Saturday, March 24, 2018

हमारा फेसबुक और आधार का डेटा चुराकर कर क्या लोगे बाबू!

सुबह अखबार में खबर आई तो गांव में जो भी भाई-बंदा अपने मोबाइल पर फेसबुक चलाता था, एकदम से सहमा हुआ था और गुड्डू आंखें फाड़-फाड़कर तकरीबन बेहूदगी से सबको देख रहे थे. उनसे रहा न गया, पूछ ही बैठेः "काहे सब परेशान हैं इतने?' 

'ददा, पता नहीं है आपको, फेसबुक पर हमारे डेटा सुरक्षित नहीं रहे, पहले आधार वाले हमारे डेटा पर सेंध थी और अब इस फेसबुक पर दी गई सूचनाओं पर भी खतरा है.'

गुड्डू भैया जोर-जोर से हंसने लगे, 'सुनो रे ठाकुर, एक ठो किस्सा सुनो. एक आदमी ज्योतिषी के पास हाथ दिखाने गया. ज्योतिषी ने कहा, शनि का साढ़ेसाती है. काली गाय दान करो.

आदमी उजबक की तरह देखने लग गयाः इत्ते पइसे कहां है महराज?

ज्योतिषी ने तोड़ निकालाः तो लोहे की कड़ाही में काली तिल भरकर दान करो.

आदमी ने फिर हाथ जोड़ेः पंडिज्जी, इत्ते पइसे कहां है मेरे पास?

ज्योतिषी ने आखिरी बात कहीः चल एक टोकरी कोयला ही दान कर दे.

आदमी ने फिर हाथ जोड़ लिएः नहीं कर पाऊंगा ज्योतिषी जी. इत्ते पइसे नहीं पास में.

ज्योतिषी उठ खड़ा हुआ, अबे कंगले, जब तेरे पास टोकरी भर कोयला दान करने लायक कलदार भी नहीं, तो शनि महराज भी तेरा क्या बिगाड़ लेगें.'

गुड्डू ने कहानी खत्म की और मुझसे पूछाः 'समझे ठाकुर!'

मैंने भी हाथ जोड़ लिएः क्या भइया, चाहते क्या हैं कहना.

गुड्डू ने हाथ में पकड़े गिलास से लंबा घूंट भरा और बोलेः 'हमारे डेटा चोरी कर के कोई क्या कर लेगा यार?'

'क्यों, हमारी सारी सूचना तो उसमें है? क्या सूचना है बता तो सही? आय़कर भरने वाले सौ लोगों में से 89 फीसद लोग तो 5 लाख रु. से कम की आमदनी वाले हैं. बाकी जो 11 लोग आयकर देते हैं उनमें से भी 80 फीसदी लोग मुंबई के हैं तो इ डेटा चोरी होने से होगा क्या. वैसे भी अदालत में सरकारी नुमांइदे ने कहा ही है, हमारे डेटा दस फीट मोटी दीवार वाले कमरे में सुरक्षित हैं. अरे ऐसे में तो क्लाउड में सेव किया डेटा भीग भी जाता होगा.' गुड्डू भैया ने फिर लंबा ठहाका लगाया.

'लेकिन जो मेल पर रोज रोज प्रस्ताव आते हैं सो?' गुड्डू भैया ने अपना जीमेल खोलकर दिखाया. इनबॉक्स में कोई 6,879 अनरीड मेल पड़े थे. 'जो आदमी मेल चेक ही नहीं करता उसका यह लोग डेटा चोरी करके करेंगे क्या? और रोजाना जो आपके पास मार्केटिंग वाले फोन किया करेंगे, लोन लो, पर्सनल भी होम भी, क्रेडिट कार्ड भी, और न जाने क्या अल्लम-गल्लम.' 

'लेकिन, ददा. देश के अधिकतर फेसबुक यूज़र को यह नहीं पता है कि सोशल मीडिया कंपनियां उनके बारे में कितना जानती हैं. फ़ेसबुक का बिज़नेस मॉडल उसके डेटा की गुणवत्ता पर आधारित है. फ़ेसबुक उन डेटा को विज्ञापनदाताओं को बेचता है. विज्ञापनदाता यूज़र की ज़रूरत समझकर स्मार्ट मैसेजिंग के ज़रिए आदतों को प्रभावित करते हैं और यह कोशिश करते हैं कि हम उनके सामान को खरीदें.' मैंने अपना तर्क रखा.

'तो क्या होगा. कितनी तो मीठी आवाज में बात करती हैं बेचारी. पूरी बात सुन लो, और उसके बाद आखिर में कह दो नहीं लेना है लोन. नही लेना क्रेडिट कार्ड.' 

