Showing posts with label अंतर्मन. Show all posts
Showing posts with label अंतर्मन. Show all posts

Sunday, June 14, 2020

सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी छोटे शहरों के सपनों के लिए झटका है

जानने वाले कहते हैं सुशांत सिंह राजपूत पूर्णिया के पास मलहारा नाम के किसी छोटी जगह के थे. मुंबई जैसी जगहों में, जहां मुंबई से बाहर की दुनिया बाहरगांव कही जाती है, मलहारा छोड़िए, पूर्णिया भी कम ही लोग जानते हैं. चमकदमक की उस दुनिया में सुशांत सिंह राजपूत पटनावाले कहलाते थे. सवाल यह नहीं है कि सुशांत पटना के थे या पूर्णिया के, महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि छोटे शहरों के प्रतिनिधि के रूप में, जो जाकर मुश्किल से मुश्किल चोटी पर परचम लहरा दे, एक चेहरा और कम हो गया है.

सुशांत सिंह राजपूत उन चेहरों का स्पष्ट प्रतीक थे, जो कुंअर बेचैन की इन पंक्तियों को परदे पर अपने गालों पर पड़ने वाले खूबसूरत गड्ढों और कातिलाना मुस्कान से सजीव करते थे.

दुर्गम वनों और ऊंचे पर्वतों को जीतते हुए,

जब तुम अंतिम ऊंचाई को भी जीत लोगे,

जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब,

तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में,

जिन्हें तुमने जीता है.

सुशांत सिंह राजपूत ने आज खुदकुशी कर ली. फोटोः ट्विटर

पर सुशांत सिंह राजपूत हैं से थे हो गए. फेसबुक पर उनके बारे में जब लिखा तो कई पाठकों ने टिप्पणी की कि काश, कोई 2020 के साल को इस डिलीट कर सकता!

राजपूत ने खुदकुशी की और अमूमन लोग खुदकुशी को कायरों का काम कह रहे हैं.

कुछ साल पहले भारतीय क्रिकेट टीम के विश्वविजयी कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के जीवन पर फिल्म बनी थी तो इन्हीं सुशांत सिंह राजपूत को रूपहले परदे पर धोनी का चेहरा बनाया गया था. चेहरा फिट बैठा था और फिल्म हिट हुई थी. इतिहास में अब जब तक महेंद्र सिंह धोनी का नाम रहेगा, परदे पर सुशांत सिंह राजपूत भी उनके चेहरे के प्रतिनिधि के रूप में जीवित रहेंगे.

सुशांत सिंह राजपूत के साथ दो विडंबनाएं हुईं. पहली, छोटे शहरों से आकर धाक जमाने वाले और दुनिया जीत लेने वाले जज्बे से भरे लोगों के एक प्रतीक पुरुष अगर खुद महेंद्र सिंह धोनी हैं, तो दूसरे प्रतीक खुद सुशांत सिंह राजपूत भी हैं. इसी तरह सुशांत सिंह राजपूत की एक और फिल्म छिछोरे भी आई थी.

फिल्म छिछोरे में वह अपने ऑनस्क्रीन बेटे के लिए प्रेरणा की तरह सामने आते हैं जो अवसाद में है. अपने उस बेटे को अवसाद से निकालने के लिए वह अपने सहपाठियों को खोज निकालते हैं. पर अपने जीवन के अवसाद, क्योंकि इस लेख के लिखे जाने तक कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुशांत सिंह राजपूत अवसाद में थे, को कम करने के लिए वह कुछ नहीं कर पाए.

क्या सुशांत सिंह राजपूत जैसे फिल्मी नायकों के इस कदर आत्महत्या करने का असर पड़ेगा? हिंदुस्तान जैसी जगह में जहां आगे बढ़ने की राह में तमाम किस्म की दुश्वारियां दरपेश होती हैं, जहां अपनी दसवीं का नतीजा जानने से लेकर ग्रेजुएशन में परीक्षा के लिए फॉर्म भरने तक किसी किरानी की जेब गर्म करनी होती है, जहां चौथी श्रेणी के छोटी-छोटी नौकरियों के लिए पीएचडी जैसी उपाधियां हासिल करने वाले हजारों लोग आवेदन कर देते हैं, जहां नौकरी के लिए हुई परीक्षा में घोटाले और भ्रष्टाचार के मामले नित दिन उजागर होते रहते हैं, वहां हमारे बच्चों को, खासकर छोटे शहरों और गांवो के लोगों को प्रेरणा कहां से मिलेगी?

यह प्रेरणा इन्हीं विजेताओं से आती है, जो कभी धोनी के रूप में, कभी जहीर खान के रूप में, कभी सुशांत सिंह राजपूत के रूप में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं. टीवी से शुरुआत करके सीढी-दर-सीढ़ी सिनेमा की संकरी दुनिया में अपनी जगह बनाना और उस में पैर जमाकर अपने लिए अच्छी भूमिकाएं हासिल करना खासी मशक्कत का काम है.

सुशांत सिंह राजपूत ने यह सब किया था. पर, आज उनकी आत्महत्या की घटना से उनको अपना आदर्श मानने वाला एक बड़ा तबका यह जरूर सोचेगा कि क्या इस भीड़ में जगह बनाकर आगे खड़े होने की जद्दोजहद इतनी जानलेवा है?

हो सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी के पीछे कोई और वजह हो. अवसाद न हो, निजी रिश्ते हों या शायद कोई ऐसा दवाब, जो जाहिर न किए जा सकते हो. पर, नायक होते ही से क्या जिम्मेदारी नहीं बढ़ जाती? भीड़ आपकी भूमिका पर सिर्फ तालियां बजाने नहीं आती, वह आपके किरदार का चोला ओढ़कर फिर अपने गांवो-कस्बों में उसे दूसरों तक ले जाती है.

संभवतया सुशांत सिंह राजपूत ने कुंअर बेचैन की कविता का बाकी आधा हिस्सा नहीं पढ़ा था, पढ़ा होता तो शायद हमारा मुस्कुराता हुआ बांका नायक हमारे बीच होता.

जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे,

और कांपोगे नहीं...

जब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क नहीं

सब कुछ जीत लेने में..

और अंत तक हिम्मत न हारने में.

***

Saturday, May 30, 2020

लॉकडाउन ढीला हो रहा है, पूजास्थलों में अब खैरियत मांगने का वक्त है

लॉकडाउन अब डाउन हो रहा है. कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, पर लॉकडाउन से सरकार का मन भर गया है. 

भैया, सरकार ने कोशिश की. सरकार ने कोशिश की कि ढाई महीने का लॉकडाउन लगाकर कोरोना के प्रसार को रोका जाए. अब नहीं रुका तो क्या किया जाए? मुझसे आप कहेंगे कि ठाकुर, नाम तुम्हारा मंजीत है, तो मंजीत बावा की तरह पेंटिग करके दिखाओ. हमने भी ट्राई किया था, पर

पेंटिंग पूरी हुई तो लगा किसी ने कैनवास पर पान खाकर पीक कर दिया हो. पर सचाई यह है कि मैंने कोशिश की थी. मेरी कोशिश पर किसी को कोई शक नहीं हो सकता. यह बात और है कि मुझे कूची पकड़नी नहीं आती थी. जैसे, मुझे यह भी नहीं पता था तैल रंग पानी में नहीं घुलते, उसी तरह शायद सरकार को लॉकडाउन जैसी हालत में व्यवस्था करना नहीं आता था.
टेस्ट होंगे या नहीं, कितने होंगे. किट कहां से आएगी. चीन वाली नहीं, जापान वाली, जर्मनी वाली. आइसीएमआर ने तो इतनी बार गाइडलाइन बदले कि जीएसटी की गाइडलाइनें याद आ गईं. कसम कलकत्ते की, आंखें गीली हो गई. हाय रे मेरा जीएसटी, कैसा है रे तू....लॉकडाउन में किधर फंस गया रे तू...
ट्रेन चलेगी, या नहीं चलेगी. किराया लिया जाएगा या नहीं लिया जाएगा. राज्य कितना देंगे. मजदूर कितना देंगे. देंगे कि नहीं देंगे...इतनी गलतफहमी तो सरकार में होनी ही चाहिए. भाई, सरकार है कोई ठट्ठा थोड़ी है.
दारू बेचकर राजस्व कमाने का आइडिया तो अद्भुत था. मतलब बेमिसाल. भाई आया, पर देर से आया. लोगबाग फालतूफंड में छाती पीटते रहे मजदूर-मजदूर. भाई मजदूर तो मजदूर है, कोई कनिका कपूर थोड़ी हैं कि पांच बार टेस्ट कराया जाए?
मजदूरों का क्या है, सरकार क्या करे. गए क्यों थे भाई? मुंबई, नासिक, सूरत क्यों गए थे? सरकार ने निमंत्रण पत्र भिजवाया था क्या? फिर गए क्यों... गए तो वहीं रहो. देशहित में काम करो, थोड़ा पैदल चलो. देश के लिए जान कुर्बान करने वालो. थोड़ा पैदल ही चलकर जान दो.
अच्छा ये बताइए, सरकार शुरू से रेल चला देती, बस चला देती, तो देश को ज्योति की कहानी कैसे पता चलती? कैसे पता लगता कि देश में पिता को ढोकर गांव तक 1200 किमी साइकिल चलाने वाली लड़की की दास्तान? लॉकडाउन की वजह से ही न.
यह लॉकडाउन नहीं था, यह राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा थी.
मैं सिर्फ केंद्र सरकार की तारीफ नहीं कर रहा, मेरी तारीफ के ज़द में राज्य सरकारें भी हैं, जो अपने पूरे राज्य में खून पसीना बहाने वाले कुछेक लाख मजदूरों को दो जून खाना खिलाने लायक नहीं है. अब नेता कोई अपनी अंटी से तो निकाल कर नहीं देगा न. क्यों देगा भला! 

और सरकार को कलदार खर्च करने होंगे तो उसके लिए तमाम खर्चे हैं भाई. विधायकों के लिए स्कॉर्पियो खरीदना है, मंत्रियों के लिए हेलिकॉप्टर जुगाड़ना है, अपनी सरकार की उपलब्धियों को अखबार में भरना है. उस पैसे को दो टके के मजदूरों के लिए खर्चना कोई बुद्धिमानी थोड़ी है!
तो महाराज, 8 जून से खुलेंगे मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-गिरजे. वहां जाकर टेकिए मत्था. अपने और अपने परिवार के लिए कुशलक्षेम की प्रार्थना कीजिए. सरकार को जो करना था कर लिया. जहान डूब चुका है, अब जान जाने की बारी है.

Tuesday, January 7, 2020

एक था पीयूष

पीयूष नाम था उसका. जिसके नाम का अर्थ ही अमृत था, वह नहीं रहा. उसके जाने की खबर पर यकीन नहीं हो रहा. वह जब मुस्कुराता था तो उसके गालों पर गड्ढे पड़ते थे. इतना खुशमिजाज कि साथ में चलते चलते भी चुटीली बातें करके उदास से उदास दिन को जिंदादिली में बदल जाता. 

पीयूष और धीरज (नीले टीशर्ट में)


हमने बचपन साथ गुजारा था. उससे पहली बार मुलाकात तो तब हुई जब उसका परिवार मधुपुर के एक दूरस्थ मुहल्ले में कुमार साहब नाम के प्रतिष्ठित अध्यापक के यहां किराए में रहता. तब मेरी उम्र पांच-छह साल की रही होगी. फिर कुछ महीनों बाद 1986 या 87 में वे लोग हमारे घर में आ गए थे. 
बचपन के दोस्त विजय की गोद में पीयूष

और उसके बाद से हमारी दोस्ती गाढ़ी हो गई. फिर हाइस्कूल तक पढ़ाई हो या क्विज कंपीटिशन और चित्रकला प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना, हम साथ रहे. वह मन से चित्रकार था, उसकी गणित की कापियों में समीकरणों की बजाए चित्र खिंचे होते थे. उसका मन कवि का था...बेहतरीन लिखता था. 
मधुपुर के पास के गांव पननिया में घुघनी खाने पहुंचे सारे बैचमेट. पीयूष नीली कमीज में है


उसने मुझसे वायदा लिया था कि वह एक कविता संग्रह प्रकाशित करवाएगा और उसका संपादन मुझे करना होगा. जब हम छोटे थे तब भी उसके खेल निराले थे, वह दीवार पर जमने वाले हरे मॉस (काई) उखाड़ लाता और रेत पर उससे सजाकर महलें और पार्क बनाता...
दोस्तों के झुंड में

सोशल मीडिया पर आने के बाद वैचारिक रूप से हममें तकरारें भी हुईं, पर हर बार गर्मागर्म बहस के बाद वह फोन करता था, भाई, प्यार अपनी जगह. तर्क अपनी जगह. फोन रखते समय हम दोनों मुस्कुराते हुए बात खत्म करते थे. मधुपुर की सड़कों पर बिना बात, बेमकसद घूमने से लेकर अपनी किसी कहानी के प्लॉट तक के बारे में बात करने के लिए पीयूष से निकट मित्र नहीं मिला था मुझे. 

