Thursday, October 1, 2009

बादलों में गुस्ताख़

रावण दहन का दिन था.. घर के लोग पूरा जोर लगा रहे थे कि रावण के पुतला दहन हो तो उसका चश्मदीद मैं भी बनूं। लेकिन मुझे रावण से बहुत सहानुभूति रही है। सहानुभूति के कारणों का हवाला बाद में दूंगा लेकिन सच तो यह है कि रावण दहन का दॉश्य मुझसे झेला नहीं जाता।

राम की ड्रेस में सजा कोई बच्चा.. और उसके पीछे दारु पीकर झूमते लोग। रावण का बहुत बड़ा पुतला बनाया हुआ। मेरे शहर के लोगों ने तो इस बार हद ही कर दी थी। उनने रावण के नौ सिर ही लगाए थे। अब उसका फोटो भी है मेरे पास...तो जो राम नहीं कर पाए त्रेता में, वह मेरे तुच्छ शहर के शराबी रामभक्तों ने कर दिखाया।

बहरहाल, आतिशबाजी का पूरा इँतजाम रहा। बांस के ढांचे पर खड़ा राॠम फुलझडियों के छूटने के बीच पटपटाकर जल गया। इस पूरे ठनगन में पंद्रह मिनट भी नहीं लगे। बाकी राॠम को मारने में राम को कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी, ये कोई राम से ही पूछे।

तो जनाब खलनायक हो तो रावण जैसा..खलनायक का खलनायक और चरित्र में बेदाग..। जो करता रहा सीना ठोंक के, ये ले ये मैंने करा है, तैनूं जो करना है कर ले।

बाद में उसके चरित्र के साथ और भी क्षेपक जोड़ दिए गए। लेकिन रावण जैसे कद्दावर राष्ट्राध्यक्ष को सद्दाम की तरह पंद्रह मिनट में निपटा देना मुझे सुहाया नहीं।

बहरहाल, रावण के प्रति सहानुभूति से भरा मैं मूंगफलियां तोड़ता घर पहुंचा। अगले दिन अल्लसुबह मुझे ट्रेन पकड़नी थी ताकि दिन दो बजे कोलकाता से गुवाहाटी की फ्लाइट पकड़ सकूं। कोलकाता पहुंचा तो वहां सड़कों प सन्नटा। लोग दुर्गापूजा की थकान उतारने में लगे थे। फ्लाइट के आसमान में पहुंचते ही मैं भी सातवे आसमान में पहुंच गया, आसमान बादलों से भरा था। मेरी पहले की उड़ानो में ऐसा नही था कि प्लेन ठीक बादलों के बीच से होकर गुजरे।

किताबों में पढ़ा था, कि बादलों के भी कई पर्कार होते हैं। ऐसे में जिन बादलों को मैं ऊपर देख रहा था वह कपासी बादल थे। रुई-से सफेद एकदम झक्क, बुर्राक उजले। इतनी ऊंचाई पर पानी के महीन कण जम जाते हैं और बरफ में तब्दील हो जाते हैं। जाहिर है आसमान में हिलते डुलते भी कम ही हैं। सच कहें तो गोभी के फूलों जैसे आकार वाले बादल... गाना याद आ रहा था आज मैं ऊपर.......।

फिर पता नहीं क्यों मन में स्वर्ग का खयाल आया। सोचा अगर प्लेन अभी क्रैश करता है तो कहां जाऊंगा? मेरी स्वर्ग की यात्रा कैसे होगी। सीधे स्वर्ग (अथवा नरक? मैं खुद को नरक का भागीदार ही मानता हूं, क्योंकि जिन कार्यों में मैं संलिप्त हूं उसे तो धर्म के ठेकेदार पाप कहते हैं। जैसे रावण की प्रशंसा,) बहरहाल, यह तय रहा कि मरा तो शरीर नीचे जाएगा और आत्मा ऊपर जाएगी।

अर्थ यह कि शरीर को नीचे ले जाने से आत्मा का उत्थान होता है। पता नहीं दर्शन क्या कहता है? पहले अगरतला और बाद में गोहाटी को ऊपर से देखा तो लगा कि हमारे देश का यह हिस्सा कितना खूबसूरत है यार। ऊपर से ही मजा आ गया। लगा, किसी ने हरे काग़ज़ को मरोड़ कर रख दिया है और उस पर काई जम गई है। ( अजी हज़रत, एरियल व्यू में पेड़ तो काई जैसे ही दिखेंगे न?)

