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Sunday, August 9, 2026

कहानी कश्मीर कीः शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?

कश्मीर की कहानी- भाग एक

आज जब अनुच्छेद 370 को संशोधित किए ठीक 7 साल गुजर गए हैं. कश्मीर को लेकर कुछ बातों का पुनरावलोकन जरूरी है. इसमें से शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू के अद्भुत प्रेम को समझना महत्वपूर्ण है, जिसने कश्मीर के एक गुट के नेता को ऐसे समय में केंद्रीय मंच पर पहुंचा दिया, जब ध्यान पूरी तरह से राष्ट्र निर्माण पर होना चाहिए था।

शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू की निष्ठा से भारत के हितों को चोट

कश्मीर की पहली राजनीतिक पार्टी, ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन 1932 में हुआ था. लेकिन 1939 में यह अधिक तटस्थ 'नेशनल कॉन्फ्रेंस' में बदल गई. शेख अब्दुल्ला इसके संस्थापक-अध्यक्ष बने.

पार्टी अध्यक्ष रहते अब्दुल्ला नेहरू के संपर्क में आए और उनकी बार-बार की मुलाकातों ने उस यारी की नींव रखी जो इतिहास पर अपनी एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ने वाली थी, जो भारत के लिए लगभग घातक साबित हुई.

अब्दुल्ला और नेहरू के बीच एक सहज और त्वरित रिश्ते के पीछे की एक संभावित वजह है कि नेहरू का कश्मीर के साथ संबंध महज राजनैतिक नहीं, बल्कि बेहद निजी भी था, इसके साक्ष्य उन खतों में मिलते हैं जिसमें उन्होंने उस स्थान की यात्रा करने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त की है, जिसे वह अपनी मातृभूमि कहते हैं.

संभव है कि अब्दुल्ला ने सोचा होगा कि सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में उन्हें एक समान विचारों वाला सहयोगी मिल गया है.

1936 में अब्दुल्ला को लिखे नेहरू के पत्र, जिसे 30 जून, 1936 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित किया गया था, में लिखा थाः

आपके लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप मुझे अपनी मातृभूमि पर आमंत्रित करें, क्योंकि वहाँ जाने की इच्छा मेरे भीतर हमेशा मौजूद रहती है. अब मुझे वहां गए 19 साल हो गए हैं और मैं अक्सर वहां लौटने के लिए उत्सुक रहता हूं, लेकिन परिस्थितियाँ मेरे लिए बहुत अलग रही थीं और उसकी वजह से मैं ऐसा नहीं कर पाया... भारत की बड़ी समस्याओं ने मुझे भारत के इस हिस्से से बांधे रखा है. जैसा आप जानते हैं, वे समस्याएँ अंततः कश्मीर को भी प्रभावित करती हैं, क्योंकि कश्मीर का भाग्य शेष भारत के साथ जुड़ा हुआ है. यदि भारत आजाद हुआ तो कश्मीर उस आजादी में शामिल होगा.

नेहरू और शेख अब्दुल्ला के राजनैतिक विचारों में बहुत सी बातें साझा थीं और इसलिए 1937 में लाहौर में उनकी मुलाकात के बाद दोनों का गठजोड़ और अधिक गहरा हो गया.
 
अपनी मनुहार की शक्ति का इस्तेमाल करके नेहरू ने अब्दुल्ला को उत्तर-पश्चिम सरहद की यात्रा पर अपने साथ चलने के लिए मना लिया. नेहरू की कश्मीर की बाद की यात्राओं से अब्दुल्ला की लोकप्रियता में उनका विश्वास मजबूत होता गया.

मई-जून 1940 में, नेहरू ने खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ कश्मीर का दौरा किया, जो दो दशकों से अधिक समय में अपनी मातृभूमि की उनकी पहली यात्रा थी.

1945 में कश्मीर के एक अन्य दौरे में, नेहरू का स्वागत नावों के विहंगम जुलूस के साथ किया गया. इस दौरे में, नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में भाषण देते हुए नेहरू ने अब्दुल्ला के नेतृत्व पर भी मुहर लगा दी.

