शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

महाराष्ट्र में 10% पानी कटौती: सूखा प्रबंधन या जल शासन की परीक्षा?

मुख्य बिंदु
  • महाराष्ट्र सरकार ने 16 अक्टूबर से शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में कम-से-कम 10% पानी कटौती का निर्देश दिया.
  • पिंपरी-चिंचवड़ महानगरपालिका ने भी पानी की खपत घटाने के कदम घोषित किए हैं.
  • पेयजल को प्राथमिकता देने के साथ उद्योगों में पानी के पुनः उपयोग और पाइपलाइन रिसाव रोकने पर जोर है.
  • सवाल यह है कि पानी बचाने का बोझ केवल नागरिकों पर पड़ेगा या बड़े उपभोक्ताओं और प्रशासन की जवाबदेही भी तय होगी.
महाराष्ट्र में पानी का संकट अब केवल गर्मियों की आशंका नहीं, बल्कि जल प्रबंधन और प्रशासनिक तैयारी की परीक्षा बनता जा रहा है.

राज्य सरकार ने 5 अक्टूबर 2026 को जारी निर्देश में शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों को 16 अक्टूबर से कम-से-कम 10 प्रतिशत पानी की कटौती लागू करने को कहा. उद्देश्य उपलब्ध जल भंडार को अगले मानसून तक संभालकर रखना है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या पानी की कटौती ही समाधान है, या इसके साथ जल वितरण की खामियों को भी दूर करना होगा?

कम बारिश से बढ़ी चिंता

आकाशवाणी की 5 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, जल संसाधन विभाग ने 31 अगस्त 2027 तक पानी के भंडार और उसके इस्तेमाल की योजना बनाने का निर्देश दिया है. पेयजल को प्राथमिकता देने, प्रमुख बांधों में 10 प्रतिशत आपातकालीन भंडार रखने और पानी की बर्बादी रोकने पर जोर दिया गया है.

उद्योगों से इस्तेमाल किए जाने वाले पानी का कम-से-कम 30 प्रतिशत पुनः उपयोग या पुनर्चक्रण करने को भी कहा गया है.

पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में इस नीति का असर दिखने लगा है.

द टाइम्स ऑफ इंडिया की 16 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, पिंपरी-चिंचवड़ महानगरपालिका ने पानी की आपूर्ति में 10 प्रतिशत कटौती की घोषणा की है. वहां पहले से एक दिन छोड़कर पानी दिया जाता है; अब आपूर्ति की अवधि लगभग 20 से 25 मिनट घटने की संभावना है. पुणे में भी साप्ताहिक जलापूर्ति बंदी का उपाय लागू किया गया है.

क्या कटौती से आगे भी कोई रास्ता है?

पानी बचाने के लिए आपूर्ति घटाना एक तात्कालिक उपाय हो सकता है, लेकिन दीर्घकालीन समाधान के लिए यह पर्याप्त नहीं है.

सबसे पहले यह देखना होगा कि पाइपलाइनों से कितना पानी रिसाव के कारण बर्बाद होता है, अवैध निकासी पर कितनी प्रभावी निगरानी है और नगर निकाय उपचारित अपशिष्ट जल का कितना पुनः उपयोग कर रहे हैं.

राज्य सरकार ने स्थानीय निकायों को रिसाव रोकने और बागवानी, निर्माण तथा धुलाई जैसे कामों में उपचारित पानी इस्तेमाल करने के निर्देश दिए हैं. इन उपायों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब उनके क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा हो और आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं.

यह भी जरूरी है कि पानी बचाने की जिम्मेदारी केवल घरेलू उपभोक्ताओं पर न डाली जाए. उद्योगों, बड़े व्यावसायिक परिसरों, निर्माण परियोजनाओं और स्थानीय प्रशासन—सभी के लिए स्पष्ट लक्ष्य होने चाहिए.

पानी की कटौती कितनी हुई, कितना पानी बचा और कितना उपचारित जल दोबारा इस्तेमाल हुआ, इसकी जानकारी नागरिकों को मिलनी चाहिए.

जल संकट, समानता और जवाबदेही

पानी की कमी का सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ सकता है जिनके पास भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है या जो टैंकरों पर निर्भर हैं. इसलिए कटौती लागू करते समय यह भी देखना होगा कि अलग-अलग इलाकों में आपूर्ति का अंतर और न बढ़े.

कम पानी उपलब्ध होने पर समान और पारदर्शी वितरण पहले से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है.

खेती और उद्योगों की जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सरकार ने पेयजल, पशुधन और चारे की जरूरतों को प्राथमिकता देने तथा उसके बाद सिंचाई के पानी के आवंटन की बात कही है. लेकिन इसके लिए बांधों के वास्तविक भंडार, आगामी मांग और वर्षा की स्थिति पर आधारित नियमित समीक्षा जरूरी होगी.

महाराष्ट्र की 10 प्रतिशत पानी कटौती को केवल संकट की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि जल शासन की परीक्षा के रूप में देखना चाहिए.

यदि इससे रिसाव रोकने, पानी के पुनर्चक्रण और पारदर्शी वितरण को बढ़ावा मिलता है, तो यह उपयोगी कदम साबित हो सकता है. लेकिन यदि नागरिकों को कम पानी मिलता रहे और बर्बादी के स्रोत बने रहें, तो समस्या अगले मौसम में फिर सामने आएगी.

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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

इंद्रायणी नदी में मछलियों की मौत: क्या नदी पुनर्जीवन के वादे जमीन पर उतर रहे हैं?

- महाराष्ट्र के आलंदी में इंद्रायणी नदी के गोपालपुरा क्षेत्र के पास 14 अक्टूबर को बड़ी संख्या में मरी हुई मछलियां मिलने की खबर सामने आई.

- स्थानीय कार्यकर्ताओं ने नदी की सतह पर तैलीय परत दिखाई देने की बात कही और संभावित रासायनिक प्रदूषण पर चिंता जताई.

- आसपास की औद्योगिक इकाइयों को लेकर आशंका व्यक्त की गई है, लेकिन किसी खास इकाई को जिम्मेदार ठहराने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी है.

- नदी के पुनर्जीवन और सीवेज ट्रीटमेंट की योजनाओं के बीच सवाल है कि प्रदूषण की निगरानी और रोकथाम कितनी प्रभावी है.

- जल के नमूनों की जांच, जिम्मेदार एजेंसियों की प्रतिक्रिया और परियोजनाओं की वास्तविक प्रगति इस मामले में निर्णायक होगी.

आलंदी के पास इंद्रायणी नदी में प्रदूषण और मछलियों की मौत की घटना


आलंदी में फिर बड़ी संख्या में मरी हुई मछलियां मिलने से नदी के प्रदूषण पर सवाल उठे हैं। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की योजनाओं और प्रशासन के दावों के बीच अब निगरानी, जांच और जवाबदेही पर ध्यान देने की जरूरत है.

महाराष्ट्र के पुणे क्षेत्र में बहने वाली इंद्रायणी नदी एक बार फिर प्रदूषण को लेकर चर्चा में है, 14 अक्टूबर 2026 को आलंदी के गोपालपुरा इलाके के पास बड़ी संख्या में मरी हुई मछलियां मिलने की खबर सामने आई.

अगले दिन, 15 अक्टूबर को द टाइम्स ऑफ इंडिया की पुणे रिपोर्ट ने इस घटना को लेकर स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चिंता सामने रखी. नदी की सतह पर तैलीय परत दिखाई देने की बात भी कही गई। इससे नदी में संभावित प्रदूषण और जलीय जीवन पर उसके प्रभाव को लेकर सवाल उठे हैं.

इंद्रायणी केवल एक नदी नहीं है. आलंदी में संत ज्ञानेश्वर महाराज और देहू में संत तुकाराम महाराज से जुड़ी धार्मिक परंपराओं के कारण इसका विशेष सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व है. 

यहां आने वाले श्रद्धालुओं, स्थानीय निवासियों और नदी पर निर्भर जीव-जंतुओं के लिए इसकी स्वच्छता बेहद जरूरी है. ऐसे में बार-बार मछलियों की मौत की खबरें सामने आना पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक व्यवस्था, दोनों के लिए चिंता का विषय है.

नदी में मछलियों की मौत की वजह क्या है?

ताजा घटना के बाद स्थानीय कार्यकर्ता निसार सैयद ने नदी की सतह पर मोटी, तैलीय परत दिखाई देने की बात कही. उन्होंने आसपास की औद्योगिक इकाइयों से संभावित रासायनिक अपशिष्ट नदी में छोड़े जाने की आशंका भी जताई. उनके अनुसार, नदी के कुछ हिस्सों में ऐसी घटनाएं पहले भी सामने आई हैं.

हालांकि, किसी औद्योगिक इकाई को मछलियों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराने से पहले पानी और मृत मछलियों के नमूनों की वैज्ञानिक जांच जरूरी है. 

तैलीय परत प्रदूषण का संकेत हो सकती है, लेकिन केवल उसे देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पानी में कौन-सा रसायन मौजूद है या मछलियों की मौत का निश्चित कारण क्या है.

मछलियों की सामूहिक मौत के पीछे पानी में घुलित ऑक्सीजन की कमी, अनुपचारित सीवेज, रासायनिक अपशिष्ट या अन्य पर्यावरणीय कारण हो सकते हैं. इन संभावनाओं के बीच अंतर करने के लिए जल-गुणवत्ता के आंकड़े, प्रयोगशाला परीक्षण और संबंधित अधिकारियों की जांच निर्णायक होगी.

यह पहली घटना नहीं है

इंद्रायणी में प्रदूषण की समस्या नई नहीं है. सितंबर 2026 में भी आलंदी के पास नदी में मरी हुई मछलियां मिलने की खबर आई थी. 

उस समय पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अनुपचारित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और नदी की खराब होती जल-गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई थी. 

द टाइम्स ऑफ इंडिया की 15 सितंबर की रिपोर्ट में 2022 से 2024 के बीच नदी के विभिन्न हिस्सों में किए गए एक शोध का भी उल्लेख था, जिसमें ऊपरी हिस्सों की तुलना में निचले हिस्सों में जल-गुणवत्ता अधिक खराब पाई गई थी.

यह पुराना संदर्भ बताता है कि मौजूदा घटना को केवल एक दिन की समस्या मानकर नहीं देखा जा सकता. हालांकि, सितंबर की घटना और अक्टूबर की घटना के कारण एक जैसे हैं या नहीं, यह ताजा जांच के बिना तय नहीं किया जा सकता.

नदी के प्रदूषण की पड़ताल में यह समझना भी जरूरी है कि घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि से बहकर आने वाले प्रदूषक अलग-अलग स्रोत हैं. हर स्रोत के लिए निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था भी अलग हो सकती है.

नदी पुनर्जीवन परियोजना: योजना से जमीन तक का सफर

प्रदूषण पर चिंता के बीच सबसे अहम सवाल नदी को साफ करने के लिए उठाए गए कदमों का है. 

रिपोर्ट के अनुसार, पिंपरी-चिंचवड़ महानगरपालिका (PCMC) ने इस वर्ष इंद्रायणी नदी के पुनर्जीवन से जुड़ी परियोजना के लिए कार्यादेश जारी किए थे. इस परियोजना में कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित करने की योजना शामिल है.

लेकिन 15 अक्टूबर की रिपोर्ट में एक वरिष्ठ महानगरपालिका अधिकारी के हवाले से बताया गया कि फिलहाल सर्वेक्षण का काम चल रहा है और उसके पूरा होने के बाद निर्माण शुरू होगा. 

रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना के उद्घाटन में भी देरी हुई है और मौके पर काम शुरू नहीं हो पाया था.

यह स्थिति एक बुनियादी प्रश्न खड़ा करती है: यदि नदी में प्रदूषण लगातार चिंता का विषय बना हुआ है, तो उपचार और रोकथाम की योजनाओं को लागू करने में लगने वाला समय कैसे कम किया जा सकता है?

सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाना जरूरी है, लेकिन केवल निर्माण से समस्या हल नहीं होती. 

संयंत्रों की क्षमता, उनके नियमित संचालन, सीवर नेटवर्क की उपलब्धता और उपचारित पानी की गुणवत्ता की निगरानी भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है. यदि गंदा पानी किसी अन्य रास्ते से नदी में पहुंचता रहता है, तो नई परियोजना का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा.

प्रशासन की जवाबदेही और वैज्ञानिक जांच जरूरी

रिपोर्ट के अनुसार, महानगरपालिका के अधिकारी ने यह भी बताया कि संबंधित नागरिक निकाय की टीमें आसपास की औद्योगिक इकाइयों का निरीक्षण कर रही हैं और नियमों का उल्लंघन मिलने पर कार्रवाई की जा रही है. यह कदम महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता का आकलन जांच के परिणामों और सार्वजनिक किए गए आंकड़ों से होना चाहिए.

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) और स्थानीय निकायों को ताजा घटना के बाद पानी के नमूने लेने, घुलित ऑक्सीजन और अन्य प्रदूषण संकेतकों की जांच करने तथा निष्कर्ष सार्वजनिक करने चाहिए. 

यदि किसी इकाई या सीवेज निकासी बिंदु से नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो कार्रवाई का विवरण भी सामने आना चाहिए.

साथ ही, नदी के अलग-अलग हिस्सों में नियमित जल-गुणवत्ता निगरानी की जरूरत है. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि प्रदूषण कहां से आ रहा है, किस मौसम में बढ़ता है और उपचार के उपाय कितने प्रभावी हैं.

नदी बचाने के लिए घोषणाओं से आगे बढ़ना होगा

इंद्रायणी में मछलियों की मौत की ताजा घटना नदी की सेहत पर गंभीर सवाल उठाती है. लेकिन इसका समाधान किसी एक संभावित कारण को दोषी ठहराने या केवल नई परियोजना की घोषणा करने से नहीं निकलेगा. 

वैज्ञानिक जांच, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान, सीवेज उपचार व्यवस्था का समयबद्ध क्रियान्वयन और नियमित सार्वजनिक निगरानी—इन सभी पर एक साथ काम करना होगा.

इंद्रायणी की स्वच्छता धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय जरूर है, लेकिन इसका महत्त्व उससे कहीं व्यापक है. यह जलीय जीवन, स्थानीय पर्यावरण और सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न भी है. 

नदी पुनर्जीवन की सफलता का वास्तविक पैमाना बजट या कार्यादेश नहीं, बल्कि साफ होता पानी, सुरक्षित जलीय जीवन और प्रदूषण की घटनाओं में कमी होना चाहिए.

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FAQ

1. इंद्रायणी नदी में मछलियों की मौत की घटना कब और कहां सामने आई?

द टाइम्स ऑफ इंडिया की 15 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 14 अक्टूबर को महाराष्ट्र के आलंदी में गोपालपुरा क्षेत्र के पास बड़ी संख्या में मरी हुई मछलियां मिलीं.