पीयूष और अरविंद

मुझे नहीं मालूम कि प्रेम में आकंठ डूबकर जीवन के बेहतर तरीके से जीने में यकीन रखने वाले, पीयूष की तबीयत दिन ब दिन कैसे बिगड़ती गई. दो बरस पहले मधुपुर गया था तो वह सख्त बीमार था और चाचाजी (उसके पिता) उसे बरेली से वापस मधुपुर ले गए थे. चाचाजी ने मुझसे कहा, स्टेशन पर से उसने जिद करके इंडिया टुडे मैगजीन खरीदवाई और तुम्हारी रपट देखकर खुश हो गया था. मानो उसी के नाम से खबर छपी हो. 


उस साल मधुपुर के हमारे दोस्तों के वॉट्सऐप ग्रुप में उसको जोड़ा, जबरिया. क्योंकि वह बीमार पड़ने के बाद से ग्रुप्स में जोड़े जाने से सकुचाने लगा था. पर, फिर ग्रुप में दोस्तों के साथ ठठाकर हंसते देखा उसको...तो लगा भाई ठीक होने लगा है. पर अचानक आज जो खबर आई वह स्तब्ध कर गई. 

इतनी हिम्मत नहीं कि मौसी (उसकी मां) को फोन कर पाऊं...एक मां के दिल पर क्या बीत रही होगी, इसका अंदाजा लगाकर ही सन्न रह जाता हूं. पीयूष अपना वादा तोड़कर चला गया. उसकी कविताओं के संग्रह का संपादन बाकी ही रह गया. बड़े गौर से सुन रहा था ज़माना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते. लौट आओ दोस्त पीयूष, नए साल का यूं आगाज़ बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा. तुम ताजिंदगी याद आओगे.

Tuesday, March 19, 2019

उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए हम कितने अकेले हैं

आगे जाने का रास्ता बहुत थका देता है कभी-कभी. मन करता है सुस्ता लूं, किसी छांव के नीचे. मेरे शहर मधुपुर के पास एक पहाड़ी है. गौर किया था मैंने, पूरे पहाड़ की चोटी पर अकेला खड़ा पलाश का ऊंचा-सा पेड़ था.
पहाड़ पर झाड़ियां भी थीं, और भी मुख्तलिफ़ पेड़ थे. लेकिन चोटी पर अकेला था पलाश. गरमी में खिलता था, तो लगता था पहाड़ी की चोटी पर आग लगी हो. धधकती हुई चोटी लगती थी. पलाश को ऐसे भी जंगल की आग कहते ही हैं. आज भी याद है मुझे, पलाश के फूलों को देखकर कितना बढ़िया लगता था.

पहाड़ी पर एकदम से लाल-चटख पेड़.


आज ध्यान देता हूं तो एक बात और समझ में आती है. वह पेड़ अकेला था. अकेलापन दुखदायी होता है. मैं फेसबुक पर भी हूं, ट्विटर पर भी, इंस्टाग्राम में भी हूं, लिखता हूं भी हूं. लिखना पेशा भी है, शगल भी. संवाद के माध्यम है सारे. लेकिन फिर भी अकेलापन क्यों महसूस होता है. भीड़ है. दिल्ली में जहां घूमिए भीड़ ही भीड़ तो है. दिल्ली से बाहर जाएं तो कोई ऐसी जगह नहीं मिलेगी, जहां भीड़ नहीं. तो इतनी भीड़ में भी आदमी अकेला कैसे महसूस करता है?

किससे मन की बात बताएंगे? किसके पास इतना समय है, धैर्य है कि आपकी बात सुने. सबके पास अपनी शर्तें हैं. खुद की अपेक्षाएं हैं. उनके खुद की अनगिनत समस्याएं हैं. रोज़ ब रोज़ की न जाने कितनी सारी परीक्षाएं हैं. किसी में फेल हुए तो जीवन भर की कमाई लुट गई समझिए.

हर परीक्षा में उत्तीर्ण होना जरूरी है. कंपलसरी. किसी में चूके तो फेल. फेल मतलब सिरे से फेल. बाकी किसी अन्य विषय की कोई कॉपी जांची नहीं जाएगी. ऐसा नहीं कि इन परीक्षाओं से महज मुझे ही दो-चार होना पड़ रहा है. मेरे जैसा हर कोई होता होगा.

दौड़ में या तो आप आगे निकल जाते हैं, या कई दफा एकदम पीछे. दोनों ही स्थितियों में अकेला पड़ना तय है. रोटी से दाल और दाल के बाद मक्खन, कमरे से सिंगल बीएचके, सिंगल बीएचके से डबल या थ्री बीएचके...रुकना कहां होता है. आप रुक जाएंगे तो आपके साथ के सब लोगों के सपनों का रंग उखड़ना शुरू हो जाएगा. फिर, इन सबके साथ वक्त भी निकालना है. अपने लिए खाक...उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए.

लिखते समय आपको लगता है कि मन हल्का हो जाए. इतना तो समझ में आ ही गया है कि पैसे और शोहरत कमाने के चक्कर में दिन-रात की भागदौड़ में हमारे हाथ में हासिल बचने वाला अंडा ही है. लाजिम है कि पहाड़ी का वह पलाश याद आए, अभी मधुपुर में वह खिला होगा. पहाड़ी पर उस पलाश को किसी ने काट न फेंका हो, तो यही तो मौसम है टेसू के खिलने का.

ऐ मेरे जैसे पलाश...मैं तुम्हें बहुत याद करता हूं. मधुपुर तुम्हारे बिना मेरा जीवन अधूरा है.

Sunday, January 27, 2019

सबसे कामयाब प्रजाति इंसान नहीं गेहूं है.

हमने गेहूं को घरेलू नहीं बनाया, गेहूं ने हमें घरेलू बना दिया. डोमिस्टिक मतलब घर, घर में कौन रह रहा है? हम या गेहूं? जाहिर है, हम. 

जब भी कोई सवाल पूछता है कि पृथ्वी के इतिहास की सबसे कामयाब नस्ल कौन सी है तो हम बिना सोचे जवाब देते हैं, इंसान. पर जरा गेहूं की निगाह से कृषि क्रांति को देखिए. कोई 10,000 साल पहले गेहूं महज एक जंगली घास थी. बहुत-सी घासों में एक घास, जो मध्य-पूर्व के एक छोटे से दायरे में सीमित थी.

कुछ ही हजार वर्षों के भीतर इसकी पैदावार सारी दुनिया में होने लगी. लेखक, युवाल नोआ हरारी अपनी किताब होमोसेपियंस में स्थापित करते हैं कि उत्तरजीविता और पुनरुत्पादन के बुनियादी विकास मानकों के अनुसार, गेहूं पृथ्वी के इतिहास की सबसे कामयाब वनस्पति बन चुका है. उत्तरी अमेरिका के विशाल मैदानों में जहां 10,000 साल पहले गेहूं का एक डंठल भी पैदा नहीं होता था वहां आज की तारीख में सैकड़ों किलोमीटर तक आपको गेहूं के अलावा कोई और वनस्पति नजर नहीं आएगी. पूरी दुनिया के स्तर पर मापें तो गेहूं भूमंडल की 25 लाख वर्ग किमी सतह को घेरता है, जो ब्रिटेन के आकार से दस गुना है.

यह घास एक नाचीज से सर्वव्यापी में कैसे बदल गई?

हरारी लिखते हैं, असल में, खाद्य संग्राहक और शिकारी इंसान अच्छा-खासा जीवन जी रहा था, पर फिर इसने गेहूं की खेत से ज्यादा से ज्यादा उद्यम लगाने की शुरुआत की. उसके बाद मनुष्य गेहूं के अलावा किसी और प्रजाति पर कम ध्यान देने लगा. गेहूं को चट्टानें और कंकड़-पत्थर पसंद नहीं थे इसलिए सेपियंस इन सब चीजों से खेतों को साफ करने में कमर तोड़ मेहनत करने लगे.

गेहूं को अपनी जगह, पानी और पोषक तत्व साझा करना पसंद नहीं था इसलिए लोग दिन भर खेतों की निराई करने लगे. कीड़ो और पाले पर निगहबानी जरूरी थी. खरगोश से लेकर चूहों तक से रक्षा जरूरी थी. गेहूं प्यासा था तो मनुष्य झरनों और नदियों से पानी ढोकर उसकी सिंचाई करते थे. यहां तक कि इसकी भूख ने सेपियंस को जानवरों का मल इकट्ठा करने को मजबूर कर दिया, ताकि पौधे को पोषण मिल सके.

खेतों में मेहनत करने और पानी की बाल्टियां ढोने की कीमत हरारी के मुताबिक, इंसान की रीढ़ों, घुटनों, गरदनों और तलुओं के मेहराबों को चुकानी पड़ीं. कृषि के विकास ने स्लिप डिस्क, गठिया और हॉर्निया जैसी बीमारियों को जन्म दिया.

लोगों की जीवन पद्धति बदल गई. खानाबदोश सेपियंस अब एक जगह बस गए. हरारी कहते हैं, हमने गेहूं को घरेलू नहीं बनाया, गेहूं ने हमें घरेलू बना दिया. डोमिस्टिक मतलब घर, घर में कौन रह रहा है? हम या गेहूं? जाहिर है, हम.

Friday, December 14, 2018

कल्पित वास्तविकताएं ही इस युग का सच हैं.

कल्पित वास्तविकताएं क्या है? एक साझा मिथक. ये झूठ नहीं होते. इस साझा मिथक में विश्वास करते हुए हम करोड़ों की संख्या में आपसी सहयोग कर सकते हैं. भारतीय चुनावों के संदर्भों में आप इसे इंदिरा लहर, राम लहर, मोदी लहर, सत्ता विरोधी लहर की मिसालों में समझ सकते हैं. जब पूरा देश एक खास नेता या विषय की लहर की चपेट में होता है. आखिर यह लहर पैदा कैसे होती है? क्या यह लहर भावनात्मक मुद्दों पर नहीं होती? इंदिरा लहर क्या उनकी हत्या से जुड़ी सहानुभूति से नहीं उपजी थी? या राम लहर एक खास स्थान पर मंदिर बनाने के भावुकता पर आधारित नहीं थी?


म और आप, बल्कि दुनिया के हर हिस्से में, हर समाज के पास अपने-अपने मिथक हैं. हर समाजे के अपने ईश्वर हैं. सिर्फ धर्मों के ही नहीं, बल्कि विभिन्न जनजातीय समुदायों के भी. पर जरा सोचिए कि एक होमोसेपियंस (यानी हम बुद्धिमान इंसान) जो शुरू में चिंपाजी जैसे ही थे, आखिर इन मिथकों की कल्पना कैसे कर सके? ईश्वर भी उन मिथकों में से एक है. पर थोड़ी देर के लिए अन्य बातों पर गौर कीजिए. आखिर जंगलों में भोजन खोजने के लिए भटकने वाले खाद्य संग्राहक, और आदिम खेतिहर लोग हजारों बाशिंदों से भरो शहरों और करोड़ो की आबादी वाले साम्राज्यों की स्थापना कैसे कर सके?

यह भी सोचिए कि आखिर, हम भारतीयों को कौन सी एक चीज है जो बतौर राष्ट्र एक सूत्र में बांधती है? या ब्रिटिशों को? या इन इस्लामिक जेहादियों को, जो पूरी दुनिया को दारुल-उलूम में बदलना चाहते हैं?

यह मैं ईश्वर के संदर्भ में नहीं, बल्कि विकासवाद के संदर्भ में पूछ रहा हूं.

असल में इसका रहस्य कल्पना के प्रकट होने में है. एक साझा मिथक में विश्वास करते हुए हम करोड़ों की संख्या में आपसी सहयोग कर सकते हैं. भारतीय चुनावों के संदर्भों में आप इसे इंदिरा लहर, राम लहर, मोदी लहर, सत्ता विरोधी लहर की मिसालों में समझ सकते हैं. जब पूरा देश एक खास नेता या विषय की लहर की चपेट में होता है. आखिर यह लहर पैदा कैसे होती है? क्या यह लहर भावनात्मक मुद्दों पर नहीं होती? इंदिरा लहर क्या उनकी हत्या से जुड़ी सहानुभूति से नहीं उपजी थी? या राम लहर एक खास स्थान पर मंदिर बनाने के भावुकता पर आधारित नहीं थी?

असल में बड़े पैमाने पर इंसानी सहयोग की जड़ें उन साझा मिथकों में फैली होती हैं, जिनका अस्तित्व सिर्फ समाज की सामूहिक कल्पना में होता है. दो मुस्लिम, या कैथोलिक इसाई कभी एक दूसरे से मिले भी न हों पर धर्मयुद्ध में एक साथ जा सकते हैं. अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए महाराष्ट्र और बिहार के कारसेवक हाथ मिला सकते हैं. या केरल बाढ़ राहत के लिए चंदा दे सकते हैं. क्योंकि इन दो इंसानों को विश्वास होता है कि ईश्वर ने इंसान के रूप में, या ईश्वर के पुत्र के रूप में अवतार लिया था और हमारे पापों से बचाने के लिए खुद को सूली पर लटका लिया था या केरल भी उनके राष्ट्र का एक हिस्सा है.

