Showing posts with label अर्थात्. Show all posts
Showing posts with label अर्थात्. Show all posts

Tuesday, September 12, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर

पेड़ के नीचे बैठे गुड्डू भईया तकरीबन ध्यान की मुद्रा में थे. मैं गुजर रहा था तो सोचा चुपके से निकल लूं. आखिर गुड्डू भैया अभी ब्लेसिंग स्टेट में होंगे तत्व सेवन के बाद. सुबह-सुबह उठकर ह्विस्की के घूंट भर लेना गुड्डू जी की आदत थी और गुड्डू उसे आचमन कहते.

मेरे कदमों की आवाज सुनकर गुड्डू ने आंखें खोल दीः ठाकुर कहां भगे जा रहे हो, तनिक मैनाक पर विश्राम-सा कर लो. अब भागने की कोई राह न थी, मैं उनके कदमों में कुछ ऐसे बैठ लिया जैसे पुराने जमाने में छात्र गुरुओं के पैरों के पास बैठते थे. ज्ञान हासिल करने के लिए.

गुड्डू भैया अभी प्रकृतिस्थ हो पाते कि मैंने कहाः शिक्षक दिवस की मुबारकवाद हो गुड्डू भिया.

हैप्पी टीचर्स डे. मैं चौंका, अरे भिया आप और अंग्रेजी!

गुड्डू कुछ वैसे ही चौंके जैसे कबूतर की तरफ पत्थर उछालिए तो वह चौंकता हैः अबे ठाकुर, हम तो क्या चीज़ हैं चचा ग़ालिब तक अंग्रेजी के शौकीन थे. उनको तो एक स्कॉच से ऐसी मुहब्बत थी कि पटियाला नरेश के न्योते के बावजूद नहीं गए थे. वह स्कॉच सिर्फ दिल्ली छावनी में मिलती थी.

वह तो ठीक है गुड्डू भिया. आज शिक्षक दिवस के मौके पर भी शराबनोशी!

गुड्डू ने अपनी सींकिया काया को जितना मुमकिन था उतना फुलाकर कहाःल हर शब पिया ही करते हैं मय जिस कदर मिले...चचा ग़ालिब का ही कहा हुआ है. और तुम यह न दिवस वगैरह मना करके कैलेंडर मत बन जाओ. देखो यूं समझो कि जिस आदमी के लिए कुछ नहीं कर सकते उसका डे मना लो... सुनो कि एक दीवाने लेखक मंटो ने क्या लिखा है दुनिया में बड़े-बड़े सुधारक हुए हैं। उनकी शानदार शिक्षाएं भी रही हैं। शिक्षाएं वक्त के साथ घिस-मिट जाती हैं, खो जाती है। रह जाती हैं तो सलीबें, धागे, यज्ञोपवीत, दाढ़ियां, बग़लों के बाल...

लेकिन गुरुओं के योगदान को भुला सकता है कोई जीवन में?

क्यों भुलाएगा भाई? तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा शिक्षक नहीं रहा जिसने तुमसे 27 का पहाड़ा न पूछा हो? खैर, जानना चाहते हो तो जानो कि शिक्षा का अधिकार कानून देशभर में अब तक नौ फीसदी से भी कम स्कूलों में लागू हो पाया है. यह कानून कहता है कि आठवीं तक तो सभी बच्चों को शिक्षा जरूरी तौर पर मुहैया कराई जाए. लेकिन यह तब होगा जब गांव-गांव स्कूल खुले, शिक्षकों की समस्याओं का समाधान हो, और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए.

देखो, देशभर में करीब 50 फीसदी शिक्षक संविदा आधारित हैं...संविदा नहीं समझते? ठेके पर काम करने वाले शिक्षक. चिंदी भर की तनख्वाह मिलती है, पिर क्या पढ़ाएगा वह? शुक्राचार्य, वृहस्पति और द्रोण को ठेके पर रखकर देखते तो कभी न दानव स्वर्ग जीत पाते, न देवता दानवों से स्वर्ग छीन पाते, न तुमको अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, दुर्योधन जैसे रणबांकुरे मिल पाते. संदीपनि सुखी थे तो कृष्ण वासुदेव बने. पढ़ाई लिखाई भी कोई अनुबंध और ठेके पर देने की चीज है? ऐसे करवाओगे देश के भविष्य का निर्माण?

गुरुओं को क्यों नाराज कर रहे हो तुम लोग? कबीर को सुनोः

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥


गुड्डू भैया का सवाल सदी के सवाल की तरह छा गया. मैं चुप था कि गुड्डू भैया ज्ञानमुद्रा से वापस आएः पता है ह्विस्की की टीचर्स ब्रांड पौने दो सौ साल पुरानी है और इसको विलियम टीचर नाम के शख्स ने शुरू किया था.

मुझे नहीं मालूम था. मैंने कहाः आज के शिक्षक वेतन तो लेते है लेकिन पढ़ाने में फांकी मारते हैं.

गुड्डू उकडूं बैठ गएः देखो ठाकुर, हमारे यहां लोगों में यह गलतफहमी है कि शिक्षक को वेतन अधिक मिलता है, जबकि हालात इसके लट हैं. मौजूदा समय में देश के बजट का करीब 3.4 फीसदी शिक्षा पर खर्च किया जाता है. इसमें से करीब 65 फीसदी आमदनी सरकार को विविध उपकरों से होती है. यानी शिक्षा में हमारा खर्चा बहुत कम है. अच्छे वेतन की जो बात तुम कर रहे हो न, वैसे टीचर बहुत कम हैं...देशभर में 50 फीसदी शिक्षक वेतन से जूझ रहे हैं. जितने शिक्षक हैं उनमें से आधों को 6 हजार रु. से भी कम तनख्वाह मिलती है. शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए गठित किये गये कोठारी आयोग ने इस बात की सिफारिश की थी कि शिक्षक का वेतन कम-से-कम इतना तो हो ही कि उसे किसी तरह की आर्थिक परेशानियों से जूझना नहीं पड़े. आयोग ने शिक्षकों को एक सम्मानित वेतन देने की बात कही थी. लेकिन, सल में उनका वेतन न्यूनतम मजदूरी के बराबर है. अनुबंध पर काम करने वाले अधिकतर शिक्षकों की ट्रेनिंग नहीं हुई है. देशभर में करीब 11 लाख शिक्षक ट्रेंड नहीं हैं तो बताओ क्या पढ़ाएं ये लोग?

