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गुरुवार, 7 मई 2026

कतरनी चावल चूड़ा और देवघर का पेड़ा

कुछ खुशबुएँ ऐसी होती हैं जो समय की धूल में भी धुंधली नहीं पड़तीं. वे हमारी इंद्रियों के किसी गुप्त झरोखे में दुबक कर बैठ जाती हैं और एक मामूली से स्पर्श मात्र से पूरे अतीत को पुनर्जीवित कर देती हैं.

पिछली बार जब मैंने गोविंदभोग चावल पर लिखा था तो कई लोगों ने उस चावल जैसा चावल देश के अन्य हिस्सों में होने की बात कही थी. लेकिन यकीन मानिए, गोविंदभोग चावल यूनीक है और इसलिए उसे जीआइ टैग मिला है.
बहरहाल, कुछ लोगों ने कतरनी चावल की याद दिलाते हुए उस पर लिखने के लिए भी कहा था. और कतरनी के बारे में सोचते हुए मुझे सबसे पहले उसकी खुशबू याद आई.

बिहार के ‘अंग क्षेत्र’ (भागलपुर और बांका) के खेतों में जब कतरनी का धान पकता है, तो उसकी सोंधी महक केवल हवा में नहीं तैरती, बल्कि वह उस माटी के संस्कार और आतिथ्य का उद्घोष करती है.

यह केवल एक अन्न नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अस्मिता है. आज के इस मशीनी जमाने में जब ‘फास्ट फूड’ ने थालियों पर कब्ज़ा कर लिया है, तब कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का मिलन एक ऐसी सात्विक तृप्ति प्रदान करता है, जिसकी तुलना किसी भी वैश्विक व्यंजन से नहीं की जा सकती.




कतरनी: सुगंध का स्वर्ण-अक्षत

भागलपुर और बांका की जलोढ़ मिट्टी में जब कतरनी धान के पौधे लहलहाते हैं, तो उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है. कतरनी चावल अपने छोटे कद, तीखे और सुगंधित दानों के लिए विश्वविख्यात है. इसे जीआई टैग प्राप्त है, जो इसके विशिष्ट होने की मुहर लगाता है. लेकिन इसका महत्व केवल सरकारी दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं है.
यह टैग क्यों महत्वपूर्ण है?

जीआई टैग मिलने का अर्थ यह है कि ‘कतरनी’ नाम का उपयोग केवल उसी चावल के लिए किया जा सकता है जो भागलपुर और बांका के भौगोलिक क्षेत्र में पारंपरिक विधियों से उगाया गया हो. यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी शुद्धता की गारंटी देता है और स्थानीय किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य दिलाने में मदद करता है.

कतरनी चावल को 28 मार्च, 2018 को आधिकारिक तौर पर भारत सरकार के भौगोलिक उपदर्शन रजिस्ट्री (जीआइ रजिस्ट्री) द्वारा जीआई टैग प्रदान किया गया था.

इस चावल के पंजीकृत रूप से मालिकाना हक भागलपुर जिला कतरनी धान उत्पादक संघ के पास है और उसके उत्पादन का इलाका भागलपुर, बांका और मुंगेर जिलों के विशिष्ट क्षेत्र हैं.

बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर ने कतरनी चावल के जीआई टैगिंग की प्रक्रिया में मुख्य तकनीकी भूमिका निभाई थी. मार्च, 2018 की सरकारी रिपोर्टों में बिहार के चार कृषि उत्पादों (कतरनी चावल, जर्दालु आम, मगही पान और शाही लीची) को एक साथ जीआई टैग मिलने का उल्लेख है.

अंग की लोक-संस्कृति में कहा जाता है कि कतरनी का धान जब घर आता है, तो पड़ोसी को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती; खुशबू खुद गवाही दे देती है. यह चावल जब पकता है, तो इसके दाने किसी श्वेत मोती की भांति चमकते हैं. इसकी मिठास और कोमलता इसे ‘चावलों की महारानी’ बनाती है. यह वह चावल है जिसे केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि मन को तृप्त करने के लिए खाया जाता है.


चूड़ा: सघन तपस्या का मधुर फल

कतरनी के धान से जब ‘चूड़ा’ (चिड़वा, पोहा) तैयार किया जाता है, तो यह एक लंबी प्रक्रिया और सघन धैर्य का परिणाम होता है. कतरनी के धान को हल्के गर्म पानी में भिगोकर, भूनकर और फिर लकड़ी के ओखल या मिल में कूटकर जो पतले, कागज़ जैसे झिलमिलाते चूड़े निकलते हैं, वे अद्भुत होते हैं.

कतरनी चूड़ा की विशेषता यह है कि यह अत्यंत सुपाच्य और स्निग्ध होता है. इसकी महक कच्चे धान की सोंधी खुशबू को समेटे रहती है.

बिहार के खान-पान में ‘दही-चूड़ा’ का स्थान सर्वोपरि है. मकर संक्रांति हो या जेठ की दुपहरी में मेहमान का स्वागत, चूड़ा-दही और चीनी/गुड़ का मेल एक मुकम्मल भोजन है. लेकिन जब यह चूड़ा कतरनी का हो, तो वह भोजन से ऊपर उठकर एक ‘अनुभव’ बन जाता है.

अंग से बाबाधाम: कतरनी और पेड़े का दिव्य संबंध

अब बात करते हैं उस ‘त्रिवेणी’ की, जो भागलपुर, सुल्तानगंज और देवघर के बीच बहती है. अंग प्रदेश की सीमाएं देवघर (झारखंड) की पहाड़ियों से जा मिलती हैं. यह संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और स्वादजन्य भी है.

सावन का महीना हो और सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर कांवड़िए जब बाबाधाम (देवघर) की ओर प्रस्थान करते हैं, तो उनकी पोटली में अक्सर ‘कतरनी का चूड़ा’ होता है. यात्रा के दौरान जब वे विश्राम करते हैं, तो मोटी मलाई वाली दही और कतरनी चूड़ा उनका मुख्य संबल बनता है.

लेकिन इस स्वाद की पूर्णता तब होती है, जब इसमें देवघर के विश्वविख्यात ‘पेड़े’ का समावेश होता है.
देवघर का पेड़ा, जो शुद्ध खोया और चीनी के मंद आंच पर कैरेमलाइज्ड होने से बनता है, अपनी एक विशिष्ट भूरी आभा और सोंधी मिठास के लिए जाना जाता है.

स्वाद का रसायन: चूड़ा-दही और पेड़ा

अंग क्षेत्र की मेहमानी में एक विशिष्ट परंपरा है—’दही-चूड़ा-पेड़ा’. कतरनी चूड़ा: जो आधार है, जो सुगंधित और हल्का है. गाढ़ा दही: जो शीतलता और क्रीमी टेक्सचर प्रदान करता है. और इसके साथ देवघर का पेड़ा, जो मिठास का वह चरम है, जो इस पूरे भोजन को एक ‘शाही डेजर्ट’ में बदल देता है.

अक्सर लोग दही-चूड़ा में चीनी या गुड़ मिलाते हैं, लेकिन मुझ जैसे पारखी लोग पेड़े को चूड़े के साथ मसलकर खाते हैं.

पेड़े की वह सोंधी मिठास जब कतरनी की खुशबू और दही की खटास के साथ मिलती है, तो मुँह में रसों का एक ऐसा विस्फोट होता है जिसे शब्दों में बांधना कठिन है. पेड़े का दानेदार होना और चूड़े का करारापन एक अद्भुत विरोधाभास पैदा करता है जो स्वाद की ग्रंथियों को झंकृत कर देता है.

सांस्कृतिक ताना-बाना और विरासत

भागलपुर का रेशम और यहाँ की कतरनी, दोनों ही सूक्ष्मता के प्रतीक हैं. वहीं देवघर का पेड़ा उस भक्ति और श्रद्धा का अंश है जो बाबा बैद्यनाथ के चरणों से जुड़ा है.

जब कोई व्यक्ति देवघर से लौटता है, तो उसके पास प्रसाद के रूप में पेड़े होते हैं और जब वह भागलपुर से गुजरता है, तो झोले में कतरनी चूड़ा. इन दोनों का साथ होना दो संस्कृतियों के मिलन का प्रतीक है.

जाहिर है, यह सब लिखते हुए मैं उस समय में लौट गया हूं, जब जीवन की गति धीमी थी. जब खेतों से अनाज सीधे ओखल तक आता था और पेड़े शुद्ध दूध से घंटों कढ़ाई में जलकर बनते थे. आज ‘पैकेज्ड’ और ‘इंस्टेंट’ के युग में कतरनी और देवघर के पेड़े का यह मेल हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है.

कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का यह कनेक्शन केवल भोजन की बात नहीं है; यह अंग और संथाल परगना के बीच के मधुर रिश्तों का सेतु है. यह माँ के हाथों से सानकर खिलाए गए उस ग्रास की याद है, जिसमें ममता का नमक और संस्कार की खुशबू मिली होती है.

यदि आप कभी अंग प्रदेश की यात्रा पर हों और दोपहर की सुनहरी धूप में आपको कोई कतरनी चूड़ा, गाढ़ी दही और देवघर के पेड़े परोस दे, तो समझियेगा कि आप केवल खाना नहीं खा रहे, बल्कि आप उस प्राचीन सभ्यता का हिस्सा बन रहे हैं जिसने स्वाद को भी ईश्वर की आराधना के समान पवित्र माना है. कतरनी की महक और पेड़े की मिठास, यही है हमारे अंग का असली गौरव, जो सदियों से हमारी जीभ पर एक मीठी याद बनकर अमर है.

अंग की धरती पर कतरनी का उगना केवल एक कृषि प्रक्रिया नहीं, बल्कि माटी के साथ किया जाने वाला एक प्रेम-अनुष्ठान है. आधुनिकता की आंधी के बावजूद, भागलपुर और बांका के गाँवों में आज भी कतरनी को सहेजने की विधियाँ वैसी ही हैं जैसी पूर्वजों के समय में थीं.

असल में, कतरनी चावल की पैदावार विशिष्ट पारंपरिक विधियों से की जाती है जो इस चावल की सुगंध और स्वाद को अक्षुण्ण रखती हैं:

पहली बात कि कतरनी की पैदावार के लिए विशिष्ट भूखंड का चयन किया जाता है. स्थानीय (और भौगोलिक रूप से) इसे दिआरा और तारी की माटी कहा जाता है.

कतरनी हर कहीं नहीं उग सकती. अंग के किसान आज भी पारंपरिक रूप से उन्हीं खेतों को चुनते हैं जहाँ गंगा या उसकी सहायक नदियों का पानी लौट चुका हो. विशेषकर ’तारी’ (ऊँची भूमि) और ’बलगाथ’ (हल्की दोमट) मिट्टी इसके लिए श्रेष्ठ मानी जाती है.

मान्यता है कि इस मिट्टी में मौजूद विशिष्ट खनिजों के कारण ही कतरनी में वह ‘2-AP’ नामक सुगंधित तत्व विकसित होता है.

पारंपरिक खेती में कतरनी के साथ यूरिया या रासायनिक खाद का प्रयोग वर्जित माना जाता है.

गाँवों में किसान आज भी ’गोबर की खाद’ और ’खेत की पुरानी कचवा’ (सड़ी हुई घास-फूस) का उपयोग करते हैं. तकनीकी रूप से यह सच है कि अधिक नाइट्रोजन (यूरिया) डालने से धान की लंबाई तो बढ़ जाती है, लेकिन उसकी मूल सुगंध कम हो जाती है. इसीलिए अंग के किसान ‘कम पैदावार’ मंजूर करते हैं, लेकिन ‘कम सुगंध’ नहीं.
कतरनी की रोपाई का समय बहुत महत्वपूर्ण है. सावन के आगमन के साथ ही इसके ’बिचड़े’ (नर्सरी) तैयार किए जाते हैं. पारंपरिक विधि में रोपाई के समय दो पौधों के बीच एक निश्चित दूरी रखी जाती है, ताकि हवा का संचार सही हो.

पारंपरिक ढेंकी, मशीनी युग में इसे कौन याद रखता है!


किसान रोपाई के समय अक्सर लोकगीत (कजरी) गाते हैं, जो इस थकाऊ काम को एक उत्सव बना देता है. साथ ही, बरहमासा गीत भी होते हैं.

फसल की कटाई और ‘अदहन’ का ध्यान

कतरनी को काटने का एक विशिष्ट समय होता है. जब बालियां सुनहरी हो जाएं और उनमें दूध सूखकर दाना कड़ा हो जाए, तभी इसे काटा जाता है. अधिक देर करने पर दाने खेत में ही झड़ने लगते हैं. कटाई के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में ’अदहन देना’ कहते हैं.

कतरनी चूड़ा बनाने की प्राचीन ‘भट्टी’ विधि

कतरनी का असली जादू उसके चूड़े में है, जिसे बनाने की पारंपरिक विधि आज भी मशीनों को मात देती है. सबसे पहले धान को बड़े लोहे के कड़ाहों में रात भर भिगोने के बाद आधा उबाला जाता है. यह प्रक्रिया बहुत सावधानी से की जाती है ताकि दाना फटे नहीं.

उबले हुए धान को मिट्टी के चूल्हे पर बालू के साथ भूना जाता है. यहाँ ‘अंदाज’ ही सब कुछ है; जरा सी चूक चूड़े को जला सकती है या उसे कच्चा छोड़ सकती है.

हालाँकि अब मशीनें आ गई हैं, लेकिन आज भी कुछ पुराने घरों में ’ढेंकी’ (लकड़ी का भारी लीवर) का प्रयोग होता है. ढेंकी से कूटा हुआ चूड़ा मोटा होता है, लेकिन उसकी मिठास और खुशबू मशीन वाले चूड़े से कहीं अधिक होती है.

कतरनी को लोहे के साइलो में नहीं, बल्कि मिट्टी से बनी ‘कोठी’ या ’बखार’ में रखा जाता है. मिट्टी के ये पात्र तापमान को नियंत्रित रखते हैं, जिससे कतरनी की सुगंध लंबे समय तक सुरक्षित रहती है.

अंग के गाँवों में कतरनी का उत्पादन कोई ‘बिजनेस’ नहीं, बल्कि एक ‘विरासत’ है. यहाँ का किसान अपनी फसल को संतान की तरह पालता है. कतरनी की वह विशिष्ट महक दरअसल उस किसान के पसीने, गंगा की माटी और ढीकी की थाप का सामूहिक संगीत है.

(तस्वीरें ढेंकी-जो अब दुर्लभ है. तथा कतरनी चावल की हैं. देवघर के पेड़े तो अब अमेजन पर भी उपलब्ध हैं)

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणामः जीते हुए मुस्लिम उम्मीदवार, पार्टी, सीट और उनका मार्जिन

मुस्लिम उम्मीदवार विजेता

1. जोकीहाट- AIMIM – मोहम्मद मुर्शिद आलम- मार्जिन- 28803

2. बहादुरगंज- AIMIM- मोहम्मद तौसीफ आलम- मार्जिन- 28726

3. कोचादामन- AIMIM- मो. सरवर आलम- मार्जिन- 23021

4. अमौर- AIMIM- अख्तरूल ईमान- मार्जिन- 38928

5. बैसी- AIMIM- गुलाम सरवर- मार्जिन- 27251

6. किशनगंज- कांग्रेस- मो. कमरूल होदा- मार्जिन- 12794

7. बिस्फी- राजद- आसिफ अहमद- मार्जिन- 8107

8. रघुनाथपुर- राजद- ओसामा साहब- मार्जिन- 9248

9. ढाका- राजद- फैजल रहमान- मार्जिन- 178

10. अररिया- कांग्रेस- अबीदुर रहमान- मार्जिन- 12741

11. चैनपुर- जेडीयू- मो. ज़मां खान- मार्जिन 8362




दूसरे स्थान पर रहे मुस्लिम उम्मीदवार

1. अमौर – सबा जफर- जद-यू

2. बहादुरगंज- मो. मुसव्वर आलम – कांग्रेस

3. बरारी- मो. तौकीर आलम- कांग्रेस

4. बेतिया- वशी अहमद- कांग्रेस

5. बिहार शरीफ- ओमैर खान- कांग्रेस

6. गौरा बौराम- अफजल अली खान- राजद

7. जमुई- मोहम्मद शमसाद आलम- राजद

8. जोकीहाट- मंजर आलम- जद-यू

9. कदवा- शकील अहमद खान- कांग्रेस

10. कसबा- मोहम्मद इरफान आलम- कांग्रेस

11. केओटी- फराज फातमी- राजद

12. कोचादामन- मोजाहिद आलम- राजद

13. नरकटिया- शमीम अहमद- राजद

14. नाथनगर- शेख जियाउल हसन- राजद

15. प्राणपुर- इशरत परवीन- राजद

16. रफीगंज- गुलाम शाहिद- राजद

17. समस्तीपुर- अख्तरूल इस्लाम शाहीन- राजद

18. सिकटा- खुर्शीद फिरोज अहमद- निर्दलीय

19. सिमरी बख्तियारपुर- युसुफ सलाउद्दीन- राजद

20. सुरसंड- सैय्यद अबू दोजाना- राजद

21. ठाकुरगंज- गुलाम हसनैन- AIMIM


बिहार विधानसभा चुनावः एनडीए की प्रचंड जीत में नीतीश के पीछे क्यों खड़ी है महिला शक्ति?

