Monday, February 25, 2008

सिनेमाः तमिल सिनेमा में बदलाव की बयार

कादल के बाद कल्लूरी इस साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म साबित हुई है। कादल की कामयाबी के बाद बालाजी शक्तिवेल बड़ी स्टारकास्ट के साथ महत्वाकांक्षी फिल्म की परियोजना पर काम कर सकते थे, लेकिन बनिस्पत इसके उन्होंने छोटे पैमाने पर फिल्में बनाना जारी रखा है, बल्कि इस बार उनका जुड़ाव और भी गहरा है। लेकिन क्या है ये..

फिल्म कल्लूरी में आपको कुछ अप्रत्याशित लग सकता है। यह फिल्म कॉलेज के नौ लड़कों के तीन साल की जिंदगी पर आधारित है। फिल्म में चरित्रों, प्लॉट और संवाद को अचूक तरीके से पिरोया गया है। ये चरित्र छोटे शहरों के होने पर भी हीनभावना से ग्रस्त नहीं है और अपने खांटी गंवईपन को संवेदनाओं के साथ उघाड़ते हैं।

फिल्म के सारे चरित्र बिलाशक दक्षिण भारतीय दिखते हैं। जाहिर है, उन्हें दिखना भी चाहिए। भोजपुरी फिल्मों की तरह नहीं, जिसमें रेगिस्तानी इलाके के लोग भोजपुरी बोलते नजर आते हैं। फ्रेम में दिख रहा हर चेहरा असली दिखता है। पात्रों के चेहरे पर जबरन मेकअप पोतकर सिनेमाई दिखाने की कोई कोशिश नहीं है। शक्तिवेल ने व्यावसायिक और कला सिनेमा के बीच एक जबरदस्त संतुलन साधा है।

कल्लूरी पिछली कई तमिल फिल्मों मेंसे महज एक उदाहरण भर है, जो समकालीन तमिल सिनेमा में आ रहे शांत लेकिन रेखांकित किए जाने लायक बदलाव की कहानी बयां कर रहा है। यह धारा एक नए बौद्धिक यथार्थवादी और मजबूत पटकथा वाली किस्सागोई वाली फिल्मों की है। राम की कट्टराधु तमिल और अमीर की परुचिवीरन फिल्मों की इस नई धारा की अगुआई कर रही हैं।

क्या सवाल महज इन फिल्मों की कला, उम्दा निर्देशन या उत्कृष्ट कहानी ही है..। जी नहीं, इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर तगड़ी कमाई भी की है। कल्लूरी जैसी फिल्में अपने कम बजट और यथार्थवाद के बावजूद बड़े सितारे वाले फिल्मों की बनिस्पत ज़्यादा मनोरंजक साबित हो रही हैं। दरअसल, तमिल सिनेमा की इस नई धारा ने व्यावसायिक सिनेमा की ऊर्जा और मनोरंजन को कला सिनेमा की जटिलता और संवेदना में खूबसूरती से पिरों दिया है। इस धारा की झलक तो मणिरत्नम् की नायकन और आयिता इझूथु में ही मिल गई थी, लेकिन ऩई पीढी के फिल्मकारों तक यह संदेश पहुंचने में एक दशक से ज़्यादा का वक्त लग गया।

तमिल फिल्मों की इस नई धारा में थंकर बच्चन की की पल्लिकूडम, और ओनबाई रूबई नोट्टू, वेगीमारन् की पोल्लाधवन, निशिकांत कामत की ईवानो ओरूवान, पद्मा मगन की अम्मूवागिया नान, गण राजशेखरन की पेरियार, वसंत बालन की वील, सेल्वाराघवन की पुदुपेट्टाई और चेरन थावामई थावामिरुंथु जैसी फिल्में शामिल हैं।

इन फिल्मों के साथ ही तमिल सिनेमा के एक नए दर्शक वर्ग, युवा दर्शकों का उदय हुआ है। जो नई चीज़ देखना पसंद कर रहा है। पिछली दिवाली पर धड़ाके के साथ रिलीज़ हुई आझागिया तमिल मागन, वोल और माचाकाईन दर्शकों के इस वर्ग को मनोरंजक नहीं लगता। दरअसल, दर्शकों के इस वर्ग को नई धारा के खोजपूर्ण सिनेमा का चस्का लग गया है।

तमिल फिल्मों की इस नई धारा की एक और खासियत है- शैली। हर निर्देशक का अंदाजे बयां ज़ुदा है। इनमें गाने सीमित है, आम तौर पर ये गाने भी पृष्ठभूमि में होते हैं। छोटी अवधि की इन फिल्मों में कॉमिडी के लिए भी अलग से समांतर कथा नहीं चल रही होती, बल्कि हास्य को कथानक के भीतर से ही सहज स्थितियों से पैदा किया जा रहा है।

ज़्यादातर फिल्मों के विषय बारीकी से परखे हुए होते हैं- गंवई कहानियों का बारीक ऑब्जरबेशन। तमिल सिनेमा की इस नई बयार के ज्यादातर चरित्रों की जड़े परिवार, संस्कृतियों और परंपरा में गहरे धंसी हैं। लेकिन प्रेम या निजी महत्वाकांॿाओं के लिए ये चरित्र हर तरह की बाधाओं पर पार पाते हैं।

वैसे, तमिल सिनेमा जिस दौर से गुजर रहा है, वह प्रक्रिया हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं की फिल्मो में कमोबेश पूरी हो चुकी है। हिंदी में ऐसे प्रयोग हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी., मिक्स्ड डबल्स, भेजा फ्राई, पेज-3, रंग दे बसंती, दस कहानियां, खोया-खोया चांद, इकबाल जैसी फिल्मों से किए जा चुके हैं। हालांकि, हिंदी में इन फिल्मों की कहानी शहरी जिंदगी पर आधारित है। मामला चाहे सेक्स का हो, वयस्कता का हो, रिश्तों, काम के बोझ या अपराध की। मिडिल सिनेमा में गांव अबतक अछूते हैं।

तमिल में यह मामला सिर्फ गांव की कहानियों पर आधारित है। जाहिर है दोनो सिनेमा को क्रास ओवर की ज़रूरत है।

जारी
मंजीत ‌ठाकुर

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