Thursday, June 14, 2018

ओस में गीले हरसिंगार जैसी ताज़ी फिल्म है अक्तूबर

इस सिनेमाई कविता को आप पांच-दस बरस बाद भी देखेंगे तो इसके भाव उतने ही शाश्वत रूप से ताजा होंगे, जितने ओस में गीले खुद हरसिंगार के फूल. 

कभी बहुत खूबसूरत सिनेमाई कविता देखने का मन हो तो आपको फिल्म अक्तूबर देखना चाहिए. फोटो सौजन्यः गूगल


हम कविताएं पढ़ते हैं या सुनते हैं. लेकिन कभी बहुत खूबसूरत सिनेमाई कविता देखने का मन हो तो आपको फिल्म अक्तूबर देखना चाहिए.

प्रेम के प्रकटीकरण के बेहद शोना-बाबू युग में जब प्रेमी-प्रेमिका के वॉट्सऐप पर आए हर मेसेज के जबाव में फौरन से पहले जवाब देना अनिवार्य हो और फेसबुक पर पोस्ट पर दिल चस्पां करना, अक्तूबर बताता है कि प्रेम किस कदर गहरा हो सकता है. समंदर की तरह.

अगर कोई प्रेम के होने या न होने पर संजीदा सवाल उठाए, उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े करे तो उन सौ सवालों का एक जवाब है अक्तूबर.

यह फिल्म असली जिंदगी के ही किसी गहरे प्रेम को इतने सटीक तरीके से परदे पर उकेरता है कि आपको इस नश्वर संसार में प्रेम के शाश्वत होने पर यकीन होने लग जाएगा.

तो इस प्रेम के शाश्वत तत्व क्या हैं? जाहिर है, वेदना, पीड़ा, त्याग और हां, बहुत गहरा अनुराग. अक्तूबर मुक्तिबोध के अंधेरे में की तरह की एक लंबी कविता सरीखा है.

भारत में सिनेमा को लेकर एक कट टू कट हड़बड़ी है. हम एक सीन को नब्बे सेकेंड से ज्यादा बरदाश्त नहीं करते. हम 60 विज्ञापन फिल्मों को एक कथासूत्र में बांध कर एक फीचर फिल्म बनाते हैं. ताकि दर्शक बंधा रहे. हमारे पास कामयाबी का एक मनमोहनी (देसाई) तरीका है, सीन-दर-सीन, नाच-गाना-कॉमिडी-मारधाड़-फिर से गाना-मां-बिछड़ना-मिलना.

अक्तूबर जैसी फिल्में इस समीकरण का एंटी-थीसिस हैं.

अक्तूबर की कहानी को दो मिनट में निपटाया जा सकता है. लेकिन उसकी संवेदनशील कहानी को सीन-दर-सीन विवेचित किया जाए तो एक पूरी किताब लिखनी चाहिए.

हमने हमेशा वरूण धवन को गोविंदा के नक्शे-कदम पर चलते देखा है. लेकिन पहले बदलापुर और फिर अक्तूबर में धवन ने अपने अंदर के असाधारण कलाकार से परिचित कराया है. इस फिल्म की साधारण कहानी हमारे जीवन के किस्सों की तरह ही साधारण है. इसमें खिंचा-खिंचा से रहने वाला होटल प्रबंधन का छात्र डैन है, इसमें कभी कभार उससे बात कर लेने वाली उसकी सहपाठी शिवली है.

शिवली नए साल के उत्सव में शामिल होते वक्त होटल की चौथी मंजिल से गिर जाती है. बुरी तरह जख्मी शिवली कोमा में चली जाती है. गिरने से पहले उसने आखिरी सवाल अपनी दोस्त से डैन के बारे में पूछा होता हैः डैन कहां है? और, यह सवाल डैन की जिंदगी बदल देता है.

अक्तूबर को देखेंगे तो शिवली और डैन के अलावा आपको कड़क मिज़ाज बॉस का किरदार दिखेगा, जिसकी वजह से आपको डैन के किरदार के अलग अलग शेड्स दिखते हैं, जिसकी वजह से डैन के किरदार की परतें खुलती हैं.

फिर आपको अस्पताल के चक्कर काटते डैन और शिवली की मां के बीच पनपता एक ममतामय रिश्ता नजर आएगा. डैन और उसके दुनियादार दोस्तों के बीच की कैमिस्ट्री नजर आएगी. आप फ्रेम दर फ्रेम इस फिल्म के क्राफ्ट से मुत्तास्सिर होते जाएंगे.

इस फिल्म का क्राफ्ट आम हिंदी फिल्मों के क्राफ्ट से बेहद अलहदा है. इसके संपादन में एक रिदम है, गति है, लय है. अविक मुखोपाध्याय की सिनेमैटोग्राफी में ओस से गीले हरसिंगार के फूल, मकड़ी के जाले, बोगनवेलिया एक काव्यात्मकता रचते हैं. खूबसूरत लगता हर फ्रेम फिल्मी रूप से नाटकीय नहीं बल्कि इतना वास्तविक है कि मन करेगा कि फ्रेम को अपने कंप्यूटर का स्क्रीनसेवर बना लें.

लेकिन इन्हीं दृश्यों से एक उदासी सृजित होती जाती है. फिर पहाड़ हैं. उनमें जंगलों से निकलता सूरज है, उसकी किरनें हैं, नदी है. और हर फ्रेम में अपनी अदाकारी से आपको आश्वस्त करते वरूण धवन हैं.

अक्तूबर बिस्तर पर पड़े मरीजों की देखभाल में लगे लोगों के त्याग का अनकहा पाठ है और कुछ असंवेदनशील लोगो पर टिप्पणी भी.

नायिक बनिता संधू (शिवली) फिल्म में ज्यादातर वक्त बिस्तर पर मृतप्राय अवस्था में बिताती दिखती हैं. उनके पास विकल्प कम थे पर उनकी आंखें अद्भुत रूप से संप्रेषणीय हैं.

हमें न तो बनिता का नाम जानने की जल्दी होती है न फिल्म खत्म होने के बाद हमें वरूण धवन याद रहते हैं. हमें बस शिवली याद होती है और याद रहता है डैन.

इस सिनेमाई कविता को आप पांच-दस बरस बाद भी देखेंगे तो इसके भाव उतने ही शाश्वत रूप से ताजा होंगे, जितने ओस में गीले खुद हरसिंगार के फूल. 


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Monday, June 11, 2018

फिल्म परमाणु में भाजपा का झंडा लहराता है

गरमी की छुट्टियां चल रही थीं तो मेरे बेटे ने जिद की कि वह फिल्म देखना चाहता है. मुझे इनफिनिटी वॉर नाम की फिल्म दिखाने का इसरार वह कर रहा था और मैं कत्तई इस मूड में नहीं था कि मैं तीन घंटे सिनेमा हॉल में बोर होकर आऊं.

मुझे विलक्षण मार-धाड़ वाली फिल्में बोर करती हैं.

बहरहाल, यह पृष्ठभूमि थी फिल्म परमाणु देखने की. यह पोकरण परमाणु परीक्षणों पर आधारित है. मैं चूंकि खुद पोकरण जा चुका हूं और डॉक्युमेंट्री भी बनाई है इस विषय पर, तो मुझे लगा कि देखना चाहिए कि इसमें कितनी सच्चाई है और कितना मसाला निर्देशक ने डाला है.