मैं संतुष्ट नहीं हुआः भिया, मास्टर लोग स्कूल छोड़कर धनरोपनी कराने निकल जाते हैं..

गुड्डू भिया मुस्कुरा उठेः वेतन दोगे मजदूर वाला और काम द्रोणाचार्य का लोगे? खाली मास्टर लोगों से उम्मीद करोगे कि वह पढ़ाई के बीच में धनरोपनी कराने न जाए. ग्रामीण इलाकों में अब भी करीब 10 फीसदी स्कूल ऐसे हैं, जहां एकमात्र शिक्षक हैं.

बेचारे एक ही मास्टर को बच्चों की हाजिरी देखनी होती है, सारे विषय और वर्गों को पढ़ाना होता है, अब तो दुपहरिया में खाने का इंतजाम भी करवाना होता है. और सरकार! एनसीइआरटी जैसे सरकारी शिक्षा संस्थानों को मजबूत बनाने के बजाय सरकार शिक्षा के लिए प्राइवेट सेक्टर की ओर देख रही है, इससे बेड़ा गर्क ही होगा न..

पता है सरकार ने 5 दिसंबर 2016 को लोकसभा में शिक्षा के आंकड़े पेश किए थे. उसके मुताबिक, सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में 18 फीसदी और माध्यमिक विद्यालयों में 15 फीसदी शिक्षकों के पद खाली हैं. देश भर में कुल मिलाकर करीब 10 लाख शिक्षकों की कमी है. देश के 26 करोड़ स्कूली छात्रों का करीब 55 फीसदी हिस्सा सरकारी स्कूलों में पढ़ता है. सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में माध्यमिक स्कूलों की सर्वाधिक रिक्तियां झारखंड में है, जो कि 70 फीसदी है. इस राज्य में प्राथमिक स्कूलों के लिए यह आंकड़ा 38 फीसदी है. उत्तर प्रदेश में माध्यमिक शिक्षकों के आधे पद खाली हैं, जबकि बिहार और गुजरात में यह कमी एक-तिहाई है. 60 लाख शिक्षकों के पदों में करीब नौ लाख प्राथमिक स्कूलों में और एक लाख माध्यमिक स्कूलों में खाली हैं.

लेकिन ठाकुर, जनगणना करवाना हो, मुर्गी, मवेशी, सूअर गिनवाना हो, मिड डे मील का भोजन बनवाना हो, ...बिना छत वाले स्कूल में पढ़ाना हो, बिना ब्लैक बोर्ड और खड़िया के पढ़ाना हो...बीडीओ से लेकर पंचायत सदस्य तक की जूती चटवाना हो...सारे काम शिक्षकों से करवा लो...

इतने के बाद शिक्षक अगर जिंदा रहकर पढ़ा रहा है ना, तो इसके लिए इस देश के तमाम प्रतिभावान् और कामचोर दोनों वर्गों के शिक्षकों का मेरा नमन.

गुड्डू संजीदा हो गए. आज मैंने उनके लिए शेर पढ़ाः

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए


गुड्डू मुस्कुरा उठे, उनने अपने पैंताने छिपा रखी टीचर्स का एक खंभा निकाला और जोर से कहाः हैप्पी टीचर्स डे.



Monday, September 5, 2016

चीटरों के दौर में टीचर

मधुपुर मेरा जन्मस्थान तो है ही, इसने यह भी तय किया कि मैं किस तरह का इंसान बनने वाला हूं। अपने भैया मंगल ठाकुर को अपना पहला गुरु मानता हूं, जो मेरी हर कामयाबी पर उछले, हर नाकामी पर परेशान हुए।

फिर सुबल चंद्र सिंह, जिन्होंने अपने सभी छात्रों की सखुए की संटी से पीट-पीटकर बंदर से इंसान बनाने की कोशिश की। लेकिन हाय दैव, उनके ज्यादातर छात्र आज भी बंदर ही हैं। दिनेश सर, जो गणित को सरलता से समझा देते थे। 

व्रजनारायण झा, जिन्होंने मुझे संस्कृत पढ़ाते वक्त सीधा बता दिया, व्याकरण गणित की तरह है, लेकिन इसमें कुछ समझ न आए तो सीधा रट लो। एमएलजी उच्च विद्यालय, जहां मैने दसवीं तक पढ़ाई की, वहां अलाउद्दीन अंसारी सर इतिहास पढ़ाते थे। पढ़ाते वक्त संभवतया वह टाइम मशीन में बैठकर उस दौर में पहुंच जाते, जिस दौर का अध्याय वह पढ़ा रहे होते थे। अलाउद्दीन सर ने अपनी कक्षाओ में हमें शनिवार को आधी छुट्टी के बाद हमारे संभावित क्रिकेट मैच की योजना बनाने का पूरा मौका दिया। वह किताब में रमकर हमें अकबर, शाहजहां और बलबन के बारे में बताते रहते थे, और हम फुसुर-फुसर करके यह तय करते थे कि बैटिंग में किस नंबर पर कौन उतरेगा। 