उनके शब्दों में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में स्वतंत्र कश्मीर की उम्मीदों का प्रतिबिंब झलक रहा थाः

‘इसके (नेशनल कॉन्फ्रेंस) दरवाजे हर कश्मीरी के लिए खुले हैं... कश्मीर बहुत खूबसूरत जगह है और जो लोग यहाँ रहते हैं वे बड़े किस्मत वाले हैं. लेकिन असली खुशकिस्मती उसी दिन आएगी, जब लोगों के पास आजादी होगी... मुझे उम्मीद है कि शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के दूरदर्शी नेतृत्व में, यह अपना मकसद हासिल करने में कामयाब होगी.’

शेख अब्दुल्ला के संबंध में नेहरू की दो ग़लतफ़हमियाँ

अब्दुल्ला के साथ अपनी शुरुआती बातचीत के दौरान नेहरू के मन में दो बेहद महत्वपूर्ण गलतफहमियाँ पैदा हुईं जो बाद में भारत के हितों के लिए हानिकारक साबित होने वासी थीं. पहली ग़लतफ़हमी थी, पूरे कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की अपार लोकप्रियता में उनका अटूट विश्वास था.

जम्मू और कश्मीर क्षेत्र में कश्मीर घाटी, जम्मू क्षेत्र और लद्दाख क्षेत्र शामिल थे. अब्दुल्ला का प्रभाव सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बीच सीमित था और क्षेत्र की अन्य मुस्लिम जातियों और जम्मू और लद्दाख के अन्य समुदायों के बीच उनकी अपील नगण्य थी या कोई अपील थी ही नहीं.

1945 तक, नेहरू अब्दुल्ला के प्रति इतने आसक्त हो गए थे कि उन्होंने पार्टी के कैडर के खिलाफ धार्मिक असहिष्णुता के सभी आरोपों को खारिज कर दिया.

असल में, नेहरू ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के निर्णयों को प्रभावित करने या देश से अलग होने के जोखिम के मद्देनजर हिंदुओं से इसमें शामिल होने का आग्रह किया.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को कहीं अधिक सख्त सलाह दी. नेहरू की सलाह थी: 'यदि गैर-मुस्लिम कश्मीर में रहना चाहते हैं, तो उन्हें नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल हो जाना चाहिए या देश को अलविदा कह देना चाहिए.'

अपने उसी दौरे में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं की एक सभा को संबोधित किया और यही सलाह दोहराईः


‘मैं सलाह दूंगा कि अधिक संख्या में इसमें (नेशनल कॉन्फ्रेंस) शामिल होइए और इसके फैसलों पर प्रभाव डालिए। उन्हें निष्क्रिय दर्शक और आलोचक ही नहीं बने रहना चाहिए. यह स्पष्ट है, और यहां तक कि एक बच्चे को भी पता होना चाहिए, कि यदि आप देश की जनता के साथ नहीं खड़े होंगे तो महाराजा और अंग्रेज आपको हमेशा गुलाम बनाकर रखेंगे.’

असल में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को यह याद दिलाते हुए एक कड़ी चेतावनी दी थीः ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस एक असली राष्ट्रीय संगठन है और भले ही एक हिंदू इसका सदस्य ने बने, तो भी यह ऐसा ही रहेगा. अगर पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, यदि पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, तो कोई भी सुरक्षा उपाय और महत्व उनकी रक्षा नहीं करेगा.’

कांग्रेस पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता की ओर से दी गई नेहरू की सलाह का कश्मीरी हिंदुओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जो अपने साथ पिछले पलायन की पीढ़ीगत स्मृति लेकर आए थे.

