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बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

भारत-कनाडा रिश्तों की नई शुरुआत: क्या व्यापार सुरक्षा विवादों से आगे निकल पाएगा?

भारत और कनाडा अपने रिश्तों को व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग के जरिए नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन क्या आर्थिक हित दोनों देशों के बीच सुरक्षा और कूटनीतिक विवादों की दूरी कम कर पाएंगे? विदेश मंत्री एस. जयशंकर और कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद की मुलाकात के बहाने समझिए भारत-कनाडा संबंधों की चुनौतियां, संभावनाएं और भारत की बहुआयामी विदेश नीति।

भारत और कनाडा के रिश्तों में एक बार फिर संवाद की खिड़की खुलती दिखाई दे रही है. 14 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद की मुलाकात में व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा, शिक्षा और लोगों के बीच संपर्क जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई.

जयशंकर ने इसे दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की कोशिश बताया.

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि दोनों देशों के विदेश मंत्री कितनी बार मिलते हैं या साझा बयान में कितने क्षेत्रों का उल्लेख होता है.

सवाल यह है कि क्या भारत और कनाडा अपने रिश्तों को सुरक्षा विवादों के साये से निकालकर ऐसी साझेदारी में बदल सकते हैं, जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों को वास्तविक लाभ मिले?

इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि कूटनीतिक सद्भावना कितनी जल्दी ठोस नीतियों और परिणामों में बदलती है.

तनाव से सहयोग तक: रिश्तों की पृष्ठभूमि

भारत और कनाडा के संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं. दोनों देशों के बीच लंबे समय से शैक्षणिक, सांस्कृतिक और कारोबारी संपर्क रहे हैं.

कनाडा में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी और भारतीय छात्रों की उपस्थिति इस रिश्ते को सामाजिक आधार देती है. इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा और राजनीतिक विवादों ने आपसी विश्वास को प्रभावित किया.

सितंबर 2023 में कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों की संभावित भूमिका से जुड़े आरोप लगाए थे. भारत ने इन आरोपों को खारिज किया था.

इस विवाद ने राजनयिक संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया और दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ा.

ऐसे माहौल में बातचीत की बहाली महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसे रिश्तों के सामान्य हो जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता. सुरक्षा से जुड़े आरोपों, जांच और संप्रभुता के सवालों पर दोनों देशों की चिंताएं अलग-अलग हैं. आर्थिक सहयोग बढ़ाना इन मतभेदों को अपने आप समाप्त नहीं करेगा.

फिर भी कूटनीति का उद्देश्य केवल मतभेदों को दोहराना नहीं, बल्कि उन्हें संभालने के रास्ते तलाशना भी है. यही भारत-कनाडा संबंधों की मौजूदा चुनौती है.

व्यापार समझौता: रिश्तों को स्थिरता देने का रास्ता

भारत-कनाडा संबंधों को नई दिशा देने में व्यापार सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. कनाडा के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2025 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 10.9 अरब कनाडाई डॉलर रहा.

सेवाओं के क्षेत्र में भी कनाडा का भारत के साथ बड़ा आर्थिक संबंध है, जिसमें शिक्षा के लिए यात्रा और अन्य सेवाओं की उल्लेखनीय भूमिका है.

दोनों देश व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी CEPA (Comprehensive Economic Partnership Agreement) पर बातचीत आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

मार्च 2026 में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा के दौरान वार्ता का औपचारिक ढांचा तय किया गया था. दोनों पक्षों ने वर्ष 2026 के अंत तक बातचीत पूरी करने का लक्ष्य रखा है.

ऐसा समझौता केवल आयात-निर्यात बढ़ाने का माध्यम नहीं होगा. इससे भारतीय कंपनियों को कनाडा के बाजार में बेहतर अवसर मिल सकते हैं, जबकि कनाडाई कंपनियों को भारत की विशाल अर्थव्यवस्था में निवेश का रास्ता मिल सकता है.

लेकिन समझौते की सफलता केवल उसके घोषित लक्ष्य से नहीं मापी जाएगी. बाजार तक पहुंच, शुल्क, सेवाओं के कारोबार, निवेश की सुरक्षा और नियामकीय बाधाओं पर सहमति जरूरी होगी. यदि सुरक्षा विवादों के कारण कारोबारी समुदाय को भविष्य की नीतियों को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, तो व्यापार समझौते की संभावनाएं भी सीमित हो सकती हैं.