रुस के विघटन के बाद भारत को अंतराराष्ट्रीय स्तर पर घेरने की कोशिश हो रही थी, चीन और अमेरिका पाकिस्तान के पीछे रणनीतिक रूप से गोलबंद थे. उन दिनों किस तरह से यह परमाणु परीक्षण हुए वह अपने आप में हम सब के लिए गर्व का विषय तो है ही. तब बुद्ध फिर से मुस्कुराए थे.

किस तरह भारतीय वैज्ञानिकों और परीक्षण की तैयारी कर रहे दल ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था उसे ही इस फिल्म की थीम बनाया गया है. मुझे इन सब पर कुछ और नहीं लिखना है क्योंकि अब तक आप लोगों ने यह फिल्म देख ली होगी या उस पर पढ़ भी लिय़ा होगा.

असल में लेखकों और निर्देशक के सामने बड़ी चुनौती यह थी कि वह कैसे इस विषय को एक वृत्त चित्र होने से बचाएं और कहानी में दर्शकों की दिलचस्पी बरकरार रखें. क्योंकि फिल्म के क्लाइमेक्स का भी सबको पता था ही. उसके बाद काल्पनिक किरदार जोड़े गए. लेकिन अश्वत रैना का किरदार तो ठीक है पर उसके परिवार से जुड़ी कहानी का फिल्म की कहानी से कोई मेल नहीं होता.

मसलन, अश्वत रैना की पत्नी को पहली बार नाकाम परीक्षणों के बाद यह तो पता रहता है कि अश्वत सिविल सेवा अधिकारी है, और वह किसी खास एटमी मिशन से जुड़ा है. मिशन फेल होने के बाद वह अश्वत की नौकरी चले जाने की बात भी जानती है. लेकिन वही पत्नी, जो संयोग से खुद एक खगोलशास्त्री है, कहानी के उतरार्ध में पति के मिशन से अनजान रहती है और पाकिस्तानी खुफिया एजेंटो के झांसे में आ जाती है. यह बात एकदम से पचती नहीं.

दूसरी बात, जॉन अब्राहम के डोले-शोले एक दम वैसे ही हैं जैसे दूसरी फिल्मों में होते हैं. अब उनसे दुबला कोई पाकिस्तानी जासूस उनको पीटता रहे और वह एक थप्पड़ भी न मार पाएं, यह हजम नहीं होता.

फिल्म में एक बात और अखरती है कि आर चिदंबरम से लेकर अनिल काकोडकर और एपीजे अब्दुल कलाम तक, सारे वैज्ञानिकों को तकरीबन हास्यास्पद दिखाया गया है, जो छोटी बातों के लिए शिकायत करते और गुस्सा होते दिखते हैं. मसलन, रेगिस्तान में काम करने की शिकायत, धूल धूप और गरमी की शिकायत. और इतने फूहड़ की गोलगप्पे खाते हुए जासूसों के सामने अश्वत रैना का राज़ उगल देते हैं. ऐसा नहीं हुआ था. और एपीजे अब्दुल कलाम जिस तरह से दिखाए गए हैं कि वह हमेशा कुछ न कुछ खाते रहते हैं यह भी गलत है और हां, वह उस वक्त डीआरडीओ में थे और प्रधानमंत्री के रक्षा सलाहकार भी थे. फिल्म उनको इसरो में काम करने वाला वैज्ञानिक बताती है.

डायना पैंटी खूबसूरत लगी हैं और शायद उनको सिर्फ इसीलिए फिल्म में लिया भी गया. यक्षवा पूछ रहा है कि पैंटी की जरूरत ही क्या थी फिल्म में. लेखकों ने खुफिया एजेंसी रॉ का एक तरह का मजाक उड़ाया है क्योंकि अश्वत के गेस्ट हाउस में पाकिस्तानी और अमेरिकी जासूस खुले आम आते-जाते हैं सवाल है कि तब रॉ के लोग क्या कर रहे होते हैं, यह पता नहीं चलता. इतने बडे ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तानी जासूस सारे रास्ते पर भाग रहा होता है, रॉ कुछ नहीं करती. पाकिस्तानी जासूस रैना के घर में जाकर ट्रांसमीटर लगा देते हैं, फोन टैप कर लेते हैं और रॉ कुछ नहीं करती.

इंटरवल के बाद फिल्म जरूर रफ्तार पकड़ती है जब पाकिस्तानी और अमेरिकी जासूस पोकरण में रह कर इस बात को पकड़ लेते हैं कि भारत परमाणु परीक्षण करने जा रहा है. यहां पर थ्रिल पैदा होता है. क्लाइमैक्स अच्छे से लिखा गया है और दर्शक सिनेमाहॉल छोड़ते समय अच्छी फिलिंग लेकर निकलते हैं और लेखक यहां पर कामयाब हुए हैं.

निर्देशक अभिषेक शर्मा की फिल्म बेहतर विषय पर बनी हुई है, संपादन भी कसा हुआ है. और इसमें जॉन अब्राहम का भावहीन सपाट चेहरा भी नहीं खलता. देशभक्ति के लिए यहां छाती नहीं ठोंकी गई. पूरी फिल्म में सिर्फ एक बार तिरंगे का इस्तेमाल हुआ है. पर अगर आपमें गौर से देखने की क्षमता और इच्छा हो तो देखिएगा, पूरी फिल्म में कम से कम तीन दफा दूर पृष्ठभूमि में भाजपा का चुनावी झंडा लहरा रहा होता है.

भरोसा नहीं, तो खुद देख लीजिएगा.



Saturday, June 9, 2018

मधुपुर मेरा मालगुडी है


मधुपुर डायरी पार्ट 2:

मधुपुर की सुबहें दीगर शहरों से अलग हुआ करती हैं. यह शहर मेरा मालगुडी है, और मैं उसका स्वामीनाथन.

सोमवार की सुबह को जब मैं उठा, तो अपनी आदत के उलट तयशुदा समय से काफी पहले उठ गया था. चाय-चुक्कड़ इत्यादि पीने के बाद हमने, यानी मैंने और रतन भैया ने मधुपुर में सोशल विजिट का कार्यक्रम रखा था.

मेरे मुहल्ले में एक विद्यालय है, तिलक विद्यालय. मैं इसका छात्र रहा हूं तो यहां गया भी. उसकी पोस्ट बाद में. पर उसके पिछवाड़े अमलतास क्या उमक कर खिला था. मन का सारा दुख दूर हो गया. दिल्ली में पेड़ पौधे धूल से अंटे रहते हैं. मधुपुर में सारे पेड़ धुले-धुले थे, साफ-साफ. हंसते हुए. खिलखिलाते. 

मुझे तो ऐसे भी गुलमोहर और अमलतास बहुत भाते हैं. अमलतास के पीलेपन को मैने अपने आंखों भी बसाया और मोबाइल में भी कैद कर लिया. 