अब्दुल्ला को लेकर नेहरू के मन में दूसरी गलतफहमी, जो घटनाओं की एक श्रृंखला से शुरू हुई थी, और जिसका अंत इसमें शामिल सभी लोगों के लिए त्रासद रूप से हुआ था, 1946 में अब्दुल्ला द्वारा शुरू की गई कश्मीर छोड़ो (क्विट कश्मीर) आंदोलन था. (तस्वीर देखिए, 30 मई, 1946 में हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में शेख अब्दुल्ला के 'पूर्ण उत्तरदायी सरकार' को छोड़कर 'कश्मीर छोड़ो' शुरू करने का दस्तावेजीकरण किया गया था.)

यह आंदोलन महाराजा हरिसिंह के अधीन ‘पूर्ण उत्तरदायी सरकार’ के लिए पूरे समर्थन से वादाखिलाफी था. इस आंदोलन के दौरान नेहरू द्वारा अब्दुल्ला को सक्रिय समर्थन दिया गया था और इसने महाराजा के साथ उनके रिश्तों में खटास लानी शुरू कर दी और इससे इन घटनाओं के लिए मंच तैयार हो गया जो 1947 में देखने को मिलने वाली थीं.

शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और नेहरू की हिरासत-

जब कश्मीर छोड़ो आंदोलन ने गति पकड़ ली, तो हरि सिंह ने 20 मई, 1946 को शेख अब्दुल्ला को दिल्ली के रास्ते में गिरफ्तार कर लिया. अब्दुल्ला नेहरू के अनुरोध पर उनसे मिलने दिल्ली जा रहे थे.

कुछ ही दिनों बाद, 26 मई को एक सार्वजनिक संबोधन में इस गिरफ्तारी की नेहरू ने तीखी आलोचना की थी.
इस भाषण में, नेहरू ने न केवल राज्य प्रशासन को फटकार लगाई, बल्कि इसकी तुलना कुख्यात जलियांवाला बाग नरसंहार के साथ कर दी. (चित्र देखिए जिसमें दो क्लिप हैं.)
 


उन्होंने प्रशासन पर असहमतियों को दबाने का आरोप लगाया और यह दावा करके भावनात्मक लहर पैदा की कि ऑल-इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने संवैधानिक प्रमुख के रूप में शासक के अधीन एक सरकार का समर्थन किया—जो अब्दुल्ला के 'कश्मीर छोड़ो' का विरोधाभास है—और श्रीनगर को उन्होंने 'मुर्दों का शहर' बताया.
नेहरू ने अपने संबोधन में अब्दुल्ला के प्रति अटूट समर्थन व्यक्त किया और उन्हें पूरे कश्मीर में बेहद लोकप्रिय नेता बताया.

बहरहाल, एक महीने के भीतर ही, नेहरू को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि 26 मई के उनके संबोधन में किए गए दावे झूठे थे हालांकि, इस समय तक पर्याप्त नुक्सान हो चुका था. (चित्र देखिए ) 




#कश्मीरकीकहानी #Jammuandkashmir #ManjitThakur 

FAQ
1. शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?
2. कश्मीर भारत में विलय क्यों नहीं चाहता था?
3. कश्मीर के भारत में विलय पर पंडित नेहरू की क्या राय थी?

Wednesday, March 6, 2019

कश्मीर में भिखारी क्यों नहीं होते?

8 जुलाई, 2016 को जब कश्मीरी आतंकवादियों के पोस्टर बॉय बुरहान वानी को सुरक्षा बलों ने एक मुठभेड़ में मार गिराया था. उस वक्त मैं श्रीनगर में था और हफ्ते भर पहले अमरनाथ यात्रा शुरू हुई थी. मैंने अमरनाथ गुफा तक की यात्रा बालटाल और पहलगाम दोनों रास्तों से की थी और तब घाटी के विभिन्न इलाकों में रिपोर्टिंग के वास्ते घूमा भी था.

उस साल ईद 6 या 7 तारीख की हुई थी और मैं कश्मीरी सिवइयों का स्वाद लेने डल झील के पास के बाजार में घूम रहा था और वहीं एक भिखारी कुछ मांगने आ गया. कश्मीरी पंडित मूल की एक साथी पत्रकार ने तब मुझे बताया था कि कश्मीरी लोग भीख नहीं मांगते और बाहरी (खासकर बिहारी लोग) आकर कश्मीर की समृद्ध फिजां में भीख मांगने की रवायत शुरू कर रहे हैं.