अंग्रेजी पढ़ाते थे रफीक़ सर। उन दिनों बिहार (तब, आजकल वह इलाका झारखंड में आता है) में अंग्रेजी की छात्रों से मुठभेड़ छठी कक्षा में होती थी, और मान लिया जाता था कि पांचवी कक्षा तक तो छात्रों ने अंग्रेजी खुद-ब-खुद मां-बाप से सीख ही ली होगी। तो रफीक़ सर, अंग्रेजी पढ़ाते थे और यह मानते थे कि वह जो फर्राटेदार अंग्रेजी छठी-सातवीं-आठवीं के छात्रों के सामने बतियाते थे, तो यह सोचते थे कि इन सबको समझ में आ रहा होगा। अंग्रेजी बोलने का उनका  लहज़ा  खोरठानुमा था। खोरठा मधुपुर के आसपास बोली जाने वाली बोली है, जिसमें मैथिली-बांगला-और संताली के शब्द घुलेमिले होते हैं। बहरहाल, किसी का ध्यान भटकने पर रफीक़ सर ब्लैक बोर्ड के पास से ही चॉक फेंककर सीधे छात्र के मुंडी पर निशाना लगाते थे और कहतेः अंग्रेजी नहीं पढ़नी हो तो जाओ, गणेश की दुकान पर जाकर घुघनी-मूढ़ी खाओ। (घुघनीः काले चने के छोले, मूढ़ीः चावल के मुरमुरे)

मौलाना सर की फ़ारसी की क्लास में हम दुनिया के नक्शे के बारे में पढ़ते क्योंकि वह पिताजी के दोस्त भी थे और फ़ारसी की कक्षा के वक्त तक स्कूल में सारे बच्चे भाग निकलते थे।

बहुत शिक्षकों ने पढ़ाया, सिखाया, मुझे बनाने और बिगाड़ने में अपनी अहम भूमिका अदा की। इनमे आलोक बक्षी का नाम बहुत आदर से लेना चाहता हूं।

बाद में कई शिक्षक हुए जिन्होंने मुझे बनाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। उन सभी गुरुओ और सबसे बड़े गुरू वक्त के सामने सिर झुकाता हूं, जिसने दुनिया को समझने की थोड़ा सा सलीका मुझे सिखा दिया है। यह जरूर है कि अपनी बाजिव कीमत लेकर।

मंजीत

Wednesday, February 24, 2016

दूरदर्शन को चिट्ठी

विजय देव झा ने दूरदर्शन को एक पाती लिखी है। फेसबुक पर। यह चिट्ठी मैं यहां शेयर कर रहा हूं। विजय देव झा, द टेलिग्राफ में पत्रकार हैं। 

दूरदर्शन समाचार हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।

मैंने भी तुम्हें कभी सुस्त धीमी गति कह कर मजाक उड़ाया था. मुझे उन नए खबरिया चैनलों और उनके एंकर से प्यार हो गया था।ये चैनल और इनके एंकर चौबीस घंटे उत्तेज़ना के साथ न्यूज़ देने का वादा करते थे। मैं खुद में प्रणव राय और विनोद दुआ को देखता था राजदीप मुझे दुनिया का सबसे स्मार्ट आदमी लगता था और रविश किसी संत से कम नहीं। इन सुन्दर महिला एंकरों को पुरे अदा और जलवे के साथ न्यूज़ पढ़ते देख मुझे लगता था की न्यूज़ प्रजेंटेसन का यही तरीका है. आज तो वह बजाप्ते वॉकी टॉकी लेकर न्यूज़ पढ़ती पढ़ते हैं. 

लेकिन मैं गलत था तुम उस वक़्त भी संत थे और आज भी हो. 

तुम्हें इस बात की रत्ती भर परवाह नहीं है की तुम टीआरपी में कहीं नहीं हो. अर्णव क्यों चीखते हैं, रविश क्यों रह रह कर बौद्धिक सिसकारियाँ लेते रहते हैं वह न्यूज़ कम पढ़ते हैं हम दर्शकों यह बताते हुए दिख पड़ते हैं की वह इस पेशे में बस इसलिए हैं की हम लोगों का बौद्धिक उन्नयन कर सकें, नीरा राडिया केस और वसूली के केस एक्सपोज़ हो चुके बरखा दत्त और सुधीर चौधरी मेरे नैतिक पहरेदार कैसे हो सकते हैं, लेकिन तुम्हारे एंकर आज भी शांत तरीके से न्यूज़ पढ़ते हैं. 

मुझे अक्सरहां तुम्हारे रिपोर्टर और कैमरामैन से मुलाकात होती रहती है. वह आम खबरिया चैनल के रिपोर्टर की तरह झाँउ झाँउ नहीं करते करते। 

टीवी रिपोर्टिंग का भी एक संस्कार होता है जो टीआरपी और तमाशे से नहीं आते. मैं मानता हूँ की तुम पर प्रो-इस्टैब्लिशमेंट का इलज़ाम लगाया जाता है लेकिन तुम इन निजी चैनलों की तरह उत्तेज़ना और अफवाह नहीं फैलाते। 

मेरा बेटा महज तीन महीने का है लेकिन टीवी की तरफ टुकुर-टुकुर ताकते रहता है यह जेनेटिकली ट्रांसफर्ड आदत है. लेकिन न्यूज़ चैनल देखते ही वह असहज हो जाता है. मुझे डर है की वह जब बड़ा होगा तो मुझसे पत्रकार होने की वजह से नफरत न करना शुरू कर दे. तुम देश के उन महान टीवी रिपोर्टर और एंकर की तरह खुद को सर्वज्ञानी और जज नहीं कहते और दूसरों को सत्ता या फिर विपक्ष का दलाल नहीं कहते। खबरिया चैनल अब तनाव और नफरत उतपन्न कर रहे हैं. देश में 