'बात सिर्फ क्रेडिट कार्ड की नहीं है न ददा. फ़ेसबुक न सिर्फ़ सामान बल्कि राजनीति भी बेच रहा है. राजनीतिक दल, चाहे वो लोकतांत्रिक हों या न हों, हमारी सोच को प्रभावित करने के लिए स्मार्ट मैसेजिंग का इस्तेमाल करना चाहते हैं ताकि हमलोग किसी ख़ास उम्मीदवार को वोट करें. वो इसका इस्तेमाल आम सहमति को कमज़ोर करने और सच्चाई को दबाने के लिए भी करते हैं.'

'देखो ठाकुर, हमारे देश में पहले से लोग जाति, धर्म और सौ के नोट के बदले वोट देने के आदी रहे हैं. फेसबुक और वॉट्सऐप मेसेज के बदले भी दे लेंगे तो क्या हो जाएगा? और तुम कर भी क्या लोगे? तुम जो करते हो सब तो सरकार से ज्यादा गूगल की निगाहों में है. कितने बजे उठते हो, कितने बजे पोट्टी जाते हो, कितने बजे दफ्तर जाते हो और किस रास्ते जाते हो, कौन सी कैब से जाते हो. तेरी रग-रग से वाकिफ है गूगल. तो फिर क्या बचा लोगे उससे. कौन से डेटा की सुरक्षा चाहिए तुम्हें और कौन करेगी सुरक्षा! बात रही मेरे प्रोफाइल फोटो की, तो करने दो डाउनलोड मेरा फोटो. चिपकाने दो कलेजे से मेरा फोटो, फेविकोल लगाकर.'

'ऐसा मत कहिए गुड्डू भइया. रवि शंकर बाबू ने क्या तगड़ी डांट पिलाई है जुकरबर्ग को.'

'सुन ठाकुर बुरा न मानो तो एक किस्सा और सुन लो. दिल्ली पर मुहम्मद शाह रंगीले का शासन था. खबर मिली कि नादिरशाह का हमला होने वाला है. तो रंगीला चिंतित हो गया. उसके एक वजीर ने राय दी थी. यमुना के किनारे कनातें लगवा देते हैं. हम सब चूड़ियां पहनकर कनातों में बैठे रहें. जैसे ही नादिरशाह की फौज पास आए हम सब चूड़ियां चमका कर कहें, इधर न आइयो मुए, इधर जनाने हैं. फिर वो शर्म से नहीं आएंगे.

अरे ठाकुर, हूण आए, कुषाण आए, शक भी आए. नए दौर में यह नई तकनीक भी आई है, हमें तो लुटने की आदत है. यह जुकरबर्ग क्या लूट लेगा और आधार में से कंपनियां क्या लूट लेंगी. सुनते जाओ

चराग़ हाथ में हो तो हवा मुसीबत है
सो मुझ मरीज़-ए-अना को शिफ़ा मुसीबत है.

मैं चुप हो गया. गुड्डू भैया ने ग्लास में से लंबा घूंट लिया और बोले, 'मरीज़-ए-अना मतलब अभिमान की बीमारी से ग्रस्त, और शिफ़ा का मतलब स्वस्थ होना. बिना मतलब समझे शेर समझ नहीं आएगा.' 

मैं उस घड़ी को कोसता हुआ आगे निकल गया जब मैंने गुड्डू जी को आधार और फेसबुक के डेटा लीक होने की खबर पर चर्चा छेड़ी थी.

Tuesday, March 13, 2018

'ये जो देश है मेरा' पर विनय कुमार की प्रतिक्रिया

मूलतः विस्थापन और वंचित इलाकों के विकास को केंद्र में रखकर लिखी गई मेरी किताब 'ये जो देश है मेरा', पर मेरे मित्र और अच्छे कथाकार विनय कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया फेसबुक पर लिखी है, आप सबके साथ साझा करने का लालच नहीं रोक पा रहा. उन्हीं के शब्दः

जब से इस पुस्तक 'ये जो देश है मेरा' के बारे में पता चला था, तब से इसे पढ़ने की तीव्र इच्छा थी. और पिछले हफ्ते जब यह पुस्तक मिली तो जैसे जैसे समय मिला, इसको पढ़ता गया. 

यह तो पहले से ही मालूम था कि 'ये जो देश है मेरा' न तो उपन्यास है और न ही कोई दिलचस्प कहानी संग्रह, लेकिन एक रिपोर्ताज भी आपको इतना प्रभावित करती है और अगर दूसरे शब्दों में कहें तो पढ़ने के बाद इतना विचलित कर देती है तो इसका मतलब साफ है, लेखक अपनी बात को उसी शिद्दत से कहने में सफल है, जितनी शिद्दत से उसने इसे रचा है. 

पांच खंडों वाली इस किताब 'ये जो देश है मेरा' को पढ़ना एक अलग हिंदुस्तान से रूबरू होना है जिससे आम मध्यमवर्गीय और उच्चवर्गीय जनमानस बड़ी आसानी से अपना मुंह फेर लेता है. 

