हो तो आपको फिल्म अक्तूबर देखना चाहिए. फोटो सौजन्यः गूगल


हम कविताएं पढ़ते हैं या सुनते हैं. लेकिन कभी बहुत खूबसूरत सिनेमाई कविता देखने का मन हो तो आपको फिल्म अक्तूबर देखना चाहिए.

प्रेम के प्रकटीकरण के बेहद शोना-बाबू युग में जब प्रेमी-प्रेमिका के वॉट्सऐप पर आए हर मेसेज के जबाव में फौरन से पहले जवाब देना अनिवार्य हो और फेसबुक पर पोस्ट पर दिल चस्पां करना, अक्तूबर बताता है कि प्रेम किस कदर गहरा हो सकता है. समंदर की तरह.

अगर कोई प्रेम के होने या न होने पर संजीदा सवाल उठाए, उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े करे तो उन सौ सवालों का एक जवाब है अक्तूबर.

यह फिल्म असली जिंदगी के ही किसी गहरे प्रेम को इतने सटीक तरीके से परदे पर उकेरता है कि आपको इस नश्वर संसार में प्रेम के शाश्वत होने पर यकीन होने लग जाएगा.

तो इस प्रेम के शाश्वत तत्व क्या हैं? जाहिर है, वेदना, पीड़ा, त्याग और हां, बहुत गहरा अनुराग. अक्तूबर मुक्तिबोध के अंधेरे में की तरह की एक लंबी कविता सरीखा है.

भारत में सिनेमा को लेकर एक कट टू कट हड़बड़ी है. हम एक सीन को नब्बे सेकेंड से ज्यादा बरदाश्त नहीं करते. हम 60 विज्ञापन फिल्मों को एक कथासूत्र में बांध कर एक फीचर फिल्म बनाते हैं. ताकि दर्शक बंधा रहे. हमारे पास कामयाबी का एक मनमोहनी (देसाई) तरीका है, सीन-दर-सीन, नाच-गाना-कॉमिडी-मारधाड़-फिर से गाना-मां-बिछड़ना-मिलना.

अक्तूबर जैसी फिल्में इस समीकरण का एंटी-थीसिस हैं.

अक्तूबर की कहानी को दो मिनट में निपटाया जा सकता है. लेकिन उसकी संवेदनशील कहानी को सीन-दर-सीन विवेचित किया जाए तो एक पूरी किताब लिखनी चाहिए.

हमने हमेशा वरूण धवन को गोविंदा के नक्शे-कदम पर चलते देखा है. लेकिन पहले बदलापुर और फिर अक्तूबर में धवन ने अपने अंदर के असाधारण कलाकार से परिचित कराया है. इस फिल्म की साधारण कहानी हमारे जीवन के किस्सों की तरह ही साधारण है. इसमें खिंचा-खिंचा से रहने वाला होटल प्रबंधन का छात्र डैन है, इसमें कभी कभार उससे बात कर लेने वाली उसकी सहपाठी शिवली है.

शिवली नए साल के उत्सव में शामिल होते वक्त होटल की चौथी मंजिल से गिर जाती है. बुरी तरह जख्मी शिवली कोमा में चली जाती है. गिरने से पहले उसने आखिरी सवाल अपनी दोस्त से डैन के बारे में पूछा होता हैः डैन कहां है? और, यह सवाल डैन की जिंदगी बदल देता है.

अक्तूबर को देखेंगे तो शिवली और डैन के अलावा आपको कड़क मिज़ाज बॉस का किरदार दिखेगा, जिसकी वजह से आपको डैन के किरदार के अलग अलग शेड्स दिखते हैं, जिसकी वजह से डैन के किरदार की परतें खुलती हैं.

फिर आपको अस्पताल के चक्कर काटते डैन और शिवली की मां के बीच पनपता एक ममतामय रिश्ता नजर आएगा. डैन और उसके दुनियादार दोस्तों के बीच की कैमिस्ट्री नजर आएगी. आप फ्रेम दर फ्रेम इस फिल्म के क्राफ्ट से मुत्तास्सिर होते जाएंगे.

इस फिल्म का क्राफ्ट आम हिंदी फिल्मों के क्राफ्ट से बेहद अलहदा है. इसके संपादन में एक रिदम है, गति है, लय है. अविक मुखोपाध्याय की सिनेमैटोग्राफी में ओस से गीले हरसिंगार के फूल, मकड़ी के जाले, बोगनवेलिया एक काव्यात्मकता रचते हैं. खूबसूरत लगता हर फ्रेम फिल्मी रूप से नाटकीय नहीं बल्कि इतना वास्तविक है कि मन करेगा कि फ्रेम को अपने कंप्यूटर का स्क्रीनसेवर बना लें.

लेकिन इन्हीं दृश्यों से एक उदासी सृजित होती जाती है. फिर पहाड़ हैं. उनमें जंगलों से निकलता सूरज है, उसकी किरनें हैं, नदी है. और हर फ्रेम में अपनी अदाकारी से आपको आश्वस्त करते वरूण धवन हैं.

अक्तूबर बिस्तर पर पड़े मरीजों की देखभाल में लगे लोगों के त्याग का अनकहा पाठ है और कुछ असंवेदनशील लोगो पर टिप्पणी भी.

नायिक बनिता संधू (शिवली) फिल्म में ज्यादातर वक्त बिस्तर पर मृतप्राय अवस्था में बिताती दिखती हैं. उनके पास विकल्प कम थे पर उनकी आंखें अद्भुत रूप से संप्रेषणीय हैं.

हमें न तो बनिता का नाम जानने की जल्दी होती है न फिल्म खत्म होने के बाद हमें वरूण धवन याद रहते हैं. हमें बस शिवली याद होती है और याद रहता है डैन.

इस सिनेमाई कविता को आप पांच-दस बरस बाद भी देखेंगे तो इसके भाव उतने ही शाश्वत रूप से ताजा होंगे, जितने ओस में गीले खुद हरसिंगार के फूल. 


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Monday, June 11, 2018

फिल्म परमाणु में भाजपा का झंडा लहराता है

गरमी की छुट्टियां चल रही थीं तो मेरे बेटे ने जिद की कि वह फिल्म देखना चाहता है. मुझे इनफिनिटी वॉर नाम की फिल्म दिखाने का इसरार वह कर रहा था और मैं कत्तई इस मूड में नहीं था कि मैं तीन घंटे सिनेमा हॉल में बोर होकर आऊं.

मुझे विलक्षण मार-धाड़ वाली फिल्में बोर करती हैं.

बहरहाल, यह पृष्ठभूमि थी फिल्म परमाणु देखने की. यह पोकरण परमाणु परीक्षणों पर आधारित है. मैं चूंकि खुद पोकरण जा चुका हूं और डॉक्युमेंट्री भी बनाई है इस विषय पर, तो मुझे लगा कि देखना चाहिए कि इसमें कितनी सच्चाई है और कितना मसाला निर्देशक ने डाला है.

रुस के विघटन के बाद भारत को अंतराराष्ट्रीय स्तर पर घेरने की कोशिश हो रही थी, चीन और अमेरिका पाकिस्तान के पीछे रणनीतिक रूप से गोलबंद थे. उन दिनों किस तरह से यह परमाणु परीक्षण हुए वह अपने आप में हम सब के लिए गर्व का विषय तो है ही. तब बुद्ध फिर से मुस्कुराए थे.

किस तरह भारतीय वैज्ञानिकों और परीक्षण की तैयारी कर रहे दल ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था उसे ही इस फिल्म की थीम बनाया गया है. मुझे इन सब पर कुछ और नहीं लिखना है क्योंकि अब तक आप लोगों ने यह फिल्म देख ली होगी या उस पर पढ़ भी लिय़ा होगा.

असल में लेखकों और निर्देशक के सामने बड़ी चुनौती यह थी कि वह कैसे इस विषय को एक वृत्त चित्र होने से बचाएं और कहानी में दर्शकों की दिलचस्पी बरकरार रखें. क्योंकि फिल्म के क्लाइमेक्स का भी सबको पता था ही. उसके बाद काल्पनिक किरदार जोड़े गए. लेकिन अश्वत रैना का किरदार तो ठीक है पर उसके परिवार से जुड़ी कहानी का फिल्म की कहानी से कोई मेल नहीं होता.