2. इंद्रायणी नदी में मछलियों की मौत का कारण क्या है?

अभी ताजा घटना का निश्चित कारण स्थापित नहीं है. स्थानीय कार्यकर्ताओं ने संभावित रासायनिक प्रदूषण की आशंका जताई है. वास्तविक कारण जानने के लिए पानी और मृत मछलियों के नमूनों की वैज्ञानिक जांच जरूरी है.

3. क्या इंद्रायणी नदी में प्रदूषण की समस्या पहले भी सामने आई है?

हां. सितंबर 2026 और इससे पहले भी नदी में मरी हुई मछलियां मिलने तथा जल-गुणवत्ता खराब होने की खबरें प्रकाशित हुई थीं. हालांकि, हर घटना का कारण अलग हो सकता है.

4. इंद्रायणी नदी को साफ करने के लिए क्या योजना बनाई गई है?

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पिंपरी-चिंचवड़ महानगरपालिका ने नदी पुनर्जीवन परियोजना के लिए कार्यादेश जारी किए हैं. इसमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने की योजना शामिल है. 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित अधिकारी ने बताया था कि सर्वेक्षण जारी है और उसके बाद काम शुरू होगा.

5. इंद्रायणी नदी में प्रदूषण की जांच कौन कर सकता है?

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, संबंधित स्थानीय निकाय और अन्य सक्षम पर्यावरणीय संस्थाएं पानी के नमूनों की जांच, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई कर सकती हैं।

6. नदी में मछलियों की मौत रोकने के लिए क्या जरूरी है?

अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट पर नियंत्रण, प्रभावी सीवेज ट्रीटमेंट, नियमित जल-गुणवत्ता परीक्षण और प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ नियमों के अनुसार कार्रवाई जरूरी है.

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बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

भारत-कनाडा रिश्तों की नई शुरुआत: क्या व्यापार सुरक्षा विवादों से आगे निकल पाएगा?

भारत और कनाडा अपने रिश्तों को व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग के जरिए नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन क्या आर्थिक हित दोनों देशों के बीच सुरक्षा और कूटनीतिक विवादों की दूरी कम कर पाएंगे? विदेश मंत्री एस. जयशंकर और कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद की मुलाकात के बहाने समझिए भारत-कनाडा संबंधों की चुनौतियां, संभावनाएं और भारत की बहुआयामी विदेश नीति।

भारत और कनाडा के रिश्तों में एक बार फिर संवाद की खिड़की खुलती दिखाई दे रही है. 14 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद की मुलाकात में व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा, शिक्षा और लोगों के बीच संपर्क जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई.

जयशंकर ने इसे दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की कोशिश बताया.

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि दोनों देशों के विदेश मंत्री कितनी बार मिलते हैं या साझा बयान में कितने क्षेत्रों का उल्लेख होता है.

सवाल यह है कि क्या भारत और कनाडा अपने रिश्तों को सुरक्षा विवादों के साये से निकालकर ऐसी साझेदारी में बदल सकते हैं, जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों को वास्तविक लाभ मिले?

इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि कूटनीतिक सद्भावना कितनी जल्दी ठोस नीतियों और परिणामों में बदलती है.

तनाव से सहयोग तक: रिश्तों की पृष्ठभूमि

भारत और कनाडा के संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं. दोनों देशों के बीच लंबे समय से शैक्षणिक, सांस्कृतिक और कारोबारी संपर्क रहे हैं.

कनाडा में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी और भारतीय छात्रों की उपस्थिति इस रिश्ते को सामाजिक आधार देती है. इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा और राजनीतिक विवादों ने आपसी विश्वास को प्रभावित किया.

सितंबर 2023 में कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों की संभावित भूमिका से जुड़े आरोप लगाए थे. भारत ने इन आरोपों को खारिज किया था.

इस विवाद ने राजनयिक संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया और दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ा.

ऐसे माहौल में बातचीत की बहाली महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसे रिश्तों के सामान्य हो जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता. सुरक्षा से जुड़े आरोपों, जांच और संप्रभुता के सवालों पर दोनों देशों की चिंताएं अलग-अलग हैं. आर्थिक सहयोग बढ़ाना इन मतभेदों को अपने आप समाप्त नहीं करेगा.

फिर भी कूटनीति का उद्देश्य केवल मतभेदों को दोहराना नहीं, बल्कि उन्हें संभालने के रास्ते तलाशना भी है. यही भारत-कनाडा संबंधों की मौजूदा चुनौती है.

व्यापार समझौता: रिश्तों को स्थिरता देने का रास्ता

भारत-कनाडा संबंधों को नई दिशा देने में व्यापार सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. कनाडा के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2025 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 10.9 अरब कनाडाई डॉलर रहा.

सेवाओं के क्षेत्र में भी कनाडा का भारत के साथ बड़ा आर्थिक संबंध है, जिसमें शिक्षा के लिए यात्रा और अन्य सेवाओं की उल्लेखनीय भूमिका है.

दोनों देश व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी CEPA (Comprehensive Economic Partnership Agreement) पर बातचीत आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

मार्च 2026 में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा के दौरान वार्ता का औपचारिक ढांचा तय किया गया था. दोनों पक्षों ने वर्ष 2026 के अंत तक बातचीत पूरी करने का लक्ष्य रखा है.

ऐसा समझौता केवल आयात-निर्यात बढ़ाने का माध्यम नहीं होगा. इससे भारतीय कंपनियों को कनाडा के बाजार में बेहतर अवसर मिल सकते हैं, जबकि कनाडाई कंपनियों को भारत की विशाल अर्थव्यवस्था में निवेश का रास्ता मिल सकता है.

लेकिन समझौते की सफलता केवल उसके घोषित लक्ष्य से नहीं मापी जाएगी. बाजार तक पहुंच, शुल्क, सेवाओं के कारोबार, निवेश की सुरक्षा और नियामकीय बाधाओं पर सहमति जरूरी होगी. यदि सुरक्षा विवादों के कारण कारोबारी समुदाय को भविष्य की नीतियों को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, तो व्यापार समझौते की संभावनाएं भी सीमित हो सकती हैं.

ऊर्जा और महत्त्वपूर्ण खनिज: साझा हितों का मजबूत आधार

ऊर्जा सहयोग दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दे सकता है. भारत को अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा के विविध स्रोतों की आवश्यकता है.

दूसरी ओर, कनाडा के पास ऊर्जा संसाधन, यूरेनियम और महत्त्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं हैं.

मार्च 2026 में कनाडा की कंपनी Cameco और भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग के बीच 2.6 अरब कनाडाई डॉलर का दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति समझौता घोषित किया गया था. दोनों देशों ने महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला में सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए.

इस सहयोग का रणनीतिक महत्त्व है. स्वच्छ ऊर्जा, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और आधुनिक विनिर्माण के लिए जरूरी खनिजों की विश्वसनीय आपूर्ति अब आर्थिक विकास के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का भी विषय बन चुकी है.

भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता और कनाडा के लिए बड़ा बाजार—दोनों के हित यहां एक-दूसरे से जुड़ते हैं.

हालांकि, समझौतों की घोषणा और उनका वास्तविक क्रियान्वयन अलग-अलग चीजें हैं. आपूर्ति की समयसीमा, कीमत, निवेश, परिवहन और पर्यावरणीय मानकों पर काम करना होगा. ऊर्जा सहयोग तभी रिश्तों का मजबूत स्तंभ बनेगा, जब उसके परिणाम मापे जा सकें.

रक्षा और सुरक्षा: विश्वास के बिना साझेदारी अधूरी

रक्षा सहयोग का उल्लेख दोनों देशों की बातचीत में हुआ है, लेकिन इस क्षेत्र में प्रगति के लिए विशेष सावधानी जरूरी होगी. सुरक्षा संबंधी विवाद ही वह क्षेत्र है जिसने आपसी भरोसे को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है.

भारत की प्राथमिकता अपनी संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर स्पष्टता की है. कनाडा की ओर से कानून के शासन, जांच की स्वतंत्रता और नागरिकों की सुरक्षा पर जोर दिया जाता है.

दोनों देशों के लिए जरूरी है कि वे इन विषयों पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय प्रमाण, कानूनी प्रक्रियाओं और नियमित संवाद के आधार पर आगे बढ़ें.

इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक सहयोग के लिए सुरक्षा संबंधी चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया जाए. बल्कि स्थायी साझेदारी के लिए दोनों मोर्चों पर काम करना होगा—एक तरफ व्यापार और निवेश को बढ़ाना, दूसरी तरफ विवादों के समाधान के लिए विश्वसनीय संवाद-तंत्र तैयार करना.

शिक्षा और लोगों के संपर्क की भूमिका

भारत-कनाडा रिश्तों का सबसे मजबूत सामाजिक आधार लोगों के बीच संपर्क है. भारतीय छात्र, पेशेवर, उद्यमी और भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक दोनों समाजों को जोड़ते हैं. इसलिए शिक्षा, शोध, कौशल विकास और पेशेवर आवागमन में सहयोग महत्त्वपूर्ण है.

लेकिन इस क्षेत्र में भी केवल पुराने संबंधों के भरोसे नहीं रहा जा सकता. छात्रों के लिए पारदर्शी नियम, वीजा प्रक्रिया में स्पष्टता, संस्थानों के बीच शोध सहयोग और पेशेवर अवसरों की उपलब्धता जरूरी है. नीतियों में अचानक बदलाव से विद्यार्थियों और परिवारों में अनिश्चितता पैदा होती है.

लोगों के बीच संपर्क सरकारों के बीच तनाव को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता, लेकिन वह रिश्तों को व्यापक सामाजिक आधार जरूर देता है.

जब विश्वविद्यालय, कंपनियां और नागरिक नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ काम करते हैं, तो राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सहयोग के लिए प्रोत्साहन बना रहता है.


भारत की बहुआयामी विदेश नीति की परीक्षा

भारत-कनाडा संबंधों में सुधार की कोशिश भारत की व्यापक विदेश नीति के अनुरूप है. भारत पश्चिमी देशों के साथ व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और निवेश बढ़ाना चाहता है, लेकिन साथ ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता भी बनाए रखना चाहता है.

इसका मतलब है कि भारत अलग-अलग देशों के साथ सहयोग को किसी एक रिश्ते की शर्तों तक सीमित नहीं रखना चाहता.

कनाडा के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का प्रयास इसी संतुलन की परीक्षा है. भारत को आर्थिक अवसरों का लाभ उठाना है, लेकिन अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं से समझौता किए बिना.

कनाडा को भी भारत के साथ आर्थिक साझेदारी आगे बढ़ाते हुए द्विपक्षीय मतभेदों के समाधान के लिए व्यावहारिक रास्ते तलाशने होंगे.

निष्कर्ष: मुलाकात नहीं, परिणाम होंगे असली पैमाना

14 अक्टूबर की मुलाकात को भारत-कनाडा संबंधों में संवाद जारी रहने के संकेत के रूप में देखा जा सकता है. लेकिन इसे किसी बड़े विवाद के समाप्त होने या रिश्तों के पूरी तरह सामान्य हो जाने की घोषणा मानना जल्दबाजी होगी.

आने वाले महीनों में तीन कसौटियां निर्णायक होंगी—क्या CEPA वार्ता ठोस प्रगति करती है, क्या ऊर्जा और निवेश से जुड़े समझौते जमीन पर उतरते हैं, और क्या सुरक्षा संबंधी मतभेदों को संभालने के लिए दोनों देशों के बीच भरोसेमंद संवाद कायम होता है?

भारत और कनाडा के रिश्ते तभी नई शुरुआत करेंगे, जब कूटनीतिक मुलाकातें ठोस आर्थिक अवसरों में बदलें और सुरक्षा विवाद सहयोग की राह में स्थायी बाधा न बनें.

व्यापार रिश्तों को आगे बढ़ाने का रास्ता खोल सकता है, लेकिन उस रास्ते पर टिके रहने के लिए विश्वास, पारदर्शिता और निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति अनिवार्य होगी.


FAQ
प्रश्न 1: भारत और कनाडा के रिश्तों में तनाव का मुख्य कारण क्या रहा है?
खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से जुड़े आरोपों और सुरक्षा संबंधी विवादों ने दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित किया। भारत ने कनाडा के आरोपों को खारिज किया था।

प्रश्न 2: भारत-कनाडा व्यापार समझौता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
प्रस्तावित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता व्यापार, निवेश और सेवाओं के क्षेत्र में अवसर बढ़ा सकता है। इसकी सफलता वार्ता के नतीजों और समझौते के वास्तविक क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।

प्रश्न 3: भारत और कनाडा के बीच ऊर्जा सहयोग की क्या संभावनाएं हैं?
यूरेनियम, ऊर्जा संसाधनों और महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति में सहयोग दोनों देशों की आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है।

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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

पाकिस्तान का सिक्योरिटी स्टेट- आतंकवाद, राजनीतिक टकराव और भारत की सीमा के सामने नई चुनौतियाँ

इस लेख में जानिए
  • पाकिस्तान में सुरक्षा और राजनीति का टकराव: आतंकवाद से निपटने की चुनौती और PTI तथा संघीय सरकार के बीच विवाद का क्या संबंध है?
  • अफगानिस्तान और TTP का संकट: पाकिस्तान और तालिबान सरकार के बीच तनाव का क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या असर पड़ सकता है?
  • सेना, सरकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही: आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और प्रांतीय स्वायत्तता के बीच संतुलन क्यों जरूरी है?
भारत की सीमा सुरक्षा के लिए मायने: पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता, अफगानिस्तान से जुड़े उग्रवादी नेटवर्क और नियंत्रण रेखा की संवेदनशीलता पर भारत को किन पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए?

पाकिस्तान आज एक ऐसे संकट के सामने खड़ा है, जिसमें आतंकवाद से मुकाबला, प्रांतीय स्वायत्तता, नागरिक सरकार की वैधता और सेना की भूमिका एक-दूसरे से उलझते दिखाई देते हैं. अफगानिस्तान के साथ बढ़ता तनाव, खैबर पख्तूनख्वा में राजनीतिक टकराव और नियंत्रण रेखा के निकट विस्फोटों की खबरें इस संकट के अलग-अलग पहलू हैं.

इन्हें एक ही साजिश या सीधे जुड़े घटनाक्रम के रूप में देखना जल्दबाजी होगी. लेकिन इनसे एक बड़ा सवाल जरूर उठता है: क्या पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था राजनीतिक स्थिरता पैदा कर पा रही है, या सुरक्षा का प्रश्न ही उसके भीतर सत्ता-संघर्ष का नया केंद्र बनता जा रहा है?

12 अक्टूबर 2026 को सामने आई खबरों के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई.