वैसे, मैंने कश्मीर घाटी में कहीं मकान झोंपड़ानुमा नहीं देखे. हर जगह मकान बढ़िया बने थे. जबकि इसकी तुलना में उत्तर भारतीय राज्यों का लैंडस्केप ज्यादा टेढ़ा-मेढ़ा है, गुरबत और धूल-धक्कड़ से भरा है.

तब से यह सवाल मेरे जेहन में लगातार घूम रहा था कि क्या वाकई कश्मीरी लोग भीख नहीं मांगते? और अगर उस पत्रकार की बात सच थी तो क्यों नहीं मांगते?

जबकि, सरकारी आंकड़े कश्मीर की आर्थिक स्थिति का कुछ और ही खुलासा दे रहे हैं. आंकड़े बता रहे हैं कि कश्मीर में 2014 के बाद से आतंकवाद में इजाफा हुआ है. सिर्फ 2018 की बात करें तो कश्मीर घाटी में 614 आतंकी घटनाएं हुईं हैं. जबकि 2014 में 222 हुई थीं. 2018 में 257 आतंकवादी मारे गए हैं और 2014 में 110 आतंकवादी ढेर किए गए थे.

इसीतरह पाकिस्तान ने भी घाटी में अपनी गतिविधियां तेज की हैं. 2016 से 2018 के बीच 398 आतंकियों ने कश्मीर में घुसपैठ की. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर के मुताबिक, 686 आतंकवादी मारे गए और 56 पकड़ लिए गए.

वैसे, कश्मीर में वहां बेरोजगारी की दर भी बाकी देश के औसत से कहीं अधिक है. पर्यटन के आंकड़े भी गोते लगा रहे हैं. कश्मीर में 18 से 29 साल के आयु वर्ग में बेरोजगारी की दर 24.6 फीसदी है. जबकि बेरोजगारी में यह राष्ट्रीय औसत कोई 13.2 फीसदी है. जुलाई 2016 से जून 2017 के बीच 130 कार्यदिवसों का नुक्सान घाटी में हड़ताल और कर्फ्यू से हुआ था. इसकी अनुमानित लागत करीब 13,261 करोड़ रु. आंकी गई है.


जहां तक आर्थिक वृद्धि की बात है कश्मीर में वित्त वर्ष 2017 में 8.2 फीसदी की विकास दर दर्ज की गई थी. जबकि इसी अवधि के लिए राष्ट्रीय औसत 10.8 फीसदी रहा. कश्मीर का 2019 में राज्य जीडीपी करीबन 25 अरब डॉलर का है और देश के तमाम राज्यों के लिहाज से विकास की सीढ़ी पर कश्मीर 21वें पायदान पर है.

घाटी में पर्यटन भी गोते लगा रहा है. साल 2018 में कश्मीर में 8.5 लाख देशी और विदेशी सैलानी आए थे. 2017 की तुलना में यह 23 फीसदी कम है.

दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर घाटी में आए बाढ़ के बाद राहत और ढांचागत विकास और स्वास्थ्य कल्याण और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 80,000 करोड़ रु. का पैकेज दिया था. फिर भी, इन आंकड़ो से एक बात साफ होती है कि कश्मीर की आर्थिक हालत खराब ही है.

सवाल है कि क्या बेहतर आर्थिक वृद्धि और विकास कश्मीर के नौजवानों में बढ़ते अलगाव को थामने में कामयाब होगा? संकेत हैं कि आर्थिक गतिविधियों के साथ ही खुले मन से बातचीत के रास्ते भी बढ़ाए जाने चाहिए. सवाल यह है कि केंद्र सरकार के पास बातचीत की कोई गुंजाइश बची है?