मंजीत ठाकुर

बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार में जनता ने गरदा उड़ा दिया. बिहार में गरदा उड़ाने का मतलब चुनावी है प्रचंड बहुमत हासिल करना. 2020 के विधानसभा चुनावों में जहां जनता दल युनाइटेड को 43 सीटें और 15.39 फीसद वोट शेयर हासिल हुआ था, वहीं 2025 के चुनावों में नीतीश कुमार भले ही भाजपा से कम सीटें हासिल कर पाएं हों पर उनके वोट शेयर में अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई है.

2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक जनता दल युनाइटेड को इस खबर के लिखे जाने तक 78 सीटें और 7 पर बढ़त यानी कुल 85 सीटें (यह अंतिम आंकड़े आने पर बदल सकते हैं) और 19.27 फीसद वोट मिले हैं. यानी सीधे-सीधे सीटों की संख्या दोगुनी और वोट शेयर में करीबन 4 फीसद का इजाफा!
14 नवंबर को मतगणना के बाद एनडीए-मय हुआ बिहार

बेशक, भाजपा ने पिछले चुनाव के अपने प्रदर्शन में सुधार किया है और तब के 74 सीटों के मुकाबले 2025 में 87 सीटों पर जीत चुकी है और 2 पर आगे है (यानी कुल 89). पर उसके वोट शेयर में मामूली बढ़त है.

2020 में भाजपा ने 19.46 फीसद वोट हासिल किए थे और 2025 में 20.07 यानी उसके वोट शेयर में आधे फीसद का इजाफा ही हुआ है.





अब जानकार कह रहे हैं कि महागठबंधन ने अपने लिए जिस एमवाई समीकरण पर भरोसा किया था उस पर नीतीश कुमार का एम (महिला) और वाई (यूथ) का समीकरण अधिक भारी पड़ा.

बेशक, नीतीश कुमार महिलाओं में खासे लोकप्रिय हैं और उन्होंने सभी जाति और धर्मों की महिलाओं में अपना खास वोटर तबका तैयार किया है.


बिहार विधानसभा चुनाव 2025 पार्टीवार वोट शेयर

 
आखिर बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार अब भी महिला मतदाताओं के बीच सबसे भरोसेमंद नेता क्यों हैं?

बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प सामाजिक बदलाव पिछले दो दशकों में उभरा है, महिलाएँ अब सिर्फ़ वोटर नहीं, बल्कि चुनावी नतीजों को मोड़ने वाली निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं।

बिहार की राजनीतिक समझ रखने वाले लोग जानते हैं कि राज्य की चुनावी दिशा अब सिर्फ़ जातीय समीकरणों पर नहीं चलती। पिछले 20 साल में एक नया समीकरण उभरा है- लैंगिक समीकरण। और उसमें नीतीश कुमार ने एक स्थायी जगह बनाई है।

लेकिन सवाल यह है कि आख़िर क्यों बिहार की महिला मतदाता, बार-बार और बड़े पैमाने पर, नीतीश कुमार को प्राथमिकता देती हैं?

इसका उत्तर सिर्फ़ किसी एक योजना में नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे में किए गए उन बदलावों में छिपा है, जिन्हें उन्होंने 2005 के बाद से लगातार आगे बढ़ाया।

आइए, नीतीश कुमार के इस वोट बैंक के “महिला समर्थन मॉडल” की परतें समझने की कोशिश करते हैं.


तालीम का रास्ता बदलने वाली ‘साइकिल’

आज की तारीख में बिहार के किसी भी सुदूर देहाती इलाके में चले जाइए, वहां की सड़कों पर एक चीज सामान्य रूप से दिखेगी. लड़कियां. साइकल चलाती स्कूली यूनिफॉर्म में सजी-धजी लड़कियां.

2005 से पहले यह अनुभव विरला ही था. अगर गांवों में स्कूल घर से दूर हुए तो लड़कियों का स्कूल से नाम कटा दिया जाता था. लेकिन बिहार में एक सरकारी योजना ने लड़कियों की शिक्षा का रास्ता बदल दिया और बिलाशक वह योजना नीतीश कुमार की थी. नीतीश ने बिहार में छात्राओं को मुख्यमंत्री साइकिल योजना के तहत स्कूल जाने के लिए साइकिलें देनी शुरू की थी.

स्रोतः बिहार सेकेंडरी एजुकेशन डिपार्टमेंट

नीतीश कुमार साल 2005 के अक्तूबर-नवंबर के चुनाव में जीत के बाद सत्ता में आए थे और साल 2006 में नीतीश ने यह नया प्रयोग शुरू किया था. बिहार सरकार ने नवीं कक्षा में दाख़िल लड़की छात्राओं को साइकिल या साइकिल खरीदने के लिए नकद देने की नीति शुरू की तो मकसद साफ था: स्कूल तक का समय और दूरी घटाकर लड़कियों की स्कूली शिक्षा में दाखिले की दर और उनकी पढ़ाई बीच में न छूटे इसके दर को बेहतर करना.

यह न केवल एक योजना भर नहीं थी, यह कल्याणकारी हस्तक्षेप था, बल्कि इसे एक व्यावहारिक हस्तक्षेप कहना होगा जिसकी वजह से ‘स्कूल घर के करीब’ आ गया.


  साल 2006 में इस योजना के तहत लड़कियों के साइकिल खरीदने के लिए नकद 2000 रुपए दिए जाते थे. लेकिन बाद में, जब डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर का चलन बढ़ा तो पैसे सीधे छात्राओं के खाते में जमा किए जाने लगे.

इस पहल को बाद में कई अर्थशास्त्रियों और विकास-विश्लेषकों ने अध्ययन का विषय बनाया. इस योजना को देश के कई अन्य राज्यों ने अपनाया. इसके असर पर दुनियाभर में अध्ययन हुए. अध्ययनों ने बताया कि साइकिल बांटने की यह योजना कन्या शिक्षा को बढ़ावा देने में कारगर रही है और न सिर्फ स्कूली शिक्षा में लड़कियों के दाखिले की दर बढ़ी है बल्कि ड्रॉप आउट दर भी कम हुई है.

  
बिहार की इस मुख्यमंत्री साइकिल योजना के मॉडल को जाम्बिया समेत सात अफ्रीकी देशों ने अपनाया और संयुक्त राष्ट्र ने इसे स्कूली दाखिले को बढ़ावा देने और महिला सशक्तिकरण का शानदार तरीका बताया.

हालांकि, शुरू में यह योजना सिर्फ लड़कियों के लिए थी, लेकिन बाद में लड़कों को भी साइकिल योजना में शामिल किया गया और योजना का विस्तार हुआ.

बिहार सेंकेंडरी एजुकेशन डिपार्टमेंट के आंकड़ों के मुताबिक, 2007 से 2024 के बीच कुल 97,94,445 (यानी लगभग 97.9 लाख) छात्राओं को मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना के अंतर्गत साइकिल प्रदान किया जा चुका है.  



असल में बिहार में शिक्षा और साक्षरता का स्तर राष्ट्रीय औसत से काफी कम थे. ऐसे में, 2005 में सुशासन के नाम पर सत्ता में आई नीतीश कुमार की सरकार ने शिक्षा में सुधार लाने के लिए कुछ योजनाएं शुरू कीं. इनमें से एक था, हर पंचायत में एक हाई स्कूल खोलना और उन हाई स्कूलों तक पहुंचने के लिए बच्चों को साइकिल देना ताकि स्कूल और घर की दूरी घट सके.

बिलाशक, राज्य सरकार की इन कोशिशो ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया.

एनुएल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) के साल 2006 से 2014 के बीच के आंकड़े इस बात को साबित करते हैं कि स्कूली शिक्षा में दाखिले के स्तर पर बिहार ने ऊंची छलांग लगाई थी.

2006 में यह दर 72.2 फीसद थी, जो 2011 में 90.1 फीसद हो गई. 2006 में बिहार उन सात राज्यों में शुमार था जहां 11 से 14 साल की लड़कियों में दस से अधिक प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं जाती थीं. 2006 में बिहार में 17.6 फीसद लड़कियों का दाखिला स्कूल में नहीं हुआ था लेकिन 2014 में यह घटकर 5.7 फीसद और 2024 में घटकर 2.5 फीसद रह गया है.

बात इतनी ही नहीं रही, बीच में 2012-13 में पहली बार स्कूली दाखिले के मामले में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक हो गई थी.

एक अन्य आंकड़ा काफी सुखद रूप से चौंकाने वाला भी है. 2005 की दसवीं की परीक्षा में जहां छात्राओं की संख्या केवल 25,413 थी वहीं, 2025 की मैट्रिक-परीक्षा के पहले दिन की रिपोर्ट के अनुसार उस दिन उपस्थित कुल छात्रों में 8,18,122 लड़कियाँ थीं.
 
बिहार की साइकिल योजना का अनुकरण 7 अफ्रीकी देशों में किया जा रहा है
और संयुक्त राष्ट्र ने भी इसकी तारीफ की है

शिक्षा का नकद-नारायण

नीतीश कुमार की लोकप्रियता सिर्फ साइकिल बांटने वाली योजना तक सीमित नहीं है. मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना जन्म से लेकर स्नातक होने तक क्रमिक किस्तों में लड़कियों को सहायता देती है; जिसकी राशि 94,100 रुपए है। ग्रेजुएट पास करने वाली लड़कियों के लिए स्नातक-प्रोत्साहन की अलग कैटेगरी भी है।

मुख्यमंत्री स्नातक प्रोत्साहन योजना के तहत ग्रेजुएट होने वाली लड़कियों को 50 हजार रुपए का नकद प्रोत्साहन दिया जाता है, जबकि बारहवी पास करने वाली लड़कियों के लिए अलग कैटेगरी में 10 हजार रुपए की प्रोत्साहन दिया जाता है.

बिहार में लड़की की पढ़ाई अक्सर आर्थिक कारणों से छूट जाती थी, कॉपी-किताब से लेकर कॉलेज फीस तक हर पड़ाव पर मुश्किलें थीं। इस स्थिति को बदलने के लिए सरकार ने एक पूरा पैकेज तैयार किया. यह उस राज्य में बड़ा बदलाव था जहाँ माता-पिता अक्सर कहते थे, “लड़की है, ज़्यादा पढ़ाई का क्या फायदा?”

बहरहाल, अब जब डिग्री मिलने पर बैंक खाते में सीधा 50 हजार नकद आता है, तो परिवार का नज़रिया भी बदलता है। इसका राजनीतिक असर यह हुआ कि लाखों युवा महिलाएँ और उनके परिवार नीतीश कुमार को ‘लड़कियों का भविष्य सुरक्षित करने वाले नेता’ के रूप में देखने लगे।


आधी आबादी को सत्ता की चाबी

2006 में नीतीश कुमार ने पंचायतों में महिलाओं को 50 फीस आरक्षण दिया। यह कदम भारतीय राजनीति में पहली बार देखा गया था। इसका प्रभाव सिर्फ़ चुनावी नहीं था, इसने गाँवों की राजनीति को घरों तक पहुँचा दिया।

नीतीश कुमार के इस नीतिगत फैसले से हज़ारों महिलाएँ मुखिया, वार्ड सदस्य, जिला परिषद सदस्य बनीं। घर-गृहस्थी संभालने वाली महिलाएँ अब सार्वजनिक मुद्दों पर बोलने लगीं. स्थानीय सत्ता में महिलाओं की निर्णायक भूमिका बनी.

नतीजतन, ग्रामीण इलाकों की महिलाओं ने नीतीश कुमार को सिर्फ़ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व का निर्माता माना। उनका यह समर्थन आज भी कायम है।

महिला वोटरों के बीच नीतीश कुमार की इमेज अलग शराबबंदी की वजह से भी बनी है. सूबे की लाखों महिलाओं के घरों में शराबबंदी की वजह से शांति आई है. इसके अलावा, हर घर नल का जल, हर घर शौचालय, बिजली-कनेक्शन और गृह निर्माण सहायता जैसी योजनाओं ने नीतीश कुमार के लिए अपनी जाति-बिरादरी के बाहर महिलाओं का एक ऐसा वोटबैंक तैयार करने में मदद की, जो वोट देते समय जाति और धर्म नहीं देखती (या कम से कम नीतीश कुमार का यही दावा है)

नीतीश कुमार के साल 2000 में सात दिन और फिर 2005 के बाद से बिहार के हर चुनाव और हर सरकार में प्रासंगिक बने रहने के पीछे इसी नारीशक्ति का कमाल है.



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बुधवार, 12 मई 2021

बिहार में मुंडन-जनेऊ-ब्याह जीवन से ज्यादा जरूरी है

आज ट्विटर पर मधुबनी के किसी मित्र ने वहां के एक छोटे शहर सकरी के रामशिला अस्पताल के सामने मौजूद भीड़ की चार तस्वीरें चस्पां करते हुए लिखा है, “ये हालात हैं रामशिला हॉस्पिटल, सकरी मधुबनी के बाहर, हॉस्पिटल प्रशासन कह रहा है कि ऑक्सीजन ख़त्म हो गया है. आज का ऑक्सीजन बाकी है कल के लिए कुछ नहीं है. कृपया मदद करें बहुत लोगों की ज़िंदगी का सवाल है.”

बिहार में 4 मई, 2021 को कोविड संक्रमणों की सरकारी संख्या 14,794 थी. ठीक एक महीना पहले 4 अप्रैल, 2021 को यह संख्या 864 थी. महीने भर में सोलह गुना वृद्धि कैसे हुई? वह भी तब, जब टेस्ट कौन करा रहा है, कितने टेस्ट हो रहे हैं और टेस्ट से निकले नतीजे कितने भरोसेमंद हैं इसपर गहरा शक है. असल में, कुछ साल हुए जब न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने कहा था कि हिंदुस्तान के 90 फीसद लोग मूर्ख हैं, तो जनता तिलमिला गई थी. पर न्यायमूर्ति सही थे.

पूरे हिंदुस्तान की जनता काटजू साहब के मूर्खता के तराजू पर खरी उतरती है या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन मेरा गृहराज्य बिहार खरा उतरता है. पिछले डेढ़ दो महीनों में बिहार में सब कुछ हुआ है. जो-जो मुमकिन उत्सव हो सकते हैं. सब कुछ. सारे मांगलिक कार्य, जिसका नतीजा अमंगल में निकलना था. पिछले दो महीनों से प्रवासी बिहारी (सफेद और नीले कमीज पहनने वाले, दोनों) भेड़ियाधंसान करते हुए बिहार भाग रहे थे.

किसी के घर में मुंडन था, किसी के जनेऊ, कहीं भाई का ब्याह था, कहीं बहिन के हाथ पीले होने थे. कोई इसरार कर रहा था कि तुम्हारे बिना कैसे मुमकिन होगा, कोई कह रहा था कि तुम्हारी भांजी का ब्याह है, बारात कौन संभालेगा. एक मित्र ने मुझसे कहा कि उसके भाई का ब्याह है, अब तो दरभंगा में हवाई जहाज भी उतरने लगा है, सीधे आओ, मुजफ्फरपुर तक कार से आकर पार्टी में शामिल हो जाओ और फिर वापस. मेरे खुद के परिवार में विवाह था. मैंने एक सुर से विनम्रता से सबको मना किया, कुछ लोगों ने मुझ पर लानतें भेजीं, पर अधिकतर ने मुझसे रिश्ता तोड़ लिया.

यह सिर्फ मेरी बात नहीं है. आप सबके साथ, जिन्होंने कोविड प्रोटोकॉल का पालन अपने लिए, और देश के लिए किया होगा, ऐसा सहना पड़ा होगा. लेकिन खासतौर पर बिहार में शादी-ब्याह के न्यौतों में शामिल होने का न सिर्फ इसरार किया जा रहा है (अभी भी) बल्कि बाकायदा धमकी तक दी जा रही है उससे तो यही लगता है कि जनता वाकई भांग पीकर बैठी है.