इस घटनाक्रम को लेकर संघीय सत्ता और PTI के बीच मतभेद सामने आए. इसे केवल कानून-व्यवस्था की कार्रवाई या केवल राजनीतिक प्रतिशोध मान लेने से पहले घटनाओं, सरकारी आदेशों और संवैधानिक प्रक्रियाओं की स्वतंत्र जांच आवश्यक है.

इसी समय अफगानिस्तान की तालिबान सरकार और इस्लामाबाद के बीच तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को लेकर तनाव जारी है.

पाकिस्तान का आरोप है कि अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल उसके खिलाफ हमले करने वाले उग्रवादी समूह करते हैं. काबुल इन आरोपों और अपनी जिम्मेदारी को लेकर अलग रुख रखता है.

दूसरी ओर, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 12 अक्टूबर को हुए IED विस्फोट में चार नागरिकों की मौत की खबर भी सामने आई. इन घटनाओं को भारतीय सीमा पर बारूदी सुरंगों की अलग-अलग खबरों से जोड़ने का कोई पुष्ट आधार फिलहाल नहीं है.

इन घटनाओं का महत्व केवल उनकी तात्कालिक गंभीरता में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक ढांचे में है जिसके भीतर पाकिस्तान इन चुनौतियों का सामना कर रहा है.

सुरक्षा संकट और संघीय ढांचे की परीक्षा

खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का सीमावर्ती प्रांत है, जहां अफगानिस्तान से लगी सीमा, उग्रवादी गतिविधियां और स्थानीय राजनीतिक असंतोष लंबे समय से एक-दूसरे को प्रभावित करते रहे हैं.

यहां TTP की गतिविधियां पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती हैं. लेकिन इस चुनौती का सामना करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका सैन्य पक्ष.

11 अक्टूबर को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लागू करने की घोषणा की और PTI की प्रांतीय सरकार को निलंबित कर दिया. संघीय सरकार ने इसे आतंकवाद से निपटने में प्रांतीय सरकार की विफलता से जोड़ा, जबकि PTI ने इसे अपने राजनीतिक अधिकारों पर हमला बताया है.

यहां संवैधानिक प्रश्न उठता है कि क्या सुरक्षा संबंधी विफलता निर्वाचित प्रांतीय सरकार को हटाने के लिए पर्याप्त आधार हो सकती है?

पाकिस्तान के संविधान में आपातकाल और प्रांतीय शासन से जुड़े प्रावधान हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जा सकता है, यह कानूनी प्रक्रिया, उपलब्ध साक्ष्यों और संवैधानिक सीमाओं से तय होना चाहिए.

आतंकवाद से मुकाबले के लिए संघीय और प्रांतीय सरकारों के बीच समन्वय जरूरी है. लेकिन यदि सुरक्षा विफलताओं की जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित होती दिखाई दे, तो संस्थाओं पर भरोसा कमजोर हो सकता है.

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में स्थानीय आबादी का सहयोग निर्णायक होता है. उस सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रशासनिक क्षमता के साथ राजनीतिक वैधता भी आवश्यक है.

अफगानिस्तान: सैन्य दबाव या कूटनीतिक समाधान?

इस संकट का दूसरा पहलू अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के संबंध हैं. 12 अक्टूबर को पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने तालिबान सरकार से अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करने वाले उग्रवादी समूहों को रोकने की मांग दोहराई.

दोनों देशों के बीच सीमा पर झड़पों और पाकिस्तानी हवाई हमलों के कारण तनाव बढ़ा है.

इस्लामाबाद के सामने समस्या यह है कि अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता से उसके संबंध पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो चुके हैं.

पाकिस्तान चाहता है कि काबुल TTP के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करे. लेकिन केवल आरोपों और सैन्य दबाव के सहारे सीमा पार उग्रवाद का स्थायी समाधान निकालना कठिन होगा.

जरूरत ऐसे तंत्र की है, जिसमें खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, सीमा प्रबंधन, संदिग्ध ठिकानों के बारे में सत्यापन और हिंसा रोकने के लिए नियमित संवाद शामिल हों.

इसके साथ यह भी आवश्यक है कि सीमा पार सैन्य कार्रवाई में नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, सितंबर 2026 तक अफगानिस्तान में सीमा पार हिंसा से 1,100 से अधिक नागरिकों के मारे जाने या घायल होने के मामले दर्ज किए गए थे.

पाकिस्तान को यह समझना होगा कि पड़ोसी देश पर दबाव डालना और वहां मौजूद उग्रवादी नेटवर्क को प्रभावी ढंग से समाप्त करना दो अलग-अलग लक्ष्य हैं. पहला कदम दूसरे की गारंटी नहीं है.


सेना, सरकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही

पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका लंबे समय से बहस का विषय रही है. मौजूदा घटनाक्रम में भी सुरक्षा का प्रश्न संघीय सरकार, PTI और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच जारी टकराव से अलग नहीं है.

हालांकि यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि हर सुरक्षा निर्णय सेना के निर्देश पर ही लिया गया है. महत्वपूर्ण यह देखना है कि फैसले किस संवैधानिक प्रक्रिया से लिए जा रहे हैं और उनकी जवाबदेही किसके प्रति है.

यदि आतंकवाद से निपटने के नाम पर राजनीतिक असहमति के लिए जगह संकुचित होती है, तो सुरक्षा और लोकतंत्र के बीच तनाव बढ़ सकता है. दूसरी ओर, निर्वाचित सरकारों को भी कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं माना जा सकता.

लोकतांत्रिक जवाबदेही का अर्थ है कि सरकारों के प्रदर्शन की समीक्षा हो, लेकिन वह समीक्षा पारदर्शी और संवैधानिक तरीके से की जाए.

भारत के लिए क्या मायने हैं?

भारत के लिए पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता का महत्व मुख्यतः सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता के संदर्भ में है.

12 अक्टूबर को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हजीरा क्षेत्र में बारूदी उपकरण के विस्फोट से चार नागरिकों की मौत हुई. इसी दौरान पुंछ के मेंढर क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा बलों को पुरानी बारूदी सुरंगें मिलीं. उपलब्ध रिपोर्टों में इन घटनाओं के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि नहीं हुई है.

भारत को इसलिए घटनाओं के सत्यापित तथ्यों और संभावित सुरक्षा जोखिमों के आधार पर अपनी तैयारी बनाए रखनी होगी.

पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक संकट अपने आप में सीमा पार हमले की आशंका का प्रमाण नहीं है. लेकिन अफगानिस्तान से जुड़े उग्रवादी नेटवर्क, पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा और नियंत्रण रेखा की संवेदनशीलता को अलग-अलग निगरानी में रखना आवश्यक है.

पाकिस्तान की चुनौती केवल आतंकवादियों को रोकने की नहीं है. उसे यह भी तय करना है कि सुरक्षा के नाम पर सत्ता का इस्तेमाल किस सीमा तक हो सकता है, प्रांतों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी और अफगानिस्तान के साथ तनाव को स्थायी टकराव बनने से कैसे रोका जाएगा.

किसी भी देश की सुरक्षा केवल सेना और हथियारों से नहीं बनती. वह मजबूत संस्थाओं, जवाबदेह सरकार, प्रभावी कानून-व्यवस्था और पड़ोसियों के साथ व्यावहारिक संबंधों पर भी निर्भर करती है.

पाकिस्तान के लिए आज असली परीक्षा यही है कि वह सुरक्षा संकट का समाधान अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किए बिना निकाल पाता है या नहीं.

एआइ जनरेटेड कैरिकेचर

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: पाकिस्तान में आतंकवाद देश की राजनीति और सुरक्षा को कैसे प्रभावित करता है?

उत्तर: पाकिस्तान में TTP जैसे उग्रवादी संगठनों की गतिविधियाँ आंतरिक सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और अफगानिस्तान के साथ संबंधों को प्रभावित करती हैं। आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बलों की कार्रवाई के साथ संघीय और प्रांतीय सरकारों के बीच समन्वय, प्रभावी प्रशासन और स्थानीय आबादी का सहयोग भी आवश्यक है।

प्रश्न 2: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव की प्रमुख वजह क्या है?

उत्तर: दोनों देशों के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण पाकिस्तान में होने वाले हमलों में अफगान क्षेत्र के कथित इस्तेमाल को लेकर मतभेद है। पाकिस्तान TTP के खिलाफ कार्रवाई की मांग करता है, जबकि तालिबान सरकार अपनी जिम्मेदारी और इन आरोपों को लेकर अलग रुख रखती है। सीमा प्रबंधन, उग्रवादी नेटवर्क और नागरिकों की सुरक्षा इस विवाद के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं।

प्रश्न 3: पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता का भारत की सीमा सुरक्षा पर क्या असर पड़ सकता है?

उत्तर: पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति भारत के लिए सीमा प्रबंधन, उग्रवादी नेटवर्क और नियंत्रण रेखा की निगरानी के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है। हालांकि, पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता अपने आप में भारत पर संभावित हमले का प्रमाण नहीं है। भारत के सुरक्षा आकलन को सत्यापित खुफिया सूचनाओं, सीमा पर वास्तविक घटनाओं और विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

त्योहार की थाली पर धर्म का पहरा: क्या सिलीगुड़ी में खरीदारी भी सांप्रदायिक पहचान से तय होगी?

त्योहार की थाली पर धर्म का पहरा: क्या सिलीगुड़ी में आस्था और आजीविका के बीच खिंच रही है नई लकीर?

दुर्गापूजा बंगाल में केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कला, शिल्प, खान-पान, रोजगार और सामुदायिक जीवन का एक बड़ा उत्सव है. महीनों पहले से कुम्हार मूर्तियां बनाने लगते हैं, कलाकार पंडाल सजाने में जुट जाते हैं, कारीगर प्रतिमा के आभूषण तैयार करते हैं और छोटे दुकानदार त्योहार के कारोबार की उम्मीद में अपनी पूंजी लगाते हैं.

लेकिन इसी उत्सवी मौसम में सिलीगुड़ी से आई एक खबर ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है: क्या अब त्योहार की खरीदारी में भी दुकानदार का धर्म, उसके सामान की गुणवत्ता और कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण होने जा रहा है?

11 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित खबरों के अनुसार, सिलीगुड़ी में हिंदू जागरण मंच ने ऐसे पोस्टर लगाए, जिनमें लोगों से हिंदू दुकानों से बिरयानी और पूजा-सामग्री खरीदने की अपील की गई.

संगठन ने इसे आदेश नहीं, बल्कि हिंदू कारोबारियों को आर्थिक समर्थन देने की अपील बताया. दूसरी ओर, स्थानीय आलोचकों और वामपंथी नेताओं ने इस अभियान पर आपत्ति जताई और धार्मिक पहचान के आधार पर बाजार को बांटने की आशंका व्यक्त की.

यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके केंद्र में केवल एक पोस्टर या बिरयानी की दुकान नहीं है. सवाल उस आर्थिक व्यवहार का है, जिसमें ग्राहक और दुकानदार के बीच भरोसे, कीमत, गुणवत्ता और सेवा के रिश्ते की जगह धार्मिक पहचान लेने लगे.

‘अपील’ और सामाजिक दबाव के बीच की दूरी

किसी भी नागरिक को अपनी पसंद के दुकानदार से सामान खरीदने का अधिकार है. कोई व्यक्ति किसी खास कारोबार, स्थानीय उत्पाद या छोटे उद्यमी का समर्थन करना चाहे, तो इसमें अपने आप में कोई समस्या नहीं है. धार्मिक समुदायों के भीतर आर्थिक सहयोग की पहल भी लोकतांत्रिक समाज में चर्चा का वैध विषय हो सकती है.

लेकिन जब अपील यह कहने लगे कि सामान किस धर्म के व्यक्ति से खरीदना चाहिए, तब उसका सामाजिक अर्थ बदल जाता है. ऐसी अपील ग्राहक को केवल एक विकल्प नहीं देती; वह खरीदारी को धार्मिक निष्ठा की कसौटी भी बना सकती है.

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा. किसी दुकान को चुनना ग्राहक का निजी निर्णय है, लेकिन सार्वजनिक अभियान के जरिए दुकानदारों की धार्मिक पहचान के आधार पर खरीदारी को प्रोत्साहित करना एक व्यापक सामाजिक संदेश देता है.

यदि ऐसा संदेश बार-बार दोहराया जाए, तो दूसरे समुदाय के कारोबारी को ग्राहक खोने का डर हो सकता है. ग्राहक भी यह सोच सकता है कि किसी खास दुकान से सामान खरीदना उसके समुदाय के प्रति निष्ठा का प्रश्न बना दिया जाएगा.

फिलहाल सिलीगुड़ी में इस अभियान के कारण कितने कारोबारियों को वास्तविक आर्थिक नुकसान हुआ है, इसका प्रमाण उपलब्ध खबरों में नहीं दिया गया है. इसलिए नुकसान को घटित तथ्य की तरह पेश करना उचित नहीं होगा. लेकिन आर्थिक बहिष्कार की आशंका और बाजार में पैदा होने वाला सामाजिक दबाव अपने आप में गंभीर सवाल हैं.

त्योहारों की अर्थव्यवस्था किसी एक समुदाय की नहीं

दुर्गापूजा की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए पंडाल के सामने लगी रोशनी से आगे देखना होगा. इसमें मूर्तिकार, बांस और कपड़े के कारोबारी, बिजली मिस्त्री, बढ़ई, चित्रकार, फूल विक्रेता, दर्जी, खाद्य विक्रेता, परिवहनकर्मी और असंख्य छोटे उद्यमी शामिल होते हैं. इनमें अलग-अलग धर्मों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग काम करते हैं.

रिपोर्टों में इस बात का भी उल्लेख है कि दुर्गापूजा की सजावट और शोलापिथ के आभूषणों से जुड़े कारीगरों में मुस्लिम कारीगर भी शामिल हैं.

यह साझेदारी कोई असाधारण सामाजिक प्रयोग नहीं है. भारतीय त्योहारों की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक रूप से श्रम के इस परस्पर निर्भर रिश्ते पर टिकी रही है. पूजा किसी की आस्था हो सकती है, लेकिन उसके आयोजन में लगने वाला श्रम अनेक लोगों की आजीविका का साधन बनता है.

इसलिए सवाल यह नहीं है कि हिंदू व्यापारी को कारोबार क्यों मिले. सवाल यह है कि क्या उसे समर्थन देने का एकमात्र रास्ता मुस्लिम व्यापारी से दूरी बनाना है? क्या स्थानीय कारोबार को मजबूत करने के लिए धार्मिक पहचान को सामने लाना जरूरी है? क्या छोटे दुकानदारों की मदद के लिए बेहतर बाजार, उचित ऋण, प्रशिक्षण, डिजिटल भुगतान और ग्राहकों तक पहुंच जैसे विकल्प नहीं हैं?

यदि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना उद्देश्य है, तो वह प्रयास कारोबारियों की धार्मिक पहचान के बजाय उनकी जरूरतों और आर्थिक स्थिति पर आधारित होना चाहिए.