यह अलग बात है की सोनिया गांधी से आशीर्वाद प्राप्त मनमोहन सिंह की सरकार ने तुम्हारे सूत्र वाक्य "सत्यम शिवम सुंदरम" को हटा दिया था शायद देश को इस सूत्र वाक्य की जरुरत ही नहीं रह गयी. देश को तो जरूरत है बस जेएनयू टाइप रिपोर्टिंग की जो खबरिया चैनल दिखा रहे हैं। 

देश ने पहली बार देखा की देश के बड़े बड़े स्वनामधन्य टीवी पत्रकार खुलेआम एक दूसरे को खुलेआम गालियाँ दे रहे हैं जिसमे बीप की कोई भी गुंजाइस नहीं है। सबने अपने एजेंडा तय कर लिए हैं अब पत्रकार कम पैरोकार अधिक दिखते हैं। और यह एजेंडा तय करते हैं कुछ प्रमुख पत्रकार और उनके मालिक। 

देश की जनता को इन्होंने राष्ट्रवाद और फ्री स्पीच के अपने नकली और खोखले तर्क से ऐसा फँसा रखा है की अब गृह युद्ध जैसे हालात पैदा हो रहे हैं। सत्ता संस्थान से कड़े सवाल जरूर पूछे जाने चाहिए लेकिन आपने तो ये हिसाब और सुबिधा के अनुसार सवाल पूछते हैं। चैनल वही दिखाते और सुनाते हैं जो उनके और उनके राजनितिक मित्रों के इंट्रेस्ट का हो। 

दूरदर्शन मुझे याद है की शायद तुमने एक बार अपने स्क्रीन को ब्लैक किया था जब इंदिरा गाँधीजी की हत्या हुई थी। लेकिन अब तो फैशन हो गया है। हमें बताया जाता है की फलाना पत्रकार देश और पत्रकारिता के गिरते स्तर पर कितना चिंतित है। लेकिन असली बात यह है की कुल योग्यता इस बात में हैं की इन्होंने देश में कितने उत्पात और इंटलरेंस बढ़ाये। इनकी कृपा से आज सैकड़ों चिरकुट नेता बन बैठे। इनका ब्रेकिंग और फलाने का एक और विवादास्पद बयान देश को ले बैठा है। 

खबरिया चैनल बौद्धिकता से दूर एक विध्वंसकारी समूह बन चुका है जो किसी के लिए जिम्मेदार नहीं है। दूरदर्शन समाचार यह सब लिखते हुए मैं अपने पापों का प्रायश्चित कर रहा हूँ। देश का सहनशील वर्ग आज फिर से तुम्हारी तरफ देख रहा है। तुम सुस्त ही सही लेकिन शैतान नहीं हो।

Thursday, October 9, 2014

अर्थात्...अपने शाहे-वक़्त का यू मर्तबा आला रहे

भारत की तहज़ीब में ही पैवस्त रहा है हमेशा अपने लिए नायकों की तलाश। हम सिनेमा हो खेल, अपने लिए नायको की तलाश करते रहते हैं। नायको की इसी तलाश में कई दफा हम उन नायकों की संतानों और रिश्तेदारों को भी कुछ वैसी ही प्रतिष्ठा देते हैं, जितना अपने नायकों को। कई दफा ये संताने उतनी ही प्रतिभावान् होती हैं, कई दफा नहीं भी होती।

हम नायको में खुद को देखना चाहते हैं और उनकी संतानों में अपनी संतानो का अक्स देखते हैं। उम्मीदें बढ़ जाती हैं। अमिताभ के बेटे से अमिताभ जैसा, गावस्कर के बेटे से गावस्कर जैसा होने की उम्मीदों का बोझ होता है। 

एक भाव होता है, जो हमें नायकों से जोड़ता है। लोग अपने बच्चों के नाम उसी जुड़ाव की वजह से कभी जवाहर, कभी इंदिरा, कभी राजीव, अमिताभ, सलमान और शाह रुख़ रखते हैं। यह एक सूत्र है, जिसकी वजह से असली या नक़ली नायक पैदा होते हैं। 

अन्ना का आंदोलन आय़ा, तो इसने नौजवानों को अपने साथ कनेक्ट कर लिया। कुछ दिनों या शायद महीनों के लिए केजरीवाल इसी लहर पर सवार होकर नायकत्व का सुख प्राप्त करते रहे। लोकसभा चुनाव में मोदी को नायकों जैसी प्रतिष्ठा के साथ सत्ता दी है। 

यह एक लगाव वाली खास भावना है, जो किसी अभिनेता, खिलाड़ी और जांबाज फौजी़ को हासिल होती है। 

लेकिन हमारी इसी भावना को भुनाते हैं राजनेता। हम एक व्यावहारिक लोकतंत्र में वंशवादी राजनीति की खामियों की व्याख्या कैसे कर सकते हैं इस पर विचार करने की जरूरत है? हिंदुस्तान में राजनीति पहले की तुलना में अब ज्यादा पारिवारिक उद्यम बन गया है।

सहभागी लोकतंत्र में वंशवादी राजनीति का होना अपने आप में कई तरह के विरोधाभासों को जन्म देता है फिर भी ये मौजूद क्यों है और क्यों प्रतिस्पर्धी राजनीति में भी खत्म नहीं हो रहा है ये एक बड़ा सवाल है। कई बड़ी पार्टियां संगठनात्मक तौर पर वंशवादी नहीं हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनके भीतर राजनीतिक वंश से ताल्लुक रखने वाले सांसद मौजूद नहीं हैं। 