आज के तथाकथित विकसित हिंदुस्तानी समाज के एक ऐसे वर्ग के बारे में यह किताब 'ये जो देश है मेरा' न सिर्फ बताती है बल्कि पूरी ईमानदारी से हमें उन लोगों और उन क्षेत्रों से परिचित भी कराती है, जिसके विकास के नाम पर आज भी राजनीतिज्ञ अपनी दुकान चला रहे हैं और जिन्हें सरकारी तंत्र भी बड़ी आसानी से भुला देता है. और अगर यह लोग अपनी जायज मांगों के लिए आंदोलन करते हैं तो उसे बड़ी आसानी से नक्सली आंदोलन बताकर बेरहमी से कुचल दिया जाता है.
ये जो देश है मेरा


'ये जो देश है मेरा' किताब का पहला खंड ही पानी की कमी का ऐसा भयावह चित्र प्रस्तुत करता है कि दिल भविष्य के आसन्न संकट को लेकर कांप उठता है. 'ये जो देश है मेरा' के पांचों खंड अलग अलग भौगोलिक क्षेत्रों के बारे मे तथाकथित विकास का भयावह पहलू दिखाते हैं जिनके बारे मे कुछ करना तो दूर, सरकार सोचना भी गंवारा नहीं करती. 

कहीं कहीं किताब थोड़ी बोझिल भी हो जाती है लेकिन तथ्यों की ऐसी पड़ताल पढ़कर लेखक की मेहनत के बारे मे अंदाजा हो जाता है. 

कुल मिलाकर 'ये जो देश है मेरा' हर गंभीर पाठक के लिए पठनीय और संग्रहणीय किताब है जिसके लिए श्री मंजीत ठाकुर बधाई के पात्र हैं.

Friday, March 9, 2018

नीमः सकुचाते फूलों का वह वीतराग झरना

याद आता नीम के नीचे रखे
पिता के पार्थिव शरीर पर
सकुचाते फूलों का वह वीतराग झरना
– जैसे माँ के बालों से झर रहे हों –
नन्हें नन्हें फूल जो आँसू नहीं
सान्त्वना लगते थे.


कविताः कुंवर नारायण
फोटोः मंजीत ठाकुर

फोटोः मंजीत ठाकुर

Wednesday, March 7, 2018

एक पाठक की नज़र से "ये जो देश है मेरा"

मेरी किताब, ये जो देश है मेरा पर समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी है, मेरे अनुज सदृश रामकृपाल झा ने, 

एक सामान्य पाठक जब किसी क़िताब को पढ़ना शुरू करता है और पढ़ते हुए उसे ख़त्म करता है, इन 3-4 घंटे के दौरान वह लेखक द्वारा प्रस्तुत कथा, कथानक और कथ्य में अपने आप को खोजते हुए लगातार जुड़े रहने का यत्न करता है। अगर लेखक अपनी प्रस्तुति से पाठक को इन 3-4 घंटे तक जोड़ने में सफल रहता है तो क़िताब सफल मानी जाती है । (इस विचार पर मतभिन्नता हो सकती है )

"ये जो देश है मेरा" कोई कहानी , उपन्यास या उपन्यासिका नहीं है। यह किताब भुखमरी, विस्थापन और सूखे के दंश को झेलते हुए उन लाचार किसान, आदिवासियों और विस्थापितों के दर्द को समेटे हुए आंकड़ों और भावनाओं की एक रिपोर्ट है, (रिपोर्ताज) जिसे पढ़ते हुए आप कई मर्तबा भावुक होंगे और शायद झुंझला जाएंगें।

पांच हिस्से में लिखी गई यह रिपोर्ट शुरुआत में अपनी कसावट, बेहतर आंकड़े और सुंदर शब्द संयोजन के साथ सामने आती है। बुंदेलखंड के सूखे से जूझते हुए किसान, किसान के परिवार और उससे होती हुई आत्महत्या के आंकड़े हृदयविदारक हैं।

पढ़ते हुए यह एहसास होने लगता है कि खेती जुआ समान ही तो है। किसान बैंकों से कर्ज लेते हैं, कर्ज के पैसे से बीज बोते हैं, फ़सल उग आती है और फिर सूखा पड़ जाता है। स्थिति अब भयावह हो जाती है। ना खाने को पैसे बचते हैं ना कर्ज़ चुकाने को! बाकी जो शेष बच जाता है वो फांसी का फंदा होता है जिसे किसान किसी शर्त पर ठुकरा नहीं सकता है।

कई मामले में राज्य सरकारों ने इसे गृह क्लेश का भी कारण बताया है ।

मेरे समझ से गाँव में रहने वाले लोगों में गृह क्लेश के ज्यादातर मामलों का अगर पोस्टमार्टम किया जाए तो यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि ग़रीबी गृह क्लेश का प्रमुख कारण है ।

