आज की तारीख में हिंदुस्तान कोरोना वायरस से बहुत अधिक त्रस्त है और पिछले साल फरवरी–मार्च में जब कोरोना का प्रसार शुरू ही हुआ था तब लोगों ने—जिन्होंने विज्ञान या कृषि विज्ञान नहीं पढ़ा था—एक नया शब्द सुना थाः क्वॉरंटाइन या गाढ़ी हिंदी में जिसका अनुवाद था संगरोध.
वायरस के प्रसार को रोकने के लिए क्वॉरंटाइन करने को सबसे अच्छा तरीका माना गया है और दुनियाभर में और भारत में भी जो लॉकडाउन लगाया गया है, वह भी क्वॉरंटाइन का सामूहिक तरीका ही है. यानी, इसके पीछे अवधारणा है लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए एक-दूसरे से अलग-थलग रखना. आपको हैरत होगी कि इस तरीके की खोज की थी, एक मुस्लिम वैज्ञानिक ने और उनका नाम है इब्न सिना.
पश्चिमी देशों में मध्यकाल के इस मुस्लिम वैज्ञानिक को एविशियेना (Avicenna) के नाम से जाना जाता है और उनका समय 980 ईस्वी से 1037 ईस्वी तक का माना जाता है. इनका जन्म बुखारा के पास अफसां में हुआ था और इनका निधन हमदां में हुआ था. इनके माता-पिता ईरानी वंश के थे. इनके पिता खरमैत: के शासक थे. इब्न सिना ने बुखारा में शिक्षा हासिल की और शुरू में कुरान और साहित्य का अध्ययन किया.
इब्न सिना का पूरा नाम अली अल हुसैन बिन अब्दुल्लाह बिन अल-हसन बिन अली बिन सिना है. इब्न सिना न सिर्फ वैज्ञानिक थे, बल्कि यह चिकित्सक, खगोलशास्त्री, गणितज्ञ और दार्शनिक भी थे.
उनकी गणित पर लिखी 6 पुस्तकें मौजूद हैं जिनमें ‘रिसाला अल-जराविया’, ‘मुख्तसर अक्लिद्स’, ‘अला रत्मातैकी’, ‘मुख़्तसर इल्म-उल-हिय’, ‘मुख्तसर मुजस्ता’, ‘रिसाला फी बयान अला कयाम अल-अर्ज़ फी वास्तिससमा’ (जमीन की आसमान के बीच रहने की स्थिति का बयान) शामिल हैं.
असल में, आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में, जिसे यूरोप ने अपनाया और फिर विकसित किया, इब्न सिना का योगदान बेहद अहम है.
ये इस्लाम के बड़े विचारकों में से थे, इब्न सिना ने 10 साल की उम्र में ही कुरआन हिफ्ज़ कर लिया था. शरिया के अध्ययन के बाद इन्होंने तर्कशास्त्र, गणित, रेखागणित और ज्योतिष में योग्यता हासिल की. जल्दी ही, इन्होंने निजी अध्ययन से भौतिकी और चिकित्सा की पढ़ाई की और हकीमी सीखते हुए ही उसकी प्रैक्टिस भी शुरू कर दी.
एक बार जब बुखारा के सुल्तान नूह इब्न मंसूर बीमार हो गए और उनके इलाज में किसी हकीम की कोई दवा कारगर साबित नहीं हो रही थी, तब इब्न सिना ने उनका इलाज किया था. और उस वक्त उनकी उम्र महज 18 साल की थी.
बहरहाल, इब्न सिना की दवाई से सुल्तान इब्न मंसूर स्वस्थ हो गए तो उन्होंने खुश होकर इब्न सिना को पुरस्कार दिया. और यह पुरस्कार भी खास था. सुल्तान ने उन्हें एक पुस्तकालय सौगात में दिया था. इब्न सिना की स्मरण शक्ति बहुत तेज़ .थी उन्होंने जल्द ही पूरा पुस्तकालय छान मारा और जरूरी जानकारी एकत्र कर ली, और फिर 21 साल की उम्र में अपनी पहली किताब लिखी.
जानकारों का मानना है कि इब्न सिना ने कुल 21 बड़ी और 24 छोटी किताबें लिखी थीं. लेकिन कुछ विद्वानों का दावा है कि उन्होंने 99 किताबों की रचना की.
बिला शक उनकी सबसे मशहूर किताब है ‘किताब अल कानून’, जो चिकित्सा की एक मशहूर किताब है. इस किताब का अनुवाद अन्य भाषाओं में भी हो चुका है. खास बात यह है कि उनकी यह किताब 19वीं सदी के अंत तक यूरोप के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती रही है.
इन्होंने कई बड़ी पुस्तकें लिखीं जिनमें अधिकतर अरबी में और कुछ फारसी में थीं. इनमें खासतौर पर दर्शन कोश 'किताबुल् शफ़ा', जो 1313 ई. में तेहरान से छपा था, और हकीमी पर लिखा ग्रंथ 'अलक़ानून फीउल् तिब' है जो 1284 ई. में तेहरान से छपा था. 'किताबुल् शफ़ा' अरस्तू के विचारों पर केंद्रित है, जो नव अफ़लातूनी विचारों तथा इस्लामी धर्म के प्रभाव से संशोधित हो गए थे. इसमें संगीत की भी व्याख्या है. इस ग्रंथ के 18 खंड हैं और इसे पूरा करने में 20 महीने लगे थे.
'अल्क़ानून फीउल् तिब' में यूनानी तथा अरबी वैद्यकों का अंतिम निचोड़ पेश किया गया है. इनका एक कसीदा बहुत प्रसिद्ध है जिसमें इन्होंने आत्मा के उच्च लोक से मानव शरीर में उतरने का वर्णन किया है. मंतिक (तर्क या न्याय) में इनकी श्रेष्ठ रचना 'किताबुल् इशारात व अल्शबीहात' है.
इन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखी थी जिसका संकलन इनके प्रिय शिष्य अल्जुर्जानी ने किया.
इब्न सिना के नाम पर कई यूरोपीय देशों में उके नाम से डाक टिकट जारी किये गए हैं. इब्न सिना के जीवन पर पर एक फिल्म भी बनी. 2013 में रिलीज हुई इस फिल्म का नाम था ‘द फिजिशियन’ और इसमें इब्न सिना का किरदार निभाया था हॉलीवुड के मशहूर अदाकार बेन किंग्सले ने.
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Tuesday, May 11, 2021
Sunday, January 27, 2019
सबसे कामयाब प्रजाति इंसान नहीं गेहूं है.
हमने गेहूं को घरेलू नहीं बनाया, गेहूं ने हमें घरेलू बना दिया. डोमिस्टिक मतलब घर, घर में कौन रह रहा है? हम या गेहूं? जाहिर है, हम.
कुछ ही हजार वर्षों के भीतर इसकी पैदावार सारी दुनिया में होने लगी. लेखक, युवाल नोआ हरारी अपनी किताब होमोसेपियंस में स्थापित करते हैं कि उत्तरजीविता और पुनरुत्पादन के बुनियादी विकास मानकों के अनुसार, गेहूं पृथ्वी के इतिहास की सबसे कामयाब वनस्पति बन चुका है. उत्तरी अमेरिका के विशाल मैदानों में जहां 10,000 साल पहले गेहूं का एक डंठल भी पैदा नहीं होता था वहां आज की तारीख में सैकड़ों किलोमीटर तक आपको गेहूं के अलावा कोई और वनस्पति नजर नहीं आएगी. पूरी दुनिया के स्तर पर मापें तो गेहूं भूमंडल की 25 लाख वर्ग किमी सतह को घेरता है, जो ब्रिटेन के आकार से दस गुना है.
यह घास एक नाचीज से सर्वव्यापी में कैसे बदल गई?
हरारी लिखते हैं, असल में, खाद्य संग्राहक और शिकारी इंसान अच्छा-खासा जीवन जी रहा था, पर फिर इसने गेहूं की खेत से ज्यादा से ज्यादा उद्यम लगाने की शुरुआत की. उसके बाद मनुष्य गेहूं के अलावा किसी और प्रजाति पर कम ध्यान देने लगा. गेहूं को चट्टानें और कंकड़-पत्थर पसंद नहीं थे इसलिए सेपियंस इन सब चीजों से खेतों को साफ करने में कमर तोड़ मेहनत करने लगे.
गेहूं को अपनी जगह, पानी और पोषक तत्व साझा करना पसंद नहीं था इसलिए लोग दिन भर खेतों की निराई करने लगे. कीड़ो और पाले पर निगहबानी जरूरी थी. खरगोश से लेकर चूहों तक से रक्षा जरूरी थी. गेहूं प्यासा था तो मनुष्य झरनों और नदियों से पानी ढोकर उसकी सिंचाई करते थे. यहां तक कि इसकी भूख ने सेपियंस को जानवरों का मल इकट्ठा करने को मजबूर कर दिया, ताकि पौधे को पोषण मिल सके.
खेतों में मेहनत करने और पानी की बाल्टियां ढोने की कीमत हरारी के मुताबिक, इंसान की रीढ़ों, घुटनों, गरदनों और तलुओं के मेहराबों को चुकानी पड़ीं. कृषि के विकास ने स्लिप डिस्क, गठिया और हॉर्निया जैसी बीमारियों को जन्म दिया.
लोगों की जीवन पद्धति बदल गई. खानाबदोश सेपियंस अब एक जगह बस गए. हरारी कहते हैं, हमने गेहूं को घरेलू नहीं बनाया, गेहूं ने हमें घरेलू बना दिया. डोमिस्टिक मतलब घर, घर में कौन रह रहा है? हम या गेहूं? जाहिर है, हम.
Sunday, March 4, 2018
फूटा घट-घट घटहिं समाना
अभिनेत्री श्रीदेवी के अचानक निधन से पूरा देश सदमे में आ गया था. 24 फरवरी की रात अचानक खबर आई कि दुबई में श्रीदेवी का हार्ट अटैक से निधन हो गया. खबर सुनते ही बॉलीवुड के तमाम सितारे सोशल मीडिया पर शोक जताने लगे और उन्हें श्रद्धांजलि देने लगे. लेकिन श्रीदेवी के निधन पर जिस तरह से मीडिया कवरेज हुई उससे अभिनेता ऋषि कपूर थोड़े नाराज भी दिखे.
उन्होंने ट्वीट किया, "अचानक श्रीदेवी 'बॉडी' कैसे बन गईं? सारे टीवी चैनल दिखा रहे हैं कि बॉडी आज रात मुंबई लाई जाएगी. अचानक आपकी पहचान खत्म हो गई और बॉडी बन गई."
थोड़ी देर के लिए मीडिया कवरेज को छोड़ दीजिए, तो ऋषि कपूर की इस नाराजगी का जबाव भारतीय परंपरा और मनीषा में मिलता है. हिंदू जीवन धर्म में जन्मतिथियों के मनाने की परंपरा है और पुण्यतिथि सिर्फ पिता की मनाई जाती है. क्योंकि पिता की मृत्यु की घटना जीवन से जुड़ी है. भारतीय परंपरा कहती हैकि मृत्यु के अनंतर ही पिता का सारा ऋण पुत्र को हस्तांतरित होता है.
कोई सामान्य हिन्दू श्राद्ध की सारी विधियां पूरी करे या न करे, दाह संस्कार के बाद पीपल के पेड़ के नीचे एक घड़ा जरूर बांधता है. उस घड़े में नीचे छोटा-सा छेद कर दिया जाता है. प्रतिदिन उस घड़े में पानी भरा जाता है और यह अपेक्षा की जाती है कि पानी निरंतर पीपल की जड़ में गिरता रहे. उस घड़े के पास प्रतिदिन दीपक जलाया जाता है.
यह जीवन की साधना है.
महाप्रयाण के लिए गया जीवन ही उस घड़े के रूप में सनातन काल की शाखाओं में उतने दिनों तक लटका दिया जाता है जितने दिन प्रतीक रूप में उसे नया जन्म ग्रहण कर लेना है. और तब इस प्रतीक की जरूरत नहीं रह जाती है. इस प्रतीक की सार्थकता खत्म हो जाती है तो इसे भी फोड़ दिया जाता है, 'फूटा घट-घट घटहिं समाना'. एक चेतन व्यक्ति समष्टि में, सृष्टि में वापस चला जाता है.
विज्ञान पढ़ने वाले लोग जानते होंगे, हम सभी मूलतः ऊर्जा से बने हैं. हम एनर्जी का पार्ट हैं. उस एनर्जी या ऊर्जा को जो इस अखंड ब्रह्मांड में व्याप्त है और हर ओर प्रवाहित हो रही है. ऊर्जा के संरक्षण का सिद्धांत कहता है, 'ऊर्जा का न तो नाश हो सकता है न उसका सृजन किया जा सकता है. वह सिर्फ रूपांतरित हो सकता है.'
क्या भौतिकी का यह सामान्य नियम आपको गीता के श्लोकों की याद दिला रहा है? बिलकुल सही, हम सभी ऊर्जा का हिस्सा हैं और उसी में चले जाते हैं. आप चाहें तो इसको 'पंचतत्वों में विलीन हो जाना' भी कह सकते हैं.
क्षिति जल पावक गगन समीरा,
पंच रचित अति अधम शरीरा।
शरीर के भौतिक अवशेषों को गंगा की धारा में या तीर्थ में प्रवाहित करने के पीछे भी जीवन की निरंतरता की खोज की भावना है. भस्मीभूत अवशेष एक अध्याय की समाप्ति के प्रतीक भर हैं, वे पूरी तरह अशुचि हैं. अपवित्र हैं. उन्हें छूने भर से आदमी अपवित्र हो जाता है, क्योंकि आदमी मृत्यु को छूने के लिए नहीं बना है. वह जीवन का प्रतीक है. इसलिए मृत्यु अशौच है, अपवित्र है. आदमी की देह जीवन के पार जीवन की खोज के लिए साधन है. भारतीय परंपरा कहती है ऐसे साधन देवताओं तक को मयस्सर नहीं है.
लेकिन बदलते वक्त में चलन उल्टा हो गया है. भस्मियां पवित्र हो गई हैं. उनको ताम्र कलशों में रखा जाने लगा है. चुपचाप शांति से प्रवाहित करने की बजाय बड़े-बड़े जुलूस निकाले जाते हैं. उनको एक जगह नहीं, जगह-जगह प्रवाहित करने का चलन चल पड़ा है. मृत्यु की पूजा भोंडे तरीके से शुरू हो गई.
दिवंगतों की मूर्तियों की स्थापना की जाने लगी हैं. मंदिर बनने लगे हैं. जो चला गया, उसकी पार्थिव आकृति इतिहास के लिए भले जरूरी हो, पर उसकी पूजा क्यों?
श्रीदेवी के मामले में उनका काम ही अनुकरणीय है. सिनेमा की कला में उनका योगदान ही सराहा जाना चाहिए. शरीर तो रीत गया, फूट गया (घड़े की तरह) तो उसकी पूजा क्यों?
यह श्लोक ऋषि कपूर ने नहीं सुना हो तो सुनना चाहिए,
न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं न पुनर्भवम।
कामये दुःख ऋतांना केवलमार्स्त्तिनाशनम्।।
यानी, न मैं राज्य चाहता हूं न स्वर्ग, न पुनर्जन्म के चक्कर से मुक्ति. मैं केवल दुखितों के पीड़ा हरने का अवसर चाहता हूं.
जो कुछ भी जैसा जीवन चारों तरफ है, उसकी साझेदारी यही हिन्दू सनातन परंपरा का मूल तत्व है. दर्शन है.
ऐसे में श्रीदेवी का कार्य ही उनकी पहचान है. बाकी जो बचा हुआ है, पांच तत्वों वाला, वह घड़ा है रीता हुआ, खाली हुई देह है, बॉडी है. मैं जानता हूं कि संवेदनशील ऋषि कपूर बेहद शोकाकुल हैं पर उऩको श्रीदेवी के पार्थिव शरीर को 'बॉडी' कहने पर नाराज नहीं होना चाहिए.
(यह लेख इंडिया टुडे में प्रकाशित हो चुका है, कृपया कहीं और प्रकाशित न करें)
उन्होंने ट्वीट किया, "अचानक श्रीदेवी 'बॉडी' कैसे बन गईं? सारे टीवी चैनल दिखा रहे हैं कि बॉडी आज रात मुंबई लाई जाएगी. अचानक आपकी पहचान खत्म हो गई और बॉडी बन गई."
थोड़ी देर के लिए मीडिया कवरेज को छोड़ दीजिए, तो ऋषि कपूर की इस नाराजगी का जबाव भारतीय परंपरा और मनीषा में मिलता है. हिंदू जीवन धर्म में जन्मतिथियों के मनाने की परंपरा है और पुण्यतिथि सिर्फ पिता की मनाई जाती है. क्योंकि पिता की मृत्यु की घटना जीवन से जुड़ी है. भारतीय परंपरा कहती हैकि मृत्यु के अनंतर ही पिता का सारा ऋण पुत्र को हस्तांतरित होता है.
कोई सामान्य हिन्दू श्राद्ध की सारी विधियां पूरी करे या न करे, दाह संस्कार के बाद पीपल के पेड़ के नीचे एक घड़ा जरूर बांधता है. उस घड़े में नीचे छोटा-सा छेद कर दिया जाता है. प्रतिदिन उस घड़े में पानी भरा जाता है और यह अपेक्षा की जाती है कि पानी निरंतर पीपल की जड़ में गिरता रहे. उस घड़े के पास प्रतिदिन दीपक जलाया जाता है.
यह जीवन की साधना है.
महाप्रयाण के लिए गया जीवन ही उस घड़े के रूप में सनातन काल की शाखाओं में उतने दिनों तक लटका दिया जाता है जितने दिन प्रतीक रूप में उसे नया जन्म ग्रहण कर लेना है. और तब इस प्रतीक की जरूरत नहीं रह जाती है. इस प्रतीक की सार्थकता खत्म हो जाती है तो इसे भी फोड़ दिया जाता है, 'फूटा घट-घट घटहिं समाना'. एक चेतन व्यक्ति समष्टि में, सृष्टि में वापस चला जाता है.
विज्ञान पढ़ने वाले लोग जानते होंगे, हम सभी मूलतः ऊर्जा से बने हैं. हम एनर्जी का पार्ट हैं. उस एनर्जी या ऊर्जा को जो इस अखंड ब्रह्मांड में व्याप्त है और हर ओर प्रवाहित हो रही है. ऊर्जा के संरक्षण का सिद्धांत कहता है, 'ऊर्जा का न तो नाश हो सकता है न उसका सृजन किया जा सकता है. वह सिर्फ रूपांतरित हो सकता है.'
क्या भौतिकी का यह सामान्य नियम आपको गीता के श्लोकों की याद दिला रहा है? बिलकुल सही, हम सभी ऊर्जा का हिस्सा हैं और उसी में चले जाते हैं. आप चाहें तो इसको 'पंचतत्वों में विलीन हो जाना' भी कह सकते हैं.