शायद पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर भी राजनैतिक वंशवाद को इतने व्यापक स्तर पर समर्थन हासिल है और ऊपर से ये कि इस मुल्क की जनता ने सिर्फ एक नहीं बल्कि दसियों "खानदानों" को अपने सिर माथे पर बिठाया है। 

उत्तर प्रदेश हो या हरियाणा, तमिलनाडु हो या जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र हो या बिहार...वंशवाद की बेल हर सूबे में परवान चढ़ी है, फल-फूल रही है। ऐसे में सवाल यही खड़ा होता है, अगर पार्टियां खानदानों के प्रभुत्व वाले राजवंशों में तब्दील हो जाएं तो राजनीति में हिस्सेदारी चाहने वाले आम आदमी के हिस्से में क्या जाएगा.. सियासत को खानदानी कारोबार समझने वाले सियासतदां तो बक़ौल अदम गोंडवी आम आदमी के बारे में बस इतना सोचते हैं,

आंख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे,
अपने शाहे-वक़्त का यूं मर्तबा आला रहे।

एवरी थिंग फेयर है इलेक्शन वॉर में।

चुनाव आते हैं, तो वादे बड़े हो जाते हैं, और उससे भी बड़े हो जाते हैं दावे। असली मकसद होता है वोटर को रिझाना। यह मैं कोई नई बात नहीं लिख रहा हूं। आम आदमी के बारे में सोचते वक्त नेताओं के जेह्न में सिर्फ भीड़ होती है। चेहरे वोटों की गिनती में बदल जाते हैं। लेकिन इनमें शायद ही कभी किसान की छवि आती हो। 

महाराष्ट्र हो या हरियाणा के किसान के हिस्से में समस्या ही होती है। खाद के दाम, बीज के दाम, और कर्ज पर लगने वाला ब्याज....सुविधा मुहैया कराना वादो में तो होता है लेकिन सरकार बनने के बाद सारी सोच मुंबई के मंत्रालय या चंडीगढ़ के सचिवालय तक सिमट जाती है।
 
महाराष्ट्र में चुनाव हैं, लेकिन विदर्भ का किसान वैसे ही परेशान है। नागपुर के पास मिहान में बनने वाला एसईजेड दस साल से लगातार बन रहा है। उसका बनना खत्म ही नहीं हो रहा।
 
यों तो खेती की देखभाल राज्य का विषय है, लेकिन चुनाव में मसला उठता है तो सफाई देनी जरूरी हो जाती है। हो सके तो ठीकरा दूसरे के सर पर फोड़ना भी जरूरी हो जाता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने हरियाणा में एक रैली में जैसे ही किसानों के कर्ज पर लगने वाले 4 फीसद ब्याज की बात कही, अगली रैली में भूपिन्दर सिंह हुड्डा ने एलान कर दिया, कि आगे से किसानो को कोई ब्याज नहीं देना होगा।

उधर, एक मसला भ्रष्टाचार का भी है। एक तरफ प्रधानमंत्री हरियाणा में सरकारी ज़मीन के घोटाले को लोगों के सामने उठाते हैं तो मुख्यमंत्री भूपिन्दर सिंह हुड्डा कहते हैं, साबित हो गया तो पद छोड़ देंगे। पद छोड़ देना आसान है, पद पर रहकर अपने वायदे निभाना मुश्किल। नैतिकता को निभाना हमेशा मुश्किल होता है, नैतिक बने रहना आसान।

नैतिकता का सवाल ओमप्रकाश चौटाला के लिए भी है, लेकिन जेल से मेडिकल ग्राउंड पर बाहर आए चौटाला ने चुनाव प्रचार कर साबित किया कि उन के लिए मेडिकल ग्राउंड तो है लेकिन मोरल नाम का कोई ग्राउंड नहीं। 

वैसे वादो, इरादों और दावों के इस दौर में एक हिट हिन्दी फिल्म का महाहिट गाना याद आ रहा है, धोखा अच्छा नहीं है लेकिन प्यार में, एवरीथिंग फेयर है लव और इलेक्शन वॉर में।

Sunday, February 9, 2014

भोजपुरी को अश्लील किसने बनाया?

कॉमिडी नाइट्स विद कपिल देख रहा था। आज यानी 8 फरवरी के एपिसोड में भोजपुरी सिनेमा की तीन हिट शख्सियतें, मनोज तिवारी, रवि किशन और निरहुआ आए थे। यों कपिल शर्मा सबका मजाक बनाते हैं, लेकिन भोजपुरी को लेकर उनके मजाक-भाव में हास्य कम, एक किस्म का उपहास-भाव अधिक था। इस उपहास भाव को बारीकी से देखने की जरूरत है। कईयों को पता नहीं चला होगा, लेकिन मुझे खल गया।

कपिल शर्मा के शो में मजाक बहुतों का बनाया जाता है, कभी खलता नहीं क्योंकि वह कॉमिडी सर्कस की कॉमिडी की तरह सेक्स कॉमिडी या भोंडा नहीं होता। लेकिन, यही कपिल शर्मा जब मीका को बुलाते हैं, तो मीका प्राहजी के साथ सिद्धू को मिलाते हैं और खुद को उसमें जोड़कर पंजाबियत का गुणगान करते हैं। 

यही नहीं, सलमान या अजय देवगन या सोहेल खान को शो में बुलाने पर कपिल का व्यवहार अलग होता है। एक आदर भाव...हंसाते तो हैं कपिल तब भी, लेकिन संभल कर। 

कपिल शर्मा के शो का रेगलर दर्शक हूं, तकरीबन हर शो देखता हूं, इसलिए इस अंतर को बहुत बारीकी से देख पा रहा हूं।