मेरे एक वरिष्ठ राज झा, जो मशहूर विज्ञापन निर्माता हैं और एक साथी किसान-पत्रकार गिरीन्द्रनाथ झा हैं. राज झा मधुबनी के पास और गिरीन्द्र पूर्णिया के पास रहते हैं. उन दोनों ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट्स के जरिए बताया कि बिहार के लोग, कोरोना के प्रसार से जरा भी चिंतित नहीं हैं. बारातें निकल रही हैं, डीजे तेज आवाज में ढिंचक बज रहा है और भोज-भात पूरे शबाब पर है. बिहार में जिसतरह से कोरोना को लेकर लोग लापरवाह रहे हैं, उससे यक्ष-युधिष्ठिर वार्ता में यक्ष का प्रश्न याद आता है.

यक्ष ने पूछा था, आश्चर्य क्या है?

युधिष्ठिर ने कहा, लोग रोज अपने आसपास दूसरों को मरते देखते हैं, पर वह यह कभी नहीं सोचते कि कभी वह भी मर सकते हैं, यही आश्चर्य है.

लोग भले ही यह न सोचें कि कोरोना का संकट कितना गहरा हो सकता है, और उनकी यादद्दाश्त भी इतनी कमजोर है कि पिछले साल इन्हीं दिनों जब कोरोना की वजह से देशव्यापी लॉकडाउन लगा था तो लोगों को सड़को पर पैदल चलते हुए अपने घर लौटना पड़ा था. उन दर्दनाक तस्वीरों में सबसे ज्यादा पैदल प्रवासी बिहार के ही थे. पिछले साल का दर्दनाक मंजर बिहार भूल गया पर शायद वहां की सरकार वहां लोगों से अधिक संवेदनशील साबित हुई है. कम से कम इस बार तो जरूर.

लॉकडाउन की तैयारियों के ही मद्देनजर शायद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रवासियों को जल्दी लौट आने का आग्रह किया और एक ओर जहां, मिथिला, मगध और भोजपुर में ब्याह की शहनाइयां गूंज रही थी, स्पीकर फटने की हद तक डीजे का वॉल्यूम बढ़ा हुआ था, सरकार ने 15 मई तक लॉकडाउन की घोषणा कर दी है.

सच में, बिहार में लोगों ने ‘कोरोना आश्चर्य’ पेश किया है. मैंने मधुबनी जिले में जयनगर के पास दुल्लीपट्टी गांव के एक मित्र को जब फोन पर कहा कि सावधानी जरूरी है, क्योंकि बीमार पड़े तो बिहार में खस्ता स्वास्थ्य सुविधाओं के मद्देनजर ऑक्सीजन भी नहीं मिलेगा. पर दोस्त आत्मविश्वास से लबरेज थे. उन्होंने मुझे फौरन जवाब दिया कि बिहार में ऑक्सीजन की जरा भी कमी नहीं है. आपको कितना ऑक्सीजन चाहिए भला! आइए हमारे गांव... आम की गाछी (अमराई) में ऑक्सीजन ही ऑक्सीजन है.

न्यायमूर्ति काटजू वाकई आप सही थे. क्योंकि कम से कम बिहार निवासियों को यही लगता है कि दुनिया में जीवन से भी आवश्यक अपने चचेरे भाई के सबसे छोटे बेटे का मुंडन है.

रविवार, 14 जून 2020

सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी छोटे शहरों के सपनों के लिए झटका है

जानने वाले कहते हैं सुशांत सिंह राजपूत पूर्णिया के पास मलहारा नाम के किसी छोटी जगह के थे. मुंबई जैसी जगहों में, जहां मुंबई से बाहर की दुनिया बाहरगांव कही जाती है, मलहारा छोड़िए, पूर्णिया भी कम ही लोग जानते हैं. चमकदमक की उस दुनिया में सुशांत सिंह राजपूत पटनावाले कहलाते थे. सवाल यह नहीं है कि सुशांत पटना के थे या पूर्णिया के, महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि छोटे शहरों के प्रतिनिधि के रूप में, जो जाकर मुश्किल से मुश्किल चोटी पर परचम लहरा दे, एक चेहरा और कम हो गया है.

सुशांत सिंह राजपूत उन चेहरों का स्पष्ट प्रतीक थे, जो कुंअर बेचैन की इन पंक्तियों को परदे पर अपने गालों पर पड़ने वाले खूबसूरत गड्ढों और कातिलाना मुस्कान से सजीव करते थे.

दुर्गम वनों और ऊंचे पर्वतों को जीतते हुए,

जब तुम अंतिम ऊंचाई को भी जीत लोगे,

जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब,

तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में,

जिन्हें तुमने जीता है.

सुशांत सिंह राजपूत ने आज खुदकुशी कर ली. फोटोः ट्विटर

पर सुशांत सिंह राजपूत हैं से थे हो गए. फेसबुक पर उनके बारे में जब लिखा तो कई पाठकों ने टिप्पणी की कि काश, कोई 2020 के साल को इस डिलीट कर सकता!

राजपूत ने खुदकुशी की और अमूमन लोग खुदकुशी को कायरों का काम कह रहे हैं.

कुछ साल पहले भारतीय क्रिकेट टीम के विश्वविजयी कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के जीवन पर फिल्म बनी थी तो इन्हीं सुशांत सिंह राजपूत को रूपहले परदे पर धोनी का चेहरा बनाया गया था. चेहरा फिट बैठा था और फिल्म हिट हुई थी. इतिहास में अब जब तक महेंद्र सिंह धोनी का नाम रहेगा, परदे पर सुशांत सिंह राजपूत भी उनके चेहरे के प्रतिनिधि के रूप में जीवित रहेंगे.

सुशांत सिंह राजपूत के साथ दो विडंबनाएं हुईं. पहली, छोटे शहरों से आकर धाक जमाने वाले और दुनिया जीत लेने वाले जज्बे से भरे लोगों के एक प्रतीक पुरुष अगर खुद महेंद्र सिंह धोनी हैं, तो दूसरे प्रतीक खुद सुशांत सिंह राजपूत भी हैं. इसी तरह सुशांत सिंह राजपूत की एक और फिल्म छिछोरे भी आई थी.

फिल्म छिछोरे में वह अपने ऑनस्क्रीन बेटे के लिए प्रेरणा की तरह सामने आते हैं जो अवसाद में है. अपने उस बेटे को अवसाद से निकालने के लिए वह अपने सहपाठियों को खोज निकालते हैं. पर अपने जीवन के अवसाद, क्योंकि इस लेख के लिखे जाने तक कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुशांत सिंह राजपूत अवसाद में थे, को कम करने के लिए वह कुछ नहीं कर पाए.

क्या सुशांत सिंह राजपूत जैसे फिल्मी नायकों के इस कदर आत्महत्या करने का असर पड़ेगा? हिंदुस्तान जैसी जगह में जहां आगे बढ़ने की राह में तमाम किस्म की दुश्वारियां दरपेश होती हैं, जहां अपनी दसवीं का नतीजा जानने से लेकर ग्रेजुएशन में परीक्षा के लिए फॉर्म भरने तक किसी किरानी की जेब गर्म करनी होती है, जहां चौथी श्रेणी के छोटी-छोटी नौकरियों के लिए पीएचडी जैसी उपाधियां हासिल करने वाले हजारों लोग आवेदन कर देते हैं, जहां नौकरी के लिए हुई परीक्षा में घोटाले और भ्रष्टाचार के मामले नित दिन उजागर होते रहते हैं, वहां हमारे बच्चों को, खासकर छोटे शहरों और गांवो के लोगों को प्रेरणा कहां से मिलेगी?

यह प्रेरणा इन्हीं विजेताओं से आती है, जो कभी धोनी के रूप में, कभी जहीर खान के रूप में, कभी सुशांत सिंह राजपूत के रूप में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं. टीवी से शुरुआत करके सीढी-दर-सीढ़ी सिनेमा की संकरी दुनिया में अपनी जगह बनाना और उस में पैर जमाकर अपने लिए अच्छी भूमिकाएं हासिल करना खासी मशक्कत का काम है.

सुशांत सिंह राजपूत ने यह सब किया था. पर, आज उनकी आत्महत्या की घटना से उनको अपना आदर्श मानने वाला एक बड़ा तबका यह जरूर सोचेगा कि क्या इस भीड़ में जगह बनाकर आगे खड़े होने की जद्दोजहद इतनी जानलेवा है?

हो सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी के पीछे कोई और वजह हो. अवसाद न हो, निजी रिश्ते हों या शायद कोई ऐसा दवाब, जो जाहिर न किए जा सकते हो. पर, नायक होते ही से क्या जिम्मेदारी नहीं बढ़ जाती? भीड़ आपकी भूमिका पर सिर्फ तालियां बजाने नहीं आती, वह आपके किरदार का चोला ओढ़कर फिर अपने गांवो-कस्बों में उसे दूसरों तक ले जाती है.

संभवतया सुशांत सिंह राजपूत ने कुंअर बेचैन की कविता का बाकी आधा हिस्सा नहीं पढ़ा था, पढ़ा होता तो शायद हमारा मुस्कुराता हुआ बांका नायक हमारे बीच होता.

जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे,

और कांपोगे नहीं...

जब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क नहीं

सब कुछ जीत लेने में..

और अंत तक हिम्मत न हारने में.

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मंगलवार, 14 जनवरी 2020

नदीसूत्रः गंगाजल पाइपलाईन योजना बिहार सरकार का मायोपिक विजन है

एक तरफ गंगा खुद अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है, वहीं बिहार सरकार गंगा के 50 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी को गया भेजने के लिए भारी-भरकम योजना लेकर तैयार है. गया में भूजल स्तर सुधारने के दूसरे मुफीद तरीके अपनाने की बजाए गंगा का पानी गया तक लाने के पीछे मंशा आखिर क्या है?


सरकारें विकास की योजनाओं को लेकर किस कदर मायोपिक होती हैं इसकी ताजा मिसाल है बिहार सरकार की गंगा वॉटर लिफ्ट योजना. 18 दिसंबर की शाम बिहार सरकार की कैबिनेट की मंजूरी के बाद सूबे के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने फूले न समाते हुए ट्वीट कियाः "जल संसाधन मंत्रालय के प्रस्ताव को मिली कैबिनेट मंजूरी से आह्लादित हूं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जल जीवन हरियाली अभियान के तहत यह बहुमुखी और अनूठी योजना गंगा वॉटर लिफ्ट स्कीम गया, बोधगया और राजगीर जैसे शहरों में पेयजल मुहैया कराएगी."

नीतीश कुमार और संजय झा


उनका अगला ट्वीट अधिक सूचनाप्रद था जिसमें बिहार के जल संसाधन मंत्री ने बताया, "गंगाजल लिफ्ट स्कीम के पहले चरण का बजट 2836 करोड़ रुपए है और इससे गया को 43 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) और राजगीर को 7 एमसीएम पानी मुहैया कराया जाएगा. यह जल दोनों ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के दोनों शहरों की जरूरतों के लिहाज से पर्याप्त होगा."

झा का तीसरा ट्वीट यह बताने के लिए काफी था कि गंगा का पानी ही फल्गु नदी में श्रद्धालुओं के नहाने के लिए छोड़ा जाएगा. क्योंकि इस भारी-भरकम बजट वाली योजना का कुछ फायदा तो आम लोगों के लिए दिखना चाहिए था. झा के ट्वीट के मुताबिक, 'यह योजना बिहार सरकार की उस कोशिश का हिस्सा है जिसके तहत सरकार फल्गु नदी में साफ पानी उपलब्ध कराना चाहती है.'

सवाल है कि आखिर इस योजना को लेकर शक क्यों है?

शक इसलिए है कि फल्गु नदी को आखिर गंगा का पानी चाहिए ही क्यों? गया जिले में बारिश कम नहीं होती. मौसम विभाग के साइट पर जाएं तो आंकड़े बताते हैं कि गया के पूरे इलाके में औसतन बरसात 110 सेमी के आसपास होती है. लेकिन सचाई यह है कि गया नगर निगम के तहत आने वाले 70 फीसदी घरों में नल का पानी नहीं आता. पूरे जिले में भूजल तेजी से नीचे गिर रहा है.

यह स्थिति तब है जब गया में फल्गु नदी के साथ ही साथ पड़ोस में दो और नदियां, जमुनी और मोरहर मौजूद हैं. दो साल पहले गया के जिलाधिकारी संजय सिंह ने इन नदियों का पानी शहर तक पहुंचाने की योजना बनाई थी. पर इस योजना का नामलेवा कोई नहीं बचा. आखिर, सरकार पानी के नाम पर वाकई कुछ बड़ा करना चाहती थी.

बिहार सरकार भी कभी फल्गु को गंगा से जोड़ने तो कभी फल्गु को सोन नदी से जोड़ने को लेकर दुविधा में रही.

बहरहाल, गंगा का पानी 170 किलोमीटर लंबे पाइपलाईन के जरिए मोकामा से गया तक लाने का काम किसी को मछली देने जैसा है, जबकि मछली पकड़ना सिखाना बेहतर विकल्प होता. बिहार सरकार ने गया के पानी की समस्या को निबटाने के लिए गया के गिरते भूजल को सुधारने की योजना क्यों नहीं बनाई? खासकर तब, जब गया जैसे इलाके में तालाब और पोखरे बनाकर और वर्षा जल संचयन के जरिए भूमिगत जल का स्तर ठीक किया जा सकता था.

वैज्ञानिक मानते हैं कि पानी को आयात करना समस्या का महज फौरी निवारण ही है. वॉटरशेड मैनेजमेंट, यानी स्थानीय बारिश को रोककर रखना, उससे भूमिगत जल के स्तर को दुरुस्त करना और बारिश के पानी को रोककर शहर में उसकी आपूर्ति करना न सिर्फ दीर्घकालिक समाधान होता बल्कि पाइप लाईन बिछाने से अधिक सस्ता और त्वरित भी होता. सरकार को गया, राजगीर, नवादा जैसे इलाकों में अधिकाधिक तालाब खुदवाने चाहिए थे. इससे मछली उत्पादन भी बढ़ता, खेतों के सिंचाई के लिए भी पानी मिलता और कुओं में भी पानी आ जाता. साथ भी यह ध्यान भी रखना चाहिए था कि गया के इलाके में अभी भी अच्छी खासी खेती होती है, जो बिना पानी के मुमकिन नहीं है. गया का इलाका अभी भी बुंदेलखंड जैसी स्थिति में नहीं पहुंचा है. हां, नदियों को जोड़ना फैशन और चलन में आ गया है तो बात और है.

दूसरी तरफ, खुद गंगा अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है. अगर गर्मियों में उससे 50 एमसीएम पानी निकाल लिया जाएगा, तो खुद इसके पारितंत्र पर क्या असर पड़ेगा इसका क्या कोई अध्ययन बिहार सरकार ने कराया है?

असल में, सरकारों को लगता है कि नदी में पानी बहकर और बचकर निकल जाए तो वह पानी की बरबादी है. जबकि ऐसा है नहीं और मोकामा से अगर 50 एमसीएम पानी निकाल लिया जाएगा तो उसके आगे बड़ी मात्रा में नदी के बेड में गाद भी जमा होगी. क्या राज्य सरकार उसके लिए तैयार है?

गया के आसपास जिस तरह की धरती है वहां वॉटरशेड प्रबंधन बहुत कारगर भी साबित होता. पिछली गर्मियों में मिथिला क्षेत्र के दरभंगा और मधुबनी जैसे जिलों में भी अमूमन सालों भर पानी से भरे रहने वाले पोखरे सूख गए थे, वैसे में उनको जिलाने की कोई योजना सरकार की निगाह में नहीं है. पर, गंगा का पानी गया भेजने की योजना को जिसतरह फटाफट लागू करने की तैयारी है और जिस तरह से उसके लिए रकम भी जारी की गई है, उससे तो सरकार के विकास वाले विजन पर सवालिया निशान और भी गहरा ही हो गया है. 

हां, जद-यू का अगले साल के चुनावी मैदान का विजन स्पष्ट दिख जरूर रहा है.

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शुक्रवार, 8 नवंबर 2019

नदीसूत्रः पूर्णिया की सरस्वती बनने को अभिशप्त है सौरा नदी

ब्रिटिश छाप लिए शहर पूर्णिया में एक नदी है, सौरा. यह नदी बेहद बीमार हो रही है. सूर्य पूजा से सांस्कृतिक संबंध रखने वाली नदी सौरा अब सूख चली है और लोगों ने इसके पेटे में घर और खेत बना लिए हैं. भू-माफिया की नजर इस नदी को खत्म कर रही है और अब नदी में शहर का कचरा डाला जा रहा है.