राष्ट्र राज्यों की कल्पना राष्ट्रीय मिथकों में फैली हैं. दो भारतीय जो आपस में कभी नहीं मिले, वो पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में एकदूसरे की जान बचाने के लिए खद को जोखिम में डाल सकते हैं. क्योंकि दोनों को भारतीय राष्ट्र, भारत माता और इसके तिरंगे में विश्वास है. 1947 के पहले यह स्थिति अकल्पनीय होती. जबकि 1965 में पूर्वी पाकिस्तान के लोग भारत के दुश्मन थे और 1971 में यह स्थिति बदल गई. इसी तरह न्यायिक व्यवस्था भी है. न्याय भी सामाजिक मिथकों का पारंपरिक संकलन ही है. डेढ़ हजार साल पहले हम्बूराबी के न्याय, 1776 के अमेरिका के स्वतंत्रता की घोषणा वाले न्याय और भारतीय संविधान के निर्माण में न्याय की दृष्टि बदली हुई है क्योंकि हमारे मिथक बदल गए.

हालांकि कुछ भी हो, इन सबका अस्तित्व उन कहानियों के बाहर नहीं होता है, जो लोगों ने गढ़ी होती है. जिन्हें वे एक दूसरे को सुनाते हैं. मनुष्यों की साझा कल्पना से बाहर विश्व में कोई और देवता नहीं है, कोई राष्ट्र, कोई पैसा, कोई मानव अधिकार, कोई कानून या न्याय नहीं है.

यह सब किस्सा है. कारगर किस्से कहना आसान नहीं होता. मुश्किल किस्सा सुनाने में नहीं, बल्कि उस पर विश्वास करने के लिए हर किसी को राजी करने में होता है. ज्यादातर इतिहास इस प्रश्न के इर्द-गिर्द चक्कर लगाता हैः ईश्वर, या राष्ट्रों, या सीमित दायित्वों वाली कंपनियों के बारे में गढ़े गए खास किस्सों पर विश्वास करने के लिए कोई व्यक्ति लाखों लोगों को किस तरह राजी करता है? जब भी इसमें कामयाबी मिलती है तो सेपियंस को अपरिमित शक्ति प्रदान करती है, क्योंकि यह लाखों अजनबियों को आपस मे सहयोग करने तथा साझा लक्ष्यों की दिशा में काम करने के लिए सक्षम बनाती है.

जरा यह कल्पना कीजिए कि अगर हम सिर्फ नदियों, वृक्षों, शेरों या उन्हीं जैसी सिर्फ वास्तविक चीजों पर बात कर सकते तो हमारे लिए राज्यों, राष्ट्रों और वैधानिक व्यवस्था का निर्माण करना कितना मुश्किल हो जाता.

किस्सों के नेटवर्क के माध्यम से लोग जिस तरह की चीजें रचते हैं, उन्हीं को कल्पना, सामाजिक निर्मितियों, या कल्पित वास्तविकताओं का नाम दिया जाता है. कल्पित वास्तविकताएं झूठ नहीं हैं. झूठ मैं तब कह सकता हूं कि दिल्ली में एक शेर इंडिया गेट के पास है. जबकि मैं जानता हूं कि इंडिया गेट पर कोई शेर नहीं है. झूठ में कोई विशेष बात नहीं होती है.

झूठ से उलट, कल्पित वास्तविकता एक ऐसी चीज होती है जिस पर हर कोई भरोसा करता है. जब तक यह सामूहिक विस्वास बना रहता है, तब तक यह कल्पित वास्तविकता संसार में अपने बल का प्रयोग करती रहती है. हम सब वैदिक देवताओं समेत नरसिंह और वराह जैसे अवतारों के अस्तित्व में यकीन करते हैं. कुछ ओझा धूर्त होते हैं लेकिन अधिकतर लोग ऐसे होते हैं जो सच्चे मन से देवों और दानवों के अस्तित्व में यकीन करते हैं.

संज्ञानात्मक क्रांति के बाद सेपियंस लगातार दोहरी वास्तविकता में रह रहे हैं. समझिए कि हम पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण मानते हैं लेकिन यह तो सिर्फ धरती के संदर्भ में है. अगर हम अंतरिक्ष में चले जाएं तो यह दिशाएं किधर जाएंगी? नदियों, वृक्षों, शेरों की वस्तुनिष्ठ वास्तविकता, और दूसरी तरफ देवताओं, राष्ट्रों और कंपनियों की कल्पित वास्तविकता. समय के साथ कल्पित वास्तविकताएं शक्तिशाली होती गईं. यहां तक कि वस्तुनिष्ठ  वास्तविकताओं का जीवन कल्पित वास्तविकताओं की कृपा पर निर्भर रहने लगा है.

जारी रहेगा...

***

Thursday, April 12, 2018

सन्तो जागत नींद न कीजै

जीवन में सबसे जटिल दिखने वाली चीजें सबसे सरल होती हैं, यह कहना किसी को उम्मीद का दिया दिखाने जैसा है. किसी लड़ रहे शख्स के अंदर के नैराश्य को मारकर उसे फिर से हथियार तान लेने के लिए तैयार करने जैसा. वैसे यह सत्य है कि ऐसी प्रेरणाओं की ज़रूरत सबको होती है. कुछ वैसे ही जैसे कि ईश्वर की.

ईश्वर की मौजूदगी आपको सबल बनाती है. आप ईश्वर को नहीं मानते (या खुद को नास्तिक कहते हैं) इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर का विरोध करें. या किसी मंदिर मस्जिद या किसी और पूजा स्थान न जाएं. नास्तिक होने के लिए किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होनी चाहिए. आजकल होती है. लोग कहते हैं तुम्हारे व्यवहार से तो लगता नहीं कि तुम नास्तिक हो. नास्तिक होना तर्कशील होना होता है. ईश्वर का विरोध करना नहीं. विरोध करना किसी के होने को स्वीकार्यता देना होता है और आप किसी के नहीं होने की बात को अंतःकरण से मानते हुए भी उसके होने से जुड़े कई कामों से जुड़ सकते हैं और आपको जुड़ना पड़ेगा.

फिर एक तरफ है परंपरा, दूसरी तरफ समाज तीसरी तरफ आपका विचार और चौथी तरफ आप खुद, यानी मैं. यद्यपि मैं मानता हूं कि अगर ईश्वर है तो वह ‘मैं’ ही है. अध्यात्म में ‘तुम’ का स्थान नहीं है. वहां अगर ईश्वर की अवधारणा है तो वह ‘मैं’ ही है. मैं का होना और विद्यमान होने को महसूस करना ही ईश्वर की खोज है. वस्तुतः सत्य यही है.

फिर सत्य की अवधारणा को लेकर कई सवाल हैं. आखिर, सत्य क्या है? जो आपने सुना क्या वह सत्य है? क्या आपने अपनी आंखों से देखा वह सत्य है? आप कहेंगे शायद हां.

सुनी हुई बातें तो आधी सच्ची आधी झूठी. आंखो देखी को आप सत्य मान सकते हैं, लेकिन यकीन करिए वह भी सत्य हुआ नहीं करतीं. एक ने कहा है, Reality is merely an Illusion.

यथार्थ महज एक संभ्रम है. मैं बताता हूं कैसे.

देखिए, पृथ्वी से सबसे नजदीक का तारा है सूर्य और दूसरा सबसे नजदीक का तारा प्रॉक्सिमा सेंचुरी है. प्रकाश की गति करीब 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड होती है और सूर्य पृथ्वी से कोई 15 करोड़ किमी दूर है. इस तरह, सूर्य की रोशनी पृथ्वी तक पहुंचने में 8 मिनट और 20 सेकेंड का वक्त लेती है.

इसीतरह, प्रॉक्सिमा सेंचुरी पृथ्वी से कोई साढ़े 4 प्रकाश वर्ष दूर है. एक प्रकाश वर्ष यानी एक साल में प्रकाश जितनी दूरी तय करे. याद रखिए प्रकाश की गति एक सेकेंड में 3 लाख किमी है.

अब फर्ज कीजिए कि सूर्य की बत्ती अचानक गुल हो जाए तो हमें यह पता चलने में 8 मिनट बीस सेकेंड लगेंगे और प्रॉक्सिमी सेंचुरी का दिया बुझ जाए तो हमें यह पता चलने में साढ़े चार साल का वक्त लगेगा.

इसके बरअक्स, हम अगर कोई ऐसा यान बना लें, जो प्रकाश की गति से चले और हम प्रॉक्सिमा सेंचुरी की तरफ ही चल पड़ें तो दो साल चलने के बाद हमारे पास वह सूचना होगी जिसकी पृथ्वी पर पहुंचने में दो साल और लगेंगे. यानी हम भविष्य की यात्रा पर होंगे. प्रॉक्सिमा सेंचुरी और सूर्य जैसे खबरों तारे हमारी आकाशगंगा में, विभिन्न मंदाकिनियों में और पूरे ब्रह्मांड में मौजूद है. जिनमें से ज्यादातर हमसे कई करोड़ प्रकाश वर्ष दूर हैं. यानी हम अपनी खुली आंखों से आसमान में जो तारे देखते हैं उनमें से कई असल में मौजूद हैं ही नहीं. यथार्थ वाकई भ्रम ही है. इसलिए भ्रम को सत्य न मानिए.

सन्तो जागत नींद न कीजै.

आइए, वापस धरती पर लौटते हैं, जहां प्रकृति ने हमें एक ज्यादा अनमोल उपहार सौंपा है. जिसे हम प्रेम कहते हैं. एक तरफ हम कहते हैं अहं ब्रह्मास्मि. मैं ही ब्रह्म हूं. ब्रह्म में मैं ही हूं...

दूसरी तरफ कहते हैं, मैं तो कूतरा राम का मोतिया मेरा नाम.

प्रेम का कौन सा स्वरूप आपको भाता है? पूजित होना या मंसूर की तरह अन लहक, अन लहक कहकर अपने यार के लिए खुद को बिसरा देना? विकल्प आपके पास है. खुशी किससे ज्यादा मिलती है? जो भी हो यह अनंत की दिव्य विभूति है जो जीवन का आवश्यक अंग है.

क्या आपको अपने प्रिय तक पहुंचकर भावोन्माद होता है? आपकी आंखें भर आती हैं, मन में कसक उठती है? कि इसकी ताबीज की तरह गले से लटकाकर मलंग बन जाऊं?

सोचिए, अगर इंन्द्रियां अपनी-अपनी कार्यशक्ति एक-दूसरे से बदल ले तो संसार में क्या परिवर्तन हो जाएगा? मसलन, हम रंगों को सुनने लगें और ध्वनियों को देखने लगें तो हमारे जीवन में क्या अंतर आ जाएगा?

अपनी किताबह मिस्टिसिज्म में अंडरहिल लिखते हैं,

I Heard flowers that sounded and saw notes that shone.

मैंने उन फूलों को सुना जो शब्द करते थे और उन ध्वनियों को देखा जो जाज्वल्यमान थीं.

प्रेम में शरीर की सारी शक्तियां निरालम्ब होकर अपने को अनन्त की गोद में छोड़ देती हैं. एक तरफ यथार्थ है, जो संभ्रमित करता है अगर आप उस पर विचार करें, दूसरी तरफ अहं ब्रह्मास्मि है जो आपको कहता है कि ब्रह्मांड के केंद्र एक मात्र आप ही है और दुनिया के सार काम आपको केंद्र में रखकर होने चाहिए तीसरी तरफ प्रेम है, जिसमें अगर आप हैं तो आप जॉन स्टुअर्ट ब्लैकी की तरह कहते हैं,

As Fishes swim in briny sea,

As Fouls do float in the air,

From thy embrace we cannot flee,

We breathe and thou art there.

(जिसतरह मछलियां समुद्र में तैरती हैं, जिस प्रकार परिन्दे हवा में झूलते हैं, तेरे आलिंगन से हम अलग नहीं हो सकते. हम सांस लेते हैं, क्योंकि तू वहां मौजूद है.)
यह अनुभूति इतनी दिव्य और अलौकिक होती है कि संसार के शब्दों में स्पष्टीकरण असंभव नहीं तो कम से कम कठिन जरूर है. आप खुद को मैं समझें या खुद को तुम समझें, लेकिन बाकी के लोगों के विचार उस गहराई तक नहीं पहुंच सकते जहां वह जटिल को जटिल और सरल को जटिल और सरल को सरल या जटिल को सरल समझने की पर्याप्त व्याख्या कर सकें.

खुद को और तुम को भी, मैं समझने की स्थिति एक सफर है, उस दिव्य अनुभूति में इंद्रियां अपना काम करना भूल जाती हैं. वे निस्तब्ध होकर अपना काम-काज अव्यवस्थित रूप से करने लगती हैं. इसका विश्लेषण करें तो उसमें हम जाने कितने गूढ़ रहस्यों पर से परदा उठा सकते हैं. फारसी के कवि शम्स तबरीज लिखते हैं,

ब यादे बज़्मे विसालश् दर आरज़ू ए जमालश्

फ़ुतादा बे ख़बर अन्द ज़ेआँ शराब कि दानी

चि खुँशबूअद कि बदूयश बर आस्तान ए कूयश

बराए दीदने रूयश शमे बरोज़ रसानी

हवा से ज़ुल्मए खुद रा बनूरे जाने तो बर अफ़रोज़

(दीवान-ए-शमसी तबरीज़)

(उसके सम्मलिन की स्मृति में,

उसके सौंदर्य की आकांक्षा में,

वे उस मदिरा को—जिसे तू जानता है—

पीकर बेसुध पड़े हैं.

