इस महीने की शुरुआत में पटने में राजकमल के किताब उत्सव में गिरीन्द्रनाथ बारं-बार डोढ़ाय चरित मानस का जिक्र कर रहे थे. रही-सही कसर सत्यानंद निरुपम ने पूरी कर दी. नतीजतन, किताब उत्सव में ही मैंने सतीनाथ भादुड़ी का उपन्यास डोढ़ाय चरित मानस खरीद लिया और अड्डे पर विमान का दो-ढाई घंटे इंतजार करते हुए 35-40 पेज पढ़ डाले.
किताब पढ़ने की यह गति? नहीं. मैं उस किताब की भाषा से चमत्कृत हो गया था. मूल बांग्ला में लिखा यह उपन्यास उन जादुई हाथों की सरस्वती कलम से अनूदित हुआ है कि असल जैसा मजा आ जाता है. रेणुजी जैसी भाषा. वैसी ही शब्दावली. वैसे ही तेवर.
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| राजकमल प्रकाशन ने डोढ़ाय चरित मानस को फिर से प्रकाशित किया है |
असल में, हिंदी और भारतीय भाषाओं के साहित्य में कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ना भर एक पाठकीय अनुभव नहीं, बल्कि समय और समाज के भीतर उतरने की एक यात्रा होता है. डोढ़ाय चरित मानस ऐसी ही कृति है.
यह उपन्यास अपने समय के साथ-साथ हमारे समय को भी उतनी ही तीक्ष्णता से पढ़ता है. इसे पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि हम किसी बीते हुए भारत की कहानी नहीं, बल्कि आज के भारत की जड़ों को पढ़ रहे हैं.
सतीनाथ भादुड़ी का यह उपन्यास शीर्षक से ही एक दिलचस्प छल करता है. ‘चरित मानस’ यह शब्द आते ही स्मृति में सिर्फ भगवान श्रीराम की छवि उभरती है, जहाँ नायक एक आदर्श पुरुष है, मर्यादा का प्रतीक. लेकिन यहाँ भादुड़ी जिस ‘चरित’ को लिखते हैं, उसका नायक है डोढ़ाय.
एक साधारण, उलझा हुआ, परिस्थितियों में बहता हुआ मनुष्य.
यह शीर्षक दरअसल एक विडंबनात्मक उद्घोषणा है: यहाँ कोई राम नहीं है, यहाँ मनुष्य है, अपने सारे दोषों, कमजोरियों और भ्रमों के साथ.
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| सतीनाथ भादुड़ी |
डोढ़ाय कोई असाधारण पात्र नहीं है. वह न तो क्रांतिकारी है, न दार्शनिक, न ही कोई नैतिक नायक. वह वही है, जो भारत के गाँवों में हर जगह दिखाई देता है. एक ऐसा आदमी, जो परिस्थितियों के साथ बहता है, कभी इधर, कभी उधर.
लेकिन भादुड़ी की ताकत यही है कि वे इसी ‘साधारण’ को असाधारण बना देते हैं.
डोढ़ाय का जीवन दरअसल उस दौर के भारतीय समाज का दर्पण बन जाता है, जहाँ स्वतंत्रता आंदोलन की ऊँची-ऊँची बातें गाँव की जमीन पर आकर अजीब-सी विडंबनाओं में बदल जाती हैं.
इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत इसका राजनीतिक दृष्टिकोण है. लेकिन, यह राजनीति ऊपर से नहीं, नीचे से देखी गई है. यहाँ गांधी, कांग्रेस, आंदोलन ये सब मौजूद हैं, लेकिन केंद्र में नहीं हैं. केंद्र में है वह आदमी, जो इन सबके बीच फँसा हुआ है.
डोढ़ाय राजनीति को समझने नहीं जाता, राजनीति उसे घेर लेती है. वह कभी आंदोलन का हिस्सा बनता है, कभी उससे दूर चला जाता है, कभी उसका इस्तेमाल होता है, और कभी वह खुद दूसरों का इस्तेमाल करता है. इस पूरे खेल में आदर्श धीरे-धीरे छीजते जाते हैं और बचती है सिर्फ एक कच्ची, असहज सचाई.
भादुड़ी का व्यंग्य यहाँ बहुत धारदार है, लेकिन वह शोर नहीं करता. वह चुपचाप, लगभग सहज ढंग से हमारे सामने खुलता है. यह व्यंग्य किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर है. उस राजनीति पर, जो जनता के नाम पर चलती है, लेकिन जनता को ही सबसे ज्यादा भ्रमित करती है.
इस लिहाज से देखें तो यह उपन्यास आगे चलकर राग दरबारी जैसी कृतियों की जमीन तैयार करता दिखाई देता है. फर्क बस इतना है कि जहाँ ‘राग दरबारी’ में व्यंग्य खुलकर सामने आता है, वहीं भादुड़ी के यहाँ वह धीमे-धीमे रिसता है.
उपन्यास का आंचलिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है. यह सिर्फ एक राजनीतिक कथा नहीं, बल्कि गाँव के जीवन का सूक्ष्म दस्तावेज़ है. भाषा, बोली, रीति-रिवाज, सामाजिक संबंध सब कुछ इतनी बारीकी से दर्ज है कि पाठक को लगता है, वह किसी गाँव में बैठा यह सब देख रहा है.