मसलन, अश्वत रैना की पत्नी को पहली बार नाकाम परीक्षणों के बाद यह तो पता रहता है कि अश्वत सिविल सेवा अधिकारी है, और वह किसी खास एटमी मिशन से जुड़ा है. मिशन फेल होने के बाद वह अश्वत की नौकरी चले जाने की बात भी जानती है. लेकिन वही पत्नी, जो संयोग से खुद एक खगोलशास्त्री है, कहानी के उतरार्ध में पति के मिशन से अनजान रहती है और पाकिस्तानी खुफिया एजेंटो के झांसे में आ जाती है. यह बात एकदम से पचती नहीं.

दूसरी बात, जॉन अब्राहम के डोले-शोले एक दम वैसे ही हैं जैसे दूसरी फिल्मों में होते हैं. अब उनसे दुबला कोई पाकिस्तानी जासूस उनको पीटता रहे और वह एक थप्पड़ भी न मार पाएं, यह हजम नहीं होता.

फिल्म में एक बात और अखरती है कि आर चिदंबरम से लेकर अनिल काकोडकर और एपीजे अब्दुल कलाम तक, सारे वैज्ञानिकों को तकरीबन हास्यास्पद दिखाया गया है, जो छोटी बातों के लिए शिकायत करते और गुस्सा होते दिखते हैं. मसलन, रेगिस्तान में काम करने की शिकायत, धूल धूप और गरमी की शिकायत. और इतने फूहड़ की गोलगप्पे खाते हुए जासूसों के सामने अश्वत रैना का राज़ उगल देते हैं. ऐसा नहीं हुआ था. और एपीजे अब्दुल कलाम जिस तरह से दिखाए गए हैं कि वह हमेशा कुछ न कुछ खाते रहते हैं यह भी गलत है और हां, वह उस वक्त डीआरडीओ में थे और प्रधानमंत्री के रक्षा सलाहकार भी थे. फिल्म उनको इसरो में काम करने वाला वैज्ञानिक बताती है.

डायना पैंटी खूबसूरत लगी हैं और शायद उनको सिर्फ इसीलिए फिल्म में लिया भी गया. यक्षवा पूछ रहा है कि पैंटी की जरूरत ही क्या थी फिल्म में. लेखकों ने खुफिया एजेंसी रॉ का एक तरह का मजाक उड़ाया है क्योंकि अश्वत के गेस्ट हाउस में पाकिस्तानी और अमेरिकी जासूस खुले आम आते-जाते हैं सवाल है कि तब रॉ के लोग क्या कर रहे होते हैं, यह पता नहीं चलता. इतने बडे ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तानी जासूस सारे रास्ते पर भाग रहा होता है, रॉ कुछ नहीं करती. पाकिस्तानी जासूस रैना के घर में जाकर ट्रांसमीटर लगा देते हैं, फोन टैप कर लेते हैं और रॉ कुछ नहीं करती.

इंटरवल के बाद फिल्म जरूर रफ्तार पकड़ती है जब पाकिस्तानी और अमेरिकी जासूस पोकरण में रह कर इस बात को पकड़ लेते हैं कि भारत परमाणु परीक्षण करने जा रहा है. यहां पर थ्रिल पैदा होता है. क्लाइमैक्स अच्छे से लिखा गया है और दर्शक सिनेमाहॉल छोड़ते समय अच्छी फिलिंग लेकर निकलते हैं और लेखक यहां पर कामयाब हुए हैं.

निर्देशक अभिषेक शर्मा की फिल्म बेहतर विषय पर बनी हुई है, संपादन भी कसा हुआ है. और इसमें जॉन अब्राहम का भावहीन सपाट चेहरा भी नहीं खलता. देशभक्ति के लिए यहां छाती नहीं ठोंकी गई. पूरी फिल्म में सिर्फ एक बार तिरंगे का इस्तेमाल हुआ है. पर अगर आपमें गौर से देखने की क्षमता और इच्छा हो तो देखिएगा, पूरी फिल्म में कम से कम तीन दफा दूर पृष्ठभूमि में भाजपा का चुनावी झंडा लहरा रहा होता है.

भरोसा नहीं, तो खुद देख लीजिएगा.



Wednesday, October 12, 2016

एम एस धोनीः द अनटोल्ड स्टोरी की लेट-लतीफ समीक्षा

मुझे क्रिकेट पसंद है और धोनी भी। ऐसे में मुझे एस एम धोनीः द अनटोल्ड स्टोरी तो देखनी ही थी। मैंने फिल्म देर से देखी, और कायदे से देखी।

महेन्द्र सिंह धोनी, में अभी क्रिकेट काफी बाकी है और उनका स्टारडम खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में उन पर बनने वाली बायोपिक के रिलीज़ का यही सही वक्त है। मैं शर्तिया कह सकता हूं कि सचिन पर बने बायोपिक से बाजा़र सौ करोड़ कमाकर नहीं देगा।

बहरहाल, इस कमाऊ फ़िल्म से आप शिल्प और कला पक्ष की उम्मीद न करें, तो बेहतर। यह महेन्द्र सिंह धोनी के जीवन पर आधारित एक मनोरंजक फिल्म है, जिसकी पटकथा का बड़ा हिस्सा सतही है। धोनी का किरदार नीरज पांडे कायदे से रजत पट पर उकेर नहीं पाए हैं। जबकि, हमारी उम्मीदें उस निर्देशक से हद से ज्यादा थीं जिन्होंने इससे पहले अ वैडनेसडे और स्पेशल छब्बीस जैसी फिल्में दी हैं।

इस फिल्म को बायोपिक कहना गलत होगा क्योंकि धोनी की जिंदगी को यह कुछ बारीकी से पेश नहीं कर पाई है। जो बारीकी आपने भाग मिल्खा भाग या मैरी कॉम में देखी होगी, या पान सिंह तोमर में, वह सूक्ष्मता इस फिल्म से नदारद है। खबरें हैं कि नीरज पांडे ने शूट तो बहुत किया था, लेकिन धोनी ने फिल्म देखकर कट लगावा दिए। इस खबर की सच्चाई का कोई सुबूत नहीं है। सिवाय, इस बात के कि इंटरवल के बाद फिल्म में झटके आने शुरू हो जाते हैं और अलाय-बलाय शॉट और सीक्वेंस आते हैं।

जब नाम में लिखा हो अनटोल्ड स्टोरी, तो हम धोनी की जिंदगी के अनछुए पहलुओं से रू ब रू होने की उम्मीद बांधते हैं। एक हद तक पहले एक घंटे में यही सब होता है। धोनी के बचपन की कहानी दिलचल्प भी है और प्रेरणादायी भी।

फिल्म की शुरूआत बेहतरीन है। विश्वकप 2011 के फाइनल के मुसीबत भरे क्षणों से शुरू हुई इस फिल्म को फ्लैश-बैक तकनीक में फिल्माया गया है। दृश्य ड्रेसिंग रूम का है। अचानक धोनी फैसला लेते हैं कि युवराज की बजाय वे बल्लेबाजी के लिए जाएंगे।

यह सीन फिल्म का मूड सेट कर देता है। इसके बाद फिल्म सीधे 30 साल पीछे जाकर धोनी के जन्म से शुरू होती है। इसके बाद धोनी किस तरह क्रिकेट की दुनिया में धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाते हैं, उनके इस सफर को दिखाया गया है।

यह कहानी बताती है कि शुरू में धोनी फुटबॉलर थे, कि उन्हें क्रिकेट में रूचि नहीं थी, कि वह गोलकीपर थे, कि जब वह अच्छा खेलते थे स्कूल में छुट्टी हो जाती थी। यह फिल्म यह स्थापित करती है कि धोनी को धोनी बनाने में उनकी मां और उनके दोस्तों का कितना भारी योगदान है।

फिल्म बताती है कि धोनी, सचिन के भारी फैन थे, कि एक मैच में उनका युवराज सिंह से दिलचस्प तरीके से सामना होता है। कूचबिहार ट्रॉफी के दौरान युवराज सिंह से धोनी का सामना होता है। और खास बात यह कि युवराज के किरदार में हैरी टंगड़ी जबरदस्त लगे हैं। क्या देह-भाषा, क्या लाजवाब एंट्री...। वाह।