दिल्ली में रामकृपाल झा ने मुझसे कहा था कि एक दफा नया बाजार चला जाऊं, तो नया बाजार (मधुपुर का एक मोहल्ला) जाना तय ही था. लेकिन रामकृपाल के पिताजी माताजी तीर्थ के लिए कहीं निकल गए थे तो दिन में उनसे मुलाकात की कोई संभावना नहीं थी सो हम लोग उधर जाने के कार्यक्रम को आगे की तारीख पर टाल गए.

तो हमने पहली यात्रा शुरू की दक्षिण की तरफ. मधुपुर में हमारे मुहल्ले को साधनालय कहा जाता है. उसकी सरहद हनुमान जी का एक चबूतरा था, जिसे अब एक छोटे मंदिर में तब्दील कर दिया गया है. मेरे घर से निकलते ही पहले बाएं हाथ पर एक परचून की दुकान हुआ करती थी. शंकर की दुकान. जिसके ऐन पीछे एक विशालकाय यूकेलिप्टस का पेड़ था. उस पेड़ की पत्तियों में मैं बचपन में मुख्तलिफ़ आकृतियां खोजा करता था. घिरते अंधरे में स्याह होते जाते उस पेड़ में कभी मुझे बजरंगबली दिखते थे, कभी अनिल कपूर तो कभी कोई डरावनी चुड़ैल भी.

मेरे मुहल्ले में उमक कर खिला अमलतास. फोटोः मंजीत ठाकुर


अब वह पेड़ वहां नहीं है. कट चुका है. लगा कि मेरा कोई बहुत जिगरी दोस्त नहीं रहा इस दुनिया में.

उस पेड़ के ठीक सामने यानी सड़क के दाहिनी तरफ, शुक्र है, अभी भी खेत हैं. मेरे घर के ठीक दक्षिण में जो बड़ा सा तालाब था. वह आधा भरा जा चुका है. उस में आधे मधुपुर के नाले का गंदा पानी जमा होता है. मछलियां मर चुकी हैं. पानी का रंग गहरा काला हो चुका है. विश्वास नहीं होता कि यह वही तालाब है जिसमें हम अमूमन नहाया करते थे, मछलियां मारते थे और होली के बाद रंग छुड़ाने के लिए तो यही पोखरा तय था.

बहरहाल, बजरंगबली का चबूतरा खत्म होते ही हाजी मुहल्ला शुरु हो जाता है. मेरे कई दोस्त वहां मिले. रोज़े में प्यास न लगे सो नीम के दातुन चबाते लोग. कुछ को छोड़कर पहले वाली गुरबत कहीं नहीं दिखती. सब मकान पक्के और ऊंचे और आलीशान हो गए हैं. बाकी लोग वैसे ही है. हंस कर मिलने वाले.

बरकत भैया मिले थे. जब हम बच्चे थे तब भी उनके बाल सफेद थे. अब तो खैर, नौकरी अभी भी उनकी दो साल बची है पर सिर भौंह दाढ़ी सब सुफेद. बिलकुल बर्फ़ानी.

फिर वह सब मकान, जिसमें कभी होम्योपैथ के मधुपुर के मशहूर डॉक्टर फारूख़ साहेब रहते थे और जिनके घर में एक मस्त-सा हिरन था. शायद उसको उन्होंने किसी बकरीद में क़ुरबान कर दिया. अब उन्होंने कहीं और मकान बनाया पर उनका वह मकान जो पुराने धज का था, अब भी है, पर उसमें वह बात नहीं रही.

उसके आगे संताल आदिवासियों के घर थे और शरीफों, कठ-लीची (लीची का जंगली पेड़ जिसमें कंचों के आकार के छोटे फल होते थे) वगैरह के जंगल थे. जंगल अब कम हो गए हैं. गोयठे-उपले बेचने वाले संतालों ने कोई और धंधा अपना लिया है. उसके आगे धान के खेत हुआ करते थे, जिनके बीच में ऊंची मेड़ थी. चौड़ी भी. बाईं तरफ एक और तालाब, जिससे मेरे एक मित्र प्रशांत का एक मजेदार वाकया भी जुड़ा है. 


रेल से मधुपुर घुसते समय पात्रो (पतरो) नदी के पास का विहंगम दृश्य फोटोः मंजीत ठाकुर


प्रशांत का मकान बन रहा था. और शाम को उसके अधबने मकान को देखकर वापसी में जब आसमान में चांद उग ही रहा था और अंधेरा हो चुका था, प्रशांत को तेज हाजत आ गई. (पाखाना लग गया)

गरमियों के दिन थे और तालाब में चांद की परछाईं देखकर प्रशांत समझे कि तालाब में पर्यापत् पानी मौजूद है. लेकिन जब वह शंका निवारण के बाद धुलाई के लिए आए, तो सिर्फ कीचड़-ही-कीचड़ था. बाद में हमने भौतिकी में पढ़ा कि पानी की पतली परत भी एक फिल्म की तरह काम करती है और प्रकाश को परावर्तित कर सकती है, जबकि उतने पानी में शौचक्रिया तो खैर क्या ही होगी, हाथ भी गीला नहीं हुआ था. बाद में झाड़ियों के पत्तों से काम चलाया गया, जो बाद में प्रशांत ने बताया, बेहद दर्दनाक था.

अस्तु, वह तालाब भर दिया गया है. एक गड्ढा जैसा है, लेकिन उसमें पड़ोसी लोग कूड़ा डालते हैं. असंख्य मकान उग आए हैं उस तालाब के चारों तरफ. पहले जो इलाका पेड़ों, तालाबों से अनिंद्य खूबसूरती का वायस था, अब ईंट-गारों के मकानों के बोझ से दब गया है.

पहले वहां ताड़ के पेड़ों के पीछे सूरज छिपता था. पर अब वो बात नहीं रही.

कोई साढ़े दस बजे सुबह में हम दोनों भाई पहले अपने एक पारिवारिक घनिष्ठ ललित भैया के यहां गए थे. पर उनके यहां ठंडा इत्यादि ठेलने के बाद मैं प्रो. सुमन लता के यहां गया.

हम सभी उनको मौसी कहते हैं. मां की मुंहबोली बहन हैं. लेकिन वहां गया तो एक सुखद आश्चर्य हुआ. मेरे बचपन का दोस्त पीयूष का मुस्कुराता चेहरा दिखा. संभवतया 1997-98 के बाद उससे पहली बार मुलाकात हुई थी.

बता दें कि पीयूष सौरभ लखनऊ कार्ट ऐंड क्राफ्ट कॉलेज से ललित कला (फाईन आर्ट) में स्नातक और परा-स्नातक हैं. कैनवस पर उसकी कूची ऐसे चलती है जैसे इंद्रधनुष बिखेर दी हो.

बढ़ी हुई दाढ़ी और सफेद बालों के साथ पीयूष थोड़ा बीमार लग रहा था. पर ऊर्जा वैसी ही. वही सृजनात्मकता. वही मुस्कुराहट. वह हंसता है तो गालों में डिंपल पड़ते हैं उसके.

मैं वहां उसके यहां चाय-मिठाई के बाद चलने को हुआ तो मैंने इसरार किया कि शाम को गांधी चौक पर मिलने से पहले शेविंग भी कर ले, और बाल में डाइ भी.

फिर हम शाम को गांधी चौक पर मिले.

वहां से किस्सा, कैसे और कहां गया, वह कल बताएँगे.