क्षिति जल पावक गगन समीरा,
पंच रचित अति अधम शरीरा।
शरीर के भौतिक अवशेषों को गंगा की धारा में या तीर्थ में प्रवाहित करने के पीछे भी जीवन की निरंतरता की खोज की भावना है. भस्मीभूत अवशेष एक अध्याय की समाप्ति के प्रतीक भर हैं, वे पूरी तरह अशुचि हैं. अपवित्र हैं. उन्हें छूने भर से आदमी अपवित्र हो जाता है, क्योंकि आदमी मृत्यु को छूने के लिए नहीं बना है. वह जीवन का प्रतीक है. इसलिए मृत्यु अशौच है, अपवित्र है. आदमी की देह जीवन के पार जीवन की खोज के लिए साधन है. भारतीय परंपरा कहती है ऐसे साधन देवताओं तक को मयस्सर नहीं है.
लेकिन बदलते वक्त में चलन उल्टा हो गया है. भस्मियां पवित्र हो गई हैं. उनको ताम्र कलशों में रखा जाने लगा है. चुपचाप शांति से प्रवाहित करने की बजाय बड़े-बड़े जुलूस निकाले जाते हैं. उनको एक जगह नहीं, जगह-जगह प्रवाहित करने का चलन चल पड़ा है. मृत्यु की पूजा भोंडे तरीके से शुरू हो गई.
दिवंगतों की मूर्तियों की स्थापना की जाने लगी हैं. मंदिर बनने लगे हैं. जो चला गया, उसकी पार्थिव आकृति इतिहास के लिए भले जरूरी हो, पर उसकी पूजा क्यों?
श्रीदेवी के मामले में उनका काम ही अनुकरणीय है. सिनेमा की कला में उनका योगदान ही सराहा जाना चाहिए. शरीर तो रीत गया, फूट गया (घड़े की तरह) तो उसकी पूजा क्यों?
यह श्लोक ऋषि कपूर ने नहीं सुना हो तो सुनना चाहिए,
न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं न पुनर्भवम।
कामये दुःख ऋतांना केवलमार्स्त्तिनाशनम्।।
यानी, न मैं राज्य चाहता हूं न स्वर्ग, न पुनर्जन्म के चक्कर से मुक्ति. मैं केवल दुखितों के पीड़ा हरने का अवसर चाहता हूं.
जो कुछ भी जैसा जीवन चारों तरफ है, उसकी साझेदारी यही हिन्दू सनातन परंपरा का मूल तत्व है. दर्शन है.
ऐसे में श्रीदेवी का कार्य ही उनकी पहचान है. बाकी जो बचा हुआ है, पांच तत्वों वाला, वह घड़ा है रीता हुआ, खाली हुई देह है, बॉडी है. मैं जानता हूं कि संवेदनशील ऋषि कपूर बेहद शोकाकुल हैं पर उऩको श्रीदेवी के पार्थिव शरीर को 'बॉडी' कहने पर नाराज नहीं होना चाहिए.
(यह लेख इंडिया टुडे में प्रकाशित हो चुका है, कृपया कहीं और प्रकाशित न करें)
Tuesday, June 13, 2017
धूप लिफाफे में
दिल्ली में मौसम मां-बाप की लड़ाई सरीखा हो गया है।
दिल्ली की धूप हमारे जमाने के मास्टर की संटी सरीखा करंटी हुआ करती है। हमारे जमाने इसलिए कहा, काहे कि आज के मास्टर बच्चों को कहां पीट पाते हैं?
दिन की धूप में बाप-सा कड़ापन है। होमवर्क नहीं किया, ज्यादा देर खेल लिए, पड़ोसी के बच्चे से लड़ लिए, किसी के पेड़ से अमरूद तोड़ लाए...ले थप्पड़, दे थप्पड़। बस बीच में मां के आंचल की तरह कहीं से झोंका आता है बारिश का...मां का लाड़ बीच में कूद पड़ता है। यों कि अब बाबू जी के अनुशासन और मां के लाड़ के खींचतान में बच्चे की तो दुविधा द्विगुणित हो जाए।
अब धूप का रंग बाबूजी से मिला ही दिया है तो उसके भी कई तेवर हैं...सुबह की धूप, सुबह 11 बजे की धूप, दोपहर की सिर पर तैनात धूप...खेल के वक्त की कनपटी पर पड़ती धूप, ड्रिल मास्टर सरीखी...शाम की धूप विदा कहती प्रेमिका-सी, जाड़े की धूप, भादो के दोपहर की धूप...और न जाने कितने रंग हैं।
रघुवीर सहाय को ये रंग तो कई तरीके का नजर आया हैः
‘एक रंग होता है नीला,
और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है,
इसी तरह लाल भी लाल नहीं है,
बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग,
दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है,
सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है,
और कोई एक रंग जो तेरी बांह पर पड़ा हुआ है।’
धूप पिताजी के अवतार में है, पापा के भी, डैडी के भी...अलग अलग लोगों के लिए अलग-अलग संबोधन..अलग चरित्र। मोंटेक की धूप, मनमोहन की धूप, जेटली-मोदी और शाह की धूप, शिवराज की धूप और विजय माल्या की धूप...मेरे, आपके और एक मजदूर की धूप में अंतर तो होगा ना।
धूप में पसीना बहाना...कुछ ऐसा मानो कह रहा हो, आदमी जब तक हारता रहता है जिंदा रहता है। जब जीतने लगता है आदमी नहीं रहता।
लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित ही है...धूप बाप-सा तीखा क्यों हो गया।लेकिन जो भी हो, यह धूप इंसान को लड़ना सिखाता है। कनपटी से बहता पसीनी बेरोकटोक यहां-वहां, जहां-तहां जा रहा है। आपकी मेहनत का द्रवीकृत रूप पसीना है तो वाष्पीकृत रूप आपके देह की गंध।
इस गंध का आनंद लीजिए जब बालो में बेला के फूल खोंसे आपकी प्रेयसी आपसे कान में फुसफुसाते हुए कहे, मुझे तुम्हारी देह की गंध पसंद है, तुम डियो मत लगाया करो।
आखिर में, शाहरुख खान को याद कीजिए, हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी, धूप है कभी कभी है छांव जिंदगी...जिंदगी में अभी धूप वाला दौर है।
दिल्ली की धूप हमारे जमाने के मास्टर की संटी सरीखा करंटी हुआ करती है। हमारे जमाने इसलिए कहा, काहे कि आज के मास्टर बच्चों को कहां पीट पाते हैं?
दिन की धूप में बाप-सा कड़ापन है। होमवर्क नहीं किया, ज्यादा देर खेल लिए, पड़ोसी के बच्चे से लड़ लिए, किसी के पेड़ से अमरूद तोड़ लाए...ले थप्पड़, दे थप्पड़। बस बीच में मां के आंचल की तरह कहीं से झोंका आता है बारिश का...मां का लाड़ बीच में कूद पड़ता है। यों कि अब बाबू जी के अनुशासन और मां के लाड़ के खींचतान में बच्चे की तो दुविधा द्विगुणित हो जाए।
अब धूप का रंग बाबूजी से मिला ही दिया है तो उसके भी कई तेवर हैं...सुबह की धूप, सुबह 11 बजे की धूप, दोपहर की सिर पर तैनात धूप...खेल के वक्त की कनपटी पर पड़ती धूप, ड्रिल मास्टर सरीखी...शाम की धूप विदा कहती प्रेमिका-सी, जाड़े की धूप, भादो के दोपहर की धूप...और न जाने कितने रंग हैं।
रघुवीर सहाय को ये रंग तो कई तरीके का नजर आया हैः
‘एक रंग होता है नीला,
और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है,
इसी तरह लाल भी लाल नहीं है,
बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग,
दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है,
सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है,
और कोई एक रंग जो तेरी बांह पर पड़ा हुआ है।’
धूप पिताजी के अवतार में है, पापा के भी, डैडी के भी...अलग अलग लोगों के लिए अलग-अलग संबोधन..अलग चरित्र। मोंटेक की धूप, मनमोहन की धूप, जेटली-मोदी और शाह की धूप, शिवराज की धूप और विजय माल्या की धूप...मेरे, आपके और एक मजदूर की धूप में अंतर तो होगा ना।
धूप में पसीना बहाना...कुछ ऐसा मानो कह रहा हो, आदमी जब तक हारता रहता है जिंदा रहता है। जब जीतने लगता है आदमी नहीं रहता।
लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित ही है...धूप बाप-सा तीखा क्यों हो गया।लेकिन जो भी हो, यह धूप इंसान को लड़ना सिखाता है। कनपटी से बहता पसीनी बेरोकटोक यहां-वहां, जहां-तहां जा रहा है। आपकी मेहनत का द्रवीकृत रूप पसीना है तो वाष्पीकृत रूप आपके देह की गंध।
इस गंध का आनंद लीजिए जब बालो में बेला के फूल खोंसे आपकी प्रेयसी आपसे कान में फुसफुसाते हुए कहे, मुझे तुम्हारी देह की गंध पसंद है, तुम डियो मत लगाया करो।
आखिर में, शाहरुख खान को याद कीजिए, हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी, धूप है कभी कभी है छांव जिंदगी...जिंदगी में अभी धूप वाला दौर है।
Friday, March 18, 2016
हिन्दी खड़ी बाज़ार मेंः आख़री किस्त
भारतीय सिनेमा जब हिन्दी सिनेमा में तब्दील हुई, यानी मूक फिल्में जब सवाक फिल्मों का रूप लेने लगीं तो उसकी भाषा हिन्दी ही थी। या मान लीजिए कि हिन्दुस्तानी थी। हिन्दुस्तानी इसलिए क्योंकि थियेटर के नाम पर लोकप्रिय पारसी थियेटर था, कलाकार उनके पास थे और थियेटर की भाषा उर्दूनुमा हिन्दी थी। उनके पास आबादी के लिहाज से बड़ा दर्शक वर्ग भी था।
उन दिनों जब कागज पर हिन्दी का विकास हो ही रहा था और हिन्दी क्लिष्ट और आसान के बीच झूल रही थी, सिनेमा ने तय कर लिया था कि ज्यादा लोगों तक पहुंच बनाने के लिए हिन्दी को आसान होना होगा। कई स्टूडियो ऐसे रहे जहां हिन्दी फिल्मों के संवाद लिखवाने के लिए गैर-हिन्दी भाषी या हिन्दी कम जानने वाले लेखक रखे जाते थे, जो आसान हिन्दी लिख सकें। आप याद करें, उन दिनों संवाद अधिक लोगों की समझ में लाने के लिए उनकी द्विरूक्ति होती थी। प्रमथेश बरूआ की देवदास को याद कीजिए, अरे देवदास तुम आ गए, हां पारो, मैं आ ही गया—सरीखे संवाद।
हिन्दी लोगों की ज़बान पर चढ़ने लगी। फिल्मों का बाजार पेशावर से लेकर चटगांव तक था। नेपाल से लेकर श्रीलंका तक। तो हिन्दी ने अपना परचम लहराना शुरू कर दिया मेरा जूता है जापानी रूस में हिट था तो सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस में होना ही था। अमिताभ बच्चन उजबेकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान तक शहंशाह रहे।
आजादी के बाद हिन्दी संस्कृतनिष्ठ होती गई, और उर्दू फारसी की तरफ बढ़ गई। विभाजन की खाई के बाद उर्दू को मुसलमानों की भाषा करार दिया गया। लेकिन हिन्दी के इस संस्कृतकरण ने हिन्दी को लोगों की ज़बान नहीं बनने दिया था। लोग हिन्दी बोल तो रहे थे, लेकिन उनकी हिन्दी वह हिन्दी नहीं थी जो लिखी जाती थी।
रेडियो, गीतमाला, हिन्दी गीतो ने हिन्दी को ज़बान पर ला दिया। लेकिन हिन्दी ज़बान पर भले ही चढ़ गई हो। लोग सलमान-शाहरूख क असर में आज भी फिल्मी संवाद दोहरा लें, शोले के कितने आदमी थे से लेकर एक बार मैने कमिटमेंट कर दी...तक या फिर हम तुममें इतने छेद करेंगे...जैसे महापॉपुलर संवाद तक, लेकिन हिन्दी को पढ़ाई की भाषा बनने में अभी भी वक्त लगेगा।
जब तक हिन्दी रोजगार देने वाली भाषा नहीं बनेगी, तब तक इसका प्रसार भी नहीं होगा। हिन्दी साहित्य पढ़ने वाला या तो हिन्दी का शिक्षक बन सकता है या अनुवादक। हिन्दी के साहित्य को समृद्ध करने के लिए अनुवाद के काम को प्रकाशक कर तो रहे हैं लेकिन हिन्दीवालों की पढ़ने की आदत छीजती जा रही है।
विज्ञान की कोई मान्यता प्राप्त आखिरी किताब कौन सी है जो हिन्दी में छपी हो। हिंदी के अनुवादकों की क्या औकात है यह तो खुद अनुवादक ही बता सकता है या प्रकाशक। वैसे तो प्रकाशकों के सामने हिन्दी के लेखको की भी क्या औकात, लेकिन अगर कोई शख्स विज्ञान, या दर्शन के किताब को हिन्दी में अनुवाद कर भी दे तो क्या छपेगा कौना छापेगा और उस शख्स को भाषा की सेवा करने का तमगा मिलने के अलावा क्या मिलेगा यह सब जानते हैं।
एक और बात यह है कि हिन्दी मे जो साहित्य लिखा जा रहा है वह उत्कृष्ट तो है लेकिन लोकप्रिय नहीं हो पाता। जो लोकप्रिय है वह लुगदी ही है। सैकड़े में एक दो उत्कृष्ट लेखन होता है जो मास लेवल पर पसंद किया जाता है। वरना क्या वजह है कि गोरखपुर से लेकर झारखंड के देवघर तक चेतन भगत की किताब तो बिक जाती है, लेकिन किसी बड़े हिन्दी लेखक का उपन्यास नहीं बिकता।
इसकी एक वजह तो मुझे यह भी दिखाई देती है कि हिंदी का लेखक इस अहंमन्यता का शिकार होता है कि वह स्वांतः सुखाय लिख रहा है। तो फिर उसे बाजार का मोह नहीं होना चाहिए। प्रकाशकों की नीयत भी कुछ वैसी ही होती है। दूसरी बात, हिंदी का लेखक कहते ही हम सीधे साहित्यकार क्यों मान लेते हैं? हिंदी का लेखक कथेतर साहित्य भी तो लिख सकता है। लेकिन मुझे दुख है यह कहते हुए कि हिंदी में कथा हो या कथेतर पढ़ने वाले कम ही बचे हैं।
एक दो मिसालें मैं और देना चाहता हूं। अंग्रेजी के बेस्ट सेलर का खिताब शायद एक लाख प्रतियों के बाद मिलता है लेकिन अनु सिंह चौधरी की नीला स्कार्फ 2100 प्रतियो के बाद और नॉन रेजिडेंट बिहारी उससे भी कम प्रतियों के बिकने के बाद बेस्ट सेलर घोषित हो गए। सिर्फ इसलिए क्योंकि हिंदी में पाठक कम हो गए हैं। आप ही बताएं कि अनिल कुमार यादव का यात्रा वृत्तांत ये भी कोई देस है महराज या अजय तिवारी का डोंगी में डगमग सफर जैसा यात्रा वृत्तांत हाल में क्यों नहीं लिखा गया।
हमें खोजना होगा उस वजह को, कि आखिर क्यों हिंदी में पाठक नहीं बचे हैं। वरना हिन्दी फिल्मों के दर्शक न सिर्फ हैं बल्कि बढ़ रहे हैं। हिन्दी गानों का जलवा बरकरार है और सिर्फ गानों के दम पर न जाने कितने म्युजिक चैनल अपनी दुकान चला रहे हैं। एफएम रेडियो भी मनोरंजन के नाम पर गाने ही तो परोसते हैं। वह भी फिल्मी।
साइबर संसार में हिन्दी ब्लॉगिंग अब गंभीरता की तरफ बढ़ गई है। फेसबुक के आने के बाद ब्लॉगिंग में सिर्फ संजीदा लोग बच गए हैं। हिंदी में कंटेंट की कमी तो नहीं है। लेकिन छपे हुए सामग्री के स्तर पर विविधता जरूरी है।
फेसबुक पर हिन्दी की लोकप्रियता बढ़ी है। रवीश कुमार ने जिस लप्रेक को शुरू किया उसे गिरीन्द्र नाथ झा ने रवीशमैनिया नाम देकर लगातारता दी। विनीत कुमार और गिरीन्द्र की कहानियों को भी राजकमल प्रकाशन ने लप्रेक श्रृंखला के तहत ही छापा है। हमारा फलक भी लप्रेक से प्रेरित था, लेकिन अगर 15 हजार सदस्यों वाले समूह में लोग कहानियां लिख रहे हैं और हिंदी में लिख रहे हैं तो समझिए कि इंटरनेट पर भी हिंदी का वक्त उज्जवल है।
मैं यह बात इसलिए भी कह रहा हूं कि अभी तक नेट की पहुंच सिर्फ पैसे वाले अंग्रेजीदां तबके तक थी। स्मार्ट फोन पर हिंदी लिखने की छूट, और स्मार्टफोन के हर हाथ तक पहुंच ने यह सुनिश्चित कर दिया है, कि आने वाला वक्त हिंदी का ही है। सिनेमा, रेडियो और टीवी पर हिंदी का जलवा है। साइबर संसार में बढ़त बन रही है। बस सोचना है साहित्यकारों को, कि आखिर उत्कृष्टता और लोकप्रियता (कभी कभी एक चीज दोनों मुकाम हासिल कर लेती है, लेकिन सिर्फ कभी-कभी) दोनों में वह क्या चुनना चाहती है।
उन दिनों जब कागज पर हिन्दी का विकास हो ही रहा था और हिन्दी क्लिष्ट और आसान के बीच झूल रही थी, सिनेमा ने तय कर लिया था कि ज्यादा लोगों तक पहुंच बनाने के लिए हिन्दी को आसान होना होगा। कई स्टूडियो ऐसे रहे जहां हिन्दी फिल्मों के संवाद लिखवाने के लिए गैर-हिन्दी भाषी या हिन्दी कम जानने वाले लेखक रखे जाते थे, जो आसान हिन्दी लिख सकें। आप याद करें, उन दिनों संवाद अधिक लोगों की समझ में लाने के लिए उनकी द्विरूक्ति होती थी। प्रमथेश बरूआ की देवदास को याद कीजिए, अरे देवदास तुम आ गए, हां पारो, मैं आ ही गया—सरीखे संवाद।
हिन्दी लोगों की ज़बान पर चढ़ने लगी। फिल्मों का बाजार पेशावर से लेकर चटगांव तक था। नेपाल से लेकर श्रीलंका तक। तो हिन्दी ने अपना परचम लहराना शुरू कर दिया मेरा जूता है जापानी रूस में हिट था तो सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस में होना ही था। अमिताभ बच्चन उजबेकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान तक शहंशाह रहे।
आजादी के बाद हिन्दी संस्कृतनिष्ठ होती गई, और उर्दू फारसी की तरफ बढ़ गई। विभाजन की खाई के बाद उर्दू को मुसलमानों की भाषा करार दिया गया। लेकिन हिन्दी के इस संस्कृतकरण ने हिन्दी को लोगों की ज़बान नहीं बनने दिया था। लोग हिन्दी बोल तो रहे थे, लेकिन उनकी हिन्दी वह हिन्दी नहीं थी जो लिखी जाती थी।
रेडियो, गीतमाला, हिन्दी गीतो ने हिन्दी को ज़बान पर ला दिया। लेकिन हिन्दी ज़बान पर भले ही चढ़ गई हो। लोग सलमान-शाहरूख क असर में आज भी फिल्मी संवाद दोहरा लें, शोले के कितने आदमी थे से लेकर एक बार मैने कमिटमेंट कर दी...तक या फिर हम तुममें इतने छेद करेंगे...जैसे महापॉपुलर संवाद तक, लेकिन हिन्दी को पढ़ाई की भाषा बनने में अभी भी वक्त लगेगा।