यहां आकर फिल्मकार स्थापित कर देता है कि बड़े शहरों के बच्चों की केयरलेस एट्टीट्यूड से कैसे छोटे शहरों के बच्चे धराशायी हो जाते हैं। यह फिल्म यह भी बताती है कि धोनी ने हेलिकॉप्टर शॉट लगाना अपने दोस्त संतोष लाल से सीखा था। संतोष इसे थप्पड़ शॉट कहते थे। लेकिन फिल्म में यह बात मिसिंग लिंक की तरह है। अगर धोनी हेलिकॉप्टर शॉट लगाना सीखते दिखाए गए हैं तो किसी मैच में उस शॉट को खेलते भी दिखाना चाहिए था।

फिल्म हमें बताती है कि दलीप ट्रॉफी में धोनी विमान मिस कर देते हैं। वहीं फिल्मकार किरदार उभारने में यह सीन भी रख सकते हैं कि बाद में उनके बड़े बनने के बाद विमान ने उनका इंतजार भी किया था। लेकिन यह मिसिंग है।

नीरज पांडे ने फिल्म को रियल लोकेशन पर शूट किया है इससे फिल्म विश्वनीय दिखती है। खासकर, धोनी के बचपन का घर, उनकी मां (बहुत शानदार सरलता के साथ) उनकी बहनों के साथ बरताव...सब कुछ नीरज पांडे शैली में विश्वसनीय है। लेकिन फिल्म में कहीं भी धोनी के भाई नरेन्द्र सिंह धोनी का जिक्र भी नहीं। क्यों...यह तो नीरज पांडे ही बता पाएंगे या फिर खुद धोनी।

टीसी की नौकरी में धोनी की कुंठा को अच्छे से दिखाया है जब वह पूरा दिन रेलवे प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हैं और शाम को मैदान में पसीना बहाते हैं। उसका टीम में चयन नहीं होता तो वह रात में टेनिस बॉल से खेले जाने वाले टूर्नामेंट में खेल कर अपने गुस्से को बाहर निकालता है। एक दिन दिल की बात सुन कर वह नौकरी छोड़ देता है।

धोनी के मन का यह फ्रस्टेशन फिल्माने में नीरज पांडे पूरी तरह कामयाब हुए हैं और इन क्षणों को जीवंत करने कि लिए सुशांत सिंह बधाई के पात्र हैं। फिल्म में धोनी की जद्दोजहद को बखूबी उभारा गया है। कई छोटे-छोटे दृश्य प्रभावी हैं। धोनी के अच्छे इंसान होने के गुण भी इन दृश्यों से सामने आते हैं। लेकिन आह, इंटरवल के बाद फिल्म लड़खड़ाने लगती है।

लेकिन, फिल्म कहीं से भी धोनी के कैप्टन कूल स्थापित नहीं करती। हम फिल्म में प्रायः धोनी को टूटते, रोते और रुआंसा होते देखते हैं। चाहे विमान छूटने की घटना हो या टीम में चयन नहीं होने की खबर हो या फिर पहली प्रेमिका प्रियंका झा की मौत की खबर। लेकिन मैदान पर हमेशा भावनाविहीन और संतुलित कप्तान वह कैसे बने रहते हैं इसका कहीं जिक्र नहीं, कोई उल्लेख नहीं।

दर्शकों की उत्सुकता यह जानने में रहती है कि ड्रेसिंग रूम के अंदर क्या होता था? धोनी किस तरह से बतौर कप्तान अपनी रणनीति बनाते थे? करोड़ों उम्मीद का तनाव 'कैप्टन कूल' किस तरह झेलते थे? अपने खिलाड़ियों के साथ किस तरह व्यवहार करते थे? उन्हें क्या टिप्स देते थे? सीनियर खिलाड़ियों को कैसे नियंत्रित करते थे? सीनियर खिलाड़ियों को टीम से बाहर करने का जिक्र एक बार जरूर आता है, लेकिन बिना किसी रेफरेंस के।

धोनी के कत्पान बनने का ब्योरा गायब है, फिर टेस्ट में नंबर एक टीम बनने का कहीं उल्लेख नहीं। टी-ट्वेंटी में फाइनल जीत है लेकिन उसकी तैयारियां...वह कहां हैं? याद कीजिए भाग मिल्खा भाग...उस फिल्म में योगराज सिंह के साथ फरहान अख्तर की ट्रैनिंग के दृश्य और जोशीले गीत से क्या आपका एड्रेनलिन नहीं बढ़ गया था?

फिल्म में कुछ दृश्य बेवजह लगते हैं। मसलन, धोनी से मिलने आए उनके टीसी दोस्त का होटल में आना। उस सीन को कोई रेफरेंस नहीं मिलता और आने की वजह से किरदार या फिल्म आगे बढ़ती हो, इसके सुबूत भी हासिल नहीं होते।

फिल्म तीन घंटे से भी ज्यादा लंबी है फिर भी ज्यादातर वक्त दर्शकों को बांधे रखती है। बीच-बीच में ऐसे कई दृश्य हैं जो धोनी के फैंस को सीटी और ताली बजाने पर मजबूर कर देते हैं। धोनी के जीवन में परिवार, दोस्त, प्रशिक्षक और रेलवे में काम करने वाले उनके साथियों का कितना महत्वपूर्ण योगदान रहा है इस बात को उन्होंने अच्छे से रेखांकित किया है।

आमतौर पर फिल्मों में खेल वाले दृश्य कमजोर पड़ जाते हैं, लेकिन इस मामले में फिल्म बेहतरीन है। सुशांत सिंह राजपूत पूरी तरह क्रिकेटर लगते हैं। हालांकि तकनीकी रूप से कुछ खामियां भी हैं जैसे धोनी को कम उम्र में रिवर्स स्वीप मारते दिखाया गया है। उस समय शायद ही कोई यह शॉट खेलता हो और खुद धोनी भी यह शॉट खेलना पसंद नहीं करते हैं।

एक्टिंग के मामले में फिल्म लाजवाब है। सुशांत सिंह राजपूत में पहली फ्रेम से ही धोनी दिखाई देने लगते हैं। बॉडी लैंग्वेज में उन्होंने धोनी को हूबहू कॉपी किया है। क्रिकेट खेलते वक्त वे एक क्रिकेटर नजर आएं। इमोशनल और ड्रामेटिक सीन में भी उनका अभिनय देखने लायक है।

जो भी हो, फिल्म में इंटरवल के बाद बारीक ब्योरों की कमी है फिर भी फिल्म मनोरंजक है। भारतीय फिल्मों में शायद यह पहली फिल्म है जिसने बिना किसी खान के सौ करोड़ की कमाई का बुलंद आंकड़ा छुआ है। जाहिर है, धोनी की स्टार हैसियत किसी खान से कम नहीं।

अनुपम खेर, भूमिका चावला, कुमुद मिश्रा, राजेश शर्मा, दिशा पटानी, किआरा आडवाणी ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है।

महेंद्र सिंह धोनी हमारी पीढ़ी के क्रिकेटर हैं। उनने हमें गर्व के कई मौके दिए हैं और फिल्म में उन्हें दोबारा जीना बहुत अच्छा लगता है। कलात्मकता के तौर पर फिल्म से ज्यादा कुछ हासिल नहीं होगा, लेकिन बायोपिक की विधा में बावजूद कई खामियो के यह फिल्म (कमाई के मामले में) मील का पत्थर है।

Tuesday, June 21, 2016

उड़ता पंजाब की लेट समीक्षा

मैं समाचारों की दुनिया से जुड़ा हूं तो जाहिर है 'उड़ता पंजाब' को लेकर चल रही हर ख़बर पर मेरी नज़र थी। पिछले कुछ सालों में इससे अधिक चर्चा में कोई भी फिल्म नहीं रही थी।

जहां तक अश्लीलता की बात है, यह फिल्म मस्तीज़ादे या हेट स्टोरी जैसी फिल्मों से कम और टीवी पर चल रहे कई कॉमिडी शोज़ से--जिसमें कॉमेडियन द्विअर्थी संवादो के ज़रिए भद्देी बातें करते हैं--कम अश्लील है

आप चाहें इस फिल्म का लाख डॉक्यू-ड्रामा कह लें, क्योंकि फिल्म देखने से पहले मेरे कई साथियों ने मुझे आगाह किया था, लेकिन फिल्म में एक साथ चार किरदारों की कहानियां चलती हैं। और उन सबको एक साथ जोड़ता है ड्रग्स।

