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Saturday, November 5, 2016

चीन की चुनौती से निपटने के लिए नेपाल है जरूरी

अठारह साल बाद भारत के किसी राष्ट्रपति की यह नेपाल यात्रा थी। 2 से 4 नवंबर तक हुई यह यात्रा इस मायने में भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन ने रणनीतिक तौर पर भारत को घेरने के लिए नेपाल की बिला शर्त मदद करनी र उस पर शिकंजा कसने की तैयारियां शुरू कर दी थीं। इसके बाद, भारतीय मूल के लोगों, जिन्हें नेपाल में मधेसी कहा जाता है, उनमें भी एक बेचैनी का आलाम था क्योंकि नेपाल के मौजूदा संविधान में मधेसियों के हितों की अनदेखी की गई थी।

लेकिन राष्ट्रपति की यह यात्रा किसी समझौते या नई परियोजना के लिए नहीं थी। बल्कि, यह तो राजनीतिक और कामकाजी स्तरों पर नेपाल के साथ भारत के सघन संवाद के विस्तार का एक रूप माना जाना चाहिए।

वैसे भी राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के नेपाल के लोगों और वहां के राजनीतिक नेताओं के साथ लंबे समय से संबंध रहे हैं और वह ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने नेपाल में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास में रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री और विदेश मंत्री वगैरह पदो पर रहते हुए भारत की तरफ से अहम भूमिका निभाई है।

बहरहाल, काठमांडू में साल 2104 में हुए सार्क सम्मलेन में द्विपक्षीय बातचीत में भारत और नेपाल ने व्यापार, आर्थिक, कनेक्टिविटी, जनसंपर्क और पर्यटन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कई नए समझौते किए हुए हैं और राष्ट्रपति का यह दौरा उन संधियों और समझौतों को लागू करने, और परियोजनाओं को तेज़ रफ्तार देने की कोशिश है। भारत की कोशिश है कि जिन संधियों पर पहले हस्ताक्षर हुए हैं, उन्हें वाकई लागू किया जाए।

हालांकि, आपको याद होगा नेपाल के नए संविधान के लागू होने बाद भारत की सरहद को मधेसियों ने विरोध-स्वरूप बंद कर दिया था। असल में, नेपाल के इससे पहले के प्रधानमंत्री के पी ओली की झुकाव चीन की तरफ ज्यादा था। लेकिन, सत्ता परिवर्तन में पुष्प कुमार दहल ‘प्रचंड’ के प्रधानमंत्री बनने के बाद से नेपाल की विदेश नीति में यू-टर्न आया है और वहां पहले की तरह पूर्ववत भारत की ओर झुकाव दिख रहा है। बीते दिनों दहल की भारत यात्रा से दोनों देशों में बर्फ गलनी शुरू हुई।

नेपाल के साथ भारत की डिप्लोमेसी नए सिरे से परवान चढ़ने लगी है। नेपाली राजनीति में चीन की तरफ का झुकाव थोड़ा कम हुआ है। चीन के साथ संबंधों के मद्देनजर भारत अब अपने इस पड़ोसी देश को नए रणनीतिक साझीदार के तौर पर विकसित करने में जुट रहा है।

नेपाल में तीन नई रेल लाइन बिछाने, नए सड़क संपर्क विकसित करने के साथ ही सीमा सुरक्षा का साझा मेकेनिज्म विकसित करने और सैन्य सुरक्षा बढ़ाने पर दोनों देश मसविदा तैयार करने में जुटे हैं।

नेपाल ने अपनी ओर से भारत द्वारा फंडिंग की जा रही उन परियोजनाओं की फेहरिस्त सौंपी है, जो नेपाल के अंदरूनी राजनीतिक हालात के चलते ठंडे बस्ते में चले गए थे। वहां के पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली के दौर में नेपाल का झुकाव चीन की तरफ हो गया था। तब चीन ने अपने यहां से काठमांडो तक रेल नेटवर्क बनाने की परियोजना शुरू की थी।