कपिल शर्मा के मन में निरहुआ जैसे अदाकारों को लेकर संभवतया इसलिए अश्रद्धा का भाव था क्योंकि उनकी फिल्मों का बजट, कपिल शर्मा के शो इतना ही होता होगा। या फिर इसलिए क्योंकि भोजपुरी हिन्दी पट्टी के आर्थिक रूप से सबसे कमजोर तबके की भाषा है। लेकिन शायद कपिल शर्मा नहीं जानते हैंशायद तभी उन्होंने अपने शो में इसका जिक्र भी नहीं कियाकि मनोज तिवारी देश के एकमात्र ऐसे अभिनेता हैं, जिनपर नीदरलैंड्स में डाक टिकट जारी हुआ है।

भोजपुरी को लेकर लोगों के मन में एक अश्लीलता की छवि है। यह सवाल मुझसे मेरे एक युवा संपादक मित्र ने भी किया। हालांकि महेश मिश्रा खुद यूपी से हैं, लेकिन भोजपुरी पर उनका सवाल था, और शायद जायज़ भी था। तब मैंने उन्हें बताया, कि भोजपुरी में अश्लीलता का पुट तो गुड्डू रंगीला जैसे बाजार के रसियों ने भरा है। वरना यह भाषा भिखारी ठाकुर की रवायत से फली-फूली है, जिन्होंने बिदेसिया जैसा लोकनाट्य दिया। इस भाषा में महेन्दर मिसर (महेन्द्र मिश्र) की परंपरा है, जिनकी गायन शैली से आज भी बिरहा गाए जाते हैं।

भाषा की छवि भी शायद बाजार ही तय करने लगा है, इसलिए अमिताभ ने अवधी को नायको की भाषा बना दिया वहीं, दक्षिण भारतीय फिल्मों की डबिंग में विलेन की आवाज़ें भोजपुरी में बदल जाती हैं। नायक खड़ी बोली बोलते हैं, विलेन भोजपुरी। एक फिल्म याद आ रही है (मिसाले सैकड़ो में हैं वैसे) राउडी राठौड़। जिसमें भी घटिया किस्म की भोजपुरी (क्योंकि खुद निर्देशक साउथ से हैं) बोलने वाला खलनायक पटना के पास किसी पहाड़ी जगह देवघर से हैं।

सवाल यही है कि क्या, मलयालम में सिर्फ अडूर गोपलाकृष्णन ही फिल्में बनाते हैं या वहां भी शकीला का बाज़ार पर कब्जा है, क्या बांगला में सिर्फ मृणाल सेन हैं या वहां भी प्रसेनजीत हैं क्या मराठी में सिर्फ श्वास बनती है या दादा कोंडके वहीं के हैं?

भोजपुरी को लेकर यह तो दूसरों का नज़रिया है, जिसे जबरिया बदला नहीं जा सकता। लेकिन भोजपुरी सिनेमा के आधार पर भोजपुरी भाषा के प्रति अपना दृष्टिकोण मत तय कीजिए। निश्चय ही, मराठी, मलयालम, कन्नड़ या बांगला में जैसा सिनेमा रचा जा रहा है, वैसा भोजपुरी में बना नहीं अभी तक। लेकिन भोजपुरी सिनेमा की उमर भी तो देखिए। क्या स्कूल के बच्चे की नीयत खुला छोड़ देने पर बंक मारने की नहीं होती?

इधर, भोजपुरी को लेकर जनमानस में बने नज़रिए की बात करें, तो यह आरोप सीधा गुड्डू रंगीला जैसे लोगों पर जाएगा, जिन्होंने फौरी फायदे के लिए भोजपुरी के लोकसंगीत  को तोड़-मरोड़ कर पेश किया। होली के हुड़दंग में निश्चय़ ही कुछ मजाकिया और श्रृंगारिक लोकगीत हैं, लेकिन समाज में उसको मान्यता मिली है। उस कुदरती रंग में रासायनिक जहर मिला कर दाम कमाया जा रहा है। निरहुआ सटल रहे जैसे गाने अश्लीलता के आरोपों को पुष्ट करते हैं।

लेकिन, यह गलती भोजपुरी भाषा की नहीं है। यह गलती तो सिनेमा और बाजारू कैसेट उद्योग की है। कपिल शर्मा ने जिसतरह फिल्मों के नाम भोजपुरी में पूछे, कभी पंजाबी वालों से पूछा? कभी बांगला वालों से...और मराठी से?

कपिल शर्मा, मजाक करते और डिंपल वाले गालों के साथ आप बड़े मनमोहक दिखते हैं, टीवी पर दिखने वाला आपका परिवार भी अच्छा है। सिद्धू जी आप मजाक करते बड़े अच्छे दिखते हैं, लेकिन कृपया किसी भाषा को ऐसे अंदाज़ में न छेड़ें, जिसकी बारीकी को कोई महसूस कर जाए।


Friday, March 23, 2012

यह धूप बाप सरीखा क्यों है?

दिल्ली में मौसम मां-बाप की लड़ाई सरीखा हो गया है। दिल्ली की धूप हमारे जमाने के मास्टर की संटी सरीखा करंटी हुआ करता है। हमारे जमाने इसलिए कहा काहे कि आज के मास्टर बच्चों को कहां पीट पाते हैं।

तो जनाब, तीन दिन बीते, दिन की धूप में बाप-सा कड़ापन आना शुरु ही हुआ था..कि सरदी मां के लाड़-सी बीच में कूद पड़ी। यों कि अब बाबू जी के अनुशासन और मां के लाड़ के खींचतान में बच्चे की तो दुविधा द्विगुणित हो जाए।

