Saturday, June 13, 2009

सिनेमा से पहली मुलाकात



अपने स्कूली दिनों में कायदे से बेवकूफ़ ही था। पढ़ने-लिखने से लेकर सामाजिक गतिविधियों तक में पिछली पांत का खिलाड़ी। क्रिकेट को छोड़ दें, तो बाकी किसी चीज़ में मेरी दिलचस्पी थी ही नहीं। बात तबकी है जब मैं महज सात-आठ साल का रहा होऊंगा।.. मेरे छोटे-से शहर मधुपुर में तब, दो ही सिनेमा हॉल थे, वैसे आज भी वही दो हैं।


लेकिन सिनेमा से पहली मुलाकात, याद नहीं कि कौन सी फिल्म थी वह- मम्मी के साथ हुई थी। मम्मी और कई पड़ोसिनें, मैटिनी शो में फिल्में देखने जाया करतीं। हम इतने छोटे रहे होंगे कि घर पर छोड़ा नहीं जा सकता होगा। तभी हमें मम्मी के साथ लगा दिया जाता होगा। बहनें भी साथ होतीं.. तो सिनेमा के बारे में जो पहली कच्ची याद है वह है हमारे शहर का मधुमिता सिनेमा..।


यह पहले रेलवे का यह गौदाम थी, थोड़ा बहुत नक्शा बदल कर इसे सिनेमा हॉल में तब्दील कर दिया था। ्ब इस हॉल को पुरनका हॉल कहा जाता है। महिलाओं के लिए बैठने का अलग बंदोबस्त था। आगे से काला पर्दा लटका रहता.. जो सिनेमा शुरु होने पर ही हटाया जाता। तो सिनेमा शुरु होने से पहले जो एँबियांस होता वह था औरतों के आपस में लड़ने, कचर-पचर करने, और बच्चों के रोने का समवेत स्वर।


लेडिज़ क्लास की गेटकीपर भी एक औरत ही थीं, मुझे याद है कुछ शशिकलानुमा थी। झगड़ालू, किसी से भी ना दबने वाली..। चूंकि हमारे मुह्ल्ले की औरतें प्रायः फिल्में देखनो को जाती तो सीट ठीक-ठाक मिल जाती। शोहदे भी उस वक्त कम ही हुआ करते होंगे, ( आखिरकार हम तब तक जवान जो नहीं हुए थे) तभी औरतों की भीड़ अच्छी हुआ करती थी।


बहरहाल, फिल्म के दौरान बच्चों की चिल्ल-पों, दूध की मांग, उल्टी और पैखाने के बीच हमारे अंदर सिनेमा के वायरस घर करते गए। हमने मम्मी के साथ जय बाबा अमरनाथ, धर्मकांटा, संपूर्ण रामायण, जय बजरंगबली, मदर इंडिया जैसी फिल्में देखी। रामायण की एक फिल्म में रावण के गरज कर - मैं लंकेश हूं कहने का अंदाज़ मुझे भा गया। और घर में अपने भाईयों और दोस्तों के बीच मैं खुद को लंकेश कहता था।

मेरे पुराने दोस्त और रिश्तेदार अब भी लंकेश कहते हैं। वैसे लंकेश का चरित्र अब भी मुझे मोहित करता है, और इसी चरित्र की तरह का दूसरा प्रभावी चरित्र मुझे मोगंबो का लगा। लेकिन तब तक मैं थोड़ा बड़ा हो गया था। और मानने लगा था कि अच्छी नायिकाओं का सात पाने के लिए अच्छा और मासूम दिखने वाला अनिल कपूर या गुस्सैल अमित बनना ज्यादा अहम है।

to be cont...

Thursday, June 11, 2009

वाम से दूर अवाम



इस बार के लोकसभा चुनाव के नतीजे किसी और सूबे में, किसी और पार्टी के लिए हैरत भरे रहे हों या नहीं, लेकिन पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के लिए नतीजे 'अप्रत्याशित' ही रहे। चुनाव परिणाम के दिन यानी 16 मई को अलीमुद्दीन स्ट्रीट यानी सीपीएम के कोलकाता दफ्तर पर सन्नाटा दोपहर से पहले ही पसर गया था।



मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य सुबह आठ बजे से पहले ही पार्टी ऑफिस आ चुके थे, नौ बजे तक ट्रेंड्स कुछ साफ होने लगे, लेकिन तबतक वहां से निकलते हुए मुहम्मद सलीम के चेहरे की चमक कम नहीं हुई थी। बहरहाल, ग्यारह बजे सुभाष चक्रवर्ती बाहर निकले और नतीजो में बगदलते ट्रेंड्स को 'अप्रत्याशित' बताकर अपना दामन छुड़ा लिया।


खैर, नतीजे तो अब जगजाहिर हो चुके हैं और वाम मोर्चा मात खा चुका था। 19 सीटों पर जीत हासिल करने वाली तृणमूल कांग्रेस नेता और बंगाल की शेरनी कही जाने वाली ममता बनर्जी अब तो रेल मंत्री भी बन चुकी हैं। लेकिन, यह उस वाम मोर्चे के लिए जोर का झटका साबित हुआ जो नंदीग्राम और सिंगूर को स्थानीय मुद्दे से ज्यादा कुछ मानने को तैयार ही नहीं था। दरअसल, 1977 के बाद से वाममोर्चे ने बंगाल में 14 चुनावों का सामना किया, लेकिन इतनी बड़ी चुनौती उसे कभी नहीं मिली थी।


परिसीमन के बाद कई चुनावी समीकरण भोथरे हो गए थे और चुनावी गणित की नई कंटूर रेखाएं खींच दी गईं थीं। लेकिन 2004 में सबसे बड़ी जीत और 2009 में सबसे बड़ी हार के बीच के कारणों पर वाम मोर्चा, खासकर सबसे नुकसान में रहा सीपीएम, ज़रुर चिंतन करना चाहेगा।


चुनाव में वाम मोर्चा ममता को विकास-विरोधी साबित करने में लगा रहा और खुद बिजली-पानी-सड़क के मुददे को लेकर जनता तक गया। लेकिन बंगाल के गांवों में भी, जहां वाम मोर्चे की गहरी पैठ रही है, वोटर यह पूछने में नहीं हिचका कि पिछले 32 साल से यही मुद्दे चुनाव में क्यों आते रहे हैं। हालांकि, पूछने की यह प्रक्रिया कई वजहो से siidhee उम्मीदवार की बजाय वोटिंग के दिन अधिक मुखर था।

बहुत दिनों से यहां के पत्रकार एक कहावत कहा करते थे- वाम को अगर बंगाल में कोई हरा सकता है तो वह खुद वाम ही है। एक तरह से देखा जाए तो वाम की लंबी जीत के सिलसिलों में ही उसकी हार की वजहें छिपी हैं। 1977 के बाद से बंगाल में वाम मोर्चे ने अपना एक शानदार तंत्र खड़ा कर लिया था। प्रमोद दासगुप्ता और अनिल विश्वास सरीखे नेताओं और पार्टी प्रबंधकों ने सीपीएम की ऐसी मशीनरी खड़ी कर दी, जैसी किसी दूसरे सूबे में नहीं थी।


पार्टी ने अपना सामाजिक आधार औद्योगिक सर्वहारा से आगे बढ़ाते हुए उसे भूमिहीन मज़दूरों, छोटे किसानों और सीमांत किसानों तक फैलाया। इस समीकरण में वाम मोर्चे ने वर्ग को भी जोड़ा और दलितों और मुस्लिमों का वोट बैंक उसके साथ आ जुड़ा। इस वोट बैंक की वजह से ही वाम की हेजिमनी 2006 के विधानसभा चुनाव तक बरकरार रही।


लेकिन जिस परिवर्तेन हावा ( परिवर्तन की हवा) की हात इस बार मीडिया इस बार की गई और जो चुनाव परिणाम के बाद अनुमानों से ज्यादा मुखर हुआ, उसके संकेत पंचायत चुनाव से ही मिलने शुरु हो गए थे। सूबे के 17 में से 13 ज़िला-परिषदों पर हालांकि वाम मोर्चे का क़ब्जा बरकरार रहा। लेकिन जानकार इसे वाम मोर्चे की 4 जिला परिषदों में शिकस्त के रुप में देख रहे थे।