तो अब कल सुबह में मुझे टीम के साथ डिब्रूगढ़ के लिए कूच करना है और फिर वहां से तेज़ू के लिए तेज़ू म्यांमार और चीन की सरहद के पास है। और लोहित जिले में हैं। सुना है कृष्ण की पहली पत्नी रुक्मिणी मिस्मी जनजाति की थी, जो लोहित जिले की जनजाति है। यह जानकर तेज़ू मेरा ननिहाल हो गया है, मेरी मां का नाम भी रुक्मिणी ही है।

आगली पोस्ट तेज़ू से..

मंजीत

Thursday, September 17, 2009

बुत हमको कहें काफ़िर....विनोद दुआ बनाम डीडी

दूरदर्शन (टीवी के लिए हिंदी शब्द) के पचास साल पूरे क्या हो गए.. सरकारी चैनल डीडी के आलोचकों का मानों मुंह खुल गया। वैसे सिला ही कब था? १५ सितंबर के आठ बजे विनोद दुआ लाइव में विनोद दुआ जी ग्यान-गंगा बहाने बैठे। उनके श्रीमुख से शब्द निर्झर की तरह झहरते हैं। लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते हैं। लेकिन बहुधा वह इसका गलत इस्तेमाल करने लग जाते हैँ।

पहले तो दूरदर्शन के पचास साल जुमले पर उन्होंने आपत्ति दर्ज की। ठीक है...मान लिया। डीडी में दस हजार गलतियां हैं। चलो ग्यारह हजार होगीं। किस सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार नहीं होता। लेकिन सिर्फ इसलिए कि सरकारी चैनल बेहूदेपन की हद तक नकारा हैं, आपके साफ-सुथरे और दूध से धुले होने का सार्वभौमिक सत्य स्थापित नहीं हो जाता।

तो जनाब, विनोद दुआ ने डीडी की उम्र ३५ साल कूती। क्योंकि पिछले १५ साल से निजी चैनल मार्केट में उतरे ठहरे। विनोद दुआ जी से कोई पूछे कि आपने अपना करिअर शुरु कहां से किया था? और वह दूरदर्शन छोड़ कर निजी चैनलों में क्यों कूदे? और जब कूदे तो डीडी से क्या ले गए थे? और क्या इसी बहाने वह अपना पिछला हिसाब चुकता तो नहीं कर रहे? और डीडी को ऑटोक्रेटिक ठहराने वाले अपने गिरेबां में झांकेगे क्या?

बहरहाल, सीना तान कर और मूंछों पर ताव देते हुए मैं डीडी का सगर्व दर्शक इसे इसकी पूरी गलतियों के साथ अपनाता हूं। विनोद दुआ के एनडीटीवी की दुकानदारी पूरे सस्ते होने और सड़कछाप हो जाने पर भी नंबर एक नहीं पहुंच पाई है, शायद १५ सितंबर का जेहादी तेवर उसी की परिणति है।

वैसे कूड़ा परोसने में एनडीटीवी भी पीछे नहीं। नेट के झरोखे से, और टीवी के धारावाहिकों औक कॉमिडी शोज़ के अलग से विशेष उनने दिखाने शुरु कर दिए हैं। और हां, १६ सितंबर की शाम विनोद जी का एक और कारनामा दिखा। वैसे एंकर थे तो जिम्मेदारी उन्हीं की बनती है। रवीश कुमार की फरमाइश पर विनोद दुआ लाइव में उनने फिल्म "उसने कहा था" का एक गीत दिखाया। यहां तक सबकुछ स्वाभाविक था..लेकिन हद तो तब हुई जब सुपर में रवीश कुमार की फरमाइश चलने लगा और एक तस्वीर भी उनकी चस्पां हो गई स्क्रीन पर।

इसी लिए तो हम ग़ुलाम अली के गले की आवाज़ में सुनते हैं .......
"बुत हमको कहें काफ़िर, अल्लाह की मर्जी है.." ...... हैरानी नहीं होती।

दुआ साहब हम मानते हैं कि रवीश आपके आउटपुट हैड हैं, लेकिन,......आप तो डीडी से बेहतर हैं ना?

