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Friday, June 30, 2017

टाइम मशीन 2ः क़िस्सा नल-दमयंती

नल को दमयंती से प्यार था और दमयंती को नल से. न कभी मिले, न कभी देखा...बस आवाज़ सुनी. दोनों सपनों में एक-दूसरे को देखते, कभी कश्मीर की वादियों में मिलते. चिनार के नीचे बिछी बर्फ़ीली चादर पर अंधेरी रातों में चलते, नश्तर चुभोती हवा में हाथ थामे सबसे चमकते तारे को निहारते और फिर सीसीडी के भीतर जाकर हॉट-चाकलेट और ब्राउनी ऑर्डर करते. 

वे कभी जंगलों में मिलते, कभी रेगिस्तान में. कभी दमयंती नल को अपने हाथों से आलू के परांठे खिलाती, कभी दोनों साथ झूले पर झूलते हुए अतीत और भविष्य बतियाते.
लेकिन दोनों कभी मिले नहीं थे. 

...और अब दमयंती का स्वयंवर था. स्वयंवर में दिलेर और सुंदर राजकुमारों, कमनीय देवताओं की भीड़ में नल कहीं दुबका हुआ था.
देवताओं को भी दमयंती पसंद थी और उनतक दमयंती के मुहब्बत के क़िस्से पहुंच चुके थे. आनन-फानन में देवताओं ने नल का बाना धर लिया. दमयंती परेशान. पांच-पांच नल जैसे लोग! कौन है असली?
दमयंती पास गई तो देखाः पांच में से सिर्फ एक की परछाईं है, माथे पर पसीने की बूंद है, देह की एक ख़ास गंध है, जिसे सूंघकर दमयंती ने कहा था- "मुझे तुम पसंद हो. तुम्हारी गंध भी."

दमयंती ने पसीने-देहगंध और परछाईं वाले इंसान नल को चुन लिया.

#टाइममशीन #एकदा #प्रेमकहानी

Thursday, December 1, 2016

नागफ़नी

तपते रेगिस्तान में कैक्टस सीना ताने खड़ा था। गुलाब-केतकी-गेंदे की तरह उसे कभी किसी माली ने खाद-पानी नहीं दिया था, कभी उसकी कटिंग-प्रूनिंग भी नहीं हुई थी। किसी ने कभी जड़ में पानी तक नहीं दिया। वक़्त के साथ कैक्टस के कांटे तीखे हो गए थे। एकदम दरांती की तरह तेज़। और कैक्टस उर्फ नागफनी का फन नाग की तरह ज़हरीला हो गया।

तेज़ धूप, गरम हवा के थपेड़े, अपने ही कांटों से छिला बदन। रेगिस्तान में बारिश कहां होती थी, कभी भी नहीं। लेकिन इधर पता नहीं कहां से काली घटा आई, अपने गीले बालों से उसने कैक्टस को लपेट लिया, बालों से गिरती बूंदो ने कैक्टस को भिंगो दिया।

कैक्टस घटा के आगोश में था, तपती धरती पर गिरी बूंदो से जो सोंधी सुगंध निकली, उसने कैक्टस को मदहोश कर दिया। उसने ज़िंदगी में पहली दफ़ा ऐसी बू सूंघी थी। मेघा बोली, 'प्यारे कैक्टस, अब तेरा सारा ज़हर मेरा, तेरे सारे दर्द मेरे।' मेघा की न(र)मी से कैक्टस का ज़हर धुल गया। कांटे नरम पड़ गए और पत्तियों में बदल गए। कली निकल आई, फूल खिलने ही वाला था कि घटा हवा के साथ ऊपर उठ गई, उठती गई। एकदम आसमान में जाकर सिरस बादलों में तब्दील हो गई...मेरे प्यारे कैक्टस, तुम तो मेरे हीरो हो, अब से तुम कांटो के लिए नहीं, फूलों के लिए जाने जाओगे...अब तुम रेत पर कविताएं लिखा करना।

कैक्टस ने सिर उठाकर देखा, उसकी मेघा हमेशा उसके ऊपर रहने वाली थी, रेगिस्तान में हरा कैक्टस सीना ताने फिर खड़ा हो गया। धूप, लू के थपेड़ों, गरमी...अब किसकी परवाह थी उसे।


Tuesday, May 22, 2012

फलकः कुछ उम्दा रचनाएं

फलक (फेसबुक लघु कथाएं) के मंच पर लोग लगातार लिख रहे हैं। उम्दा लिख रहे हैं। हम उनमें से कुछ ताजा उम्दा रचनाओं को यहां आपके साथ साझा कर रहे हैं-गुस्ताख़