Monday, May 28, 2018

क्या मधुपुर बेतहाशा भागने से पहले थोड़ा सोचेगा?

मधुपुर डायरीः पहला दिन

मधुपुर में जब उतरा जो आदतन पूर्वा एक्सप्रेस कोई 4 घंटे लेट हो चुकी थी. बाहर प्लेटफॉरम पर बड़े भैया खड़े थे. हम लोग बाहर निकले तो मधुपुर पहले से अधिक साफ-सुथरा था, स्टेशन पर पान के पीक मौजूद तो थे, लेकिन पहले की तरह हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं करा रहे थे. गरमी काफी ज्यादा थी और स्टेशन के बाहर निकलते ही हम जिस तरह हमेशा चाय पिया करते, वह करने की हिम्मत नहीं हुई. 

मधुपुर लाओपाला पार्क में सेल्फी, साथ हैं भैया, रितुराज और अभिषेक


स्टेशन में कुछ अच्छे बदलाव दिख रहे थे. स्टेशन के अहाते के बीच मे लोहे की पटरी से बना गोलंबर जिसमें पहले गुलमोहर के पेड़ हुआ करते थे, अब कट गए थे और उसमें बढ़िया फूल-पत्तियां लगाई जा चुकी थीं.
 
शाम को हम तीन लोग, यानी मैं, मेरे मंझले भैया रतन ठाकुर, भतीजे रितुराज और अभिषेक बाहर की हवा लेने निकले. हमारे पड़ोस के मुहल्ले में केलाबागान में नया मंदिर बन रहा था. शहीद निर्मल महतो चौक यानी ग्लास फैक्ट्री मोड़ पर भी सब कुछ यथावत् था. वहां से हमलोग पहले के लाओपाला पार्क में घुस गए थे.

मधुपुर का लाओपाला पार्क अब अव्यवस्था का शिकार है. फोटोः मंजीत ठाकुर


हमारे ज़माने में यह पार्क शहर भर के लोग लुच्चों, उचक्कों, लफाड़ियों का अड्डा होता था, हालांकि ला-ओपाला ने इसे बहुत करीने से सजाया था. खैर, जिन लड़कों को अपने एकतरफा या दोतरफा प्यार का चेहरा देखना नसीब नहीं होता था वह यहां आकर दर्शन लाभ लिया करते थे.

लेकिन आज यह बेहद छोटा सा पार्क उपेक्षा का शिकार है.

मधुपुर के इस पार्क में कभी जमघट लगता था युवाओं का. फोटोः मंजीत ठाकुर

हम तीनों फिर भगत सिंह चौक होते हुए मधुपुर में बन रहे फ्लाईओवर देखते हुए (जी हां, फ्लाई ओवर्स पर अब सिर्फ बड़े शहरों का हक नहीं. मधुपुर जैसे छोटे शहर भी फ्लाईओवरों के चक्कर में हैं) गांधी चौक पर गए. गांधी चौक का नजारा भी बदला हुआ था. साफ-सफाई थी. न कहीं मिट्टी के कुल्हड़ों का ढेर था न कूड़ा था. जगह-जगह कूड़ेदान लगे थे. 
पंचमंदिर के पास लगे कूड़ेदान और पृष्ठभूमि में गोयठे फोटोः मंजीत ठाकुर


इतनी सफाई! वाकई प्रशासन इस मामले में दुरुस्त हुआ था. पर इसे बनाकर रखने की जिम्मेदारी तो सिर्फ और सिर्फ मधुपुर वासियों की ही है. मधुपुर के सामने यहां से दो रास्ते जाते हैं, पहलाः यहां से वह विकास की अंधी दौड़ में सामिल होकर कंक्रीट के जंगल में बदल सकता है. दूसरा, यहां से वह अपनी हरी-भरी विरासत, हरियाली, नदियों, झरनों को बचाते हुए देश भर के लिए मिसाल बन सकता है.

खूबसूरत लक्ष्मी-नारायण मंदिर फोटोः मंजीत ठाकुर


बहरहाल, गांधी चौक पर हमारे स्कूली मित्र अटल चौरसिया आने वाले थे और साथ में विजय सिंह और प्रमोद झा भी. कामयाब कारोबारी बन चुके अटल जी अपनी लंबी कार के साथ आए थे. विजय और प्रमोद ने अपनी बाइक गांधी चौक पर ही पार्क कर दीं और हम सब नीमतल्ला भेड़वा की तरफ निकल पडे. हल्की चांदनी में खुली हवा में मन कर रहा था खूब खींच-खींचकर सांस लूं और ऑक्सीजन अपने फेंफड़ों में भर लूं. गोकि दिल्ली में प्रदूषण ने फेफड़ो में कालिख भर दी होगी.

मधुपुर में गांधी चौक ने अपनी रंगत बदल दी है. पहले चाय के ठेलों से रौनक ज्यादा होती थी. फोटोः मंजीत ठाकुर


गांधी चौक पहले हमारा गजब का अड्डा हुआ करता था. जहां, कोने पर लिट्टी, मुड़ी-घुघनी, सिंघाड़े (समोसे) खाए जाते थे. चाय की अनेकानेक ठेलियां होती थीं, जिनमें एक रूपए की चाय पी जा सकती थी. कोल्हा डोसा बनाता था और छोटू की चाट मशहूर थी. लेकिन अभी वहां यह सब नहीं है. गांधी चौक पर रोजन ठाकुर के राजबोग और जिलेबियों का स्वाद तो नहीं ले पाया पर बर्दवान मिष्टान्न भंडार में राबड़ी चाभते वक्त पता चल गया कि क्यों इस दुकान ने कृष्णा स्वीट्स की रंगत फीकी कर दी है.

बहरहाल, इन्ही विषय़ों पर विजय, प्रमोद और अटल के साथ चर्चा में वक्त पंछी की तरह उड़ गया. फिर रात घिरने लगी थी और हम सब अपने घोंसलों में वापस लौट पड़े थे. 

अगले दिन का किस्सा कल.

Wednesday, May 9, 2018

विकास की दौड़ में मिथिला को नेहरू ने दिया था उपेक्षा का दंश

सन 2008 में जब कोसी में बाढ़ की वजह से मिथिला का एक बहुत बड़ा हिस्सा तबाह हुआ था, उस समय द टेलिग्राफ के स्वनामधन्य पत्रकार विजय देव झा ने कोशी पर एक ब्लॉग लिखा था कि कैसे स्वतंत्रता से पूर्व और यहां तक की बाद में दिल्ली और बिहार की सरकार ने मिथिला को कोसी की तबाही से जूझने के लिए बेसहारा छोड़ दिया था. इस आलेख पर पत्रकार हितेंद्र गुप्ता की नजर पड़ी और उन्होंने अपने ब्लॉग हेलो मिथिला में इसे छापा था.

इस लेख में घोघरडीहा के सरौती गाँव के कवि मोहम्मद अब्दुल रहमान की चर्चा की थी. इनके बारे में जानकारी विजयदेव झा को उनके बाबूजी डॉ रामदेव झा ने दी थी.