खराब आर्थिक हालत, बेरोजगारी और पर्यटन जैसे एकमात्र उद्योग के बिखरने के बावजूद कश्मीर में भिखारी क्यों नहीं हैं और बिहार-यूपी-झारखंड-बंगाल के लोग घाटी में जान जोखिम में डालकर भीख क्यों मांगते हैं, इसका उत्तर मिलना बाकी है.

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Saturday, July 16, 2016

अमरनाथ को केदारनाथ बनने मत दीजिए

बाबा बर्फानी यानी बाबा अमरनाथ लाखों हिन्दुओं की श्रद्धा के केन्द्र रहे हैं और भारत में श्रद्धा पर सवाल खड़े करना बेहद खतरनाक है। लेकिन इन दिनों मैं बाबा अमरनाथ की यात्रा को बड़े गौर से देख रहा हूं। 2 जुलाई को
जिस दिन यात्रा की शुरूआत हुई थी, नौ हज़ार यात्री थे, और श्रद्धालुओं की यह संख्या दूसरे ही दिन बढ़कर सोलह हजार हो गई।

जम्मू-कश्मीर के जिस हिस्से में बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा है, उसे पारिस्थितिकी के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील माना जाता है। लोगों की बढ़ती तादाद से उस इलाके में, उस ऊंचाई पर सामान्य तापमान में बढोत्तरी हो जाती है। और बर्फ से बनने वाला शिवलिंग कई दफा पूरा नहीं बन पाता। 

इस इलाके में हरियाली बहुत तेज़ी से कम हो रही है और यात्रा के लिए नए रास्ते बनाए जा रहे हैं। रास्ते में अधबनी सड़कों की वजह से धूल के बगूले उठते हैं। असल में, बाबा अमरनाथ तक जाने के दो रास्ते हैं, एक है पारंपरिक पहलगाम-चंदनबाड़ी होकर जाने का रास्ता। इस रास्ते की लंबाई अधिक है, करीब 38 किलोमीटर का सफ़र तय करना होता है। लेकिन पारंपरिक रास्ता तो यही है। इसी रास्ते पर आतंकवादी हमले का खतरा भी अधिक होता है।

लेकिन दूसरा रास्ता भी बना लिया गया है। हालांकि, लोग बताते हैं कि इस रास्ते का उपयोग 18वीं सदी से होता आय़ा है लेकिन पिछले 15-16 साल में बालटाल होकर जाने वाला रास्ता अधिक लोकप्रिय हुआ है। बालटाल के रास्ते बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा तक जाने में सिर्फ 14 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। सो, फटाफट पुण्य कमाने वालों के लिए यह रास्ता अधिक मुफीद साबित हो रहा है।

बालटाल से हेलिकॉप्टर भी उड़ते हैं। तो अमीर लोगों के लिए बाबा बर्फानी का दर्शन ज्यादा आसानी से उपलब्ध हो गया है। लेकिन यात्रा शुरू होने से पहले मेरी नजर उन कूड़ों पर पड़ ही गई जो पिछले साल के यात्रियों ने यहां छोड़ दिए थे। उनकी सफाई नहीं हो पाई थी।  अब इस साल का कूड़ा उस ढेर को और बड़ा कर देगा और इस कूड़े में प्लास्टिक-पॉलीथीन की थैलियां बहुतायत में हैं।

आखिर पर्यावरण की चिंता किसे है? श्रीनगर से बालटाल जाने के रास्ते में, आपको कंगन के बाद से ही दोनों तरफ ग्लेशियर दिखने लगते हैं। आपको इन ग्लेशियरों को देखकर स्वर्गीय आनंद आएगा और आपको इस बात का इल्म भी नहीं होगा कि सालों भर जमने वाली इस बर्फ की नदी (ग्लेशियर) में से तीन हमेशा के लिए खत्म हो चुके हैं।