कथाः एक

बचपन
विजय राज सिंह
कथाकारः विजय राज सिंह
उसने फोन करके कहा, आज से मेरी छुट्टियां शुरू हैं, पापा मुझे यहाँ घूमने जाना, पापा मुझे अपने लिए स्केट ख़रीदने है आपमें वादा किया था कि हॉलिडेज में दिलाएंगे ... मुझे यह करना है मुझे वो करना है।

उसकी अपने मम्मी-पापा के साथ यह चर्चा सुनकर धीरे धीरे मैं भी अपने बचपन की यादों में खोता जा रहा था। अन्दर-अन्दर बचपन एक बार फिर से पैदा होने के लिए हिलोरें मार रहा था। लग रहा था काश एक बार बस एक बार मेरा बचपन लौट आये और मैं फिर से उससे जीभर कर जी लूं।

(विजय राज सिंह दूरदर्शन न्यूज़ में ब्रॉडकास्ट एक्जीक्यूटिव हैं)

कथाः दो

प्यार
कथाकारः सुशांत झा
सुशांत झा
गलती उसकी भी नहीं थी, उसने तीन साल तक इंतजार किया। गलती मेरी भी नहीं थी, इस तीन साल में जब-2 मैंने शादी का मन बनाया, मेरी नौकरी चली गई। यह अरेंज मैरेज का ही मामला था उसके पिता ने मेरे घर पैगाम भेजा था। हम फेसबुक फ्रेंड भी थे। यह कोई प्लेटोनिक लव नहीं था, एक भरोसा था जो धीरे-धीरे पनप रहा था। लेकिन आखिरकार उसने घरवालों के दवाब के आगे घुटना टेक दिया। बस, एक ही खुशी है कि उसे अच्छा लड़का मिला। एक ही खुशी है कि मैंने उसे अपने नौकरी के बारे में गलत जानकारी नहीं दी। धोखा नहीं दिया।


(सुशांत झा कई मीडिया संस्थानों में काम करने के बाद आजकल फ्रीलांसर हैं, रामचंद्र गुहा की किताब इंडियाः आफ्टर गांधी का उन्होंने हिंदी अनुवाद किया है। पेंग्विन से शीघ्र प्रकाश्य। अन्य किताबों में व्यस्त।)
कथाः तीन

हिपोक्रेसी

कथाकारः सिद्धार्थ श्रीवास्तव
सिद्धार्थ श्रीवास्तव
साब! ठंढा ले लो, सफर की थकान दूर हो जाएगी। ठंढे वाले ने ओपेनर को बोतलों पे चला कर चिरपरिचित ठंढतरंग बजाई। इस ठंढतरंग से उसकी तंद्रा टूटी। 

 माई, ठंढा लेबे।

माँ ने इनकार मे सर हिला दिया।  तू ले ला, थाक लाग गइल होई।  उसने भी इनकार मे सर हिला दिया।

 दोनों फिर से चिंताओ के सागर मे उतराने लगे। अब कुछ महीनों के लिए उसके हिस्से मे माँ है। माँ के रहने का मतलब व्यर्थ की खड़ी की गई शिकवा- शिकायतों मे फिर वो मथा जाएगा और उससे निकलने वाले हलाहल...... वो भी उसके ही भाग्य मे तो है।

 बस स्टैंड से घर तक के रास्ते मे जगह-जगह मदर्स डे के बैनर-पोस्टर उसकी मजबूरी पर उसे बिराते हुए से लग रहे थे।

(सिद्धार्थ श्रीवास्तव उत्तराखंड में सरकारी नौकरी में हैं और फलक पर कहानियों का शतक जमा चुके हैं, हमारे स्टार कथाकार)

कथाः चार

भरोसा

दीपिका लाल
कथाकारः दीपिका लाल

'सोना कहां हो.....?'
'ओटी में। काफी सिरियस केस आया हुआ है। एक्सीडेंट का। बाद में बात करता हूं।'

दो घंटे बाद... 'कहां हो सोना...?'
'बाबू खाना खा रहा हूं।'

तीसरे घंटे- 'वेयर आर यू...?'
'इन हास्पीटल डीयर...'
'...और मैं तुम्हारे सामने हूं...!'

वो चौंका..... मैं सिर्फ शाक्ड थी। पिछले तीन घंटे वो रासलीला में मग्न था। मैं लगातार तीन घंटे से वहां खड़ी सब देख रही थी। उस पल के लिए उसकी नजरें नीचे झुक गई... और उम्र भर के लिए मेरा भरोसा...