इसकी फौरी वजह तो लेफ्ट फ्रंट के विभिन्न घटक दलों में आई दरार और पंचायत चुनावों पर पड़े इसके असर को माना गया। उधर, नंदीग्राम की घटनाओं के लगातार विरोध के बाद धीरे-धीरे बुद्धिजीवियों का एक तबका गोलबंद होकर वाम के खिलाफ़ खड़ा हो गया। बंगाल के गांवों में भी-जो कि वाम का एकमुश्त वोट रहा है- वाम के खिलाफ़ सुगबुगाहट थी। ग्रामीण और शहरी दोनों ही मुस्लिम समुदाय वाम मोर्चे से बिदक चुके थे। शहरी मुस्लिम तभके में रिजवानुर हत्याकांड का गुस्सा था। जबकि गांव के वोटरों तक सच्चर कमिटी की सिफारिशों को तृणमूल और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने बखूबी पहुंचा दिया।


गौरतलब है कि सच्चर कमिटी की रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि बंगाल में करीब पचीस फीसदी आबादी होने पर भी सरकारी नौकरियों में महज 4 फीसदी ही मुसलमान हैं। बंगाल में दलितों और मुसलमानो kii खराब हालत एक चुनावी मुद्दा बन चुका था। नंदीग्राम में तापसी मलिक हत्याकांड को ममता ने खूब भुनाया।


दरअसल, कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की साढे चार साल की स्थिरता, नरेगा की कामयाबी, सूचना के अधिकार, वनाधिकार कानून जैसे प्रगतिशील कदमों में योगदान देने वाला वाममोर्चा समर्थन वापसी के बाद इऩका ॽेय लेने की स्थिति में नहीं थी। लेकिन इन कदमों ने कांग्रेस की छवि सामाजिक-जनवादी ज़रुर बना दी। दूसरी तरफ चंद्र बाबू नायडू और नवीन पटनायक जैसे नवउदारवादियों के साथ खड़ा होने का नुकसान भी वाम को झेलना पड़ा।


वाम के खिलाफ यह जनादेश फौरी भावनाओं की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, एक हद तक उसके लिए वाम की ठसक भरी राजनीति ज़िम्मदेरा है। आखिरकार, लोकतंत्र में असली ताकत to जनता के पास है। जो थोड़ा नज़रअंदाज़ करती है, वोटबैंक बनकर एकमुश्त वोट करती है, भावुकता भरे वायदों पर यकीन करती हैं, लेकिन साथ ही झटके से ज़मीन भी दिखला देती है।


यकीनन, वाम को मिला यह आखिरी जनादेश नहीं है और यह चुनाव भी आखिरी नहीं था, लेकिन यह लोकसभा चुनाव उन्हें ज़रुर इस बात पर सोचने के लिए मजबूर करेगी कि आखिरकार मोर्चे ने क्या गलत किया कि परिणाम 'अप्रत्याशित' हुए।

Thursday, June 4, 2009

बेसाख़्ता

क्या तुमने कभी,

महबूब के इंतजार में धूप तापी है?

पार्क में बैठकर-

बोगनवेलिया के हरे पत्तो पर

अपने नाखूनों से उसका नाम लिखा है?

क्या अमलतास के पीले फूलों की तरह तुम,

प्रेम में उलटा लटके हो?

क्या गुलमोहर की तरह

तुम्हारे दिल का खून

मुंह के रास्ते आया है कभी बाहर,

क्या मुहब्बत के आएला में,

सब्र का बांध टूटा है...

नहीं.. नहीं..नहीं

तो क्या हुआ जो-

इज़हार ए मोहब्बत का एक ख़त अधूरा रह गया,

जिस खत में लिखा उसे महबूब की तरह??


क़स्बे पर रवीश की कविता उदास नज़्में, सस्ती शायरी पर मेरी फौरी प्रतिक्रिया, गुस्ताख़ी माफ़.

Monday, May 25, 2009

बंगाल यात्राः आनंद अखंड घना था

पिछले एक माह से बंगाल की यात्रा पर था। क्या कहें.. मन में शुरु से इच्छा थी कि इस राजनैतिक रुप से बेहद सचेत राज्य को कवर करूं. इस लोस चुनाव ने यह अभिलाषा भी पूर्ण कर दी।


अभिलाषा भी ऐसे पूरी हुई कि मज़ा आ गया। कोलकाता से सीधे मालदा जाना था। २३ अप्रैल को.. दमदम हवाई अड्डे पर कैमरामैन स्टालिन मिले तो उनकी गर्मजोशी देखकर चकित रह गया। मालदा की ओर चला.. रास्ते में रुकते ठहरते। किनारे-किनारे केले, नारियल की झुरमुटें। पोखरे.. बंगला मे पुकुर कहते हैं। एक हद तक बांगला सीख ली मैंने। रात के खाने में चारा-पोना मछली खाई। इसके साथ ही सीखा काटा-पोना शब्द भी। मालदा की उस रात से मछली सेवन शुरु हुआ वह आखिरी दिन तक चलता रहा। हमारा यह व्रत कभी भंग नहीं हो पाया।