अभिषेक चौबे के इस उड़ते पंजाब में न तो भांगड़ा-गिद्धा है न हरे-भरे खेतों में रंगीन चुनर उड़ाती मक्के दी रोटी और सरसों का साग और लस्सी वाले पंजाबी खुशहाल किसान है। यह हरित क्रांति के दौर में बनी पंजाब की पुख्ता छवि तो तार-तार करने वाली फिल्म है। उड़ता पंजाब का पंजाब पॉप्युलर कल्चर की नजर से अब तक ओझल रहा पंजाब है।

शाहिद कपूर के लिए कहना होगा कि वह अपनी हर अगली फिल्म के साथ निखरते जा रहे हैं। उनके इमोशनल आर्क पर लेखक और निर्देशक ने खास ध्यान दिया है। हर अगले दृश्य के साथ टॉमी सिंह बने शाहिद कपूर की उलझने साफ उनके चेहरे पर दिखती हैं। आज के मुख्य धारा के नायकों में शाहिद ने अपनी अलग पहचान बना ली है, जिसमें उनकी अच्छी एक्टिंग का कमाल है। आखिर उन्हें एक्टिंग विरासत में जो मिली है (लेकिन हर एक्टर के लिए यह सही नहीं है)

सबसे सहज लगे हैं दलजीत दोसांझ, जो इस फिल्म में एएसआई की भूमिका में हैं। पंजाबी स्थानीयता उनके चेहरे पर साफ दिखती है और लगता नहीं कि वह एक्टिंग कर रहे हों।

तारीफ करनी होगी आलिया भट्ट की। अपनी शहरी देहभाषा और ज़बान के बावजूद वह बिहारन मजदूर के किरदार में ढल गई हैं। ग्लैमरविहीन किरदार में आलिया का यह अवतार अच्छा लगता है। और याद आता है कि किस तरह फिल्म प्रहार में नाना पाटेकर माधुरी दीक्षित को बिना मेकअप परदे पर लाए थे।

लेकिन आलिया भट्ट कई जगह बेहद लाउड हैं, देहभाषा में भी और संवाद अदायगी में भी। यह खलता है। उन्हें यह सब सीखना होगा।

फिल्म में करीना कपूर भी हैं, जिनका किरदार पूरे फिल्म में अंडर प्ले ही रह जाता है। दलजीत और करीना के बीच पैदा हुए प्रेम को परदे पर निर्देशक कायदे से उकेर नहीं पाए हैं। इसलिए जब भी कहानी डॉ प्रीत और सरताज के प्रेम पर आती है, तो फिल्म थोड़ी बिखरी हुई लगती है।

उड़ता पंजाब की कहानी उस पंजाब की कहानी है, जो हम लोग परदे पर नहीं आम जनजीवन में देखते हैं। यह वही कहानी है, जिसकी वजह से बठिंडा से बीकानेर तक जाने वाली ट्रेन कैंसर एक्सप्रेस में बदल जाती है। यही वह कहानी है जिसकी वजह से यह एक राजनीतिक मुद्दा बनना चाहिए लेकिन बन नहीं पाता। फिल्म उस गहरे सियासी चक्र को छूती तो है लेकिन उसको खोलती नहीं है।

अभिषेक चौबे की इस फिल्म को हालांकि सराहना बहुत मिल रही है, संपादन और संगीत दुरुस्त है, कहानी में रिसर्च तगड़ा है, लेकिन गैंग्स ऑफ वासेपुर वाली बात इसमें बन नहीं पाई है। अधिकतर संवाद पंजाबी में हैं, जो स्वाभाविक ही है, और इस वजह से  खांटी हिन्दी वालों को शायद संवाद समझने में मुश्किलें हों।

सेंसर बोर्ड के साथ विवाद की वजह से इस फिल्म को अधिक हवा मिल गई लेकिन ऐसा कुछ भी इस फिल्म के साथ नहीं जो असाधारण है। कुल मिलाकर फिल्म अच्छी है, और बढ़िया विषय पर सलीके से बनी हुई फिल्म है। इसमें सियासी दांवपेंच खोजना अच्छा नहीं है न सियासत के लिए न सिनेमा के लिए।

मंजीत ठाकुर

Friday, December 4, 2015

जिसे ढूंढा ज़माने में मुझी में थाः तमाशा

इससे पहले कि आप किसी नामी-गिरामी फिल्म समीक्षकों की समीक्षा को आधार बनाते हुए मेरी पसंद पर लानतें भेंजे, मेरी पहली बात; पिछले पांच साल में बनी किसी भी फिल्म से बेहतर ओपनिंग क्रेडिट है फिल्म ‘तमाशा’ का। और हां, मैं ग्राफिक्स की बात नहीं कर रहा। मेरे कहने का मतलब ओपनिंग सीक्वेंस से भी है।
‘तमाशा’ उन लोगों के लिए बनी हुई फिल्म नहीं है, जिनको चार ट्रॉली और तीन क्रेन शॉट पर एक पूरा गाना फिल्मा लिए जाने में कोई बुराई नज़र नहीं आती लेकिन कायदे की बना हुई फिल्म की कहानी को वह बिखरी हुई कहानी कहने से पहले सांस तक नहीं लेते।

‘तमाशा’ सलीके से बुनी हुई और बनी हुई बेहतर फिल्म है जिसमें कम से कम तीन अदाकारों ने जान फूंक दी है। रनबीर, दीपिका और पीय़ूष मिश्रा।

‘तमाशा’ देखेंगे तो कई दफ़ा लगेगा आपको कि यह ‘रॉकस्टार’ और ‘जब वी मेट’ के बीच की फिल्म है। या कहीं न कहीं इसमें ‘लव आजकल’ की सोच भी है।

लेकिन इस फिल्म के संपादन और इसको रचने के क्राफ्ट से मेरे मुंह से कई बार वाह निकला। किसी को इनकार नहीं होगा कि ‘तमाशा’ जरा अलग तरह के प्यार का किस्सा है। उस तरह का प्यार, जिसमें प्रेमी एक-दूसरे को चाहते भी हैं और दुनिया को और खुद को ये जताना चाहते हैं कि प्यार नहीं भी है।

तमाम दुनियावी बातों के बीच यह फिल्म हमसे कहती है कि हमें वही काम करना चाहिए, जिसके लिए हम पैदा हुए हैं। यह बात भी सौ टका सच है कि हम सब किसी खास काम के लिए बने हैं। यह फिल्म मीडियोक्रिटी के खिलाफ फतवा है।

इस फिल्म की सिनेमैटोग्राफी जबरदस्त है और मैं इरशाद कामिल के गीतों को बोल शानदार है। इरशाद कामिल और नीलेश मिसरा इस दौर के सबसे बेहतरीन गीतकार हैं। इरशाद कामिल के गीत नई कविता सरीखे हैं तो नीलेश में ग़ज़लग़ो वाली नज़ाकत और नफ़ासत है।

‘तमाशा’ हमारे भीतर के वजूद को आवाज़ लगाने वाली फिल्म है। जो आपके भीतर होता है उसी को आप बाहर ढूंढ़ते हैं। यह फिल्म ‘हीर तो बड़ी सैड है’ कहते हुए भी एक बड़ी कंपनी में उसके विकास को दिखाती है, कि जिन पलों में हमारी हीर को सबसे ज्यादा खुश होना चाहिए, वह सैड है। काहे कि, वह अपना दिल तो कोर्सिका में ही भूल आई है।

‘तमाशा’ हमसे कहती है कि आप करिअर और समाज की बंदिशों की वजह से महज एक रोबोट या पालतू शख्स में तब्दील न हो जाएं। फिल्म की शुरूआत में ही रोबोट और उसकी छाती पर लाल रंग का बना हुआ दिल होता है। मैं इस फिल्म के शानदार संपादन के लिए निर्देशक और संपादक का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं, क्योंकि हाल ही में एक फिल्म आई थी ‘कागज़ के फूल्स’ जिसके एक ही दृश्य में, एक ही किरदार ने दूसरे किरदार को दो बार दो अलग नामों से पुकारा था। भरोसा न हो, तो इसके उस सीन को देखिए जिसमें विनय पाठक प्रकाशक के यहां अपनी किताब पर प्रतिक्रिया लेने जाते हैं। पहले संवाद में जो शख्स बनर्जी होता है दूसरे संवाद में वह श्रीवास्तव हो जाता है।