ऊर्जा और महत्त्वपूर्ण खनिज: साझा हितों का मजबूत आधार

ऊर्जा सहयोग दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दे सकता है. भारत को अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा के विविध स्रोतों की आवश्यकता है.

दूसरी ओर, कनाडा के पास ऊर्जा संसाधन, यूरेनियम और महत्त्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं हैं.

मार्च 2026 में कनाडा की कंपनी Cameco और भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग के बीच 2.6 अरब कनाडाई डॉलर का दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति समझौता घोषित किया गया था. दोनों देशों ने महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला में सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए.

इस सहयोग का रणनीतिक महत्त्व है. स्वच्छ ऊर्जा, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और आधुनिक विनिर्माण के लिए जरूरी खनिजों की विश्वसनीय आपूर्ति अब आर्थिक विकास के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का भी विषय बन चुकी है.

भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता और कनाडा के लिए बड़ा बाजार—दोनों के हित यहां एक-दूसरे से जुड़ते हैं.

हालांकि, समझौतों की घोषणा और उनका वास्तविक क्रियान्वयन अलग-अलग चीजें हैं. आपूर्ति की समयसीमा, कीमत, निवेश, परिवहन और पर्यावरणीय मानकों पर काम करना होगा. ऊर्जा सहयोग तभी रिश्तों का मजबूत स्तंभ बनेगा, जब उसके परिणाम मापे जा सकें.

रक्षा और सुरक्षा: विश्वास के बिना साझेदारी अधूरी

रक्षा सहयोग का उल्लेख दोनों देशों की बातचीत में हुआ है, लेकिन इस क्षेत्र में प्रगति के लिए विशेष सावधानी जरूरी होगी. सुरक्षा संबंधी विवाद ही वह क्षेत्र है जिसने आपसी भरोसे को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है.

भारत की प्राथमिकता अपनी संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर स्पष्टता की है. कनाडा की ओर से कानून के शासन, जांच की स्वतंत्रता और नागरिकों की सुरक्षा पर जोर दिया जाता है.

दोनों देशों के लिए जरूरी है कि वे इन विषयों पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय प्रमाण, कानूनी प्रक्रियाओं और नियमित संवाद के आधार पर आगे बढ़ें.

इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक सहयोग के लिए सुरक्षा संबंधी चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया जाए. बल्कि स्थायी साझेदारी के लिए दोनों मोर्चों पर काम करना होगा—एक तरफ व्यापार और निवेश को बढ़ाना, दूसरी तरफ विवादों के समाधान के लिए विश्वसनीय संवाद-तंत्र तैयार करना.

शिक्षा और लोगों के संपर्क की भूमिका

भारत-कनाडा रिश्तों का सबसे मजबूत सामाजिक आधार लोगों के बीच संपर्क है. भारतीय छात्र, पेशेवर, उद्यमी और भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक दोनों समाजों को जोड़ते हैं. इसलिए शिक्षा, शोध, कौशल विकास और पेशेवर आवागमन में सहयोग महत्त्वपूर्ण है.

लेकिन इस क्षेत्र में भी केवल पुराने संबंधों के भरोसे नहीं रहा जा सकता. छात्रों के लिए पारदर्शी नियम, वीजा प्रक्रिया में स्पष्टता, संस्थानों के बीच शोध सहयोग और पेशेवर अवसरों की उपलब्धता जरूरी है. नीतियों में अचानक बदलाव से विद्यार्थियों और परिवारों में अनिश्चितता पैदा होती है.

लोगों के बीच संपर्क सरकारों के बीच तनाव को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता, लेकिन वह रिश्तों को व्यापक सामाजिक आधार जरूर देता है.

जब विश्वविद्यालय, कंपनियां और नागरिक नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ काम करते हैं, तो राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सहयोग के लिए प्रोत्साहन बना रहता है.


भारत की बहुआयामी विदेश नीति की परीक्षा

भारत-कनाडा संबंधों में सुधार की कोशिश भारत की व्यापक विदेश नीति के अनुरूप है. भारत पश्चिमी देशों के साथ व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और निवेश बढ़ाना चाहता है, लेकिन साथ ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता भी बनाए रखना चाहता है.

इसका मतलब है कि भारत अलग-अलग देशों के साथ सहयोग को किसी एक रिश्ते की शर्तों तक सीमित नहीं रखना चाहता.