Wednesday, September 9, 2009

बारिश के बहाने

आज दिल्ली का आसमान बेतरह काला है, रात, नहीं भोर में बरसात हुई थी। दफ्तर की ओर चला तो सड़कें गीली-गीली थी। ऐसे मानों किसी मां ने पैर छितरा कर रोते हुए चंट बेटे की कुटम्मस की हो, और उसके आंसू गालों पर अभी भी छितरे हों। बचपन में हम देखते थे कि आसमान हठात् काले रंग का हो जाता था। और बौछारें शुरु..। कमरे में बैठे हैं.. उजाला घटने लगा.. मां ने आदेश दिया.. आंगन से कपड़े उठा लाओं ... जबतक कपड़े उठाने गए.. तब तक तरबतर..। बड़ी बड़ी बूंदें.. ऐसी मानो किसी बंगालन कन्या के बड़े-बड़े नैन हों।

हमेशा मैंने बरसात को अपने भीतर महसूस किया है। उमड़-घुमड़ कर बरसते बादल आने से पहले ऐसी समां बांधते बस पूछिए मत...ताजी हवा कि गुनगुनती सिहराने वाली खुनक... दरअसल गरमी के बीच थोड़ी भी हवा की ठंडक मजेदार लगती है।

कई बार तो धूल भरी आंधी आती और बादलों के पीछे से झांकते सूरज महाराज की किरणें अजीब माहौल पैदा करती। अगर हम क्रिकेट खेल रहे होते तो चिल्लाते एक पैसा की लाई बजार में छितराई बरखा उधरे बिलाई... लेकिन कभी बरखा बिला जाती तो कभी हम जैसे नालायकों की दुआ में बिलकुल असर नहीं होता। ताबड़तोड़ बारिश शुरु हो जाती। हम भींगते हुए घर पहुचे नहीं कि मां ने उसी बारिश वाले अंदाज में हमें धोया नहीं।

बरसात होती तो हमारे घर के चारों तरफ जो खाली ज़मीन थी उसमें अरंडी वगैरह के झाड़ उग जाते॥ हमारे खेल के मैदान में घास की हरी चादर बिछ जाती। मैदान के एक किनारे पर पोखरा था, पोखरे में पानी लबालब भर जाता।

एक झाडी़, जिसका नाम पता नहीं उसमे पीले-पीले फूलों को देखकर मन खिल जाता। भटकटैया के फूल चूसते, मीठेपन का अहसास होता। बॉल बिरयिंग की गोलियों जैसे भटकटैया के फल जमा करना हमारे मनोरंजन का साधन होता। बरसात मे हम ड्रैगन फ्लाई पकड़ने उसके पीछे-पीछे घूमा करते। दूब की चादर पर लाल-लाल बीर बहूटियों को पकड़ लेते।

असली मज़ा तो तब आता, जब स्कूल जाने के वक्त जोरदार बारिश हो रही हो, सुबह से ही। माताजी, फिर भी नहीं मानती और छाता लेकर स्कूल के अंदर तक खदेड़ आतीं। बदले में हम वापसी में काले रंग के चमड़े के जूतों में मिट्टी लपेसकर लाल कर आते। गीले जूतों से अगले दिन स्कूल जाने की आशंका प्रायः खत्म हो जाती। लेकिन उसेक बाद घर आते ही जूतों की हालत देखकर माताजी उन्हीं जूतों से हमें दचककर कूटतीं।

हमारे मन में आज भी बरसात का मतलब जमकर बरसना होता है। दिल्ली में तो महज फुहारें होती है। बाद में जब हमने सिगरेट पीना शुरु किया तो चोरी छिपे बारिश होते हुए और अपने दोस्त की प्रेमिका के घर के सामने से भींगते हुए सिगरेट पीने का मज़ा ही कुछ और होता। हां, मीरा के घर के सामने हम सिगरेट को अपने होंठों में ले लेते। ताकि दोस्त की इमेज पर असर न पड़े।