दरअसल, चारा-पोना का स्वाद हमारी ज़बान पर इस क़दर चढ़ गया कि हमने इस्लामपुर, रायगंज. जंगीपुर, सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग..यानी जहां-जहां हम गए, चारा-पोना ही मांगा। उत्तरी बिहार खासकर मिथिला प्रदेश और बंगाल की जलवायु कितनी मिलती-जुलती है. उतनी ही मिलती-जुलती हैं समस्याएं भी। मधुबनी-दरभंगा तो राजनैतिक रुप से भी समान हैं। कुछ अरसा पहले तक कम्युनिस्टों का ही दबदबा था उधर भी। भोगेंद्र झा और चतुरानन मिश्र जैसे नेता..उसी इलाकेसेतो थे।



बहरहाल बता दूं कि चारा-पोना क्या है। कोई भी मछली हथेली भर के साईज़ की, चारा पोना है। खासकर वह रुई माछ यानी रोहू तो ज्यादा बढिया। और कोई भी मछली जिसे काटकर पीस बनाकर खाया जाए वह काटा पोना है। इसके अलावा पोर्शा, इलिश यानी हिलसा और कई और मछलियां... नाम भी याद नहीं। तो हमारा मछली सेवन का व्रत अनवरत चलता रहा।



मालदा के बाद हमें इस्लामपुर की ओर कूच करना था। छोटी-सी जगह। लेकिन तब तक हम चारा-पोना के साथ मिष्टी दोई (मीठी दही) और रोसोगुल्ला (यममी..) गपकना सीख गए थे। वैसे भी मैथिल लोग रसगुल्ला और दही देखते हैं सरकारी नल से ज्यादा पानी अर्थात् लार स्रावित करते हैं। तो भाई साहब हमने जंगीपुर के चौक पर, सिलीगुडी के ढाबे में, रायगंज के लाईन होटल में, मुर्शिदाबाद में हजारदुआरी पैलेस के ठीक सामने, बेहरामपुर के लालदिघी में, भागीरथी नदी के किनारे (गंगा की उपधारा), यानी जहां भी जब भी वक्त मिला कस कर रसगुल्ले चांपे।



दार्जिलिंग गया तो ढाबे पर की चाय में भी एक अलग फ्लेवर था। राजनीति के फ्लेवर पर अभी बात करने की कत्तई इच्छा नही है। न्यू जलपाई गुड़ी...और फिर आसनलोस, दुरगापुर, सीतारामपुर, नियामतपुर श्रीकृष्णानगर, शांतिपुर, बोलपुर, ... जहां भी गया, बंगाल के स्वाद का जादू बरकरार रहा।



कोलकाता में एक रेस्तरां है, सोलह आना बंगाली। वहां पर इलिश का स्वाद पाया। किंग प्रॉन भी खाया। इतना खाया कि हाजमोला खाने तक की जगह नहीं बची। रात का खाना डिसमिश करना पड़ गया। फिर हमारे कोलकाता संवाददाता अर्घ्य ने हमें दावत दी। तीन तरह की मछलियां, पोर्सा, हमारे लिए विशेष तौर पर चारा-पोना और एक अन्य। लेकिन पहले ताड़ के अंदर का गूदा..पता नहीं क्या कहते हैं। मन तृप्त हो गया। फिर रोसोगुल्ला। फिर गप-शप के बाद भोजन। खीर, मिष्टी दोई...अहा। क्या कहें ऐसे ही किसी दावत के बाद कवि ने कहा होगा, -आनंद अखंड घना था।



अभी दिल्ली लौट आया हूं तो एक साथ ही खुशी भी है, चारा-पोना से साथ छूटने का ग़म भी। क्योंकि वहां तो आनंद अखंड घना था।