जब तक हिन्दी रोजगार देने वाली भाषा नहीं बनेगी, तब तक इसका प्रसार भी नहीं होगा। हिन्दी साहित्य पढ़ने वाला या तो हिन्दी का शिक्षक बन सकता है या अनुवादक। हिन्दी के साहित्य को समृद्ध करने के लिए अनुवाद के काम को प्रकाशक कर तो रहे हैं लेकिन हिन्दीवालों की पढ़ने की आदत छीजती जा रही है।
विज्ञान की कोई मान्यता प्राप्त आखिरी किताब कौन सी है जो हिन्दी में छपी हो। हिंदी के अनुवादकों की क्या औकात है यह तो खुद अनुवादक ही बता सकता है या प्रकाशक। वैसे तो प्रकाशकों के सामने हिन्दी के लेखको की भी क्या औकात, लेकिन अगर कोई शख्स विज्ञान, या दर्शन के किताब को हिन्दी में अनुवाद कर भी दे तो क्या छपेगा कौना छापेगा और उस शख्स को भाषा की सेवा करने का तमगा मिलने के अलावा क्या मिलेगा यह सब जानते हैं।
एक और बात यह है कि हिन्दी मे जो साहित्य लिखा जा रहा है वह उत्कृष्ट तो है लेकिन लोकप्रिय नहीं हो पाता। जो लोकप्रिय है वह लुगदी ही है। सैकड़े में एक दो उत्कृष्ट लेखन होता है जो मास लेवल पर पसंद किया जाता है। वरना क्या वजह है कि गोरखपुर से लेकर झारखंड के देवघर तक चेतन भगत की किताब तो बिक जाती है, लेकिन किसी बड़े हिन्दी लेखक का उपन्यास नहीं बिकता।
इसकी एक वजह तो मुझे यह भी दिखाई देती है कि हिंदी का लेखक इस अहंमन्यता का शिकार होता है कि वह स्वांतः सुखाय लिख रहा है। तो फिर उसे बाजार का मोह नहीं होना चाहिए। प्रकाशकों की नीयत भी कुछ वैसी ही होती है। दूसरी बात, हिंदी का लेखक कहते ही हम सीधे साहित्यकार क्यों मान लेते हैं? हिंदी का लेखक कथेतर साहित्य भी तो लिख सकता है। लेकिन मुझे दुख है यह कहते हुए कि हिंदी में कथा हो या कथेतर पढ़ने वाले कम ही बचे हैं।
एक दो मिसालें मैं और देना चाहता हूं। अंग्रेजी के बेस्ट सेलर का खिताब शायद एक लाख प्रतियों के बाद मिलता है लेकिन अनु सिंह चौधरी की नीला स्कार्फ 2100 प्रतियो के बाद और नॉन रेजिडेंट बिहारी उससे भी कम प्रतियों के बिकने के बाद बेस्ट सेलर घोषित हो गए। सिर्फ इसलिए क्योंकि हिंदी में पाठक कम हो गए हैं। आप ही बताएं कि अनिल कुमार यादव का यात्रा वृत्तांत ये भी कोई देस है महराज या अजय तिवारी का डोंगी में डगमग सफर जैसा यात्रा वृत्तांत हाल में क्यों नहीं लिखा गया।
हमें खोजना होगा उस वजह को, कि आखिर क्यों हिंदी में पाठक नहीं बचे हैं। वरना हिन्दी फिल्मों के दर्शक न सिर्फ हैं बल्कि बढ़ रहे हैं। हिन्दी गानों का जलवा बरकरार है और सिर्फ गानों के दम पर न जाने कितने म्युजिक चैनल अपनी दुकान चला रहे हैं। एफएम रेडियो भी मनोरंजन के नाम पर गाने ही तो परोसते हैं। वह भी फिल्मी।
साइबर संसार में हिन्दी ब्लॉगिंग अब गंभीरता की तरफ बढ़ गई है। फेसबुक के आने के बाद ब्लॉगिंग में सिर्फ संजीदा लोग बच गए हैं। हिंदी में कंटेंट की कमी तो नहीं है। लेकिन छपे हुए सामग्री के स्तर पर विविधता जरूरी है।
फेसबुक पर हिन्दी की लोकप्रियता बढ़ी है। रवीश कुमार ने जिस लप्रेक को शुरू किया उसे गिरीन्द्र नाथ झा ने रवीशमैनिया नाम देकर लगातारता दी। विनीत कुमार और गिरीन्द्र की कहानियों को भी राजकमल प्रकाशन ने लप्रेक श्रृंखला के तहत ही छापा है। हमारा फलक भी लप्रेक से प्रेरित था, लेकिन अगर 15 हजार सदस्यों वाले समूह में लोग कहानियां लिख रहे हैं और हिंदी में लिख रहे हैं तो समझिए कि इंटरनेट पर भी हिंदी का वक्त उज्जवल है।
मैं यह बात इसलिए भी कह रहा हूं कि अभी तक नेट की पहुंच सिर्फ पैसे वाले अंग्रेजीदां तबके तक थी। स्मार्ट फोन पर हिंदी लिखने की छूट, और स्मार्टफोन के हर हाथ तक पहुंच ने यह सुनिश्चित कर दिया है, कि आने वाला वक्त हिंदी का ही है। सिनेमा, रेडियो और टीवी पर हिंदी का जलवा है। साइबर संसार में बढ़त बन रही है। बस सोचना है साहित्यकारों को, कि आखिर उत्कृष्टता और लोकप्रियता (कभी कभी एक चीज दोनों मुकाम हासिल कर लेती है, लेकिन सिर्फ कभी-कभी) दोनों में वह क्या चुनना चाहती है।
Saturday, March 5, 2016
कुछ तस्वीरें रूला देती हैं
फेसबुक कभी-कभी रुला देता है। नीचे जो तस्वीर साझा कर रहा हूं, वह संजय तिवारी जी ने ली है। उसके आगे जो घटना है वह कुमुद सिंह ने साझा की है। यह तस्वीर देखकर आंखें नम हुईं, नोर आ गए, लेकिन कुमुद जी ने जो कहानी साझा की है, उसे पढ़कर खूब रोया हूं। जीभर कर।
मोटे चश्मे को उतारने की भी फुरसत नहीं दी आंसुओ ने, अभी भी धुंधला सा दिख रहा है। खुद पढ़ लीजिए।
बकौल कुमुद सिंहः इस तसवीर को देखकर सचमुच आंखें नोरा गयी..। उन आंखों का हंसना भी क्या जिन आखों में पानी ना हो....।
मोटे चश्मे को उतारने की भी फुरसत नहीं दी आंसुओ ने, अभी भी धुंधला सा दिख रहा है। खुद पढ़ लीजिए।
![]() |
| फोटोः संजय तिवारी |
बकौल कुमुद सिंहः इस तसवीर को देखकर सचमुच आंखें नोरा गयी..। उन आंखों का हंसना भी क्या जिन आखों में पानी ना हो....।
कल की ही बात है भैरव लाल दास जी के घर गयी थी तो उन्होंने ऐसा ही एक प्रसंग सुनाया। सोच रही थी आपसे उसपर बात करू, तभी संजय तिवारी जी की इस तसवीर पर नजर गयी।
बात पटना संग्रहालय परिसर की है। चार दिनों पहले एक परिवार संग्रहालय घूमने आया। इसी दौरान वो लोग परिसर स्थित बिहार रिसर्च सोसायटी भी आये। परिवार का एक बच्चा वहां एक किताब को करीब 10 मिनट तक पलटा रहा, फिर अधिकारी से पूछा कि यह किताब मुझे मिल सकती है, मुझे इस विषय पर एक आलेख लिखना है। पदाधिकारी ने कहा कि यह पुस्तक मिल सकती है, 100 रुपये लगेंगे। बच्चा अपने पिता से 100 रुपये लेने गया और पिता ने रुपये देने से मना कर दिया।
बच्चे की मां ने भी कहा कि 100 रुपये का ही तो सवाल है दे दीजिए..पिता ने कहा कि नहीं दूंगा..करीब 45 मिनट तक बच्चा उस किताब के लिए जिद करता रहा, लेकिन पिता मानने को तैयार नहीं हुए। अंत में बच्चा रोने लगा।
किशोरा अवस्था में एक इतिहास की पुस्तक के लिए छात्र को रोता देख सोसायटी के पदाधिकारी का दिल भी रोने लगा, लेकिन वो खामोश रहे। करीब 50 मिनट बाद बच्चा माता-पिता के पीछे-पीछे परिसर से बाहर जाने लगा।
पदाधिकारी ने संग्रहालय के गेटमैन को फोन से सूचित किया कि इस परिवार को गेट से बाहर न जाने दें और बच्चा को सोसायटी कार्यालय ले आये। गेटमैन से वैसा ही किया। बच्चा जैसे ही कार्यालय पहुंचा पदाधिकारी ने उसे वो पुस्तक देते हुए कहा कि लो पूरा पढकर जो लिखना वो मुझे दिखाना..यह पुस्तक तुम्हारे जैसे ज्ञान के प्यासे के लिए ही छपी है..तुम से कोई पैसा नहीं लेंगे। बच्चे पुस्तक को लेकर उछल पडा और उसके चेहरे पर जो खुशी थी उसे देखकर पदाधिकारी की आंख भर आयी...।
हमारा देश सचमुच अभागा है जो छोटी-छोटी खुशियां भी देखने को तैयार नहीं है।
Thursday, March 3, 2016
हिन्दी खड़ी बाज़ार मेंः भाग दो
हाल ही मैं मॉस्को गया था। हवाई अड्डे पर स्थानीय टैक्सी वालों ने मुझे नमस्कार किया। जी हां, हिन्दी में नमस्कार बोलकर।
रूस में राज कपूर के बाद मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मों का दौर रहा। आजकल वहां सलमान लोकप्रिय हैं। वहां कई विद्वान हैं जो अपने विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाते हैं। उनमें से कईयों के साथ बातचीत का मौका मुझे हासिल हुआ। सर्गेई बंगला, हिंदी और संस्कृत के जानकार है। और अपने जीवन के कई बहुमूल्य साल उन्होंने बनारस में बिताए हैं। भारतीय इतिहास पढ़ाने वाली नतालिया ने मुझसे कहा कि जब वह भारत से लौटकर वापस रूस गईं तो उनके छात्रों ने उनसे पहला सवाल यही किया कि क्या वह भारत मे सलमान खान से मिलीं?
मैं इन मिसालों के ज़रिए हिन्दी फिल्मों की महिमा का गुणगान नहीं कर रहा बल्कि आपको बताना चाहता हूं कि बॉलिवुड ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अपनी अहम भूमिका निभाई है।
आजादी के बाद जब टकसाली और रघुवीरी हिन्दी, या फिर जिसे हम एतद् द्वारा वाली हिन्दी कहते हैं का बाज़ार गरम था तब भी सिनेमा ने उसे आसान बनाने की प्रक्रिया को तेजी दी थी। भारतीय जनसंचार संस्थान में हमारे अध्ययन के दिनों में सबसे पहला पाठ जो हमें बताया जाता था वह था आसान हिन्दी लिखने का।
कुछ हिन्दीप्रेमी मित्र उन दिनों भी शिक्षकों से भिड़ जाते थे कि कभी किसी ने आसान अंग्रेजी लिखने के लिए तो नहीं कहा लेकिन हमेशा आसान हिन्दी ही क्यों लिखने पर जोर दिया जाता है? लेकिन यह बात माननी होगी कि हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने पर हम उसके लिए कुछ भला नहीं कर पाएंगे। खासकर दृश्य-श्रव्य माध्यमों में।
मैं इन मिसालों के ज़रिए हिन्दी फिल्मों की महिमा का गुणगान नहीं कर रहा बल्कि आपको बताना चाहता हूं कि बॉलिवुड ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अपनी अहम भूमिका निभाई है।
आजादी के बाद जब टकसाली और रघुवीरी हिन्दी, या फिर जिसे हम एतद् द्वारा वाली हिन्दी कहते हैं का बाज़ार गरम था तब भी सिनेमा ने उसे आसान बनाने की प्रक्रिया को तेजी दी थी। भारतीय जनसंचार संस्थान में हमारे अध्ययन के दिनों में सबसे पहला पाठ जो हमें बताया जाता था वह था आसान हिन्दी लिखने का।
कुछ हिन्दीप्रेमी मित्र उन दिनों भी शिक्षकों से भिड़ जाते थे कि कभी किसी ने आसान अंग्रेजी लिखने के लिए तो नहीं कहा लेकिन हमेशा आसान हिन्दी ही क्यों लिखने पर जोर दिया जाता है? लेकिन यह बात माननी होगी कि हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने पर हम उसके लिए कुछ भला नहीं कर पाएंगे। खासकर दृश्य-श्रव्य माध्यमों में।
प्रिंट मीडिया में या किताबों की भाषा में शायद हम यह छूट ले पाएं लेकिन सिनेमा या खबरिया चैनलों की भाषा या फिर टीवी में धारावाहिको की भाषा को हम जितना आसान बनाएंगे उतना ही उसका प्रसार होगा। दर्शक तो हर उम्र और हर पृष्ठभूमि का होता है।
शायद यही वजह है कि कलर्स जैसे चैनलों पर आ रहा ऐतिहासिक धारावाहिक चक्रवर्तिन् सम्राट अशोक हो या फिर सिया के राम, या ऐसा ही कोई और पौराणिक धारावाहिक आसान भाषा लिखना बड़ी चुनौती बनी। इसमें आमफहम भाषा का इस्तेमाल तो किया जा रहा है लेकिन वह हिन्दी ही होती है। अभी भी हमारी मानसिकता ऐसी है कि हम शिव के मुंह से उर्दू के लफ्ज सुनना पसंद नहीं करेंगे।
शायद यही वजह है कि कलर्स जैसे चैनलों पर आ रहा ऐतिहासिक धारावाहिक चक्रवर्तिन् सम्राट अशोक हो या फिर सिया के राम, या ऐसा ही कोई और पौराणिक धारावाहिक आसान भाषा लिखना बड़ी चुनौती बनी। इसमें आमफहम भाषा का इस्तेमाल तो किया जा रहा है लेकिन वह हिन्दी ही होती है। अभी भी हमारी मानसिकता ऐसी है कि हम शिव के मुंह से उर्दू के लफ्ज सुनना पसंद नहीं करेंगे।
लेकिन सिनेमा ने हिन्दी को जो संजीवनी आजादी के पहले और बाद में दी वह आसान भाषा के जरिए ही दी।
मंजीत ठाकुर
मंजीत ठाकुर
Tuesday, March 1, 2016
हिन्दी खड़ी बाज़ार में
हिन्दी खड़ी बाजा़र में
हाल ही की बात है, नीलेश मिसरा एक रेडियो शो के लिए मैं एक पौराणिक कहानी लिख रहा था। नीलेश मिसरा रेडियो की जानी-पहचानी आवाज़ हैं और गीतकार होने के साथ-साथ किस्साग़ो भी हैं। तो उस पौराणिक कथा की भाषा, जाहिर है हिन्दी, के संदर्भ में उन्होंने मुझे कहा कि इस कहानी की भाषा का तुम एमटीवीकरण कर दो। मैं थोड़ा हिचकिचाया क्योंकि मैं रावण या कुंभकर्ण के मुंह से क़त्तई फ़ारसी नहीं बुलवा सकता था। उन्होंने साफ किया कि हमें भले ही देशकाल के संदर्भ में रामाय़ण के पात्रों से उर्दू-फ़ारसी बुलवाने की छूट नहीं है, लेकिन हर हालत में हमें हर पात्र से आसान हिन्दी बुलवानी होगी।
हिन्दी के फैलते साम्राज्य के पीछे यही सफल रणनीति काम कर रही है। मैं हिन्दी को आज की सफल भाषाओं में गिनना चाहता हूं और उन लोगों की कतार से दूर ही रहना चाहता हूं जो हिन्दी का भाषा का मर्सिया पढ़ने पर उतारू हैं।
हिन्दी आज बाज़ार की भाषा है। इसलिए मैं इसे कामयाब कह रहा हूं। हालांकि कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि हिंदी की स्थिति आज भी कुछ वैसी ही है और उसी मुहाने पर है जैसी आजादी के वक्त थी। कुछ लोग इंटरनेट गवर्नेंस फोरम के एक सर्वे का हवाला देते हैं जिसमें भारतीय इंटरनेट यूजर की प्राथमिकता का भाषा का विकल्प आने पर 99 फीसद लोगों ने अंग्रेजी को चुना था। इसी सर्वे में लोगो ने जवाब दिया कि वह सीखना भी अंग्रेजी ही चाहते हैं और इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाली भाषा भी अंग्रेजी ही है।
हो सकता है कि इंटरनेट पर हुए इस सर्वे में अंग्रेजी बाजी मार गई हो। लेकिन सवाल अंग्रेजी और हिन्दी या बाकी की भारतीय भाषाओं के बीच स्पर्धा का है ही नहीं।
हाल ही की बात है, नीलेश मिसरा एक रेडियो शो के लिए मैं एक पौराणिक कहानी लिख रहा था। नीलेश मिसरा रेडियो की जानी-पहचानी आवाज़ हैं और गीतकार होने के साथ-साथ किस्साग़ो भी हैं। तो उस पौराणिक कथा की भाषा, जाहिर है हिन्दी, के संदर्भ में उन्होंने मुझे कहा कि इस कहानी की भाषा का तुम एमटीवीकरण कर दो। मैं थोड़ा हिचकिचाया क्योंकि मैं रावण या कुंभकर्ण के मुंह से क़त्तई फ़ारसी नहीं बुलवा सकता था। उन्होंने साफ किया कि हमें भले ही देशकाल के संदर्भ में रामाय़ण के पात्रों से उर्दू-फ़ारसी बुलवाने की छूट नहीं है, लेकिन हर हालत में हमें हर पात्र से आसान हिन्दी बुलवानी होगी।
हिन्दी के फैलते साम्राज्य के पीछे यही सफल रणनीति काम कर रही है। मैं हिन्दी को आज की सफल भाषाओं में गिनना चाहता हूं और उन लोगों की कतार से दूर ही रहना चाहता हूं जो हिन्दी का भाषा का मर्सिया पढ़ने पर उतारू हैं।
हिन्दी आज बाज़ार की भाषा है। इसलिए मैं इसे कामयाब कह रहा हूं। हालांकि कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि हिंदी की स्थिति आज भी कुछ वैसी ही है और उसी मुहाने पर है जैसी आजादी के वक्त थी। कुछ लोग इंटरनेट गवर्नेंस फोरम के एक सर्वे का हवाला देते हैं जिसमें भारतीय इंटरनेट यूजर की प्राथमिकता का भाषा का विकल्प आने पर 99 फीसद लोगों ने अंग्रेजी को चुना था। इसी सर्वे में लोगो ने जवाब दिया कि वह सीखना भी अंग्रेजी ही चाहते हैं और इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाली भाषा भी अंग्रेजी ही है।
हो सकता है कि इंटरनेट पर हुए इस सर्वे में अंग्रेजी बाजी मार गई हो। लेकिन सवाल अंग्रेजी और हिन्दी या बाकी की भारतीय भाषाओं के बीच स्पर्धा का है ही नहीं।
मुझे नहीं मालूम कि इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले कितने फीसद हिन्दीभाषियों को इस सर्वे में शामिल किया गया था। लेकिन फेसबुक पर मेरे 5 हजार दोस्त हैं, मैं फेसबुक लघुकथाओं का फलक नाम का एक समूह चलाता हूं जिसमें 15 हजार सदस्य हैं। इनमें से लगभग 99 फीसद लोग हिन्दी लिखते हैं। फेसबुक पर भी और ट्विटर पर भी। इनमें से जो लोग देवनागरी में हिन्दी नहीं लिखते वे लोग रोमन में हिन्दी लिखते हैं।
बहरहाल मैं इस बात की तस्दीक कर सकता हूं कि इंटरनेट पर हिन्दी या बाकी की भारतीय भाषाओं का चलन बढ़ा है। दूसरी तरफ, एफएम रेडियो के जॉकी जो शोर मचाते हैं उनमें अहमदाबाद हो या गोहाटी, पटना हो या पुणे, मुंबई हो या दिल्ली या फिर बठिंडा, स्थानीय बोली के पुट के साथ मूल भाषा तो हिन्दी ही होती है।
बहरहाल मैं इस बात की तस्दीक कर सकता हूं कि इंटरनेट पर हिन्दी या बाकी की भारतीय भाषाओं का चलन बढ़ा है। दूसरी तरफ, एफएम रेडियो के जॉकी जो शोर मचाते हैं उनमें अहमदाबाद हो या गोहाटी, पटना हो या पुणे, मुंबई हो या दिल्ली या फिर बठिंडा, स्थानीय बोली के पुट के साथ मूल भाषा तो हिन्दी ही होती है।
अगले पोस्ट में जारी...