हम लोग कई बार दूर गांव की तरफ निकल जाते थे। झारखंड का ये इलाका हरियाली के लिए मशहूर है, और उस हरियाली को मैं आज भी अपने अंदर जिंदा महसूस करता हूं। हरियाली तो दिल्ली में भी है लेकिन पता नहीं क्यों झारखंड की हरियाली में जो गंध थी, यहां महसूस नहीं हो पाती। झारखंड में इस वक्त पलाश के जंगल में पत्ते आ जाते हैं। और साल के पेड़ की हरियाली में अलग-अलग शेड्स आ जाते हैं।

तो बरसात के इन्हीं दिनों कई बार ओले भी पड़ते। कई बार तो ओले की बौछारों से सड़क कि किनारे और घास सफेद लगने लगा जाता। कहावत थी कि ओले खाने चाहिए फायदा होता है। उस फायदे की आड़ में हम खूब बऱफ के टुकड़े चुनते फिरते।

दिल्ली में ओले गिरे भी तो हम कभी चुनकर खा नहीं पाए। कभी सम्मान के नाम पर..कभी बड़ा हो गया हूं यह सोच कर। बारिश के नाम पर रोमांस के टुकड़े तो हमने खूब देखे, लेकिन कभी यह सोचा है कि बारिश में आसमान के आंसू गिरते हैं।?

अरे हां, याद आया। एक बार उड़ीसा में महाचक्रवात आया था.. शायद ९७ में। हमारे शहर में सात दिनों तक लगातार बारिश होती रही। पहले दो दिन तो मजा आया, लेकिन बाद में लगातार बिजली गुल रहने, बाहर दोस्तों से नहीं मिल पाने और कई दूसरी वजह से बारिश बोझ लगने लग गई।

फिर भी, बारिश अपने चंद्रमुखी स्वरुप में बेहतर होती है। वह ज्वालामुखी न बने तो ही बेहतर।

Friday, September 4, 2009

अमिताभ के जूते में शाहरुख के पांव


अमिताभ बच्चन का जो एंग्री यंगमैन का किरदार था, वह एक क़िस्म की सामाजिक नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ नौजवानों का जवाब था। यह सब कुछ लगभग 20 साल तक चला।

1970 की शुरुआत से लेकर 1990 तक अमिताभ एक एंग्री यंगमैन का प्रतिरूप बन गए थे, जो अपन बाग़ी तेवरो से नौजवान भारत की आवाज़ था। लेकिन अमिताभ बच्चन के बाद 90 के दशक में फिर से भारत बदला, नई नीतियां आ गईं और विकास की ओर जाने के रास्ते बदले, तो बाग़ी तेवरों के ग़ुस्से में दर्शकों के लिए जो अपील थी, वो ख़त्म होने लगी।

एक क़िस्म का जो रेगुलराइजेशन, वैश्वीकरण होने लगा, रोज़गार के नए मौके आए, तो उसकी वजह से हिंदुस्तान में जो हो रहा था उसे दिखाने के लिए सिनेमा में नए चेहरों की ज़रुरत पड़ी। तो फ़िल्मों में जो तीन खा़न हैं शाह रुख़, सलमान और आमिर ख़ान का आना शुरु हो गया।

एंग्री यंगमैन के अमिताभ के चरित्र को शाहरुख ख़ान ने थाम लिया। वे आज के वैश्विक भारतीय के चरित्र को जीते हैं, हैं जो कि हर स्थिति में बेहतर है। इसे नौकरी के लिए कतार में लगना नहीं होता, उसे भूख की चिंता नहीं है वह एनआरआई है, और एनआरआआई के मनोरंजन का सरंजाम जुटाता है।
वो विश्व में कहीं भी काम कर सकता है, उस क़िस्म का जो नया आशावादी, सकारात्मक चरित्र जो है और डेविल में केयर एटीट्यूड भी है। पर वो साथ ही साथ बहुत होशियार भी है। 90 के दशक से शुरु होकर यह अभी तक चले जा रहा है।

तीनों ख़ानो में सलमान अगली कतार के दर्शकों के हीरो है तो शाह रुख़ और आमिर हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ परोस रहे हैं। उन में आमिर का अंदाज़ कुछ ज़्यादा बेहतर है।