मंजीत ठाकुर, कोलकाता से लौटकर

Wednesday, May 13, 2009

मेरी खबर का असर

पहले बता दूं कि अपने चैनल की खबर का असर लाल पट्टियों पर मोटे-मोटे हरफों में लिखने वालों के लिए ये मेरा खास पैगाम है। आपकी खबर का असर सरकार तक है, मेरी खबर का असर ऊपर वाले तक। अपना गुणगान नहीं कर रहा क्योंकि मुझे दुनिया के महानतम पापियों में गिना जाता है। लेकिन खबर के ऐसे पॉजिटिव असर से मैं बेहद खुश हूं।

पिछली २३ तारीख से पश्चिम बंगाल में हूं। चुनाव की कवरेज पर..आज आखिरी दौर की वोटिंग भी खत्म हो गई।

जब २३ की शाम मैं मालदा पहुंचा, तो चाय की दुकान पर ही मालूम पड़ा कि मालदा सूखे से त्रस्त है। मालदा ही क्यों उत्तरी दीनाजपुर और जलपाई गुडी़ में भी। चाय के बागान सूखने लगे थे। पिछली सितंबर में बारिश हुई थी, उसके बाद से पानी की बूंद नहीं टपकी थी। लिहाजा, मालदा का मशहूर आम इस बार रसहीन रहा है। आम के साथ दूसरी फसले भी कमजोर दिखीं।

कुमारगंज से दार्जिलिंग की सुखना तक तपिश का असर कठोरतम था। दर्सल, इस इलाके में जाड़े के बाद और मॉनसून-पूर्व की बारिश होती है। इसकी मात्रा ७० मिमी से ११० मिमी तक होती है। लेकिन िस बार यह बारिश नदारद थी। मछली के उत्पादन पर असर पड़ रहा था।

लोगों ने भूमिगत जल का दोहन शुरु कर दिया। फिर तो, इलाके का जलस्तर ६ फुट तक नीचे चला गया। लेकिन इस समस्या को चुनावी मुद्दा तो दूर िस पर बोलने के लिए कोई भी पार्टी तैयार नहीं थी। २४ तारीख को ही हमारी पूरी टीम इस िलाके में घूमी और हमने ेक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें सूखे के असर को दिखाया और कहा कि ये क्यों चुनावी मुद्दा नहीं है।

बहरहालस राजनैतिक दलों ने देखा, नहीं देखा, मुद्दे के रुप में उन्हे सूझा या नहीं पता नहीँ। लेकिन ऊपरवाले को ये शायद पसंद आ गई। और स्टोरी रन होने के एक दिन ही बाद मालदा, िस्लामपुर, रायगंज और जलपाईगुड़ी मेंवो झमाझम बारिश हुई कि दिल खुश हो गया।

इसी से तो कहता हूं मेरी खबर का असर ऊपरवाले तक है। तो दीजिए न मुझे बेस्ट जर्नलिस्ट अवॉर्ड..यंग जर्नलिस्ट अवार्ड वालों... रामनाथ गोयनका पुरस्कार वालों सुन रहे हो क्या?

Friday, April 17, 2009

नरक में मार्च एंडिंग


मैं आजकल नरक में हूं। नरक में रहना कोई बहुत पापकर्म रहा नहीं। नरक में भी मौज है। मर्त्यलोक में हमारे कर्मों का लेखा-जोखा करने के बाद और हमारे चरित्र का विश्लेषण करने के बाद चित्रगुप्त जी महाराज ने बहियां जला दीं क्योंकि उन्हें डर है कि इस सेंसरशिप के बगैर आने वाली पीढियां हमारी तरह ही गुस्ताख और बददिमाग़ हो लेंगी।

बहरहाल, मौज में हूं। नरक में जितना फंड बजट के बाद आया था, खर्च नहीं हो पाया। पता नहीं क्यों। जिस कड़ाह में तेल डाल कर हम जैसे पापियों को उबालते-तलते थे, उसकी तली में छेद हो गया है। कड़ाह खरीदा नहीं गया है, एक पुराना कड़ाह कबाड़ में रखा तो है लेकिन न तो कोयला है जलाने के लिए और न ही तेल आ पाया है। इस काम के लिए फंड नहीं था।


जिस आरे से पापियों को चीरा जाता रहा है, उस आरे की दांतें घिस गई हैं। गोया उस आरे से चोट तो लग सकती है लेकिन चीरा नहीं जा सकता। सारे हरबे-हथियार पुराने पड़े हुए हैं, संग्रहालय में रखने लायक हो चुके हैं। हम सारे पापी उस हथियारखाने की ओर से गुज़रते हैं तो सादर थूक समर्पित करते हुए जाते हैं।