मंजीत ठाकुर
Thursday, December 26, 2013
बैनीआहपीनाला
बैंगनी रंग का कुरता पहन रखा था शायद कंचनजंघा ने....सूरज पश्चिम में छिपने की कोशिश में था। पहाड़ का तो क्या है, सूरज पहाड़ों के पीछे गया नहीं, कि अंधेरा हुआ...। गंगटोक में भी ऐसा ही हुआ था। सूरज छिपा, अंधेरा हुआ, और इसके साथ ही ठंड ने नश्तर चुभोने शुरू कर दिए।
गंगटोक में मॉल रोड ही है...गुलज़ार रहने वाला। अपने हाफ बाजू के स्वेटर में सिकुड़ता हुआ, काली पृष्ठभूमि में सफेद धुएं के बीच, उस गुलज़ार सड़क पर कपड़ो की एक दुकान पर अटकता हूं....। पीली कुरते वाली लड़की...आंखों में गहरा काजल...।
मेरे चश्में पर भाप जम गई है। मुंह से निकली भाप। चीजें धुंधली नजर आऩे लगी है। धत्त, ये कोई लड़की नहीं है, मेरी कहानी से निकलकर सामने नहीं आ खड़ी हुई है मेरी नायिका। ये तो पुतला है, प्लास्टिक का।
बगल में कहीं, चेन्नई एक्सप्रेस का गाना चल रहा है। यो यो हनी सिंह, कोकोनट में लस्सी मिलाकर पीने की गुजारिश कर रहे हैं। लुंगी डांस।
लुंगी डांस राष्ट्रीय गीत की तरह मेरे कानों में बज रहा है...सफदर हाशमी मार्ग पर खड़ा होकर मैं गाड़ियों की भीड़ के खत्म होने का इंतजार कर रहा हूं। दिल्ली की ट्रैफिक मन के अंधेरे और नाउम्मीदी की तरह कभी ना खत्म होने वाली शै है। कार के बेवजह और तेज़ हॉर्न ने टाइम और स्पेस ही बदल दिया। यादों में गंगटोक जीते-जीते, दिल्ली में आ खड़ा हुआ।
सामने है हमारा दफ्तर...गोभी की फूल की तरह नीचे संकरा...ऊपर फूलता चला जाता हुआ। उल्टे पिरामिड जैसी आकृति।
आज सूरज कुछ खास नहीं निकल पाया। बादलों से झड़प हुई थी, या कोहरे को मिल रहे इम्पॉर्टेंस से रूठा हुआ था, वही जाने या आसमान। कोहरा भी कोई पूरी तरह सफेद नहीं है। न कोहरा है, न सूरज है, न उजाला है न अंधेरा है। गजब की नाउम्मीदी है। दिल्ली में सरकार बनाने जैसा अनिश्चय है।
जीवन में अजब गजब रंग देखने को मिलते हैं। आजकल राजनीति रंगीन है। सिर पर सफेद टोपी पहने वाले केजरीवाल ने कहा है, उनकी पार्टी ईमानदार पार्टी है। केजरीवाल ने कहा था उनसे पहले सत्ताधारी पार्टी यानी कांग्रेस भ्रष्ट थी। अब कथित भ्रष्ट पार्टी कथित ईमानदार पार्टी को सपोर्ट दे रही है।
सवाल यह है कि सफेद टोपी वाली पार्टी, भगवा और खाकी रंग वालो, के साथ काली कमाई का आरोप झेल रही कांग्रेस पर क्या कार्रवाई करेगी। दिल्ली की राजनीति का क्या रंग आए गा सामने. यह दिलचस्प होगा। पता है, लाल को कोई रोल नहीं, लेकिन सफेद कितने दिन सफेद बना रहेगा, या धूसर हो जाएगा...लोकसभा चुनाव तक, इसी पर तो सबकी निगाहे हैं।
सोचने का वक्त नहीं है...बैठक शुरू होने ही वाली है...एडिटोरियल मीटिंग। रस्म है। रोजाना। मीटिंग में फिर वही सोच सामने आ जाती है...गाढ़ा बैंगनी कुरते पहनी गंगटोक की बर्फीली कंचनजंघा मेरी फैली हुई बांहों में सिमट गई, तो उस पर छाई हुई बदली सूरज की किरनों से लाल हो गईं थीं....या शरम से।
गंगटोक में मॉल रोड ही है...गुलज़ार रहने वाला। अपने हाफ बाजू के स्वेटर में सिकुड़ता हुआ, काली पृष्ठभूमि में सफेद धुएं के बीच, उस गुलज़ार सड़क पर कपड़ो की एक दुकान पर अटकता हूं....। पीली कुरते वाली लड़की...आंखों में गहरा काजल...।
मेरे चश्में पर भाप जम गई है। मुंह से निकली भाप। चीजें धुंधली नजर आऩे लगी है। धत्त, ये कोई लड़की नहीं है, मेरी कहानी से निकलकर सामने नहीं आ खड़ी हुई है मेरी नायिका। ये तो पुतला है, प्लास्टिक का।
बगल में कहीं, चेन्नई एक्सप्रेस का गाना चल रहा है। यो यो हनी सिंह, कोकोनट में लस्सी मिलाकर पीने की गुजारिश कर रहे हैं। लुंगी डांस।
लुंगी डांस राष्ट्रीय गीत की तरह मेरे कानों में बज रहा है...सफदर हाशमी मार्ग पर खड़ा होकर मैं गाड़ियों की भीड़ के खत्म होने का इंतजार कर रहा हूं। दिल्ली की ट्रैफिक मन के अंधेरे और नाउम्मीदी की तरह कभी ना खत्म होने वाली शै है। कार के बेवजह और तेज़ हॉर्न ने टाइम और स्पेस ही बदल दिया। यादों में गंगटोक जीते-जीते, दिल्ली में आ खड़ा हुआ।
सामने है हमारा दफ्तर...गोभी की फूल की तरह नीचे संकरा...ऊपर फूलता चला जाता हुआ। उल्टे पिरामिड जैसी आकृति।
आज सूरज कुछ खास नहीं निकल पाया। बादलों से झड़प हुई थी, या कोहरे को मिल रहे इम्पॉर्टेंस से रूठा हुआ था, वही जाने या आसमान। कोहरा भी कोई पूरी तरह सफेद नहीं है। न कोहरा है, न सूरज है, न उजाला है न अंधेरा है। गजब की नाउम्मीदी है। दिल्ली में सरकार बनाने जैसा अनिश्चय है।
जीवन में अजब गजब रंग देखने को मिलते हैं। आजकल राजनीति रंगीन है। सिर पर सफेद टोपी पहने वाले केजरीवाल ने कहा है, उनकी पार्टी ईमानदार पार्टी है। केजरीवाल ने कहा था उनसे पहले सत्ताधारी पार्टी यानी कांग्रेस भ्रष्ट थी। अब कथित भ्रष्ट पार्टी कथित ईमानदार पार्टी को सपोर्ट दे रही है।
सवाल यह है कि सफेद टोपी वाली पार्टी, भगवा और खाकी रंग वालो, के साथ काली कमाई का आरोप झेल रही कांग्रेस पर क्या कार्रवाई करेगी। दिल्ली की राजनीति का क्या रंग आए गा सामने. यह दिलचस्प होगा। पता है, लाल को कोई रोल नहीं, लेकिन सफेद कितने दिन सफेद बना रहेगा, या धूसर हो जाएगा...लोकसभा चुनाव तक, इसी पर तो सबकी निगाहे हैं।
सोचने का वक्त नहीं है...बैठक शुरू होने ही वाली है...एडिटोरियल मीटिंग। रस्म है। रोजाना। मीटिंग में फिर वही सोच सामने आ जाती है...गाढ़ा बैंगनी कुरते पहनी गंगटोक की बर्फीली कंचनजंघा मेरी फैली हुई बांहों में सिमट गई, तो उस पर छाई हुई बदली सूरज की किरनों से लाल हो गईं थीं....या शरम से।
Sunday, November 10, 2013
एक ठो भारत रत्न हमको भी!
हद हो गई है। कैसा देश है ये। छोड़िए देश के बारे में बाद में बात करें, मैं खोज रहा हूं कि इस सवा अरब की आबादी वाले देश में मेरा कोई दूर का रिश्तेदार हो जो सत्ता पक्ष में, विपक्ष में, कहीं भी, सिफारिश करने की पोजीशन पर हो। और सिफारिश ऐसी-वैसी नहीं कि रोज़गार सेवक लगाने वाला काम, या शिक्षा-मित्र की बहाली। भारत रत्न के लिए सिफारिश की जरूरत है।
इस देश में भाई-भतीजावाद किस क्षेत्र में नहीं है! पता नहीं क्यों लोग फिर भी इसकी बुराई करते हैं। अब ताजा उदाहरण देखिए-इस साल पद्म पुरस्कारों के लिए की गई सिफारिशों की सूची में कुछ लोगों ने कई नाम सुझाए तो कुछ लोगों ने इस प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान के लिए अपने संबंधियों और दोस्तों के नामों को आगे बढाया।
अब पहली कोटि में वो लोग हैं, जो चाहते हैं कि भारत रत्न पुरस्कारों का सम्मान बचा रहना चाहिए। इसलिए वो लोग पता नहीं क्यों ईमानदारी दिखा जाते हैं।
जबकि होना ये चाहिए कि इसमें अपने रिश्तेदारों का नाम आगे किया जाना चाहिए। आखिर, परिवार के प्रति भी तो हमारा फर्ज है कुछ। अब एक सिरफिरे ने गृह मंत्रालय में आरटीआई डाल दिया कि किस महानुभाव ने किसके नाम की सिफारिश की है, भारत रत्न के लिए।
ऐसे में जो जवाब आया उससे यही साबित होता है कि हम भारत के लोग वसुधैव कुटुम्बकम् में भरोसा करें या न करें, अपने कुटुम्ब में बहुत भरोसा करते हैं।
गृह मंत्रालय ने आरटीआई आवेदन का जवाब दिया कि सार्वजनिक की गई 1300 नामों की सिफारिशें करने वाली सूची के अनुसार कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा, मंत्री राजीव शुक्ला, सांसद टी सुब्बरामी रेड्डी, शास्त्रीय गायक पंडित जसराज आदि ने इस पुरस्कार के लिए कई-कई नामों की सिफारिशें की थीं।
भारत रत्न से सम्मानित पार्श्व गायिका लता मंगेशकर ने पद्म पुरस्कारों के लिए जिन नामों की सिफारिश की हैं उनमें उनकी बहन उषा मंगेशकर, पार्श्व गायक सुरेश वाडकर और सामाजिक कार्यकर्ता राजमल पारख का नाम था।
पद्म विभूषण से सम्मानित सरोद वादक उस्ताद अमजद अली ने छह नामों की सिफारिश की थी जिनमें उनके बेटों अमान और अयान के साथ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक कौशिकी चक्रबर्ती, तबला वादक विजय घाटे, कला प्रोत्साहक सूर्य कृष्णमूर्ति उर्फ नटराज कृष्णमूर्ति और सितार वादक निलाद्री कुमार के नाम सम्मलित थे।
पूर्व सपा नेता अमर सिंह ने लोकसभा सदस्य जयाप्रदा को यह पुरस्कार देने की सिफारिश की थी। हालांकि, इस साल घोषितपद्म पुरस्कारों की सूची में उषा मंगेशकर, अमान या अयान जगह नहीं बना पाए। विख्यात शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पद्म पुरस्कारों के लिए नौ नाम, राजीव शुक्ला ने पांच, मोतीलाल वोरा ने आठ, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने रंगमंच से जुडे दो लोगों, विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने दो और कांग्रेस सांसद विजय दरडा ने तीन नामों की सिफारिश की थी।
अब आपको लग रहा होगा न कि आखिर मेरा नाम क्यों नहीं था इस सूची में...सोच रहा हूं जिस दिन सिफारिश करने लायक बनूंगा, अपने साले को भारत रत्न दिलवाऊंगा, आखिर सारी खुदाई एक तरफ...।
इस देश में भाई-भतीजावाद किस क्षेत्र में नहीं है! पता नहीं क्यों लोग फिर भी इसकी बुराई करते हैं। अब ताजा उदाहरण देखिए-इस साल पद्म पुरस्कारों के लिए की गई सिफारिशों की सूची में कुछ लोगों ने कई नाम सुझाए तो कुछ लोगों ने इस प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान के लिए अपने संबंधियों और दोस्तों के नामों को आगे बढाया।
अब पहली कोटि में वो लोग हैं, जो चाहते हैं कि भारत रत्न पुरस्कारों का सम्मान बचा रहना चाहिए। इसलिए वो लोग पता नहीं क्यों ईमानदारी दिखा जाते हैं।
जबकि होना ये चाहिए कि इसमें अपने रिश्तेदारों का नाम आगे किया जाना चाहिए। आखिर, परिवार के प्रति भी तो हमारा फर्ज है कुछ। अब एक सिरफिरे ने गृह मंत्रालय में आरटीआई डाल दिया कि किस महानुभाव ने किसके नाम की सिफारिश की है, भारत रत्न के लिए।
ऐसे में जो जवाब आया उससे यही साबित होता है कि हम भारत के लोग वसुधैव कुटुम्बकम् में भरोसा करें या न करें, अपने कुटुम्ब में बहुत भरोसा करते हैं।
गृह मंत्रालय ने आरटीआई आवेदन का जवाब दिया कि सार्वजनिक की गई 1300 नामों की सिफारिशें करने वाली सूची के अनुसार कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा, मंत्री राजीव शुक्ला, सांसद टी सुब्बरामी रेड्डी, शास्त्रीय गायक पंडित जसराज आदि ने इस पुरस्कार के लिए कई-कई नामों की सिफारिशें की थीं।
भारत रत्न से सम्मानित पार्श्व गायिका लता मंगेशकर ने पद्म पुरस्कारों के लिए जिन नामों की सिफारिश की हैं उनमें उनकी बहन उषा मंगेशकर, पार्श्व गायक सुरेश वाडकर और सामाजिक कार्यकर्ता राजमल पारख का नाम था।
पद्म विभूषण से सम्मानित सरोद वादक उस्ताद अमजद अली ने छह नामों की सिफारिश की थी जिनमें उनके बेटों अमान और अयान के साथ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक कौशिकी चक्रबर्ती, तबला वादक विजय घाटे, कला प्रोत्साहक सूर्य कृष्णमूर्ति उर्फ नटराज कृष्णमूर्ति और सितार वादक निलाद्री कुमार के नाम सम्मलित थे।
पूर्व सपा नेता अमर सिंह ने लोकसभा सदस्य जयाप्रदा को यह पुरस्कार देने की सिफारिश की थी। हालांकि, इस साल घोषितपद्म पुरस्कारों की सूची में उषा मंगेशकर, अमान या अयान जगह नहीं बना पाए। विख्यात शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पद्म पुरस्कारों के लिए नौ नाम, राजीव शुक्ला ने पांच, मोतीलाल वोरा ने आठ, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने रंगमंच से जुडे दो लोगों, विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने दो और कांग्रेस सांसद विजय दरडा ने तीन नामों की सिफारिश की थी।
अब आपको लग रहा होगा न कि आखिर मेरा नाम क्यों नहीं था इस सूची में...सोच रहा हूं जिस दिन सिफारिश करने लायक बनूंगा, अपने साले को भारत रत्न दिलवाऊंगा, आखिर सारी खुदाई एक तरफ...।
Sunday, October 13, 2013
रामलीलाः चीर कर रख दूंगा लकड़ी की तरह
मंच सजा था, बिजली की लड़ियों ने चकाचौंध मचा रखी थी। महागुन मेट्रो
मॉल की विशाल इमारत की छत पर मैकडॉनल्ड का लाल रंग का निशान चमक रहा था। इस
मॉल की आधुनिकता की चमक के ऐन पीछे मैदान में था मंच. बल्बों की नीली-पीली रौशनी के बीच भगवा रंग के कपड़ो में एक किशोर-सा
अभिनेता लक्ष्मण बना हुआ था।
मंच पर मौजूद सारे अभिनेता, जिनमें एक विदूषक, कई वानर लड़ाके और कई राक्षस थे। हनुमान भी। सारे अभिनेता मंच पर हमेशा चलते रहते, तीन कदम दाहिनी तरफ, फिर वापस मुड़कर, तीन कदम बाईं तरफ।
बीच बीच में कोई पंडितजीनुमा आदमी कोई निर्देश दे आता मंच पर जाकर। फिर मंच पर आवाज आती, उद्घोषक की, जिसे अपनी आवाज़ सुनाने में ज्यादा दिलचस्पी थी।
काले कपड़ो में सजे मेघनाद की आवाज़ में ज़ोर था, भगवा कपड़े में सजे लखन लाल की आवाज़ नरम थी। लेकिन तेवर वही...दोनों के बीच संवाद में शेरो-शायरी थी। एक ललकारता...दूसरा उसका जवाब देता।
लखन लाल चीखे, अरे क्या बक-बक करता है बकरी की तरह, चीर कर रख दूंगा, लकड़ी की तरह
भीड़ ने जोरदार ताली बजाई। एकदिन पहले हुई बारिश की वजह से मैदान गीला था...लेकिन मैदान में खासी भीड़ थी।
सोच रहा था कि क्या दिल्ली में भी लोग इतने खाली हैं, या फिर कुछ तो ऐसा है इन आधुनिक शहरियों को अपनी ओर खींच रहा है। रामलीला के बगल में, एक जगह ऑरकेस्ट्रा का आय़ोजन है। लडकी बांगला गाने गा रही है, और लगभर सुर के बाहर गा रही है।
वह भीड़ से पूछती है, केनो, हिंदी ना बांगला...भीड़ के अनुरोध पर वह हिंदी में गाती है। लौंडिया पटाएंगे, फेविकोल से...मेरे मित्र सुशांत को पूजा के पवित्र पंडाल में यह शायद अच्छा नहीं लगा होगा। मैं तर्क देता हूं कि यह मास कल्चर है। मास को पसंद कीजिए, हर जगह तहज़ीब की पैकेजिंग नहीं चलेगी।
यह सही है। यही सही है। आम आदमी, जिसके लिए राम लीला के पात्रों ने हिंदुस्तानी बोलना शुरू कर दिया। संवादों के बीच में ही, मानस की चौपाईयां आती है, जो माहौल में भक्ति का रंग भरने के सिवा कुछ और नहीं करतीं।
अगल बगल गुब्बारे, हवा मिठाई, गोलगप्पे...प्लास्टिक के खिलौने...चाट, भेलपूरी। मुझे मधुपुर की याद आई।
दृश्य़ दोः हमारे घर के पास ही एक दुर्गतिनाशिनी पूजा समिति है। दुर्गा की मूर्त्ति के सामने बच्चों के नाच का एक कार्यक्रम है। यह समिति पहले उड़िया समुदाय के लोगों के हाथ में थी, अब उस समिति में बिहारी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, यूपी के सभी समुदायों के लोग है।
सभी घरों के बच्चे नाच रहे हैं, महिलाएं हैं...मेयर साहब आते हैं..। जय गणेशा गाने पर नाचने वाला लड़का बहुत अच्छा नाच रहा है। मैं पहचानता हूं उसे, वह बिजली मिस्त्री है। रोज पेचकस कमर में खोंसे शिवशक्ति इलेक्ट्रिकल्स पर बैठा रहता है। मुसलमान है।
अब किसी को फर्क नहीं पड़ा कि नाचने वाला लड़का किस धर्म का है। किसी को फर्क नहीं पड़ा कि दुर्गा जी ने जिस महिषासुर को मारा है मूर्ति में...उसकी जाति और उसके समुदाय को लेकर बौद्धिक तबका बहस में उलझा है। जनता को फर्क नही पड़ता कि दुर्गा ने किसको मारा है।