बिरयानी से बड़ा सवाल

इस विवाद में बिरयानी का उल्लेख प्रतीकात्मक महत्व रखता है. भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं होता; वह स्मृति, स्वाद, संस्कृति और सामाजिक मेलजोल का हिस्सा भी है.

बंगाल की खाद्य संस्कृति में अलग-अलग परंपराओं और समुदायों का योगदान रहा है. किसी व्यंजन को किसी एक धर्म की स्थायी संपत्ति मान लेना इस सांस्कृतिक इतिहास को संकुचित करना होगा.

बिरयानी बनाने वाला व्यक्ति हिंदू है या मुस्लिम, यह जानना ग्राहक का अधिकार हो सकता है, लेकिन इसे खरीदारी की अनिवार्य कसौटी बना देना एक अलग बात है.

इसी तरह पूजा-सामग्री की दुकान चलाने वाले की धार्मिक पहचान से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होना चाहिए कि वह गुणवत्तापूर्ण सामान उचित कीमत पर उपलब्ध करा रहा है या नहीं.

बाजार का एक बुनियादी सिद्धांत है कि ग्राहक अपने विवेक से निर्णय ले. जब इस निर्णय पर सामुदायिक दबाव हावी होने लगता है, तब बाजार केवल वस्तुओं के लेन-देन की जगह नहीं रहता; वह पहचान की राजनीति का मैदान बन सकता है.

संविधान और नागरिकता का प्रश्न

भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों की रक्षा करता है. अनुच्छेद 15 राज्य को धर्म सहित कुछ आधारों पर भेदभाव करने से रोकता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को पेशा अपनाने, व्यापार करने और व्यवसाय चलाने का अधिकार देता है. इन प्रावधानों का कानूनी दायरा और निजी व्यक्तियों पर उनका लागू होना अलग-अलग प्रश्न हैं; इसलिए हर धार्मिक अपील को स्वतः असंवैधानिक घोषित करना सही नहीं होगा.

फिर भी संवैधानिक मूल्यों का सामाजिक महत्व अदालतों की व्याख्या तक सीमित नहीं है. समान नागरिकता का अर्थ है कि किसी व्यक्ति की आजीविका और सामाजिक प्रतिष्ठा केवल उसकी धार्मिक पहचान के कारण संदेह के घेरे में न आए.

लोकतंत्र में किसी संगठन को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता है. उसी तरह नागरिकों को उस विचार की आलोचना करने का भी अधिकार है. इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते समय भी संयम जरूरी है. पूरे हिंदू समाज को इस अभियान से जोड़ना उतना ही अनुचित होगा, जितना किसी समुदाय के सभी कारोबारियों को एक ही नजर से देखना.

क्या त्योहारों की अर्थव्यवस्था अगला कम्युनल प्लैशपॉइन्ट बनेगी?

सिलीगुड़ी के पोस्टर अपने आप में यह साबित नहीं करते कि बंगाल की त्योहार अर्थव्यवस्था धार्मिक आधार पर बंट चुकी है. लेकिन वे एक ऐसी प्रवृत्ति की ओर ध्यान खींचते हैं, जिसमें खाना खरीदना, दुकान चुनना, कारोबार करना जैसी रोजमर्रा की गतिविधियां सामुदायिक पहचान के चश्मे से देखी जाने लगती हैं.

इसका असर केवल अल्पसंख्यक दुकानदारों तक सीमित नहीं रह सकता. यदि ग्राहक की पसंद पर पहचान का दबाव बढ़ता है, तो कारोबारियों के बीच प्रतिस्पर्धा भी गुणवत्ता और कीमत से हटकर धार्मिक पहचान पर टिक सकती है.

अंततः नुकसान उन छोटे व्यवसायों का होगा, जिनके पास बड़े बाजारों और ग्राहकों तक पहुंच बनाने के सीमित साधन हैं.

प्रशासन की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है. उसे किसी वैध अपील पर केवल उसके राजनीतिक संदेश के कारण कार्रवाई करने के बजाय यह देखना चाहिए कि कहीं धमकी, जबरदस्ती, सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा या किसी के कारोबार को रोकने की कोशिश तो नहीं हो रही. साथ ही, राजनीतिक और सामाजिक संगठनों को भी समझना होगा कि उनके संदेशों का असर पोस्टर लगाने तक सीमित नहीं रहता.

दुर्गापूजा की असली शक्ति उसकी भव्यता में ही नहीं, बल्कि उस सामूहिक श्रम में भी है जो उसे संभव बनाता है.

पंडाल की सजावट करने वाले हाथों, प्रतिमा गढ़ने वाले कलाकारों और बाजार में सामान बेचने वाले छोटे कारोबारियों की आजीविका को धार्मिक खांचों में बांटना त्योहार के सामाजिक आधार को कमजोर कर सकता है.

सवाल यह नहीं कि किस धर्म की दुकान से खरीदारी हो. सवाल यह है कि क्या हम ऐसा बाजार चाहते हैं, जहां ग्राहक का फैसला उसकी पसंद से हो या उसकी धार्मिक पहचान से?

दुर्गापूजा की रोशनी तभी व्यापक अर्थ में उत्सव बनेगी, जब उसके उजाले में काम करने वाले हर कारीगर और कारोबारी को अपनी मेहनत के लिए सम्मान और अवसर मिले. त्योहार लोगों को जोड़ने का अवसर है—उसे आर्थिक बहिष्कार की परीक्षा में बदल देना किसी के भी हित में नहीं है.

क्या ऐसा करके हम एक और पाकिस्तान के विचार को सींच नहीं रहे हैं?

जगदंब अहिं अवलंब हमर 🙏 | माँ दुर्गा की भावुक स्तुति | मैथिली और हिंदी भक्ति गीत #Shorts





 जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर,

हे माए अहाँ बिनु आस केकर।
हे माए अहाँ बिनु आस केकर,
हे माए अहाँ बिनु आस केकर।
जँ माए अहाँ दुःख नै सुनबय,
तऽ जाय कहु ककरा कहबय।
करू माफ़ जननी अपराध हमर,
हे माए अहाँ बिनु आस केकर। 

जय माता दी! जय जगदंबे! 

“जगदंब अहिं अवलंब हमर” माँ दुर्गा के चरणों में समर्पित एक भावपूर्ण स्तुति है। इसमें माँ जगदंबा को अपना सहारा मानते हुए उनके प्रति श्रद्धा, विश्वास और समर्पण का भाव व्यक्त किया गया है।

मैथिली और हिंदी में गाई गई यह भक्तिमय प्रस्तुति माँ दुर्गा के भक्तों के लिए प्रेम, आस्था और आध्यात्मिक शांति का अनुभव है।

माँ जगदंबा सब पर अपनी कृपा बनाए रखें।

अगर यह स्तुति आपके हृदय को छू जाए, तो वीडियो को Like करें, अपने परिवार और मित्रों के साथ Share करें.

जय माँ दुर्गा! जय जगदंबे!

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शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

सोशल मीडिया पर विचार मुफ्त, लेकिन पहुँच महँगी! क्या एल्गोरिद्म तय करेगा कि हम क्या पढ़ें और क्या सोचें?

  • इस लेख में जानिए
  • विचार मुफ्त, पहुँच महँगी: X, Facebook और Instagram पर पेड सदस्यता तथा प्रीमियम सुविधाएँ आम यूजर की दृश्यता को कैसे प्रभावित कर सकती हैं? 
  • एल्गोरिद्म का अदृश्य संपादक: सोशल मीडिया पर कौन-सी पोस्ट दिखाई देगी और कौन-सी पीछे रह जाएगी, यह कैसे तय होता है?
  • लेख बनाम रील्स: क्या वीडियो और मौलिक सामग्री को प्राथमिकता देने वाली नीतियाँ गंभीर लेखन की पहुँच को प्रभावित करती हैं?

डिजिटल लोकतंत्र और जवाबदेही: क्या सोशल मीडिया कंपनियों को अपने एल्गोरिद्म, पेड रीच और सामग्री वितरण के नियम अधिक पारदर्शी बनाने चाहिए?

सोशल मीडिया पर विचार मुफ्त, लेकिन उनकी पहुँच महँगी! क्या एल्गोरिद्म तय करेगा कि हम क्या पढ़ें और क्या सोचें?

आपको याद होगा, आज से 15-16 साल पहले जब फेसबुक पर साइन इन किया था, तो उसमें लिखा थाः इट्स फ्री ऐंड विल बी फ्री. पर अब वो बात कहां!

एक समय था जब ट्विटर, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आम आदमी को अपनी बात कहने का लगभग मुफ्त मंच देते थे. आज सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धीरे-धीरे भुगतान करने की क्षमता पर निर्भर होती जा रही है?

एक दौर था जब ट्विटर पर कोई पत्रकार, लेखक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता या आम नागरिक अपने विचार लिखता था. फेसबुक पर कोई लंबा लेख साझा करता था, कोई कविता लिखता था, कोई राजनीतिक टिप्पणी करता था.

उस पोस्ट को कितने लोग पढ़ेंगे, यह काफी हद तक उसके नेटवर्क, पाठकों की दिलचस्पी और उस समय की प्लेटफॉर्म व्यवस्था पर निर्भर करता था. बेशक, तब भी एल्गोरिद्म और व्यावसायिक हित मौजूद थे, लेकिन आज की तरह प्रीमियम सदस्यता और पेड सुविधाओं का इतना स्पष्ट बाजार सामने नहीं था.

अब तस्वीर बदल चुकी है. ट्विटर, जो अब X है, से लेकर फेसबुक और इंस्टाग्राम तक, सोशल मीडिया कंपनियों ने सदस्यता, वेरिफिकेशन बैज और प्रीमियम सुविधाओं के जरिए कमाई के नए रास्ते बना लिए हैं.

सवाल इन सुविधाओं के अस्तित्व से नहीं, बल्कि उस असमानता से है जो इनके कारण सूचना और विचारों की पहुँच में पैदा हो सकती है.




ब्लू टिक: पहचान का प्रतीक या डिजिटल विशेषाधिकार?

एलन मस्क के स्वामित्व वाले X पर ब्लू टिक का अर्थ बदल चुका है. पहले यह मुख्य रूप से किसी अकाउंट की प्रामाणिकता, सार्वजनिक पहचान और उल्लेखनीयता की पुष्टि से जुड़ा था.

अब ब्लू टिक मुख्यतः प्रीमियम सदस्यता से जुड़ा है. प्रीमियम सदस्यता में जवाबों को प्राथमिकता देने जैसी सुविधाएँ भी शामिल हैं. यानी भुगतान करने वाले यूजर को कुछ ऐसे उपकरण मिलते हैं जो उसकी प्लेटफॉर्म पर उपस्थिति को प्रभावित कर सकते हैं.

लेकिन यहाँ एक जरूरी सवाल उठता है. अगर किसी लेखक के पास पैसे देकर प्रीमियम सदस्यता लेने का विकल्प नहीं है, तो क्या उसके विचारों को समान अवसर मिल रहा है? क्या उसकी पोस्ट केवल इसलिए पीछे रह सकती है कि दूसरे यूजर के पास जवाबों में प्राथमिकता पाने जैसी सुविधा है?

इसका अर्थ है कि जब मार्केटिंग और रीच की सुविधाएँ सिर्फ भुगतान करने वाले यूजर्स के लिए उपलब्ध हों, तो डिजिटल समानता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

फेसबुक और इंस्टाग्राम पर भी Meta Verified जैसी सशुल्क सेवाएँ उपलब्ध हैं. इनमें वेरिफिकेशन, अकाउंट सुरक्षा और सहायता जैसी सुविधाएँ शामिल हैं.

Meta ने भारत में सेवा शुरू करते समय स्पष्ट किया था कि वहाँ सदस्यता के साथ अतिरिक्त रीच देने की सुविधा शामिल नहीं होगी. लेकिन क्या यह सच है?

लेख पीछे, वीडियो आगे: क्या पढ़ने की संस्कृति बदल रही है?

सोशल मीडिया पर एक और बदलाव दिखाई देता है. तस्वीरें, छोटे वीडियो और रील्स अक्सर लंबी लिखित पोस्ट की तुलना में अधिक लोगों तक पहुँचती दिखाई देती हैं. खासकर उन प्लेटफॉर्मों पर जहाँ वीडियो देखना, स्क्रॉल करना और तुरंत प्रतिक्रिया देना यूजर के अनुभव का प्रमुख हिस्सा है.

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि लिखित विचार अब अप्रासंगिक हो गए हैं? बिल्कुल नहीं. राजनीति, इतिहास, समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति जैसे विषयों पर गंभीर आलेखों की अपनी अहमियत है.

समस्या तब पैदा होती है जब किसी प्लेटफॉर्म की वितरण-व्यवस्था पाठक का ध्यान आकर्षित करने वाले प्रारूपों को अधिक अवसर देती है और गहरे विश्लेषण की पहुँच सीमित हो जाती है.

Meta ने मार्च 2026 में फेसबुक पर मौलिक सामग्री और Reels को प्राथमिकता देने की अपनी नीति के बारे में जानकारी दी थी.

कंपनी के अनुसार, ओरिजनल वीडियो को अधिक रीच देने और दोहराई गई या कम मौलिक सामग्री की पहुँच घटाने पर काम किया जा रहा है. यह इस बात का उदाहरण है कि प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिद्म के जरिए तय करते हैं कि किस प्रकार की सामग्री को अधिक अवसर मिलेगा. लेकिन यह बात भी पूरी तरह सही नहीं है.

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वीडियो लोकप्रिय क्यों हैं. सवाल यह भी है कि क्या लिखित विचारों, गंभीर बहस और लंबे विश्लेषण को भी उतनी ही पारदर्शी और न्यायसंगत वितरण-व्यवस्था मिलती है?

एल्गोरिद्म का अदृश्य संपादक कौन है?

सोशल मीडिया पर संपादक की भूमिका का एक हिस्सा एल्गोरिद्म निभाता है. वही तय करने में मदद करता है कि यूजर के सामने कौन-सी पोस्ट आएगी, किसे सुझाया जाएगा और किस सामग्री को कम दृश्यता मिलेगी.

X ने अपने अनुशंसा तंत्र का कुछ कोड सार्वजनिक भी किया है, लेकिन पूरे प्लेटफॉर्म पर हर पोस्ट को मिलने वाली वास्तविक पहुँच को केवल एक नियम से नहीं समझा जा सकता.

यहीं एक बड़ी लोकतांत्रिक चुनौती पैदा होती है. यदि किसी पोस्ट को कम लोग देखते हैं, तो क्या वह इसलिए पीछे रह गई कि उसमें लोगों की दिलचस्पी नहीं थी? क्या उसकी प्रस्तुति कमजोर थी? क्या वह किसी नीति के तहत सीमित की गई? या उसके सामने ऐसी सामग्री थी जिसे एल्गोरिद्म ने अधिक प्रासंगिक मान लिया?