जब एक माँ, अपने नई ब्याही बेटी और दामाद का अपने घर में स्वागत कुल जमा एक किलो अनाज से करती है और यह रिपोर्ट आप पढ़ रहे होते हैं तब आपके अंदर कुछ चटक रहा होता है जिसे केवल आप महसूस करते हैं ।

रिपोर्टर की रिपोर्ट आगे बढ़ती है जहाँ,
जब एक जवान बेटी अपने शादी में होने वाले खर्चे के लिए अपने पिता द्वारा लिए जाने वाले संभावित कर्ज और परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले विभीषिका से चिंतित होकर (पिताजी को आत्महत्या ) एक दिन चुपचाप डाई (बालों में लगाया जाने वाला रसायन) पीकर मरने की कोशिश करती है और पूरा तंत्र कुछ नहीं कर पाता है। ये सब पढ़ते हुए आप भन्नाकर रह जाते हैं !

लोग आत्महत्या कैसे कर लेते हैं एक आध की बात हो तो ठीक है पर मुआमला जब दहाई नहीं सैंकड़ों में हो तो विषय चिंताजनक और ध्यान देने योग्य होती है ।

मैंने घास की रोटियों पर न्यूज़ चैनलों की कई बार रिपोर्टिंग देखी है किंतु इस विषय को गौर से पढ़ते हुए यह सोचना बेईमानी लगती है कि हम जो पढ़ रहे हैं वो सिर्फ सच है,सच के सिवा कुछ भी नहीं है ।

यह सच है की सूखे के इस प्रेत को यूँ ही नहीं आना पड़ा है। लोगों ने प्रकृति और पर्यावरण का अनुचित दोहन करते हुए ढ़ोल और मृदंग की थाप पर इसे आमंत्रण दिया है जो अब ब्रह्मपिशाच सा बन गया है ।

हालांकि लेखक ने यह जिक्र नहीं किया है आखिर कैन और बेतवा नदी के किनारे बसे इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों ने कभी इन दोनों नदियों पर बांध बनाने को लेकर कोई मांग क्यों नहीं उठाई है जिससे किसानों को सूखे की समस्या से थोड़ी बहुत निजात मिल जाती / हुई होगी।

8000 कूनो पालपुर वनवासी के विस्थापन के साथ क़िताब का मध्य भाग में  थोड़ी ढीली हो जाती है इसके ये मायने नहीं है कि आंकड़े ग़लत और उलूल जुलूल हो जाते हैं। लेखक अपनी भावनाओं को हम जैसे पाठकों के सामने लाने में थोड़े से चूक गए हैं।

पर जैसे ही ये रिपोर्ट नियामगिरी के पहाड़ों और उनके असली हकदारों के बीच पहुंचती है आप जंगल के हरियाली और प्रकृति के बीच कहीं खो से जाते हैं। यहाँ सब कुछ वास्तविक है। महिलाओं और पुरुषों के फ़ैशन भी समानान्तर हैं। 

शहरीकरण के दौर से जूझती एक संभ्रांत महिला और नियामगिरि की एक आदिवासी महिला के बीच लेखक द्वारा की गई ईमानदार तुलना आपको भाव-विभोर कर देती है। एक आदिवासी कन्या की मुस्कुराहट उसके धंसे गालों में से सफ़ेद झांकते दांत मिलियन डॉलर वाली स्माईल की मिथक को सत्यापित करने वाली रिपोर्ट आपके चेहरे पर मुस्कुराहट की एक लकीर सी छोड़ देती है।

ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव से समुद्री जल स्तर के बढ़ने से डूब रहे तटीय प्रदेश की कहानी है सतभाया। समुद्र गाँव को लगातार डुबाए जा रहा है और साथ में डूब रही है लोगों की भावनाएँ। लोग बाग मजबूर हैं विस्थापन के लिए। घर छोड़कर चले जाना कितना कष्टदायक होता है यह बताते हुए सतभाया के विस्थापित भावुक हो जाते हैं ।

खैर !

पांच रिपोर्टों को समेटे यह रिपोर्ताज देश की मुख्यधारा को छोड़ उन लोगों की कहानी है जो जल, जंगल और जमीन से जुड़े रहना चाहते हैं और ताउम्र किसी भी कीमत पर अपने जंगल देवता को छोड़ना पसंद नहीं करते हैं । सरकारें इन्हें मुआवजा तो देती है पर इनके बेहतरी के लिए क्या करती है यह सरकार ही जानती है। कुल मिलाकर यह रिपोर्ताज़ भावनओं और मजबूरियों से बुनी एक स्वेटर है जिसे पहनकर आप भावविभोर हो जाएंगे ।


Sunday, March 4, 2018

फूटा घट-घट घटहिं समाना

अभिनेत्री श्रीदेवी के अचानक निधन से पूरा देश सदमे में आ गया था. 24 फरवरी की रात अचानक खबर आई कि दुबई में श्रीदेवी का हार्ट अटैक से निधन हो गया. खबर सुनते ही बॉलीवुड के तमाम सितारे सोशल मीडिया पर शोक जताने लगे और उन्हें श्रद्धांजलि देने लगे. लेकिन श्रीदेवी के निधन पर जिस तरह से मीडिया कवरेज हुई उससे अभिनेता ऋषि कपूर थोड़े नाराज भी दिखे.