देश उत्सवधर्मियों का है, उत्सव मनाते हैं हम।
इसमें विचारधारा को मत घुसेडिए। दुर्गा पूजा को एक प्रतीक भर रहने दीजिए। इसके सामाजिक संदर्भों को देखिए, इसमें और समुदायों को मिलाइए...और सांप्रदायिकता, राम को सांप्रदायिक बना दिया है आपने, अब दुर्गा को भी मत बनाइए।
यह आम लोगों को उत्सव है...उत्सव ही रहे। ऑरकेस्ट्रा बजता रहे, सुर बाहर लगे, कोई दिक्कत नहीं, जय गणेसा पर नाचते रहें लोग...बस।
मंच पर मौजूद सारे अभिनेता, जिनमें एक विदूषक, कई वानर लड़ाके और कई राक्षस थे। हनुमान भी। सारे अभिनेता मंच पर हमेशा चलते रहते, तीन कदम दाहिनी तरफ, फिर वापस मुड़कर, तीन कदम बाईं तरफ।
बीच बीच में कोई पंडितजीनुमा आदमी कोई निर्देश दे आता मंच पर जाकर। फिर मंच पर आवाज आती, उद्घोषक की, जिसे अपनी आवाज़ सुनाने में ज्यादा दिलचस्पी थी।
काले कपड़ो में सजे मेघनाद की आवाज़ में ज़ोर था, भगवा कपड़े में सजे लखन लाल की आवाज़ नरम थी। लेकिन तेवर वही...दोनों के बीच संवाद में शेरो-शायरी थी। एक ललकारता...दूसरा उसका जवाब देता।
लखन लाल चीखे, अरे क्या बक-बक करता है बकरी की तरह, चीर कर रख दूंगा, लकड़ी की तरह
भीड़ ने जोरदार ताली बजाई। एकदिन पहले हुई बारिश की वजह से मैदान गीला था...लेकिन मैदान में खासी भीड़ थी।
सोच रहा था कि क्या दिल्ली में भी लोग इतने खाली हैं, या फिर कुछ तो ऐसा है इन आधुनिक शहरियों को अपनी ओर खींच रहा है। रामलीला के बगल में, एक जगह ऑरकेस्ट्रा का आय़ोजन है। लडकी बांगला गाने गा रही है, और लगभर सुर के बाहर गा रही है।
वह भीड़ से पूछती है, केनो, हिंदी ना बांगला...भीड़ के अनुरोध पर वह हिंदी में गाती है। लौंडिया पटाएंगे, फेविकोल से...मेरे मित्र सुशांत को पूजा के पवित्र पंडाल में यह शायद अच्छा नहीं लगा होगा। मैं तर्क देता हूं कि यह मास कल्चर है। मास को पसंद कीजिए, हर जगह तहज़ीब की पैकेजिंग नहीं चलेगी।
यह सही है। यही सही है। आम आदमी, जिसके लिए राम लीला के पात्रों ने हिंदुस्तानी बोलना शुरू कर दिया। संवादों के बीच में ही, मानस की चौपाईयां आती है, जो माहौल में भक्ति का रंग भरने के सिवा कुछ और नहीं करतीं।
अगल बगल गुब्बारे, हवा मिठाई, गोलगप्पे...प्लास्टिक के खिलौने...चाट, भेलपूरी। मुझे मधुपुर की याद आई।
दृश्य़ दोः हमारे घर के पास ही एक दुर्गतिनाशिनी पूजा समिति है। दुर्गा की मूर्त्ति के सामने बच्चों के नाच का एक कार्यक्रम है। यह समिति पहले उड़िया समुदाय के लोगों के हाथ में थी, अब उस समिति में बिहारी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, यूपी के सभी समुदायों के लोग है।
सभी घरों के बच्चे नाच रहे हैं, महिलाएं हैं...मेयर साहब आते हैं..। जय गणेशा गाने पर नाचने वाला लड़का बहुत अच्छा नाच रहा है। मैं पहचानता हूं उसे, वह बिजली मिस्त्री है। रोज पेचकस कमर में खोंसे शिवशक्ति इलेक्ट्रिकल्स पर बैठा रहता है। मुसलमान है।
अब किसी को फर्क नहीं पड़ा कि नाचने वाला लड़का किस धर्म का है। किसी को फर्क नहीं पड़ा कि दुर्गा जी ने जिस महिषासुर को मारा है मूर्ति में...उसकी जाति और उसके समुदाय को लेकर बौद्धिक तबका बहस में उलझा है। जनता को फर्क नही पड़ता कि दुर्गा ने किसको मारा है।
देश उत्सवधर्मियों का है, उत्सव मनाते हैं हम।
इसमें विचारधारा को मत घुसेडिए। दुर्गा पूजा को एक प्रतीक भर रहने दीजिए। इसके सामाजिक संदर्भों को देखिए, इसमें और समुदायों को मिलाइए...और सांप्रदायिकता, राम को सांप्रदायिक बना दिया है आपने, अब दुर्गा को भी मत बनाइए।
यह आम लोगों को उत्सव है...उत्सव ही रहे। ऑरकेस्ट्रा बजता रहे, सुर बाहर लगे, कोई दिक्कत नहीं, जय गणेसा पर नाचते रहें लोग...बस।
Wednesday, September 18, 2013
गुलाबों के दौर में कैक्टस काया!
बारिश का मौसम था। कार सांप की तरह बलखाई काली कोलतार की सड़क के किनारे खड़ी थी। मिट्टी लाल रंग की थी, और बारिश की वजह से और ज्यादा लाल हो गई थी। लड़का हरी झाड़ियों में घुस गया।
झाड़ियों में घुसकर पता नहीं धतूरा, भटकटैया, ओक और न जाने क्या-क्या अलाय-बलाय फूल बटोर लाया। लड़की को भेंट दी। लड़की ने रख लिया। डायरी के पन्नों में छिपाकर रख लिया।
लड़के ने वायदा किया कि उसके जन्मदिन पर गेहूं की दो बालियां भेंट करेगा। लड़का गेहूं की बालियां भेंट नहीं कर पाया। क्यों, ये सवाल अलहदा है। लेकिन वह एक सवाल छोड़ गया।
प्रेमिका के कोमल हाथों में जाने का सुख सिर्फ गुलाब ही को हासिल क्यों हो। यह भावनाएं भटकटैया या धतूरे या ओक को हासिल क्यों न हो। और बात सिर्फ प्रेमिका के हाथों में जाने की ही नहीं है।
बात है कि लोग कैक्टसों, नागफनियों, भटकटैयों, धतूरों से डरते क्यों है। धार्मिकों को तो इनसे प्रेम होना चाहिए। आपके आराध्य महादेव के प्रिय फूल हैं ये। लेकिन नहीं, महादेव से कुछ मांग लेना, और बेलपत्रो से बेल से भांग से लिंग की पूजा या मूर्त्ति की पूजा कर लेना एक बात है, जीवन में उतार लेना दूसरी।
ज़हर पीना हो, तो पिएं खुद महादेव, बनें नीलकंठ। हमें क्या। हम सुविधाभोगी लोग है, खुद में से कैक्टस चुनकर उनको जहर पीने के लिए आगे कर देते हैं। हर युग में नीलकंठों की जरूरत होती है, ऐसे नीलकंठो की जिनको नाग पसंद होते हैं, नागफनी पसंद होती है, जिनका कपड़ों से नहीं, छाल से काम चल जाता है, जिनको बेलपत्र-भंग-बेल ही नसीब होता है। और बाद में अमृत हासिल करने वाला समुदाय जहर उनके हवाले कर जाता है। हर युग में बंदर पुल बनाते हैं, राम जाकर रावण मार आते हैं, पुल तो राम के नाम का हो जाता है।
बंदर मर जाते हैं। उनका नामलेवा तक कोई नहीं, कितने बंदर पत्थरों में दब गए। युद्ध में कितने मरे, कोई इंडिया गेट नहीं बना, कहीं नाम नहीं खुदा। कैक्टस थे सबके सब। खुद उग आए थे। खुद उगगें तो कौन रखेगा खयाल।
कैक्टस होना, सरकारी स्कूलो में पढ़ने वाले बच्चों की तरह है। जड़ में कौई खाद डाल रहा है, पानी डाल रहा है, या कौन जाने दोपहर के खाने के नाम पर जहर ही परोस रहा हो, कौन जाने पोलियो की बजाय हेपेटाटिस का टीका ड्रॉप बनाकर पिला जाए। देवताओं की कमी नहीं, गुलाबों की कमी नहीं.. ये दुनिया ही गुलाबों ने अपनेलिए बनाई है। ये दुनिया देवताओं ने अपने लिए गढ़ी है।
इसमें नागफनियों के लिए स्पेस नहीं है।
देवताओं की दुनिया में गुलाबो की दुनिया में फ्लाईओवर हैं, वहां साइकिल के लिए स्पेस नहीं है। गुलाबों की दुनिया में नजाकत है नफासत है, वहां भदेस होना बेवकूफी है, वैसे ही जैसे हाथ से खाना।
कैक्टस को आजकल गमलों में लगाते हैं। नहीं, गमलों में लगने के लिए बना ही नहीं है कैक्टस।
बिना खाद बिना पानी, बिना माली के खुद उगता है कैक्टस। इसकी नियति है, सुनसान में उगना, औरजब फूलता है तो इसका सौन्दर्य किसी कदर गुलाब से कम नहीं होता। निराला ने इसी वजह से तो गरिआया है गुलाब को,
अबे सुन बे गुलाब,
भूल मत गर पाई खुशबू
रंगो-आब।
---
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर बैठा इतरा रहा कैपिटलिस्ट।
कैक्टस को देखिए, कांटों से भरा होता है। कांटे तो गुलाब मे भी होते हैं, लेकिन वो होते है गुलाब की रक्षा के लिए। उन कांटो की जो नज़ाकत होती है ना फूल तो फूल, कांटा भी नफीस-सॉफिस्टिकेटेड लगता है। नागफनी का कांटा छू लीजिए कभी। बिच्छू के दंश सा होता है। नानी जीवित हो दिवंगत, याद आनी तय है।
तो ग़िला किस बात का, किस बात की शिकायत, अगर आपके अंदर है नागफ़नी तो फिर किसी की परवाह क्यों...शान से सर उठा कि जिएं। बाजुओं में ताकत तो होगी ही, फिर काहे के लिए किसी को मुंह जोहना...।
लड़का इत्ता भाषण देकर सड़क के किनारे बैठ गया। लाल मिट्टी में अदरक बहुत बढ़िया होती है, हल्दी भी। देसी जंगली हल्दी औषधीय गुणो की होती है। उसकी खुशबू...पैकेट वाली हल्दी से एकदम अलहदा। लड़की के हाथ में एक और भटकटैया का फूल थमाया उसने, शीशे पर नज़र गई तो देखा उसका खुद का गला नीला-नीला सा हो रहा था।
झाड़ियों में घुसकर पता नहीं धतूरा, भटकटैया, ओक और न जाने क्या-क्या अलाय-बलाय फूल बटोर लाया। लड़की को भेंट दी। लड़की ने रख लिया। डायरी के पन्नों में छिपाकर रख लिया।
लड़के ने वायदा किया कि उसके जन्मदिन पर गेहूं की दो बालियां भेंट करेगा। लड़का गेहूं की बालियां भेंट नहीं कर पाया। क्यों, ये सवाल अलहदा है। लेकिन वह एक सवाल छोड़ गया।
प्रेमिका के कोमल हाथों में जाने का सुख सिर्फ गुलाब ही को हासिल क्यों हो। यह भावनाएं भटकटैया या धतूरे या ओक को हासिल क्यों न हो। और बात सिर्फ प्रेमिका के हाथों में जाने की ही नहीं है।
बात है कि लोग कैक्टसों, नागफनियों, भटकटैयों, धतूरों से डरते क्यों है। धार्मिकों को तो इनसे प्रेम होना चाहिए। आपके आराध्य महादेव के प्रिय फूल हैं ये। लेकिन नहीं, महादेव से कुछ मांग लेना, और बेलपत्रो से बेल से भांग से लिंग की पूजा या मूर्त्ति की पूजा कर लेना एक बात है, जीवन में उतार लेना दूसरी।
ज़हर पीना हो, तो पिएं खुद महादेव, बनें नीलकंठ। हमें क्या। हम सुविधाभोगी लोग है, खुद में से कैक्टस चुनकर उनको जहर पीने के लिए आगे कर देते हैं। हर युग में नीलकंठों की जरूरत होती है, ऐसे नीलकंठो की जिनको नाग पसंद होते हैं, नागफनी पसंद होती है, जिनका कपड़ों से नहीं, छाल से काम चल जाता है, जिनको बेलपत्र-भंग-बेल ही नसीब होता है। और बाद में अमृत हासिल करने वाला समुदाय जहर उनके हवाले कर जाता है। हर युग में बंदर पुल बनाते हैं, राम जाकर रावण मार आते हैं, पुल तो राम के नाम का हो जाता है।
बंदर मर जाते हैं। उनका नामलेवा तक कोई नहीं, कितने बंदर पत्थरों में दब गए। युद्ध में कितने मरे, कोई इंडिया गेट नहीं बना, कहीं नाम नहीं खुदा। कैक्टस थे सबके सब। खुद उग आए थे। खुद उगगें तो कौन रखेगा खयाल।
कैक्टस होना, सरकारी स्कूलो में पढ़ने वाले बच्चों की तरह है। जड़ में कौई खाद डाल रहा है, पानी डाल रहा है, या कौन जाने दोपहर के खाने के नाम पर जहर ही परोस रहा हो, कौन जाने पोलियो की बजाय हेपेटाटिस का टीका ड्रॉप बनाकर पिला जाए। देवताओं की कमी नहीं, गुलाबों की कमी नहीं.. ये दुनिया ही गुलाबों ने अपनेलिए बनाई है। ये दुनिया देवताओं ने अपने लिए गढ़ी है।
इसमें नागफनियों के लिए स्पेस नहीं है।
देवताओं की दुनिया में गुलाबो की दुनिया में फ्लाईओवर हैं, वहां साइकिल के लिए स्पेस नहीं है। गुलाबों की दुनिया में नजाकत है नफासत है, वहां भदेस होना बेवकूफी है, वैसे ही जैसे हाथ से खाना।
कैक्टस को आजकल गमलों में लगाते हैं। नहीं, गमलों में लगने के लिए बना ही नहीं है कैक्टस।
बिना खाद बिना पानी, बिना माली के खुद उगता है कैक्टस। इसकी नियति है, सुनसान में उगना, औरजब फूलता है तो इसका सौन्दर्य किसी कदर गुलाब से कम नहीं होता। निराला ने इसी वजह से तो गरिआया है गुलाब को,
अबे सुन बे गुलाब,
भूल मत गर पाई खुशबू
रंगो-आब।
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खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर बैठा इतरा रहा कैपिटलिस्ट।
कैक्टस को देखिए, कांटों से भरा होता है। कांटे तो गुलाब मे भी होते हैं, लेकिन वो होते है गुलाब की रक्षा के लिए। उन कांटो की जो नज़ाकत होती है ना फूल तो फूल, कांटा भी नफीस-सॉफिस्टिकेटेड लगता है। नागफनी का कांटा छू लीजिए कभी। बिच्छू के दंश सा होता है। नानी जीवित हो दिवंगत, याद आनी तय है।
तो ग़िला किस बात का, किस बात की शिकायत, अगर आपके अंदर है नागफ़नी तो फिर किसी की परवाह क्यों...शान से सर उठा कि जिएं। बाजुओं में ताकत तो होगी ही, फिर काहे के लिए किसी को मुंह जोहना...।
लड़का इत्ता भाषण देकर सड़क के किनारे बैठ गया। लाल मिट्टी में अदरक बहुत बढ़िया होती है, हल्दी भी। देसी जंगली हल्दी औषधीय गुणो की होती है। उसकी खुशबू...पैकेट वाली हल्दी से एकदम अलहदा। लड़की के हाथ में एक और भटकटैया का फूल थमाया उसने, शीशे पर नज़र गई तो देखा उसका खुद का गला नीला-नीला सा हो रहा था।
Monday, September 2, 2013
एक शाम होटल ताज पैलेस वाया गांव जारपा, नियामगिरि
दिल्ली। जगहः दरबार हॉल, होटल ताज पैलेस। वातानुकूलित हॉल, रंग-बिरंगी रोशनी। मेरी औकात को अच्छी-तरह समझता बूझता वेटर मेरे पास आकर मुझे जूस, और रोस्टेड चिकन के लिए पूछता है। किसी ट्रैवल मैगजीन ने पुरस्कारों का आयोजन है।
आयोजन शुरू होने में देर है। कई होटल वालों को पुरस्कार मिलना है। कयास लगाता हूं कि ये वो लोग होंगे जो उक्त पत्रिका में विज्ञापन देते होंगे। एक मंत्री भी आने वाले हैं, दो फिल्मकार हैं। जिनमें से एक के नाम पर पुरस्कार है, दूसरे को पुरस्कार दिया जा रहा है।
बिजली की चमक मुझे चौंधियाती है। बगल की टेबल पर बैठी एक लड़की ने काफी छोटी और संकरी हाफ पैंट पहनी है। उसके पेंसिल लेग्स दिख रहे हैं। उसकी किसी रिश्तेदार ने पता नहीं किस शैली में साड़ी पहनी है, ज्यादा कल्पना करने के लिए गुंजाईश नहीं छोड़ी है। साथ में तेरह-चौदह साल का लड़का अपनी ही अकड़-फूं में है।
दोनों सम्माननीया महिलाओं के बदन पर चर्बी नहीं है। हड्डियां दिख रही हैं, कॉलर बोन भी। डायटिंग का कमाल है। जी हां, मैं उक्त महिला के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए उनके बदन की चर्बी नाप रहा था। वो बड़ी नज़ाकत से जूस का सिप ले रही हैं। वो हाफ पैंट वाली कन्या बार टेंडर से कुछ लाकर पी रही है...शायद वोदका है। वो कैलोरी वाला कुछ नहीं खा रहीं।
मै शरीर से दरबार हॉल में हूं। मन मेरा अभी भी नियामगिरि में हूं, जरपा गांव में। मेरे दिलो-दिमाग़ में अभी जरपा गांव ताजा़ है। हरियाली का पारावार। जीवन में इतनी अधिकतम हरियाल एक साथ देखी नहीं थी। नियामगिरि के जंगलो में डंगरिया-कोंध जनजाति रहती है। मर्द औरतें दोनों नाक में नथें पहनती हैं, महिलाएं भी कमर के ऊपर महज गमछा लपेटती हैं कपड़े के नाम पर। दो वजहें हैं--अव्वल तो उनकी परंपरा है, और उनको जरूरत भी नहीं। दोयम, तन ढंकने भर को कपड़े उपलब्ध हैं।
तन भी कैसा। कुपोषण से गाल धंसे हुए। डोंगरिया-कोंध लोगों की आबादी नहीं बढ़ रही क्योंकि छोटी बीमारियों में भी बच्चे चल बसते हैं। गांव में सड़क नहीं, पीने का पानी नहीं, बिजली वगैरह के बारे में तो सोचना ही फिजूल है। जारपा तक जाने में हमें जंगल में बारह किलोमीटर चढ़ना पड़ा।
अभी तो नियामगिरि बवाल बना हुआ है। वहां का किस्सा-कोताह यह है कि वेदांता नाम की कंपनी को लान्जीगढ़ की अपनी रिफाइनरी के लिए बॉक्साइट चाहिए। नियामगिरि में बॉक्साइट है। लेकिन नियामगिरि में आस्था भी है। डोंगरिया-कोंध जनजाति के लिए नियामगिरि पहाड़ पूज्य है, नियाम राजा है।
तो छियासठ साल बाद, सरकार को सुध आई कि इन डोंगरिया-कोंध लोगों का विकास करना है, उनको सभ्य बनाना है। इसके लिए इस जनजाति को जंगल से खदेड़ देने का मामला फिट किया गया। योजना बनाने वाले सोचते हैं कि भई, जंगल में रह कर कैसे होगा विकास?