इन सवालों के जवाब हमेशा यूजर को नहीं मिलते.

पेड बूस्ट से पैदा होता फिल्टर बबल

पेड बूस्ट इस तस्वीर का दूसरा पहलू है. विज्ञापन के जरिए कोई व्यक्ति, कंपनी, राजनीतिक दल या संगठन अपनी सामग्री को अधिक लोगों तक पहुँचा सकता है.

बेशक, यह वैध व्यावसायिक सुविधा है, लेकिन इससे यह अंतर पैदा होता है कि किसके पास अपनी बात फैलाने के लिए अतिरिक्त बजट है और किसके पास केवल अपने शब्द.

इसका अर्थ यह है कि डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र में दृश्यता के कई रास्ते हैं, पर एल्गोरिद्मिक चयन पर और कुछ सीधे भुगतान से मिलने वाली रीच एक तरह से सोशल मीडिया के कथित लोकतांत्रिक स्वरूप को बाधा पहुंचाती है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल पोस्ट लिख देने का अधिकार नहीं है. सार्वजनिक बहस में उस पोस्ट के दिखाई देने और सुने जाने की संभावना भी मायने रखती है. जब दृश्यता के नियम अस्पष्ट हों, तो प्लेटफॉर्म की जवाबदेही का सवाल उठना चाहिए.

एलन मस्क और भारत-विरोधी सामग्री का सवाल

इस बहस का एक राजनीतिक पहलू भी है. एलन मस्क सिर्फ X के मालिक नहीं हैं; वे वैश्विक कारोबारी हितों और राजनीतिक शक्ति के बीच सक्रिय रहने वाले उद्योगपति भी हैं. भारत के साथ उनके कारोबारी संबंधों में टेस्ला, स्टारलिंक और भारतीय बाजार से जुड़े कई सवाल शामिल रहे हैं.

भारत के कुछ बड़े कारोबारी समूहों के साथ मस्क के तनाव और भारतीय बाजार में स्टारलिंक की संभावनाओं को लेकर विवाद सबकी निगाहों में हैं. इससे भारत में उनके कारोबारी हितों और सार्वजनिक बयानों पर चर्चा फिर तेज हुई. इस विवाद में राहुल ने मस्क का पक्ष लिया है, इससे कई कोण, संभावनाओं और आशंकाओं को बल मिलता है.

ऐसे माहौल में एक प्रश्न उठाना अनुचित नहीं है: अगर किसी प्लेटफॉर्म का मालिक किसी देश की सरकार, उसके नियामकों या कारोबारी व्यवस्था से असहमत हो, तो क्या उसके निजी हित उस प्लेटफॉर्म की नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं?

क्या आपकी वॉल पर दनादन सीजेपी प्रोटेस्ट के वीडियो, रील और पोस्ट आ रहे हैं? क्या यह सोची-समझी चाल या रणनीति नहीं हो सकती है?

क्या एलन मस्क प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से खफा हैं और इसी कारण X पर भारत-विरोधी सामग्री को बढ़ावा दे रहे हैं?

यह भी जरूरी है कि भारत सरकार की आलोचना, किसी सरकारी नीति का विरोध, भारत की सामाजिक समस्याओं पर रिपोर्टिंग और देश के प्रति शत्रुतापूर्ण दुष्प्रचार को एक ही श्रेणी में न रखा जाए.

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना वैध अभिव्यक्ति है. किसी देश के बारे में झूठी या भ्रामक सूचना फैलाना एक अलग मामला है.

फिर भी, एक बुनियादी सवाल अपनी जगह कायम है: जब एक निजी कंपनी करोड़ों लोगों के सूचना-संसार को प्रभावित कर सकती है, तो उसके मालिक की व्यक्तिगत पसंद, कारोबारी हित और राजनीतिक संबंध कितने पारदर्शी हैं? और अगर एल्गोरिद्म में पक्षपात का संदेह पैदा हो, तो उसकी स्वतंत्र जाँच कैसे होगी?
डिजिटल लोकतंत्र को पारदर्शिता चाहिए

सोशल मीडिया ने आम नागरिक को आवाज दी है. किसी छोटे शहर का पत्रकार, किसी गाँव का शिक्षक, कोई स्वतंत्र लेखक या सामाजिक कार्यकर्ता बिना बड़े मीडिया संस्थान के भी अपनी बात लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है. इस उपलब्धि को कम करके नहीं आँका जा सकता.

लेकिन इसी उपलब्धि के साथ एक नया जोखिम भी आया है. मंच मुफ्त हो सकता है, पर ध्यान सीमित है. पोस्ट लिखना मुफ्त हो सकता है, पर उसे अधिक लोगों तक पहुँचाने के साधन समान नहीं हैं. और एल्गोरिद्म की व्यवस्था इतनी जटिल हो सकती है कि यूजर को यह समझ ही न आए कि उसकी सामग्री क्यों दिखाई गई या क्यों नहीं दिखाई गई.

इसलिए सोशल मीडिया कंपनियों से कुछ बुनियादी सवाल पूछे जाने चाहिए. क्या वे अपने अनुशंसा तंत्र के प्रमुख नियमों को स्पष्ट करती हैं? क्या यूजर समझ सकता है कि उसकी पोस्ट की पहुँच किन कारणों से प्रभावित हुई?

क्या शोधकर्ताओं को गोपनीयता सुरक्षित रखते हुए स्वतंत्र अध्ययन के लिए पर्याप्त डेटा मिलता है? क्या भुगतान करने वाले और मुफ्त यूजर के बीच दृश्यता के अंतर को साफ-साफ बताया जाता है?

ये सवाल किसी एक कंपनी, एक नेता या एक विचारधारा तक सीमित नहीं हैं. ये डिजिटल सार्वजनिक जीवन की गुणवत्ता से जुड़े सवाल हैं.

लोकतंत्र में हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार होना चाहिए. लेकिन अगर कुछ कंपनियाँ ही यह तय करने लगें कि कौन-सी आवाज कितनी दूर तक सुनाई देगी, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग भी उतनी ही जरूरी हो जाती है.

क्योंकि विचारों की दुनिया में सबसे बड़ा विशेषाधिकार केवल बोल पाना नहीं, बल्कि सुना जाना है. और जब सुनाई देने की संभावना बाजार, एल्गोरिद्म तथा निजी शक्ति के मेल से तय होने लगे, तब सवाल पूछना किसी एक प्लेटफॉर्म के खिलाफ अभियान नहीं—लोकतांत्रिक समाज की जरूरत है.

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: क्या सोशल मीडिया पर पैसे देने से पोस्ट की पहुँच बढ़ती है?
उत्तर: यह प्लेटफॉर्म और सदस्यता की सुविधाओं पर निर्भर करता है। X Premium में जवाबों को प्राथमिकता देने जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। वहीं, विज्ञापन के माध्यम से पोस्ट को अधिक लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। लेकिन किसी भी सशुल्क सुविधा से हर पोस्ट की पहुँच बढ़ने की गारंटी नहीं मिलती।

प्रश्न 2: सोशल मीडिया एल्गोरिद्म क्या होता है?
उत्तर:
सोशल मीडिया एल्गोरिद्म उन प्रणालियों का समूह है जो यह तय करने में मदद करता है कि यूजर को उसकी फीड, सर्च और सुझावों में कौन-सी सामग्री दिखाई जाए। इसमें यूजर की गतिविधि, सामग्री की प्रासंगिकता और प्लेटफॉर्म के अन्य संकेतक भूमिका निभा सकते हैं।

प्रश्न 3: क्या Facebook और Instagram पर Meta Verified लेने से अधिक रीच मिलती है?
उत्तर: Meta Verified में सत्यापित बैज, अकाउंट सुरक्षा और सहायता जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। भारत में व्यक्तिगत यूजर्स के लिए Meta Verified शुरू करते समय Meta ने अतिरिक्त रीच को सदस्यता का हिस्सा नहीं रखा था। कुछ व्यावसायिक योजनाओं में खोजे जाने और ग्राहकों से जुड़ने के लिए अतिरिक्त सुविधाएँ हो सकती हैं। इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि हर Meta Verified सदस्य को स्वतः अधिक रीच मिलती है।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

सिंधु जल समझौता: पाकिस्तान के आरोप और भारत के खिलाफ नैरेटिव की राजनीति

इस लेख में जानिए

  • पानी को हथियार बनाने का आरोप: पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की जल नीति को किस तरह पेश कर रहा है?
  • यूरोप से इस्लामाबाद तक नैरेटिव की लड़ाई: सीमा-पार जल संसाधनों पर आयोजित सम्मेलनों और पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयासों में क्या संदेश दिया जा रहा है?
  • सिंधु जल समझौते में पानी का बँटवारा: पूर्वी और पश्चिमी नदियों के पानी के उपयोग के अधिकार भारत और पाकिस्तान को कैसे दिए गए?
  • धमकियाँ बनाम जलविज्ञान: चिनाब नदी के प्रवाह, रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं और भारत पर लगाए जा रहे आरोपों को समझना क्यों जरूरी है?
सिंधु जल समझौते पर नेतागण देश के अंदर चाहे जितने ताल ठोंक लें, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी बातें नहीं चलतीं. दूसरी बात, सिंधु का पानी रोक देंगे जैसे दक्षिणपंथी दावों से भी पाकिस्तान का पक्ष मजबूत होता है.

आजादी के बाद से ही पाकिस्तान फॉल्स नैरेटिव गढ़ने का उस्ताद रहा है. उसका आरोप है कि भारत पानी को हथियार बना रहा है.

असल में, ब्रसेल्स में “ट्रांसबाउंड्री वॉटर रिसोर्सेजः अ वीपनाइज्ड ग्लोबल कॉमन” नाम से आयोजित एक महत्वपूर्ण नीति सम्मेलन में सीमा-पार जल संसाधनों को ‘हथियार बनाए जा सकने वाला वैश्विक साझा संसाधन’ बताया गया. अब ध्यान दीजिए कि इस सम्मेलन का आयोजन किसने किया था! सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी स्टडीज (सीईपीएस) और और यूरोपीय संघ में पाकिस्तान के मिशन ने मिलकर.

अब यूरोपीय देश पानी की कमी से मर रहे किसानों और खासकर प्यास से तड़पते बच्चों की तस्वीरें देखकर पिघलने का नाटक करने में भी आला दर्जे के हैं. पर बात यहीं नहीं रुकी है.

इसी साल 30 जून को इस्लामाबाद के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार “द इंडस वॉटर ट्रीटीः एन इंस्ट्रूमेट ऑफ पीस ऐंड रीजनल स्टैबिलिटी” में पाकिस्तान ने सिंधु नदी की तुलना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक समुद्री चोकपॉइन्टस् से करने की कोशिश की.

पाकिस्तान का तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसे वैश्विक नियम बनाने चाहिए, जो ऊपरी धारा वाले देशों (अपर राइपेरियन कंट्रीज) को पानी का इस्तेमाल भूराजनीतिक दबाव के साधन के रूप में करने से रोकें.

लेकिन जिस तरह का भ्रामक नैरेटिव सेट किया जा रहा है उससे क्षेत्रीय सहयोग को नुक्सान ही होगा.

लेकिन, आस्तीनें चढ़ाकर शेखी बघारने में भी पाकिस्तानियों का मुकाबल बुड़बक से बुड़बक हिंदुस्तानी दक्षिणपंथी ट्रोल नहीं कर सकता.

एक पाकिस्तानी कैबिनेट मंत्री ने तो पश्चिमी नदियों (सिंधु जल समझौते वाली) पर पानी मोड़ने वाली संरचनाएं बनाने वाले किसी भी व्यक्ति के ‘हाथ काट देने’ की धमकी दी.

इसी तरह, जनरल असीम मुनीर ने अमेरिका के टैम्पा में पाकिस्तानी प्रवासियों को संबोधित करते हुए भारत के खिलाफ सीधे सैन्य और परमाणु हमले की धमकियां दीं.

इन धमकियों में उन्होंने चेतावनी दी कि सिंधु नदी बेसिन पर भारत द्वारा भविष्य में बनाए जाने वाले किसी भी बांध को नष्ट करने के लिए पाकिस्तान मिसाइल हमले कर सकता है.

इतना तो जाहिर है कि हिंदी मुहावरा कोश में ऐसी ही बकर को गीदड़भभकी कहा गया है.

आपको पता ही होगा फिर भी सोचा याद दिला दूं कि सिंधु जल संधि के तहत भारत को पूर्वी नदियों के पानी पर विशेष अधिकार मिला, जिसकी अनुमानित मात्रा 40.7 अरब घन मीटर (बीसीएम), यानी 33 मिलियन एकड़-फीट (एमएएफ) है.

वहीं पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के लगभग पूरे पानी के उपयोग का अधिकार दिया गया, जिसकी अनुमानित मात्रा 168 से 170 बीसीएम (135 से 140 एमएएफ) है.

गौर करने वाली बात यह है कि सिंधु नदी तंत्र के कुल पानी का केवल लगभग 19.6 प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है, जबकि इस हिस्से से संबंधित जलग्रहण क्षेत्र भारत में पाकिस्तान की तुलना में लगभग दोगुना है. इसके विपरीत, पाकिस्तान को लगभग 81 प्रतिशत पानी मिलता है, जबकि संबंधित जलग्रहण क्षेत्र का केवल लगभग आधा हिस्सा ही उसके क्षेत्र में आता है.

1941 की जनगणना के अनुसार, सिंधु नदी तंत्र के पानी पर निर्भर आबादी में पाकिस्तान की हिस्सेदारी करीब 2.5 करोड़ यानी 54 प्रतिशत थी, जबकि भारत में करीब 2.1 करोड़ यानी 46 प्रतिशत लोग इस जल प्रणाली पर निर्भर थे. भारतीय हिस्से की 46 प्रतिशत आबादी को सिंधु तंत्र के केवल 19.6 प्रतिशत पानी पर निर्भर रहना पड़ा, जबकि पाकिस्तान के पंजाब की 54 प्रतिशत आबादी को लगभग 80 प्रतिशत पानी मिला.

सिंधु नहर प्रणाली से सिंचित कुल 2.6 करोड़ एकड़ भूमि में से करीब 2.1 करोड़ एकड़ पाकिस्तान में और केवल 50 लाख एकड़ भारत में सिंचित होती थी.

विभाजन के बाद बने नए राजनीतिक माहौल ने न केवल भारत की खाद्य आपूर्ति व्यवस्था को बाधित किया, बल्कि सिंधु नदी तंत्र की सदियों पुरानी जल-भौगोलिक एकता को भी तोड़ दिया. इससे भारत के सिंधु बेसिन के उन कई मिलियन एकड़ क्षेत्रों के विकास पर गंभीर खतरा पैदा हुआ, जो अत्यंत शुष्क होने के बावजूद उपजाऊ थे.