स्वतंत्रता से कुछ साल पहले कोशी की विभीषिका पर मोहम्मद अब्दुल रहमान ने काव्य रचना की थी जिसका नाम था "अकाल का हाहाकार उर्फ कोशी की तूफान".  रहमान जी ट्रेन में अपनी किताबें बेचते थे इस किताब पर अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था क्योंकि इन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से अंग्रेज़ी सरकार की पोल खोल दी थी. यह पुस्तिका कोशी की विभीषिका पर आधारित थी.

उसी समय श्री दिनेश मिश्रा कोशी पर एक पुस्तक लिख रहे थे इस आलेख पर उनकी नजर पड़ी उन्होंने विजय से  यह जानने के लिए संपर्क किया कि क्या मोहम्मद रहमान की वह किताब वह कहीं से मिल सकती है. 
आकाल का हाहाकार उर्फ कोशी की तूफान, साभारः विजयदेव झा


8 साल बाद वह दुर्लभ पुस्तिका विजयदेव जी को बाबूजी के संकलन से मिली. इसमें से एक कविता इस प्रकार से थीः

"दौड़ू दौड़ू हो सरकार

प्रजा सब दहाइए भैया कोशी के मझधार।।

चारू कात से कोशी माता घेरलक घर वो द्वार।

भागै के नै रास्ता छोड़लक काने काश्तकार।।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाते हैं जिन्होंने पूरे देश में कल कारखाने और बांध का जाल बिछाया. मिथिला के बच्चे भी पाठ्यक्रम में यही पढ़ा करते हैं. लेकिन आधुनिक भारत के निर्माता का संसाधन और संकल्प मिथिला तक आते आते समाप्त हो चुका था जिसकी कई वजहें थी.

देश की आजादी के तुरंत बाद पंजाब में अकाल का साया मंडराने लगा और उसी समय विशाल भाखड़ा नांगल डैम का निर्माण हुआ था.

मिथिला का कोशी की विभीषिका से कोई नया रिश्ता नहीं है. सरकार के पास भाखड़ा नांगल डैम बनाने के लिए पैसे तो थे लेकिन जब कोशी पर बांध बनाने की बात आई तो सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पैसे नहीं है इसलिए लोग श्रमदान कर बांध बना लें.

उस समय मिथिला राज्य के लिए आंदोलन करने वालों में अग्रणी मिथिला विभूति डॉ. लक्ष्मण झा ने चर्चा की थी कि ब्रिटिश सरकार ने जाते-जाते नेशनल डिजास्टर फंड के अंतर्गत कोशी पर बांध बनाने के लिए पैसे दिए थे जिसे नेहरू ने भाखड़ा नांगल डैम बनाने केेेे लिये डाइवर्ट कर दिया. लोगों में भारी आक्रोश था. इस काम के लिए पंडित नेहरू ने अपने वित्त मंत्री गुलजारी लाल नंदा को लगाया. उस समय अखबारोंं में गुलजारीलाल नंदा केे कई बयान छपे थे जिसमें उन्होंने मिथिला के लोगों से अपील की थी कि वे श्रमदान के माध्यम से बांध बनाएं क्योंकि सरकार के पास इतने पैसे नहीं हैं.

1954 में बांध बनाने के लिए ब्रह्मचारी श्री हरि नारायण के नेतृत्व में भारत सेवक समाज की स्थापना हुई और कोशी के कुछ हिस्सों पर लोगों ने खुद ही श्रमदान कर बांध बनाया था.

श्रमदान की शुरुआत मिथिला के 150 पंडितों के द्वारा हुई जिन्होंने वैदिक मंत्र और कोशी महात्म्य आदि के साथ विधिवत पूजा-पाठ करने के बाद कुदाल और फावड़ा उठाया. उस समय मिथिला के गणमान्य साहित्यकार और बुद्धिजीवियों ने लोगों की सहभागिता के लिए जनजागरण अभियान चलाया था.

स्कूली बच्चे, कॉलेज के छात्र, युवा, बुजुर्ग सभी बांध बनाने के अभियान में जुटे थे. कोशी क्षेत्र में कई जगह श्रमदान शिविर बने. मिथिला के विभिन्न कोने से लोग बांध बनानेेे के लिए पहुंच रहेे थे और कुछ एक वर्षों के अथक मेहनत के बाद भुतहा, कुनौली, महादेव मठ, डुमरा आदि कोशी के प्रवाह क्षेत्र में बांध बनकर तैयार हुआ.

लेकिन यह मिथिला के लोगों के लिए एक कटु अनुभव था कि आजादी से पूर्व ब्रिटिश सरकार ने मिथिला को अविकसित और अकिंचन बनाकर रखा था और आजादी के बाद भी अपनी सरकार मिथिला भूभाग के साथ सौतेला व्यवहार करती है. ललितेश्वर मल्लिक ने उस समय कोशी पर एक विशद पुस्तक प्रकाशित किया था. बाद में मिथिला के लोगों ने नेहरूजी को सड़ा आम उपहार में भेजा था.

प्रकृति के साथ साथ सरकारों ने भी मिथिला को क्षत-विक्षत और विभाजित करने में कोई कोताही नहीं की. एक योजना के तहत मिथिला के कोशी प्रक्षेत्र को शेष मिथिला भूमि से अलग-थलग रखा गया. कोशी हर एक साल अपना रास्ता बदलती रही और वह अपना रास्ता बदलते-बदलते पूर्णिया से दरभंगा तक पहुंच गई.

15 जनवरी, 1934 के भूकंप के बाद कोशी दरभंगा की तरफ आ गई. इस भूकंप ने मिथिला के रेल और सड़क यातायात को बुरी तरह से प्रभावित किया. निर्मली-सुपौल रेल लाइन क्षतिग्रस्त हो गयी. इस रेल लाइन को कभी भी दुरुस्त नहीं किया गया. इसका यातायात पर ऐसा असर पड़ा कि दरभंगा से सहरसा की दूरी तय करने में लोगों को 24 घंटे का समय लगताा था. बाद में तत्कालीन रेलवे मंत्री ललित नारायण मिश्र ने जानकी एक्सप्रेस चलाई जो लंबी परिक्रमा करने के बाद सहरसा पहुंचती थी, इसमें भी करीब 16 घंटे का समय लगता था. लेकिन देखा जाए तो दरभंगा और सहरसा की दूरी महज घंटे ढाई घण्टे की है.

मिथिला क्षेत्र अभी भी औपनिवेशिक त्रासदी से बाहर नहीं निकल पाया है. ब्रिटिश सरकार से लेकर स्वतंत्र भारत की सरकारों ने मिथिला को खंड-खंड में बांटकर रखने की पॉलिसी पर ही काम किया. सरकार योजनाबद्ध तरीके से मिथिला को धीरे-धीरे टुकड़ों में बांट रही है. मिथिला की जगह मिथिलांचल, पूर्णिया के इलाकों को सीमांचल भागलपुर के इलाकों को अंगिका मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और अब दरभंगा को भी बज्जिका क्षेत्र कहकर संबोधित किया जा रहा है जबकि ये सभी मिथिला के अखंड भाग हैं. 

कोसी क्षेत्र को मिथिला से अलग-थलग करने के पीछे भी यही राजनीति थी कि कालक्रम में इसे शेष मिथिला से अलग कोशिकांचल के रुप में स्थापित किया जाए. मिथिला के विभाजन के दर्द को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने समझा. कोसी महासेतु का निर्माण हुआ, सड़क मार्ग बने और रेल लाइन पुनर्निर्माण को सहमति दी गई.