अब ‘भारत-नेपाल संयुक्त आयोग’ की बैठक के मंच से भारत चार महत्त्वपूर्ण योजनाओं पर काम कर रहा है। बड़ी परियोजना रेल नेटवर्क की है। कोलकाता बंदरगाह से नेपाल के औद्योगिक हब बीरगंज के लिए सिंगल लाइन है, जिस पर मालगाड़ी चलती है। उसे विकसित कर पैसेंजर ट्रेन चलाने लायक बनाने का प्रस्ताव है। नई रेल लाइन नेपाल के बिराटनगर तक बिछाई जा रही है, जिसमें भारत की तरफ का काम पूरा हो चुका है। आगे के लिए नेपाल सरकार को अनुमति देना है। तीसरी रेल लाइन परियोजना का प्रस्ताव है- नेपाल के काकरभिट्टा सीमा से लेकर बंगाल के पानीटंकी इलाके तक।

इसके अलाबा नेपाल में 945 किलोमीटर की ईस्ट-वेस्ट रेल लाइन बिछाने की परियोजना का प्रस्ताव है, जिसके लिए राइट्स समेत तमाम भारतीय एजंसियां अपना शुरुआती काम निपटा चुकी हैं। भारत द्वारा प्रस्तावित बीबीआइएन (भूटान-बांग्लादेश-इंडिया-नेपाल) देशों में रेल और सड़क नेटवर्क के विस्तार के लिए नेपाल में इन योजनाओं को जरूरी माना जा रहा है। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, हमारा पूरा ध्यान रेल नेटवर्क की ओर है।

भारत की तरफ से सड़क संपर्क, सीमा-पार संपर्क बढ़ाने, सुरक्षा मामलों, सीमा पर सतर्कता, पेट्रोलियम पाइप लाइन बिछाने और नेपाल में भारतीय फंडिंग वाली 4800 मेगावाट की पनबिजली परियोजना के साथ ही कई ऐसे प्रस्तावों पर बातचीत का एजंडा है, जिसकी नेपाल को बेहद जरूरत है। इस एजंडे में महाकाली संधि को लागू करने का मेकेनिज्म विकसित करने का विषय है, जिसके तहत दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का फार्मूला तैयार किया जाना है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्परूप के अनुसार, ‘राजनयिक स्तर पर कोशिश है कि सभी प्रस्तावों पर तेजी से काम हो।’

सुस्ता और कालापानी इलाके में इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट बनाने और साझा पेट्रोलिंग का प्रस्ताव भारत ने दिया, जिसे मान लिया गया है। इसकी घोषणा खुद राष्ट्रपति ने की।

लेकिन इस मामले में सबसे अहम रहा, नेपाली छात्रों को आईआईटी में पढ़ने की सुविधा की घोषणा और इसकी प्रवेश परीक्षा अब काठमांडू में भी होगी। जाहिर है भारत ने नेपाल को साथ रखने के लिए उसे सौगातों से लाद दिया है। इसमें भूकंप के दौरान ध्वस्त हुए घरों के निर्माण के लिए 6800 करोड़ की मदद भी शामिल है।

लेकिन भारतीय कूटनयिकों के चेहरे पर खुशी तब दिखी, जब पाकिस्तान का नाम लिए बगैर राष्ट्रपति ने अपने भाषण में कहा कि जिन देशों ने अपनी नीति का हिस्सा आतंकवाद को बना लिया हैं उन्हें अलग-थलग किया जाना जरूरी है। नेपाल के साथ खुली सरहद से आंतकवाद आने का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे में नेपाल के उप-प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री समेत तमाम लोगों ने जब कहा कि नेपाल की धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा, तो इसे भारत की कामयाबी माना जाना चाहिए।