शाह रुख़ खान के पीछे युवा वर्ग इस तरह दीवाना है जैसे कभी राजेश खन्ना और देवांनंद के करिश्मे से रोमांचित था।

आमिर में शाह रुख़ जैसी अपील तो नही है लेकिन वह अदाकारी में शाह रुख़ से कई क़दम आगे हैं। शाह रुख़ तड़क-भड़क में आगे हैं लेकिन अपनी फ़िल्मों में मैथड एक्टिंग के ज़रिए आमिर, शाह रुख़ के जादू पर काबू पा लेते हैं।

लगान हो या तारे ज़मीं पर, आमिर ने अपनी काबिलियत साबित की है। एक तरह से आमिर मिडिल सिनेमा में मील के पत्थर है तो शाहरुख सुपर सितारे की परंपरा के वाहक। और यही आज के युवा का मूलमंत्र भी है। इधर, शाह रुख़ के आमिताभ के हर जूते में पैर देने की सनक सवार है। अमिताभ की शहंशाह की उपाधि के बरअक्स वह बादशाह कहलाना पसंद करते हैं। (ये बात और है कि शहंशाह और बादशाह दोनों ही, निहायत ही वाहियात और सुपर फ़्लॉप फ़िल्मे ठहरी हैं) ।

कौन बनेगा करोड़पति से लेकर डॉन और ऐसे ही कारनामे शाह रुख कर रहे हैं, जिससे वह खुद को अमिताभ या उससे ऊपर कहलना पसंद करते हैं। यह उनकी निजी आकांक्षा हो सकती है, लेकिन पहले भी हमने बात की थी कि अभिनेता का निजी भी सार्वजनिक होता है, तो इस तरह से जनता में कोई खास बढिया संदेश तो नहीं जा रहा।

मंजीत ठाकुर

Monday, August 31, 2009

डेडिकेटेड टू माइ फर्स्ट लव

डेडिकेटेड टू माइ फर्स्ट लवये पंक्ति होगी मेरी किताब के पहले पन्ने पर .... बिलकुल सादा पन्ना जिसके बीच में होंगी ये लाईनें। इटैलिक्स में.... प्रेरणा का स्रोत भी बता ही दूं, यूं तो यह अनगिनत किताबों में होता है। लेकिन ताज़तरीन मामला मुझे गुज़रे ज़माने के सबसे मशहूर टीवी पत्रकार सुधांशु रंजन की जेपी पर लिखी किताब के पहले पन्ने में दिखा।

किताब जेपी पर थी, गंभीर और बेहतरीन थी। लेकिन ये डेडिकैशन सबसे ज्यादा संजीदा लगा। लोग अपने पहले प्रेम को नहीं भूल पाते हैं क्या? वैसे, मैंने तभी तय कर लिया कि अपनी किताब (अगर कभी लिखी गई) तो पहले पन्ने पर मैं भी ऐसी ही लाईनें लिखूंगा...डेडिकेटेड टू माई फर्स्ट लव..। कोई नाम नहीं दूंगा कि यह किताब मेरी प्रेयसी मुन्नी, चुन्नी गुड़िया, चीकू, बन्नी, बिट्टी, गुड्डी या मिली को समर्पित है।

नाम लेने का मतलब संभावनाओं का अंत, तुरंत..।

इससे होगा क्या कि आपकी मौजूदा लव को लगेगा कि यह किताब उन्हीं के लिए है और आपके बिना सुबूत दिए यह साबित हो जाएगा कि आपका पहला प्यार वही है।
दूसरे, आपके पहले, दूसरे, तीसरे...और जितने भी आपकी औकात के हिसाब से प्यार हुए हों, हरेक को लगेगा कि किताब उन्हीं को समर्पण है। कई लोग राजेंद्र यादव, तो कोई नामवर सिंह को समर्पित करते हैं। हम उनको करेगे जिनसे हमारा मतलब सध चुका है और भविष्य में कभी संभावना होगी कि पुनः सधेगा।