यद्यपि मिथिला के लोगों ने अटल बिहारी वाजपेयी को लोकसभा चुनाव में मिथिला से ऐसा रिटर्न गिफ्ट दिया कि भविष्य में कभी भी किसी भलेमानस राजनेता की हिम्मत नहीं होगी कि वह मिथिला के हित के लिए कुछ करे.

मोहम्मद अब्दुल रहमान के पीछे अंग्रेज सरकार बुरी तरह पड़ गई थी. बाद में उन्होंने पाचक बेचना शुरू कर दिया लेकिन वह लोगों को कोशी की विभीषिका की कहानी बताते रहे. 1961 में विजयदेव झा के बाबूजी ने मिथिला मिहिर में रहमान पर एक विस्तृत लेख लिखा था. 

राजनीतिक मकड़जाल और उदासीनता के बीच मैथिल समाज मेमोरी लॉस के उस उच्चतम स्टेज तक पहुँच चुका है जहाँ उसे कुछ भी याद नहीं.

(यह लेख मूल रूप से विजयदेव झा के फेसबुक पेज से लिया गया है और उसे थोड़ा संपादित भर किया गया है)

...और क़यामत नहीं ही आई!

क़यामत भी नेताओं और माशूकाओं की तरह धोखेबाज़ है. आते-आते नहीं आती है. वायदा करती है और नहीं आती है.

कई दिनों से टीवी वाले चीख रहे थे, पाकिस्तान से धूल भरी आंधी से, यह उड़ जाएगा. तूफानी बारिश से वह बह जाएगा. मौसम विभाग ने स्कूल बंद करवा दिए, लोगों से घरों में दुबके रहने को कहा. कहा, किसी छोटे पेड़ के नीचे न खड़े हों. टीन-टप्पर का सहारा न लें. मजबूतों की शरण में जाएं. भाई, यह कर्नाटक चुनाव नहीं है कि हम किसी बड़ी पार्टी की ही शरण लें और टीन-टप्पर और पेड़ों जैसी छोटी जेबी पार्टियों से दूर रहें.

मौसम विभाग ने कहा, यह आंधी दूर तलक जाएगी. हम धड़कते दिल से घर से दफ्तर के लिए निकले थे. धड़कते दिल से तेज हवा और धूल का इंतजार कर रहे थे. धड़कते दिल से आसमान में चमकती हुई तेज गरजों और बिजली का इंतजार कर रहे थे, जिसको सुनते ही मचकती हुई प्रेमिका प्रेमियों से लिपट जाती है. और फिर पार्क में दो फूल आपस में टकरा जाते हैं.

ऐसे ही कई फिल्मों में वाक़या होता है कि ओलों वाली बारिश में लड़की भींग जाती है. बेसुध हो जाती है. उसके शरीर को गरमी की जरूरत होती है. कोई उपाय नहीं. कहीं न डॉक्टर न कुछ और मदद. किसी खंडहर में आसरा लिया नायक उसको अपनी देह की गरमी देता है. नतीजतन, कुछ दिनों बाद लड़की गर्भवती हो जाती है. कुछ कार्य-कारण संबंध सरीखा मामला दिखने लगता है. मुख्तसर यह कि हम डरे हुए थे और बड़े एंडवेंचरस से विचार आ रहे थे.

हम भी बड़ी शिद्दत से क़यामत का इंतज़ार कर रहे थे. हम बहुत नजदीक से देखना चाहते थे कि क़यामत आखिर होती कैसी है. सुना था क़यामत के रोज़ क़ब्र से मुरदे उठ खड़े होंगे और सबके पाप-पुण्य का हिसाब-किताब होना है.

फिर मन में बड़े गहन विचार उत्पन्न हुए आखिर क़यामत है क्या... लोगों ने समझाया कि इस के बाद धरती पर सारे लोग खत्म हो जाएंगे. धरती लोगों के रहने लायक नहीं रह जाएगी. एक सवाल अपने आप सेः धरती अभी लोगों के रहने लायक है क्या?

कुछ लोग अपनी महबूबा को क़यामत सरीखा मानते हैं, कुछ अपनी पत्नी को कहते तो शरीक-ए-हयात हैं लेकिन मानते क़यामत ही हैं. पहले पत्नियों वाली बात. बीवी को क़यामत ने मानने वालों के लिए, श्रीमतीजी का जन्मदिन, उनके भाई का जन्मदिन, अपनी शादी की सालगिरह की तारीख़ भूलकर देखिए (यद्यपि हमारा विचार है कि यह तारीख़ भूलने योग्य ही हुआ करती है.) आपके लिए वही तारीख़ क़यामत सरीखी हो जाएगी. उस दिन कायदे से क़यामत बरपा होगा आप पर.

आपकी महबूबा ने फोन पर आपसे कहा, फलां दिन मिलते हैं. किस जगह, किस वक़्त, ये बाद में बताने का वायदा. फिर आप तैयार होना शुरू करते हैं...सिगडी़ पर दिल सेंक रहा हूं, तेरा रास्ता देख रहा हूं, गुनगुनाते हुए...आपकी क़यामत सरीखी महबूबा, जिनकी आंखों, भौंहों, पलकों, अलकों (बाल की लटों) बालों, गालों, गाल पर के तिल, होठों, मुस्कुराहट, गरदन, ठोड़ी, कलाइयों, कलाई के ऊपर के एक और तिल, कमर सबको एक-एक कर आप पहले ही क़यामत बता चुके हैं.

सोमवार को आपने उनके चलने को क़यामत कहा था. मंगलवार को उनकी मुस्कुराहट से क़यामत आई थी. गुरुवार को उऩकी आवाज़ क़यामत सरीखी थी. शुक्रवार को वो क़यामत का पूरा पैकेज लग रही थी. मतलब सर से पैर तक क़यामत ही क़यामत. बहरहाल, आपने तय किया था कि इसी क़यामत से मिलकर क़यामत की घटना को सत्य ही घटित करना...लेकिन असली क़यामत की बारी तो अब आती है.

आप टापते रह जाते हैं. आपके जिगर पर छुरी चल जाती है. लड़को का जिगर प्रायः छुरियों के नीचे ही पड़ा रहता है. आपकी उनने कुछ किया या न किया, आपकी तरफ देखा, नहीं देखा, आपसे समय पूछा, हंसी, नहीं हंसी, आज उनने जीन्स पहनी है, आज उनने सलवार सूट पहना है, आज उन्होंने आपकी तरफ देखा, आज उनने आपकी तरफ देखकर थूका नहीं...आपको वह क़यामत लगेगी. आपके दिल पर छुरियां चल जाएगी.

बहरहाल, ये तो बहुत निजी क़िस्म की क़यामतें हैं. जहां प्रेमिकाएं अपने प्रेमी से फायरब्रिगेड मंगवाने की इल्तिजा करती हों, जहां प्रेमी को प्रेमिका का प्यार हुक्काबार लगे, या तस्वीर को फेविकोल से चिपका लिया जाए वहां बाकी की क़यामतों पर क्या नज़र जाएगी.

पिछले कुछ दिनों से क़यामत से सामना हो रहा है.