सर्द हवा की झोंकों, रात के तापमान में बरफीले अहसास और दिन में बाबूजी सरीखे आंखे लाल किए सूरज की छड़ीनुमा धूप के बीच बच्चा सरीखा आदमी ज्वर में कांपे, खांके, छींके...। अब धूप का रंग  बाबूजी से मिला ही दिया है तो उसके भी कई तेवर हैं...सुबह की धूप, सुबह 11 बजे की धूप, दोपहर की सिर पर तैनात धूप...खेल के वक्त की कनपटी पर पड़ती धूप, ड्रिल मास्टर सरीखी...शाम की धूप विदा कहती प्रेमिका-सी, जाड़े की धूप, भादो के दोपहर की धूप...और न जाने कितने रंग हैं।


रघुवीर सहाय को ये रंग तो कई तरीके का नजर आया हैः
‘एक रंग होता है नीला,
 और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है,
 इसी तरह लाल भी लाल नहीं है,
 बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग,
 दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है,
 सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है,
 और कोई एक रंग जो तेरी बांह पर पड़ा हुआ है।’

धूप पिताजी के अवतार में है, पापा के भी. डैडी के भी...अलग अलग लोगों के लिए अलग-अलग संबोधन..अलग चरित्र। मोंटेक की धूप मनमोहन की धूप...मेरे आपके और एक मजदूर की धूप में अंतर तो होगा ना। धूप में पसीना बहाना...कुछ ऐसा मानो कह रहा हो, आदमी जब तक हारता रहता है जिंदा रहता है। जब जीतने लगता है आदमी नहीं रहता।

लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित ही है...धूप बाप सा तीखा क्यों हो गया। जवाब भी होगा, सरदी की हवाओं ने मां जैसी नरमाई छोड़ी नहीं है अब तक।

आखिर में, शाहरुख खान को याद कीजिए, हर घड़ी बदल रही है रुप जिंदगी, धूप है कभी कभी है छांव जिंदगी...जिंदगी में अभी धूप वाला दौर है।

Thursday, December 29, 2011

सनीः भारतीय पुरुषों के सपनों की नई रानी

नी लियोनी...ने बिग बॉस में धमाल मचाने के बाद एक नया करिश्मा कर दिया है। टीवी के रियलिटी शो से चुपके से निकल कर इस पॉर्न स्टार ने भारतीय पुरुषों के सपनों में घुसपैठ कर ली है। हाल तक शीला की जवानी मर्दों के सपनों में धमाल मचाती रहती थीं...लेकिन करीना, कतरीना, ऐश्वर्य..सबको पीछे छोड़ दिया, करण मल्होत्रा उर्फ करणजीत कौर वोहरा उर्फ सनी लियोनी ने।
सनी परदे पर हों तो लोग सुनना नहीं, देखना पसंद करते हैं
भारत जैसे देश में जहां आज सेक्स पर बात करना भी वर्जित माना जाता है, वहां बिग बॉस के आयोजकों को भी सनी के सीधे प्रवेश पर शक हो रहा था। उन्हें लग रहा था कि शायद भारतीय लोग सनी के विरोध में सड़कों पर उतर आएं। लेकिन मेरे एक नजदीकी दोस्त की तरह सनी के शैदाई भी कम नहीं।

मेरे सहयोगी और मित्र को सनी की मादक काया के साथ ही उसका मासूम चेहरा तो भाता है ही, हजरत सनी की मीठी आवाज के कायल भी है। कभी लीगल कॉरेस्पांडेंट रहे मेरे इस दोस्त के सपनों पर सनी का कब्जा हो गया है।

मेरे इन रिपोर्टर साथी की आंखों में सनी की कशिश अकेली उनकी ही समस्या नहीं है। इस सूची में सनी को सराहने वाली भारतीय युवा पीढ़ी की एक पूरी तादाद है।

इंटरनेट के जमाने में पॉर्न सामग्री कोई वर्जित फल की तरह नहीं है। ऐसे में सनी लियोनी और प्रिया अंजलि राय, गंदे माने जानेवाले इस धंधे में भारतीय परचम की तरह है।
क्या सनी लियोनी विद्या बालन के इश्कि़या और डर्टी पिक्टर वाले देसी सौन्दर्य का एनआरआई जवाब है?

मैं सनी के सौन्दर्य का निश्चित रुप से प्रशंसक हूं, लेकिन साफ कर दूं कि मैं पॉर्न को महिमा मंडित करने कोशिश नहीं कर रहा। साथ ही उसका विरोध भी नहीं कर रहा।

सवाल है कि एडल्ट फिल्मों में काम कर रही इस सुपरस्टारनी के कदम अब बॉलिवुड में भी पड़ चुके हैं। इससे किसे चिंतित होना चाहिए। महेश भट्ट ने जिस्म-2 सनी को ऑफर भी कर दिया है। इसके साथ ही दर्जनों निर्माता भी सनी से संपर्क साध रहे हैं।

हमें सनी की अभिनय क्षमता पर संदेह नहीं होना चाहिए। लेकिन, भारतीय सेंसक बोर्ड अभिनय के जिन मानकों को पास करता है सनी उस तरह का अभिनय कर पाएंगी, यही सवाल लाख टके का है। क्योंकि सनी के अभिनय के मानक भारतीय सेंसर और दर्शक शायद ही खुले तौर पर हजम कर पाएँ।
कतरीना करीना की नींद उड़ा दी है सनी ने

फिर भी, गूगल पर सर्च के मामले में सनी ने भारतीय पुरुषों के सपनों की रानियों को पछाड़ दिया है। सनी को कतरीना  से दस गुना ज्यादा बार सर्च किया गया है।