नरक में पूछताछ के कमरे, अपराधी के सिर पर जलने वाला जो ढाई सौ वॉट का बिजली का बल्ब लगा होता है, वह फ्यूज़ हो चुका है और चेहरे पर फेंकने के लिए गंदे पानी की सप्लाई भी रोकी हुई है। ऐसे में पापियों से पूछताछ रुकी हुई है। स्टे ऑर्डर लगा हुआ है पूछताछ पर। पापी चक्की भी नहीं पीस पा रहे... चक्की चलाएं तो कैसे, पीसने के लिए अनाज भी नहीं आया।


ये सारा मामला फरवरी के आखिरी दिनों तक ही था। मार्च के शुरुआती दिनों में एडमिन( नरक प्रशासन) की नींद खुली। अतिरिक्त महानिदेशक ने डायरेक्टर से, डायरेक्टर ने जॉइंट डायरेक्टर, जॉइँट डायरेक्टर ने डिपुटी डायरेक्टर से यानी बड़े अधिकारी ने छोटे अधिकारी से और उस अधिकारी ने एकांउंटेंट से जानकारी मांगी।


कहा, फंड खरचना ज़रूरी है वरना अगले वित्त वर्ष में फंड कम हो जाएगा। अब नरक में मच गई अफरातफरी। निविदाएं मंगाई जाने लगीं। अधिकारियों के कमरे में एसी बदल दिए गए। पूरे नर्क प्रशासन भवन की पुताई की गई, साइन बोर्ड, बदल दिए गए। सेंट्रलाइज्ड एसी को दुरुस्त करने के बहाने ढेर खर्च किया गया।


मज़बूत दीवार को तोड़ने में कई मजदूर लगाए गए...फिर उसे तोड़कर कमजोर और डिजाइनदार दीवार बनाई गई। अतिरिक्त महानिदेशक और संयुक्त सचिव को पसंद नहीं आई। नतीजतन दीवार तोड़ दी गई और उसकी जगह नामी कंपनी का बना कांच लगाया गया।


नरक के लॉन में खुदाई करके नर्सरी से मंगाई गई घास रोपी गई। किनारे-किनारे मंहगी इंटें गाड़कर फूलों के पौधे लगाने की जगह बनाई गई। साइकस और मनीप्लांट के मंहगे पौधे मंगाए गए। सात-आठ सौ पौधे, जिनमें पानी न डालने की सख्त हिदायत दी गई है। लोगबाग उसे थूकदान की तरह इस्तेमाल करते हैं।


सभी अधिकारियों के कमरों में नए सोफे लगाए गए और वैसे लोग जो सोफे के काहिल नही उनके कमरे में नए कवर वाले पुराने सोफे डाल दिए गए। फर्श की घिसाई की गई.. मतलब सारे पैसे खर्च हो गए, अब चपरासियों को वेतन नहीं मिला है और कड़ाह वगैरह की खरीद नहीं हो पाई है। पानी की सप्लाई दुरुस्त नहीं हो पाई है, तेल बेचने वाला कोई अधिकारी का रिश्तेदार नहीं निकल पाया सो निविदा भी नहीं निकल पाई। आरा अब भी दांत के इंतजार में है। हरबे हथियारों के ज़रुरत ही नहीं है, उसका इस्तेमाल करना कौन चाहता है।


लब्बोलुआब ये कि अधिकारी वित्त वर्ष खत्म होने से पहले खुले हाथों से फंड की रकम खर्च करने में व्यस्त हैं। यमराज ये देखने में लगे है कि उसकी बाईट किस चैनल पर कितने देर चली। और हम पापी नरक में मज़े ले रहे हैं।


Tuesday, April 14, 2009

एक ग़ज़ल

शामिल तेरी हयात मेरी शायरी में है
अब पूरी कायनात मेरी शायरी में है।

ये नज़्म, ये ग़ज़ल, ये क़ता ये रुबाईयां,
ख्वाबों की इक जमात मेरी शायरी में है।

दिन भर की दौड़-धूप, थकन और बेकसी
उसपर सितम की रात, मेरी शायरी में है।

मेरे अदब से सारे फरिश्ते सहम गए,
ये कैसी वारदात मेरी, शायरी में है।

गुस्ताख़ लग रहा है ज़माने को फलसफ़ा,
लेकिन ज़रा-सी बात मेरी शायरी में है।