भादुड़ी की भाषा में एक तरह की ‘लोक गंध’ है. वह सजावटी नहीं है, लेकिन बेहद प्रभावी है. यह भाषा अपने आप में एक सांस्कृतिक प्रतिरोध भी है, क्योंकि यह उस समय के साहित्यिक मानकों से अलग रास्ता चुनती है. और जैसा, गिरीन्द्र बता रहे थे, यह रेणुजी की औपन्यासिक कथा-भूमि का प्रीक्वल है.
लेकिन इस उपन्यास को सिर्फ आंचलिकता तक सीमित करना उसके साथ अन्याय होगा. इसकी असली शक्ति इसके दार्शनिक अंतरतम में है.
डोढ़ाय का जीवन हमें बार-बार यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या मनुष्य वास्तव में अपने निर्णयों का स्वामी है, या वह सिर्फ परिस्थितियों का परिणाम है? क्या वह सच में कोई रास्ता चुनता है, या रास्ते उसे चुन लेते हैं? यह सवाल उपन्यास में कहीं सीधे नहीं पूछा गया, लेकिन हर घटना, हर मोड़ पर यह हमारे सामने खड़ा हो जाता है.
डोढ़ाय का चरित्र इसी संदर्भ में बेहद जटिल हो जाता है. वह न तो पूरी तरह निर्दोष है, न पूरी तरह दोषी. वह कभी सहानुभूति जगाता है, तो कभी झुंझलाहट. लेकिन शायद यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी सफलता है. यह हमें किसी एक नैतिक निष्कर्ष तक नहीं पहुँचने देता. यह हमें मजबूर करता है कि हम मनुष्य को उसकी पूरी जटिलता में देखें.
यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि भादुड़ी अपने पात्रों के साथ कोई नैतिक निर्णय नहीं सुनाते. वे उन्हें जज नहीं करते. वे सिर्फ उन्हें प्रस्तुत करते हैं. जैसे वे हैं. यह दृष्टिकोण अपने आप में बहुत आधुनिक है. यह हमें याद दिलाता है कि
साहित्य का काम सिर्फ उपदेश देना नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं को उजागर करना भी है.
अगर इस उपन्यास की तुलना करनी हो, तो हिंदी में गोदान का नाम स्वाभाविक रूप से आता है. लेकिन ‘गोदान’ जहाँ किसान जीवन की त्रासदी को अधिक भावुक और नैतिक धरातल पर प्रस्तुत करता है, वहीं ‘डोढ़ाय चरित मानस’ उस त्रासदी को एक राजनीतिक और विडंबनात्मक परिप्रेक्ष्य में देखता है. यहाँ करुणा है, लेकिन वह करुणा भी एक तरह की बेचैनी के साथ आती है.
आज के समय में इस उपन्यास को पढ़ना एक अलग ही अनुभव है. जब हम लोकतंत्र, राजनीति और आम आदमी की बात करते हैं, तो अक्सर हम बड़े सिद्धांतों और आदर्शों की बात करते हैं. लेकिन भादुड़ी हमें उस जमीन पर ले जाते हैं, जहाँ ये आदर्श टूटते हैं, बिखरते हैं और कई बार अपना अर्थ ही खो देते हैं.
संभवतया, अपने कथा वितान को अधिक तानने के लिए ही भादुड़ी डोढ़ाय को अपने गांव के मरनाधार से उठाकर (भगाकर) कोयरीटोला में जाकर स्थापित करते हैं. अपने मूल गांव में जहां बहुत सारे किरदार हैं, बौका बाबा हैं, रमिया है. महतो हैं, छड़ीदार हैं. रबिया है, नायब है, वहीं कोयरी टोला में भी सगिया नायिक है, मोसम्मात है, गिदन है, बाबू साहेब हैं.
राजनीति और जातीय कोण इस कथा को अधिक जटिल और अधिक परतदार बनाते हैं.
यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र सिर्फ चुनावों और नारों का खेल नहीं है, बल्कि वह उन लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी से बनता है, जिनकी आवाज़ अक्सर कहीं दर्ज ही नहीं होती.
‘डोढ़ाय चरित मानस’ इस मायने में सिर्फ एक उपन्यास नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ है. यह हमें उस भारत से मिलवाता है, जो अक्सर इतिहास की किताबों में नहीं मिलता. यह हमें बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ एक महान कथा नहीं था, बल्कि उसमें असंख्य छोटी-छोटी कहानियाँ थीं. भ्रम की, संघर्ष की, और कई बार विफलताओं की.
भादुड़ी की यह कृति इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह हमें अपने समय को समझने का एक आईना देती है. यह आईना चमकदार नहीं है, उसमें धुंधलापन है, खरोंचें हैं. लेकिन शायद सच हमेशा ऐसा ही होता है.
अगर आपने डोढ़ाय चरित मानस नहीं पढ़ा है और आप साहित्य के अनुरागी हैं तो आपको पहली फुरसत में यह किताब पढ़नी चाहिए. राजकमल ने नए कलेवर में इसी साल फिर से उतारा है.