लौटते समय उसकी आवाज सुनाई दे रही थी.... कम बैक.... लेकिन जाने कहां टकराकर लौट जा रही थी.... भरोसे का एक्सीडेंट हो चुका था.. इस केस को न तो ओटी में भेजा जा सकता था... न ही आपरेशन के बाद बचने का कोई चांस था....

(दीपिका लाल, दो अंग्रेजी अखबारों में रिपोर्टर रह चुकी हैं, फिलहाल ऑल इंडिया रेडियो में है।)


कथाः पांच

पटने के लड़के
कथाकारः अविनाश कुमार चंचल
अविनाश कुमार चंचल
हौज खास मेट्रो से मुनिरका तक ही दोनों को साथ जाना था। इतने में 511 बस आके रूकी। लड़का झट से बस में चढ़ गया। लड़की की नजर बस के डबल खाली सीट ढुंढ़ने लगी। इतने में लड़की ने लड़के का हाथ पकड़कर झट से नीचे खींच लिया। लड़का कहता रहा,"अरे। इसी से चलेंगे, हरी वाली है डीटीसी पास है टिकिट नहीं लेना पड़ेगा"

 लड़की-''नहीं। बस में एक साथ दो सीट खाली नहीं है, ऑटो से चलेंगे''

 लड़की ने ऑटो वाले से 40 रूपये में किराया फिक्स किया, इधर लड़का सोचता रहा,"इतने में तो जेएनयू में खाना खा लेते"

मुनीरका में बर्फ चुस्की खाने का प्लान बना।

"का, दस रूपये में एगो। एतना में तो दुनो आदमी खा लेंगे भाई"-लड़का बर्फ वाले से मोल-तोल करने में लगा था।

लड़की सोच रही थी-"उफ्फ! ये पटने के लड़के !
(अविनाश कुमार चंचल भारतीय जनसंचार संस्थान से ताजा-ताजा निकरे हैं, फलक के सक्रिय सदस्य, बेहद
ऊर्जावान्)
कथाः छह

आगजनी
मूल कथाः मंटो
संकलकः मंजीत ठाकुर

आग लगी तो सारा मुहल्ला जल गया--सिर्फ एक दुकान बच गई, जिसकी पेशानी पर यह बोर्ड लगा हुआ था---
'यहां इमारत-साज़ी का सारा सामान मिलता है'

Sunday, November 27, 2011

फलक- फेसबुक लघु कथाएँ उम्दा रचनाएँ

मेट्रो मुहब्बतः

कुलदीप मिश्रा
कथाकारः कुलदीप मिश्रा

(कुलदीप मिश्रा दैनिक भास्कर में चंडीगढ़ में सह-संपादक हैं। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर चुके कुलदीप सीएऩईबी टीवी चैनल में भी काम कर चुके हैं)
शंका, उम्मीद, एक्साइटमेंट। कुछ कॉकटेल सा था दोनों के मन में। फर्स्ट टाइम मिलना बड़ा अजीब होता है। बाइ गॉड। सोचते हुए वो पीतमपुरा मेट्रो पहुंच गई। ये भी शमशेर बहादुर पढ़कर तैयार हुआ। कटवारिया का मुंशी प्रेमचंद पीतमपुरा की लेडी गागा से मिलने वाला था। बीच की कहानी रिकॉर्ड में नहीं है।

वो कुर्ते और चप्पल पर भड़की थी और ये उसके भड़कने पर।

आठ बजे की दिल्ली। सड़कों पर धुंधली रौशनी थी। दिल्ली के ऑफिस वालों के साथ लौट रहे थे दोनों। ख़्यालों के कॉकटेल से लबालब।



2. रोना  
विनायक काले
कथाकारः विनायक काले

( विनायक काले हैदराबाद विश्वविद्यालय में पढाते हैं, और फेसबुक लघुकथा मंच के सक्रिय सदस्य हैं)

 उसने कहा,
“किसी के मृत्यु पर
रोते क्यों नहीं तुम?”
मैंने कहा,
“ब्रेकींग न्यूज़ देखकर उब गया हूँ मैं।”

3. सेल

कथाकारः विनायक काले
सने कहा,
“सुनामी के समाचारों के बीच आते
साबुन और कंडोम के ऐड के बारे में क्या कहोगे तुम?”
मैंने कहा,
“बाजार में इन्सान खोज रहा हूं मैं"



4. वफादारी

कथाकारः मंजीत ठाकुर

दोपहर को भयंकर गरमी थी। जोरों की लू चल रही थी। मैं एक बाईट के चक्कर में कांग्रेस दफ्तर गया। वहां मीडिया सेंटर वाले कमरे में कुरसी पर बैठे नेता ने जोरों से हवा देते पंखे का रुख अपनी बजाय, सोनिया गांधी की तस्वीर की ओर कर रखा था.