बहरहाल, ‘तमाशा’ इन ज्यादातर सिनेमाई खामियों से दूर है।

‘तमाशा’ एक विचार के तौर पर दुनिया की हर कहानी को हर जगह पाई जाने वाली कहानी के तौर पर पेश करता है। आप अगर गौर से देखें तो पाएंगे कि वेद के किरदार के मनोविज्ञान को निर्देशक ने बहुत गहराई से पकड़ा है। अंदर का ज्वालामुखी, फटने को बेताब ज्वालामुखी। बहुत कुछ ‘रॉकस्टार’ के नायक-सा है वेद।

आखिरी दृश्यों में आप देखेंगे कि नायक अपने अवचेतन में बसे सभी बाधाओं को पार करता है, और हर दृश्य में उसके साथ एक जोकर होता है। जिन जिन जगहों की, गणित की, स्कूल की, इंजीनियरिंग के बोझिल कॉलेज की गांठ उसके मन में थी, वह खुल जाती है। वह जो होना चाहता है, हो जाता है।

नायिका के कहने पर, और याद दिलाने पर कि तुम्हारे अंदर की प्रतिभा दुनिया के मीडियोक्रिटी पर जोर देने की वजह से कुंद हो गई है, नायक खुद की तलाश में निकलता है। वह उसी क़िस्सागो के पास जाता है जो बचपन से उसे कहानियां सुनाता आया है। उसके कहानी कहने का तरीक़ा इम्तियाज़ी है। क़िस्सागो अलहदा क़िस्सों को दुनिया के हर हिस्से की कहानी के तौर पर पेश करता है जिसके लिए रोमियो-जूलियट और हीर-रांझा और सोहिनी-महिवाल में ज्यादा फर्क़ नहीं है। वेद यह पूछता है कि आखिर उसकी खुद की कहानी का अंत क्या है। किस्सागो उसके बाद जो कहता है, वह सूफी परंपरा का आधार है। वह कहता है अनलहक-अनलहक। गुस्से में किस्सागो वेद से कहता है तू अपनी कहानी का अंत मुझसे क्यों पूछता है, खुद क्यों नहीं तय करता?

सच ही तो है हम अपनी कहानियों का क्लाइमेक्स किसी और को तय करने क्यों देते हैं। हम सबकी अपनी जिंदगियों की कहानी में ट्विस्ट कोई और क्यों लाता है...हमारी जिंदगी के फ़ैसले कोई और क्यों लेता है।

तमाशा हमारे खुद के वजूद के तलाश को उकसाने वाली ऐसी कविता है जिसे इम्तियाज़ ने परदे पर रचा है।

मुझे इस बात की कत्तई परवाह नहीं है कि भारत के दर्शक इस फिल्म को कितनी कलेक्शन करवाते हैं, लेकिन जिनको सिनेमाई कला की समझ है, या जो इसके शिल्प को समझना चाहते हैं, उनके लिए यह जरूरी फिल्म है।

Tuesday, August 25, 2015

जबरजस्त, जिन्दाबाद...नवाज़!!

मुझे यह कहने में क़त्तई गुरेज़ नहीं कि मांझी पूरी तरह नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी की फ़िल्म है। केतन मेहता निर्देशक हैं जरूर, लेकिन यह फिल्म पूरी तरह नवाज़ की है।

इस फिल्म के ही बहाने दशरथ मांझी अचानक चर्चा में आ गए हैं। गहलौर चर्चा में आ गया है। नवाज़ तो खैर फिल्म कहानी के बाद से अपनी हर फिल्म की वजह से चर्चा में रहते ही हैं, चाहे किक हो, लंचबॉक्स हो या फिर बजरंगी भाईजान...लेकिन अब तो लोग उनकी पुरानी फिल्में देखकर उनकी भी चर्चा करने लगे हैं। मिसाल के तौर पर, सरफरोश में वह 45 सेकेन्ड की भूमिका में थे, पीपली लाइव में थे...शॉर्ट फिल्म बाईपास में थे।

नवाज़ अपनी हर अगली फिल्म के साथ निखरते जाते हैं, और इस बिनाह पर कहें तो हैरत की बात नहीं कि मांझी उनकी अब तक की सबसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म है।

फिल्म शुरू होते ही आप ख़ून से लथपथ नवाज़ को देखते हैं जो सीधे पहाड़ को ललकारता है। फिर आप पत्थरों पर हथौड़े पड़ते देखते हैं। फिर ज़मींदार के उत्पीड़न, पत्रकारिता को देखते हैं। कहानी के साथ आप बहते जाते हैं। मेहता को यह सब करना ही था, क्योंकि 22 साल के दौर में बिहार में जो कुछ हुआ, उसे दर्ज किए बगैर यह फिल्म पूरी ही नहीं हो सकती थी। इस लिहाज़ से यह बहुत जरूरी फिल्म है।

एक बार फिर मैं यह कह रहा हूं कि बेहद शानदार यह फिल्म, सिर्फ नवाज़ की है। थोड़ी बहुत राधिका आप्टे की है। तिग्मांशु धूलिया और पंकज त्रिपाठी में गैंग्स ऑफ वासेपुर की छाप है और दोनों ही अभी तक उसके हैंगओवर से बाहर नहीं निकल पाए हैं।

जाति प्रथा पर चोट करती हुई यह फिल्म मारक लगती है। लेकिन मुसहरों का कोई बड़ा रेफरेंस नहीं देती है। अब बिहार-पूर्वी यूपी के अलावा बाकी देश और विदेश के लोगों को मुसहरों का व्यापक संदर्भ नहीं मिल पाता। सिर्फ इतना रजिस्टर हो पाता है कि मुसहर एक अछूत जाति है।
तो यह फिल्म इसके कलाकारों और दशरथ मांझी की है। लेकिन यह फिल्म केतन मेहता की नहीं है। फिल्म शुरू होते वक्त अधूरा लगता है और बिना किसी संदर्भ के शुरू हो जाता है। (यह निजी अहसास है) कैमरा पहाड़ को उसकी विशालता में क़ैद तो करता है लेकिन निर्देशक बारीकी में पिछड़ जाते हैं। मिसाल के तौर पर, सन् 1975 में भारतीय रेल का कोई डब्बा नीला नहीं था। पूरे देश में रेल के डब्बे सिर्फ लाल रंग के होते थे।

तब, यानी 1975 में जब मांझी इंदिरा गांधी से मिलने दिल्ली जा रहे होते हैं, तो रेल के भीतर तीसरे (या दूसरे?) दर्जे की साफ-सफाई भी अचंभित करती है। वह जाहिर है, वज़ीरगंज में चढ़ रहे थे लेकिन...चलिए इतनी साफ-सुथरी रेल से बिहारवासियों को ईर्ष्या हो सकती है।

जमीन्दार वाले कुछ दृश्य ढीले हैं और उसमें और कसावट लाई जा सकती थी।

लेकिन, केतन मेहता की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने नवाज़ुद्दीन के मोहब्बत के अंदाज़ को एकदम अलहदा अंदाज़ में पेश किया है। राधिका आप्टे और नवाज़ का प्रेम परदे पर अल्हड़ भी है, मज़ेदार भी और कई दफ़ा उन्मुक्त भी। लेकिन अब तक रूखड़े किरदार निभा रहे नवाज़ ने साबित कर दिया कि उनका रोमांस—मैं दशरथ मांझी वाले किरदार की नहीं, नवाज़ के इस किरदार को निभाने की बात कर रहा—शाहरूख वाले रोमांस से बेहतर है।

वैसे, मेरे छिद्रान्वेषण और गुस्ताख़ी को छोड़ दें तो केतन तो केतन ही हैं। ज्यादातर दर्शक और संभवतया समीक्षक भी नवाज़ में चिपककर गए होंगे। लेकिन गरीबी हटाओ का नारा दे रही इंदिरा गांधी के टूटते मंच को जिसतरह मांझी जैसे चार लोगों ने कंधे का सहारा दिया है, यह मेटाफर ही उस वक्त के सियासी कहानी के कहने के लिए काफी है। केतन मेहता की इसके लिए मैं जी खोल कर तारीफ करना चाहता हूं।

संवाद तो शानदार हैं ही। जब तक तोड़ेगा नहीं...या फिर क्या पता भगवान आपके भरोसे बैठा हो..पहले ही हिट हैं। और दिलकश भी।