लेकिन डोंगरिया-कोंध को लगता है विकास की इस योजना के पीछे कोई गहरी चाल छिपी है। कोंध लोगों को अंग्रेजी नहीं आती, विकास की अवधारणा से उनका साबका नहीं हुआ है, उनको ग्रीफिथ टेलर ने नहीं बताया कि जल-जंगल-जमीन को लूटने वाली मौजूदा अर्थव्यवस्था आर्थिक और पर्यावरण भूगोल में अपहरण और डकैती अर्थव्यवस्था कही जाती है।
डोंगरिया कोंध जनजाति के इस लड़ाके तेवर पर नियामगिरि सुरक्षा समिति के लिंगराज आजाद ने कहा था मुझसे, आदिवासियों के बाल काट देना उनका विकास नहीं है। आदिवासी अगर कम कपड़े पहनते हैं और यह असभ्यता की निशानी है,तो उन लोगों को भी सभ्य बनाओ जो कम कपड़े पहन कर परदे पर आती हैं।
लिगराज आजाद को शायद यह इल्म भी न रहा होगा कि कम कपड़े पहने लोग सिर्फ सिनेमाई परदे पर ही नहीं आते। कम कपड़े पहनना सच में सभ्यता की निशानी है, कम कपड़ो से व्यक्तिगत तौर पर मुझे कोई उज्र नहीं है। लेकिन किसी को इसी आधार पर बर्बर-असभ्य कहने पर मुझे गहरी आपत्ति है।
दरबार हॉल की महिला के उभरे हुए चिक-बोन्स और डंगरिया लड़की के गाल की उभरी हुई हड़्डी में अंतर है। वही अंतर है, जो शाइनिंग इंडिया में है, और भारत में। इन्ही के भारत का निर्माण किया जा रहा है। 66 साल बाद याद आया कि भारत का निर्माण किया जाना है।
मन में सवाल है, अब तक किस भारत का उदय हुआ, किसकों चमकाया आपने, जो शाइनिंग है वो किसकी है। वेदांता, पॉस्को, आर्सेलर मित्तल ने किसके लिए लाखों करोड़ लगाया है भला।
मेरे खयालों का क्रम टूटता है, वह वोदका पीने वाली कम कपड़ो वाली कन्या और सिर्फ साड़ी (ब्लाउज स्लीवलेस था) कहने आदरणीया महिला मेरी तरफ देख रही हैं...मैं उनकी मुस्कुराहट पर नज़र डालता हूं, नकली है, बनावटी है। कसरत की वजह से धंसे गालों में रूज़ की लाली है, नकली है। जरपा गांव में मेरे पत्तल पर भात और पनियाई दाल डालने वाली आदिवासी कन्या की मुस्कुराहट याद आ रही है...उसके धंसे गालों में से सफेद दांत झांकते थे, तो लगा था यही तो है मिलियन डॉलर स्माइल। उसकी मुस्कुराहट...झरने के पानी की तरह साफ, शगुफ़्ता, शबनम की तरह पाक।
जरपा तुम धन्य हो।
आयोजन शुरू होने में देर है। कई होटल वालों को पुरस्कार मिलना है। कयास लगाता हूं कि ये वो लोग होंगे जो उक्त पत्रिका में विज्ञापन देते होंगे। एक मंत्री भी आने वाले हैं, दो फिल्मकार हैं। जिनमें से एक के नाम पर पुरस्कार है, दूसरे को पुरस्कार दिया जा रहा है।
बिजली की चमक मुझे चौंधियाती है। बगल की टेबल पर बैठी एक लड़की ने काफी छोटी और संकरी हाफ पैंट पहनी है। उसके पेंसिल लेग्स दिख रहे हैं। उसकी किसी रिश्तेदार ने पता नहीं किस शैली में साड़ी पहनी है, ज्यादा कल्पना करने के लिए गुंजाईश नहीं छोड़ी है। साथ में तेरह-चौदह साल का लड़का अपनी ही अकड़-फूं में है।
दोनों सम्माननीया महिलाओं के बदन पर चर्बी नहीं है। हड्डियां दिख रही हैं, कॉलर बोन भी। डायटिंग का कमाल है। जी हां, मैं उक्त महिला के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए उनके बदन की चर्बी नाप रहा था। वो बड़ी नज़ाकत से जूस का सिप ले रही हैं। वो हाफ पैंट वाली कन्या बार टेंडर से कुछ लाकर पी रही है...शायद वोदका है। वो कैलोरी वाला कुछ नहीं खा रहीं।
मै शरीर से दरबार हॉल में हूं। मन मेरा अभी भी नियामगिरि में हूं, जरपा गांव में। मेरे दिलो-दिमाग़ में अभी जरपा गांव ताजा़ है। हरियाली का पारावार। जीवन में इतनी अधिकतम हरियाल एक साथ देखी नहीं थी। नियामगिरि के जंगलो में डंगरिया-कोंध जनजाति रहती है। मर्द औरतें दोनों नाक में नथें पहनती हैं, महिलाएं भी कमर के ऊपर महज गमछा लपेटती हैं कपड़े के नाम पर। दो वजहें हैं--अव्वल तो उनकी परंपरा है, और उनको जरूरत भी नहीं। दोयम, तन ढंकने भर को कपड़े उपलब्ध हैं।
तन भी कैसा। कुपोषण से गाल धंसे हुए। डोंगरिया-कोंध लोगों की आबादी नहीं बढ़ रही क्योंकि छोटी बीमारियों में भी बच्चे चल बसते हैं। गांव में सड़क नहीं, पीने का पानी नहीं, बिजली वगैरह के बारे में तो सोचना ही फिजूल है। जारपा तक जाने में हमें जंगल में बारह किलोमीटर चढ़ना पड़ा।
अभी तो नियामगिरि बवाल बना हुआ है। वहां का किस्सा-कोताह यह है कि वेदांता नाम की कंपनी को लान्जीगढ़ की अपनी रिफाइनरी के लिए बॉक्साइट चाहिए। नियामगिरि में बॉक्साइट है। लेकिन नियामगिरि में आस्था भी है। डोंगरिया-कोंध जनजाति के लिए नियामगिरि पहाड़ पूज्य है, नियाम राजा है।
तो छियासठ साल बाद, सरकार को सुध आई कि इन डोंगरिया-कोंध लोगों का विकास करना है, उनको सभ्य बनाना है। इसके लिए इस जनजाति को जंगल से खदेड़ देने का मामला फिट किया गया। योजना बनाने वाले सोचते हैं कि भई, जंगल में रह कर कैसे होगा विकास?
लेकिन डोंगरिया-कोंध को लगता है विकास की इस योजना के पीछे कोई गहरी चाल छिपी है। कोंध लोगों को अंग्रेजी नहीं आती, विकास की अवधारणा से उनका साबका नहीं हुआ है, उनको ग्रीफिथ टेलर ने नहीं बताया कि जल-जंगल-जमीन को लूटने वाली मौजूदा अर्थव्यवस्था आर्थिक और पर्यावरण भूगोल में अपहरण और डकैती अर्थव्यवस्था कही जाती है।
डोंगरिया कोंध जनजाति के इस लड़ाके तेवर पर नियामगिरि सुरक्षा समिति के लिंगराज आजाद ने कहा था मुझसे, आदिवासियों के बाल काट देना उनका विकास नहीं है। आदिवासी अगर कम कपड़े पहनते हैं और यह असभ्यता की निशानी है,तो उन लोगों को भी सभ्य बनाओ जो कम कपड़े पहन कर परदे पर आती हैं।
लिगराज आजाद को शायद यह इल्म भी न रहा होगा कि कम कपड़े पहने लोग सिर्फ सिनेमाई परदे पर ही नहीं आते। कम कपड़े पहनना सच में सभ्यता की निशानी है, कम कपड़ो से व्यक्तिगत तौर पर मुझे कोई उज्र नहीं है। लेकिन किसी को इसी आधार पर बर्बर-असभ्य कहने पर मुझे गहरी आपत्ति है।
दरबार हॉल की महिला के उभरे हुए चिक-बोन्स और डंगरिया लड़की के गाल की उभरी हुई हड़्डी में अंतर है। वही अंतर है, जो शाइनिंग इंडिया में है, और भारत में। इन्ही के भारत का निर्माण किया जा रहा है। 66 साल बाद याद आया कि भारत का निर्माण किया जाना है।
मन में सवाल है, अब तक किस भारत का उदय हुआ, किसकों चमकाया आपने, जो शाइनिंग है वो किसकी है। वेदांता, पॉस्को, आर्सेलर मित्तल ने किसके लिए लाखों करोड़ लगाया है भला।
मेरे खयालों का क्रम टूटता है, वह वोदका पीने वाली कम कपड़ो वाली कन्या और सिर्फ साड़ी (ब्लाउज स्लीवलेस था) कहने आदरणीया महिला मेरी तरफ देख रही हैं...मैं उनकी मुस्कुराहट पर नज़र डालता हूं, नकली है, बनावटी है। कसरत की वजह से धंसे गालों में रूज़ की लाली है, नकली है। जरपा गांव में मेरे पत्तल पर भात और पनियाई दाल डालने वाली आदिवासी कन्या की मुस्कुराहट याद आ रही है...उसके धंसे गालों में से सफेद दांत झांकते थे, तो लगा था यही तो है मिलियन डॉलर स्माइल। उसकी मुस्कुराहट...झरने के पानी की तरह साफ, शगुफ़्ता, शबनम की तरह पाक।
जरपा तुम धन्य हो।
Sunday, February 24, 2013
बाप सरीखी धूप
दिल्ली में मौसम मां-बाप की लड़ाई सरीखा हो गया है।
दिल्ली की धूप हमारे जमाने के मास्टर की संटी सरीखा करंटी हुआ करता है। हमारे जमाने इसलिए कहा, काहे कि आज के मास्टर बच्चों को कहां पीट पाते हैं?
तो जनाब, दिन की धूप में बाप-सा कड़ापन आना शुरू ही हुआ था..कि सरदी बीच में मां के लाड़-सी कूद पड़ती है। यों कि अब बाबू जी के अनुशासन और मां के लाड़ के खींचतान में बच्चे की तो दुविधा द्विगुणित हो जाए।
सर्द हवा की झोंकों, रात के तापमान में बरफीले अहसास और दिन में बाबूजी सरीखे आंखे लाल किए सूरज की छड़ीनुमा धूप के बीच बच्चा सरीखा आदमी ज्वर में कांपे, खांके, छींके...।
अब धूप का रंग बाबूजी से मिला ही दिया है तो उसके भी कई तेवर हैं...सुबह की धूप, सुबह 11 बजे की धूप, दोपहर की सिर पर तैनात धूप...खेल के वक्त की कनपटी पर पड़ती धूप, ड्रिल मास्टर सरीखी...शाम की धूप विदा कहती प्रेमिका-सी, जाड़े की धूप, भादो के दोपहर की धूप...और न जाने कितने रंग हैं।
रघुवीर सहाय को ये रंग तो कई तरीके का नजर आया हैः
‘एक रंग होता है नीला,
और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है,
इसी तरह लाल भी लाल नहीं है,
बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग,
दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है,
सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है,
और कोई एक रंग जो तेरी बांह पर पड़ा हुआ है।’
धूप पिताजी के अवतार में है, पापा के भी, डैडी के भी...अलग अलग लोगों के लिए अलग-अलग संबोधन..अलग चरित्र। मोंटेक की धूप मनमोहन की धूप...मेरे, आपके और एक मजदूर की धूप में अंतर तो होगा ना।
धूप में पसीना बहाना...कुछ ऐसा मानो कह रहा हो, आदमी जब तक हारता रहता है जिंदा रहता है। जब जीतने लगता है आदमी नहीं रहता।
लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित ही है...धूप बाप-सा तीखा क्यों हो गया। जवाब भी होगा, सरदी की हवाओं ने मां जैसी नरमाई छोड़ी नहीं है अब तक।
आखिर में, शाहरुख खान को याद कीजिए, हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी, धूप है कभी कभी है छांव जिंदगी...जिंदगी में अभी धूप वाला दौर है।
दिल्ली की धूप हमारे जमाने के मास्टर की संटी सरीखा करंटी हुआ करता है। हमारे जमाने इसलिए कहा, काहे कि आज के मास्टर बच्चों को कहां पीट पाते हैं?
तो जनाब, दिन की धूप में बाप-सा कड़ापन आना शुरू ही हुआ था..कि सरदी बीच में मां के लाड़-सी कूद पड़ती है। यों कि अब बाबू जी के अनुशासन और मां के लाड़ के खींचतान में बच्चे की तो दुविधा द्विगुणित हो जाए।
सर्द हवा की झोंकों, रात के तापमान में बरफीले अहसास और दिन में बाबूजी सरीखे आंखे लाल किए सूरज की छड़ीनुमा धूप के बीच बच्चा सरीखा आदमी ज्वर में कांपे, खांके, छींके...।
अब धूप का रंग बाबूजी से मिला ही दिया है तो उसके भी कई तेवर हैं...सुबह की धूप, सुबह 11 बजे की धूप, दोपहर की सिर पर तैनात धूप...खेल के वक्त की कनपटी पर पड़ती धूप, ड्रिल मास्टर सरीखी...शाम की धूप विदा कहती प्रेमिका-सी, जाड़े की धूप, भादो के दोपहर की धूप...और न जाने कितने रंग हैं।
रघुवीर सहाय को ये रंग तो कई तरीके का नजर आया हैः
‘एक रंग होता है नीला,
और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है,
इसी तरह लाल भी लाल नहीं है,
बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग,
दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है,
सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है,
और कोई एक रंग जो तेरी बांह पर पड़ा हुआ है।’
धूप पिताजी के अवतार में है, पापा के भी, डैडी के भी...अलग अलग लोगों के लिए अलग-अलग संबोधन..अलग चरित्र। मोंटेक की धूप मनमोहन की धूप...मेरे, आपके और एक मजदूर की धूप में अंतर तो होगा ना।
धूप में पसीना बहाना...कुछ ऐसा मानो कह रहा हो, आदमी जब तक हारता रहता है जिंदा रहता है। जब जीतने लगता है आदमी नहीं रहता।
लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित ही है...धूप बाप-सा तीखा क्यों हो गया। जवाब भी होगा, सरदी की हवाओं ने मां जैसी नरमाई छोड़ी नहीं है अब तक।
आखिर में, शाहरुख खान को याद कीजिए, हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी, धूप है कभी कभी है छांव जिंदगी...जिंदगी में अभी धूप वाला दौर है।
Saturday, January 19, 2013
राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनने से क्या होगा?