पूर्णिया की सौरा नदी की एक धारा. फोटोः पुष्यमित्र

देश में नदियों के सूखने या मृतप्राय होते जाने पर खबर नहीं बनती. चुनावी घोषणापत्रों में अमूमन इनका जिक्र नहीं होता. बिहार को जल संसाधन में संपन्न माना जाता है और अतिवृष्टि ने बाजदफा लोगों को दिक् भी किया है. इस बार तो राज्य के उप-मुख्यमंत्री भी बेघर हो गए थे.

पर इसके बरअक्स एक कड़वी सचाई यह भी है कि एक समय में बिहार में लगभग 600 नदियों की धाराएं बहती थीं, लेकिन अब इनमें से अधिकतर या तो सूख चुकी हैं और अपना अस्तित्व खोने के कगार पर पहुंच चुकी हैं. नदी विशेषज्ञों का कहना है कि नदी की इन धाराओं की वजह से न केवल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया था, बल्कि इससे क्षेत्र का भूजल भी रिचार्ज होता था, लेकिन आज हालात बदल चुके हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ बिहार में ही लगभग 100 नदियां, जिनमें लखंदी, नून, बलान, कादने, सकरी, तिलैया, धाधर, छोटी बागमती, सौरा, फालगू आदि शामिल हैं, खत्म होने की कगार पर हैं.

पिछले नदीसूत्र में हमने सरस्वती का जिक्र किया था और आज आपको बता रहे हैं भविष्य की सरस्वती बनकर विलुप्त होने को अभिशप्त नदी सौरा का.

बिहार के भी पूरब में बसा है खूबसूरत शहर पूर्णिया, जो अब उतना खूबसूरत नहीं रहा. ब्रिटिश काल की छाप लिए इस शहर में एक नदी सौरा बहती थी. नदी बहती तो अब भी है, पर बीमार हो रही है. बहुत बीमार.

पूर्णिया में नदियों को बचाने के लिए अभियान चलाने वाले अखिलेश चंद्रा के मुताबिक, यह नदी लंदन की टेम्स की तरह थी, जो पूर्णिया शहर के बीचों-बीच से गुजरती थी, अब पूरी तरह सूख चुकी है और यहां अब शहर का कचरा डाला जा रहा है.

अखिलेश अपनी एक रिपोर्ट में लिखते हैं, कभी 'पुरैनियां' में एक सौम्य नदी बहती थी सौरा. कोसी की तरह इसकी केशराशि सामान्य दिनों में छितराती नहीं थी. जो 'जट' कभी अपनी 'जटिन' को मंगटिक्का देने का वादा कर 'पू-भर पुरैनियां' आते थे, उन्हें यह कमला नदी की तरह दिखती थी. जटिन जब अपनी कोख बचाने के लिए खुद पुरैनियां आती थी, तो गुहार लगाती थी, "हे सौरा माय, कनी हौले बहो...ननकिरबा बेमार छै...जट से भेंट के बेगरता छै...(हे सौरा माई, आहिस्ते बहिए. बच्चा बीमार है. जट से मुलाकात की सख्त जरूरत है)

...और दुख से कातर हो सौरा नदी शांत हो जाती थी.

अपने लेख में अखिलेश सौरा को 'जब्बर नदी' कहते हैं. जब्बर ऐसी कि कभी सूखती ही नहीं थी. पर बदलते वक्त ने, बदलती जरूरतों, इनसानी लालच और आदतों ने इसे दुबला बना दिया है. नदी का दाना-पानी बंद हो गया है. लोग सांस थामे इसे मरते देख रहे हैं. अखिलेश लिखते हैं, हमारी मजबूरी ऐसी है कि हम शोकगीत भी नहीं गा सकते!

असल में, बदलते भारत की एक विडंबना यह भी है कि हमने जिन भी प्रतीकों को मां का दर्जा दिया है, उन सबकी दुर्गति हो गई है. चाहे घर की बूढ़ी मां हो या गंगा, गाय और हां, पूर्णिया की सौरा नदी भी. इसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि हमें जिन प्रतीकों की दुर्गति करनी होती है, उसे हम मां का दर्जा दे देते हैं.

चंद्रा लिखते हैं कि पूर्णिया शहर को दो हिस्सों में बांटने वाली सौरा नदी को सौर्य संस्कृति की संवाहक है. पर पिछले कुछ वर्षों से इस पर जमीन के कारोबारियों की काली नजर लग गई. नतीजतन, अनवरत कल-कल बहने वाली नदी की जगह पर कंक्रीट के जंगल फैल गए हैं.

एक समय था जब सौरा नदी में आकर पूर्णिया और आसपास के इलाकों में सैकड़ों धाराएं मिलती थीं और इसकी प्रवाह को ताकत देती थीं, लेकिन अब ऐसी धाराएं गिनती की रह गई हैं. इन धाराओं के पेटे में जगह-जगह पक्के के मकान खड़े कर दिए गए. नतीजतन सौरा की चौड़ाई कम होती जा रही है.

हालांकि सौरा बेहद सौम्य-सी दिखने वाली नदी है, पर इसका बहुत सांस्कृतिक महत्व है. इसके नामकरण को लेकर अब भी शोध किये जा रहे हैं. लेकिन, यह माना जाता है कि सूर्य से सौर्य और सौर्य से सौरा हुआ, जिसका तारतम्य जिले के पूर्वी अंतिम हिस्से से सटे सुरजापुर परगना से जुड़ा रहा है.

पूर्णिया-किशनगंज के बीच एक कस्बा है सुरजापुर, जो परगना के रूप में जाना जाता है. बायसी-अमौर के इलाके को छूता हुआ इसका हिस्सा अररिया सीमा में प्रवेश करता है. यह इलाका महाभारतकालीन माना जाता है, जहां विशाल सूर्य मंदिर का जिक्र आया है. पुरातत्व विभाग की एक रिपोर्ट में भी सौर्य संस्कृति के इतिहास की पुष्टि है. वैसे यही वह नदी है, जहां आज भी छठ महापर्व के मौके पर अर्घ देने वालों का बड़ा जमघट लगता है.

अररिया जिले के गिधवास के समीप से सौरा नदी अपना आकार लेना शुरू करती है. वहां से पतली-सी धारा के आकार में वह निकलती है और करीब 10 किलोमीटर तक उसी रूप में चलती है. श्रीनगर-जलालगढ़ का चिरकुटीघाट, बनैली-गढ़बनैली का धनखनिया घाट और कसबा-पूर्णिया का गेरुआ घाट होते हुए सौरा जब बाहर निकलती है, तो इसका आकार व्यापक हो जाता है और पूर्णिया के कप्तानपुल आते-आते इसका बड़ा स्वरूप दिखने लगता है.

यह नदी आगे जाकर कोसी में मिल जाती है. एक समय था, जब सौरा इस इलाके में सिंचाई का सशक्त माध्यम थी. मगर, बदलते दौर में न केवल इसके अस्तित्व पर संकट दिख रहा है, बल्कि इसकी महत्ता भी विलुप्त होती जा रही है.

नदी के आसपास के हिस्से पर आज कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए हैं. पूर्णिया में सौरा नदी के पानी के सभी लिंक चैनल बंद हो गए. अंग्रेजों के समय सौरा नदी का पानी निकलने के लिए लाइन बाजार चौक से कप्तान पुल के बीच चार पुल बनाए गए थे. ऊपर से वाहन और नीचे से बरसात के समय सौरा का अतिरिक्त पानी निकलता चला जाता था. आज पुल यथावत है, पर उसके नीचे जहां नदी की धारा बहती थी, वहां इमारतें खड़ी हैं. इधर मूल नदी का आकार भी काफी छोटा हो गया है. नदी के किनारे से शहर सट गया है.

हालांकि सोशल मीडिया पर अब पूर्णियावासी सौरा को बचाने के लिए सक्रिय हो गए हैं. फेसबुक पर सौरा नदी बचाओ अभियान नाम का एक पेज बनाया गया है और पूर्णिया शहर के नाम पर बने पेज पर भी लगातार सौरा के बारे में लिखा जा रहा है. स्थानीय अखबारों की मदद से सौरा से जुड़े अभियानों पर लगातार लिखा जा रहा है और जागरूकता भी फैलाई जा रही है. पर असली मसला तो भू-माफिया के चंगुल से सौरा को निकालना है. और उससे भी अधिक बड़ा दोष तो एक इंच और जमीन कब्जा कर लेने की हम सबकी बुनियादी लालची प्रवृत्ति की तरफ जाता है.

सौरा को संजीवनी देनेवाली धाराओं के मुंह बंद किए जा रहे हैं. ऐसे में लग तो यही रहा है कि अगली पीढ़ी सौरा को 'सरस्वती' के रूप में याद करेगी और उसके अस्तित्व की तलाश करेगी. दुख है कि पूर्णिया की सौरा नदी अगली सरस्वती बन रही है.

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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

क्या उपेंद्र कुशवाहा नाकाम मौसम विज्ञानी साबित होंगे?

भारतीय राजनीतिक पत्रकारिता के हालिया शब्दावलियों में एक शब्द ने आजकल आया राम, गया राम जैसे पद का स्थान ले लिया है और वह हैः मौसम वैज्ञानिक. जाहिरा तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल रामविलास पासवान के लिए किया जाता है क्योंकि हवा के रुख को जितनी चतुराई से पासवान भांप जाते और इसी के मुताबिक आले पर दिया रख देते हैं, वैसी मिसाल कम ही है.

बिहार में कुशवाहा (पढ़ें, कोयरी, एक खेतिहर जाति) के स्वयंभू नेता उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने इस बार एनडीए का दामन छोड़कर महागठबंधन का पल्लू थाम लिया और उन्हें पांच सीटें मिल भी गईं. रालोसपा को इतनी अधिक सीटें मिलना एक तरह से साबित करता है कि कुशवाहा ने तेजस्वी से कड़ा मोलभाव किया होगा और तेजस्वी विपक्षी दलों के गठजोड़ को लेकर इतने बेचैन थे कि उन्होंने शर्तें मान भी लीं.

पर सियासी तौर पर शायद कुशवाहा ने थोड़ी अपरिपक्वता दिखा दी है. खासतौर पर तब, जब सीटें जीतना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो. ज्यादा वक्त नहीं बीता जब समता पार्टी में नीतीश कुमार के बाद कुशवाहा नंबर दो की कुरसी पर काबिज थे. 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद जब बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड, भाजपा से बड़ी पार्टी बनी थी तो नीतीश ने कुशवाहा को विपक्षी दल का नेता बनवा दिया था. उस वक्त कुशवाहा की राजनीतिक जमीन उतनी पुख्ता नहीं थी. कुशवाहा पहली बार साल 2000 में विधायक बने थे और पहली बार में ही वह विपक्षी दल के नेता बन बैठे. तब नीतीश कुमार ने कुशवाहा में शायद कोई सियासी समीकरण देख लिया था.

लेकिन, 2005 में राजद के खिलाफ बिहार में नीतीश की लहर चली तो उस लहर में भी एनडीए के उम्मीदवार रहे कुशवाहा चुनाव में खेत रहे.

इस घटना ने नीतीश को कुशवाहा से दूर कर दिया. उपेंद्र कुशवाहा मत्री बनना चाहते थे पर जदयू ने उनकी जगह संगठन में तय कर दिया. पर शायद यह कुशवाहा को अधिक भाया नहीं और 2006 में वह राकांपा में शामिल हो गए.

हाल में, एनडीए से अलग होने पर बंगला खाली करने पर कुशवाहा ने विरोध प्रदर्शन किया था और लाठी चार्ज में कुशवाहा को चोट भी आई थी. उनकी जख्मी हालत में तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब देखी-दिखाई गई. पर कुशवाहा का यह पैंतरा पुराना है. 2005 में चुनाव हारने के बावूजद, कुशवाहा विरोधी दल के नेता के तौर पर मिले बंगले में तीन साल तक काबिज रहे थे और 2008 में उनसे जबरिया यह बंगला खाली करवाना पड़ा था. उस वक्त भी उनकी तब की पार्टी राकांपा ने बिहार में धरना-प्रदर्शन किया था. तब भी बंगला खाली करने को इन्होंने कोयरी समाज के अपमान से जोड़ दिया था.

पर, कुशवाहा के कामकाज से राकांपा प्रमुख शरद पवार कत्तई संतुष्ट नहीं थे और 2008 में पवार ने न सिर्फ कुशवाहार को पार्टी से बर्खास्त कर दिया बल्कि पार्टी की बिहार इकाई को ही भंग कर दिया. तब कुशवाहा ने अपनी नई पार्टी गठित की थी. नई पार्टी कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाई और कुशवाहा राजनीतिक बियाबान में चले गए. 2010 के विधानसभा चुनावों में जद-यू के तब के अध्यक्ष और कभी नीतीश के प्रिय पात्र ललन सिंह और नीतीश में खटपट हुई और ललन सिंह ने पार्टी छोड़ दी. मौका भांपकर कुशवाहा नीतीश की छत्रछाया में लौट आए. पर 2012 में ललन सिंह की पार्टी में वापसी के साथ ही कुशवाहा ने न सिर्फ पार्टी छोड़ी और राज्यसभा से भी इस्तीफा दे दिया.

फिर अस्तित्व में आई राष्ट्रीय लोक समता पार्टी यानी रालोसपा. 2014 में जब नीतीश की भाजपा के साथ कुट्टी हो गई थी तब कुशवाहा ने एनडीए में जुड़ जाना बेहतर समझा. नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर में एनडीए ने रालोसपा को तीन सीटें दी और पार्टी तीनों जीत गई. हैरतअंगेज तौर पर सीतामढ़ी सीट से कुशवाहा ने अज्ञातकुलशील राम कुमार शर्मा को टिकट दिया जो एक गांव के मुखिया भर थे. आज भी यह रहस्य ही है कि कुशवाहा ने एक मुखिया को सीधे सांसदी का टिकट कैसे दे दिया.

2015 में विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे में काफी कलह के बाद कुशवाहा की पार्टी महज 2 सीटें ही जीत पाई. खुद अपने कुशवाहा समाज का वोट भी वे एनडीए में ट्रांसफर करा पाने में नाकाम रहे.

अब जबकि, कुशवाहा को पांच सीटें मिल चुकी हैं और उन पर उनकी ही पार्टी के नेता टिकट बेचने तक का आरोप लगा चुके हैं...यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि क्या उपेंद्र कुशवाहा ने सीटों की संख्या बढ़ाने के लालच में जीतने लायक सीटें छोड़ दी हैं?

सियासी हवा का रुख भांपने में माहिर पासवान एनडीए में ही बने हुए हैं और ओपिनियन पोल भी जो आंकड़े दे रहे हैं वह बिहार में महागठबंधन के लिए बहुत उत्साहजनक तस्वीर पेश नहीं कर रही. खुद रालोसपा तीनेक सीटें जीत भी जाए और खुदा न खास्ता केंद्र में एनडीए सरकार ही बनी तो फिर उपेंद्र कुशवाहा 23 मई के बाद क्या करेंगे?



सोमवार, 5 नवंबर 2018

बिहार में भाजपा जद-यू के आगे क्यों झुकी?

एक और सहयोगी को खो बैठने के डर से बिहार में भाजपा 2019 के लिए संसदीय सीटों की नीतीश की मांग के आगे झुकी 

बिहार के मामले में आखिरकार, भाजपा और उसके अध्यक्ष अमित शाह को नरम होना पड़ा. अमित शाह और जद (यू) प्रमुख और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह घोषणा की कि वे बिहार में 2019 लोकसभा चुनाव में बराबर सीटों पर लड़ेंगे. सीटों पर बराबरी की यह बात गौर से देखें तो साफ लगता है कि भगवा पार्टी काफी झुक गई. फिलहाल राज्य में उसके पास लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें हैं. जीत के लिहाज से उसे सीटें ज्यादा मिलनी चाहिए थीं.

राज्य में 2014 में भाजपा को 40 में से 22 पर जीत मिली थी, जबकि अकेले लडऩे वाले जद (यू) को सिर्फ दो सीटें हासिल हुई थीं. नए तालमेल का मतलब यह है कि भाजपा के कम से कम पांच मौजूदा सांसदों का टिकट कट सकता है. राज्य में एनडीए के पास फिलहाल 33 सीटें हैं, जिनमें रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के पास छह और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के पास तीन सीटें हैं.

खबर है कि भाजपा को यह घोषणा करने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि नीतीश कुमार ने गठबंधन की किसी भी बैठक में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था. मौजूदा गणित में भाजपा और जद-यू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी. इस तरह लोजपा के लिए सिर्फ चार और आरएलएसपी के लिए सिर्फ दो सीटें बचेंगी. आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा तो खुलकर खीर बनाने की कोशिशें करते नजर आ सकते हैं. दो सीटों के विकल्प के साथ उनके पास नाक बचाने के लिए एनडीए छोड़ने के सिवा ज्यादा चारा है नहीं.