कनाडा के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का प्रयास इसी संतुलन की परीक्षा है. भारत को आर्थिक अवसरों का लाभ उठाना है, लेकिन अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं से समझौता किए बिना.

कनाडा को भी भारत के साथ आर्थिक साझेदारी आगे बढ़ाते हुए द्विपक्षीय मतभेदों के समाधान के लिए व्यावहारिक रास्ते तलाशने होंगे.

निष्कर्ष: मुलाकात नहीं, परिणाम होंगे असली पैमाना

14 अक्टूबर की मुलाकात को भारत-कनाडा संबंधों में संवाद जारी रहने के संकेत के रूप में देखा जा सकता है. लेकिन इसे किसी बड़े विवाद के समाप्त होने या रिश्तों के पूरी तरह सामान्य हो जाने की घोषणा मानना जल्दबाजी होगी.

आने वाले महीनों में तीन कसौटियां निर्णायक होंगी—क्या CEPA वार्ता ठोस प्रगति करती है, क्या ऊर्जा और निवेश से जुड़े समझौते जमीन पर उतरते हैं, और क्या सुरक्षा संबंधी मतभेदों को संभालने के लिए दोनों देशों के बीच भरोसेमंद संवाद कायम होता है?

भारत और कनाडा के रिश्ते तभी नई शुरुआत करेंगे, जब कूटनीतिक मुलाकातें ठोस आर्थिक अवसरों में बदलें और सुरक्षा विवाद सहयोग की राह में स्थायी बाधा न बनें.

व्यापार रिश्तों को आगे बढ़ाने का रास्ता खोल सकता है, लेकिन उस रास्ते पर टिके रहने के लिए विश्वास, पारदर्शिता और निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति अनिवार्य होगी.


FAQ
प्रश्न 1: भारत और कनाडा के रिश्तों में तनाव का मुख्य कारण क्या रहा है?
खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से जुड़े आरोपों और सुरक्षा संबंधी विवादों ने दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित किया। भारत ने कनाडा के आरोपों को खारिज किया था।

प्रश्न 2: भारत-कनाडा व्यापार समझौता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
प्रस्तावित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता व्यापार, निवेश और सेवाओं के क्षेत्र में अवसर बढ़ा सकता है। इसकी सफलता वार्ता के नतीजों और समझौते के वास्तविक क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।

प्रश्न 3: भारत और कनाडा के बीच ऊर्जा सहयोग की क्या संभावनाएं हैं?
यूरेनियम, ऊर्जा संसाधनों और महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति में सहयोग दोनों देशों की आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है।

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शनिवार, 5 नवंबर 2016

चीन की चुनौती से निपटने के लिए नेपाल है जरूरी

अठारह साल बाद भारत के किसी राष्ट्रपति की यह नेपाल यात्रा थी। 2 से 4 नवंबर तक हुई यह यात्रा इस मायने में भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन ने रणनीतिक तौर पर भारत को घेरने के लिए नेपाल की बिला शर्त मदद करनी र उस पर शिकंजा कसने की तैयारियां शुरू कर दी थीं। इसके बाद, भारतीय मूल के लोगों, जिन्हें नेपाल में मधेसी कहा जाता है, उनमें भी एक बेचैनी का आलाम था क्योंकि नेपाल के मौजूदा संविधान में मधेसियों के हितों की अनदेखी की गई थी।

लेकिन राष्ट्रपति की यह यात्रा किसी समझौते या नई परियोजना के लिए नहीं थी। बल्कि, यह तो राजनीतिक और कामकाजी स्तरों पर नेपाल के साथ भारत के सघन संवाद के विस्तार का एक रूप माना जाना चाहिए।

वैसे भी राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के नेपाल के लोगों और वहां के राजनीतिक नेताओं के साथ लंबे समय से संबंध रहे हैं और वह ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने नेपाल में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास में रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री और विदेश मंत्री वगैरह पदो पर रहते हुए भारत की तरफ से अहम भूमिका निभाई है।

बहरहाल, काठमांडू में साल 2104 में हुए सार्क सम्मलेन में द्विपक्षीय बातचीत में भारत और नेपाल ने व्यापार, आर्थिक, कनेक्टिविटी, जनसंपर्क और पर्यटन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कई नए समझौते किए हुए हैं और राष्ट्रपति का यह दौरा उन संधियों और समझौतों को लागू करने, और परियोजनाओं को तेज़ रफ्तार देने की कोशिश है। भारत की कोशिश है कि जिन संधियों पर पहले हस्ताक्षर हुए हैं, उन्हें वाकई लागू किया जाए।