कैसा अच्छा हो कि उसकी गली के द्वार पर

उसका मुख देखने के लिए

वह रात को दिन तक पहुंचा दे

तू अपने

शरीर की इंद्रियों को

आत्मा की ज्योति से जगमगा दे.

ज्ञान की अवस्था चार तरह की होती है, पहला आप जानते हैं कि आप क्या जानते हैं. दूसरा, आप जानते हैं कि आप क्या नहीं जानते. तीसरा आप नहीं जानते हैं कि आप क्या जानते हैं और चौथा आप नहीं जानते कि आप क्या नहीं जानते.

विज्ञान इन चारों कसौटियों पर खुद को सकता है. इसलिए वह विज्ञान है. जो वह नहीं जानता उसे जानने की कोशिश करता है. विज्ञान में कुछ भी अंतिम सत्य नहीं है. नए समाधान हमेशा अपनाए जाते हैं. अध्यात्म में भी थोड़ा बहुत ऐसा है लेकिन कर्मकांड तो कत्तई नहीं है. विज्ञान इसीलिए मौलिक है. धर्म इसीलिए रोकता है. ईश्वर की जो सत्ता है, उस पर आप सवालिया निशान खड़े नहीं कर सकते. समाज आपको रोकेगा, और तब अनहल्लाज मंसूर की तरह आप अपनी अनुभूति के गीत गाते-गाते थक जाएंगे, लोग समझ ही नही पाएंगे, समाज आपको ईश्वरीय सत्ता का विनाश करने वाला समझकर मंसूर की ही तरह धड़नतख्ते पर भी झुला सकता है.

इसलिए आप तर्कवादी है, आप के पास ईश्वर, सत्य और यथार्थ से जुड़े अपने तर्क हैं तो आप को चुप रह जाना पड़ता है. आपके पास अपार प्रेम है तो आप कई दफा खामोश रह जा सकते हैं कि जिससे आप प्रेम कर रहे हैं वह इसको कितना समझेगा, किस स्तर तक समझेगा, समझेगा भी या नहीं,

नश्वर स्वर से कैसे गाऊं आज अनश्वर गीत!


जारी रहेगा







Thursday, November 10, 2016

मंगल ठाकुर की मैथिली कविताः दो

आबहु आऊ अहां अशेष,
बड़ सहलहुं अछि आब कलेष,
मेटल ठोप, बहल दृग अंजन
नहिं आओल अछि किछु संदेश।

बीतल दिन बीतल ऋतु चारि
अंकुर निकसल धरती फारि
पुलकित सब कुंठित हम छी
बाटि तकैत गेल फाटि कुहेस।

स्नेहसिक्त लोचन स्वामी के
आलिंगन दुनू प्राणी के
नयन कलश में भरल अश्रु-जल
पुलकित मन अर्पण प्राणेश।

मूल मैथिली कविताः मंगल ठाकुर

हिन्दी अनुवादः मंजीत ठाकुर

अब आ जाओ मेरे अशेष
सहा न जाए विरह क्लेश
मिटी बिन्दी और बह गए अंजन
मिला न कुछ तेरा संदेश।

बीते दिन, बीते ऋतु चार
हरियाई धरती भी अपार
पुलकित सब, मुझे विरह-विषाद
बाट देखती रहा न शेष।

स्नेहसिक्त लोचन वाले तुम
आलिंगन लोगे कब, सुन तुम
नयन कलश में भरे अश्रु-जल
पुलकित मन अर्पण प्राणेश।








Tuesday, November 1, 2016

मौत से मुलाकात का वाकया

वाकया पिछले साल का है। बिहार में चुनाव का दौरे-दौरा था और हम उसी तरह हम भी इलाके में घूम रहे थे। पिछले साल 30 अक्तूबर को दीवाली नहीं थी। दशहरे के बाद का मौसम था..।

मधुबनी में रजनीश के झा से मुलाकात के बाद, और उनके घर में शानदार भोजन के बाद हमने रात दरभंगे में बिताई  और हम सहरसा-अररिया में महादलितों पर आधे घंटे कि स्पेशल स्टोरी के लिए निकल पड़े थे। तारीख थी 30 अक्तूबर की। 

दिन भर शूट करने के बाद हम और आगे निकलते गए। कोसी के कछारों की तरफ...लेकिन शाम 4 बजे ही बूंदा-बांदी शुरू हो गई और अंधेरा छा गया। अब कैमरा नाकाम हो जाने वाला था। अंधेरे में कुछ शूट करना मुमकिन नहीं था। 

फिर हम वापस लौट चले। 

हमें पूर्णिया जाना था क्योंकि 1 नवंबर को पूर्णिया में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली थी। और वहां से खबरों का पुलिन्दा गिरने की उम्मीद की जा रही थी। बिहार के इस इलाके में आखिरी चरण में मतदान होना था और यह निर्णायक भी था। 

बहरहाल, पूर्णिया का फोरलेन ट्रैक पकड़ने से पहले हम स्टेट हाईवे पर चल रहे थे, और अररिया के पास सात बज गए थे। स्टेट हाईवे बना तो अच्छा है और वाकई अच्छा बना है लेकिन सड़को के किनार साइनेज़ नहीं लगे हैं। यानी आप अगर रात में चल रहे हैं तो आपको क़त्तई गुमान नहीं होगा कि आगे मोड़ है या है भी तो कितना है। अस्तु।

तो साहब, रात के घुप्प अंधेरे में गाड़ी में हम चार लोग थे। मैं, कैमरामैन आरके, कैमरा असिस्टेंट श्रीनिवास और ड्राइवर तिवारी। गाड़ी की स्पीड सत्तर से थोड़ी ऊपर ही। मैं अगली सीट पर बैठना पसंद करता हूं तो नज़र चली ही जाती है स्पीडोमीटर पर।

अब अगले तीन सेकेन्ड की कहानी सुनिएः 

चले जा रहे थे कि अचानक, ड्राइवर ने स्टीयरिंग घुमानी शुरू की, मैंने देखा सामने सड़की में मोड़ है। कितना मोड़ है यह अंदाज़ा नहीं। स्पीड में गाड़ी घूमती ही जा रही थी कि अचानक सामने से ट्रक की हेडलाइट से पता चला कि मोड़ और भी हैं। ट्रक से बचने के लिए ड्राइवर ने स्टीयरिंग को हल्की-सी जुंबिश दी, अपनी तरफ काटा। बस फिर क्या था, गाड़ी कोलतार से नीचे उतरी। कोलतार और मिट्टी में करीब एक फुट का अंतर था। मेरे पैरों के नीचे वाला पहिया नीचे झुका कि बस गाड़ी फिसल गई और ऊपर सड़क से नीचे पंद्र फुट गड्ढे में जा गिरी। 

और सिर्फ गिरी क्यों...एक के बाद एक चार पलटे खाए। मेरी आंखें खुली हुई थीं। स्थिति की नज़ाकत को देखते हुए मैंने विंडो के ऊपर वाले हैंडल को मजबूती से पकड़ लिया और पैर आगे जमा दिए। मुझे लगा कि मैं भी गाड़ी की बॉडी का हिस्सा बन गया हूं। गाड़ी के साथ ही सारी मूवमेंट, बाकी शरीर को गाड़ी से साथ जकड़ दिया। सांस ऊपर की ऊपर, नीचे की नीचे...।

चार बार पलटने के बाद पांचवी बार में गाड़ी की छत नीचे और पहिए ऊपर। 

तीन सेंकेन्ड पूरे। 




मुझे भान हुआ कि मैं एक उलटी हुई गाड़ी में हूं और इंजन अब भी चालू है तो सामने वाली खिड़की के टूटे हुए कांच के रास्ते बाहर आया। कैमरामैन आरके और श्रीनिवास बाहर निकाले। ड्राइवर फंसा हुआ था, उसे भी हमलोगों ने निकाला। 



तब तक ग्रामीणों की भीड़ आ गई थी। मुझे आशंका थी कि गाड़ी में से धुआं निकल रहा है कहीं आग न लग जाए। तो हमने पहले तो सबको किनारे किया। फिर जब आग की आशंका कम हुई तो सबने अपने सामान ढूढे। एक ग्रामीण ने मुझे बताया कि सब सामान इकट्ठा कर लो, नहीं तो लोग ऐसे हैं कि चुरा ले जाएंगे। ऐसा पहले भी कई बार हुआ है। 


मैं ने खुद को हिला-डुलाकर देखा। मैं सही सलामत था, कंधे पर चोट आई थी जो अब भी बरकरार है। श्रीनिवास की पसलियों चोट थी जो बाद में दिल्ली आकर पता लगा कि फ्रैक्चर था। 

आरके सही सलामत है। उसकी शादी कुछ ही महीनों बाद थी और मुझे उसकी चिंता अधिक थी। 

थोड़े आपे में आए तो हमने अपनी दूसरी टीमों को फोन किया। दफ्तर को बताया सारी अस्पताल में कटी। पूर्णिया में। वहां से विनय तिवारी गाड़ी लेकर आए थे। हमे ले जाने के लिए। हमारा ड्राइवर भी सही सलामत था। 

शुक्र यह रहा कि चोट किसी को बहुत ज्यादा नहीं आई। वरना मौके पर पहुंचे दारोगा ने हमें बताया कि इसी मोड़ पर 28 एक्सीडेंट हो चुके हैं दो साल में। और अभी तक यहां दुर्घटना में कोई नहीं बचा था। 

हम बच गए। 

और सच कहूं तो मुझे लगा था कि किसी ने मुझे गोद में उठा लिया है। अगले दिन भाई गिरीन्द्रनाथ आए थे। मिलने के लिए। बहुत सारी बातें बताईं उन्होंने मुझे, उसका किस्सा फिर कभी।






Monday, September 5, 2016

चीटरों के दौर में टीचर

मधुपुर मेरा जन्मस्थान तो है ही, इसने यह भी तय किया कि मैं किस तरह का इंसान बनने वाला हूं। अपने भैया मंगल ठाकुर को अपना पहला गुरु मानता हूं, जो मेरी हर कामयाबी पर उछले, हर नाकामी पर परेशान हुए।

फिर सुबल चंद्र सिंह, जिन्होंने अपने सभी छात्रों की सखुए की संटी से पीट-पीटकर बंदर से इंसान बनाने की कोशिश की। लेकिन हाय दैव, उनके ज्यादातर छात्र आज भी बंदर ही हैं। दिनेश सर, जो गणित को सरलता से समझा देते थे। 

व्रजनारायण झा, जिन्होंने मुझे संस्कृत पढ़ाते वक्त सीधा बता दिया, व्याकरण गणित की तरह है, लेकिन इसमें कुछ समझ न आए तो सीधा रट लो। एमएलजी उच्च विद्यालय, जहां मैने दसवीं तक पढ़ाई की, वहां अलाउद्दीन अंसारी सर इतिहास पढ़ाते थे। पढ़ाते वक्त संभवतया वह टाइम मशीन में बैठकर उस दौर में पहुंच जाते, जिस दौर का अध्याय वह पढ़ा रहे होते थे। अलाउद्दीन सर ने अपनी कक्षाओ में हमें शनिवार को आधी छुट्टी के बाद हमारे संभावित क्रिकेट मैच की योजना बनाने का पूरा मौका दिया। वह किताब में रमकर हमें अकबर, शाहजहां और बलबन के बारे में बताते रहते थे, और हम फुसुर-फुसर करके यह तय करते थे कि बैटिंग में किस नंबर पर कौन उतरेगा। 

अंग्रेजी पढ़ाते थे रफीक़ सर। उन दिनों बिहार (तब, आजकल वह इलाका झारखंड में आता है) में अंग्रेजी की छात्रों से मुठभेड़ छठी कक्षा में होती थी, और मान लिया जाता था कि पांचवी कक्षा तक तो छात्रों ने अंग्रेजी खुद-ब-खुद मां-बाप से सीख ही ली होगी। तो रफीक़ सर, अंग्रेजी पढ़ाते थे और यह मानते थे कि वह जो फर्राटेदार अंग्रेजी छठी-सातवीं-आठवीं के छात्रों के सामने बतियाते थे, तो यह सोचते थे कि इन सबको समझ में आ रहा होगा। अंग्रेजी बोलने का उनका  लहज़ा  खोरठानुमा था। खोरठा मधुपुर के आसपास बोली जाने वाली बोली है, जिसमें मैथिली-बांगला-और संताली के शब्द घुलेमिले होते हैं। बहरहाल, किसी का ध्यान भटकने पर रफीक़ सर ब्लैक बोर्ड के पास से ही चॉक फेंककर सीधे छात्र के मुंडी पर निशाना लगाते थे और कहतेः अंग्रेजी नहीं पढ़नी हो तो जाओ, गणेश की दुकान पर जाकर घुघनी-मूढ़ी खाओ। (घुघनीः काले चने के छोले, मूढ़ीः चावल के मुरमुरे)