भाजपा के झुकने की वजह यह मानी जा रही है कि बिहार में अच्छे नतीजों के लिए भाजपा नीतीश कुमार पर निर्भर है. तो क्या यह माना जाए कि चंद्रबाबू नायडू के कांग्रेस के पाले में चले जाने के बाद भाजपा नहीं चाहती कि नीतीश से उनका ब्रोमांस खत्म हो जाए.

बिहार में नीतीश अपरिहार्य हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि 2005 से 2015 के बीच (सिर्फ 2014 में नरेंद्र मोदी लहर को छोड़ दें तो) हुए चार विधानसभा और दो लोकसभा चुनाव के दौरान जीत उसी धड़े को हासिल हुई जिसकी तरफ नीतीश कुमार थे. साथ ही यह बात भी समझिए कि 2014 में जहां भाजपा मोदी लहर और सत्ताविरोधी रूझान को साथ लेकर उड़ रही थी अब 2019 में हमें उसे खुद सत्ताविरोधी रुझान का सामना करना है. जनता के एक तबके में मोदी से मोहभंग जैसा माहौल भी है, उससे निपटना भी आसान नहीं होगा.

शायद यही वजह है कि भाजपा ने बिहार में एनडीए के लोकसभा अभियान का नेतृत्व नीतीश को सौंप दिया है. उत्तर प्रदेश में लोकसभा उपचुनावों में भाजपा की हार और मोदी लहर के ठंडे पड़ते जाने से भगवा पार्टी के पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है. इसके साथ ही कीर्ति आजाद जैसे कई कमजोर खिलाड़ियों का पत्ता साफ हो सकता है. दरभंगा के मौजूदा सांसद आजाद वैसे भी अरूण जेटली की हिट लिस्ट में हैं. आजाद उन पांच भाजपा सांसदों में होंगे जिनकी जगह जद-यू के किसी प्रत्याशी को दी जा सकती है. संजय झा जद-यू के महासचिव और नीतीश कुमार के काफी करीबी हैं.

जो भी हो, फिलहाल भाजपा ने ध्वज नीतीश के हाथों में पकड़ा दिया है.

बुधवार, 9 मई 2018

विकास की दौड़ में मिथिला को नेहरू ने दिया था उपेक्षा का दंश

सन 2008 में जब कोसी में बाढ़ की वजह से मिथिला का एक बहुत बड़ा हिस्सा तबाह हुआ था, उस समय द टेलिग्राफ के स्वनामधन्य पत्रकार विजय देव झा ने कोशी पर एक ब्लॉग लिखा था कि कैसे स्वतंत्रता से पूर्व और यहां तक की बाद में दिल्ली और बिहार की सरकार ने मिथिला को कोसी की तबाही से जूझने के लिए बेसहारा छोड़ दिया था. इस आलेख पर पत्रकार हितेंद्र गुप्ता की नजर पड़ी और उन्होंने अपने ब्लॉग हेलो मिथिला में इसे छापा था.

इस लेख में घोघरडीहा के सरौती गाँव के कवि मोहम्मद अब्दुल रहमान की चर्चा की थी. इनके बारे में जानकारी विजयदेव झा को उनके बाबूजी डॉ रामदेव झा ने दी थी.

स्वतंत्रता से कुछ साल पहले कोशी की विभीषिका पर मोहम्मद अब्दुल रहमान ने काव्य रचना की थी जिसका नाम था "अकाल का हाहाकार उर्फ कोशी की तूफान".  रहमान जी ट्रेन में अपनी किताबें बेचते थे इस किताब पर अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था क्योंकि इन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से अंग्रेज़ी सरकार की पोल खोल दी थी. यह पुस्तिका कोशी की विभीषिका पर आधारित थी.

उसी समय श्री दिनेश मिश्रा कोशी पर एक पुस्तक लिख रहे थे इस आलेख पर उनकी नजर पड़ी उन्होंने विजय से  यह जानने के लिए संपर्क किया कि क्या मोहम्मद रहमान की वह किताब वह कहीं से मिल सकती है. 
आकाल का हाहाकार उर्फ कोशी की तूफान, साभारः विजयदेव झा


8 साल बाद वह दुर्लभ पुस्तिका विजयदेव जी को बाबूजी के संकलन से मिली. इसमें से एक कविता इस प्रकार से थीः

"दौड़ू दौड़ू हो सरकार

प्रजा सब दहाइए भैया कोशी के मझधार।।

चारू कात से कोशी माता घेरलक घर वो द्वार।

भागै के नै रास्ता छोड़लक काने काश्तकार।।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाते हैं जिन्होंने पूरे देश में कल कारखाने और बांध का जाल बिछाया. मिथिला के बच्चे भी पाठ्यक्रम में यही पढ़ा करते हैं. लेकिन आधुनिक भारत के निर्माता का संसाधन और संकल्प मिथिला तक आते आते समाप्त हो चुका था जिसकी कई वजहें थी.

देश की आजादी के तुरंत बाद पंजाब में अकाल का साया मंडराने लगा और उसी समय विशाल भाखड़ा नांगल डैम का निर्माण हुआ था.

मिथिला का कोशी की विभीषिका से कोई नया रिश्ता नहीं है. सरकार के पास भाखड़ा नांगल डैम बनाने के लिए पैसे तो थे लेकिन जब कोशी पर बांध बनाने की बात आई तो सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पैसे नहीं है इसलिए लोग श्रमदान कर बांध बना लें.

उस समय मिथिला राज्य के लिए आंदोलन करने वालों में अग्रणी मिथिला विभूति डॉ. लक्ष्मण झा ने चर्चा की थी कि ब्रिटिश सरकार ने जाते-जाते नेशनल डिजास्टर फंड के अंतर्गत कोशी पर बांध बनाने के लिए पैसे दिए थे जिसे नेहरू ने भाखड़ा नांगल डैम बनाने केेेे लिये डाइवर्ट कर दिया. लोगों में भारी आक्रोश था. इस काम के लिए पंडित नेहरू ने अपने वित्त मंत्री गुलजारी लाल नंदा को लगाया. उस समय अखबारोंं में गुलजारीलाल नंदा केे कई बयान छपे थे जिसमें उन्होंने मिथिला के लोगों से अपील की थी कि वे श्रमदान के माध्यम से बांध बनाएं क्योंकि सरकार के पास इतने पैसे नहीं हैं.

1954 में बांध बनाने के लिए ब्रह्मचारी श्री हरि नारायण के नेतृत्व में भारत सेवक समाज की स्थापना हुई और कोशी के कुछ हिस्सों पर लोगों ने खुद ही श्रमदान कर बांध बनाया था.

श्रमदान की शुरुआत मिथिला के 150 पंडितों के द्वारा हुई जिन्होंने वैदिक मंत्र और कोशी महात्म्य आदि के साथ विधिवत पूजा-पाठ करने के बाद कुदाल और फावड़ा उठाया. उस समय मिथिला के गणमान्य साहित्यकार और बुद्धिजीवियों ने लोगों की सहभागिता के लिए जनजागरण अभियान चलाया था.

स्कूली बच्चे, कॉलेज के छात्र, युवा, बुजुर्ग सभी बांध बनाने के अभियान में जुटे थे. कोशी क्षेत्र में कई जगह श्रमदान शिविर बने. मिथिला के विभिन्न कोने से लोग बांध बनानेेे के लिए पहुंच रहेे थे और कुछ एक वर्षों के अथक मेहनत के बाद भुतहा, कुनौली, महादेव मठ, डुमरा आदि कोशी के प्रवाह क्षेत्र में बांध बनकर तैयार हुआ.

लेकिन यह मिथिला के लोगों के लिए एक कटु अनुभव था कि आजादी से पूर्व ब्रिटिश सरकार ने मिथिला को अविकसित और अकिंचन बनाकर रखा था और आजादी के बाद भी अपनी सरकार मिथिला भूभाग के साथ सौतेला व्यवहार करती है. ललितेश्वर मल्लिक ने उस समय कोशी पर एक विशद पुस्तक प्रकाशित किया था. बाद में मिथिला के लोगों ने नेहरूजी को सड़ा आम उपहार में भेजा था.

प्रकृति के साथ साथ सरकारों ने भी मिथिला को क्षत-विक्षत और विभाजित करने में कोई कोताही नहीं की. एक योजना के तहत मिथिला के कोशी प्रक्षेत्र को शेष मिथिला भूमि से अलग-थलग रखा गया. कोशी हर एक साल अपना रास्ता बदलती रही और वह अपना रास्ता बदलते-बदलते पूर्णिया से दरभंगा तक पहुंच गई.

15 जनवरी, 1934 के भूकंप के बाद कोशी दरभंगा की तरफ आ गई. इस भूकंप ने मिथिला के रेल और सड़क यातायात को बुरी तरह से प्रभावित किया. निर्मली-सुपौल रेल लाइन क्षतिग्रस्त हो गयी. इस रेल लाइन को कभी भी दुरुस्त नहीं किया गया. इसका यातायात पर ऐसा असर पड़ा कि दरभंगा से सहरसा की दूरी तय करने में लोगों को 24 घंटे का समय लगताा था. बाद में तत्कालीन रेलवे मंत्री ललित नारायण मिश्र ने जानकी एक्सप्रेस चलाई जो लंबी परिक्रमा करने के बाद सहरसा पहुंचती थी, इसमें भी करीब 16 घंटे का समय लगता था. लेकिन देखा जाए तो दरभंगा और सहरसा की दूरी महज घंटे ढाई घण्टे की है.

मिथिला क्षेत्र अभी भी औपनिवेशिक त्रासदी से बाहर नहीं निकल पाया है. ब्रिटिश सरकार से लेकर स्वतंत्र भारत की सरकारों ने मिथिला को खंड-खंड में बांटकर रखने की पॉलिसी पर ही काम किया. सरकार योजनाबद्ध तरीके से मिथिला को धीरे-धीरे टुकड़ों में बांट रही है. मिथिला की जगह मिथिलांचल, पूर्णिया के इलाकों को सीमांचल भागलपुर के इलाकों को अंगिका मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और अब दरभंगा को भी बज्जिका क्षेत्र कहकर संबोधित किया जा रहा है जबकि ये सभी मिथिला के अखंड भाग हैं. 

कोसी क्षेत्र को मिथिला से अलग-थलग करने के पीछे भी यही राजनीति थी कि कालक्रम में इसे शेष मिथिला से अलग कोशिकांचल के रुप में स्थापित किया जाए. मिथिला के विभाजन के दर्द को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने समझा. कोसी महासेतु का निर्माण हुआ, सड़क मार्ग बने और रेल लाइन पुनर्निर्माण को सहमति दी गई.

यद्यपि मिथिला के लोगों ने अटल बिहारी वाजपेयी को लोकसभा चुनाव में मिथिला से ऐसा रिटर्न गिफ्ट दिया कि भविष्य में कभी भी किसी भलेमानस राजनेता की हिम्मत नहीं होगी कि वह मिथिला के हित के लिए कुछ करे.

मोहम्मद अब्दुल रहमान के पीछे अंग्रेज सरकार बुरी तरह पड़ गई थी. बाद में उन्होंने पाचक बेचना शुरू कर दिया लेकिन वह लोगों को कोशी की विभीषिका की कहानी बताते रहे. 1961 में विजयदेव झा के बाबूजी ने मिथिला मिहिर में रहमान पर एक विस्तृत लेख लिखा था. 

राजनीतिक मकड़जाल और उदासीनता के बीच मैथिल समाज मेमोरी लॉस के उस उच्चतम स्टेज तक पहुँच चुका है जहाँ उसे कुछ भी याद नहीं.

(यह लेख मूल रूप से विजयदेव झा के फेसबुक पेज से लिया गया है और उसे थोड़ा संपादित भर किया गया है)

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

ज़बानी पकौड़े के दौर में मिथिला का तरूआ है सदाबहार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोजगार का जिक्र करते हुए पकौड़े का नाम क्या लिया, सड़क से लेकर संसद तक हर तरफ पकौड़ा प्रकरण चर्चे में आ गया. इस बयान के लिए कोई तंज कर रहा है, कोई आलोचना. कोई समर्थन में है तो कोई मुखालफत में. मुखालफत में किसी ने पकौड़े की दुकान लगा ली, किसी ने पकौड़ा छानते हुए हाथ जला लिए.

लेकिन, सोशल मीडिया पर चल रही चटखारेदार चर्चा, तमाम राजनीति और आलोचनाओं को किनारे कर दें तो इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि पकौड़े वास्तव में देश के लगभग हर हिस्से में बहुतों को रोजगार दे रहे हैं और उनके परिवार का पेट भर रहे हैं.

पर आज हम पकौड़े के जिस भाई से आप का परिचय करवा रहे हैं वह असल में पकौड़े जैसा दिखता तो है लेकिन यह है मिथिला का तरूआ. इसको बनाने की विधि भी अलग है और किन सब्जियों से तरूआ बनता है उसका रेंज तो खैर विविधता भरा है ही.

इससे पहले की मैं आपको मिथिला के खान-पान के महत्वपूर्ण हिस्से तरूआ से परिचय करा दूं उससे पहले मैं मिथिला के खान-पान के बारे में एक लोकोक्ति बता दूं. मिथिला में खान-पान की संस्कृति में तीन चीजों का होना बेहद जरूरी हैः मिथिलाक भोजन तीन, कदली, कबकब मीन

यहां कदली यानी केला, कबकब यानी ओल या सूरन, और मीन यानी मछली. लेकिन यह जो ओल है उसे तलकर पकौड़े की तरह भी य़ानी तरूआ बनाकर भी खाया जाता है. शायद अचंभा लगे पर मिथिला के भोजन भंडार का यह तो महज एक नमूना है.

तरूआ को लेकर एक अन्य लोकगीत है,

भिंडी भिनभिनायत भिंडी के तरुआ,

आगु आ ने रे मुँह जरुआ

हमरा बिनु उदास अछि थारी,

करगर तरुआ रसगर तरकारी

पूरा अर्थ न जानिए बस इतना ध्यान रखिए कि इस गीत में भिंडी से लेकर काशीफल तक के तरूए का जिक्र है.

तरूआ तो तकरीबन सभी सब्जियों का बनता है. आलू, बैंगन, गोभी, लौकी, कुम्हड़ा (काशीफल), परवल, खम्हार, ओल (सूरन), अरिकंचन (अरबी के पत्ते). लेकिन मिथिला में अतिथि के सत्कार में सबसे महत्वपूर्ण तरूआ होता है तिलकोर का. तिलकोर एक किस्म का कुंदरू जैसे फल का पत्ता होता है, जिसके औषधीय गुण भी होते हैं.

मिथिला में तिलकोर की बेल आपको हर घर की बाड़ी में मिल जाएगा. जानकारों का दावा है कि तिलकोर टाईप वन डायबिटीज के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का रामबाण है. मैथिल लोग बताते हैं कि तिलकोर के नियमित सेवन से पेनक्रियाज से इंसुलिन का स्राव नियमित हो जाता है.

बहरहाल, मिथिला में तिलकोर ही नहीं बाकी सब्जियों का तरुआ बनाने की विधि तकरीबन एक जैसी है. इसके लिए अमूमन बेसन या चावल के आटे (जिसको मैथिली में पिठार कहा जाता है) का इस्तेमाल किया जाता है. मिसाल के तौर पर आलू के तरुए की बात की जाए तो उसे पतले टुकड़ों में स्लाइस की तरह काटकर रख लिया जाता है. इस तरह जैसे कि चिप्स के लिए काटा जाता है. बेसन फेंटकर उसमें नमक हल्दी मिला दी जाती है. अगर इच्छा हो तो थोड़ी लाल मिर्च का पाउडर भी. नमक आप स्वाद के मुताबिक डाल सकते हैं.

फिर आलू के फ्लेक को उस बेसन में डुबोकर कड़कते तेल में तल लिया जाता है. आंच धीमी रखने से तरूआ अच्छे से पकता है. ऐसा ही, बैंगन और तिलकोर समेत अन्य सब्जियों के लिए भी किया जाता है.

तो अगली दफा आप जब भी किसी मैथिल दोस्त से मिलें तो उससे तरूआ खाने की फरमाईश जरूर करें. लेकिन याद रखिए, तरूआ तरूआ है, यह पकौड़ा नहीं है.

***

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

ठर्रा विद ठाकुरः एवरीबडी लव्स अ गुड बाढ़

एवरीबडी लव्स अ गुड बाढ़
ठर्रा विद ठाकुरः दूसरी किश्त 
(डिस्क्लेमरः पाठक अपना पव्वा-चखना साथ लाएं)

गुड्डू भैया पूरे ताव में थे. अपने छप्पर पर खड़े होकर जितना लाउडस्पीकर हुआ जा सकता था उतना होकर कृष्ण कल्पित की सूक्तिय़ों को चीखकर गा रहे थेः

स्वप्न है शराब!
जहालत के विरुद्ध
गरीबी के विरुद्ध
शोषण के विरुद्ध
अन्याय के विरुद्ध
मुक्ति का स्वप्न है शराब!