हालांकि, आपको याद होगा नेपाल के नए संविधान के लागू होने बाद भारत की सरहद को मधेसियों ने विरोध-स्वरूप बंद कर दिया था। असल में, नेपाल के इससे पहले के प्रधानमंत्री के पी ओली की झुकाव चीन की तरफ ज्यादा था। लेकिन, सत्ता परिवर्तन में पुष्प कुमार दहल ‘प्रचंड’ के प्रधानमंत्री बनने के बाद से नेपाल की विदेश नीति में यू-टर्न आया है और वहां पहले की तरह पूर्ववत भारत की ओर झुकाव दिख रहा है। बीते दिनों दहल की भारत यात्रा से दोनों देशों में बर्फ गलनी शुरू हुई।

नेपाल के साथ भारत की डिप्लोमेसी नए सिरे से परवान चढ़ने लगी है। नेपाली राजनीति में चीन की तरफ का झुकाव थोड़ा कम हुआ है। चीन के साथ संबंधों के मद्देनजर भारत अब अपने इस पड़ोसी देश को नए रणनीतिक साझीदार के तौर पर विकसित करने में जुट रहा है।

नेपाल में तीन नई रेल लाइन बिछाने, नए सड़क संपर्क विकसित करने के साथ ही सीमा सुरक्षा का साझा मेकेनिज्म विकसित करने और सैन्य सुरक्षा बढ़ाने पर दोनों देश मसविदा तैयार करने में जुटे हैं।

नेपाल ने अपनी ओर से भारत द्वारा फंडिंग की जा रही उन परियोजनाओं की फेहरिस्त सौंपी है, जो नेपाल के अंदरूनी राजनीतिक हालात के चलते ठंडे बस्ते में चले गए थे। वहां के पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली के दौर में नेपाल का झुकाव चीन की तरफ हो गया था। तब चीन ने अपने यहां से काठमांडो तक रेल नेटवर्क बनाने की परियोजना शुरू की थी।

अब ‘भारत-नेपाल संयुक्त आयोग’ की बैठक के मंच से भारत चार महत्त्वपूर्ण योजनाओं पर काम कर रहा है। बड़ी परियोजना रेल नेटवर्क की है। कोलकाता बंदरगाह से नेपाल के औद्योगिक हब बीरगंज के लिए सिंगल लाइन है, जिस पर मालगाड़ी चलती है। उसे विकसित कर पैसेंजर ट्रेन चलाने लायक बनाने का प्रस्ताव है। नई रेल लाइन नेपाल के बिराटनगर तक बिछाई जा रही है, जिसमें भारत की तरफ का काम पूरा हो चुका है। आगे के लिए नेपाल सरकार को अनुमति देना है। तीसरी रेल लाइन परियोजना का प्रस्ताव है- नेपाल के काकरभिट्टा सीमा से लेकर बंगाल के पानीटंकी इलाके तक।

इसके अलाबा नेपाल में 945 किलोमीटर की ईस्ट-वेस्ट रेल लाइन बिछाने की परियोजना का प्रस्ताव है, जिसके लिए राइट्स समेत तमाम भारतीय एजंसियां अपना शुरुआती काम निपटा चुकी हैं। भारत द्वारा प्रस्तावित बीबीआइएन (भूटान-बांग्लादेश-इंडिया-नेपाल) देशों में रेल और सड़क नेटवर्क के विस्तार के लिए नेपाल में इन योजनाओं को जरूरी माना जा रहा है। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, हमारा पूरा ध्यान रेल नेटवर्क की ओर है।

भारत की तरफ से सड़क संपर्क, सीमा-पार संपर्क बढ़ाने, सुरक्षा मामलों, सीमा पर सतर्कता, पेट्रोलियम पाइप लाइन बिछाने और नेपाल में भारतीय फंडिंग वाली 4800 मेगावाट की पनबिजली परियोजना के साथ ही कई ऐसे प्रस्तावों पर बातचीत का एजंडा है, जिसकी नेपाल को बेहद जरूरत है। इस एजंडे में महाकाली संधि को लागू करने का मेकेनिज्म विकसित करने का विषय है, जिसके तहत दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का फार्मूला तैयार किया जाना है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्परूप के अनुसार, ‘राजनयिक स्तर पर कोशिश है कि सभी प्रस्तावों पर तेजी से काम हो।’