Wednesday, August 24, 2011

फलक (फेसबुक लघु कथाएं)- तीन उम्दा रचनाएं

मित्रों, नई मीडिया के सामने आने पर हमने सोचा की कथा के स्वरुप में भी एक बदलाव जरुर आना चाहिए। फेसबुक पर इसी अंदाज में रवीश कुमार लप्रेक (लघु प्रेम कथाएं) लिख रहे हैं। हमने सोचा सभी कथाएं प्रेमकथाएं नही होती, ऐसे में फलक की शुरुआत हुई। पहले इसका नाम फेलक था, लेकिन अजय ब्रह्मात्मज के सुझाव पर इसे फलक कर दिया, जाहिर है बेहतर है। फलक के हाल-फिलहाल की तीन कथाओं को हम यहां साझा कर रहे हैं, इनके शीर्षक भी नहीं है। आप चाहें तो शीर्षक सुझा सकते हैं।---


कथा एकः  
'कभी हमारे घर को भी पवित्र करो।' करूणा से भीगे स्वर में भेड़िये ने भोली-भाली भेड़ से कहा 'मैं जरूर आती बशर्ते तुम्हारे घर का मतलब तुम्हारा पेट न होता।' भेड़ ने नम्रतापूर्वक जवाब दिया।
कथाकार- नीरज शर्मा। 

कथा दोः
इंद्रप्रस्थ मे अन्ना की रैली देखने युधिष्ठिर भी पहुंचे। कुछ देर बाद गला प्यास से सूखने लगा तो पास के नल पर पहुंचे। नल खोला तो सूं सूं की आवाज के बाद एक कीड़ा नल से टपका और देखते ही देखते एक यक्ष मे तब्दील हो गया। यक्ष ने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक युधिष्ठिर से प्रश्न पूछा " हे युधिष्ठिर! इस रैली के बाद फिर से कौन छला जाएगा? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया हे यक्ष! इस बार फिर जनता ही छली जाएगी। यक्ष ने फिर प्रश्न पूछा "तो युधिष्ठिर इस भारत भूमि पर फिर कौन राज करेगा? युधिष्ठिर ने जवाब दिया " हे यक्ष! इस भारत भूमि पर राजपरिवार की अगली पीढ़ी ही हज़ारे उपनाम लगा कर राज करेगी। नल से पानी शर्मसार होकर बहने लगा था।
कथाकारः सिद्धार्थ श्रीवास्तव।  
(2 दिसंबर 1972 को पैदा हुए  सिद्धार्थ ने गोविंद वल्लभ पंत यूनिवर्सिटी ऑफ अग्रीकल्चर एंड टेक्नॉलजी से पढाई की है। फेसबुक पर मेरे मित्र है।)

कथा तीनः
सरकारी नाई ने बाल काटते समय कपिल सिब्बल से पूछा- 'साहब, यह स्विस बैंक वाला क्या लफड़ा है? सिब्बल चिल्लाये, 'अबे, तू बाल काट रहा है या इन्क्वारी कर रहा है?
नाई बोला, सॉरी। 
अगली बार नाई ने चिदम्बरम से पूछा- 'यह काला धन क्या होता है? चिदम्बरम चिल्लाये- तुम हमसे ये सवाल क्यूँ पूछता है? 
अगले दिन सीबीआई की टीम ने नाई से पूछताछ की। 
क्या तुम बाबा या अन्ना के एजेंट हो? 
नहीं, 
तो फिर तुम बाल काटते वक़्त काग्रेस के नेताओं से फालतू सवाल क्यूँ करते हो? 
नाई बोला- साहब ना जाने क्यूँ स्विस बैंक और काले धन के नाम पर इन कांग्रेसियों के बाल खड़े हो जाते है और मुझे बाल काटने में आसानी हो जाती है. इसलिए पूछता रहता हूँ...!
कथाकार- सुशांत झा। 
आईआईएमसी से रेडियो-टीवी पत्रकारिता पढ़ चुके सुशांत की राजनीतिक समझ बहुत बेहतर है। फिलहाल, कुछ अंग्रेजी किताबों के अनुवाद में लगे हैं। शीघ्र प्रकाश्य।