भाई गुड्डू आपने शराब को मुक्ति का स्वप्न बता दिया? गुड्डू ने इशारा किया कि 'इनकिलास जिंदाबाघ' कहने के लिए फूस की छत से मुफीद जगह कोई नहीं. गुड्डू आम आदमी थे और उनकी छत ही उनका मंच थी. हालांकि उनकी छत उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि नीचे बाढ़ के पानी ने गजब का समां बांध रखा था और उनके घर का हर बरतन मछली हो चला था.

गुड्डू भैया तो महज नुमाइंदे हैं, जो यह सब झेल रहे हैं, वरना गुजरात, असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा समेत देश के 26 राज्य और केंद्रशासित क्षेत्र बाढ़-बारिश की चपेट में हैं और 508 जानें जा चुकी हैं, देश की 2.8 लाख हेक्टेयर फसली जमीन बाढ़ से आई आपदा की चपेट में है और 63 लाख से ज्यादा घर क्षतिग्रस्त हो गए हैं. सबसे ज्यादा जान-माल का नुक्सान इस बार गुजरात को उठाना पड़ा, जहां 200 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है.

ऐसा कैसे कह सकते हैं भिया?

गुड्डू ने जांघ पर जोर से तलहत्थी मारते हुए कहाः अपनी क्या औकात रे ठाकुर. इ तो कैग कह रहा है.

मेरा मन खिन्न हो गया. आदमी हर काम के लिए सरकार को दोषी क्यों ठहराता है? क्यों गुड्डू भिया, सरकार ने बाढ़ की सूचना देने के लिए टेलीमीट्री स्टेशन नहीं बनाए हैं?

बोतल में बची आखिरी बूंद को बोतल उल्टा करने के बाद उसे जीभ से हिलकोर कर चाटते हुए गुड्डू बोलेः बनाया क्यों नहीं है ठाकुर...बनाया तो है. लेकिन करीब 60 फीसदी स्टेशन काम ही नहीं कर रहे हैं. बारहवीं पंचवर्षीय योजना में 219 टेलीमीट्री स्टेशन लगाए जाने का लक्ष्य था. 2016 तक सिर्फ 56 स्टेशन ही लगाए गए. कुल 375 टेलीमीट्री स्टेशनों में से 222 ठप पड़े हैं, तो रियल टाइम डेटा के लिए एक ही जगह बचती हैः भगवान इंद्र का दफ्तर.

मैं अभी बहस खत्म करने के मूड में नहीं था. मैंने कहा गुड्डू भिया, तो क्या बाढ़ खत्म करने के लिए कोई उपाय नहीं किया गया है?

गुड्डू मेरी तरफ मुड़कर चुप हो गए. दो मिनट तक के नाटकीय सिनेमाई साइलेंस के बाद फूटेः शराब छोड़ दी तुमने कमाल है ठाकुर/ मगर ये हाथ में क्या लाल-लाल है ठाकुर

मेरे मुंह से वाह निकलने ही वाला था कि उन्होंने हाथ से रोक दिया. मेरे लिए वाह न करो, जाकर राहत इंदौरी के लिए वाह करो. उन्हीं का है.

मैं चुप.

देखो, संकट असल में पानी का नहीं, संवेदनशीलता का है. राज्य सरकारें और केंद्र एक पटरी पर चलते ही नहीं. अगस्त से लेकर सितंबर 2011 तक 20 दिनों में छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भारी बारिश से महानदी का जलस्तर बढऩे की चेतावनी केंद्रीय जल आयोग ने कई बार जारी की थी लेकिन बांध के अफसरों ने ध्यान नहीं दिया और सितंबर में भारी बाढ़ आ गई, जिससे ओडिशा के 13 जिले प्रभावित हुए और दो हजार करोड़ रु. का आर्थिक नुकसान हुआ.

2014 में यही कहानी फिर दोहराई गई. नतीजा भी वही रहाः महानदी बेसिन में बाढ़ आ गई. जून 2013 में उत्तराखंड में अलकनंदा में बाढ़ की कोई पूर्वसूचना नहीं दी गई. मार्च 2016 तक 4,862 बड़े बांधों में से मात्र 349 (7 फीसदी) के लिए ही इमरजेंसी ऐक्शन प्लान/डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान तैयार किया गया. इनमें से भी 231 (पांच फीसदी) में ही ऑपरेटिंग मैनुअल तैयार किया गया. उत्तर प्रदेश के 115 में से सिर्फ 2, मध्य प्रदेश के 898 में 2, महाराष्ट्र के 1,693 में से 181 जबकि ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा, हरियाणा ने कोई इमरजेंसी ऐक्शन प्लान बनाया ही नहीं. 17 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में से सिर्फ दो ने मॉनसून के पहले और बाद में बांधों का पूरी तरह निरीक्षण कराया जबकि 12 राज्यों में किसी तरह का कोई निरीक्षण नहीं हुआ.

मेरा मन दुखी हो गया. तो क्या बाढ़ से बचा नहीं जा सकता?

देखो, बाढ़ कत्तई नुकसानदेह नहीं. खेतों के लिए तो फायदेमंद है. लेकिन तब, जब जान-माल सुरक्षित बना लिया जाए. फिर भी, जानलेवा बाढ़ से बचने के उपायों में कई अड़ंगे हैं, जैसे बांध सुरक्षा विधेयक 2010 से लटका हुआ है. राष्ट्रीय जल नीति के अलावा महकमे बहुत बन गए हैं, जैसे केंद्र सरकार के अधीन-केंद्रीय जल आयोग, गंगा फ्लड कंट्रोल मिशन (1972), ब्रह्मपुत्र बोर्ड (1980), राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (1976), टास्क फोर्स (2004) नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी और राज्यों में स्टेट टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी, राज्य बाढ़ नियंत्रण बोर्ड आदि, फिर भी बाढ़ का पानी हर साल सिर चढ़कर बोलता है.

गुड्डू भैया इस बीच फूस की छत से उतर गए थे. और मेरी नाव पर आकर चढ़ गएः ठाकुर, पत्रकार आदमी हो, थोड़ी-थोड़ी पिया करो. सुनो कल्पित की ही बात, खासकर तेरे लिए,

देवदास कैसे बनता देवदास
अगर शराब न होती.
तब पारो का क्या होता
क्या होता चंद्रमुखी का
क्या होता
रेलगाडी की तरह
थरथराती आत्मा का?
बाढ़ उतर जाए, तो अगले हफ्ते आना. काले चने की घुघनी (छोले) के साथ हंडिया पीने की कला सिखाऊंगा. चलो, एक पटियाला बना दो अभी. 

(यह लेख आईचौक.कॉम में प्रकाशित हो चुका है)

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

बिहारः क्या शरद पर आएगा वसंत?

नीतीश के पाला बदलने और आनन-फानन में शपथ-ग्रहण करके भाजपा के साथ सरकार बना लेने पर कुछ सवाल उठने लाजिमी है. पहला स्वाभाविक सवाल तो यही उठता है कि आखिर नीतीश प्रधानमंत्री द्वारा किए गए डीएनए वाले बिहारी अस्मिता पर चोट से आहत थे वह फिर से भाजपा की शरण में क्यों आ गए. सवाल है कि आखिर भाजपा ने नीतीश को अपने पाले में क्यों करना चाहा? क्या 2019 के लोकसभा में उसे बिहार में आधार खिसकने का इतना डर था? तीसरा सवाल है कि आखिर नीतीश के विरोधी माने जाने वाले और महागठबंधन से बाहर निकलने की मुखालफत करने वाले शरद यादव का क्या होगा?

चूंकि मोदी युग के उदय के बाद मोदी-शाह के अश्वमेघ यज्ञ में सिर्फ बिहार और दिल्ली विधानचुनाव ही असली कांटे साबित हुए हैं और बिहार का झटका ज्यादा बड़ा था जिसमें भारत की पिछड़ी जातियों के दो बड़े नेता शामिल थे और मंडल से जुड़े हुए थे. ऐसे में बिहार में मोदी की सत्ता स्वीकार्यता का एक विशेष अर्थ है और मोदी की सर्व-व्यापकता की तस्वीर बिना बिहार में एनडीए की सत्ता के पूरी नहीं होती थी. ऐसे में ये जरूरी था कि नीतीश कुमार को अपने पाले में लाया जाए और जिसके लिए वे तनिक-तनिक तैयार भी दिखने का संकेत कर रहे थे.

साथ ही ऑपरेशन बिहार इसलिए भी हड़बड़ी में जरूरी था क्योंकि लालू और नीतीश में जो मतभेद हो रहे थे, उसके बाद राजनीतिक गलियारों में ये कानाफूसी थी कि लालू, जद-यू के कुछ विधायकों पर भी निशाना साधने की तैयारी में थी. इसीलिए आनन-फानन में नीतीश ने इस्तीफा दिया और अगले दिन सुबह-सुबह फिर से शपथ ले ली!

नीतीश कुमार के पाला बदलने के सवाल के कुछ बेहद सामान्य उत्तर हैं, उनमें से एक है नीतीश भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने वाली अपनी चट्टानी छवि को नई ऊंचाईयों पर ले जाना चाहते थे. लेकिन यह हिमशैल का सिर्फ दिखने वाला सिरा है. असल में इसकी भीतरी वजहे और भी हैं. सूत्रों के हवाले से खबर है कि लालू प्रसाद ने नीतीश का तख्तापलट करने की तैयारी कर ली थी. इसके साथ ही जेडी-यू में टूट भी हो जाती. जाहिर है, नीतीश ज्यादा तेज निकले और उन्होंने ब्रह्मास्त्र चला दिया. नीतीश कुमार महागठबंधन में मुख्यमंत्री तो थे लेकिन उनकी हैसियत 80 के मुकाबले 71 विधायकों के साथ जूनियर पार्टनर की ही थी. भाजपा के साथ अब नीतीश पहले की तरह बड़े भैया हो जाएंगे.

हालांकि, बिहार भाजपा में हर कोई नए गठजोड़ से खुश नहीं है लेकिन सुशील मोदी एक बार फिर उप-मुख्यमंत्री बनकर प्रसन्नचित्त होंगे. दूसरी बात, उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत को नीतीश ने कायदे से पढ़ लिया है. यूपी में भाजपा को उन पार्टियों ने भी वोट दिया है जिसे समाज में दुर्बल जातियां कहा जाता है. बिहार में नीतीश भी उन्हीं जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. अगर 2019 में भाजपा यूपी की तरह बिहार में भी उन जातियों को अपने पाले में कर लेती तो नीतीश के पास जमापूंजी क्या रह जाती? क और वजह तेजस्वी यादव भी रहे. नहीं, उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप नहीं. नीतीश तेजी से सीखते तेजस्वी को पैर जमाते देख रहे थे और उनको विवादित करके छोटा कर देना भी एक मकसद रहा होगा.

दूसरी तरफ, भाजपा के लिए 2019 से भी फौरी जरूरत थी गुजरात के चुनाव. भाजपा गुजरात विधानसभा को खोने नहीं देने के लिए कितनी बेताब है इसका अंदाजा हालिया महीनों में वहां बढ़ गए प्रधानमंत्री के दौरों से लग जाता है. गुजरात में भाजपा के वोट बैंक रहे पटेल पार्टी से नाराज चल रहे हैं और सड़कों पर सरकार के खिलाफ पटेलों की उमड़ी भीड़ भाजपा के लिए अनिष्टसूचक प्रतीत हो रही थी. गलियारों में चर्चा थी कि हार्दिक पटेल के सिर पर नीतीश कुमार का हाथ था. अब यह महज संयोग नहीं होगा कि नीतीश कुमार उन्हीं कुर्मियों के नेता हैं, जिसे गुजरात में पटेल कहा जाता है. भाजपा को उम्मीद है कि इससे गुजरात में पटेलों के विरोध को एक हद तक साधा जा सकेगा. इस बात को भी संयोग नहीं माना जा सकता है कि राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार (और अब राष्ट्रपति) रामनाथ कोविंद कोली जाति के हैं, जिसकी तादाद गुजरात में करीब 18 फीसदी है. नीतीश के साथ कोविंद के मीठे संबंध रहे हैं.

अब बच रहे शरद यादव. शरद यादव के बारे में बिना हील-हुज्जत के यह माना जा सकता है कि वह अपने सियासी करियर के आखिरी दौर से गुजर रहे हैं. हालांकि शरद महागठबंधन तोड़ने की मुखालफत कर रहे थे लेकिन उनके राजनीतिक जीवन में वसंत तभी आएगा जब वह भाजपा के साथ जद-यू के इस गठजोड़ को मान लेंगे. जद-यू के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि केंद्र सरकार में शरद यादव के लिए कबीना मंत्री के पद का प्रस्ताव है और शरद इसके लिए सहमत भी हैं.

वैसे राजनीतिक पंडित इस बात के कयास लगा रहे हैं कि जद-यू के 18 मुस्लिम और यादव विधायक टूट के लिए तैयार हैं. लेकिन वैधानिक टूट के लिए 24 विधायकों का होना जरूरी है. अगर यह टूट हुई और कुछ न्य विधायकों को जोड़कर लालू सरकार बनाने का दावा भी करें तो भी शरद यादव को राज्यसभा सीट गंवानी पड़ेगी. उनको दोबारा राज्यसभा में भेजना कठिन होगा. आरजेडी ने मायावती को राज्य सभा में भेजने का वचन पहले ही दे दिया है. ऐसे में बस एक और नाम ख्याल में आता है ममता बनर्जी का, जो मायावती को राज्य सभा भेजने पर हामी भर सकती हैं. लेकिन यह गणित सियासी खामख्याली भी हो सकती है, क्योंकि विश्वस्त सूत्र दावा कर रहे हैं कि शरद जल्दी ही कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं. दूसरी तरफ, आरजेडी के कई विधायक तेजस्वी का इस्तीफा चाहते थे और इस टूट से नाराज होकर उन्होंने गुरुवार की बैठक में मौजूद रहना मुनासिब नहीं समझा. एक और कोण कांग्रेस का है और अगर जेडी-यू में कोई टूट होती है तो कांग्रेस में भी तोड़-फोड़ होगी. अभी भाजपा 2019 की तरफ देख रही है तो नीतीश की नजर उससे आगे 2020 (बिहार विधानसभा चुनाव) पर भी होगी. कुल मिलाकर मामला दिलचस्प है, कुछ-कुछ अंकगणित और ज्यामिति के मिले-जुले समीकरण जैसा.

मंजीत ठाकुर

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

दरभंगा में हवाई अड्डा अभी हवाई किला है

आज दरभंगा से संभावित हवाई सेवा पर लिखूंगा जिसे हाल ही में "उड़ान" योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है, हालांकि अभी सिर्फ सहमति पत्र पर दस्तखत हुए हैं और मीलों लंबा सफर तय करना है. भारत सरकार की उड़ान योजना क्षेत्रीय कनेक्टीविटी के लिए है.

बहुत सारे अन्य एयरपोर्ट की तरह ही दरभंगा एयरपोर्ट भी रक्षा मंत्रालय के अतर्गत आता है जिसके मंत्री अभी अरुण जेटली हैं. जेटली का नीतीश कुमार से मधुर संबंध है और दरभंगा के सांसद कीर्ति आजाद से कटु. लेकिन दरभंगा से सन् 2014 में JD-U के लोकसभा प्रत्याशी रहे Sanjay Jha, अरुण जेटली के नजदीकी माने जाते हैं. बिहार सरकार के सूत्र बताते हैं कि ये भी एक वजह थी कि दरभंगा एयरपोर्ट पर रक्षा मंत्रालय ने तत्काल NOC दे दिया.

(यों दो साल पहले जब सोशल मीडिया पर दरभंगा एयरपोर्ट के लिए अभियान चल रहा था तो उस समय कीर्ति आजाद कुछ सांसदों संग PM से मिलने भी गए थे लेकिन बाद में वे BJP में खुद ही अलग-थलग पड़ते गए).
फिलहाल जिस सहमति पत्र पर दस्तखत हुए हैं उसमें दरभंगा से पटना, गया और रायपुर पर सहमति बनी है. चूंकि इस बार नॉन-मेट्रो सिटी से ही कनेक्टिविटी की योजना थी, तो उसमें पटना, गया, रायपुर, बनारस और रांची आ सकते थे. अभी शुरू के तीन पर सहमति बनी है. रायपुर का नाम जुड़वाने में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की व्यक्तिगत रुचि थी, उन्होंने बैठक में कहा कि 'रायपुर और छत्तीसगढ़ में मिथिला समाज के लाखों लोग रहते हैं, कनेक्टिविटी से उनका भला होगा'. रही बात रांची और बनारस की तो अभी मंत्रालय की योजना में वो नहीं था, आगे उस पर विचार किया जा सकता है.