सुस्ता और कालापानी इलाके में इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट बनाने और साझा पेट्रोलिंग का प्रस्ताव भारत ने दिया, जिसे मान लिया गया है। इसकी घोषणा खुद राष्ट्रपति ने की।

लेकिन इस मामले में सबसे अहम रहा, नेपाली छात्रों को आईआईटी में पढ़ने की सुविधा की घोषणा और इसकी प्रवेश परीक्षा अब काठमांडू में भी होगी। जाहिर है भारत ने नेपाल को साथ रखने के लिए उसे सौगातों से लाद दिया है। इसमें भूकंप के दौरान ध्वस्त हुए घरों के निर्माण के लिए 6800 करोड़ की मदद भी शामिल है।

लेकिन भारतीय कूटनयिकों के चेहरे पर खुशी तब दिखी, जब पाकिस्तान का नाम लिए बगैर राष्ट्रपति ने अपने भाषण में कहा कि जिन देशों ने अपनी नीति का हिस्सा आतंकवाद को बना लिया हैं उन्हें अलग-थलग किया जाना जरूरी है। नेपाल के साथ खुली सरहद से आंतकवाद आने का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे में नेपाल के उप-प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री समेत तमाम लोगों ने जब कहा कि नेपाल की धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा, तो इसे भारत की कामयाबी माना जाना चाहिए।

वैसे भी, भारतीय बंदरगाहों से आने वाले दूसरे देशों के सामानों समेत भारत के कारोबार को भी जोड़ दें तो नेपाल का 96 फीसद सामान प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत से आता है। ऐसे में नेपाल के लिए भारत अपरिहार्य है और चीन की चुनौती के मद्देनजर नेपाल भारत के लिए।

दोनों साथ चलें, तो दोनो का फायदा है।







सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

मोदी का मास्टर स्ट्रोक है सर्जिकल स्ट्राइक

पाकिस्तानी आतंकी गुटों के खिलाफ एलओसी पार करके सर्जिकल स्ट्राइक भारत ने किया, उस दौरान मैं एक बार फिर से जंगल महल के उन इलाकों में था जहां मलेरिया अब भी जानलेवा है, जहां सड़कें बन कर तैयार हैं तो लोगों को लगा कि विकास हो गया, और जहां करीब साढ़े तीन साल से कोई राजनीतिक हत्या (पढ़ें- नक्सली हिंसा) नहीं हुई है।

पाकिस्तान ने जब उरी में भारतीय सैन्य शिविर पर हमला कर दिया और हमारे 18 (अब 19) जवान शहीद हो गए, तब से हम में से अधिकतर लोगों के ख़ून उबल रहे थे। देश पर युद्धोन्माद-सा छा गया था और टीवी चैनल लग रहा था, सीधे पाकिस्तान पर ही हमला बोल देंगे।

उन्हीं दिनो, साइबर विश्व के नागरिक और खबरों से नजदीकी रखने वाले लोग जानते होंगे कि एक खबरिया वेबसाईट ने सर्जिकल स्ट्राइक की खबर फोड़ी। रात भर जानकार दोस्त इस पर विचार-विमर्श पर चर्चा करते रहे और सामान्य बुद्धि यही कहती थी कि अगर, ऐसा कोई सर्जिकल स्ट्राइक हुआ भी तो वह संयुक्त राष्ट्र में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बयान के बाद ही होगा। हुआ भी यही।

लेकिन उससे पहले, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दोनों देशों, भारत और पाकिस्तान को मिलकर गरीबी के खिलाफ लड़ने का आह्वान किया था।

वक्त और जगह तय हम करेंगे, यह बयान संभवतया अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है लेकिन यह मान लेने में कोई दो राय नहीं है कि उरी पर आतंकी हमले के बाद मोदी सामरिक से कहीं ज्यादा राजनैतिक और कूटनीतिक उलझन में रहे होंगे। अपनी विदेश नीति में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को नई तरह क कूटनीतिक तेवर दिए हैं। पाकिस्तान के साथ अगर उलझाव लंबा चला तो इन तेवरों की दिशा भी बदल सकती है।

यह सही है कि भारत की विदेश नीति का केन्द्र पिछले कई दशकों से पाकिस्तान के साथ रिश्ते रहे हैं और भारत ने पाकिस्तान से दुश्मनी को केन्द्र में रखकर ही, या पाकिस्तान ने भी भारत को केन्द्र में रखकर अपने दोस्त या दुश्मन तय किए।