मौलाना सर की फ़ारसी की क्लास में हम दुनिया के नक्शे के बारे में पढ़ते क्योंकि वह पिताजी के दोस्त भी थे और फ़ारसी की कक्षा के वक्त तक स्कूल में सारे बच्चे भाग निकलते थे।

बहुत शिक्षकों ने पढ़ाया, सिखाया, मुझे बनाने और बिगाड़ने में अपनी अहम भूमिका अदा की। इनमे आलोक बक्षी का नाम बहुत आदर से लेना चाहता हूं।

बाद में कई शिक्षक हुए जिन्होंने मुझे बनाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। उन सभी गुरुओ और सबसे बड़े गुरू वक्त के सामने सिर झुकाता हूं, जिसने दुनिया को समझने की थोड़ा सा सलीका मुझे सिखा दिया है। यह जरूर है कि अपनी बाजिव कीमत लेकर।

मंजीत

Friday, June 17, 2016

बाबूजी की चिट्ठी मेरे नाम

दौड़ पड़ते थे जब
तुम्हारे नन्हें नन्हें पाँव
बारिश भीगी मिटटी में
अपने नाज़ुक निशाँ छोड़ने
छुआ था कितनी ही बार
मेरी हथेलियों ने उन्हें
और तुम ये समझे
कि रुखे मैदान में
घास का एक मामूली टुकड़ा होगा
बिखर जाते थे जब
तुम्हारे उलझे उलझे बाल
माँ से नाराज़
तुम्हारी आँखों पर
सम्हाला था कितनी ही बार
मेरी उँगलियों ने उन्हें
और तुम ये समझे
कि छू के गुज़रा
हवा का एक मामूली झोंका होगा
तुम्हारी फ़िक्र
तब भी उतनी ही थी मुझे
बैठते थे जब तुम
क्लास की आखिरी सीटों पर
जितनी अब होती है
भूलते हो जब तुम
सुबह का नाश्ता
रात का खाना
बहुत से काम के बहाने से,
तुम्हारे हाथ में सिगरेट
बुरी नहीं लगती
मुस्कुरा देता हूँ
कि नन्हीं उंगलियाँ
अब नन्हीं नहीं रहीं
थामने लगी हैं
कितने रिश्तों की डोर
बुरा लगता है
तो बस वो डर
जो चला आता है
तुम्हारी सिगरेट के
धुंए के साथ
डरने लगता हूँ
कि इस धुंए में
धुंधला न जाएँ
कहीं वो आँखे
जिनमें जलते हैं
तुम्हारे नाम के दिए
मैं अब भी हूँ
उन दीयों कि लौ में
और इस बार
तुम सही समझे
कि उन आँखों में
तुम्हारा प्यार पलता होगा

Sunday, May 8, 2016

इक शहर की हसरतें- मेरा मधुपुर

"मैं इक शहर हूं
मेरी भी कुछ हसरतें हैं
कभी मुझसे भी पूछकर तो देखो
कि मैं चाहता क्या हूं !"
----(उत्तम पीयूष)

क्या मधुपुर उस तांगेगाडी की तरह नहीं है जो हमारे कहने पर हांका जाता है पर न तो हम गाडीवान की इच्छाएं जान पाते हैं और न गाडी खींचने वाले घोडे की ख्वाहिशें ही समझ पाते हैं।

आज पता नहीं क्यों ऐसा लगने लगा है कि फिर से एक ऐसी पीढी -एक ऐसा जेनरेशन आया है जो मधुपुर की संवेदनाओं से बावस्ता है।फिक्र है मधुपुर की।आये दिन मैं देखता हूं कि मेरे कई नौजवान दोस्त अपनी चिन्ताएं,अपना प्यार और अपनी जिग्यासाएं जो मधुपुर से जुडी होती हैं -वे पोस्ट करते रहते हैं।यह अच्छा शगुन है इजहार ए इश्क का।यह शुभ लक्षण है मित्रो।

मधुपुर को लेकर यदि कोई शहरी भावुक न हो, इमोशनल न हो तो चिंता होती है। पर यह भावुकता महज किसी आरोप-प्रत्यारोप के लिए नहीं, मधुपुर के हाल-ए-दिल को अहसास करने के लिए हो तो बेहतर होगा। हमारी चिन्ताओं का रेंज सदियों का हो तभी कुछ नया गढा जा सकेगा।आपको शायद पता हो कि हमारे इंजीनियर्स जब नदियों पर पुल बनाते हैं तो यह भी आकलन करते हैं कि इस नदी में सौ साल में कब ,कितना, किस हाईट तक पानी आया था और आगे के दशकों में इसकी क्या संभावनाएं हैं।

मधुपुर को गढने /बनाने वालों ने भी मधुपुर को पहले अपने तसव्वुर में बसाया था,ख्वाबों में संजोया था ।एक चालू विग्यापन की तर्ज पर कहें तो-"यूं ही नहीं मैं मधुपुर हो जाता हूं।"

द मेकिंग आफ मधुपुर की कथा जब जब समय मिला आप दोस्तों से शेयर करता जाऊंगा। पर, इस वक्त मैं चाहता हूं कि हम सभी जो मधुपुरी हैं और अपने अपने तरह से अपनी 'मधुपुरियत ' की फिक्र करते हैं,जगह जगह चाय की चुस्कियों के साथ चिन्ता करते हैं-कुछ बेहतर करना चाहते हैं,अपने शहर को सुन्दर ,हसीन और आत्मीय बनते देखना चाहते हैं -कुछ रचनात्मक -कुछ क्रियेटिव करना चाहते हैं तो थोडा करीब आईए -अरे एकदम पास। अरे हां,मनोज जी,मंडल जी,यादव जी या स्टेशन की इस्पेशल चाय पिला रहा भाई पर क़रीब तो आईए।एक बात बोलूं ?? अपने शहर से अकेले में पूछिए -वह आपके कान में कुछ कहना चाह रहा।इसीलिए तो कह रहे जरा करीब आईए।यह करीब होना भी जरूरी है।

मधुपुर शहर कह रहा जरा धीमी जुबान से ही सही -पर कह रहा-"भईया। एक ठो हमारा भी "जन्मदिन" मना दो न। कितना अच्छा लगता है जब सबका "हैप्पी बर्थ डे"मनता है।पार्टी होती है,खुशियां आती है,लोग बधाईयां देते हैं और गिफ्ट भी देते हैं।मुझे भी मन करता है अपने जन्म का केक काटूं और आपलोगों को खिलाऊं।"
लीजिए,गरमागरम चाय भी आ गयी।मुझे लगता है शहर ए मधुपुर की बात सुननी /समझनी चाहिए।वो जो जिन्दा है जमाने से हमारी खिदमत में /उसके लिए कुछ ऐसा करें यह तो फर्ज है।

मधुपुर का जन्मदिन मनाना दरअसल मधुपुर का पुनर्उद्भव जैसा कुछ होगा।हम मधुपुर के इतिहास से जुडेंगे,उसे महसूस करैंगे और इतिहास को आने वाली नस्लों में रोपैंगे।यह दिन मधुपुर का होगा।मधुपुर के प्रत्येक नागरिक का होगा।सब खुश होंगे और सब अपने अपने तरीके से कुछ न कुछ कंट्रीब्यूट करैंगे।यह हम सबका उत्सव होगा।

जो इतिहास में था उस चेतना,उस संवेदना,उस जज्बात का यह "नया जन्मदिन"होगा।

--उत्तम कुमार पीयूष

Sunday, February 28, 2016

अकेला पलाश

आगे जाने का रास्ता बहुत थका देता है कभी। मन करता है सुस्ता लूं, छांव के नीचे। हमारे शहर मधुपुर के पास एक पहाड़ी है। गौर किया था मैंने, पूरे पहाड़ की चोटी पर अकेला खड़ा पलाश का ऊंचा-सा पेड़ था। 

पहाड़ पर झाड़ियां भी थीं, और भी पेड़ थे। लेकिन चोटी पर अकेला था पलाश। गरमी में खिलता था, तो लगता था पहाड़ी को चोटी पर आग लगी हो। पलाश को ऐसे भी जंगल की आग कहते ही हैं। आज भी याद है मुझे, पलाश के फूलों को देखकर कितना बढ़िया लगता था।

पहाड़ी पर एक-दम से लाल-चटख पेड़। 

आज ध्यान देता हूं तो एक बात और समझ में आती है। पेड़ अकेला था। अकेलापन दुखदायी होता है। मैं फेसबुक पर भी हूं, ट्विटर पर भी, इंस्टाग्राम में भी हूं, टीवी में काम करता हूं, लिखता हूं, अखबार में भी, ब्लॉग पर भी। लिखना पेशा भी है, शगल भी।

संवाद के माध्यम है सारे। लेकिन फिर भी अकेलापन क्यों महसूस होता है। भीड़ है। दिल्ली में जहां घूमिए भीड़ ही भीड़ तो है। दिल्ली से बाहर जाएं तो कोई ऐसी जगह नहीं मिलेगी, जहां भीड़ नहीं। तो इतनी भीड़ में भी आदमी अकेला कैसे महसूस करता है। 

ऐसा कहां है कोई जिससे मन की सारी बातें बताईँ जा सकें। कुछ बातें हैं जो आप परिवार के साथ भी नहीं बांट सकते। बेटे के सामने अच्छा पिता बनने की, पत्नी के साथ अच्छा पति बनने की, अच्छा बेटे बनने की, अच्छा भाई बनने की न जाने कितनी सारी परीक्षाएं हैं। किसी में फेल हुए तो जीवन भर की कमाई लुट गई समझिए। 

हर परीक्षा में उत्तीर्ण होना जरूरी। कंपलसरी। 

ऐसा नहीं कि इन परीक्षाओं से मुझे ही दो-चार होना पड़ रहा है। मेरे जैसा हर कोई होता होगा। हो सकता है मिड लाइफ क्राइसिस हो। पैंतीस साल का हो गया हूं, अधिक का। 

लेकिन उम्र के हर मोड़ पर समझौते करते जाने के बाद, कई बार लगता है कि एक बार कोई एक ऐसा हो, जिसके साथ आप अपने सारी बातें शेयर कर सकें। 

ब्लॉग पर यह लिख रहा हूं तो शायद अकेलापन महसूस कर रहा हूं, वह हल्का हो जाए। इतना तो समझ में आ गया है कि रिश्तों को जोड़ने वाला जो सीमेंट पैसा है, उसको कमाने के चक्कर में दिन-रात की भागदौड़ में हमारे हाथ में हासिल बचने वाला अंडा ही है। 

ऐसे में लाजिम है कि पहाड़ी का वह पलाश याद आए, अभी मधुपुर में वह खिला होगा। पहाड़ी पर उस पलाश को किसी ने काट न फेंका हो, तो यही तो मौसम है टेसू के खिलने का। 

पलाश मैं तुम्हें बहुत याद करता हूं. मधुपुर तुम्हारे बिना मेरा जीवन अधूरा है। 

Tuesday, January 26, 2016

यह तेरा इंडिया, यह मेरा इंडिया

पूरा देश गणतंत्र दिवस मना रहा है। हम भारत के लोग उत्सवप्रिय हैं। ईद-दशहरे-होली-क्रिसमस से लेकर वैलेंटाईन डे तक सब मनाते हैं। जोश-ओ-खरोश से मनाते हैं। 

मैं इस मौके पर बदमज़गी नहीं करना चाहता, यह सवाल पूछ कर कि अपना यह गणतंत्र कितना गण के हिस्से में है और कितना तंत्र के हिस्से में। 

लेकिन देश देखा है मैंने। जम्मू-कश्मीर सूबे में अक्साई चिन् से अंडमान निकोबार द्वीपसमूह के हैवलॉक टापू तक। देश देखा है मैंने। सच में अद्भुत है। 

हिन्द सा कोई नहीं। विदेश देखा मैंने। मॉस्को से टोक्यो तक। हिन्द सा कोई नहीं। 

हमने जो देखा, वो अपनी निगाहों से देखा। धूमिल-गोरख-इंशा-बाबा-पाश-त्रिलोचन-सांस्कृत्यायन सी आंखे कहां से लाऊं? मेरी आंखें एक छोकरे की आंखे हैं, जो पथरचपटी का है। जिसके पास पांव है और है एक अदद साइकिल। आंख है, और दिल है, जो देश को आंखों में दिल में संजो लेता है।

जब छोटे थे अलसभोर में जागकर स्कूल जाते। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में सुनते मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरा-मोती। जलेबियां खाते। देश के लालों की तस्वीरें देखकर, देशभक्ति का जज्बा दिल में भरते, शाम को टाउन हॉल में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम में अपने हिस्से के  नाटक की तैयारी करते...। दिन बीत जाता। 

महेन्द्र कपूर की आवाज़ मेरे दिल में जगह बनाए रही थी। देश की माटी सोना उगलती है, हीरा मोती उगलती है। कहां उगलती है? इसी की खोज में लगा रहा हूं। 

देश में बहुत घूमा। बंगाल से लेकर कर्नाटक तक, पंजाब-हरियाणा-गुजरात से लेकर यूपी-मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड तक। 