वैसे भी, भारतीय बंदरगाहों से आने वाले दूसरे देशों के सामानों समेत भारत के कारोबार को भी जोड़ दें तो नेपाल का 96 फीसद सामान प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत से आता है। ऐसे में नेपाल के लिए भारत अपरिहार्य है और चीन की चुनौती के मद्देनजर नेपाल भारत के लिए।

दोनों साथ चलें, तो दोनो का फायदा है।







Monday, October 3, 2016

मोदी का मास्टर स्ट्रोक है सर्जिकल स्ट्राइक

पाकिस्तानी आतंकी गुटों के खिलाफ एलओसी पार करके सर्जिकल स्ट्राइक भारत ने किया, उस दौरान मैं एक बार फिर से जंगल महल के उन इलाकों में था जहां मलेरिया अब भी जानलेवा है, जहां सड़कें बन कर तैयार हैं तो लोगों को लगा कि विकास हो गया, और जहां करीब साढ़े तीन साल से कोई राजनीतिक हत्या (पढ़ें- नक्सली हिंसा) नहीं हुई है।

पाकिस्तान ने जब उरी में भारतीय सैन्य शिविर पर हमला कर दिया और हमारे 18 (अब 19) जवान शहीद हो गए, तब से हम में से अधिकतर लोगों के ख़ून उबल रहे थे। देश पर युद्धोन्माद-सा छा गया था और टीवी चैनल लग रहा था, सीधे पाकिस्तान पर ही हमला बोल देंगे।

उन्हीं दिनो, साइबर विश्व के नागरिक और खबरों से नजदीकी रखने वाले लोग जानते होंगे कि एक खबरिया वेबसाईट ने सर्जिकल स्ट्राइक की खबर फोड़ी। रात भर जानकार दोस्त इस पर विचार-विमर्श पर चर्चा करते रहे और सामान्य बुद्धि यही कहती थी कि अगर, ऐसा कोई सर्जिकल स्ट्राइक हुआ भी तो वह संयुक्त राष्ट्र में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बयान के बाद ही होगा। हुआ भी यही।

लेकिन उससे पहले, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दोनों देशों, भारत और पाकिस्तान को मिलकर गरीबी के खिलाफ लड़ने का आह्वान किया था।

वक्त और जगह तय हम करेंगे, यह बयान संभवतया अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है लेकिन यह मान लेने में कोई दो राय नहीं है कि उरी पर आतंकी हमले के बाद मोदी सामरिक से कहीं ज्यादा राजनैतिक और कूटनीतिक उलझन में रहे होंगे। अपनी विदेश नीति में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को नई तरह क कूटनीतिक तेवर दिए हैं। पाकिस्तान के साथ अगर उलझाव लंबा चला तो इन तेवरों की दिशा भी बदल सकती है।

यह सही है कि भारत की विदेश नीति का केन्द्र पिछले कई दशकों से पाकिस्तान के साथ रिश्ते रहे हैं और भारत ने पाकिस्तान से दुश्मनी को केन्द्र में रखकर ही, या पाकिस्तान ने भी भारत को केन्द्र में रखकर अपने दोस्त या दुश्मन तय किए।

पाकिस्तान के साथ रिश्ते नरम करने की पहल अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। वाजपेयी का जिक्र इसलिए क्योंकि दक्षिणपंथी पार्टी के प्रधानमंत्री होने के नाते पाकिस्तान के साथ रिश्ते खराब होने की सबको आशंका थी, लेकिन वाजपेयी ने पहल करके सबको चौंका दिया था। यह बात और है कि उसका नतीजा करगिल युद्ध के रूप में निकला।

अब जबकि, दुनिया भर में सन् 1999 के मुकाबले भारत अधिक ताकतवर है, मोदी ने भी वाजपेयी की उस पहले को अधिक तेज़ी दी थी। खुद नवाज शरीफ की पोती के शादी में अनौपचारिक रूप से पहुंचकर, या अपने मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण में पाकिस्तान को भी आमंत्रित करके, या यूं ही सेहत का हाल-चाल पूछकर, मोदी ने रिश्तों को अनौपचारिक रूप देने की कोशिश की।