जब दो साल पहले हमारे ढेर सारे मित्र सोशल मीडिया और अखबारों के माध्यम से दरभंगा से हवाई सेवा शुरू करवाने के लिए अभियान-रत थे तो उस समय मैंने JD-U नेता संजय झा से इस मामले में पैरवी करने के लिए आग्रह किया था. वे सहमत तो थे लेकिन व्यवहारिकता और नौकरशाही की अड़चन को लेकर सशंकित थे. उन्होंने कहा था कि बेहतर हो कि राजधानी जैसी कुछ सुपरफास्ट ट्रेन या ऐसी ही कनेक्टिविटी का कुछ इंतजाम किया जाए.

लेकिन भारत सरकार जब "उड़ान" योजना लेकर सामने आई तो दरभंगा के लिए संभावना अचानक प्रकट हो गई. सोशल मीडिया में हमारे अभियान से उस समय सरकार के कान पर तो जूं नहीं रेंगी लेकिन समाज में कुछ हलचल जरूर मची. लोग तो पहले सोचते तक नहीं थे, उन्हें लगता था कि यह अभिजात्य माध्यम है, जिसका विकास से कोई लेनादेना नहीं. हाल यह था कि उस इलाके में एक जमाने में विकास-पुरुष के तौर पर सम्मानित एक प्रख्यात कांग्रेसी नेता के सुपुत्र विधायकजी ने तो यहां तक कहा कि दरभंगा वाले बस में ही बैठने की सलाहियत सीख लें,यही बहुत है!

दरभंगा एयरपोर्ट का रनवे बिहार में सबसे बड़ा है, पटना से भी बड़ा. महाराज दरभंगा का बनवाया हुआ है. छोटा-मंझोला विमान अभी भी उतर सकता है, अगर 2000 फीट रनवे और लंबा हो जाए तो भविष्य के लिए भी, बड़े विमानों के लिए भी पक्की व्यवस्था हो जाएगी. दरअसल, किसी शहर से विमानन सुविधा वन-टाइम डील होता है. हुआ तो हुआ, नहीं तो बीस-तीस साल नहीं होता. मनीष तिवारी जब केंद्र में मंत्री बने तो दिल्ली-लुधियाना शुरू हुआ, सुना कि उनके हटने के बाद बंद हो गया. इलाहाबाद में एक जमाने में था, फिर बंद हुआ और फिर जाकर मुरलीमनोहर जोशी के समय शुरू हुआ. यानी जिसकी लाठी, उसकी भैंस. वो तो भला हो उड़ान का जो दरभंगा जैसे शहर इसमें शामिल हुए.

दरभंगा एयरपोर्ट मौजूदा हाल में भी उड़ान योजना के लिए फिट था लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दरभंगा एयरपोर्ट के रनवे विस्तार के लिए जमीन अधिग्रहण हेतु सहमत हो गए हैं, ताकि भविष्य में बड़े विमान भी उतर सकें. उसके लिए पचास एकड़ जमीन चाहिए और उन्होंने कैबिनेट सचिवालय के प्रमुख सचिव ब्रजेश मेहरोत्रा को इस बाबत निर्देश दे दए है.

लेकिन इस हवाईअड्डे में कई पेंच हैं और इसमें इतनी दौड़-धूप या कहें कि ब्यूरोक्रेटिक लाइजनिंग की जरूरत है जिसके लिए ऊर्जावान नेतृत्व चाहिए. ये बात जगजाहिर है कि दरभंगा के सांसद कीर्ति आजाद की हवाईअड्डे में कितनी दिलचस्पी है और अगर होगी भी तो अरुण जेटली उनकी कितनी सुनेंगे! दरभंगा डिवीजन के अन्य दो सांसद हुकुमदेव नारायण यादव और बीरेंद्र चौधरी या तो हवाईसेवा के प्रति उदासीन हैं या इसका महत्व नहीं समझते. हां, एक बार बीरेंद्र चौधरी ने संसद में इसे उठाया था. लेकिन उस
समय 'उड़ान' जैसी कोई योजना नहीं थी. इस बार योजना तो अनुकूल है लेकिन पेंच नौकरशाही का है और वो पहाड़ जैसा है. देखिए जिस सहमति पत्र पर दस्तखत हुए हैं, उसमें किन-किन चीजों की आवश्यकता बताई गई है:
1. एयर हेड-क्वार्टर से एनओसी लेना(यानी फिर से डिफेंस मिनिस्ट्री के बाबू और वायुसेना अधिकारियों की तेल-मालिश करना)
2. AAI को एयर हेडक्वार्टर से एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करना होगा(बाबुओं को इसके लिए फिर से मनाना)
3. सिविल इन्क्लेव के लिए AAI ने जमीन अधिग्रहण करने का आग्रह किया है (झंझट का काम है. हालांकि जमीन पचास एकड़ ही चाहिए लेकिन ये "आजकल" मजाक नहीं है. बिहार सरकार के सबसे बड़े बाबू से लेकर जिलाअधिकारी, पुलिस कप्तान, मुआवजा, वित्त विभाग इत्यादि शामिल हैं)
4 रनवे एज लाइटिंग
5 एप्रन और टैक्सी वे का निर्माम
7 NA AIDS(ILS, VOR) का इंस्टालेशन- यानी रेडियो नेविगेशन सिस्टम, इस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम इत्यादि.
और ये जितने काम हैं, उसमें करीब 2000 करोड़ रुपये का खर्च है, क्योंकि 'उड़ान' स्कीम के तहत* बिहार सरकार को इसके सकल खर्च या छूट का 80 फीसदी वहन करना है! अब असली पेंच समझिए कि एक गरीब राज्य का खजाना जिसका बजट सन् 2016-17 के लिए महज 1.44 लाख करोड़ था वह सिर्फ दरभंगा हवाईअड्डे के लिए उसमें से दो हजार करोड़ निकाल दे तो पटना के बाबू लोग कितना नखरा करेंगे! (* उड़ान योजना में VGF यानी वायवेलिटी गैप फंड के तहत घाटे की भरपाई और सुविधाओं के निर्माण में केंद्र और राज्य का हिस्सा 20 औ 80 फीसदी का है.)

विद्वानों को मालूम है कि महज सहमति पत्र से कुछ नहीं होता, सहमति पत्र तो ऐसे-ऐसे हैं जो तीस-तीस साल से धूल फांक रहे हैं-उन पर काम आगे हुआ ही नहीं-फाइल आगे बढ़ी ही नहीं. असली बात है कि क्रियान्वयन होना और एक पिछड़े इलाके में इतने बड़े प्रोजेक्ट को जमीन पर उतार देना. 

यह पोस्ट सिर्फ दरभंगा एयरपोर्ट पर केंद्रित है, पूर्णिया, सहरसा, रक्सौल और किशनगंज का अलग संदर्भ है. लंबा हो जाएगा. आज के समय में एयरपोर्ट का क्या महत्व है, इस पर पोस्ट लिखना जरूरी नहीं. आप ये समझिए कि किसी पूंजीपति या सरकारी बाबू को अगर 20-25 करोड़ का भी प्रोजेक्ट लेकर उत्तर बिहार जाना हो तो वो ट्रेन से नहीं जाएगा. मैं खुद ही साधारण सी नौकरी में हूं, ट्रेन में 25-30 घंटे की सफर से बचता हूं.

मैंने ब्लॉग के जमाने में लिखा था कि ईस्ट-वेस्ट NH कॉरीडोर को मधुबनी-दरभंगा से होकर बनवाने में झंझारपुर और सहरसा के सांसद देवेंद्र प्र. यादव और दिनेश यादव का बड़ा रोल था, उन्होंने उसके लिए जमकर वाजपेयी सरकार में लॉबी की थी. नतीजतन वो मिथिला की लाइफलाइन साबित हुई.

ऐसे में दरभंगा से अगर वाकई 'उड़ान' होता है, तो बधाई के पात्र नीतीश कुमार होंगे, मोदी सरकार होगी और संजय झा होंगे जो इसमें व्यक्तिगत रुचि ले रहे हैं. दरभंगा और उत्तर बिहार के उस इलाके के लोगों को चाहिए कि वो दबाव और समर्थन बनाए रखे. वहां के मौजूदा सांसद-गण भी कुछ जोर लगाएं तो यह जल्दी फलीभूत हो जाएगा. सिर्फ हवाईअड्डा ही क्यों, रेलवे और अन्य योजनाएं भी फलीभूत हो जाएंगी.

--अपने फेसबुक वॉल पर लिखा सुशांत झा का लेख.

मंगलवार, 7 जून 2016

जहां न पहुंचे रवि...

बिहार के छात्रों के बीच एक कहावत बहुत मशहूर है कि जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि और जहां न पहुंच पाए कवि, वहां पहुंचे पैरवी। भुसकोल छात्रों के लिए पैरवी यानी सिफारिश उम्मीद की किरण की तरह है तो प्रतिभाशाली छात्रों के लिए एक और बाधा की तरह, जो बिहार में पढ़ने वाले बाक़ी छात्रों को भी झेलना ही होता है।

आप सबको याद होगा, कुछ बरस-डेढ़ बरस पहले बिहार के वैशाली में नकल करवाने वालो की एक तस्वीर सोशल मीडिया में, और उसके बाद मुख्यधारा की मीडिया में भी वायरल हुई थी। उस समय कहा गया कि बिहार की छवि बिगाड़ने की कोशिश है। ठीक है। लेकिन उसके बाद अभी बिहार में परीक्षा के परिणामों ने उस आरोप को एक तार्किक परिणति तक पहुंचा दिया है।

स्कूली शिक्षा में भ्रष्टाचार किस कदर जड़ जमा चुका है, उसकी मिसाल हैं टॉपर रूबी राय। वह आर्ट्स में टॉप आई हैं और उन्हें यह तक पता नहीं कि उन्होंने कुल कितने विषयों की परीक्षा दी है। हो सकता है मीडिया के सामने वह अकबका गई हों, और भूल गई हों, लेकिन जिस विषय में उन्हें 91 नंबर आए हैं, उन्हें यह भी याद नहीं कि उस विषय में पढ़ाया क्या जाता है! कुल 500 अंको की परीक्षा में उन्हें 444 अंक हासिल हुए हैं लेकिन उनके हिसाब से उनके पांच पेपरों में एक ‘पोडिकल साइंस’ विषय भी था। और इस विषय में बकौल रूबी, खाना पकाना सिखाया जाता है। बढ़िया।

अब इस बार बिहार के विज्ञान के टॉपर की सुनिए। यह हैं सौरभ श्रेष्ठ। अपने टॉप होने का श्रेय वह स्कूल की पढ़ाई और अच्छे तरीके से दोहराने को तो देते हैं लेकिन उनके हिसाब से रसायन की आवर्त सारणी में सबसे रिएक्टिव एलिमेंट एल्युमिनियम होता है। वाह! आवर्त सारणी बनाने वाले मेंडलीफ अपना माथा फोड़ रहे होंगे। और, सोडियम के इलेक्ट्रॉनिक स्ट्रक्चर में आउटर मोस्ट सर्किल में कितने इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसका उतरा सौरभ श्रेष्ठ के पास नहीं है।

अब हकबकाया बिहार के शिक्षा बोर्ड के अधिकारी इन टॉपरों को साक्षात्कार के लिए बुलाने की योजना बना रहे हैं। और टॉपर रूबी के पिता कह रहे हैं कि उन्होंने प्रिंसिपल को बेटी का ध्यान रखने भर को कहा था, उन्होंने तो टॉपर ही बना दिया।

कोई बात नहीं। टॉपर ही बनाइए। लेकिन इस तरह की शिक्षा से बिहार का नाम कितना बदनाम हो रहा है इसपर क्या राज्य के नेता ध्यान देंगे? क्या जो बिहार अपनी प्रतिभा के लिए देश भर में मशहूर है उसके बाकी के छात्रों पर क्या बीतेगी? उनकी प्रतिष्ठा का क्या होगा? छोड़िए पुराने छात्रो की प्रतिष्ठा का, इस बार जो कथित टॉपर हैं, वह क्या नज़रें मिला पाएंगे।

किसी महान शख्स ने कहा भी है कि, अगर आप सम्मान के लायक हैं और आपको सम्मान नहीं मिलता तो शायद उतना बुरा नहीं, जितना कि आप सम्मान के लायक नहीं हैं और फिर सम्मान मिल जाए।

कल को, मुझे फीजिक्स का नोबेल मिल जाए तो क्या मैं इसी बेसाख्ता अंदाज़ में यह स्तंभ लिख पाऊंगा? लेकिन इस शर्मो-लिहाज के लिए आंखों में पानी होना चाहिए। जो पानी शायद सूखे की वजह से खत्म होती जा रही है। तभी तो बिहार में वंशवाद ने समाजवाद को खूंटी पर टांग दिया है। और बिहार ही क्यों, देश भर में जितनी समाजवादी पार्टियां है, सबकी सब जेबी पार्टियां ही तो हैं।

लेकिन बिहार का प्रसंग चल निकला है तो याद आया कि किंगमेकर लालू प्रसाद ने एक नया रिकॉर्ड कायम करने की पूरी तैयारी कर ली है। बीते नवंबर में जब बिहार के चुनाव हुए थे तो लालू के दो बेटे चुनकर विधानसभा पहुंच गए। तेजस्वी तो उप-मुख्यमंत्री भी बन गए। बिटिया मीसा यादव लोकसभा चुनाव में बीजेपी में गए रामकृपाल यादव से हार गई थीं, अब उनका करियर बनाने के लिए राज्य सभा भेजने की तैयारी है। लालू की पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री बिहार की पहली ऐसी मां हैं जिन्हें अपने बच्चों के साथ सदन में बैठने का गौरव हासिल है।

अब, इतने आंकड़ों के बाद क्या यह सवाल प्रासंगिक भी रह जाता है कि बिहार में प्रतिभा की कद्र होगी? वैसे, याद रखिए, लालू की नौ संतानें हैं। कुल मिलाकर उनका परिवार, (साले, भाई, चाचा-फूफा जैसे संबंधियों को छोड़कर) ग्यारह का है। लालू चाहें तो विधानसभा में चौथाई बहुमत तो सिर्फ परिवारवालों के सहारे ला सकते हैं।

आप लाख सिर पटक लीजिए, बिहार में प्रतिभा पर सिफारिश भारी पड़ती है, पड़ती रहेगी। कोई रूबी, कोई सौरभ, सर्वश्रेष्ठ छात्रों की प्रतिभा भर भारी पड़कर श्रेष्ठतम साबित होता रहेगा। जहां कवि की कल्पना भी नहीं पहुंच पाए, वहां पैरवी पहुंचती रहेगी।

मंजीत ठाकुर

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

महागठबंधन जीत के आगे की चुनौती

बिहार में जीत महागठबंधन की हुई और क्या जबरदस्त जीत हुई। लालू इस खेल में मैन ऑफ द मैच रहे। लालू के सियासी करिअर का मर्सिया पढ़ने वालों से मेरा कभी इत्तफाक नहीं रहा और मुझे हमेशा लगता था कि लालू की वापसी होगी। गोकि लालू का जनाधार भी जब्बर है और इसबार नीतीश के साथ हाथ मिलाकर, वो भी बिलाशर्त, लालू ने संजीदा राजनीतिज्ञ होने का परिचय ही दिया।

अंकगणित के आधार पर लोगों ने लालू-नीतीश के महागठबंधन को खारिज कर दिया था। नरेन्द्र मोदी की अपार लोकप्रियता और सर चढ़कर बोल रहा जादू भी ऐसा ही है। लेकिन बिहार में सियासत महज वोटों के अंकगणित के समीकरणों से नहीं होती। वहां वह ज्यामिति भी होती है और बीजगणित भी।

लेकिन, महागठबंधन के पक्ष में जो जिन्न इवीएम से बाहर निकला है वह इतनी जल्दी बोतल के भीतर नहीं जाएगा। लालू ने अभी तक मुंह नहीं खोला है। गठजोड़ करने से पहले तो बिलकुल भी नहीं खोला। लेकिन वह इतनी आसानी से मानेंगे भी नहीं। नीतीश के साथ गठजोड़ करने से पहले लालू बैकफुट पर थे। उनका सियासी करिअर डांवाडोल था। लेकिन अब लालू बम-बम हैं क्योंकि उनकी सीटें जेडी-यू से भी अधिक है। जेडी-यू पिछले विधानसभा चुनाव में हासिल सीटों से कम सीटें पा सकी है इसबार। तो ऐसे में उप-मुख्यमंत्री का पद अगर लालू अपने बेटों में से एक के लिए मांग बैठे तो इसमें हैरत नहीं होनी चाहिए। गोकि लालू पहले भी बोल चुके हैं, कि उनका बेटा राजनीति नहीं करेगा तो क्या भैंस चराएगा और उनकी इसी बात पर उनके पुराने संगी पप्पू यादव किनारा करने पर मजबूर हो गए।