दशरथ मांझी की कहानी पहले ही बहुत प्रेरणादायी है, नवाज़ की अदाकारी और केतन मेहता के कमोबेश आला दर्जे के निर्देशन ने इसे नए आयाम दिए हैं।

Thursday, December 25, 2014

पीकेः धर्म का मर्म तो अब लुल्ल एलियन ही समझाएगा


किसी फिल्म को देखने के दो नज़रिए होते हैं। अव्वल तो यह कि समाज में मौजूदा घटनाओं के बरअक्स कोई फिल्म अपनी जगह कहां रखती है। दोयम, अपनी क़िस्सागोई की शैली और क्राफ्ट में फिल्म ने क्या ज़मीन फोड़ी। इसके अलावा तीसरा नज़रिया यह है कि उस फिल्म ने कितना कारोबार कर लिया और इस लिहाज से उसका साल की हिट फिल्मों की फेहरिस्त में वह कहां है।

बॉलिवुड की तमाम फिल्में तीसरे किस्म की फिल्म होने में फ़ख्र महसूस करती हैं।

पीके के लिहाज से सोचें तो पहला और तीसरा नज़रिया सही होगा। रामपाल और आसाराम प्रकरण के बरअक्स इस कहानी ने सामयिकता के मसले पर अपनी वक़त दिखाई है।

कुछ और कहने से पहले यह कह दूं कि पीके में मुझे विषय का दोहराव नज़र आय़ा। ईमानदारी से कहा जाए तो धर्म के कारोबार के इस विषय को उठाने में उमेश शुक्ला बाज़ी मार गए। ओह माय गॉड, इस विषय पर बनी पहली उल्लेखनीय फिल्म है, जिसका कारोबार भी उम्दा रहा था।
पीके कथानक के स्तर पर ओएमजी का दोहराव है।

मैं पीके की तारीफ करना चाहता हूं, क्योंकि कि मैं इस विषय पर ज्यादा फिल्में देखना चाहता हूं। राजकुमार हीरानी संभवतया आमिर को केन्द्र में रखकर बेहतर शैली में उसी कहानी को कहने के अति-आत्मविश्वास के शिकार हो गए हैं। असल में पीके, ओएमजी की कहानी को सलीके से कहती है।

उमेश शुक्ला की ओएमजी एक बरबाद हुए कारोबारी के तर्कों के कमाल पर बुनी तो गई थी, लेकिन धर्म का मामला कुछ ऐसा नाजुक है कि तर्क के ऊपर आस्था ने कब्जा जमाया, और कृष्ण बने अक्षय कुमार को आखिर में अपने अस्तित्व को बताने के लिए चमत्कार करना ही पड़ा।

पीके में भी किसी दूसरे ग्रह से आए आमिर को मानना पड़ा कि भगवान तो है जरूर, हां ये बात और है कि उस तक हम अपनी बात गलत लोगों के ज़रिए लुल्ल तरीके से पहुंचा रहे हैं।

भारत ही नहीं दुनिया भर में धर्म का मसला इतना नाजुक है कि एक आम आदमी सीधे-सीधे सवाल पूछने की ताकत ही नहीं रखता। इसी के लिए भोजपुरी बोलने वाले हमारे हीरो को असल में एक एलियन होना पड़ता है।

सोचिए जरा, धर्म पर सवाल करने के लिए एलियन ही होना पड़ेगा। लेकिन जो सवाल पीके में आमिर पूछते हैं, वाजिब हैं या नहीं। मंदिर में चप्पल चोरी होने से लेकर, गाल पर भगवान का स्टिकर चिपकाने तक, चुटीले और छोटे संवादों के ज़रिए असली बात कही गई है।

फिल्म बड़ी समस्या का सरलीकरण है। यही इसकी खूबी भी है, और कमजोरी भी।

संगीत पक्ष सामान्य ही लगा मुझे। परफेक्शनिस्ट आमिर खान कई दफा मुझे उसी अंदाज में संवाद बोलते दिखे, जिस अंदाज में वो थ्री इडियट्स में बोलते थे।

अनुष्का कन्विशिंग लगीं। ओएमजी से एक तुलना और, टीवी चैनल और इंटरव्यू का ड्रामा दोनों में था। देखना होगा कि आइडिया के मसले पर उमेश शुक्ला (निर्देशकः ओएमजी) और हीरानी के बीच कोई समझौता हुआ था या नहीं।

हीरानी ने फिल्म के विषय का सरलीकरण किया, मैं इस फिल्म की कहानी का थोड़ा और सरलीकरण करते हुए कहना चाहता हूं।

मेरे खयाल से यह फिल्म किसी एलियन की नहीं है। इसका आमिर किसी और गोले से नहीं आया...वह इसी गोले के किसी ऐसे हिस्से से आया है, जहां गरीबी है, जहां से आने पर कोई चालाक आदमी उसका ताबीज जैसा रिमोट खींच ले जाता है। ठगा हुआ वह आदमी, सभ्य दुनिया की नजर में नंगा है क्योंकि ईमानदार है, क्योंकि वह झूठ बोलना नहीं जानता।

दिल्ली जैसे महानगर में घर वापस लौटने के उस रिमोट की तलाश में वह आता है, तो उसे धर्म की चाशनी मिलती है। उसका वह रिमोट किसी तपस्वी के कब्जे में है।

मीडिया की मदद मिलती है, लेकिन वह भी तपस्वी जैसों के त्रिशूल का दाग़ अपने चूतड़ पर लिए घूम रहा है।

लब्बोलुआब यह कि, पीके कुल मिलाकर कई बार देखी जाने लायक फिल्म है। लेकिन सिर्फ विषय के लिहाज से। क्राफ्ट, अभिनय या निर्देशन बाकी किसी चीज़ के हिसाब से इस फिल्म से राजकुमार हीरानी की छाप नदारद है।

वैसे भी, धर्म के बारे में फिल्म बनाने के लिए आपको सारा दोष किसी तपस्वी टाइप खलनायक पर डालना होगा। सीधे-सीधे धर्म की खाल तो किसी और गोले से आया एलियन भी नहीं कर सकता। आखिर निर्देशक कुशल कारोबारी है कोई लुल्ल बकलोल नहीं।







Thursday, September 27, 2012

ओह माई गॉडः साधारण तकनीक, उत्कृष्ट कथ्य

बहुत दिनों से फिल्में देख रहा हूं, देशी सुपर मैनों की फिल्में भी देखीं...ज्यादातर में हीरो अपने बाप या अपने परिवार की मौत का बदला लेता है या हीरोइन को बचाता है। पिछली कुछ फिल्में इस गड़बड़झाले से अलहदा दिखी हैं। अच्छा लग रहा है।

बर्फी के बाद ओह माई गॉड भी ऐसी फिल्म है जो मन को छूती है।

हिंदी फिल्मों में पेड़ों के इर्द गिर्द नाचना और गाना एक पवित्र परंपरा है, इसी फिल्म ओह माई गॉड में एक गोंविदा आयटम गाने को छोड़ दें, जिसमें मादक होती जा रहीं बिहारी बाला सोनाक्षी कूल्हे मटका रही हैं तो बाकी की पूरी फिल्म बहुत तर्कपूर्ण है।

फिल्म नास्तिक तर्क और आस्तिक आस्था और धर्म के दुकानदारों के त्रिकोण के बीच झूलती है। चूंकि फिल्म है, कल्पना है इसलिए नास्तिक बने परेश रावल के तर्कों के बरअक्स निर्देशक उमेश शुक्ला खुद भगवान को ही ले आते हैं।

यह फिल्म भावेश मांडलिया के नाटक ‘कांजी वर्सेज कांजी’ नाटक पर आधारित है। कैमियो के रुप में फिल्म ‘ओह माय गॉड’ में अक्षय कुमार कृष्ण बनकर आते हैं। दोनों ने अभी तक 32 फिल्मों में एक साथ काम किया है। दोनों की केमिस्ट्री देखते ही बनती है।