भारतीय फिल्म उद्योग में संभावनाओं के देखते हुए सनी ने अपने तमाम वीडियो विभिन्न वेब साइटों से डिलीट करवा दिए हैं। हमें पता है कि हम जैसे चित्रांगदा सिंह के मर मिटने वाले प्रशंसकों को छोड़ दें ( देसी बॉयज़ जैसी दो कौड़ी की फिल्म हमने महज चित्रांगदा के लिए देखी) साथ ही एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की भी है, जिनके लिए सनी के लटके-झटके, चेहरे के अलमस्त हाव-भाव ही काफी हैं।

तो क्या विद्या बालन के देसी सेक्स अपील के जवाब में विदेशी खुलेपन के साथ एनआरआई सेक्स अपील आयात की गई है...क्या एक सिल्क स्मिता पुरानी कहानी में नए ट्विस्ट की तरह फिर से इंडस्ट्री में लाई गई है। जो मजबूरी में नहीं मनमर्जी से हार्डकोर पॉर्न व्यवसाय को करिअर बनाती है।

भारतीय पुरुष नेट पर सनी को तलाश रहे हैं...फिल्मवाले बेकरारी से एक मसाला आय़टम को रुपहले परदे पर पेश करने को तैयार हैं...और सपनों में एक नया मादक रंग आ गया है...यह रंग गुलाबी नहीं, सनी है।


Saturday, September 17, 2011

क़िस्सा कहानी-दाल बिरयानी उर्फ धर्मात्मा सेठ जी

एक थे सेठ जी। जैसा कि आमतौर पर कहानियों में होता है, सेठ जी बड़े दयालु थे और प्रायः पुण्य इत्यादि करने के वास्ते हरिद्वार वगैरह जाते रहते थे। एक बार वह गंगासागर की यात्रा पर गए। कहते हैं, सब धाम बार-बार, गंगासागर एक बार। 
ये भी मान्यता है कि गंगासागर जैसी पवित्र जगह में अपनी एक बुरी आदत छोड़कर ही आना चाहिए। इस बाबत सेठ जी अपने दोस्त से बातें कर ही रहे थे, और उसे बता रहे थे कि इस बार वह अपने बात-बात में गुस्सा हो जाने की आदत को गंगासागर में ही छोड़ आए हैँ।

सेठ जी का दोस्त बड़ा खुश हुआ, हमेशा की तरह सेठानी भी मन ही मन नाच उठी कि अब तो सेठ जी उसे हर बात पर नहीं डांटेंगे। जैसा कि आमतौर पर होता है, सेठ जी लोगों का एक नौकर होता है और आमतौर पर उसका नाम रामू ही होता है। इन सेठ जी के भी नौकर का नाम भी रामू ही था।

तो, उसी मुंहलगे रामू से सेठ जी ने पीने के लिए पानी मंगवाया। रामू ने सेठ जी के लिए पानी का गिलास रखते हुए सेठजी और उनके दोस्त के बीच में टांग अडाई और पूछा, "सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ?" सेठ जी जवाब दिया- गुस्सा छोड़ आया हूं। रामू पानी रखकर चला गया।
फिर छोड़ी देर बाद जब वह ग्लास उठाने आया तो उसने फिर पूछा, "सेठ जी, आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ?" सेठजी ने मुस्कुराते हुए कहा, "गुस्सा छोड़ कर आया हूं।"

कुछ देर और बीता रामू फिर सवाल लेकर आ गया- सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ? सेठ जी थोड़े झल्लाए तो सही लेकिन उन्होंने अपने-आपको जब्त करते हुए कहा कि मैं गंगासागर में गुस्सा छोड़कर आया हूं।

फिर रात के खाने का वक्त आया। रामू फिर खुद को रोक न पाया, पूछ ही बैठा- सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ? अब तो सेठ जी का पारा गरम हो गया। जूता उठा कर दौड़े और नौकर को पटक दिया। लातों से उसे दचकते हुए उन्होंने कहा, हरामखोर। तब से कहे जा रहा हूं कि गुस्सा छोड़कर आया हूं तो सुनता नहीं? हर जूते के साथ सेठ जी कहते सुन बे रमुए, गुस्सा छोड़ कर आया हूं, गुस्सा। गुस्सा। गुस्सा।

इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है? 
पता नहीं आपको क्या शिक्षा मिली, मुझे तो ये मिली कि नंबर 1- किसी सेठ के यहां नौकरी मत करो।
२- नौकरी करनी ही पड़ जाए तो सेठ के दोस्तों के साथ बातचीत के दौरान मत उलझो, वह नौबत भी आ जाए तो सवाल मत पूछो और नियम पालन करो कि सेठ एज़ आलवेज़ राइट
३- कभी किसी सेठ की बात का भरोसा मत करो, चाहे वह गंगासागर से ही क्यों न आया हो।

Friday, November 13, 2009

झारखंड: पैंतरा दोनों ओर से है..

एक-दूसरे को कोसते-कोसते भाजपा पलट जिन भाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी और कांग्रेस की ताजा दोस्ती हुई है, उसका हश्र क्या होगा? सूबे में इस सवाल का जवाब खोजा जा रहा है।

सही उत्तर तो चुनाव परिणाम के बाद ही सामने आएंगे, लेकिन कांग्रेस और बाबूलाल कि निष्ठा को लेकर बहस छिड़ी हुई है।



कहने वाले तो कहते हैं, जब कांग्रेस झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन की न हुई, जब आरजेडी वाले लालू यादव और एलजेपी वाले रामविलास पासवान की नहीं हुई तो बाबूलाल किस खेत की मूली है।


पलटवार यह कि जिस संघ की हाफ पैंट की बदौलत झोलाछाप मास्टर से ऊपर उठकर बाबूलाल भाजपा के भग-वे के भरोसे केंद्र में मंत्री बने, राज्य के मुख्यमंत्री बने, वे जब उसके न हुए तो कांग्रेस के नीचे कब तक रहेगे?



अर्थात्, पैंतरा दोनों ओर से है..।