गणतंत्र है। गुणतंत्र नहीं है। जन के लिए तंत्र ने रास्ता तंग कर दिया है। लेकिन, महान हिमालय में ग्लेशियरों को देख लीजिए या लक्षदीव और अंडमान में समंदर के नीले-मोरपंखी  पानी को, बिहार-बंगाल में धनखेतो की हरीतिमा को देख लीजिए या यूपी-पंजाब-हरियाणा में गेहूं की सुनहरी बालियों को, छत्तीसगढ़ में साल के वन की हरियाली से आह्लादित होइए कि  झारखंड के पलाश जंगलो के खिलने पर उसे जंगल की आग समझिए, बिना भारत को देखे भारत को समझा नहीं जा सकता। 

भारत को समझेंगे तो इसकी समस्याएं भी समझ  में आ जाएंगी। 

भारत को समझना है तो गंगा को समझिए, गंगा को बचाइए। गंगा के किनारे हमने एक लंबा सफर किया था, गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक, इस सफर ने हमें भारत को समझने में बहुत मदद की थी। 

गुजरात में राजकोट के पास थाण में एक मंदिर है। पांडवकालीन। कभी वहां जाइए। मकरसंक्रांति के दिनों वहां जनजातीय मेला लगता है। लड़कियों को छूट होती है अपना लड़का चुनने की। तरनेतर का मेला कहलाता है। 

राजस्थान जाएं तो करणी माता का मंदिर देखिए, लेह का दौरा करें तो मैग्नेट हिल के साथ जांस्कर-सिंधु का संगम देखिए, बंगाल जाएं तो अलीपुर दुआर के पास मदारीहाट अभयारण्य जाएं पता लगेगा आपको कि गैंडे सिर्फ काजीरंगा में ही नहीं, बंगाल में भी पाए जाते हैं। 

गोवा आप जाते रहते होंगे, छुट्टियां मनाने। गोवा यानी नशा, बीच और लड़कियां। है ना। लेकिन रूकिए। गोवा जाएं तो वहां पणजी से ठीक तीन किलोमीटर दूर मांडवी नदी के पास एक बर्ड सेंचुरी है। वहां जाकर आपको जो मजा आएगा वह कोलुंगगुट बीच के मजे से अलहदा होगा। 

भारत के जंगलों में हरेपन की किस्में देखिए। गौर कीजिए। अगर हरेपन के सबसे शेडी हिस्से को देखना है तो अरूणाचल के अनछुए सौन्दर्य को देखने जाइए। नामदफा के जंगलो में। काला हरापन है। 

झारखंड में पत्थरों के बीच नदियों की अठखेलियों पर नजर डालिए। घूमने के लिए विदेश ही क्यों...देश में बहुत कुछ है। समस्याएं कहां नहीं होतीं, अच्छा हो कि हम समस्याओं का हल खोजें लेकिन उससे पहले अपने अद्भुत भारत पर गौरव करना सीखें। 

देशभक्ति किसी पार्टी विशेष की संपत्ति नहीं और न ही इसका कोई खआस रंग है। देशभक्ति का मतलब सरहद पर जाकर गोली चलाना ही नहीं है। अपने कर्तव्यों का पालन करें तो यह भी देशभक्ति ही है। 

बाकी जो है सो तो हइए है। 

Saturday, March 7, 2015

आई डोंट मिस एनिथिंग!

मेरे घर के बच्चों ने होली की तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट की हैं। उससे पहले बड़े भैया ने चांद की तस्वीरें पोस्ट की थीं...कैप्शन देते हुए। होली पर मेरे भाई, भतीजे, भांजे...सब एक साथ थे। मैं नहीं था।

मेरा घर मधुपुर में था। मेरा घर मधुबनी में भी था। अब मैं वैशाली में रहता हूं। जो न दिल्ली है, न यूपी है। दोनों का अजीब-सा सम्मिश्रण है। यूपी वाली अराजकता है, दिल्ली जैसे लोग हैं। मेरी जड़ें मधुपुर में थीं। मेरी जड़ पर किसी ने टांगी मार दी। टांगी कुल्हाड़ी को कहते हैं।

पहले मैं अपने मधुपुर को बहुत मिस करता था। लगता था कहां आ गया। मधुपुर मेरे आत्मा में थी। मधुपुर का दशहरा, मधुपुर की दीवाली, मधुपुर का छठ...मधुपुर का भेड़वा मेला, मधुपुर का गोशाला मेला, मधुपुर की होली...मधपुर की पतरो नदी। मधुपुर का जंगल, मधुपुर की चिड़िया...मधुपुर की मिठाई, समोसे, आलूचाट, मेरा स्कूल, स्कूल वाले दोस्त..अमड़ा, इमली की चटनी, बेर, काला नमक। मधुपुर की हर चीज़। हर चीज़ में इमोशनल मूर्ख की तरह मिस करता था। 

अब मुझमें मधुपुर कहीं नहीं है। ना मैं मधुपुर में कहीं हूं। ये शहर भूला मुझे मैं भी इसे भूल गया।

किसी ने मधुपुर में मेरी जड़ काट दी है। पटना से दिल्ली प्रवास के लिए निकलने वाला था तो आदरणीय़ शिक्षक बलराम तिवारी ने कहा था, जड़ो को मत भूलना। जड़ से उखड़ा पेड़ कहीं का नहीं होता, न बढ़ता है। सूख जाता है।

तो क्या यह मान लूं कि मैंने सूखने की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं?

होली के रंग में अब वो ताव न रहा। रिश्तों में वह गरमाहट न रही। एक बड़े भाई सरीखे शख्स हैं, वह आपस में मिलते थे, तो कहते आओ मंजीत, तुम आते हो तो अच्छा लगता है। बहुत सीधा सा वाक्य है। लेकिन, भरत मुनि का नाट्य शास्त्र भले ही ऐसे मेलोड्रामाई  रिश्तों पर चुप हो, मैं कहता हूं कि आपसी रिश्तों में बोले गए संवादों में मॉड्यूलेशन बहुत महत्वपूर्ण है। 

उन बड़े भाई सरीखी शख्सियत की बातचीत में इस अनुतान का, मॉड्यूलेशन की सख्त कमी थी। उनके यहां की चाय तब भी बेमज़ा लगती थी। 

आपसदारी के रिश्तों में यह औपचारिकता तब खलती थी मुझे। अब नहीं खलता कुछ भी। दुनिया को बहुत करीब से देख लिया है। अब तो अपने लोगों (अगर रिश्तेदार अपने होते हों तो) ने  औपचारिकता भी छोड़ दी। 

मुझे किसी से शिकायत नहीं। हो भी क्यों। मुझे लगता है मैं बदल गया हूं। पहले कुछ नरम-नरम सा आदमी था। अब कठोर हो गया हूं। अब जानता समझता हूं...सब कुछ। कौन कैसा पैंतरा लेगा, कब। यह भी। 

दुनियादारी की समझ आ गई। देर से सही। मुझे अब अपनी माटी की सोंधी गंध अपनी ओर नहीं खींचती। खुश हूं कि नहीं खींचती। खींचती रहती, तो जाने की अदम्य इच्छा, और न जा पाने की कठोर मजबूरी के बीच पिसकर रह जाता।

मधुपुर में तब, जब हम छोटे थे, मुहल्ले के लड़के होलिका दहन के लिए घर-घर गोयठा (उपले) मांगा करते। दस-पंच गोइठा, मांगी ला, मांगी ला हो मांगी ला। हम भीड़ में साथ हो लेते। गोइठा देने में कभी किसी ने मना नहीं किया। होलिका जलती थी...बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देते हुए मुहल्ले की सारी झाड़ियां काटकर जला दी जातीं।

होली में सारे लोग इकट्ठा होते। हर कोई रंग लगाता, शाम को गुलाल खेलते। जो भी यह लेख पढ़ रहे होंगे, ऐसा हर किसी के यहां होता होगा। हर प्रवासी के दिल में अपना-अपना मधुपुर है।

लेकिन मधुपुर में वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। दिल बदलते हैं, और उसके साथ चेहरे भी। होली के रासायनिक रंगों का चटख मिजाज़ बरक़रार रहता है, चेहरे की मुस्कान की रंगत गायब हो जाती है। पलाश से बनने वाले रंग गायब हो जाते हैं, और  चेहरे को कांच के पाउडर सरीखा छील देने वाले नक़ली रंगो का मार्केट ज़ोर पकड़ता है। कॉरपोरेट कहता देगा, पलाश का रंग खतरनाक हो सकता है, कंपनी में बना केमिकल रंग सेफ है। य़ह मानने वालों पर है, कभी क्रॉस चेक किया है आपने?

मधुपुर में पलाश मां जैसी है। मां ही है। पलाश के रंग को कॉरपोरेट डायन कह सकता है। ...भला पलाश का रंग भी कभी खतरनाक हो सकता है? 

दुख है कि मधुपुर जैसे सैकड़ों शहरों में सब बदल गया है। सिदो-कान्हू, चांद भैरव, जबरा पहाड़िया, नीलाम्बर-पीताम्बर...भाईयों का प्यार रहा नहीं। इसके लिए चंदा से गुहार लगानी पड़ती है, चंदा रे मेरे भाईयों से कहना...।

जड़ों से काटकर मुझे ठोस पत्थर बनाने की जिम्मेवारी किसकी है?
तुम लोगों की इस दुनिया में, हर क़दम पर इंसां ग़लत। मैं सही समझकर जो भी करूं...तुम कहते हो ग़लत। मैं ग़लत हूं...तो फिर कौन सहीं। मर्जी से जीने की भी,,,क्या तुम सबको अर्जी दूं। मतलब की तुमसबका...मुझपे मुझसे भी ज़्यादा हक़ है। लिखा इरशाद कामिल ने है। पर कह मैं रहा हूं। 

मधुपुर के पलाश, मधुपुर की लाल माटी, मधुपुर की होली...बस मैं अब कुछ भी मिस नहीं करता। सॉरी, मधुपुर मैं तुम्हें मिस नहीं करता। 


Wednesday, September 18, 2013

गुलाबों के दौर में कैक्टस काया!

बारिश का मौसम था। कार सांप की तरह बलखाई काली कोलतार की सड़क के किनारे खड़ी थी। मिट्टी लाल रंग की थी, और बारिश की वजह से और ज्यादा लाल हो गई थी। लड़का हरी झाड़ियों में घुस गया।

झाड़ियों में घुसकर पता नहीं धतूरा, भटकटैया, ओक और न जाने क्या-क्या अलाय-बलाय फूल बटोर लाया। लड़की को भेंट दी। लड़की ने रख लिया। डायरी के पन्नों में छिपाकर रख लिया।

लड़के ने वायदा किया कि उसके जन्मदिन पर गेहूं की दो बालियां भेंट करेगा। लड़का गेहूं की बालियां भेंट नहीं कर पाया। क्यों, ये सवाल अलहदा है। लेकिन वह एक सवाल छोड़ गया।

प्रेमिका के कोमल हाथों में जाने का सुख सिर्फ गुलाब ही को हासिल क्यों हो। यह भावनाएं भटकटैया या धतूरे या ओक को हासिल क्यों न हो। और बात सिर्फ प्रेमिका के हाथों में जाने की ही नहीं है।

बात है कि लोग कैक्टसों, नागफनियों, भटकटैयों, धतूरों से डरते क्यों है। धार्मिकों को तो इनसे प्रेम होना चाहिए। आपके आराध्य महादेव के प्रिय फूल हैं ये। लेकिन नहीं, महादेव से कुछ मांग लेना, और बेलपत्रो से बेल से भांग से लिंग की पूजा या मूर्त्ति की पूजा कर लेना एक बात है, जीवन में उतार लेना दूसरी।

ज़हर पीना हो, तो पिएं खुद महादेव, बनें नीलकंठ। हमें क्या। हम सुविधाभोगी लोग है, खुद में से कैक्टस चुनकर उनको जहर पीने के लिए आगे कर देते हैं। हर युग में नीलकंठों की जरूरत होती है, ऐसे नीलकंठो की जिनको नाग पसंद होते हैं, नागफनी पसंद होती है, जिनका कपड़ों से नहीं, छाल से काम चल जाता है, जिनको बेलपत्र-भंग-बेल ही नसीब होता है। और बाद में अमृत हासिल करने वाला समुदाय जहर उनके हवाले कर जाता है। हर युग में बंदर पुल बनाते हैं, राम जाकर रावण मार आते हैं, पुल तो राम के नाम का हो जाता है।

बंदर मर जाते हैं। उनका नामलेवा तक कोई नहीं, कितने बंदर पत्थरों में दब गए। युद्ध में कितने मरे, कोई इंडिया गेट नहीं बना, कहीं नाम नहीं खुदा। कैक्टस थे सबके सब। खुद उग आए थे। खुद उगगें तो कौन रखेगा खयाल।

कैक्टस होना, सरकारी स्कूलो में पढ़ने वाले बच्चों की तरह है। जड़ में कौई खाद डाल रहा है, पानी डाल रहा है, या कौन जाने दोपहर के खाने के नाम पर जहर ही परोस रहा हो, कौन जाने पोलियो की बजाय हेपेटाटिस का टीका ड्रॉप बनाकर पिला जाए। देवताओं की कमी नहीं, गुलाबों की कमी नहीं.. ये दुनिया ही गुलाबों ने अपनेलिए बनाई है। ये दुनिया देवताओं ने अपने लिए गढ़ी है।