अक्षय के पास भी वैसी ही मारक मुस्कान है जैसी कृष्ण की होगी बताई जाती है। फिल्म मूल रूप से हिंदू धर्म के ठेकेदारों को घेरती है, मिथुन चक्रवर्ती श्री श्री रविशंकर जैसे किरदार की धज में है लेकिन बेहद हास्यास्पद और फूहड़ दिखते हैं। गोविंद नामदेव बनारस के पंडे के किरदार में बेहतरीन हैं और हर बात में आपा खो देते दिखते हैं। जबकि एक अन्य महिला किरदार राधे मां या ऐसी ही किसी मादक महिला धर्म कथावाचक के तौर पर दिखती हैं।

फिल्म ऐसे दौर में आई है जब एक फिल्म ने पूरे मुस्लिम जगत को आंदोलित कर रखा है। यह तो अच्छा है कि अभी बजरंगी हुड़दगी और भगवा ब्रिगेड ज्यादा सक्रिय नहीं है।

फिल्म में बार-बार पूरे फ्रेम में एबीपी न्यूज़ का लोगो आ जाता है जो फिल्म के प्रवाह को रोक देता है। संपादन भी दुरुस्त नहीं है, हालांकि कहानी में झोल है तो इतना ही अदालत में ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देते परेश रावल को लकवा मार जाता है और फिर ईश्वर ही उसे ठीक करते हैं।

यहां निर्देशक एक बार फिर ईश्वर की शरण में चले जाते हैं। फिल्म को मध्यांतर तक थामे हुए तर्क यहां आकर फिसड्डी साबित होते हैं। खैर, परेश रावल ने पूरे फिल्म को अपने कंधों पर ढोया है, हालांकि प्रोमो में भगवान अक्षय ही ज्यादा दिखते हैं।

फिल्म के संवाद बहुत मेहनत से लिखे गए हैं, जो हंसाते भी हैं और चुटीले भी हैं। धर्म के टेकेदारों की जमकर हंसी उड़ाई गई है। फिल्म आप किसी भी एक वजह से देख सकते हैं- बढिया कहानी, चुटीले संवाद, या ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाते तर्क, या फिर धर्म के ठेकेदारों को कठघरे में खड़ेकर शर्मसार करने के दृश्यों पर।

सबसे बेहतर तो लगता है जब एबीपी न्यूज़ की एंकर बनी टिस्का चोपड़ा परेश से पूछती हैं, धर्म या मज़हब इंसान को क्या बनाता है...परेश सोचकर  जवाब देते हैं....बेबस या आतंकवादी।

बात चुभती जरूर है लेकिन है सच।

Saturday, June 23, 2012

गैंग्स ऑफ़ वासेपुरः जियअ हो बिहार के लाला

गैंग्स ऑफ वासेपुर के प्रोमो देखकर कसम खाई थी कि फिल्म पहले ही दिन देखूंगा। देखी...और क्या दिखी। वाह। बहुत दिनों बाद फिल्म देखकर मजा आ गया।

अनुराग कश्यप की सभी फिल्में देखीं है। लेकिन संयुक्त बिहार या अब के झारखंड के अतीत गुंडई, लुच्चई, कमीनेपन को इस तरह किसी ने उभारा नहीं था। अपनी पहली रिलीज़ फिल्म ब्लैक फ्राइडे की तरह ही अनुराग ने एक बार फिर डॉक्यु-ड्रामा रच दिया है।

बदलते हुए लेंस, और पीय़ूष मिश्रा की कमेंट्री इस फिल्म को ऑथेंटिक बनाती है।

दरअसल, फिल्म का महीन रिसर्च इसे इस सब्जेक्ट पर बनी तमाम फिल्मों से जुदा जमीन पर खड़ी करती है। गैंग्स...को सिर्फ माफिया फिल्म समझना भूल होगी..और सिर्फ अपराध फिल्म भी नहीं है ये..ये बिहार में माफिया और राजनीति और कोयला खदानों की गड़्मड़ होती स्थितियों की कथा है।

जैसे ही आप किरदारों से रू-ब-रू होते हैं...आप उफ़-उफ़ करते जाते हैं। आपको सरदार खान हमेशा याद रह जाएगा, जो केन्द्रीय चरित्र तो है लेकिन वह नायक की शास्त्रीय परिभाषा में कहीं नहीं आता। वह लौंडियाबाजी करता है, ठरकी है, और तमाम किस्म का हरामीपना है उसके अंदर। फिर भी वह आपको मोहित करता है।

गज़ब की डिटेलिंग वाली फिल्म है गैंग्स...
माफिया के किरदार में मनोज वाजपेयी कई दफा आ चुके हैं। और सत्या का उनका किरदार भीखू म्हात्रे अब भी लोगों को याद है। लेकिन इस दफा उनके किरदार के रंग गजब के हैं...और विविध भी।

गैंग्स आफ वासेपुर एक राजनीतिक दस्तावेज़ है। लेकिन पहले सेंसर बोर्ड का शुक्रिया अदा करना नहीं भूलना चाहिए, कसाईखाने के बड़े-बड़े मांस के लोथड़ों के शॉट्स आपराधिक मिथक रचते हैं...

अनुराग कश्यप ने देश-काल (टाइम और स्पेस) में इतनी बारीकी बरती है कि दिल खुश हो जाता है, अगली दफा मिलेंगे कभी तो हाथ चम लूंगा। लेंस,  लाइटिंग, शेड्स,धूल,बाल ....क्या कंटीन्यूइटी है।

अस्पताल के दृश्य में लालटेन की रौशनी..उफ़, दिल लूट दिया गुरू।

और बात जरा डिटेलिंग की। आम तौर पर बिहार की भाषा को परदे पर लाने में बहुत हल्केपन से काम लिया जाता है। लेकिन इस काम में अनुराग उस्ताद हैं। यहां तक कि लौंडा गायक बने यशपाल शर्मा के गाने में (मुकद्दर का सिकंदर का गानाः यशपाल पहले सलामे इश्क़ मेरी जां...को लड़की की महीन आवाज में गाते हैं...कुछ इस तरह, सलामे इस्क मेरी जां जरा कूबूल कर लो...फिर किशोर की आवाज़ में गाते हैं...तू मसीहा मुहब्बत के माड़ो का है...गौरतलब है कि बिहार में 'र' को 'ड़' भी उच्चारित किया जाता है। अद्भुत इसी को तो कहते हैं। वरना बॉलिवुडिया तमाशे वाले तो बिहार के किरदार को दूधवाला या लाल मोजे पहना विलेन बना कर इतिश्री मान लेते थे।

डिटेलिंग उस वक्त मारक हो जाती है जब सवारी बिठाने के लिए मनोज, गिरिडिह- गिरिडिह बोलते हैं। नल्ला चूसते हैं, लड़की को कमीनगी से  ताकते हैं। उनकी कमीनगी भरी मुस्कुराहट पर आप न्योछावर हो जाएंगे।

सरदार और औरतों के बीच के रिश्तों के अलग से व्याख्या की जरूरत पड़ेगी। सरदार की पत्नी और उसके संरक्षक (पीयूष मिश्रा) के बीच जो संबंध होते होते रह गया और उससे जो फैज़ल पर असर पड़ा, वहीं से फैज़ल का किरदार शुरु होता है।

फिल्म में अगर महिला किरदारों की चर्चा न की जाए तो गलत होगा। नगमा या दुर्गा के किरदार संपूर्णता लिए हैं। दोनों ताकतवर है, एक  घर बार छोड़ कर बंगालन के प्रेम में पड़ने वाले रंडीबाज पति को भी खाना खिलाकर ताकतवर बनाती है, और घर आए पुलिसवालों के साथ सख्ती से निपटती है। दूसरी, सरदार से झापड़ खाकर उसके लिए अपने दरवाजे बंद कर लेती है और सैमसन और डेलिला कहानी की डेलिला की तरह अपने प्रेमी सरदार की मौत का कारण बनती है।


महिलाओं के किरदार सच में बहुत ताकतवर है। और दोनों किरदारों में उतरी अभिनेत्रियों ने भी कमाल का अभिनय किया है।
फिल्म की महिला किरदार जानदार हैं
'इक बगल में चाँद होगा' से 'कह के लूंगा' तक ‘वासेपुर का संगीत उसकी आत्मा है, जिसके बिना फ़िल्म मुमकिन नहीं थी। मनोज वाजपेयी इसलिए कि अपने किरदार की कमीनगी में इतना उतरते हैं कि आपको बार-बार बेहद विकर्षित करते हैं, लेकिन बस इतना ही कि जब वे अपना बदला ले रहे हों तो आप उनके बिल्कुल साथ खड़े हों।