बालटाल पहुंचकर हजारों गाड़ियां पार्किंग में लगी दिखती हैं। इनके डीज़ल के जलने से निकला धुआं, और अधजले कार्बन से इस साफ-सुथरी हवा में ज़हर घुल रहा है। कनाते और तंबू लगे हैं। बेस कैंप में 16 सौ तंबू हैं और हर तंबू में औसतन छह बिस्तर हैं। लेकिन पीने के पानी का सिर्फ एक नल। शौचालय के नाम पर सिर्फ एक ढांचा है। जिनमें पांच कमोड हैं। पांच में से एक कमोड टूटा-फूटा है, बाकी इतने गंदे हैं कि शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। ऐसे में यात्री कितना साफ-सुथरा होकर दर्शन के लिए आगे बढ़ेगा, यह कहना मुश्किल है।
यात्रियों में ऐसे लोगों की गिनती ज्यादा लग रही है मुझे जो पुण्य कमाने कम और पिकनिक मनाने आए लगते हैं। बेस कैंप में थोड़ा और आगे बढ़ें तो भारत की महान धार्मिक परंपरा का एक और उदाहरण मिलता हैः लंगर। यात्री, मीडियावाले कोई भी यहां आकर मुफ्त खा सकता है। जी नहीं, रूकिए, अगर आप दूर-दराज से आए ड्राइवर हैं तो आपका प्रवेश निषेध है।

फिर यह भी पता चला कि यह लंगर उन चंदों पर चलाकर पुण्य कमाए जाते हैं, जो पंजाब-हरियाणा के विभिन्न शहरों में पुण्य के अभिलाषी लोगों से जुटाए जाते हैं। तो यह लंगर भी एक तरह से घोटाला ही है। चंदे की रकम में से बाकी किधर जाती है, यह तो बगल में बहती झेलम ही बता पाए।

यह लूट-खसोट तो हर तरफ है, लेकिन बाबा अमरनाथ तक जाकर पुण्य बटोरने से पहले यह ध्यान रख लिया जाता कि उससे इस इलाके के पर्यावरण, नदियों और हिमनदियों को कितना नुकसान हो रहा है, तो अधिक पुण्य के भागीदार होते। हम सब।

मंजीत ठाकुर

Friday, November 20, 2015

लेह में आवारगी पार्ट 2

लेह के जिस सर्किट हाउस में हम ठहरे थे वह सरकारी था और जाहिर है उसमें टीवी था तो लेकिन उसके डीटीएच का पैसा नहीं दिया गया था। यानी टीवी देखना बेकार था।


फोटोः तेजिन्दर सिंह
एक पूरा दिन आराम व दूसरा पूरा दिन वहीं लेह में घूमना सबसे अच्छा तरीका है लेकिन हमारे पास वक्त बेहद कम था, और काम काफी ज्यादा। दूसरे दिन सुबह-सुबह मेरी नींद खुल गई। दिल्ली में जब तक दफ्तर न जाना हो मैं आदतन साढ़े 8 तक सोता रहता हूं और उगता हुआ सूरज कम ही देख पाता हूं। लेकिन यहां तो रात को खिड़की का पर्दा लगाना भूल गया था और 6 बजे बिस्तर पर पड़े-पड़े ही आंखें चौंधिया गईं।

सूर्य की पहली किरण भूरे पहाड़ों के शिखर पर जमी बर्फ पर पड़ रही थी। ऐसा लग रहा था मानो किसी सुनहरी काया पर मलमल का आंचल भर डाल दिया हो। 15 मिनट तक मैं बस सब कुछ भूल कर इस नजारे को देखता ही रह गया। साथ ही खिड़की से बाहर लॉन में आसमान जाने किस नस्ल की चिड़िया गा रही थी।

सुबह को, सर्किट हाउस के केयर टेकर ने हमारे लिए ऑमलेट और ब्रेड का नाश्ता तैयार कर दिया था। उस दिन शायद लेह में बाजार कुछ बंद थे।