जरा उनसे पूछिए जो इन दिनों रेल से उर्दू वाला सफ़र करते हुए अंग्रेजी में भी सफर कर रहे हैं. जिन्ना साहेब के फोटो पर क़यामत बरपा हो रहा है. अभी खबर मिली कि अकबर रोड पर किसी ने महाराणा प्रताप रोड लिख दिया. यह बात और है कि पोस्टर लिखने वाला रोड का हिज्जे नहीं लिख पाया. पर सड़क का नाम अकबर रोड हो या तॉल्सतॉय रोड, महाराणा प्रताप रोड हो या शिवाजी रोड, मर्सिडीज से चलने वाले उस पर उसी तरह स्वैग से चलेंगे, चप्पल घिसने वाले घिसते ही रहेंगे. पैदल.

इन्ना-जिन्ना के चक्कर में हमारी फौज पर गर्व करने वाली सरकार ने नई योजनाओं के लिए मांगे गए बजट में से साढ़े 15 हजार करोड़ कम आवंटन दिए. फौज फटेहाल है. न नए हथियार हैं. पेंशन का बोझ है सो अलग. लेकिन 56 इंच सीने वाली सरकार फौज की झूठी तारीफ तो करता है, बस पैसे नहीं देती. समझने वाले चाहें तो इसे क़यामत समझ सकते हैं. ग़ोकि एक तरफ चिर-शत्रु पाकिस्तान और मौकापरस्त चीन ने हमला कर दिया तो जिन्ना की तस्वीर लेकर खड़े होने से भी पाकिस्तान नहीं मानने वाला.

इधर, राहुल गांधी बोलते भए कि अगर कांग्रेस को बहुमत आ गया (चिचा, यही तो शाश्वत प्रश्न है) तो वह प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं. राहुल भिया, यह सवाल क़यामत भरा ही है. मैं तो कहता हूं अगर मेरी पार्टी को बहुमत आ गया तो हम भी पीएम बन के ही मानेंगे.

वैसे प्रधानमंत्री भी कमाल हैं, राहुल को ललकारा उन्होंने की बिना कागज 15 मिनट बोल के दिखाएं (क़यामत यह कि इस मामले में राहुल की मां को घसीट लिया) लेकिन राहुल बाबा 15 मिनट बोल देते तो क़सम कलकत्ते की क़यामत उसी रोज़ आ जाती....

क़यामत भी नेताओ और माशूकाओँ की तरह धोखेबाज़ है. मौसम विभाग सांत्वना दे रहा है कि रुको बेटा, तूफान अगले तीन घंटे में दिल्ली में आएगा. मौसम बदलेगा. हम सूखे से त्रस्त किसान की तरह आसमान निहारते हैं. कयामत है आते, आते नहीं आती है. वायदा करती है और नहीं आती है.

Thursday, May 3, 2018

महाभारत का युद्ध असल में स्पैक्ट्रम हासिल करने की लड़ाई थी!

ठर्रा विद ठाकुर

गुड्डू भैया को आज अलग धज में देखकर मैं चौंक गया. क्या भैया, आज यह पूरे माथे पर त्रिपुंड और यह रामनामी चादर...क्या हो गया है आपको? और इस कमंडली में क्या है?

गुड्डू ने कमंडली में झांका और मुस्कुराते हुए कहाः कमंडली में तो वही है जो होना चाहिए. पूरे अद्धे में गंगाजल मिलाकर शुद्धोदक बना लिया है.

यह परिवर्तन कैसे भैया...

अरे, देख नहीं रहे हो. वामपंथ के पंथ पर चलने वाले राज्य त्रिपुरा के दक्षिणपंथी मुख्यमंत्री ने क्या कहा सुना तुमने? बिप्लव देब का बयान एक दम विप्लवी है. कह रहे हैं कि महाभारत काल में भी इंटरनेट था. उन्होंने कहा कि देश में महाभारत युग में भी तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध थीं, जिनमें इंटरनेट और सैटेलाइट भी शामिल थे. यह वह देश है, जिसमें महाभारत के दौरान संजय ने हस्तिनापुर में बैठकर धृतराष्ट्र को बताया था कि कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध में क्या हो रहा है. संजय इतनी दूर रहकर आंख से कैसे देख सकते हैं, सो, इसका मतलब है कि उस समय भी तकनीक, इंटरनेट और सैटेलाइट था.

सच क्या? मैं हैरत में पड़ गया. तो फिर उसके केबल किधर डले थे? मैंने सहज जिज्ञासा में मजाक कर दिया. गुड्डू भैया बोल पड़े, केबल वगैरह नहीं भी हो सकते हैं. लेकिन मेरी जिज्ञासा इस बात में अधिक है कि कौन कंपनी उस वक्त फ्री डेटा मुहैया करा रही थीं? सेवा 4जी थी या 3जी. स्पैक्ट्रम बंटवारे का ही झंझट कौरवों-पांडवों में था या कुछ और भी. नेट की स्पीड कैसे मापते थे?

गुड्डू भैया रुके नहीं. सुनो तो सही. बयानवीर ने और भी बहुत कुछ कहा है. बिप्लब के मुताबिक, डायना हेडन इंडियन ब्यूटी नहीं हैं. डायना हेडन की जीत फिक्स थी. उन्होंने कहा कि डायना हेडन भारतीय महिलाओं की सुंदरता की नुमाइंदगी नहीं करतीं. ऐश्वर्या राय करती हैं.

मैंने गुड्डू को रोकाः भैया, उन्होंने तो अपने बय़ान पर खेद जताया है बाद में.

लेकिन ठाकुर, वह रुके कहां हैं. बेरोजगारों को दी पान की दुकान खोलने और गाय पालने की नसीहत दे डाली और बाद में कहा कि

मैकेनिकल नहीं सिविल इंजीनियर्स दें सिविल सर्विसेज की परीक्षा बाकियों को समाज निर्माण में लगना चाहिए.

मुझसे रहा नहीं गया, भैया ये भाजपा के नेता अक्सर अपने बयान और अजीबो-गरीब वैज्ञानिक तर्कों को लेकर विवादों में रहते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई मंत्री सार्वजनिक मंचों पर ऐसी बातें कह चुके हैं कि जिनके कारण उनको हंसी का पात्र बनना पड़ा है.

मुझे हंसी तो आ रही थी कि लेकिन क्या पता ऐसा ही हुआ हो. आखिर मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे नेता को तरी-घटी का ज्यादा पता होगा न किसी आम आदमी की तुलना में?

गुड्डू के माथे से पसीना बह निकला और उनके त्रिपुंड का कुछ हिस्सा धुल सा गया, हथेली से उसे पोंछते हुए बोले, ये तो सिर्फ सीएम हैं. पीएम की मानो तो जलवायु परिवर्तन कुछ नहीं होता है. बढती उम्र के कारण लगती है ठंड. और यह बात नरेंद्र मोदी जी ने 5 सितंबर, 2014 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए देश भर के स्कूली बच्चों से सवाल-जवाब सत्र में कहा था. असम के एक छात्र ने पर्यावरण में आ रहे बदलावों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की और प्रधानंत्री से पूछा कि उनकी सरकार इसे रोकने के लिए क्या कदम उठा रही है. इस पर मोदी ने कहा कि हमारे बुजुर्ग हमेशा यह शिकायत करते हैं कि इस बार पिछले साल से अधिक ठंड है. असल में यह उनकी बढ़ती उम्र और सहने की कम होती शक्ति की वजह से उन्हें ज्यादा ठंड महसूस होती है.