इसके बावजूद, पाकिस्तान लंबे समय से ऐसी दलीलें देता रहा है, जिन्हें भ्रामक नैरेटिव ही कहा जाना चाहिए, बल्कि मैं तो कहता हूं कि यह पाकिस्तान के 1952 के उसके रुख से मिलता-जुलता ही कहूंगा. वही संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी मंत्री की हायतौबा. (पिछले पोस्ट को देखें)

बहरहाल, पाकिस्तान छाती पीटता है भारत, पाकिस्तान में सूखा पैदा करने के लिए नदी के प्रवाह को नियंत्रित करता है और मानसून के दौरान बाढ़ पैदा करने के लिए भी पानी के बहाव से छेड़छाड़ करता है. हमारे दक्षिणपंथी भारतीय सोशल मीडिया रणबांकुरे भी ऐसा दावा करके पाकिस्तान की बात को एक तरह से सपोर्ट ही करते हैं.

पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस नैरेटिव को जोर-शोर से उठाया है. विशेष रूप से चिनाब नदी के प्रवाह में होने वाले उतार-चढ़ाव को लेकर भारत पर ऊपरी धारा के देश के रूप में पानी को नियंत्रित करने के आरोप लगाए जाते हैं.

जाहिर है कि ऐसे आरोप सिंधु नदी की वास्तविक जलवैज्ञानिक परिस्थितियों और रन ऑफ द रिवर जलविद्युत परियोजनाओं के स्थापित संचालन तंत्र की अनदेखी करते हैं और फर्जी हैं.

आगे कभी मौका लगा तो सिंधु जल समझौते में अमेरिका और यूरोपीय दवाब की भी चर्चा करेंगे जिसकी वजह से यह अन्यायपूर्ण समझौता भारत को करना पड़ा था.

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सिंधु जल समझौते के तहत भारत और पाकिस्तान को कितना पानी मिलता है?

उत्तर: सिंधु जल समझौते, 1960 के तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों के जल के उपयोग का अधिकार मुख्यतः भारत को दिया गया, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग मुख्यतः पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। इन नदियों के पानी की मात्रा मौसम और प्रवाह के अनुसार बदलती है, इसलिए दोनों देशों के हिस्से को केवल एक निश्चित प्रतिशत के रूप में समझना उचित नहीं है।

प्रश्न 2: पाकिस्तान भारत पर सिंधु नदी का पानी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप क्यों लगाता है?

उत्तर: पाकिस्तान का तर्क है कि ऊपरी धारा में स्थित भारत अपनी जलविद्युत परियोजनाओं और बाँधों के जरिए नदी के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। भारत की परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद रहा है। हालाँकि, किसी परियोजना के वास्तविक प्रभाव का आकलन उसके तकनीकी डिजाइन, संचालन नियमों, संधि की शर्तों और जलवैज्ञानिक आँकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3: क्या भारत सिंधु नदी तंत्र की पश्चिमी नदियों का पानी पूरी तरह रोक सकता है?

उत्तर: नहीं, ऐसा सामान्यीकृत दावा करना सही नहीं होगा। सिंधु जल समझौते के तहत भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ निर्दिष्ट उपयोगों की अनुमति है, जिनमें घरेलू और गैर-उपभोगी उपयोग, निर्धारित कृषि उपयोग तथा संधि की शर्तों के अनुरूप जलविद्युत उत्पादन शामिल हैं। रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएँ बिजली उत्पादन के लिए नदी के प्रवाह का उपयोग करती हैं, लेकिन उनका प्रभाव परियोजना की संरचना और संचालन पर निर्भर करता है। इसलिए पानी रोकने या प्रवाह नियंत्रित करने से जुड़े दावों की जाँच तकनीकी प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।

सिंधु जल समझौता: 1948 में पाकिस्तान ने कैसे गढ़ा भारत के खिलाफ झूठा नैरेटिव?

  • इस लेख में जानिए

    • 1948 के नहर जल विवाद की पृष्ठभूमि
    • भारत और पाकिस्तान के बीच जल बँटवारे का विवाद
    • संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के दावों की पड़ताल
विभाजन के बाद, अविभाजित पंजाब की 143 नहरों में से केवल 12 नहरें पूर्वी पंजाब (भारत) को आवंटित की गईं, जबकि 131 नहरें पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) को मिलीं.

सबसे अधिक लाभदायक और तकनीकी रूप से व्यवहार्य योजनाएँ पश्चिमी पंजाब में स्थित थीं, जिससे पूर्वी पंजाब, विशेष रूप से नदियों से दूर स्थित क्षेत्रों में, विकास से काफी वंचित रह गया.

भारत के हिस्से में आया सिंधु घाटी का मैदानी इलाका पाकिस्तान के मैदानों की तुलना में काफी कम विकसित थे.
अधिकांश बड़ी नहरें पूरी तरह से पाकिस्तान में स्थित थीं और कुछ पूरी तरह से भारत में। ऊपरी बारी दोआब नहर (यूबीडीसी) एकमात्र प्रमुख नहर प्रणाली थी जिसका उद्गम माधोपुर हेडवर्क्स में था, लेकिन अब विभाजन के बाद इस पर से कई स्थानों पर सीमा गुजर रही थी.

कई यूबीडीसी चैनलों के निचले हिस्से जो पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) की ओर जाते थे, उन्हें मध्य बारी नहर के नाम से जाना जाता था।

मध्य बारी दोआब नहर (सीबीडीसी) को पूर्वी पंजाब (भारत) में स्थित उन नहरों के ऊपरी हिस्सों से पानी प्राप्त करना पड़ता था। दीपालपुर नहर, जो विशेष रूप से पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) की जल आपूर्ति करती थी, का जल स्रोत फिरोजपुर में स्थित था।

विभाजन के बाद, पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) के आग्रह पर, पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब के दो मुख्य अभियंताओं ने 20 दिसंबर, 1947 को यूबीडीसी और फिरोजपुर हेडवर्क्स की यथास्थिति को 31 मार्च, 1948 तक बनाए रखने के लिए एक समझौता किया.

जानबूझकर या अनजाने में, पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) ने 31 मार्च, 1948 तक सेंट्रल बारी दोआब नहर और दीपालपु नहर को पानी की आपूर्ति के संबंध में पूर्वी पंजाब के साथ किसी भी समझौते पर बातचीत करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया.

किसी भी समझौते के अभाव में, पूर्वी पंजाब ने 1 अप्रैल, 1948 को पश्चिम पंजाब में सीबीडीसी के लाभ के लिए अपनी सुविधाओं का उपयोग बंद कर दिया.

सेंट्रल बारी दोआब नहर और दीपालपुर नहरों से पाकिस्तान के कुल सिंचित क्षेत्र के केवल छह प्रतिशत हिस्से की सिंचाई होती थी.

तत्कालीन पाकिस्तान के सेक्रेट्री जनरल और बाद में प्रधानमंत्री बने चौधरी मोहम्मद अली ने कहा था: "...पश्चिमी पंजाब के कुछ हिस्सों में कर्तव्य की उपेक्षा, आत्मसंतुष्टि और सामान्य विवेक की कमी थी - जिसके पाकिस्तान के लिए विनाशकारी परिणाम हुए."

Water has practically dried near #Akhnoor after significant reduction in water levels due to India's suspension of the Indus Waters Treaty. People have no memory of crossing the river on foot.

पाकिस्तान ने यह झूठा नैरेटिव गढ़ा कि भारत ने 1 तारीख को अपने प्रतिनिधि के समक्ष सभी छह नदियों का पानी बंद कर दिया था.

16 दिसंबर, 1952 को सुरक्षा परिषद की बहस में पाकिस्तान के प्रतिनिधि एम. ज़फरुल्ला खान ने कहा: "...1 अप्रैल, 1948 को... भारत ने उन नदियों का पानी रोक दिया जो पाकिस्तान में बहती थीं."

विडंबना यह है कि बैठक के रिकॉर्ड से पता चलता है कि सुरक्षा परिषद के किसी भी स्थायी या अस्थायी सदस्य ने इस बयान की सत्यता पर कोई संदेह नहीं जताया।

1952 में पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद में पूरी तरह से झूठा विवरण प्रस्तुत किया.

यह स्पष्ट है कि 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, भारत ने 31 मार्च, 1948 तक के नौ महीनों के दौरान इन छह नदियों में से किसी पर भी ऐसी कोई संरचना नहीं बनाई थी जो इन सभी छह नदियों के जल को नियंत्रित कर सके.

1952 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि सुरक्षा परिषद को गुमराह करने में सफल रहे. एम. ज़फरुल्ला खान ने जल प्रवाह को रोकने की व्यवस्था और इन छह शक्तिशाली नदियों के जल को छह सप्ताह तक नियंत्रित करने या संग्रहित करने की भारत की क्षमता का उल्लेख नहीं किया, और न ही उनसे सुरक्षा परिषद में इस बारे में कोई प्रश्न पूछा गया.
इस झूठे विवरण के माध्यम से, 1952 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि सुरक्षा परिषद और विश्व को गुमराह करने में सफल रहे.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सिंधु जल समझौता कब हुआ था?

उत्तर: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते पर 19 सितंबर, 1960 को कराची में हस्ताक्षर किए गए थे। विश्व बैंक ने इस समझौते की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस समझौते से पहले, 1948 में दोनों देशों के बीच पंजाब की नहरों के पानी को लेकर विवाद हुआ था।

प्रश्न 2: 1 अप्रैल, 1948 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद क्यों हुआ था?

उत्तर: पंजाब के विभाजन के बाद कुछ नहर प्रणालियों के जलस्रोत भारत में थे, जबकि उनसे सिंचित होने वाले क्षेत्र पाकिस्तान में स्थित थे। 31 मार्च, 1948 को अंतरिम व्यवस्था समाप्त होने के बाद पूर्वी पंजाब ने सेंट्रल बारी दोआब और दीपालपुर नहरों के लिए अपनी जलापूर्ति बंद कर दी। इस विवाद के समाधान के लिए दोनों देशों के बीच 4 मई, 1948 को अंतर-डोमिनियन समझौता हुआ।

प्रश्न 3: क्या भारत ने 1 अप्रैल, 1948 को सिंधु नदी प्रणाली की सभी छह नदियों का पानी रोक दिया था?

उत्तर: यह दावा 1948 के नहर जल विवाद से संबंधित घटनाओं का व्यापक वर्णन नहीं करता। उस समय विवाद विशेष रूप से सेंट्रल बारी दोआब और दीपालपुर नहरों की जलापूर्ति को लेकर था। पाकिस्तान के प्रतिनिधि एम. ज़फरुल्ला खान ने 16 दिसंबर, 1952 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत पर नदियों का पानी रोकने का आरोप लगाया था। इस दावे की ऐतिहासिक पड़ताल करते समय 1948 के समझौतों, राजनयिक पत्राचार और सुरक्षा परिषद के मूल अभिलेखों को साथ पढ़ना आवश्यक है।

रविवार, 9 अगस्त 2026

कहानी कश्मीर कीः शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?

कश्मीर की कहानी- भाग एक

आज जब अनुच्छेद 370 को संशोधित किए ठीक 7 साल गुजर गए हैं. कश्मीर को लेकर कुछ बातों का पुनरावलोकन जरूरी है. इसमें से शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू के अद्भुत प्रेम को समझना महत्वपूर्ण है, जिसने कश्मीर के एक गुट के नेता को ऐसे समय में केंद्रीय मंच पर पहुंचा दिया, जब ध्यान पूरी तरह से राष्ट्र निर्माण पर होना चाहिए था।

शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू की निष्ठा से भारत के हितों को चोट

कश्मीर की पहली राजनीतिक पार्टी, ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन 1932 में हुआ था. लेकिन 1939 में यह अधिक तटस्थ 'नेशनल कॉन्फ्रेंस' में बदल गई. शेख अब्दुल्ला इसके संस्थापक-अध्यक्ष बने.

पार्टी अध्यक्ष रहते अब्दुल्ला नेहरू के संपर्क में आए और उनकी बार-बार की मुलाकातों ने उस यारी की नींव रखी जो इतिहास पर अपनी एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ने वाली थी, जो भारत के लिए लगभग घातक साबित हुई.

अब्दुल्ला और नेहरू के बीच एक सहज और त्वरित रिश्ते के पीछे की एक संभावित वजह है कि नेहरू का कश्मीर के साथ संबंध महज राजनैतिक नहीं, बल्कि बेहद निजी भी था, इसके साक्ष्य उन खतों में मिलते हैं जिसमें उन्होंने उस स्थान की यात्रा करने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त की है, जिसे वह अपनी मातृभूमि कहते हैं.

संभव है कि अब्दुल्ला ने सोचा होगा कि सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में उन्हें एक समान विचारों वाला सहयोगी मिल गया है.

1936 में अब्दुल्ला को लिखे नेहरू के पत्र, जिसे 30 जून, 1936 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित किया गया था, में लिखा थाः

आपके लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप मुझे अपनी मातृभूमि पर आमंत्रित करें, क्योंकि वहाँ जाने की इच्छा मेरे भीतर हमेशा मौजूद रहती है. अब मुझे वहां गए 19 साल हो गए हैं और मैं अक्सर वहां लौटने के लिए उत्सुक रहता हूं, लेकिन परिस्थितियाँ मेरे लिए बहुत अलग रही थीं और उसकी वजह से मैं ऐसा नहीं कर पाया... भारत की बड़ी समस्याओं ने मुझे भारत के इस हिस्से से बांधे रखा है. जैसा आप जानते हैं, वे समस्याएँ अंततः कश्मीर को भी प्रभावित करती हैं, क्योंकि कश्मीर का भाग्य शेष भारत के साथ जुड़ा हुआ है. यदि भारत आजाद हुआ तो कश्मीर उस आजादी में शामिल होगा.

नेहरू और शेख अब्दुल्ला के राजनैतिक विचारों में बहुत सी बातें साझा थीं और इसलिए 1937 में लाहौर में उनकी मुलाकात के बाद दोनों का गठजोड़ और अधिक गहरा हो गया.
 
अपनी मनुहार की शक्ति का इस्तेमाल करके नेहरू ने अब्दुल्ला को उत्तर-पश्चिम सरहद की यात्रा पर अपने साथ चलने के लिए मना लिया. नेहरू की कश्मीर की बाद की यात्राओं से अब्दुल्ला की लोकप्रियता में उनका विश्वास मजबूत होता गया.

मई-जून 1940 में, नेहरू ने खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ कश्मीर का दौरा किया, जो दो दशकों से अधिक समय में अपनी मातृभूमि की उनकी पहली यात्रा थी.

1945 में कश्मीर के एक अन्य दौरे में, नेहरू का स्वागत नावों के विहंगम जुलूस के साथ किया गया. इस दौरे में, नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में भाषण देते हुए नेहरू ने अब्दुल्ला के नेतृत्व पर भी मुहर लगा दी.