फोटोः सौरभ, मैं और तेजिन्दर, ऑमलेट के इंतजार में


इसी से गुज़ारा करना था। हमें लेह के आसपास के हिस्सों में कुछ शूटिंग पूरी करनी थी और इसके लिए हम शांति स्तूप से लेकर न जाने कितने गोम्फाओं के दर्शन कर लिए। सड़क के बाईं तरफ पहाड़, नीचे हरा-भरा लेह, और पूरा शहर...मानो घरौंदों की बस्ती हो।


शांति स्तूप फोटोः सौरभ
फिल्म 3 इडियट्स ने इस जगह को और भी चर्चा में ला दिया है। कैसे इसकी चर्चा तो आगे, लेकिन शहर से पूर्ब सात-आठ किलोमीटर बढ़ते ही एक स्कूल हैः रैंचो स्कूल। जी हैं, आमिर खान का नाम थ्री इडियट्स में रैंचो ही था और अब एक स्कूल है जिसको उनके ही नाम से जाना जाता है।

इस स्कूल तक जाने के लिए आप एक सड़क पकड़ते है, जो सीधे मनाली की तरफ जाती है। शहर से बाहर निकलते ही इस सड़क को कई बारे आड़ी काटती हुई एक पतली सी नहर है, जो शहर के लिए पानी की आपूर्ति का शायद एकमात्र साधन है।


फिर बाई तरफ आप देखते हैं, रेतों के ढूह...पथरीले पहाड़। न जाने कितने मोड़ हैं उसमें। ऐंठन से भरे चट्टान। लगता है किसी ने मचोड़कर-मरोड़कर रख दिया हो। जाहिर कुदरत ने मरोड़ा है। कुदरत से बड़ी ताकत है क्या कोई।

इंसान कितना भी ताकतवर हो ले, आखिरी बोली तो कुदरत की होती है। यह बात, चाहे आप दिल्ली-मुंबई-अहमदाबाद-बंगलुरू में शायद महसूस न कर पाएं लेकिन लेह-लद्दाख जाकर आप इस बात से इतफाक रखेंगे।

रैंचो स्कूल के बगल में ही स्तूप जैसी सफेद आकृतियां बनाई गई है। सैकड़ो की संख्या में। फिल्मों के शौक़ीन हैं तो बंटी और बबली फिल्म का गीत देख लीजिए, जिसमें अभिषेक और रानी इन्ही आकृतियों के बगल में प्रेम भरे गीत गा रहे हैं। फिल्म दिल से में, शाहरुख और मनीषा कोईराला के प्रेम का उद्गार भी इधर ही व्यक्त हुए हैं।

बहरहाल, सूरत तेजी़ से ढल रहा था और हम वहां से फोटो खिचवाकर, क्योंकि शूटिंग हमने निबटी ली थी, शांति स्तूप की तरफ चल पड़े। वह हमारे सर्किट हाउस से ढाई किलोमीटर उत्तर था।

शांति स्तूप तक पहुंचते-पहुंचते थकान हम पर तारी हो चुकी थी। ढलते हुए सूरज का सौन्दर्य..सफेद स्तूप पर। वाह क्या दृश्य था। और जब हम हांफते हुए ऊपर शांति स्तूप तक पहुंचे...दक्षिण में बादलों का साम्राज्य हिममंडित शिखरों को अपने आगोश में ले चुका था।

फिर भी हमने हिस्से के काम निबटाए। शूटिग का। लेकिन उसके साथ अपने फोटो शूट भी तो जरूरी काम हुआ करते हैं। वह भी किया गया।

शाम को 7 बजे तक हमें वापस सर्किट हाउस पहुंचना था, क्योंकि डॉक्टर साहब आकर हमारी जांच करने वाले थे कि क्या हमारा मैदानी इलाके की जलवायु का अभ्यस्त शरीर आगे ऊंचाई पर चढ़ाई के लायक है या नहीं।

मैं डरा हुआ था। काश कि मेडिकल रिपोर्ट मुझे लेह में रूकने को मजबूर न कर दे। जिस हिमालय के बारे में हमने किताबों में पढ़ा था उसको एकदम नजदीक से देखने का मौका मैं गंवाना नहीं चाहता था।