उन्होंने ट्वीट किया, "अचानक श्रीदेवी 'बॉडी' कैसे बन गईं? सारे टीवी चैनल दिखा रहे हैं कि बॉडी आज रात मुंबई लाई जाएगी. अचानक आपकी पहचान खत्म हो गई और बॉडी बन गई."

थोड़ी देर के लिए मीडिया कवरेज को छोड़ दीजिए, तो ऋषि कपूर की इस नाराजगी का जबाव भारतीय परंपरा और मनीषा में मिलता है. हिंदू जीवन धर्म में जन्मतिथियों के मनाने की परंपरा है और पुण्यतिथि सिर्फ पिता की मनाई जाती है. क्योंकि पिता की मृत्यु की घटना जीवन से जुड़ी है. भारतीय परंपरा कहती हैकि मृत्यु के अनंतर ही पिता का सारा ऋण पुत्र को हस्तांतरित होता है.

कोई सामान्य हिन्दू श्राद्ध की सारी विधियां पूरी करे या न करे, दाह संस्कार के बाद पीपल के पेड़ के नीचे एक घड़ा जरूर बांधता है. उस घड़े में नीचे छोटा-सा छेद कर दिया जाता है. प्रतिदिन उस घड़े में पानी भरा जाता है और यह अपेक्षा की जाती है कि पानी निरंतर पीपल की जड़ में गिरता रहे. उस घड़े के पास प्रतिदिन दीपक जलाया जाता है.

यह जीवन की साधना है.

महाप्रयाण के लिए गया जीवन ही उस घड़े के रूप में सनातन काल की शाखाओं में उतने दिनों तक लटका दिया जाता है जितने दिन प्रतीक रूप में उसे नया जन्म ग्रहण कर लेना है. और तब इस प्रतीक की जरूरत नहीं रह जाती है. इस प्रतीक की सार्थकता खत्म हो जाती है तो इसे भी फोड़ दिया जाता है, 'फूटा घट-घट घटहिं समाना'. एक चेतन व्यक्ति समष्टि में, सृष्टि में वापस चला जाता है.

विज्ञान पढ़ने वाले लोग जानते होंगे, हम सभी मूलतः ऊर्जा से बने हैं. हम एनर्जी का पार्ट हैं. उस एनर्जी या ऊर्जा को जो इस अखंड ब्रह्मांड में व्याप्त है और हर ओर प्रवाहित हो रही है. ऊर्जा के संरक्षण का सिद्धांत कहता है, 'ऊर्जा का न तो नाश हो सकता है न उसका सृजन किया जा सकता है. वह सिर्फ रूपांतरित हो सकता है.'

क्या भौतिकी का यह सामान्य नियम आपको गीता के श्लोकों की याद दिला रहा है? बिलकुल सही, हम सभी ऊर्जा का हिस्सा हैं और उसी में चले जाते हैं. आप चाहें तो इसको 'पंचतत्वों में विलीन हो जाना' भी कह सकते हैं.

क्षिति जल पावक गगन समीरा,

पंच रचित अति अधम शरीरा।

शरीर के भौतिक अवशेषों को गंगा की धारा में या तीर्थ में प्रवाहित करने के पीछे भी जीवन की निरंतरता की खोज की भावना है. भस्मीभूत अवशेष एक अध्याय की समाप्ति के प्रतीक भर हैं, वे पूरी तरह अशुचि हैं. अपवित्र हैं. उन्हें छूने भर से आदमी अपवित्र हो जाता है, क्योंकि आदमी मृत्यु को छूने के लिए नहीं बना है. वह जीवन का प्रतीक है. इसलिए मृत्यु अशौच है, अपवित्र है. आदमी की देह जीवन के पार जीवन की खोज के लिए साधन है. भारतीय परंपरा कहती है ऐसे साधन देवताओं तक को मयस्सर नहीं है.

लेकिन बदलते वक्त में चलन उल्टा हो गया है. भस्मियां पवित्र हो गई हैं. उनको ताम्र कलशों में रखा जाने लगा है. चुपचाप शांति से प्रवाहित करने की बजाय बड़े-बड़े जुलूस निकाले जाते हैं. उनको एक जगह नहीं, जगह-जगह प्रवाहित करने का चलन चल पड़ा है. मृत्यु की पूजा भोंडे तरीके से शुरू हो गई.