जाहिर है कि नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे। असली चुनौती उनके लिए एस जीत के बाद होगी। उनकी छवि भी सुशासन बाबू की रही है जिन्होंने लालू-राबड़ी के शासन के दौर में साधु-सुभाष की वजह से फैली अराजकता को एनडीए का मुख्यमंत्री बनकर खत्म किया था। नीतीश ने बेशक विकास के बुनियादी सिद्धांतो का पालन किया और बिहार में सड़कें वगैरह बनवाईं, लेकिन अब विकास के दूसरे स्तर पर उन्हें अपने प्रशासन को ले जाना होगा और लालू ने अगर इसमें जरा भी लापरवाही दिखाई तो पहला धक्का नीतीश की विकास-पुरुष वाली छवि को लगेगा। इसलिए राजनीतिक पंडितों की पैनी निगाह इस गठबंधन की कामयाबी पर है।

अगर इस गठबंधन को असल में कामयाब होना ही है तो इसको पड़ोसी सूबे उत्तर प्रदेश से एक सबक लेना ही चाहिए, जहां 1993 में ऐसा ही एक गठजोड़ बना तो था लेकिन धराशायी हो गया था। इस वक्त राम मंदिर का मुद्दा बहुत गरम था और 1992 में गठित समाजवादी पार्टी और 1984 में बनी बहुजन समाज पार्टी ने हाथ मिलाए थे। सरकार गठित हई थी और उसको बाहर से समर्थन दिया था कांग्रेस ने। तब तक अयोध्या में विवादास्पद ढांचे को कारसेवकों ने गिरा दिया था और मायावती ने बहुजन समाज के लोगों को एक समाजवादी मुलायम सिंह यादव का नेतृत्व मानने के लिए मना लिया था। लेकिन 1995 के मध्य तक, मुलायम और मायावती एक दूसरे के घोर दुश्मन में तब्दील हो गए। 18 महीने तक चली यह सरकार आखिरकार कड़वाहटों के बीच 1995 के जून में गिर गई थी।

इस गठबंधन के धराशायी होने के अमूमन तीन कारण गिनाए जाते हैं। अव्वल, अपनी-अपनी जातियों की रहनुमाई करने वाले नेताओं की निजी महत्वाकांक्षाएं, दोयम, सत्ता के दो केन्द्र बन जाना, जो अपने जनाधार या सीधे शब्दों में कहे तो अपनी जातियों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे और तीसरा, सामाजिक और ज़मीनी स्तर पर यह राजनीतिक गठबंधन स्वीकार्य नहीं था।

नीतीश और लालू दोनों ही दो ताकतवर और आक्रामक जातियों के नेता हैं। चुनाव जीतने के बाद इन जातियों की उम्मीदें भी बढ़ गई होंगी। लेकिन इन दोनों ही नेताओं को अब इस राजनीतिक गठजोड़ को जमीनी स्तर पर ले जाना होगा। इसका सीधा मतलब है यादवों, दलितों और कुर्मी-कोइरी जैसी खेतिहर जातियों को एक साथ लाना। नीतीश और लालू अगर इस गठबंधन की उम्र लंबी रखना चाहते हैं तो उन्हें दलितो और यादवों के संघर्ष को कम करना होगा, और यादवों से साथ कुर्मियों के संघर्ष को भी।

जो लोग बिहार को जानते हैं उन्हें पता होगा, यह काम लिखने में आसान है लेकिन जमीनी रूप में यादवों-कुर्मियों-दलितों के जातीय संघर्ष को पिघलाना टेढ़ी खीर है।

सोमवार, 16 नवंबर 2015

मिथिला की औद्योगिक उपेक्षा

बिहार में चुनावी यज्ञ अब पूर्णाहुति की तरफ बढ़ रहा है। जम्हूरियत के इस जश्न के दौरान जब मैं यह स्तंभ लिख रहा हूं तो पांचवे चरण का मतदान चल रहा है, और आज के मतदान का प्रतिशत एनडीए और महागठबंधन की चुनावी जीत तय करेगा। ज्याद वोटिंग एनडीए के पक्ष में होगा, साठ फीसद से कम मतदान महागठबंधन के पक्ष में। हालांकि यह आंकड़ा हमेशा सच नहीं होता।

इस चुनाव को कवर करते हुए मैं बिहार के उत्तरी इलाकों में खूब घूमा। मेरी दिलचस्पी इस बात में थी कि आखिर बिहार के लोग बड़े पैमाने पर दूसरो राज्यों की ओर पलायन क्यों करते हैं, और नीतीश कुमारे के दस साल के सुशासन में आखिर उत्तर बिहार को क्या कुछ हासि हुआ। नीतीश जब लालू के जंगल राज के खिलाफ 2005 और 2010 में चुनाव लड़ रहे थे और एऩडीए का हिस्सा थे तब उन्होंने मिथिला के इलाकों में पड़े चीनी मिलों और पेपर मिलों के साथ चावल मिलों के नया जीवन देने का वायदा किया था। एक दशक बाद उत्तर बिहार का औद्योगिक सच जानने में मैं दरभंगा के पास अशोक पेपर मिल पहुंचा था।

असल में, अशोक पेपर मिल मिथिला इलाके के औद्योगीकरण के खत्म होते जाने और उसके साथ ही रोज़गार के साधनों के छीजते जाने की मिसाल है। यह मिल लूट और भ्रष्टाचार के वजह से एक फलते-फूलते उद्योग के मिट जाने की कहानी भी है। बार-बार दोबारा शुरू किए जाने के सियासी वादों और उन वादों के टूटते जाने की भी दास्तान है यह मिल। दरभंगा से करीब नौ किलोमीटर जाने पर एक ढांचा दिखाई देता है, हरे खेतों के बीच खड़ा बड़ा सा कारखाना। पहले जहां मजदूरों की चलह-पहल रहती थी वहां अब भैंसे चरती दिखाई देती हैँ।

इस मिल की स्थापना दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह ने 1958 में तब की थी जब जमींदारी के खात्मे का बड़ा शोर था और महाराज खुद को एक उद्योगपति-राजनेता में बदल लेने को तत्पर थे। किसानों से जब 400 एकड़ जमीन अधिगृहीत की गई तब रोज़गार और समृद्धि के सपने उन्हें दिखाए गए थे। उस वक्त यह उत्तरी बिहार का पहला और एकमात्र भारी उद्योग था। लेकिन 1963 में इसका लिक्विडेशन शुरू हो गया और सरकार ने 1970 में इसका अधिग्रहण कर लिया। तब असम और बिहार की राज्य सरकारों और केन्द्र ने मिलकर इसको संयुक्त उपक्रम में बदल दिया और वित्त प्रदाता आईडीबीआई ने पूंजी की व्यवस्था की।

अशोक पेपर मिल बेहद उम्दा कागज उत्पादित करता था। लेकिन नौकरशाहीनुमा लचर प्रबंधन और यूनियनबाज़ी की वजह से 1982 में यहां कागज का उत्पादन बंद करना पड़ा। इसके साथ ही 1200 कामगार बेकार हो गए। 1987 में अशोक पेपर मिल को शुरू करने की पहल की, लेकिन अनुदान मिला असम वाली यूनिट की। दरभंगा वाली इकाई यूं ही बंद पड़ी रही।

साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस मिल का निजीकरण कर दिया गया। नोर्बू कैपिटल एंड फिनांस लिमिटेड नाम की कंपनी को बिहार और असम सरकार के हिस्से के 6 करोड़ रूपये 16 किस्तों में चुकाकर अशोक पेपर मिल स्वामित्व मिलना था, लेकिन अद्यतन जानकारी के मुताबिक कंपनी से सिर्फ दो किस्तें जमा कीं। अदालत के आदेश के बावजूद, कंपनी ने कामगारों का पिछला कोई बकाया भुगतान नहीं किया। जबकि अदालत की शर्त थी कि वह मौजूदा 471 कामगारों को काम पर रखते हुए 18 महीने के भीतर उत्पादन का पहला फेज शुरू कर दे। लेकिन पहला फेज कभी शुरू नहीं हुआ, न कामगार रखे गए बल्कि वर्किंग कैपिटल के नाम पर वित्तीय संस्थाओं से 30 करोड़ रूपये की उगाही कर ली गई। शर्त यह भी थी कि कंपनी मिल के परिसर से कोई परिसंपत्ति बाहर नहीं ले जा सकती।

1998 में ट्रायल रन किया गया। इंजीनियरों ने रिपोर्ट दी कि मिल की 95 फीसद मशीनरी दुरुस्त है। इस रिपोर्ट के आधार पर कंपनी ने एक दफा फिर यनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया से 8 करोड़ रूपये वर्किंग कैपिटल के तौर पर उधार ले लिए। तथापि, मरम्मत के बहाने मशीनरी बाहर ले जाकर बेच दी गई। स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि 6 करोड़ में हासिल किए गए मिल से कंपनी 28 करोड़ कमा चुकी है वह भी सिर्फ मशीनरी को बेचकर। लोग बताते है कि कंपनी ने परिसर के भीतर के ढाई हजार पेड़, डेढ़ किलोमीटर लंबी पानी की पाइप लाईन, रेलवे ट्रैक, और मोटर वगैरह बेच दिए हैं।

मुझे इधर-उधर ताकते हुए देखकर मिल में मौजूद सुरक्षा गार्ड आ जाते हैं। उनके मन में भी इस बात के प्रेस में जाने और फोटो छाप देने पर नौकरी जाने का डर है। मिल के सुरक्षाकर्मी को भी कई सालों से वेतन नहीं मिला है।

राज़ यही खुलता है कि आखिर क्यों मिथिला का नौजवान बिहार से बाहर जाकर औने-पौने दामों में अपनी श्रम बेचने को मजबूर है। साथ ही, बाहरी होने का दंश तो है ही। अपनी ज़मीन जब सियासी और कॉरपोरेट साजिश का शिकार हो, तो झेलेगा तो इलाके का नौजवान ही।

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

जड़ो को बचाने की असली सांस्कृतिक चिंता

बिहार चुनाव को कवर करना बेहद अहम है। पिछले सप्ताह जब मैं इस स्तंभ में लिख रहा था तो मैंने कहा था कि बिहार के इस बार के चुनाव देश की राजनीति के समीकरण बदल देंगे। इस बार का चुनाव भी नए सियासी ककहरे गढ़ रहा है।

इन दिनों मैं उस इलाके में हूं, और खूब घूम रहा हूं जिसे सीमांचल और मिथिलांचल कहा जाता है। यानी दरभंगा-मधुबनी और कटिहार-किशनगंज-पूर्णिया वाला इलाका।

ऐसे ही दरभंगा में घूमते चाय की दुकान पर लोगों को टहोकते हुए एक शख्स टकरा गए। काफी गरम हो रहे थे। करते रहिए रिपोर्टिंग। लिखते रहिए। टीवी पर दिखाते रहिए, मिथिलांचल खत्म हो रहा है, विरासत मिट रही है। दही-चूड़ा-पान-मखाना-मछली की तहजीब गायब होती जा रही है और किसी को इस बात की चिंता भी नहीं। भोगेन्द्र झा चौक है दरभंगा में। गंदे नाले के किनारे चाय पर चुनावी चर्चा में वह शख्स कहे जा रहे थे कि चुनावी आपाधापी में लोगों को वोट की चिंता है, लेकिन संस्कृति की बात करना दक्षिणपंथी हो जाना हो गया है आजकल। संस्कृति के नाम पर असली काम कम, हो-हल्ला ज्यादा है।

असल में, दही-चूड़ा-पान-मखाना-मछली मिथिला की पहचान है। मिथिला में तालाबों-पोखरों की बहुतायत रही है। बढ़ते और अनियोजित शहरीकरण (घटिया शब्द है यह, असल में यह बस्तियों का कंक्रीटीकरण है) ने तालाबों को पाट दिया। बचे-खुचे तालाबों में जलकुंभी पनप आए है। पोखरों के गाद की उड़ाही की फुरसत न सरकार को है। और आम आदमी अपने हिस्से की जिम्मेदारियों को निभाने से मुकरता रहा है। ऐसे में, जिस मधुबनी जिले में एक हजार से अधिक तालाब-पोखर थे, वहां अब मछलीपालन से उत्पादन और बाहर मछली भेजना तो दूर की बात, घरेलू जरूरत भी पूरी नहीं होती।

मधुबनी दरभंगा में डेढ़ दशक पहले तक मछलीपालन बड़ा व्यवसाय था और यहां से मछली कोलकाता तक भेजी जाती थी। लेकिन अब मत्स्यपालन बंद कर दिया गया है। कुछ तालाबों में खेत बन गए हैं कुछ बस्तियों में बदल गए हैं। इस वजह से हर रोज़ मधुबनी जिले में आठ से दस ट्रक मछली आंध्र से आया करती है। यही हाल दूध और दही का भी है। पहले हर घर में पशुपालन हुआ करता था अब सहकारी संघो में भी महज 11 हजार लीटर ही दूध इकट्ठा किया जाता है। मिथिला के गांवों में शादी-ब्याह मुंडन-जनेऊ में दूध दही की भारी मांग होती है और उसे पूरा किया जाता है पाउडर वाले दूध से।

मधुबनी में साल 2009 में 450 मिलीलीटक दूध की खपत प्रति व्यक्ति थी, जो साल 2013 में घटकर 120 मिलीलीटर रह गई है। मखाना, सिंघाड़ा और पान के उत्पादन को सरकार ने बढ़ावा देने की बातें कहीं थीं, लेकिन वह चुनावी वादा महज वादा ही रहा। जमीन पर कोई चीज़ नहीं उतरी।

गांवों में घूमने पर बुजुर्गवार भी नौजवानों से कुछ परेशान नजर आते हैं। हर नौजवान के पास स्मार्ट फोन है और इंटरनेट सहज उपलब्ध है तो पॉर्न साइटों तक इन नाबालिगों की भी पहुंच है। झंझारपुर के पास महनौर गांव के बुजुर्गों ने मुझसे कहा कि इस इंटरनेट ने बच्चों को साफ बिगाड़ दिया है।

हर नौजवान के मोबाइल के मेमरी कार्ड में भोजपुरी गीत भरे पड़े हैं। अश्लील गीत। इस पर न तो रोक है न रोक लगाई जा सकती है। लेकिन मिथिला की जिस शांत और साहित्यनिष्ठ संस्कृति को हाल तक बचाए रखा जा सका था वह छीज रही है। मुझे इंटरनेट के रास्ते पूरी दुनिया के एक विश्वग्राम में बदल जाने में कोई उज्र नहीं है लेकिन सवाल मथता है उन संस्कृतियों का, जिसे यह ग्लोबल विलेज लील रहा है।

मिथिला के गांव-गांव में विद्यापति के बदेल गुड्डू रंगीला का अश्लील शोर है। बालिगों की अभिव्यक्ति की आजादी पर मुझे कोई दुविधा नहीं, वह है और होनी चाहिए। लेकिन हम जिन सांस्कृतिक निधियों को दुनिया के सामने पेश करना चाहते हैं उसे बचाए रखना हमारा फर्ज है। मिथिला के गांवों में गूंजने वाले नचारी, सोहर, बारहमासा जैसे गीत, विदापत, लोरिक-लोरिकाइन, जट-जटिन जैसी सांस्कृतिक परंपराएं अस्तित्व खोती जा रही है। क्यों भला? क्या मिथिला में ऐसी कोई औद्योगिक क्रांति हो गई कि सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य बदलने जरूरी हो गए हैं? नहीं। कत्तई नहीं।

अगले स्तंभ में, मिथिला इलाके के कुछ औद्योगिक संस्थानों की हालत बताऊंगा तो शायद स्थिति अधिक साफ होगी। फिलहाल तो मैं गांवो से लेकर शहरों तक एकरसता-सा अनुभव कर रहा हूं। पूरे बिहार में, एक जैसे मकान, एक जैसी गंदगी, एक जैसे होते जा रहे पहनावे और एक जैसी सांस्कृतिक दुविधा। हर जगह एक जैसा शोर है। कहीं जींस ढीला करने का तो कहीं गमछा बिछाने का। मिथिला की गलियों में ऐसी अवांछित अश्लीलता कभी न थी।