लेकिन, पटानकोट और उरी के हमलों के बाद पाकिस्तान को उत्तर देना जरूरी था। हालांकि, भारत ने पठानकोट के बाद संयम और सूझबूझ का परिचय दिया।

लेकिन उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक करके मोदी ने यह भी साबित किया कि 1999 में जहां वाजपेयी एलओसी पार नहीं कर पाए थे, वहीं मोदी ने मुंहतोड़ जवाब भी दिया और नियंत्रण रेखा के पार भी गए।

तो एक बात समझिए कि पाकिस्तान को नाथने की यह कोशिश पहले से ही लोकप्रिय नरेन्द्र मोदी को कुछ उसी तरह और भी ऊंचे स्थान पर ले जाएगी, जिसतरह सन इकहत्तर के युद्ध के बाद इंदिरा गांधी को खास लोकप्रियता मिली थी। इंदिरा, दुर्गा का अवतार मानी गईं थीं। मोदी का फ़ैसलाकुन अंदाज़ जनता को पसंद आएगा, यह तय मानिए।

मैंने पहले कहा था, उरी के हमले के बाद भी मोदी ने गरीबी के खिलाफ युद्ध का आह्वान किया था और ऐसा करके मोदी ने भगवा ब्रिगेड के कट्टरपंथियों की बनिस्बत अपनी राजनीतिक संजीदगी साबित की। पाकिस्तान के साथ अगली झड़पें मोदी के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित होंगी और मोदी लार्ज-दैन-लाइफ किरदार में उभर सकते हैं।

अगर पाकिस्तान के साथ लड़ाई हुई तो बिखरा हुआ पाकिस्तान पहले से अधिक बिखर जाएगा, और जैसी कि इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भविष्यवाणी की है, बीजेपी का राजनैतिक वर्चस्व अगले 15-20 बरस तक के लिए कायम हो जाएगा।

पाकिस्तानी चालबाज़ियों के खिलाफ इस सर्जिकल स्ट्राइक ने यह भी तय किया है कि चीन को भी एक चेतावनी मिले, जो अमूमन भारतीय क्षेत्रों में घुसपैठ कर लेता है। अब यह बात सवालों के घेरे में है कि हम चीन के मुकाबले सैन्य शक्ति में कहां ठहरते हैं भला? लेकिन वह सवाल बाद का है, धौंसपट्टी नहीं सही जाएगी, यह आज की कूटनीति है।

जहां तक मोदी का प्रश्न है, उनकी उंगलियो की इस हल्की जुंबिश से यूपी और उत्तराखंड चुनाव पर असर पड़ेगा यह तो तय है ही, बात-बात पर अपनी एटमी शक्ति की शेखी बघारने वाले पाकिस्तान को भी विश्व भर में नीचा देखना पड़ रहा है।

मंजीत ठाकुर

Thursday, November 27, 2014

नेपाल को फॉर ग्रांटेड न ले भारत

दक्षिण एशियाई देशों के संगठन-दक्षेस के शिखर सम्मेलन को कवर करने के लिए काठमांडू में हूं। काठमांडू हवाई अड्डे पर बुनियादी सुविधाओं की कमी है। वहां पर उकताए हुए किरानियों का जमावड़ा है, जो आपको सुविधाएं देने में आनाकानी करेंगे, कुछ वैसे ही जैसे भारतीय नौकरशाही को जनता को सुविधा मुहैया कराने में होता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कारवां जब त्रिभुवन हवाई अड्डे से सीधे उस जगह की ओर चला, जहां एक ट्रॉमा सेंटर का उन्हें उद्घाटन करना था, तो रास्ते के दोनों तरफ लोगों का हुजूम था। 