दिवंगतों की मूर्तियों की स्थापना की जाने लगी हैं. मंदिर बनने लगे हैं. जो चला गया, उसकी पार्थिव आकृति इतिहास के लिए भले जरूरी हो, पर उसकी पूजा क्यों?

श्रीदेवी के मामले में उनका काम ही अनुकरणीय है. सिनेमा की कला में उनका योगदान ही सराहा जाना चाहिए. शरीर तो रीत गया, फूट गया (घड़े की तरह) तो उसकी पूजा क्यों?

यह श्लोक ऋषि कपूर ने नहीं सुना हो तो सुनना चाहिए,

न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं न पुनर्भवम।

कामये दुःख ऋतांना केवलमार्स्त्तिनाशनम्।।

यानी, न मैं राज्य चाहता हूं न स्वर्ग, न पुनर्जन्म के चक्कर से मुक्ति. मैं केवल दुखितों के पीड़ा हरने का अवसर चाहता हूं.

जो कुछ भी जैसा जीवन चारों तरफ है, उसकी साझेदारी यही हिन्दू सनातन परंपरा का मूल तत्व है. दर्शन है.

ऐसे में श्रीदेवी का कार्य ही उनकी पहचान है. बाकी जो बचा हुआ है, पांच तत्वों वाला, वह घड़ा है रीता हुआ, खाली हुई देह है, बॉडी है. मैं जानता हूं कि संवेदनशील ऋषि कपूर बेहद शोकाकुल हैं पर उऩको श्रीदेवी के पार्थिव शरीर को 'बॉडी' कहने पर नाराज नहीं होना चाहिए.

(यह लेख इंडिया टुडे में प्रकाशित हो चुका है, कृपया कहीं और प्रकाशित न करें)

Thursday, February 22, 2018

ज़बानी पकौड़े के दौर में मिथिला का तरूआ है सदाबहार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोजगार का जिक्र करते हुए पकौड़े का नाम क्या लिया, सड़क से लेकर संसद तक हर तरफ पकौड़ा प्रकरण चर्चे में आ गया. इस बयान के लिए कोई तंज कर रहा है, कोई आलोचना. कोई समर्थन में है तो कोई मुखालफत में. मुखालफत में किसी ने पकौड़े की दुकान लगा ली, किसी ने पकौड़ा छानते हुए हाथ जला लिए.

लेकिन, सोशल मीडिया पर चल रही चटखारेदार चर्चा, तमाम राजनीति और आलोचनाओं को किनारे कर दें तो इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि पकौड़े वास्तव में देश के लगभग हर हिस्से में बहुतों को रोजगार दे रहे हैं और उनके परिवार का पेट भर रहे हैं.

पर आज हम पकौड़े के जिस भाई से आप का परिचय करवा रहे हैं वह असल में पकौड़े जैसा दिखता तो है लेकिन यह है मिथिला का तरूआ. इसको बनाने की विधि भी अलग है और किन सब्जियों से तरूआ बनता है उसका रेंज तो खैर विविधता भरा है ही.

इससे पहले की मैं आपको मिथिला के खान-पान के महत्वपूर्ण हिस्से तरूआ से परिचय करा दूं उससे पहले मैं मिथिला के खान-पान के बारे में एक लोकोक्ति बता दूं. मिथिला में खान-पान की संस्कृति में तीन चीजों का होना बेहद जरूरी हैः मिथिलाक भोजन तीन, कदली, कबकब मीन

यहां कदली यानी केला, कबकब यानी ओल या सूरन, और मीन यानी मछली. लेकिन यह जो ओल है उसे तलकर पकौड़े की तरह भी य़ानी तरूआ बनाकर भी खाया जाता है. शायद अचंभा लगे पर मिथिला के भोजन भंडार का यह तो महज एक नमूना है.

तरूआ को लेकर एक अन्य लोकगीत है,

भिंडी भिनभिनायत भिंडी के तरुआ,

आगु आ ने रे मुँह जरुआ

हमरा बिनु उदास अछि थारी,

करगर तरुआ रसगर तरकारी

पूरा अर्थ न जानिए बस इतना ध्यान रखिए कि इस गीत में भिंडी से लेकर काशीफल तक के तरूए का जिक्र है.

तरूआ तो तकरीबन सभी सब्जियों का बनता है. आलू, बैंगन, गोभी, लौकी, कुम्हड़ा (काशीफल), परवल, खम्हार, ओल (सूरन), अरिकंचन (अरबी के पत्ते). लेकिन मिथिला में अतिथि के सत्कार में सबसे महत्वपूर्ण तरूआ होता है तिलकोर का. तिलकोर एक किस्म का कुंदरू जैसे फल का पत्ता होता है, जिसके औषधीय गुण भी होते हैं.