इसमें नागफनियों के लिए स्पेस नहीं है।

देवताओं की दुनिया में गुलाबो की दुनिया में फ्लाईओवर हैं, वहां साइकिल के लिए स्पेस नहीं है। गुलाबों की दुनिया में नजाकत है नफासत है, वहां भदेस होना बेवकूफी है, वैसे ही जैसे हाथ से खाना।

 कैक्टस को आजकल गमलों में लगाते हैं। नहीं, गमलों में लगने के लिए बना ही नहीं है कैक्टस।

बिना खाद बिना पानी, बिना माली के खुद उगता है कैक्टस। इसकी नियति है, सुनसान में उगना, औरजब फूलता है तो इसका सौन्दर्य किसी कदर गुलाब से कम नहीं होता। निराला ने इसी वजह से तो गरिआया है गुलाब को,

अबे सुन बे गुलाब,
भूल मत गर पाई खुशबू
रंगो-आब।
---
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर बैठा इतरा रहा कैपिटलिस्ट।

कैक्टस को देखिए, कांटों से भरा होता है। कांटे तो गुलाब मे भी होते हैं, लेकिन वो होते है गुलाब की रक्षा के लिए। उन कांटो की जो नज़ाकत होती है ना फूल तो फूल, कांटा भी नफीस-सॉफिस्टिकेटेड लगता है। नागफनी का कांटा छू लीजिए कभी। बिच्छू के दंश सा होता है। नानी जीवित हो दिवंगत, याद आनी तय है।

तो ग़िला किस बात का, किस बात की शिकायत, अगर आपके अंदर है नागफ़नी तो फिर किसी की परवाह क्यों...शान से सर उठा कि जिएं। बाजुओं में ताकत तो होगी ही, फिर काहे के लिए किसी को मुंह जोहना...।

लड़का इत्ता भाषण देकर सड़क के किनारे बैठ गया। लाल मिट्टी में अदरक बहुत बढ़िया होती है, हल्दी भी। देसी जंगली हल्दी औषधीय गुणो की होती है। उसकी खुशबू...पैकेट वाली हल्दी से एकदम अलहदा। लड़की के हाथ में एक और भटकटैया का फूल थमाया उसने, शीशे पर नज़र गई तो देखा उसका खुद का गला नीला-नीला सा हो रहा था।





Monday, September 2, 2013

एक शाम होटल ताज पैलेस वाया गांव जारपा, नियामगिरि

दिल्ली। जगहः दरबार हॉल, होटल ताज पैलेस। वातानुकूलित हॉल, रंग-बिरंगी रोशनी। मेरी औकात को अच्छी-तरह समझता बूझता वेटर मेरे पास आकर मुझे जूस, और रोस्टेड चिकन के लिए पूछता है। किसी ट्रैवल मैगजीन ने पुरस्कारों का आयोजन है।

आयोजन शुरू होने में देर है। कई होटल वालों को पुरस्कार मिलना है। कयास लगाता हूं कि ये वो लोग होंगे जो उक्त पत्रिका में विज्ञापन देते होंगे। एक मंत्री भी आने वाले हैं, दो फिल्मकार हैं। जिनमें से एक के नाम पर पुरस्कार है, दूसरे को पुरस्कार दिया जा रहा है।

बिजली की चमक मुझे चौंधियाती है। बगल की टेबल पर बैठी एक लड़की ने काफी छोटी और संकरी हाफ पैंट पहनी है। उसके पेंसिल लेग्स दिख रहे हैं। उसकी किसी रिश्तेदार ने पता नहीं किस शैली में साड़ी पहनी है, ज्यादा कल्पना करने के लिए गुंजाईश नहीं छोड़ी है। साथ में तेरह-चौदह साल का लड़का अपनी ही अकड़-फूं में है।

दोनों सम्माननीया महिलाओं के बदन पर चर्बी नहीं है। हड्डियां दिख रही हैं, कॉलर बोन भी। डायटिंग का कमाल है। जी हां, मैं उक्त महिला के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए उनके बदन की चर्बी नाप रहा था। वो बड़ी नज़ाकत से जूस का सिप ले रही हैं। वो हाफ पैंट वाली कन्या बार टेंडर से कुछ लाकर पी रही है...शायद वोदका है। वो  कैलोरी वाला कुछ नहीं खा रहीं।

मै शरीर से दरबार हॉल में हूं। मन मेरा अभी भी नियामगिरि में हूं, जरपा गांव में। मेरे दिलो-दिमाग़ में अभी जरपा गांव ताजा़ है। हरियाली का पारावार। जीवन में इतनी अधिकतम हरियाल एक साथ देखी नहीं थी। नियामगिरि  के जंगलो में डंगरिया-कोंध जनजाति रहती है। मर्द औरतें दोनों नाक में नथें पहनती हैं, महिलाएं भी कमर के ऊपर महज गमछा लपेटती हैं कपड़े के नाम पर। दो वजहें हैं--अव्वल तो उनकी परंपरा है, और उनको जरूरत भी नहीं। दोयम, तन ढंकने भर को कपड़े उपलब्ध हैं।

तन भी कैसा। कुपोषण से गाल धंसे हुए। डोंगरिया-कोंध लोगों की आबादी नहीं बढ़ रही क्योंकि छोटी बीमारियों में भी बच्चे चल बसते हैं। गांव में सड़क नहीं, पीने का पानी नहीं, बिजली वगैरह के बारे में तो सोचना ही फिजूल है। जारपा तक जाने में हमें जंगल में बारह किलोमीटर चढ़ना पड़ा।

अभी तो नियामगिरि बवाल बना हुआ है। वहां का किस्सा-कोताह यह है कि वेदांता नाम की कंपनी को लान्जीगढ़ की अपनी रिफाइनरी के लिए बॉक्साइट चाहिए। नियामगिरि में बॉक्साइट है। लेकिन नियामगिरि में आस्था भी है। डोंगरिया-कोंध जनजाति के लिए नियामगिरि पहाड़ पूज्य है, नियाम राजा है।

तो छियासठ साल बाद, सरकार को सुध आई कि इन डोंगरिया-कोंध लोगों का विकास करना है, उनको सभ्य बनाना है। इसके लिए इस जनजाति को जंगल से खदेड़ देने का मामला फिट किया गया। योजना बनाने वाले सोचते हैं कि भई, जंगल में रह कर कैसे होगा विकास?

लेकिन डोंगरिया-कोंध को लगता है विकास की इस योजना के पीछे कोई गहरी चाल छिपी है। कोंध लोगों को अंग्रेजी नहीं आती, विकास की अवधारणा से उनका साबका नहीं हुआ है, उनको ग्रीफिथ टेलर ने नहीं बताया कि जल-जंगल-जमीन को लूटने वाली मौजूदा अर्थव्यवस्था आर्थिक और पर्यावरण भूगोल में अपहरण और डकैती अर्थव्यवस्था कही जाती है।

डोंगरिया कोंध जनजाति के इस लड़ाके तेवर पर नियामगिरि सुरक्षा समिति के लिंगराज आजाद ने कहा था मुझसे, आदिवासियों के बाल काट देना उनका विकास नहीं है। आदिवासी अगर कम कपड़े पहनते हैं और यह असभ्यता की निशानी है,तो उन लोगों को भी सभ्य बनाओ जो कम कपड़े पहन कर परदे पर आती हैं।

लिगराज आजाद को शायद यह इल्म भी न रहा होगा कि कम कपड़े पहने लोग सिर्फ सिनेमाई परदे पर ही नहीं आते। कम कपड़े पहनना सच में सभ्यता की निशानी है, कम कपड़ो से व्यक्तिगत तौर पर मुझे कोई उज्र नहीं है। लेकिन किसी को इसी आधार पर बर्बर-असभ्य कहने पर मुझे गहरी आपत्ति है।

दरबार हॉल की महिला के उभरे हुए चिक-बोन्स और डंगरिया लड़की के गाल की उभरी हुई हड़्डी में अंतर है। वही अंतर है, जो शाइनिंग इंडिया में है, और भारत में। इन्ही के भारत का निर्माण किया जा रहा है। 66 साल बाद याद आया कि भारत का निर्माण किया जाना है।

मन में सवाल है, अब तक किस भारत का उदय हुआ, किसकों चमकाया आपने, जो शाइनिंग है वो किसकी है। वेदांता, पॉस्को, आर्सेलर मित्तल ने किसके लिए लाखों करोड़ लगाया है भला।

मेरे खयालों का क्रम टूटता है, वह वोदका पीने वाली कम कपड़ो वाली कन्या और सिर्फ साड़ी (ब्लाउज स्लीवलेस था) कहने आदरणीया महिला मेरी तरफ देख रही हैं...मैं उनकी मुस्कुराहट पर नज़र डालता हूं, नकली है, बनावटी है। कसरत की वजह से धंसे गालों में रूज़ की लाली है, नकली है। जरपा गांव में मेरे पत्तल पर भात और पनियाई दाल डालने वाली आदिवासी कन्या की मुस्कुराहट याद आ रही है...उसके धंसे गालों में से सफेद दांत झांकते थे, तो लगा था यही तो है मिलियन डॉलर स्माइल। उसकी मुस्कुराहट...झरने के पानी की तरह साफ, शगुफ़्ता, शबनम की तरह पाक।

जरपा तुम धन्य हो।




Saturday, August 24, 2013

अथ तिलचट्टा लव स्टोरी

एक था तिलचट्टा। एक थी तितली। तिलचट्टा, कत्थई रंग का। उसे कत्थई रंग बहुत पसंद था। तितली पीले रंग की थी। जहां बैठती, पंख ऊपर करके। नब्बे डिग्री पर। पंख थे कि फूलों की पंखुड़ी...पीला रंग था या फूलों का पराग, आसमान ही जाने।

तिलचट्टा उड़ भी सकता था। लेकिन उड़ान छोटी हुआ करती। तितली को जिस दिन से देखा ता तिलचट्टे ने, बस दीवाना हो गया था। डरता भी था, कहां तितली, कहां तिलचट्टा। कहां गुलाब, कहां कुकुरमुत्ता। कहां ट्यूलिप, कहां धतूरा।

तितली उड़ती तो यूं बलखाती कि देखने वाले देखते रह जाते।

तिलचट्टा, कूड़े में पैदा हुआ था। उसकी सोच का विस्तार भी कूड़े तक ही था। कूड़े में रहने वालों तक, कूड़ा बीनने वालो तक, कूड़ा पैदा करनेवालों से उसे कत्तई सहानुभूति न थी...लेकिन कूड़े में रहने वालों के लिए वह संघर्ष करता रहता। तिलचट्टा था भी अजीब...इंटेलेक्चुअल किस्म का।

लेकिन कैसा भी इंटेलेक्चुअल क्यों न हो, ससुरा दिल तो दिल है। तितली को देखा तो बस वो भी वैसे ही देखता रहा गया। लेकिन उसके देखने और बाकियों के देखने में फर्क था। तिलचट्टे ने ज्यों ही तितली को देखा, लगा इसको तो देखा है कहीं...कभी। जबकि सच बात ये थी कि दोनों कभी मिले नहीं थे।

तिलचट्टे की तमाम उम्र फाकाकशी में कटी थी। तितली देखकर हिम्मत जवाब दे गई। तितली का चेहरा धूसर  रंग का था, नुकीले टेंटाकल्स थे...आंखें कत्थई थीं। यही कत्थई रंग तिलचट्टे को अपना-सा लगा था। तितली की आंखों में सच्चाई थी। तिलचट्टे का दिल साफ-सुथरा था।

प्रेम तो साफ-सुथरा ही होता है।

लेकिन एक दिन यूं ही, जब मौसम सावन का था और अंधे को भी हरियाली सूझ रही थी, तिलचट्टे ने टुकड़ों-टुकड़ो में अपने दिल का हाल बयां कर दिया। चाय में चीनी घुलाते हुए तितली ने रीझकर रूमानियत का सबब पूछा था, तो जवाब में तिलचट्टा भी बस मुस्कुरा ही पाया था।

पेड़ बारिशों में धुल चुके थे। लताओं ने पेड़ों को भी छांव दे रखी थी। कांच के बाहर बारिश की बूंदो ने मोतियों की माला जड़ दी थी, और तिलचट्टे को लगा कि ये माहौल कितना दौलतमंद हो गया है।

तिलचट्टे ने देखा था, बरस रहे बादल थोड़ी देर के लिए सुस्ताने लगे थे, बारिश खत्म नहीं हुई थी, रूकी भर थी। उसे लगा कि ये जो तितली है वह तो रवानी वाली ऐसी दरिया है जिसके पानी की प्यास नहीं उसे।

तिलचट्टे और तितली घड़ी भर साथ रहे, दो घड़ी भर।  लेकिन, तिलचट्टा अब जब भी पंख फैलाता, फड़फड़ाहट की जगह संगीत सा उठता। तिलचट्टा उड़ तो सकता था, लेकिन लंबी उड़ान नहीं। तितली ने कहा, तुम्हे लंबा उड़ना होगा। गोकि तुम तिलचट्टे हो, लेकिन उड़ना तो तुम्हें होगा ही, तेरी किस्मत में कूड़े का ढेर नहीं है।