विद्वज्जन कहते हैं लव चाहे किसी भी नंबर पर क्यों न आए होता हमेशा फर्स्ट ही है। वैसे ही जैसे मुनियों ने कंस को मिसगाइड किया था कि आपकी बहन के आठवें गर्भ की संतान आपका नाश करेगी.. आठवें गर्भ को लेकर चक्कर चल गया था। कंस परेशान था लेकिन आपको ऐसी परेशानी पेश नहीं आनी चाहिए..।

दरअसल, ऐसे समर्पण से यह साबित हो जाएगा कि आप कितने समर्पित प्रेमी रहे हैं। और एक साथ कईयों से उत्कट समर्पण का ऐसा लाजवाब आईडिए को पेंटेंट करवाने जा रहा हूं।

हर मर्ज की दवा है गुस्ताख के पास। लेकिन मैं किसी को गिनी पिग नहीं बनाने जा रहा हूं । पहला प्रयोग मैं खुद करुंगा। खुद पर। आप चाहें तो मेरे फॉर्म्युले का इस्तेमाल कर सकते हैं..। बाइलाइन देने का कोई चक्कर नहीं, हां नाम लेंगे तो अच्छा लगेगा( बतर्ज-गांधी शांति प्रतिष्ठान की किताबें)

तो गुस्ताख़ का यह आइडिया कैसा लगा आपको? है ना दूर की कौड़ी?

Thursday, August 27, 2009

गुस्सैल नौजवान अब फेंके हुए पैसे भी उठाता है- बदलता दौर बदलते नायक





उस दौर में जब राजेश खन्ना का सुनहरा रोमांस लोगों के सर चढ़कर बोल रहा था, समाज में थोड़ी बेचैनी आने लगी थी। राजेश खन्ना अपने 4 साल के छोटे सुपरस्टारडम में लोगों को लुभा तो ले गए, लेकिन समाज परदे पर परीकथाओं जैसी प्रेमकहानियों को देखकर कर कसमसा रहा था।


उन्ही दिनों परदे पर रोमांस की नाकाम कोशिशों के बाद एक बाग़ी तेवर की धमक दिखीी, जिसे लोगों ने अमिताभ बच्चन के नाम से जाना। गुस्सैल निगाहों को बेचैन हाव-भाव और संजीदा-विद्रोही आवाज़ ने नई देहभाषा दी। और उस वक्त जब देश जमाखोरी, कालाबाज़ारी और ठेकेदारों-साहूकारों के गठजोड़ तले पिस रहा था, बच्चन ने जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों के ज़रिए नौजवानों के गुस्से को परदे पर साकार कर दिया।


विजय, के नाम से जाना जाने वाला यह शख्स, एक ऐसा नौजवान था,ा जो इंसाफ के लिए लड़ रहा था, और जिसको न्याय नहीं मिले तो वह अकेला मैदान में कूद पड़ता हैै।


लेकिन बदलते वक्त के साथ इस नौजवान के चरित्र में भी बदलाव आया। जंजीर में उसूलों के लिए सब-इंसपेक्टर की नौकरी छोड़ देने वाला नौजवान देव तक अधेड़ हो जाता है। जंजीर में उस सब-इंस्पेक्टर को जो दोस्त मिलता है वह भी ग़ज़ब का। उसके लिए यारी, ईमान की तरह होती है.


लेकिन उम्र में आया बदलाव उसूलों में भी बदलाव का सबब बन गया। देव में इसी नौजवान के पुलिस कमिश्नर बनते ही उसूल बदल जाते हैं, और वह समझौतावदी हो जाता है।


लेकिन अमिताभ जैसे अभिनेता के लिए, भारतीय समाज में यह दो अलग-अलग तस्वीरों की तरह नहीं दिखतीं। दोनों एक दूसरे में इतनी घुलमिल गए हैं कि अभिनेता और व्यक्ति अमिताभ एक से ही दिखते हैं। जब अभिनेता अमिताभ कुछ कर गुज़रता है तो लोगों को वास्तविक जीवन का अमिताभ याद रहता है और जब असल का अमिताभ कुछ करता है तो पर्दे का उसका चरित्र सामने दिखता है।