मिथिला में तिलकोर की बेल आपको हर घर की बाड़ी में मिल जाएगा. जानकारों का दावा है कि तिलकोर टाईप वन डायबिटीज के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का रामबाण है. मैथिल लोग बताते हैं कि तिलकोर के नियमित सेवन से पेनक्रियाज से इंसुलिन का स्राव नियमित हो जाता है.

बहरहाल, मिथिला में तिलकोर ही नहीं बाकी सब्जियों का तरुआ बनाने की विधि तकरीबन एक जैसी है. इसके लिए अमूमन बेसन या चावल के आटे (जिसको मैथिली में पिठार कहा जाता है) का इस्तेमाल किया जाता है. मिसाल के तौर पर आलू के तरुए की बात की जाए तो उसे पतले टुकड़ों में स्लाइस की तरह काटकर रख लिया जाता है. इस तरह जैसे कि चिप्स के लिए काटा जाता है. बेसन फेंटकर उसमें नमक हल्दी मिला दी जाती है. अगर इच्छा हो तो थोड़ी लाल मिर्च का पाउडर भी. नमक आप स्वाद के मुताबिक डाल सकते हैं.

फिर आलू के फ्लेक को उस बेसन में डुबोकर कड़कते तेल में तल लिया जाता है. आंच धीमी रखने से तरूआ अच्छे से पकता है. ऐसा ही, बैंगन और तिलकोर समेत अन्य सब्जियों के लिए भी किया जाता है.

तो अगली दफा आप जब भी किसी मैथिल दोस्त से मिलें तो उससे तरूआ खाने की फरमाईश जरूर करें. लेकिन याद रखिए, तरूआ तरूआ है, यह पकौड़ा नहीं है.

***

Friday, February 16, 2018

जीवन का असली मजा तो गोलगप्पे में है

बाजार गया तो देखा भीड़-भाड़ के बीच भी एक जगह कुछ ज्यादा ही भीड़ थी. गोल घेरा-सा बना था. खासकर महिलाओं की ज्यादा तादाद थी. जिज्ञासावश वहां गया तो पता चला कि वहां गोलगप्पे बिक रहे हैं.

अब गोलगप्पों का तो क्या है, आपको दिल्ली में बंगाली मार्केट से लेकर कनॉट प्लेस और संगम विहार से लेकर रोहिणी तक मिल जाएंगे. लेकिन यह ऐसा शुद्ध स्वदेशी डिश है जो देश के हर हिस्से में मिलता है.

गोलगप्पा उर्दू का शब्द है. जैसा नाम से ही पता चलता है कि गोल पूरी जैसी चीज में आलू के चटकारेदार मसाला बनाकर डाला जाता है और उससे भी चटकारेदार रस उसमें भरकर कागज के पत्तल या पत्तों के दोने में रखिए और रखने के फौरन बाद गप्प से उदरस्थ कर जाइए. आपने देर की नहीं, कि बुलबुला फूटा नहीं. तोड़कर इसको खाना तो तकरीबन उतना ही नामुमकिन है जितना ग्यारह मुल्कों की पुलिस के लिए डॉन को पकड़ना.

तो गोल चीज को गप्प से मुंह रख लेने से ही शब्द बना गोलगप्पा. वैसे अंग्रेजीदां लोगों को बता दें कि अंग्रेजी के शब्दकोश में गोलगप्पे का अर्थ ‘पानी से भरा इंडियन ब्रेड’ या फिर ‘क्रिस्प स्फेयर ईटेन’ लिखा गया है! इसके ही एक और नाम पानीपूरी का शाब्दिक अर्थ है "पानी की रोटी" इसके मूल के बारे में बहुत कम जानकारी है पानी पूरी शब्द को 1955 में और गोलगप्पा शब्द को 1951 में दर्ज किया गया.

जरा बताइए तो, गोलगप्पे में डलता क्या है? एक पूरी होती है, जो या तो आटे से बनती है य़ा फिर सूजी मिलाकर. फिर गोलगप्पे वाला अपने अंगूठे से इसमें बड़ी मुलायमियत से एक छेद करता है, और उसमें एक मसाला डालता है. अलग-अलग इलाकों में गोलगप्पे में भरा जाने वाला मसाला अलग हो सकता है. लेकिन आलू उसमें केंद्रीय भूमिका में होता है.

आलू का मसाला तैयार करते वक्त उबले आलू को इमली के पानी, मिर्च, चाट मसाले, प्याज वगैरह के साथ मिलाया जाता है. इस मसाले को गोलगप्पे के अंदर डालकर उसे फौरन मटके में भरे एक और तरल से भरकर आपको दिया जाता है. इसमें भी इमली का रस और नमक होता है, मिर्च का पाउडर भी. लेकिन इसके अलहदा जायके भी होते हैं. कोई नींबू का पानी, पुदीने का पानी, खजूर का पानी और बूंदी डला सिरके का पानी तो है ही, हाल ही में मेरा साबका हींग के स्वाद वाले पानी से भी पड़ा. पर मेरा पसंदीदा तो झारखंड-बंगाल वाला हल्का खट्टापन लिए इमली की खटाई वाला पानी ही है.