सवाल बहुत टेढ़ा है। टेढ़ा है पर मेरा है। आखिर राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाकर क्या होगा? और अगर आज यह घोषित किया गया कि राहुल गांधी आज कांग्रेस के नंबर दो बन गए हैं, तो कोई साफ करेगा कि कल तक वो क्या थे।
और कल तक अगर कुछ और थे तो किसी कांग्रेसी महासचिव की तुलना में उनका वज़न इतना ज्यादा क्यों था। और अगर कल उनका वजन, उनका क़द पहले ही ज्यादा था, तो नंबर दो घोषित करने की वजह क्या है।
जनाब जयराम रमेश ने चिंतन शिविर में पहले ही चिंता व्यक्त कर दी है कि कांग्रेस अपने बूते सत्ता में नहीं आ पाएगी। यह बात तो राजनीति, पत्रकारिता और सामान्य नर-नारियों को पहले से पता है, रमेश बाबू कुछ तो नया कहिए।
अगला चुनाव कहा जा रहा है कि राहुल गांधी की अगुआई में लड़ा जाए। तो बिहार, यूपी, पंजाब वगैरह के पिछले चुनाव आपने किसकी अगुआई में लड़े थे।
फिर भी, चिंतन शिविर में हुई बातचीत और राहुल बाबा के नाम को आगे करने, उसके समर्थन करने के इस किस्से पर मुझे एक वाकया याद आ रहा है। एक डॉक्टर और उसके जूनियर इंटर्नों के बीच की बात-चीत है। खालिस किस्सा है, कहीं पढ़ा था। इसका किसी राजनीतिज्ञ से कोई लेना-देना नहीं।
"सड़क पर डॉक्टर साहब अपने जूनियर डॉक्टरों से घिरे आ रहे हैं। वे कुछ कह रहे थे और बाकी के लोग आगे आ-आकर उनकी हां में हां मिला रहे थे। आगे आकर दूसरे से पहले हां कहने के चक्कर में जूनियर डॉक्टर कई बार बड़े डॉक्साब के पैरों तले आते-आते रह जाते या किसी गड्ढे में पैर दे डालते।
क्यो भई, आपको क्या लगता है। क्या केस है ये?
सर मुझे तो वह...सर जैसा आप कहें।
यह अपेंडिसाइटिस तो नहीं लगता।
हां सर, यह अपेंडिसाइटिस तो नहीं है।
वैसे राइट आइलियक फोसा में दर्द और टेंडरनेस होने के कारण अपेंडिसाइटिस भी हो सकता है।
हां सर, यह अपेंडिसाइटिस भी हो सकता है।
पर यह अपेंडिसाइटिस नहीं है।
हां सर, यह केस अपेंडिसाइटिस तो नहीं है।
यह केस किसने रेफर किया था
डॉक्टर द्विवेदी ने
द्विवेदी गधा है
जी सर
यह केस अमीबिक लिवर तथा अमीबिक कोलायटिस क्यों नही है
हां सर, लगता तो वही है
तुम क्या कहते हो
जी आप जैसा कहे
यार है तो यह अपेंडिसाइटिस ही है अमीबिक लीवर तो बिलकुल नहीं
हां सर लिवर तो बढ़ा है ही नहीं
उसे पक्का अपेंडिसाइटिस ही है
उसका ब्लड काउंट भी बहुत है
जी हां, ब्लड काउंट भी बहुत था
वैसे रिपोर्ट गलत भी हो सकती है।
जी सर आजकल रिपोर्ट बहुत गड़बड़ आ रही है
फिर भी य.ह तो तय नहीं कि अपेंडिसाइटिस ही है
जी हां, ये कैसे कह सकते हैं
यस सर यह अमीबिक ही लगता है
तय रहा कि यह डॉक्टर अगले चुनाव में पार्टी का ऑपरेशन करके मानेगा। आप वोट देने जाइएगा, युवा शक्ति इस नए डॉक्टर की तरफ आशा भरी निगाहो से देख रहा है, ऐसा कई जूनियर डॉक्टर मान रहे है।
मरीज़ों ने विजय चौक और राजपथ पर लाठियां खाते हुए जब जनपथ की ओर ताका था तो यह युवा नेता पता नहीं कही छुट्टियां मना रहा था। राजनीति में छुट्टियां मनाना बहुत जरूरी है। लेकिन ध्यान रखना पड़ता है कि छुट्टियां ज्यादा लंबी न हो जाए, वरना जनता छुट्टी कर देती है।
और कल तक अगर कुछ और थे तो किसी कांग्रेसी महासचिव की तुलना में उनका वज़न इतना ज्यादा क्यों था। और अगर कल उनका वजन, उनका क़द पहले ही ज्यादा था, तो नंबर दो घोषित करने की वजह क्या है।
जनाब जयराम रमेश ने चिंतन शिविर में पहले ही चिंता व्यक्त कर दी है कि कांग्रेस अपने बूते सत्ता में नहीं आ पाएगी। यह बात तो राजनीति, पत्रकारिता और सामान्य नर-नारियों को पहले से पता है, रमेश बाबू कुछ तो नया कहिए।
अगला चुनाव कहा जा रहा है कि राहुल गांधी की अगुआई में लड़ा जाए। तो बिहार, यूपी, पंजाब वगैरह के पिछले चुनाव आपने किसकी अगुआई में लड़े थे।
फिर भी, चिंतन शिविर में हुई बातचीत और राहुल बाबा के नाम को आगे करने, उसके समर्थन करने के इस किस्से पर मुझे एक वाकया याद आ रहा है। एक डॉक्टर और उसके जूनियर इंटर्नों के बीच की बात-चीत है। खालिस किस्सा है, कहीं पढ़ा था। इसका किसी राजनीतिज्ञ से कोई लेना-देना नहीं।
"सड़क पर डॉक्टर साहब अपने जूनियर डॉक्टरों से घिरे आ रहे हैं। वे कुछ कह रहे थे और बाकी के लोग आगे आ-आकर उनकी हां में हां मिला रहे थे। आगे आकर दूसरे से पहले हां कहने के चक्कर में जूनियर डॉक्टर कई बार बड़े डॉक्साब के पैरों तले आते-आते रह जाते या किसी गड्ढे में पैर दे डालते।
क्यो भई, आपको क्या लगता है। क्या केस है ये?
सर मुझे तो वह...सर जैसा आप कहें।
यह अपेंडिसाइटिस तो नहीं लगता।
हां सर, यह अपेंडिसाइटिस तो नहीं है।
वैसे राइट आइलियक फोसा में दर्द और टेंडरनेस होने के कारण अपेंडिसाइटिस भी हो सकता है।
हां सर, यह अपेंडिसाइटिस भी हो सकता है।
पर यह अपेंडिसाइटिस नहीं है।
हां सर, यह केस अपेंडिसाइटिस तो नहीं है।
यह केस किसने रेफर किया था
डॉक्टर द्विवेदी ने
द्विवेदी गधा है
जी सर
यह केस अमीबिक लिवर तथा अमीबिक कोलायटिस क्यों नही है
हां सर, लगता तो वही है
तुम क्या कहते हो
जी आप जैसा कहे
यार है तो यह अपेंडिसाइटिस ही है अमीबिक लीवर तो बिलकुल नहीं
हां सर लिवर तो बढ़ा है ही नहीं
उसे पक्का अपेंडिसाइटिस ही है
उसका ब्लड काउंट भी बहुत है
जी हां, ब्लड काउंट भी बहुत था
वैसे रिपोर्ट गलत भी हो सकती है।
जी सर आजकल रिपोर्ट बहुत गड़बड़ आ रही है
फिर भी य.ह तो तय नहीं कि अपेंडिसाइटिस ही है
जी हां, ये कैसे कह सकते हैं
यस सर यह अमीबिक ही लगता है
तय रहा कि यह डॉक्टर अगले चुनाव में पार्टी का ऑपरेशन करके मानेगा। आप वोट देने जाइएगा, युवा शक्ति इस नए डॉक्टर की तरफ आशा भरी निगाहो से देख रहा है, ऐसा कई जूनियर डॉक्टर मान रहे है।
मरीज़ों ने विजय चौक और राजपथ पर लाठियां खाते हुए जब जनपथ की ओर ताका था तो यह युवा नेता पता नहीं कही छुट्टियां मना रहा था। राजनीति में छुट्टियां मनाना बहुत जरूरी है। लेकिन ध्यान रखना पड़ता है कि छुट्टियां ज्यादा लंबी न हो जाए, वरना जनता छुट्टी कर देती है।
Thursday, December 27, 2012
ले बलैया...इ साल भी गया!
ससुरा इहौ साल बीत गया। हम मान कर चल रहे हैं कि बीत गया। सब निगोड़े रोते रहे। वही महंगाई, वहीं मुद्रास्फीति, वही 32 लाख रूपये का गुसलखाना...सॉरी मूत्रालय...वही मैंगो पीपल, जो 32 रुपये में शहर में रह लें, 26 रूपये में गांव में बसर कर लें।
समस्या कहां है?
समस्या तब आती है जब देवी महात्म्य का पाठ करने वाले देश में फोटो को फेवीकोल से चिपकाय लिया जाता है। जब सप्तशती का पाठ करने वाले देश में छह लोग एक छात्रा के साथ रेप करते हैं।
समस्या अब भी नहीं है। आम आदमी अब एक क्लीवलिंग न होकर (संस्कृत वाला क्लीव लिंग जिसे अंग्रेजी में न्यूट्रल जेंडर कहते हैं) एक पार्टी बन गई है। ये नहीं पता कि इस संगठन में कितने मैंगो पीपल हैं।
यह साल हमेशा याद रहेगा। इस साल के बारे में एक ज्योतिषी ने मुझसे कहा कि तुम विश्वप्रसिद्ध हो जाओगे। हम नहीं भए। हां, उस ज्योतिषी को हमने बहुत ठोंका।
इस साल भी हम उसी तरह गरीब रहे, जितने 2010 में थे। इस साल भी हम पर कर्ज उतना ही रहा, जितना पिछले साल के आखिर में था। इस साल भी हमारे सपनों की मेढ़ उतनी ही कच्ची रही, जितनी पिछले बरस रही थी।
इस साल सपने देखने की आदत छुड़ा दी, तो सपनों के बीज भी रोप दिए।
यह साल भी ऐसा ही रहा। उसी तरह बेसिरपैर की फिल्में, उसी तरह रोज रोज की नौकरी, उसी तरह मॉनसून कमजोर होना, उसी तरह मंदी, उसी तरह ओबामा, उसी तरह ईरान, इराक़, मिस्र (सुना था मिस्र में तहरीर चौक पर कुछ हुआ...अब हंसी आती है उस पर। हमारे यहां एक बात कही जाती है, फॉर ऐनी रिवॉल्यूशन यू नीड टू हैव अ रिवॉल्यूशनरी आईडियोलजी एंड अ रिवॉल्यूशनरी पार्टी, किसी भी क्रांति के लिए एक क्रांतिकारी पार्टी और क्रांतिकारी विचारधारा की जरूरत होती है)
ये दोनों रामलीला मैदान के कारपोरेट आंदोलन और दिल्ली गैंप रेप में नदारद रहे।
सरकार से बलात्कारियों को तुरंत फांसी पर लटकाने की बेसिर-पैर की मांगे की गईँ। पहली मांग सुषमा स्वराज ने की, जो खुद वकील रह चुकी हैं। उन्हें भी पता होगा कि धारा 376-जी में अधिकतम सज़ा उम्र क़ैद हो सकती है।
खैर...। अगले मंगलवार को, जब नए साल का आग़ाज़ होगा तो यक़ीन मानिए कुछ नहीं बदलेगा। चौराहे पर वही कड़े दिखने वाले घूसखोर पुलिस अधिकारी मिलेंगे, अस्पताल में वही चिड़चिड़े से डॉक्टर मिलेंगे, दफ्तर में वही राजनीति पर उतारू मुंह पर मीठा बोलने वाले सुगरकोटेड लोग मिलेंगे, वही बॉस मिलेगा, जिसको हमेशा आपकी क्षमता पर संदेह होगा....सब्जी भाजी वाले उसी तरह हर रोज आलू प्याज दाम बढ़ाकर बेचते नजर आएंगे।
संसद में अगले साल भी सांसदो का वेतन वृद्धि वाला विधेयक सर्वसम्मति से पारित होगा। अगले साल भी मुलायम पिछड़ो और मुसलमानों को गोलबंद करते दिखेंगे, मायावती दलित कार्ड खेलेंगी, अगले साल मोदी अपने किले की नींव मजबूत करते दिखेंगे, ताकि उसी किले के बुर्ज से 15 अगस्त 2014 को राष्ट््र को संबोधित कर सकें।
नक्सल समस्या जस की तस बनी रहेगी, पाक से हम क्रिकेट खेल लें, दोस्ती दुश्मनी की सरहद बनी रहेगी, हमारे पीएम भी ओबामा की फोटो देखकर ही मुस्कुराएंगे, वरना साल भर उनकी मुस्कुराहट भी ईद का चांद बनी रहेगी....
दंतेवाड़ा, सांरडा में फिर कुछ पुलिस कर्मी शहीद होंगे, फिर उन्हें कुछ सम्मान दिया जाएगा। यानी अगले दिसंबर की इन्हीं आखिरी तारीखों में यही-यही सब लिखना होगा, जो हम इस साल लिख चुके हैं। हां, कुछ आंकड़ों में फेरबदल हो सकता है, कुछ तारीखों में बदलाव होगा।
लेकिन हम बदलेगे नहीं, क्या आपको लगता है कि गैंप रेप से जुड़े मसलों पर फांसी दे देने से भी बाकी के छुपे अपराधियों की मानसिकता बदल जाएगी? जनाब, हम लोग बदलने वाली क़ौम नहीं हैं।
हम कष्ट सहते रहेंगे, बिना हैंड पंप के रह लेगें, हमारे गांव में भले ही चलने को सड़क न हो...लेकिन हम वोट तो अपनी ही जाति में देंगे।
साल 2012 और 2013 में कुछ खास अंतर नहीं होगा, सिवाय अंकों के...और हां, मैं सुनो मृगांका के कुछ और सिसकते पन्ने इस बेव की वर्चुअल दुनिया में डाल चुका होऊंगा।
समस्या कहां है?
समस्या तब आती है जब देवी महात्म्य का पाठ करने वाले देश में फोटो को फेवीकोल से चिपकाय लिया जाता है। जब सप्तशती का पाठ करने वाले देश में छह लोग एक छात्रा के साथ रेप करते हैं।
समस्या अब भी नहीं है। आम आदमी अब एक क्लीवलिंग न होकर (संस्कृत वाला क्लीव लिंग जिसे अंग्रेजी में न्यूट्रल जेंडर कहते हैं) एक पार्टी बन गई है। ये नहीं पता कि इस संगठन में कितने मैंगो पीपल हैं।
यह साल हमेशा याद रहेगा। इस साल के बारे में एक ज्योतिषी ने मुझसे कहा कि तुम विश्वप्रसिद्ध हो जाओगे। हम नहीं भए। हां, उस ज्योतिषी को हमने बहुत ठोंका।
इस साल भी हम उसी तरह गरीब रहे, जितने 2010 में थे। इस साल भी हम पर कर्ज उतना ही रहा, जितना पिछले साल के आखिर में था। इस साल भी हमारे सपनों की मेढ़ उतनी ही कच्ची रही, जितनी पिछले बरस रही थी।
इस साल सपने देखने की आदत छुड़ा दी, तो सपनों के बीज भी रोप दिए।
यह साल भी ऐसा ही रहा। उसी तरह बेसिरपैर की फिल्में, उसी तरह रोज रोज की नौकरी, उसी तरह मॉनसून कमजोर होना, उसी तरह मंदी, उसी तरह ओबामा, उसी तरह ईरान, इराक़, मिस्र (सुना था मिस्र में तहरीर चौक पर कुछ हुआ...अब हंसी आती है उस पर। हमारे यहां एक बात कही जाती है, फॉर ऐनी रिवॉल्यूशन यू नीड टू हैव अ रिवॉल्यूशनरी आईडियोलजी एंड अ रिवॉल्यूशनरी पार्टी, किसी भी क्रांति के लिए एक क्रांतिकारी पार्टी और क्रांतिकारी विचारधारा की जरूरत होती है)
ये दोनों रामलीला मैदान के कारपोरेट आंदोलन और दिल्ली गैंप रेप में नदारद रहे।
सरकार से बलात्कारियों को तुरंत फांसी पर लटकाने की बेसिर-पैर की मांगे की गईँ। पहली मांग सुषमा स्वराज ने की, जो खुद वकील रह चुकी हैं। उन्हें भी पता होगा कि धारा 376-जी में अधिकतम सज़ा उम्र क़ैद हो सकती है।
खैर...। अगले मंगलवार को, जब नए साल का आग़ाज़ होगा तो यक़ीन मानिए कुछ नहीं बदलेगा। चौराहे पर वही कड़े दिखने वाले घूसखोर पुलिस अधिकारी मिलेंगे, अस्पताल में वही चिड़चिड़े से डॉक्टर मिलेंगे, दफ्तर में वही राजनीति पर उतारू मुंह पर मीठा बोलने वाले सुगरकोटेड लोग मिलेंगे, वही बॉस मिलेगा, जिसको हमेशा आपकी क्षमता पर संदेह होगा....सब्जी भाजी वाले उसी तरह हर रोज आलू प्याज दाम बढ़ाकर बेचते नजर आएंगे।
संसद में अगले साल भी सांसदो का वेतन वृद्धि वाला विधेयक सर्वसम्मति से पारित होगा। अगले साल भी मुलायम पिछड़ो और मुसलमानों को गोलबंद करते दिखेंगे, मायावती दलित कार्ड खेलेंगी, अगले साल मोदी अपने किले की नींव मजबूत करते दिखेंगे, ताकि उसी किले के बुर्ज से 15 अगस्त 2014 को राष्ट््र को संबोधित कर सकें।
नक्सल समस्या जस की तस बनी रहेगी, पाक से हम क्रिकेट खेल लें, दोस्ती दुश्मनी की सरहद बनी रहेगी, हमारे पीएम भी ओबामा की फोटो देखकर ही मुस्कुराएंगे, वरना साल भर उनकी मुस्कुराहट भी ईद का चांद बनी रहेगी....