पाकिस्तान के साथ रिश्ते नरम करने की पहल अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। वाजपेयी का जिक्र इसलिए क्योंकि दक्षिणपंथी पार्टी के प्रधानमंत्री होने के नाते पाकिस्तान के साथ रिश्ते खराब होने की सबको आशंका थी, लेकिन वाजपेयी ने पहल करके सबको चौंका दिया था। यह बात और है कि उसका नतीजा करगिल युद्ध के रूप में निकला।

अब जबकि, दुनिया भर में सन् 1999 के मुकाबले भारत अधिक ताकतवर है, मोदी ने भी वाजपेयी की उस पहले को अधिक तेज़ी दी थी। खुद नवाज शरीफ की पोती के शादी में अनौपचारिक रूप से पहुंचकर, या अपने मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण में पाकिस्तान को भी आमंत्रित करके, या यूं ही सेहत का हाल-चाल पूछकर, मोदी ने रिश्तों को अनौपचारिक रूप देने की कोशिश की।

लेकिन, पटानकोट और उरी के हमलों के बाद पाकिस्तान को उत्तर देना जरूरी था। हालांकि, भारत ने पठानकोट के बाद संयम और सूझबूझ का परिचय दिया।

लेकिन उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक करके मोदी ने यह भी साबित किया कि 1999 में जहां वाजपेयी एलओसी पार नहीं कर पाए थे, वहीं मोदी ने मुंहतोड़ जवाब भी दिया और नियंत्रण रेखा के पार भी गए।

तो एक बात समझिए कि पाकिस्तान को नाथने की यह कोशिश पहले से ही लोकप्रिय नरेन्द्र मोदी को कुछ उसी तरह और भी ऊंचे स्थान पर ले जाएगी, जिसतरह सन इकहत्तर के युद्ध के बाद इंदिरा गांधी को खास लोकप्रियता मिली थी। इंदिरा, दुर्गा का अवतार मानी गईं थीं। मोदी का फ़ैसलाकुन अंदाज़ जनता को पसंद आएगा, यह तय मानिए।

मैंने पहले कहा था, उरी के हमले के बाद भी मोदी ने गरीबी के खिलाफ युद्ध का आह्वान किया था और ऐसा करके मोदी ने भगवा ब्रिगेड के कट्टरपंथियों की बनिस्बत अपनी राजनीतिक संजीदगी साबित की। पाकिस्तान के साथ अगली झड़पें मोदी के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित होंगी और मोदी लार्ज-दैन-लाइफ किरदार में उभर सकते हैं।

अगर पाकिस्तान के साथ लड़ाई हुई तो बिखरा हुआ पाकिस्तान पहले से अधिक बिखर जाएगा, और जैसी कि इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भविष्यवाणी की है, बीजेपी का राजनैतिक वर्चस्व अगले 15-20 बरस तक के लिए कायम हो जाएगा।

पाकिस्तानी चालबाज़ियों के खिलाफ इस सर्जिकल स्ट्राइक ने यह भी तय किया है कि चीन को भी एक चेतावनी मिले, जो अमूमन भारतीय क्षेत्रों में घुसपैठ कर लेता है। अब यह बात सवालों के घेरे में है कि हम चीन के मुकाबले सैन्य शक्ति में कहां ठहरते हैं भला? लेकिन वह सवाल बाद का है, धौंसपट्टी नहीं सही जाएगी, यह आज की कूटनीति है।

जहां तक मोदी का प्रश्न है, उनकी उंगलियो की इस हल्की जुंबिश से यूपी और उत्तराखंड चुनाव पर असर पड़ेगा यह तो तय है ही, बात-बात पर अपनी एटमी शक्ति की शेखी बघारने वाले पाकिस्तान को भी विश्व भर में नीचा देखना पड़ रहा है।

मंजीत ठाकुर

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

नेपाल को फॉर ग्रांटेड न ले भारत

दक्षिण एशियाई देशों के संगठन-दक्षेस के शिखर सम्मेलन को कवर करने के लिए काठमांडू में हूं। काठमांडू हवाई अड्डे पर बुनियादी सुविधाओं की कमी है। वहां पर उकताए हुए किरानियों का जमावड़ा है, जो आपको सुविधाएं देने में आनाकानी करेंगे, कुछ वैसे ही जैसे भारतीय नौकरशाही को जनता को सुविधा मुहैया कराने में होता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कारवां जब त्रिभुवन हवाई अड्डे से सीधे उस जगह की ओर चला, जहां एक ट्रॉमा सेंटर का उन्हें उद्घाटन करना था, तो रास्ते के दोनों तरफ लोगों का हुजूम था। 