मुझे नहीं पता कि पाकिस्तान या सार्क के दूसरे सदस्य देशों के नेताओ के आने पर इतनी ही भीड़ थी या नहीं। लेकिन, हर मोड़ पर जब मोदी-मोदी के नारे लगने लगे, तो मुझे इल्म हुआ कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता भारत के बाहर भी है, और भारत से कम नहीं है।

तराई इलाके के एक नेता ने मुझे बाद में कहा भी, मोदी अगर नेपाल के मधेशी इलाके से चुनाव में खड़े हों तो यहां से भी जीत जाएंगे। 

फेसबुक पर मेरे कुछ मित्र यह आरोप लगाते हुए पोस्ट करते हैं कि मोदी ऐसी भीड़ प्रायोजित करवाते हैं। अब उनके पोस्ट पूर्वाग्रह और ईर्ष्याग्रस्त है, यह मानने की वाजिब वजह मुझे मिल गई।

ट्रॉमा सेंटर पर प्रधानमंत्री ने सब बातों के  साथ जिस बात का जिक्र किया वह था नेपाल के संविधान का तय समय सीमा पर बनकर तैयार हो जाना। उन्होंने भारतीय संविधान की नम्यता और अनम्यता का जिक्र करते हुए सर्वानुमति से संविधान तैयार करने पर जोर दिया। 

जाहिर है कि भारत ने नेपाल के साथ अपनी मैत्री को नए आयाम देने शुरू किए हैं। लेकिन ध्यान देने वाल बात यह है कि पहले प्रधानमंत्री को सड़क मार्ग से नेपाल आना था। यह कार्यक्रम बदल दिया गया। 

प्रधानमंत्री ने अपने किसी भाषण में इसका जिक्र भी किया। वजह हैः भारत की लापरवाही। सीमावर्ती इलाकों में सड़क बनाने की जिम्मेदारी भारत की है। (इस संदर्भ में समझौते भी है) लेकिन भारत ने इस काम का ठेका जिन कंपनियों को दिया था, (इनमें कोई एक कंपनी हैदराबाद की थी) उनने एडवांस तो लिया, लेकिन काम नहीं किया। 

प्रधानमंत्री को बिहार के शहर सीतामढ़ी से सड़क मार्ग से भिट्ठामोड़ (सरहदी शहर, आधा भारत में आधा नेपाल में) होते हुए जनकपुर जाना था। 

सुनने में आया कि बिहार सरकार ने प्रधानमंत्री की संभावित यात्रा के मद्देनज़र तकरीबन 30 करोड़ रूपये खर्च करके सड़क को ठीक करवा दिया। यद्यपि वह सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग है तथापि खर्च बिहार सरकार ने किया। 

लेकिन भिट्ठामोड़ से लेकर जनकपुर तक 19 किलोमीटर तक सड़कमार्ग बेहद खराब है। और यह सड़क भारतीय कंपनियों को बनानी थी। यह लापरवाही है, बहुत बड़ी चूक। 

मोदी के जनकपुर लुम्बिनी और मुक्तिधाम न जाने के कई कारण  बताए गए। लेकिन बड़ा कारण सड़क का खराब होना भी था। हालांकि प्रधानमंत्री ने यहां के लोगों को निराश नहीं होने के लिए कहा, और कहा कि वह मौका मिलते ही इधर आएंगे। लेकिन मधेश इलाके के उन लोगों को ज़रूर निराशा हुई होगी, जो चाहते थे कि मोदी एक दफा इधर आएं, तो अब तक तरक़्की की राह में नेपाल सरकार की नजरअंदाजी का शिकार रहे तराई इलाके के दिन बहुरेंगे। 


जिस तरह से मोदी सरकार नेपाल के साथ अपने संबंध सुधारना चाहती है,  उसे पुरानी सरकार की ऐसी गलतियों को ठीक करना होगा। 

सार्क देशो के पर्यवेक्षकों में चीन भी है, और भारत की ऐसी गलतियां पाकिस्तान के मुखर सहयोगी रहे चीन को नेपाल में बढ़त दिला देंगी।

मंजीत