दंतेवाड़ा, सांरडा में फिर कुछ पुलिस कर्मी शहीद होंगे, फिर उन्हें कुछ सम्मान दिया जाएगा। यानी अगले दिसंबर की इन्हीं आखिरी तारीखों में यही-यही सब लिखना होगा, जो हम इस साल लिख चुके हैं। हां, कुछ आंकड़ों में फेरबदल हो सकता है, कुछ तारीखों में बदलाव होगा।
लेकिन हम बदलेगे नहीं, क्या आपको लगता है कि गैंप रेप से जुड़े मसलों पर फांसी दे देने से भी बाकी के छुपे अपराधियों की मानसिकता बदल जाएगी? जनाब, हम लोग बदलने वाली क़ौम नहीं हैं।
हम कष्ट सहते रहेंगे, बिना हैंड पंप के रह लेगें, हमारे गांव में भले ही चलने को सड़क न हो...लेकिन हम वोट तो अपनी ही जाति में देंगे।
साल 2012 और 2013 में कुछ खास अंतर नहीं होगा, सिवाय अंकों के...और हां, मैं सुनो मृगांका के कुछ और सिसकते पन्ने इस बेव की वर्चुअल दुनिया में डाल चुका होऊंगा।
Wednesday, December 12, 2012
...और क़यामत नहीं आई
क़यामत भी नेताओ और माशूकाओं
की तरह धोखेबाज़ है। आते, आते नहीं आती है। वायदा करती है और नहीं आती है। कई साल
से टीवी वाले चीख रहे थे, 12 दिसम्बर 2012 को क़यामत आएगी। हम भी बड़ी शिद्दत से
क़यामत का इंतज़ार कर रहे थे। हम बहुत नजदीक से देखना चाहते थे कि क़यामत आखिर
होती कैसी है। सुना था क़यामत के रोज़ क़ब्र से मुरदे उठ खड़े होंगे और सबके
पाप-पुण्य का हिसाब-किताब होना है।
हम डरे हुए थे, बड़ा एंडवेंचरस से विचार आ रहे थे। काहे कि हम
पापियों की श्रेणी में गिने जाते हैं।
फिर मन में बड़े गहन विचार उत्पन्न हुए आखिर क़यामत है क्या..।
लोगों ने समझाया कि इस के बाद धरती पर सारे लोग खत्म हो जाएंगे। धरती लोगों के
रहने लायक नहीं रह जाएगी। एक सवाल अपने आप सेः धरती अभी लोगों के रहने लायक है क्या?
कुछ लोग अपनी महबूबा को क़यामत सरीखा मानते हैं, कुछ अपनी
पत्नी को कहते तो शरीक-ए-हयात हैं लेकिन मानते क़यामत ही हैं। पहले पत्नियों वाली
बात। बीवी को क़यामत ने मानने वालों के लिए, श्रीमतीजी का जन्मदिन, उनके भाई का
जन्मदिन, अपनी शादी की सालगिरह की तारीख़ भूलकर देखिए (यद्यपि हमारा विचार है कि
यह तारीख़ भूलने योग्य ही हुआ करती है।) आपके लिए वही तारीख़ क़यामत सरीखी हो
जाएगी। उस दिन कायदे से क़यामत बरपा होगा आप पर।
आपकी महबूबा ने फोन पर आपसे कहा, फलां दिन मिलते हैं। किस जगह,
किस वक़्त, ये बाद में बताने का वायदा। फिर आप तैयार होना शुरु करते हैं...सिगडी़
पर दिल सेंकते हुए, तेरा रास्ता देख रहा हूं, गुनगुनाते हुए...आपकी क़यामत सरीखी
महबूबा, जिनकी आंखों, भौंहों, पलकों, अलकों (बाल की लटों) बालों, गालों, गाल पर के
तिल, होठों, मुस्कुराहट, गरदन, ठोड़ी, कलाइयों, कलाई के ऊपर के एक और तिल, कमर
सबको एक-एककर क़यामत बता चुके हैं।
सोमवार को आपने उनके चलने को क़यामत कहा था। मंगलवार को उनकी
मुस्कुराहट से क़यामत आई थी। गुरुवार को उऩकी आवाज़ क़यामत सरीखी थी। शुक्रवार को
वो क़यामत का पूरा पैकेज लग रही थी। मतलब सर से पैर तक क़यामत ही क़यामत। बहरहाल,
आपने तय किया था कि इसी क़यामत से मिलकर क़यामत की घटना को सत्य ही घटित
करना...लेकिन असली क़यामत की बारी तो अब आती है।
आप टापते रह जाते हैं। आपके जिगर पर छुरी चल जाती है। लड़को का
जिगर प्रायः छुरियों के नीचे ही पड़ा रहता है। आपकी उनने कुछ किया या न किया, आपकी
तरफ देखा, नहीं देखा, आपसे समय पूछा, हंसी, नहीं हंसी, आज उनने जीन्स पहनी है, आज
उनने सलवार सूट पहना है, आज उन्होंने आपकी तरफ देखा, आज उनने आपकी तरफ देखकर थूका
नहीं...आपको वह क़यामत लगेगी। आपके दिल पर छुरियां चल जाएगी।
बहरहाल, ये तो बहुत निजी क़िस्म की क़यामतें हैं। जहां
प्रेमिकाएं अपने प्रेमी से फायरब्रिगेड मंगवाने की इल्तिजा करती हों, जहां प्रेमी
को प्रेमिका का प्यार हुक्काबार लगे, या तस्वीर को फेविकोल से चिपका लिया जाए वहां
बाकी की क़यामतों पर क्या नज़र जाएगी।
पिछले दिनों राज्यसभा में रिटेल में एफडीआई पर बहस के दौरान
क़यामत आती-सी लगी। आई नहीं, ये बात और है। विपक्ष सरकार पर टूट पड़ा, रिटेल में
एफडीआई आ गया तो हुजूरेआलिया क़यामत आ जाएगी। सरकार की तरफ से मंत्रियों ने कहा,
अगर एफडीआई नहीं आय़ा तो क़यामत होगी।
दीपेन्द्र हुडा ने सुषमा को कहा आंटी जी हम हरियाणा में 24 इंच
का आलू उगाएंगे, यह भी कम क़यामत न था। इन सबपर भारी था मनमोहन सिंह करीब डेढ़
सेकेन्ड तक मुस्कुराते रह गए थे। सामने अमेरिका का कोई राष्ट्रपति नहीं था, फिर भी
मुस्कुरा रहे थे। प्रधानमंत्री की मुस्कुराहट आधा या पौन सेकेन्ड और जारी रहती तो
अल्लाहक़सम क़यामत उसी रोज़ आ जाती...।
क़यामत भी नेताओ और माशूकाओँ की तरह धोखेबाज़ है। आते, आते
नहीं आती है। वायदा करती है और नहीं आती है। हमको लगा अब न्याय होगा। लेकिन
क़यामती न्याय की झलक नहीं दिखती। क़यामती पत्रकारिता करने वाले, स्वर्ग की सीढी
खोजकर दुनिया को सीधे स्वर्ग स्थानांतरित करने वाले महान् पत्रकारों की जमात किसी
और सीढ़ी की तलाश कर रही है।
खैर...लोग कहते हैं क़यामत नहीं आई। लेकिन, महंगाई के दौर में,
रसोई गैस से लेकर पानी तक पहुंच से दूर पहुंचने के दौर में, और उस दौर में जब
क़यामत वायदा करे और न आए...हम बाकायदा ज़िंदा है यह क्या कम क़यामत है?
Monday, December 3, 2012
भोपाल गैस त्रासदीः दो कविताएँ
वह भीड़ नहीं - भेड़ें थी ।
कुछ जमीन पर सोए सांसें गिन रही थीं।
दोस्तों का रोना भी नसीब न था।
चांडाल नृत्य करता शहर,
ऐ दुनिया के लोग;
अपना कब्रगाह या श्मशान यहां बना लो।
अगर कुछ न समझ में न आए तो,
एक गैसयंत्र और यहां बना लो।
मुझे कोई अफसोस नहीं,
हम तो पहले से ही आदी थे इस जहर के,
फर्क सिर्फ इतना था,
कल तक हम चलते थे, आज दौड़ने लगे।
कफ़न तो मिला था,
पर ये क्या पता था?
एक ही कफ़न से दस मुर्दे जलेगें,
जलने से पहले बुझा दिये जायेगें,
और फिर
दफ़ना दिये जाएंगें।
कवि का नामः पता नहीं कर पाए,
[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता, 2 दिसम्बर, 1987]
चलती ट्रेनों में,
जिन्दा लाशों को ढोनेवाला,
ऐ कब्रगाह- भोपाल!
तुम्हारी आवाज कहाँ खो गई?
जगो और बता दो,
इतिहास को।
तुमने हमें चैन से सुलाया है,
हम तुम्हें चैन से न सोने देगें।
रात के अंधेरे में जलने वाले,
ऐ श्मशान भो-पा-ल....
जगो और जला दो,
उस नापाक इरादों को।
जिसने तुम्हें न सोने दिया,
उसे चैन से सुला दो।
[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता, 28 दिसम्बर, 1987]
दोनों कविताएं सौमित्र भाई के सौजन्य से हासिल हुई हैं। भोपाल त्रासदी की बरसी पर मासूमों और निर्दोष जानों को समर्पित....
कुछ जमीन पर सोए सांसें गिन रही थीं।
दोस्तों का रोना भी नसीब न था।
चांडाल नृत्य करता शहर,
ऐ दुनिया के लोग;
अपना कब्रगाह या श्मशान यहां बना लो।
अगर कुछ न समझ में न आए तो,
एक गैसयंत्र और यहां बना लो।
मुझे कोई अफसोस नहीं,
हम तो पहले से ही आदी थे इस जहर के,
फर्क सिर्फ इतना था,
कल तक हम चलते थे, आज दौड़ने लगे।
कफ़न तो मिला था,
पर ये क्या पता था?
एक ही कफ़न से दस मुर्दे जलेगें,
जलने से पहले बुझा दिये जायेगें,
और फिर
दफ़ना दिये जाएंगें।
कवि का नामः पता नहीं कर पाए,
[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता, 2 दिसम्बर, 1987]
चलती ट्रेनों में,
जिन्दा लाशों को ढोनेवाला,
ऐ कब्रगाह- भोपाल!
तुम्हारी आवाज कहाँ खो गई?
जगो और बता दो,
इतिहास को।
तुमने हमें चैन से सुलाया है,
हम तुम्हें चैन से न सोने देगें।
रात के अंधेरे में जलने वाले,
ऐ श्मशान भो-पा-ल....
जगो और जला दो,
उस नापाक इरादों को।
जिसने तुम्हें न सोने दिया,
उसे चैन से सुला दो।
[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता, 28 दिसम्बर, 1987]
दोनों कविताएं सौमित्र भाई के सौजन्य से हासिल हुई हैं। भोपाल त्रासदी की बरसी पर मासूमों और निर्दोष जानों को समर्पित....
Monday, November 26, 2012
हा सचिन! हा हा सचिन
बात तब की है जब हमारी मूंछों के बाल उगे नहीं थे। तब तक सन् 94 नहीं आया था। तब तक सचिन ने सिंगर कप में पहला सैकड़ा नहीं जड़ा था। लेकिन तब भी, वो अपने खेल और अपने अंदाज़ और अपनी प्रतिबद्धता से इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि बूस्ट का विज्ञापन करती और लोकप्रिय क्रिकेट पत्रिका क्रिकेट सम्राट में छपा उनका पोस्टर हमारी पढ़ने की मेजो के सामने आकर चिपक गया था।
पोस्टर बनकर चिपकने वाले सचिन आज कहां चिपक रहा है, कहां खो गया है हमारा सचिन। हमें लग रहा था कि कुछ खराब प्रदर्शनों के बाद सचिन अपनी लय में लौटेंगे। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ़ हमें लगा था कि सचिन शतक न जड़ें, लेकिन अच्छा खेलेंगे। हम 4-0 से हारे।
मैं पराजयों के आंकड़ो में यकीन नहीं करता। लेकिन सचिन का इस तरह पराजयी भाव दिखाना, एक राष्ट्र के रूप में हमें पस्त करता है। हमने महंगाई झेल ली, हम बेरोजगारी झेल गए, हम तस्करी घोटाले सब झेल गए, क्योंकि परदे पर पहले अमिताभ ने हमारे गुस्से को आवाज दी, और फिर इन्ही निराशा-हताशाओं से उबारने के लिए ज्यादा आक्रामक सचिन तेंदुलकर हमें मिला।
वही, तेंदुलकर, जिसने ऑस्ट्रेलिया से लेकर इंगलैंड सबको धुना...पाकिस्तान के सामने, जिसे हम धुर विरोधी मानते आए हैं, हमारी पराजय का सिलसिला खत्म किया...आज घुटने टेक रहा है।
यह मसला सिर्फ एक शख्स के संन्यास का नही। चालीस की उम्र के पास पहुंच रहे व्यक्ति को जिसने राष्ट्र के लिए और अपने लिए भी ढेर सारी इज़्ज़त कमाई हो, उसे संन्यास का फ़ैसला खुद लेने देने की छूट मिलनी चाहिए। लेकिन, क्या सचिन 200 टेस्ट मैच खेलने का रेकॉर्ड कायम करने के लिए रूके हैं।
मैं सचिन को लेकर भावुक हो जाता हूं क्योंकि एक आम हिंदुस्तानी की तरह सचिन हमारे दिलों में बसते हैं। रणजी मैच में कितना अच्छा खेले थे सचिन। अब क्यों छीछालेदर करवा रहे हैं।
हम ये कत्तई नहीं चाहते कि सचिन हर मैच में सैंकड़ा ठोंके। हम चाहते हैं कि अगर लोग उन्हें सम्राट, या गॉड कहते हैं, तो उस पदवी के साथ वो खुद न्याय करें। जिस पिच पर पुजारा खेल सकते हैं, जिसपर गंभीर रूके रहे...इन दोनों क्रिकेटरों का कुल अनुभव सचिन के रणजी अनुभव से ज्यादा नहीं।
अब या तो सचिन ज्यादा सावधानी के चक्कर में पिट रहे हैं, या फिर उम्र उन पर हावी होती जा रही है।
अपने नायक की ऐसी दुर्गति मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही...सचिन, मैं अपने बेटे को अज़हर, मोंगिया, या जडेजा नहीं बनाना चाहता था. मैं उसे धोनी या सहवाग भी नहीं बनाना चाहता था। आप ऐसे विहेब करेगे, तो मैं उसे कैसा बनने को कहूंगा।
याद रखिए सचिन, ईश्वर एक वर्चुअल पद है...और उसे भी एक दिन संन्यास ले लेना चाहिए, वो भी बाइज्ज़त।
पोस्टर बनकर चिपकने वाले सचिन आज कहां चिपक रहा है, कहां खो गया है हमारा सचिन। हमें लग रहा था कि कुछ खराब प्रदर्शनों के बाद सचिन अपनी लय में लौटेंगे। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ़ हमें लगा था कि सचिन शतक न जड़ें, लेकिन अच्छा खेलेंगे। हम 4-0 से हारे।
मैं पराजयों के आंकड़ो में यकीन नहीं करता। लेकिन सचिन का इस तरह पराजयी भाव दिखाना, एक राष्ट्र के रूप में हमें पस्त करता है। हमने महंगाई झेल ली, हम बेरोजगारी झेल गए, हम तस्करी घोटाले सब झेल गए, क्योंकि परदे पर पहले अमिताभ ने हमारे गुस्से को आवाज दी, और फिर इन्ही निराशा-हताशाओं से उबारने के लिए ज्यादा आक्रामक सचिन तेंदुलकर हमें मिला।
वही, तेंदुलकर, जिसने ऑस्ट्रेलिया से लेकर इंगलैंड सबको धुना...पाकिस्तान के सामने, जिसे हम धुर विरोधी मानते आए हैं, हमारी पराजय का सिलसिला खत्म किया...आज घुटने टेक रहा है।
यह मसला सिर्फ एक शख्स के संन्यास का नही। चालीस की उम्र के पास पहुंच रहे व्यक्ति को जिसने राष्ट्र के लिए और अपने लिए भी ढेर सारी इज़्ज़त कमाई हो, उसे संन्यास का फ़ैसला खुद लेने देने की छूट मिलनी चाहिए। लेकिन, क्या सचिन 200 टेस्ट मैच खेलने का रेकॉर्ड कायम करने के लिए रूके हैं।
मैं सचिन को लेकर भावुक हो जाता हूं क्योंकि एक आम हिंदुस्तानी की तरह सचिन हमारे दिलों में बसते हैं। रणजी मैच में कितना अच्छा खेले थे सचिन। अब क्यों छीछालेदर करवा रहे हैं।
हम ये कत्तई नहीं चाहते कि सचिन हर मैच में सैंकड़ा ठोंके। हम चाहते हैं कि अगर लोग उन्हें सम्राट, या गॉड कहते हैं, तो उस पदवी के साथ वो खुद न्याय करें। जिस पिच पर पुजारा खेल सकते हैं, जिसपर गंभीर रूके रहे...इन दोनों क्रिकेटरों का कुल अनुभव सचिन के रणजी अनुभव से ज्यादा नहीं।
अब या तो सचिन ज्यादा सावधानी के चक्कर में पिट रहे हैं, या फिर उम्र उन पर हावी होती जा रही है।
अपने नायक की ऐसी दुर्गति मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही...सचिन, मैं अपने बेटे को अज़हर, मोंगिया, या जडेजा नहीं बनाना चाहता था. मैं उसे धोनी या सहवाग भी नहीं बनाना चाहता था। आप ऐसे विहेब करेगे, तो मैं उसे कैसा बनने को कहूंगा।
याद रखिए सचिन, ईश्वर एक वर्चुअल पद है...और उसे भी एक दिन संन्यास ले लेना चाहिए, वो भी बाइज्ज़त।
Thursday, November 15, 2012
बाल ठाकरे पर कविता
बाल ठाकरे के निधन की खबरें आ रही हैं, और बहुत कुछ मन में आ रहा है, वो बाद में सविस्तार लिखूंगा, लेकिन पहले याद आ रही है बाबा नागार्जुन की यह कविताः
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !
कैसे फासिस्टी प्रभुओं की --
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !
कैसे फासिस्टी प्रभुओं की --
गला रहा है दाल ठाकरे !
अबे संभल जा, वो आ पहुंचा बाल ठाकरे !
सबने हां की, कौन ना करे !
छिप जा, मत तू उधर ताक रे !
शिव-सेना की वर्दी डाटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे !
सभी डर गये, बजा रहा है गाल ठाकरे !
गूंज रही सह्यद्रि घाटियां, मचा रहा भूचाल ठाकरे !
मन ही मन कहते राजा जी; जिये भला सौ साल ठाकरे !
चुप है कवि, डरता है शायद, खींच नहीं ले खाल ठाकरे !
कौन नहीं फंसता है, देखें, बिछा चुका है जाल ठाकरे !
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे !
बर्बरता की ढाल ठाकरे !
प्रजातंत्र के काल ठाकरे !
धन-पिशाच के इंगित पाकर ऊंचा करता भाल ठाकरे !
चला पूछने मुसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे
अबे संभल जा, वो आ पहुंचा बाल ठाकरे !
सबने हां की, कौन ना करे !
छिप जा, मत तू उधर ताक रे !
शिव-सेना की वर्दी डाटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे !
सभी डर गये, बजा रहा है गाल ठाकरे !
गूंज रही सह्यद्रि घाटियां, मचा रहा भूचाल ठाकरे !
मन ही मन कहते राजा जी; जिये भला सौ साल ठाकरे !
चुप है कवि, डरता है शायद, खींच नहीं ले खाल ठाकरे !
कौन नहीं फंसता है, देखें, बिछा चुका है जाल ठाकरे !
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे !
बर्बरता की ढाल ठाकरे !
प्रजातंत्र के काल ठाकरे !
धन-पिशाच के इंगित पाकर ऊंचा करता भाल ठाकरे !
चला पूछने मुसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे
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