अभी यह लिख रहा हूं तो गोलगप्पे का जायका जबान पर तैर गया है और मुंह में पानी आ गया.

वैसे झारखंड उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और बिहार में गोलगप्पे को गुप चुप कहते हैं. गोलगप्पे के दीवानों की संख्या पूरे देश में है. सो उन्होंने अपने प्यार के मुताबिक, गोलगप्पे को कई नाम दिए हैं. महाराष्ट्र में इसका नाम पानीपूरी बताशा है तो गुजरात में पानीपूरी. बंगाल और बांग्लादेश में इसको फुचका कहते हैं.

कुछ लोग गोलगप्पे की शुरूआत बनारस से मानते हैं. सन् 1970 में दिल्ली से बच्चों की एक मैगजीन निकलती थी, जिसका नाम रखा गया था ‘गोलगप्पा’. लेकिन कहा-सुना जाने वाला इतिहास कुछ और कहता है. जो लोग दिल्ली आए हैं या यहां रहते हैं उन्हें पुरानी दिल्ली खासकर लाल किले के आसपास के इलाके में जाने का मौका ज़रूर मिला होगा. जिस जगह चांदनी चौक है, वहां आपने एक चौक देखा होगा जिसे फव्वारा कहते हैं. इस अलकतरे की आज की सड़क पर बादशाह शाहजहां के वक्त में नहरें बनवाई गई थीं, जो यमुना का पानी किले और शहर तक लाती थीं. पूरे शाहजहांनाबाद (उस वक्त की दिल्ली) के बाशिंदे उसी नहर से पानी पिया करते थे.

लेकिन, एक वक्त आया जब उस नहर का पानी किसी वजह से गंदा हो गया और शहर के लोग कै-दस्त से परेशान हो गए. फिर शाहजहां के बेटी रोशनआरा ने शाही हकीम को बुलाकर इन बीमार लोगों के लिए कोई नुस्ख़ा तैयार करने को कहा. हकीम साहब ने नुस्खा तैयार कर दिया और लोगों को पिलाया. लोग चंगे हो गए पर कुछ लोगों को इसका जायका बहुत मजेदार लगा. सो उन शौकीन लोगों ने इस नुस्खे को बनाना जारी रखा और उसे आटे की छोटी पूरियों में भरकर पिया जाने लगा. तो इस तरह गोलगप्पे का जन्म हुआ जो कहीं फुचका, कहीं गुपचुप, कहीं पानी बताशा, कही पानी पूरी और कहीं किसी और नाम से जाना जाता है.

राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इसे पताशी नाम से जाना जाता है. लखनऊ में पांच अलग-अलग टेस्ट के पानी के साथ मिलने वाले पांच स्वाद के बताशे भी काफी फेमस हैं. इसका पानी सूखे आम से बनाया जाता है. गुजरात में चपातियों को फुल्की कहा जाता है, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में गोल गप्पों को भी फुल्की कहा जाता है. इस नाम से इसे काफी कम लोग जानते हैं. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में गोल गप्पों को टिक्की कहा जाता है.

जो लोग थोड़ी भदेस जबान जानते हैं उनके लिए पड़ाका शब्द जरूर पटाखे से ताल्लुक रखता होगा लेकिन अलीगढ़ में गोलगप्पों को पड़ाका ही कहते हैं. तो गुजरात के कुछ हिस्सों में इसे पकौड़ी भी कहा जाता है. इसमें सेव और प्याज मिलाया जाता है और पानी को पुदीने और हरी मिर्च से तीखा बनाते हैं. कीमत भी इसकी कोई ज्यादा नहीं. जो गोलगप्पा हम अमूमन खाते हैं अभी, वह कोई दस रुपए में चार मिलते है. बचपन में एक रू. के दस गोलगप्पे मिलते थे, इसकी याद तो मुझे भी है.

लेकिन असली मजा तो तब है जब कोई गोलगप्पे वाले से कहे, भैया इसमें मिर्ची थोड़ा और डालना. लोग जब गोलगप्पे जब खा चुके होते हैं तो साथ में घलुए में, भैया सूखी खिला दो कहना कत्तई नहीं भूलते. आखिर मूल से ज्यादा प्यारा सूद जो होता है. तो अगली दफा जब भी गोलगप्पे खाने जाएं तो शाही हकीम और शहजादी रोशनआरा को जरूर याद कीजिएगा और बरसात के मौसम में इससे बचने की कोशिश तो कीजिएगा, लेकिन साथ ही यह भी याद रखिएगा कि यह जो गोलगप्पा है न, यह है असली स्वदेशी डिश.

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