इतना ही नहीं 2014 में एक निजी अस्पताल का उद्घाटन करते हुए तुम्हारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि, 'विश्व को प्लास्टिक सर्जरी का कौशल भारत की देन है. दुनिया में सबसे पहले गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी हुई थी, जब उनके सिर की जगह हाथी का सिर लगा दिया गया था.

गुड्डू भैया अभी चुप होने के मूड में नहीं थे.

तुम्हारे मंत्रियों ने तो चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत तक को गलत साबित कर दिया. वह भी ऐसे मंत्री ने जो पहले आईपीएस अधिकारी रह चुके हैं. केंद्र में मंत्री सत्यपाल सिंह एक कार्यक्रम के दौरान यह दावा करते नजर आए थे कि मानव के क्रमिक विकास का चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत ‘वैज्ञानिक रूप से गलत है’ और स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में इसे बदलने की जरूरत है.

बाप रे, मेरे मुंह से निकल ही गया.

गुड्डू भैया ने कमंडल से शुद्धोदक का लंबा घूंट भरा और कहाः आगे सुनो. राजस्थान के शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर ही दावा जता दिया था. उन्होंने कहा था कि, 'हम सब ने पढ़ा है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत न्यूटन ने दिया था, लेकिन गहराई में जानने पर पता चलेगा कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत न्यूटन से एक हजार वर्ष पूर्व ब्रह्मगुप्त द्वितीय ने दिया था.

बेचारे स्टीफन हॉकिंग कुछ दिन पहले गुजर गए. लेकिन भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने दावा किया था कि महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग भारतीय वेदों को अल्बर्ट आइंस्टाइन की महान थिअरी और सिद्धांत E=mc2 से काफी बेहतर मानते थे. हालांकि, जब हर्षवर्धन से इस दावे का प्रमाण मांगा गया, तो उन्होंने कहा, 'आप लोग सोर्स ढूंढें. इस बात का रेकॉर्ड है कि स्टीफन ने कहा था कि वेदों में इंस्टाइन के दिए फॉर्म्युले से बेहतर फॉर्म्युला है.

मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने आइआइटी के छात्रों को कहा था कि पुष्पक विमान से ही दुनिया में विमान बनाने का आइडिया आया. उन्होंने कहा कि 'राइट ब्रदर्स' से पहले ही एक भारतीय शिवकर बाबुजी तलपड़े ने एयरप्लेन का आविष्कार कर दिया था. कहा जाता है कि तलपड़े ने वैदिक ग्रंथों से ही उन्हें सबसे पहले एअरक्राफ्ट का आइडिया दिया था. दावा किया जाता है कि तलपड़े ने साल 1895 में मुंबई के जुहू बीच पर भीड़ के सामने इसका प्रदर्शन भी किया था. वहां बड़ौदा के राजा भी मौजूद थे. एयरक्राफ्ट 1500 फीट की ऊंचाई पर गया था और वहां कुछ मिनट रुका.

गुड्डू भैया, आप मजाक में कुछ कह दें, लेकिन सीधे-सीधे खारिज तो मत कीजिए भारतीय ज्ञान-विज्ञान को. प्राचीन भारत का साहित्य बेहद विपुल और विविधतासंपन्न है. हमारी विरासत में धर्म, दर्शन, भाषा, व्याकरण के साथ ही गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, रसायन, धातुकर्म, सैन्य विज्ञान जैसे विषयों का भी उल्लेख है. मिसाल के तौर पर, वैदिक साहित्य शून्य के कांसेप्ट, बीजगणित की तकनीकों तथा कलन-पद्धति, वर्गमूल, घनमूल के कांसेप्ट से भरा हुआ है. ऋग्वेद (2000 ईसापूर्व) में खगोलविज्ञान का उल्लेख है. 600 ईसापूर्व के भारतीय दार्शनिक कणाद ने परमाणु एवं आपेक्षिकता के सिद्धान्त का स्पष्ट उल्लेख किया है. इत्र का आसवन, गन्दकयुक्त द्रव, वर्ण और रंजकों (डाई और पिगमेंट्स) का निर्माण, शर्करा का निर्माण हमारी विरासत में रहा है. 800 ईसापूर्व में भारत में सुश्रुत और चरक ने आयुर्विज्ञान एवं शल्यकर्म पर पूरा ग्रंथ लिखा है.

सामवेद में सुरों का पूरा उल्लेख है. यानी वैदिक काल में ही ध्वनि और ध्वनिकी का सूक्ष्म अध्ययन शुरू हो चुका था. ग्रीक इतिहासकारों ने भारत में चौथी शताब्दी ईसापूर्व में ही धातुओं की स्मेल्टिंग का जिक्र किया है. हम लोहा बनाते थे भैया.

मुएनजोदड़ो एवं हड़प्पा से प्राप्त नगरीय सभयता उस समय में उन्नत सिविल इंजीनियरी एवं आर्किटेक्चर के अस्तित्व को प्रमाणित करती है. मैंने अपनी बात पूरी की तो गुड्डू मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देख रहे थे.

अच्छा हुआ जो तुमने परमाणु विज्ञान का जिक्र करते हुए एटम बम और ब्रह्मास्त्र को हाइड्रोजन बम नहीं बताया. पुष्पक विमान को हेलीकॉप्टर न बता दिया. तर्क वाली बात करोगे तो दुनिया सहमत होगी, लेकिन उन्हीं ज्ञान-विज्ञान की चीजों को धर्म से जोड़कर मूर्खतापूर्ण बयान दोगे तो सोशल मीडिया पर खिंचाई होगी ही.

मैं हैरत से गुड्डू का बात सुन रहा था. गुड्डू कुछ पलों के लिए रुके और बोले, देखो बे पत्रकार, ज्ञान की चार अवस्थाओं में से तीसरा और चौथा बड़ा खतरनाक होता है. तीसरा है, आप नहीं जानते हैं कि आप क्या जानते हैं और चौथा होता है आप नहीं जानते हैं कि आप क्या जानते हैं.

ददा, मैं प्रणाम की मुद्रा में झुककर बोलाः जाते-जाते जरा ज्ञान की पहली और दूसरी अवस्थाएं भी उचारिए.

गुड्डू मुस्कुरा उठेः शाम को चखने के साथ हवेली पर पधारो. रही बात बिल्लवी मुख्यमंत्री की, तो सुना है इस बयानवीर को दिल्ली से बुलावा आया है. पीएम से मिलकर शायद उनके बयान कम हो जाएं या कम से कम अनाप-शनाप तो न आएं. वह खीसें निपोरते हुए चल दिए और जाते-जाते मुनीश्वरलाल चिंतामणि की कविता गुनगुनाते गएः

मेरे भाई भोलेराम, तुम मूर्ख बने रहना,

कल्याण इसी में है तुम्हारा.

सच मानो बड़ी मस्ती है मूर्खता में,

कुछ रखा नहीं है विद्वता में.



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