उनके शब्दों में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में स्वतंत्र कश्मीर की उम्मीदों का प्रतिबिंब झलक रहा थाः

‘इसके (नेशनल कॉन्फ्रेंस) दरवाजे हर कश्मीरी के लिए खुले हैं... कश्मीर बहुत खूबसूरत जगह है और जो लोग यहाँ रहते हैं वे बड़े किस्मत वाले हैं. लेकिन असली खुशकिस्मती उसी दिन आएगी, जब लोगों के पास आजादी होगी... मुझे उम्मीद है कि शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के दूरदर्शी नेतृत्व में, यह अपना मकसद हासिल करने में कामयाब होगी.’

शेख अब्दुल्ला के संबंध में नेहरू की दो ग़लतफ़हमियाँ

अब्दुल्ला के साथ अपनी शुरुआती बातचीत के दौरान नेहरू के मन में दो बेहद महत्वपूर्ण गलतफहमियाँ पैदा हुईं जो बाद में भारत के हितों के लिए हानिकारक साबित होने वासी थीं. पहली ग़लतफ़हमी थी, पूरे कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की अपार लोकप्रियता में उनका अटूट विश्वास था.

जम्मू और कश्मीर क्षेत्र में कश्मीर घाटी, जम्मू क्षेत्र और लद्दाख क्षेत्र शामिल थे. अब्दुल्ला का प्रभाव सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बीच सीमित था और क्षेत्र की अन्य मुस्लिम जातियों और जम्मू और लद्दाख के अन्य समुदायों के बीच उनकी अपील नगण्य थी या कोई अपील थी ही नहीं.

1945 तक, नेहरू अब्दुल्ला के प्रति इतने आसक्त हो गए थे कि उन्होंने पार्टी के कैडर के खिलाफ धार्मिक असहिष्णुता के सभी आरोपों को खारिज कर दिया.

असल में, नेहरू ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के निर्णयों को प्रभावित करने या देश से अलग होने के जोखिम के मद्देनजर हिंदुओं से इसमें शामिल होने का आग्रह किया.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को कहीं अधिक सख्त सलाह दी. नेहरू की सलाह थी: 'यदि गैर-मुस्लिम कश्मीर में रहना चाहते हैं, तो उन्हें नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल हो जाना चाहिए या देश को अलविदा कह देना चाहिए.'

अपने उसी दौरे में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं की एक सभा को संबोधित किया और यही सलाह दोहराईः


‘मैं सलाह दूंगा कि अधिक संख्या में इसमें (नेशनल कॉन्फ्रेंस) शामिल होइए और इसके फैसलों पर प्रभाव डालिए। उन्हें निष्क्रिय दर्शक और आलोचक ही नहीं बने रहना चाहिए. यह स्पष्ट है, और यहां तक कि एक बच्चे को भी पता होना चाहिए, कि यदि आप देश की जनता के साथ नहीं खड़े होंगे तो महाराजा और अंग्रेज आपको हमेशा गुलाम बनाकर रखेंगे.’

असल में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को यह याद दिलाते हुए एक कड़ी चेतावनी दी थीः ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस एक असली राष्ट्रीय संगठन है और भले ही एक हिंदू इसका सदस्य ने बने, तो भी यह ऐसा ही रहेगा. अगर पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, यदि पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, तो कोई भी सुरक्षा उपाय और महत्व उनकी रक्षा नहीं करेगा.’

कांग्रेस पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता की ओर से दी गई नेहरू की सलाह का कश्मीरी हिंदुओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जो अपने साथ पिछले पलायन की पीढ़ीगत स्मृति लेकर आए थे.

अब्दुल्ला को लेकर नेहरू के मन में दूसरी गलतफहमी, जो घटनाओं की एक श्रृंखला से शुरू हुई थी, और जिसका अंत इसमें शामिल सभी लोगों के लिए त्रासद रूप से हुआ था, 1946 में अब्दुल्ला द्वारा शुरू की गई कश्मीर छोड़ो (क्विट कश्मीर) आंदोलन था. (तस्वीर देखिए, 30 मई, 1946 में हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में शेख अब्दुल्ला के 'पूर्ण उत्तरदायी सरकार' को छोड़कर 'कश्मीर छोड़ो' शुरू करने का दस्तावेजीकरण किया गया था.)

यह आंदोलन महाराजा हरिसिंह के अधीन ‘पूर्ण उत्तरदायी सरकार’ के लिए पूरे समर्थन से वादाखिलाफी था. इस आंदोलन के दौरान नेहरू द्वारा अब्दुल्ला को सक्रिय समर्थन दिया गया था और इसने महाराजा के साथ उनके रिश्तों में खटास लानी शुरू कर दी और इससे इन घटनाओं के लिए मंच तैयार हो गया जो 1947 में देखने को मिलने वाली थीं.

शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और नेहरू की हिरासत-

जब कश्मीर छोड़ो आंदोलन ने गति पकड़ ली, तो हरि सिंह ने 20 मई, 1946 को शेख अब्दुल्ला को दिल्ली के रास्ते में गिरफ्तार कर लिया. अब्दुल्ला नेहरू के अनुरोध पर उनसे मिलने दिल्ली जा रहे थे.

कुछ ही दिनों बाद, 26 मई को एक सार्वजनिक संबोधन में इस गिरफ्तारी की नेहरू ने तीखी आलोचना की थी.
इस भाषण में, नेहरू ने न केवल राज्य प्रशासन को फटकार लगाई, बल्कि इसकी तुलना कुख्यात जलियांवाला बाग नरसंहार के साथ कर दी. (चित्र देखिए जिसमें दो क्लिप हैं.)
 


उन्होंने प्रशासन पर असहमतियों को दबाने का आरोप लगाया और यह दावा करके भावनात्मक लहर पैदा की कि ऑल-इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने संवैधानिक प्रमुख के रूप में शासक के अधीन एक सरकार का समर्थन किया—जो अब्दुल्ला के 'कश्मीर छोड़ो' का विरोधाभास है—और श्रीनगर को उन्होंने 'मुर्दों का शहर' बताया.
नेहरू ने अपने संबोधन में अब्दुल्ला के प्रति अटूट समर्थन व्यक्त किया और उन्हें पूरे कश्मीर में बेहद लोकप्रिय नेता बताया.

बहरहाल, एक महीने के भीतर ही, नेहरू को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि 26 मई के उनके संबोधन में किए गए दावे झूठे थे हालांकि, इस समय तक पर्याप्त नुक्सान हो चुका था. (चित्र देखिए ) 




#कश्मीरकीकहानी #Jammuandkashmir #ManjitThakur 

FAQ
1. शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?
2. कश्मीर भारत में विलय क्यों नहीं चाहता था?
3. कश्मीर के भारत में विलय पर पंडित नेहरू की क्या राय थी?

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

गंगा जल संधि पर भारत को बांग्लादेश के साथ क्या सुलूक करना चाहिए? दिसंबर में होना है रिन्यू

बांग्लादेश को उम्मीद है कि उसकी तमाम भारत विरोधी रवैए के बावजूद, भारत गंगा जल संधि को नवीनीकृत करने के लिए सकारात्मक सहयोग देगा. आप ध्यान दें कि बांग्लादेश के साथ गंगा जल संधि 1996 में हुई थी और इसका नवीकरण इसी साल दिसंबर में होना है.
 
इस संधि पर बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के पहले कार्यकाल के दौरान हस्ताक्षर किया गया था. बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबेद इस्लाम को विश्वास है कि 'भारत इसके महत्व को समझेगा और उसी के अनुरूप आगे बढ़ेगा.'

अब प्रश्न है कि भारत विरोधी रवैए के बावजूद बांग्लादेश इतना आश्वस्त क्यों है? ध्यान रखना चाहिए कि बांग्लादेश और भारत के बीच गंगा सहित 54 प्रमुख नदियों का जल साझा है.

भारत में बांग्लादेश के पूर्व उच्चायुक्त तारिक ए. करीम ने हाल में कहा था कि 1996 की गंगा जल संधि ने यह दिखाया कि ‘‘संवेदनशील मुद्दों पर भी’’ सहयोग संभव है. अब बांग्लादेश को भारत विरोधी रुख भी अपनाना है, लगभग पाकिस्तान भी बन जाना है और पानी भी चाहिए. ऐसा कैसे होगा?

पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता फिलहाल निलंबित है और इसकी वजह से पूरे पाकिस्तान को दिक्कत हो रही है ऐसा पाकिस्तान के लोग मानते हैं. भारत का विपक्ष (और कुछ झंडू यूट्यूबर) भले ही शक कर रहा है और पूछ रहा है कि सिंधु का जल रखोगे किधर? तो मेरा प्रश्न यही है कि अगर संधि को खटाई में डालने से पाकिस्तान की मिर्च नहीं लगी है तो पानी के नाम पर जंग की धमकी वहां की सेना से लेकर बिलावल भुट्टो तक काहे दे रहे हैं?

खैर, बांग्लादेश पर लौटिए. वहां की मंत्री शमा ओबेद इस संधि को लेकर विश्वास जता रही हैं कि 'भारत इन बातों और इस साझा हित को ध्यान में रखते हुए सही निर्णय लेगा, ताकि हमारे द्विपक्षीय संबंधों को किसी भी तरह की क्षति न पहुंचे।'

द्विपक्षीय संबंधों को क्षति पहुंचने की इतनी चिंता है तो भारत के परम शत्रु पाकिस्तान का बगलबच्चा बनने से बचना चाहिए था. अगर भारत इस पानी वाले मसले पर बांग्लादेश की बांह नहीं मरोड़ता है तो इसे कूटनीतिक फेलियर माना जाना चाहिए.

शुक्रवार, 12 जून 2026

क्या टीएमसी के भीतर की हलचल सिर्फ सत्ता का गणित है, या सुरक्षा की राजनीति भी?

आपने कभी सोचा है कि तृणमूल के सांसदों-नेताओं का अचानक हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? आंखों में काबा वाली गायिका-अभिनेत्री घोष को अचानक अयोध्याजी कैसे प्रिय हो गए और कित-कित-कित-कित वाले कल्याण को ममता की छांव से बाहर अपना कल्याण कैसे दिखने लगा?

मुझे शक है कि यह सुनियोजित राजनैतिक कदम है. जिसमें ममता खुद को बलिदान करता हुआ दिखा रही हैं. अब अगर, ममता पर कोई कार्रवाई य कार्यवाही होती है तो शहीद की भूमिका ओढ़ने में उन्हें जरा भी वक्त नहीं लगेगा. आखिर, पैर पर प्लास्टर बांधकर और माथा फुड़वाकर बहते खून की धार के साथ चुनावी अभियान को नई शक्ल देनी वाली ममता इतनी सरल राजनीतिज्ञ तो नहीं.

हम और आप होते तो फूटे कपार को पहले रूमाल से पोंछते—और ममता के लिए रुमाल तो क्या धोती तक उपलब्ध हो जाती—और तब ही प्राथमिक चिकित्सा के लिए अस्पताल जाते. यह मिसाल इसलिए क्योंकि ममता छोटी बात को तूल देकर उसे ‘हूल’ में बदल देने की क्षमता वाली नेता हैं.

अगर टीएमसी के एक बड़े धड़े ने एनडीए को समर्थन देने की बात की है या ऐसा रुख दिखा रहे हैं, तो समझिए उनको बचाने की जद्दोजहद है.

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के रुख में जो बदलाव देखने को मिला है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सिर्फ राजनीतिक अवसरवाद है, या इसके पीछे कोई गहरी चिंता भी काम कर रही है.

इस पर ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बंगाल में कटमनी, तोलाबाजी और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर जनता का गुस्सा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है और स्थानीय टीएमसी नेताओं की पिटाई से लेकर सर मूंडकर सड़क पर दौड़ाने तक के वीडियो सामने आ रहे हैं.

मैं दोहरा रहा हूं आंखों में काबा वाली सयोनी घोष से लेकर कित-कित-कित वाले कल्याण बनर्जी तक अचानक ममता के विरोधी हो गए, यह बात कम से कम मुझे पच नहीं रही है.

पार्टी के भीतर मचे इस 'महा-विखंडन' को महज एक राजनीतिक असंतोष कहना वास्तविकता को नजरअंदाज करना होगा. यह दरअसल अस्तित्व बचाने की वह जद्दोजहद है, जहाँ नेता अपनी विचारधारा से अधिक अपनी 'सुरक्षा' को प्राथमिकता दे रहे हैं.

इस विद्रोह का नेतृत्व चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय जैसी वरिष्ठ नेता कर रही हैं, जो सीधे तौर पर संकेत देता है कि यह कोई छिटपुट असंतोष नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पलायन है.

सत्ता परिवर्तन के बाद पाला बदलने वाले नेताओं की मंशा को समझना कठिन नहीं है. राजनीति के जानकार मानते हैं कि बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद, राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति और 'बुलडोजर संस्कृति' (जो देश के अन्य हिस्सों में देखी गई है) के डर ने इन नेताओं को एनडीए के सुरक्षा घेरे में जाने के लिए मजबूर कर दिया है. इसे आप अपनी गर्दन बचाने के लिए पहना गया 'सुरक्षित कवच' कह सकते हैं.

आपके मन में सहज प्रश्न उठेगा कि ये लोग सीधे भाजपा में क्यों नहीं शामिल हो गए? आपको याद हो कि बंगाल भाजपा में नए नेताओं की भर्ती पर रोक लगा दी गई है. दूसरी तरफ, वॉशिंग मशीन वाली बात इतनी दफा कही जा चुकी है कि खुद भाजपा में जाने में इन्हें शर्म आ रही होगी और भाजपा वालों को इनको शामिल करने में. तीसरी और मार्के की बात है कि टीएमसी का यह धड़ा अपनी बार्गेनिंग पावर बनाए रखना चाहता है.

एनडीए में शामिल होकर टीएमसी के इस धड़े को कुछ न कुछ तो मिलता रहेगा. पार्टी में शामिल होने पर वैचारिक रूप से ‘हृदये मदीना’ और कित-कित भूल जाना होगा. भाजपा का नफा यह है कि राज्यसभा में शक्ति बढ़ेगी, राष्ट्रपति चुनाव आने वाले हैं उसमें किसी विशेष व्यक्ति के राष्ट्रपति चुने जाने के लिए जरूरी संख्याबल मिलेगा और हां, नीतीश और नायडू की बार्गेनिंग पावर को कम किया जा सकेगा.

तो, हृदय परिवर्तन सिर्फ गांधी के टाइम होते थे. अब सिर्फ स्टांस चेंज होता है. टीएमसी वालों का ये मूव सिर्फ कॉलगेट का सुरक्षा चक्र है. ममता शहीद के भाव में आएंगी और बंगाल के लोगों के ममत्व को अपने पाले में वापस लाने के लिए पहले एफआइआर के बाद सड़क पर आएंगी. आखिर जेपी की कार की बोनट पर कूद कर डांस करने वाली और भरी संसद में सपा सांसद दारोगा प्रसाद सरोज का गट्टा (कॉलर) पकड़ लेने वाली ममता दी अभी अपनी कला भूली तो नहीं होंगी.