मुझे नहीं पता कि पाकिस्तान या सार्क के दूसरे सदस्य देशों के नेताओ के आने पर इतनी ही भीड़ थी या नहीं। लेकिन, हर मोड़ पर जब मोदी-मोदी के नारे लगने लगे, तो मुझे इल्म हुआ कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता भारत के बाहर भी है, और भारत से कम नहीं है।

तराई इलाके के एक नेता ने मुझे बाद में कहा भी, मोदी अगर नेपाल के मधेशी इलाके से चुनाव में खड़े हों तो यहां से भी जीत जाएंगे। 

फेसबुक पर मेरे कुछ मित्र यह आरोप लगाते हुए पोस्ट करते हैं कि मोदी ऐसी भीड़ प्रायोजित करवाते हैं। अब उनके पोस्ट पूर्वाग्रह और ईर्ष्याग्रस्त है, यह मानने की वाजिब वजह मुझे मिल गई।

ट्रॉमा सेंटर पर प्रधानमंत्री ने सब बातों के  साथ जिस बात का जिक्र किया वह था नेपाल के संविधान का तय समय सीमा पर बनकर तैयार हो जाना। उन्होंने भारतीय संविधान की नम्यता और अनम्यता का जिक्र करते हुए सर्वानुमति से संविधान तैयार करने पर जोर दिया। 

जाहिर है कि भारत ने नेपाल के साथ अपनी मैत्री को नए आयाम देने शुरू किए हैं। लेकिन ध्यान देने वाल बात यह है कि पहले प्रधानमंत्री को सड़क मार्ग से नेपाल आना था। यह कार्यक्रम बदल दिया गया। 

प्रधानमंत्री ने अपने किसी भाषण में इसका जिक्र भी किया। वजह हैः भारत की लापरवाही। सीमावर्ती इलाकों में सड़क बनाने की जिम्मेदारी भारत की है। (इस संदर्भ में समझौते भी है) लेकिन भारत ने इस काम का ठेका जिन कंपनियों को दिया था, (इनमें कोई एक कंपनी हैदराबाद की थी) उनने एडवांस तो लिया, लेकिन काम नहीं किया। 

प्रधानमंत्री को बिहार के शहर सीतामढ़ी से सड़क मार्ग से भिट्ठामोड़ (सरहदी शहर, आधा भारत में आधा नेपाल में) होते हुए जनकपुर जाना था। 

सुनने में आया कि बिहार सरकार ने प्रधानमंत्री की संभावित यात्रा के मद्देनज़र तकरीबन 30 करोड़ रूपये खर्च करके सड़क को ठीक करवा दिया। यद्यपि वह सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग है तथापि खर्च बिहार सरकार ने किया। 

लेकिन भिट्ठामोड़ से लेकर जनकपुर तक 19 किलोमीटर तक सड़कमार्ग बेहद खराब है। और यह सड़क भारतीय कंपनियों को बनानी थी। यह लापरवाही है, बहुत बड़ी चूक। 

मोदी के जनकपुर लुम्बिनी और मुक्तिधाम न जाने के कई कारण  बताए गए। लेकिन बड़ा कारण सड़क का खराब होना भी था। हालांकि प्रधानमंत्री ने यहां के लोगों को निराश नहीं होने के लिए कहा, और कहा कि वह मौका मिलते ही इधर आएंगे। लेकिन मधेश इलाके के उन लोगों को ज़रूर निराशा हुई होगी, जो चाहते थे कि मोदी एक दफा इधर आएं, तो अब तक तरक़्की की राह में नेपाल सरकार की नजरअंदाजी का शिकार रहे तराई इलाके के दिन बहुरेंगे। 


जिस तरह से मोदी सरकार नेपाल के साथ अपने संबंध सुधारना चाहती है,  उसे पुरानी सरकार की ऐसी गलतियों को ठीक करना होगा। 

सार्क देशो के पर्यवेक्षकों में चीन भी है, और भारत की ऐसी गलतियां पाकिस्तान के मुखर सहयोगी रहे चीन को नेपाल में बढ़त दिला देंगी।

मंजीत