पूरी फिल्म में भोजपुरी बिरहा और बिदेसिया का सटीक इस्तेमाल है। आप पार्श्व संगीत के तौर पर बिहार के लोकगीतनुमा संगीत से दो-चार होते हैं और आपको लगने लगता है कि वाह इतना ऑथेंटिक तो बॉलिवुड कभी था ही नहीं।
एक दम से रीयल दृश्य, दिल को गुदगुदाने वाले संवाद..क्योंकि बचपन से हम ऐसी ही भाषा सुनते हुए बड़े हुए हैं। देखे-सुने जानेपहचाने लोकेशंस..बनारस, बरकाकाना का स्टेशन...फिल्म को देखकर लगता ही नहीं कि फिल्म देख रहे हैं।
हां, शुरु में भूंजे की तरह गोलियां चलती हैं तो आपको शुरुआत में ही असहज कर देती है। लेकिन फिर धीरे-धीरे आप अनुराग पर भरोसा कर के सीट पर पीठ टिका कर बैठते हैं...और एक दम यथार्थ सिनेमाई तजुर्बे से वाकिफ होते जाते हैं।
अगर आप को इऩ सबसे यानी सच्चाई, यथार्थ, कमीनेपन, हरामीपन, डकैती, बकैती, लौंडियाबाजी, रंडीबाज़ी...बम, कट्टे, कोयले, राजनीति, दंगई, खून वगैरह से डर लगे या उबकाई आती हो, या नफरत हो तो बेशक ये फिल्म न देखने जाएं। आपके लिए बेशक एक और फिल्म रिलीज़ हुई है, जिसमें शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा प्रेम-व्रेम को उसी मसाला अंदाज़ में दोहरा रहे होंगे, जो दशकों से हम आप बेहतर तरीके से परदे पर देख चुके हैं।
गैंग्स ऑफ वासेपुर, सिनेमाई जादू है। यथार्थ और कला का मेल...आखिर में सभी किरदारों के साथ और जिअ हो बिहार के लाला में मनोज तिवारी की लय पर सिर्फ  ठेले पर लटकता हुआ माउजर याद रह जाता है। जिसमें पहिए के बीचों बीच एक गोली छूटती है -- धांय।

Monday, June 4, 2012

राउडी राठौड़ः खालिस मनोरंजन, नो दिमाग़

फिल्म के बारे में कुछ लिखने से पहले आपको वैधानिक चेतावनी देना जरूरी हैः इस फिल्म को देखते वक्त दिमाग को घर पर ही छोड़ कर आएं, और तभी आप इस फिल्म का मज़ा ले पाएंगे।

राउडी राठौड़ खालिस फॉर्म्युला फिल्म है। सबसे बेहतर बात की आप प्रभु देवा से अनुराग कश्यप या हबीब फैसल जैसी उम्मीद लगा कर जाते भी नहीं है। फिल्म खालिस मनोरंजन की अपील करती है और कई हद तक उसे पूरा भी करती है।

फिल्म की कहानी में कुछ भी नया नहीं है।  शिवा यानी चोर बने अक्षय कुमार की कारस्तानियां भी कई फिल्मों का बासी कूड़ा लगता है। लेकिन फिल्म में उन लोगों के लिए बहुत कुछ है जो फिल्मों से कुछ उम्मीदें लगाकर नहीं जाते। यह रेडी, दबंग, बॉडीगार्ड और सिंह इज किंग के कतार की फिल्म है।

फिल्म शुरु होती है एक चोर की कारस्तानियों और पटना से आई एक लड़की से उसके प्रेम के शुरु होने से। जब अक्षय कुमार फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा से इश्क़ कर रहे होते हैं तब तक परदा बहुत सुहाना लगता है।

अक्षय कुमार की लगातार पिट रही फिल्मों के दौर से भी यही फिल्म सुहाना अहसास दिलवाएगी। कम से कम अक्षय इसमें अपने खिलाड़ी और एक्शन इमेज की झलक तो देते हैं। इस फिल्म की कॉमिडी में भी वो अपनी ही किसी पुरानी फिल्म का दोहराव भी नहीं लगते।

लेकिन देखा जाए तो पूरी फिल्म बॉलिवुड स्टीरियोटाइप से भरी पड़ी है, जिसमें गुंडो की अनंत फौज है। हालांकि फिल्म में गोलियां बहुत कम चलाई गई हैं, लेकिन असीम मारकाट है। एक अतिरेकी शक्तियों के स्वामी की तरह अपने दो अवतारों में (अक्षय का डबल रोल है) अक्षय लगभग अठारह अक्षौहिणी सेना का वध कर डालते हैं।

फिल्म का खलनायक पक्ष बेहद कमजोर है। घटनाएं पटना के आसपास के किसी देवगढ़ की रची गईं हैं। कोई भी दृश्य कहीं से भी बिहार का नहीं लगता। खलनायक बिहारी हैं,लेकिन निर्देशक के फैसले के मुताबिक बोलते समय लार टपकाने और प्राय- थूकते रहने वाले मुख्य खलनायक (नासिर) जब मुंह खोलते हैं तो दक्षिण भारतीय लगते हैं। बाकी के खलनायक मुंह नहीं खोलते। वे या तो स्त्रियों के साथ बलात्कार या हीरो के साथ मारकाट में रत रहते हैं।


अक्षय कुमार ने पूरी फिल्म अपने कंधों पर ढोई है। एक हद तक वो इसमें कामयाब भी रहे हैं। पीठ दर्द से परेशान रहे अक्षय को फिर से राउंड किक लगाते देखना पुराने दिनों की याद की ताजा करने जैसा है।

फिल्म बहुत लाउड है। इसका संगीत सामान्य है। और एक दो गाने जो पहले ही लोकप्रिय हो गए हैं, बाकी के गाने बेदम हैं। यहां तक आइटम सॉन्ग भी शोरगुल से ज्यादा कुछ नहीं है, जिसमें कॉरियोग्रफर ने जरूरत से ज्यादा भीड़ इकट्ठी कर ली है।

फिल्म पहले ही हिट हो चुकी है, लेकिन छोटे सेंटर्स पर इसे दर्शकों की तालियां और सीटियां दोनों मिलेंगी। फौलाद की औलाद, मैं जो कहता हूं वो करता हूं और जो नहीं कहता वो तो डेफिनेटली करता हूं जैसे संवाद तालीबटोरू हैं।

लेकिन फिल्म की सबसे खूबसूरत बात, सोनाक्षी सिन्हा रहीं। उनका रोल महज तीन या चार रीलों में सिमटा है जहां वो अक्षय के साथ गाने गाती हैं और रोमांस-सा कुछ करती हैं। कैमरे की तरफ लुक देती हैं, मुस्कुराती हैं। सोनाक्षी उन फिल्मों में ज्यादा जमेंगी जहां अभिनय करने की कोई खास जरूरत न हो। मसलन, दबंग और राउडी राठौड़।

वैसे, कटरीना के कंटीले सौन्दर्य के मुकाबले यह बिहारी बाला भी खूबसूरती के पैमान गढ़ती है। दबंग में हम उनके मस्त-मस्त नैन देख चुके हैं। इस फिल्म में उनकी मादक कमर को निशाना बनाया गया है। कई बार पूरा कैमरा ज़ूम होकर उनकी कमर पर टिक जाता है। खासी मादक कमर है।

फिल्म में अक्षय ने जबर्दस्त मूंछें रखी हैं। मूंछे मरोड़ते हुए कई दफा वे अपना नाम विक्रम राठौड़ दोहराते हैं। यह अदा भाती है, लेकिन बारिश के वक्त एक्शन के एक दृश्य में मूंछे मरोड़ते वक्त साफ हो जाता है कि मूंछें नकली हैं। मेकअप मैन की इस नाकामी को और संपादक की इस गलती को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस दृश्य को डीवीडी में कई दफा देखें तो साफ हो जाएगा।

फिल्म का एक्शन जबर्दस्त है। यही फिल्म की यूएसपी भी है। तो अगर आप फिल्म देखने जाएँ और अपने जॉनर की इस ईमानदार फिल्म को देखें (क्योंकि कहीं से भी यह फिल्म कला पक्ष या कथा तत्व का दावा नहीं करती) तो कृपया दिमाग़ का इस्तेमाल न करें।