सलमान काला हिरण खान की फिल्म सुल्तान का वह संवाद तो याद ही होगा आपकोः मैंणे पैलवाणी छोड्डी है, लड़ना नीं भूल्या.

गुरुवार, 7 मई 2026

कतरनी चावल चूड़ा और देवघर का पेड़ा

कुछ खुशबुएँ ऐसी होती हैं जो समय की धूल में भी धुंधली नहीं पड़तीं. वे हमारी इंद्रियों के किसी गुप्त झरोखे में दुबक कर बैठ जाती हैं और एक मामूली से स्पर्श मात्र से पूरे अतीत को पुनर्जीवित कर देती हैं.

पिछली बार जब मैंने गोविंदभोग चावल पर लिखा था तो कई लोगों ने उस चावल जैसा चावल देश के अन्य हिस्सों में होने की बात कही थी. लेकिन यकीन मानिए, गोविंदभोग चावल यूनीक है और इसलिए उसे जीआइ टैग मिला है.
बहरहाल, कुछ लोगों ने कतरनी चावल की याद दिलाते हुए उस पर लिखने के लिए भी कहा था. और कतरनी के बारे में सोचते हुए मुझे सबसे पहले उसकी खुशबू याद आई.

बिहार के ‘अंग क्षेत्र’ (भागलपुर और बांका) के खेतों में जब कतरनी का धान पकता है, तो उसकी सोंधी महक केवल हवा में नहीं तैरती, बल्कि वह उस माटी के संस्कार और आतिथ्य का उद्घोष करती है.

यह केवल एक अन्न नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अस्मिता है. आज के इस मशीनी जमाने में जब ‘फास्ट फूड’ ने थालियों पर कब्ज़ा कर लिया है, तब कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का मिलन एक ऐसी सात्विक तृप्ति प्रदान करता है, जिसकी तुलना किसी भी वैश्विक व्यंजन से नहीं की जा सकती.




कतरनी: सुगंध का स्वर्ण-अक्षत

भागलपुर और बांका की जलोढ़ मिट्टी में जब कतरनी धान के पौधे लहलहाते हैं, तो उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है. कतरनी चावल अपने छोटे कद, तीखे और सुगंधित दानों के लिए विश्वविख्यात है. इसे जीआई टैग प्राप्त है, जो इसके विशिष्ट होने की मुहर लगाता है. लेकिन इसका महत्व केवल सरकारी दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं है.
यह टैग क्यों महत्वपूर्ण है?

जीआई टैग मिलने का अर्थ यह है कि ‘कतरनी’ नाम का उपयोग केवल उसी चावल के लिए किया जा सकता है जो भागलपुर और बांका के भौगोलिक क्षेत्र में पारंपरिक विधियों से उगाया गया हो. यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी शुद्धता की गारंटी देता है और स्थानीय किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य दिलाने में मदद करता है.

कतरनी चावल को 28 मार्च, 2018 को आधिकारिक तौर पर भारत सरकार के भौगोलिक उपदर्शन रजिस्ट्री (जीआइ रजिस्ट्री) द्वारा जीआई टैग प्रदान किया गया था.

इस चावल के पंजीकृत रूप से मालिकाना हक भागलपुर जिला कतरनी धान उत्पादक संघ के पास है और उसके उत्पादन का इलाका भागलपुर, बांका और मुंगेर जिलों के विशिष्ट क्षेत्र हैं.

बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर ने कतरनी चावल के जीआई टैगिंग की प्रक्रिया में मुख्य तकनीकी भूमिका निभाई थी. मार्च, 2018 की सरकारी रिपोर्टों में बिहार के चार कृषि उत्पादों (कतरनी चावल, जर्दालु आम, मगही पान और शाही लीची) को एक साथ जीआई टैग मिलने का उल्लेख है.

अंग की लोक-संस्कृति में कहा जाता है कि कतरनी का धान जब घर आता है, तो पड़ोसी को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती; खुशबू खुद गवाही दे देती है. यह चावल जब पकता है, तो इसके दाने किसी श्वेत मोती की भांति चमकते हैं. इसकी मिठास और कोमलता इसे ‘चावलों की महारानी’ बनाती है. यह वह चावल है जिसे केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि मन को तृप्त करने के लिए खाया जाता है.


चूड़ा: सघन तपस्या का मधुर फल

कतरनी के धान से जब ‘चूड़ा’ (चिड़वा, पोहा) तैयार किया जाता है, तो यह एक लंबी प्रक्रिया और सघन धैर्य का परिणाम होता है. कतरनी के धान को हल्के गर्म पानी में भिगोकर, भूनकर और फिर लकड़ी के ओखल या मिल में कूटकर जो पतले, कागज़ जैसे झिलमिलाते चूड़े निकलते हैं, वे अद्भुत होते हैं.

कतरनी चूड़ा की विशेषता यह है कि यह अत्यंत सुपाच्य और स्निग्ध होता है. इसकी महक कच्चे धान की सोंधी खुशबू को समेटे रहती है.

बिहार के खान-पान में ‘दही-चूड़ा’ का स्थान सर्वोपरि है. मकर संक्रांति हो या जेठ की दुपहरी में मेहमान का स्वागत, चूड़ा-दही और चीनी/गुड़ का मेल एक मुकम्मल भोजन है. लेकिन जब यह चूड़ा कतरनी का हो, तो वह भोजन से ऊपर उठकर एक ‘अनुभव’ बन जाता है.

अंग से बाबाधाम: कतरनी और पेड़े का दिव्य संबंध

अब बात करते हैं उस ‘त्रिवेणी’ की, जो भागलपुर, सुल्तानगंज और देवघर के बीच बहती है. अंग प्रदेश की सीमाएं देवघर (झारखंड) की पहाड़ियों से जा मिलती हैं. यह संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और स्वादजन्य भी है.

सावन का महीना हो और सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर कांवड़िए जब बाबाधाम (देवघर) की ओर प्रस्थान करते हैं, तो उनकी पोटली में अक्सर ‘कतरनी का चूड़ा’ होता है. यात्रा के दौरान जब वे विश्राम करते हैं, तो मोटी मलाई वाली दही और कतरनी चूड़ा उनका मुख्य संबल बनता है.

लेकिन इस स्वाद की पूर्णता तब होती है, जब इसमें देवघर के विश्वविख्यात ‘पेड़े’ का समावेश होता है.
देवघर का पेड़ा, जो शुद्ध खोया और चीनी के मंद आंच पर कैरेमलाइज्ड होने से बनता है, अपनी एक विशिष्ट भूरी आभा और सोंधी मिठास के लिए जाना जाता है.

स्वाद का रसायन: चूड़ा-दही और पेड़ा

अंग क्षेत्र की मेहमानी में एक विशिष्ट परंपरा है—’दही-चूड़ा-पेड़ा’. कतरनी चूड़ा: जो आधार है, जो सुगंधित और हल्का है. गाढ़ा दही: जो शीतलता और क्रीमी टेक्सचर प्रदान करता है. और इसके साथ देवघर का पेड़ा, जो मिठास का वह चरम है, जो इस पूरे भोजन को एक ‘शाही डेजर्ट’ में बदल देता है.

अक्सर लोग दही-चूड़ा में चीनी या गुड़ मिलाते हैं, लेकिन मुझ जैसे पारखी लोग पेड़े को चूड़े के साथ मसलकर खाते हैं.

पेड़े की वह सोंधी मिठास जब कतरनी की खुशबू और दही की खटास के साथ मिलती है, तो मुँह में रसों का एक ऐसा विस्फोट होता है जिसे शब्दों में बांधना कठिन है. पेड़े का दानेदार होना और चूड़े का करारापन एक अद्भुत विरोधाभास पैदा करता है जो स्वाद की ग्रंथियों को झंकृत कर देता है.

सांस्कृतिक ताना-बाना और विरासत

भागलपुर का रेशम और यहाँ की कतरनी, दोनों ही सूक्ष्मता के प्रतीक हैं. वहीं देवघर का पेड़ा उस भक्ति और श्रद्धा का अंश है जो बाबा बैद्यनाथ के चरणों से जुड़ा है.

जब कोई व्यक्ति देवघर से लौटता है, तो उसके पास प्रसाद के रूप में पेड़े होते हैं और जब वह भागलपुर से गुजरता है, तो झोले में कतरनी चूड़ा. इन दोनों का साथ होना दो संस्कृतियों के मिलन का प्रतीक है.

जाहिर है, यह सब लिखते हुए मैं उस समय में लौट गया हूं, जब जीवन की गति धीमी थी. जब खेतों से अनाज सीधे ओखल तक आता था और पेड़े शुद्ध दूध से घंटों कढ़ाई में जलकर बनते थे. आज ‘पैकेज्ड’ और ‘इंस्टेंट’ के युग में कतरनी और देवघर के पेड़े का यह मेल हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है.

कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का यह कनेक्शन केवल भोजन की बात नहीं है; यह अंग और संथाल परगना के बीच के मधुर रिश्तों का सेतु है. यह माँ के हाथों से सानकर खिलाए गए उस ग्रास की याद है, जिसमें ममता का नमक और संस्कार की खुशबू मिली होती है.

यदि आप कभी अंग प्रदेश की यात्रा पर हों और दोपहर की सुनहरी धूप में आपको कोई कतरनी चूड़ा, गाढ़ी दही और देवघर के पेड़े परोस दे, तो समझियेगा कि आप केवल खाना नहीं खा रहे, बल्कि आप उस प्राचीन सभ्यता का हिस्सा बन रहे हैं जिसने स्वाद को भी ईश्वर की आराधना के समान पवित्र माना है. कतरनी की महक और पेड़े की मिठास, यही है हमारे अंग का असली गौरव, जो सदियों से हमारी जीभ पर एक मीठी याद बनकर अमर है.

अंग की धरती पर कतरनी का उगना केवल एक कृषि प्रक्रिया नहीं, बल्कि माटी के साथ किया जाने वाला एक प्रेम-अनुष्ठान है. आधुनिकता की आंधी के बावजूद, भागलपुर और बांका के गाँवों में आज भी कतरनी को सहेजने की विधियाँ वैसी ही हैं जैसी पूर्वजों के समय में थीं.

असल में, कतरनी चावल की पैदावार विशिष्ट पारंपरिक विधियों से की जाती है जो इस चावल की सुगंध और स्वाद को अक्षुण्ण रखती हैं:

पहली बात कि कतरनी की पैदावार के लिए विशिष्ट भूखंड का चयन किया जाता है. स्थानीय (और भौगोलिक रूप से) इसे दिआरा और तारी की माटी कहा जाता है.

कतरनी हर कहीं नहीं उग सकती. अंग के किसान आज भी पारंपरिक रूप से उन्हीं खेतों को चुनते हैं जहाँ गंगा या उसकी सहायक नदियों का पानी लौट चुका हो. विशेषकर ’तारी’ (ऊँची भूमि) और ’बलगाथ’ (हल्की दोमट) मिट्टी इसके लिए श्रेष्ठ मानी जाती है.

मान्यता है कि इस मिट्टी में मौजूद विशिष्ट खनिजों के कारण ही कतरनी में वह ‘2-AP’ नामक सुगंधित तत्व विकसित होता है.

पारंपरिक खेती में कतरनी के साथ यूरिया या रासायनिक खाद का प्रयोग वर्जित माना जाता है.

गाँवों में किसान आज भी ’गोबर की खाद’ और ’खेत की पुरानी कचवा’ (सड़ी हुई घास-फूस) का उपयोग करते हैं. तकनीकी रूप से यह सच है कि अधिक नाइट्रोजन (यूरिया) डालने से धान की लंबाई तो बढ़ जाती है, लेकिन उसकी मूल सुगंध कम हो जाती है. इसीलिए अंग के किसान ‘कम पैदावार’ मंजूर करते हैं, लेकिन ‘कम सुगंध’ नहीं.
कतरनी की रोपाई का समय बहुत महत्वपूर्ण है. सावन के आगमन के साथ ही इसके ’बिचड़े’ (नर्सरी) तैयार किए जाते हैं. पारंपरिक विधि में रोपाई के समय दो पौधों के बीच एक निश्चित दूरी रखी जाती है, ताकि हवा का संचार सही हो.

पारंपरिक ढेंकी, मशीनी युग में इसे कौन याद रखता है!


किसान रोपाई के समय अक्सर लोकगीत (कजरी) गाते हैं, जो इस थकाऊ काम को एक उत्सव बना देता है. साथ ही, बरहमासा गीत भी होते हैं.

फसल की कटाई और ‘अदहन’ का ध्यान

कतरनी को काटने का एक विशिष्ट समय होता है. जब बालियां सुनहरी हो जाएं और उनमें दूध सूखकर दाना कड़ा हो जाए, तभी इसे काटा जाता है. अधिक देर करने पर दाने खेत में ही झड़ने लगते हैं. कटाई के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में ’अदहन देना’ कहते हैं.

कतरनी चूड़ा बनाने की प्राचीन ‘भट्टी’ विधि

कतरनी का असली जादू उसके चूड़े में है, जिसे बनाने की पारंपरिक विधि आज भी मशीनों को मात देती है. सबसे पहले धान को बड़े लोहे के कड़ाहों में रात भर भिगोने के बाद आधा उबाला जाता है. यह प्रक्रिया बहुत सावधानी से की जाती है ताकि दाना फटे नहीं.

उबले हुए धान को मिट्टी के चूल्हे पर बालू के साथ भूना जाता है. यहाँ ‘अंदाज’ ही सब कुछ है; जरा सी चूक चूड़े को जला सकती है या उसे कच्चा छोड़ सकती है.

हालाँकि अब मशीनें आ गई हैं, लेकिन आज भी कुछ पुराने घरों में ’ढेंकी’ (लकड़ी का भारी लीवर) का प्रयोग होता है. ढेंकी से कूटा हुआ चूड़ा मोटा होता है, लेकिन उसकी मिठास और खुशबू मशीन वाले चूड़े से कहीं अधिक होती है.

कतरनी को लोहे के साइलो में नहीं, बल्कि मिट्टी से बनी ‘कोठी’ या ’बखार’ में रखा जाता है. मिट्टी के ये पात्र तापमान को नियंत्रित रखते हैं, जिससे कतरनी की सुगंध लंबे समय तक सुरक्षित रहती है.

अंग के गाँवों में कतरनी का उत्पादन कोई ‘बिजनेस’ नहीं, बल्कि एक ‘विरासत’ है. यहाँ का किसान अपनी फसल को संतान की तरह पालता है. कतरनी की वह विशिष्ट महक दरअसल उस किसान के पसीने, गंगा की माटी और ढीकी की थाप का सामूहिक संगीत है.

(तस्वीरें ढेंकी-जो अब दुर्लभ है. तथा कतरनी चावल की हैं. देवघर के पेड़े तो अब अमेजन पर भी उपलब्ध हैं)