अमिताभ का चरित्र बाज़ार के साथ जिस तरह बदला है वह भी अपने आपमें एक चौंकाने वाला परिवर्तन है। जब ‘दीवार’ के एक बच्चे ने कहा कि उसे फेंककर दिए हुए पैसे मंज़ूर नहीं तो लोगों ने ख़ूब तालियाँ बजाईं।


बहुत से लोगों को लगा कि यही तो आत्मसम्मान के साथ जीना है। उसी अमिताभ को बाज़ार ने किस तरह बदला कि वह अभिनेता जिसके क़द के सामने कभी बड़ा पर्दा छोटा दिखता था, उसने छोटे पर्दे पर आना मंजूर कर लिया।


फिर उसी अमिताभ ने लोगों के सामने पैसे फ़ेंक-फेंककर कहा, ‘लो, करोड़पति हो जाओ.’ कुछ लोगों को यह अमिताभ अखर रहा था लेकिन ज्यादातर लोगों को बाज़ार का खड़ा किया हुआ यह अमिताभ भी भा गया।


बहरहाल, अमिताभ आज भी चरित्र निभा रहे हैं, लेकिन उनके शहंशाहत को किसी बादशाह की चुनौती झेलनी पड़ रही है। हां, ये बात और है कि शहंशाह बूढा ज़रुर हो गया है पर चूका नहीं है। बाज़ार अब भी उसे भाव दे रहा है क्योंकि उसमें अब भी दम है।

Monday, August 24, 2009

बदलता दौर, बदलते नायक-३




दिलीप-देवानंद और राज कपूर के दौर के ठीक बाद या उसके दौरान ही हिंदी सिनेमा में सुपरस्टारडम की शुरुआत हुई। इस दौर में राजेश खन्ना रौमांटिक किरदारों में नजर आते रहे। वे दिलीप कुमार की परंपरा में थे। किशोर कुमार की आवाज़ गीतों के लिए परदे पर राजेश खन्ना की आवाज़ बन गई। राजेश खन्ना दरअसल एक मैटिनी आइडल थे।



बाद अपने जमाने के टॉप आइडल राजेश खन्ना के लिए जनता के बीच एक खास क़िस्म का हिस्टिरिया था।



लेकिन उनके ज़माने तक समाज में बहुत कुछ बदल रहा था। सिनेमाई परदे पर पेड़ों के इर्द-गिर्द नाच-गाने लोगों को पसंद तो आ रहे थे और दुनियावी मुश्किलों को लोग कुछ देर के लिए भूल तो जाते लेकिन यह महज इसलिए था क्योंकि दर्शक के पास विकल्प नहीं थे।



मुख्यधारा के सिनेमा में विकल्प नहीं थे और दर्शक अभी तक गंभीर कला सिनेमा को झलने के मूड में नहीं था। ऐसे में कुरते और पैंट का काकटेल चलता रहा.. किशोर कुमार की आवाज़ में गाने बजते रहे, फिल्में हिट होती रहीं लेकिन इनमे समाज का सच नहीं था।



राजेश खन्ना के कुरते और पैंट के कॉकटेल की भी कहानी है, खासकर उनके शर्ट को बाहर रखने की भी। उनकी कमर ज्यादा फैली हुई थी, तो उसे ढंकने के लिए शर्ट बाहर रखना ज़रुरी था। राजेश खन्ना के गरदन को अदा से हिलाना एक स्टाइल स्टेटमेंट बन गया। रोमांस के बाद०शाह बन चुके खन्ना पेड़ों के इर्द-गिर्द ही दौड़-दौड़ कर नायिकाओं के आगे पीछे गाने गाते रहे। हां, आनंद जैसी कुछ फिल्में ज़रुर बेहतर थीं, लेकिन इनमें निर्देशक की कुशलता अधिक नायक की अपनी छवि कम थी। जाहिर है, सिनेमा का एक बेहद प्रचलित मुहावरा विलिंग सस्पेंसन ऑफ़ डिसविलिफ़ सच होता दिख रहा था।



लेकिन तब राजेश खन्ना के इस सुनहरे सपनों वाले हवाई किले को तोड़ने वाली एक बुलंद शख्सियत की ज़रुरत थी। और ये शख्सियत सिनेमा में दस्तक दे चुकी थी।