तिलचट्टा उड़ने की कोशिश में लगा रहा। पीली तितली साथ रहती। वह उड़ने लगा। भाग मिल्खा भाग के मिल्खा सरीखा, टायर पीछे बांधकर। ताकि कभी, जब वो तितली के साथ उड़े तो कदम पीछे न रह जाएं।

एक शाम जब तितली के पीछे से सूरज को रौशनी आ रही थी, तितली का पीला रंग आफताबी हो गया। तितली पिघलने लगी। तितली का रंग भी तिलचट्टे सरीखा होने लगा।

तितली पिघलकर गिलास में ढल गई। तिलचट्टे को ऐसा नशा कभी न हुआ था। नशा ऐसा मानो, दुनिया भर की तमाम शराब की बोतलें गटक गया हो...। प्रेम का नशा कुछ ऐसा ही होता है बरखुरदार, एक बुढाए तिलचट्टे ने कहा।

तिलचट्टा अब कुछ किरदार गढ़ रहा है। कुकुरमुत्तों, धतूरे के फूलों, भटकटैया को जमा कर रहा है, चींटियों की सेना खड़ा कर रहा है। तितली ने कहा है, प्यारे तिलचट्टे, तुम दुनिया बदल सकते हो। तिलचट्टा इन्हीं से दुनिया बदलेगा...तिलचट्टा उड़ने लगा है, उसके पंखों में तितली की सी चपलता आ गई है, भौंरो की ताकत आ गई है, उसके पास तितली का रंग है।

तितली की दोस्त फूलों ने अपनी गंध दी है। उसे कूड़े का ढेर भी पसंद है, और तितली की नजाकत भी।

बादल गहरे रंग के हो गए हैं। बारिश का पानी फिर है। रेल की पटरियां समांतर दूरी पर तो हैं, लेकिन साथ हैं...सूरज डूब रहा है, आसमान सिंदूरी हो रहा है। दुनिया बदल रही है...


--जारी

Sunday, June 16, 2013

दिवंगत बाबूजी के नाम बेटे का एक खत

डियर डैड, 
सादर प्रणाम,

कहां से शुरु करुं...आज से ही करता हूं।

आज अंग्रेजी के एक अख़बार के पहले पन्ने पर बिस्किट के एक ब्रांड का विज्ञापन है। विज्ञापन कुछ नहीं...बस एक खाली पन्ना. जिसमें एक चिट्ठी लिखी जा सकती है। अपने पिता के नाम....पीछे एक पंक्ति छपी है, कोई भी पुरुष बाप बन सकता है, लेकिन पिता बनने के लिए खास होना पड़ता है (मैंने नजदीकी तर्जुमा किया है, मूल पाठ हैः एनी मैन कैन बी अ फ़ादर, इट टेक्स समवन स्पेशल टू बी डैड

मुझे नहीं पता, कि फ़ादर, डैड और पापा में क्या अंतर है। मुझे ये भी नहीं समझ में आता कि आखिर बाबूजी (जिस नाम से हम सारे भाई-बहन आपके याद करते हैं) पिताजी और बाकी के संबोधनों में शाब्दिक अर्थों से कहीं कोई फ़र्क पड़ता है क्या। क्या बाप पुकारना डेरोगेटरी है?

लेकिन बाबूजी, बाजा़र कहता है कि डैड होने के निहितार्थ सिर्फ फ़ादर होने से अधिक है। आप होते तो पता नहीं कैसे रिएक्ट करते और मेरी इस चिट्ठी की भ्रष्ट भाषा पर मुझे निहायत नाकारा कह कर शायद धिक्कारते भी। लेकिन बाबूजी, आपको अभी कई सवालों के जवाब देने हैं।

आपको उस वक्त हमें छोड़कर जाने का कोई अधिकार नहीं था, जब हमें आपकी बहुत जरूरत थी। जब हमें अगले दिन की रोटी के बारे में सोचना पड़ता था, आपको उस स्वर्ग की ओर जाने की जल्दी पड़ गई, जिसके अस्तित्व पर मुझे संशय है।

मां कहती है, कि आपके गुण जितने थे उसके आधे तो क्या एक चौथाई भी हममें नहीं हैं। आप ही कहिए बाबूजी, कहां से आएंगे गुण? दो साल के लड़के को क्या पता कि घर के कोने में धूल खा रहे सामान दरअसल आपके सितार, हारमोनियम, तबले हैं, जिन्हें बजाने में आपको महारत थी। दो साल के लड़के को कैसे पता चलेगा बाबूजी...कि कागज़ों के पुलिंदे जो आपने बांध रख छोड़े हैं, उनमें आपकी कहानियां, कविताएं और लेख हैं।... और उन कागज़ों का दुनिया के लिए कोई आर्थिक मोल नहीं। दो साल के लड़के को कैसे पता चलेगा बाबूजी कि आपने सिर्फ रोशनाई से जो चित्र बनाए, उनकी कला का कोई जोड़ नहीं। 

बाबूजी, दो साल का लड़का जब बड़ा होता गया, तो उसका पेट भी बढ़ता गया। उसकी आँखों के सामने जब सितार, हारमोनियम तबले सब बिकते चले गए, कविता वाले कागज़ों के पुलिंदे और उसके बाबूजी के बनाए रेखा-चित्र दीमकों का भोजन बनते चले गए, तो बाबूजी ये गुण कैसे उसमें बढ़ेंगे।

मां कहती है, कि आप बहुत सौम्य, सुशील और नम्र आवाज़ में बातें करते थे। बाबूजी, मैं आपके जैसा नहीं बन पाया। मां कहती हैं मैं अक्खड़ हूं, बदतमीज हूं, किसी की बात मानने से पहले सौ बार सोचता हूं...बाबूजी अभी तो आप ऊपर से झांक कर सब देख रहे होंगे...जरा बताइएगा मैं ऐसा क्यों हूं? 

बाबूजी जब आप इतने गुणों (अगर सच में गुण हैं) से भरकर भी एक आम स्कूल मास्टर ही बने रह गए, तो हम से मां असाधारण होने की उम्मीद क्यों पाले है? उसकी आंखों का सपना मुझे आज भी परेशान करता है। बाबूजी मां को समझाइए, आप जैसे आम आदमी के हम जैसे आम बच्चों से वो उम्मीद न पाले। उससे कहिए कि वो हमें नालायक समझे।

डियर डैड, ये संबोधन शायद आपको अच्छा नहीं लग रहा होगा। आज फादर्स डे है, कायदे से तो एक गुलदस्ता लेकर मुझे उस जगह जाना चाहिए था, जहां आपकी चिता सजाई गई थी, या उस पेड़ के पास जहां आपकी चिता के फूल चुनकर हरिद्वार ले जाने से पहले रखे गए थे। लेकिन बाबूजी, आपको याद करने के लिए मुझे किसी फादर्स डे या आपकी पुण्यतिथि, या मेरे खुद के जन्मदिन की जरूरत नहीं है। आप मेरे मन में है। 

बाबूजी, मरने के लिए बयालीस की उम्र ज्यादा नहीं होती। उस आदमी के लिए तो कत्तई नहीं, जिसका एक कमजोर सा बेटा सिर्फ दो साल का हो, और बाद में उस कमजोर बेटे को समझौतों से भरी जिंदगी जीनी पड़ी हो। जब सारी दुनिया के लोग अपने पिता की तस्वीरें फेसबुक पर शेयर करते हैं, तो मुझे बहुत शौक होता था कि आप होते तो...बाबूजी मुझे पता है कि आप होते तो, जेठ की जलती दोपहरी में ज़मीन पर नंगे पांव नहीं चलना होता मुझे...आप मेरे पैर अपनी हथेलियों में थाम लेते। 

आपको बता दूं बाबू जी, आपके निधन के कुछ महीनों बाद ही लोगों ने हम पर दया दिखानी शुरु कर दी थी...मुहल्ले वाली मामी ने जूठी दूध का गिलास भी देना चाहा था...मुझे पता है बाबूजी, आप होते तो किसी कि इतनी हिम्मत नहीं होती। अब तो आप जान गए होंगे न कि क्यों इतना अक्खड़ हो गया है आपका वो कमजोर दिखने वाला बेटा।

आप चले गए, नाना जी ने रुआंसा होकर कहा था उनकी उतनी ही उम्र थी। मैं नहीं मानता...आपको इस कदर नहीं जाना चाहिए था...चिलचिलाते जेठ में, ऐसे लू वाले समाज में आप छोड़ गए हमें...क्यों बाबू जी?

मुझे बहुत शिकायत है बाबूजी, बहुत शिकायत है....

आपका बेटा 
(आज्ञाकारी नहीं , कत्तई नहीं)

Tuesday, April 30, 2013

इतिहास का भूगोल, भूगोल का इतिहासः सुशील झा

 
सुशील झा, पत्रकार

सुशील झा, पेशे से तो पत्रकार हैं, लेकिन उनके अंदर एक रचयिता भी है। सामाजिक विषयों खासकर, समाज के वंचित तबके को लेकर उनकी कविताएं जोरदार तरीक़े से अपनी बात कहती है, गद्य भी कविता की शैली में लिखते हैं, यूं तो वर्चुअल स्पेस में लगातार लिखते हैं, लेकिन लेखन की उनकी शैली दिल को बाग-बाग कर देती है। इतिहास और भूगोल के मेटाफर के इस्तेमाल करते हुए,फेसबुक पर स्टेटस के तौर पर लिखा गया उनका ये अद्भुत लेखन पेशे-नज़र है---- 



1. हर लड़की का इतिहास होता है और हर लड़के का भूगोल...वैसे, हर लड़की को लडके के इतिहास में और हर लड़के को लड़की के भूगोल में रुचि होती है...इन भूगोल-इतिहास की चट्टानों पर प्रेम की दूब उग जाती है...इधर उधर छितर बितर।

2. इतिहास और भूगोल की लड़ाई जहां खत्म होती है वहां दर्शन पैदा होता है....बाल-दर्शन।

3.मैं इतिहास में पीछे था...वो भूगोल में आगे थी...दूब ने दोनों को पीछे छोड़ दिया...और हम फ्रायड की बांहों में झूल गए.

4. धड़कते-धड़कते दिल दीवार हुआ जाता है...लिखते लिखते लिखना लाचार हुआ जाता है...। हम तो पड़े थे उसके भूगोल में, और वो अब इतिहास हुआ जाता है।

5. भूगोल में बैठ कर इतिहास लिखना कैसा होता होगा...और इतिहास में बैठ कर भूगोल के बारे में सोचना

6. एक दिन इतिहास ने भूगोल को गोल कर दिया...भूगोल के गोल होते ही दोनों गार्डन के इडेन में पहुंच गए......
भूगोल के गोल होने से दूब सूख गई और फिर गोल गणित का जन्म हुआ जिससे फिर आगे चलकर लॉजिक, फिजिक्स और मेटाफिजिक्स की शुरुआत हुई।

7. बड़े शहर में हर बात छोटी होती है और छोटे शहर में हर बात बड़ी......वैसे बड़े शहर में हर बात भूगोल पर अटकती है....छोटे शहर में हर बात इतिहास पर।

8. भूगोल बदलता है तो इतिहास बनता है और नया भूगोल पुराना इतिहास ज़रूर पूछता है लेकिन इतिहास को सिर्फ भूगोल में रुचि होती है. इतिहास भूगोल का इतिहास कभी नहीं पूछता। 

9. इतिहास की नियति है भूगोल के पीछे भागना..उसे पकड़ना और फिर उसे इतिहास में बदल देना

10. एक दिन इतिहास ने भूगोल के सामने अपने इतिहास के पन्ने पलटने शुरु किए. भूगोल ने ये देखकर अंगड़ाई ली और अपना जुगराफिया बदला. जुगराफिया बदलते ही इतिहास का मुंह खुला का खुला रह गया और फिर दोनों मिलकर दूब उगाने लगे..

11. ...और फिर एक दिन भूगोल ने कहा इतिहास से कि मुझे तुम्हारा इतिहास पढ़ना है. इतिहास के पास इसका कोई जवाब नहीं था. उसे अपने पुराने भूगोल की याद सताने लगी और वह सामने के भूगोल को ताकते हुए सोचने लगा काश कि दूब उगने लगे फिर से...

12 .नया भूगोल मिलते ही इतिहास अपना पुराना इतिहास भूलना चाहता है लेकिन भूगोल को हमेशा इतिहास के पुराने इतिहास में रुचि होती है

13. इतिहास हमेशा भूगोल भूगोल खेलना चाहता है और भूगोल हमेशा इतिहास इतिहास . इस खेल में नुकसान हमेशा दूब का होता है.

14. भूगोल इतिहास की रगड़ में सबकुछ खत्म हो चुका था. बरसों बीत गए थे. झुर्रियों पड़े हाथों में हाथ थे. इतिहास भूगोल के इतिहास में गुम था और भूगोल इतिहास के भूगोल के इश्क में उलझा हुआ-सा था.