Sunday, August 9, 2026

कहानी कश्मीर कीः शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?

कश्मीर की कहानी- भाग एक

आज जब अनुच्छेद 370 को संशोधित किए ठीक 7 साल गुजर गए हैं. कश्मीर को लेकर कुछ बातों का पुनरावलोकन जरूरी है. इसमें से शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू के अद्भुत प्रेम को समझना महत्वपूर्ण है, जिसने कश्मीर के एक गुट के नेता को ऐसे समय में केंद्रीय मंच पर पहुंचा दिया, जब ध्यान पूरी तरह से राष्ट्र निर्माण पर होना चाहिए था।

शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू की निष्ठा से भारत के हितों को चोट

कश्मीर की पहली राजनीतिक पार्टी, ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन 1932 में हुआ था. लेकिन 1939 में यह अधिक तटस्थ 'नेशनल कॉन्फ्रेंस' में बदल गई. शेख अब्दुल्ला इसके संस्थापक-अध्यक्ष बने.

पार्टी अध्यक्ष रहते अब्दुल्ला नेहरू के संपर्क में आए और उनकी बार-बार की मुलाकातों ने उस यारी की नींव रखी जो इतिहास पर अपनी एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ने वाली थी, जो भारत के लिए लगभग घातक साबित हुई.

अब्दुल्ला और नेहरू के बीच एक सहज और त्वरित रिश्ते के पीछे की एक संभावित वजह है कि नेहरू का कश्मीर के साथ संबंध महज राजनैतिक नहीं, बल्कि बेहद निजी भी था, इसके साक्ष्य उन खतों में मिलते हैं जिसमें उन्होंने उस स्थान की यात्रा करने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त की है, जिसे वह अपनी मातृभूमि कहते हैं.

संभव है कि अब्दुल्ला ने सोचा होगा कि सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में उन्हें एक समान विचारों वाला सहयोगी मिल गया है.

1936 में अब्दुल्ला को लिखे नेहरू के पत्र, जिसे 30 जून, 1936 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित किया गया था, में लिखा थाः

आपके लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप मुझे अपनी मातृभूमि पर आमंत्रित करें, क्योंकि वहाँ जाने की इच्छा मेरे भीतर हमेशा मौजूद रहती है. अब मुझे वहां गए 19 साल हो गए हैं और मैं अक्सर वहां लौटने के लिए उत्सुक रहता हूं, लेकिन परिस्थितियाँ मेरे लिए बहुत अलग रही थीं और उसकी वजह से मैं ऐसा नहीं कर पाया... भारत की बड़ी समस्याओं ने मुझे भारत के इस हिस्से से बांधे रखा है. जैसा आप जानते हैं, वे समस्याएँ अंततः कश्मीर को भी प्रभावित करती हैं, क्योंकि कश्मीर का भाग्य शेष भारत के साथ जुड़ा हुआ है. यदि भारत आजाद हुआ तो कश्मीर उस आजादी में शामिल होगा.

नेहरू और शेख अब्दुल्ला के राजनैतिक विचारों में बहुत सी बातें साझा थीं और इसलिए 1937 में लाहौर में उनकी मुलाकात के बाद दोनों का गठजोड़ और अधिक गहरा हो गया.
 
अपनी मनुहार की शक्ति का इस्तेमाल करके नेहरू ने अब्दुल्ला को उत्तर-पश्चिम सरहद की यात्रा पर अपने साथ चलने के लिए मना लिया. नेहरू की कश्मीर की बाद की यात्राओं से अब्दुल्ला की लोकप्रियता में उनका विश्वास मजबूत होता गया.

मई-जून 1940 में, नेहरू ने खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ कश्मीर का दौरा किया, जो दो दशकों से अधिक समय में अपनी मातृभूमि की उनकी पहली यात्रा थी.

1945 में कश्मीर के एक अन्य दौरे में, नेहरू का स्वागत नावों के विहंगम जुलूस के साथ किया गया. इस दौरे में, नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में भाषण देते हुए नेहरू ने अब्दुल्ला के नेतृत्व पर भी मुहर लगा दी.

उनके शब्दों में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में स्वतंत्र कश्मीर की उम्मीदों का प्रतिबिंब झलक रहा थाः

‘इसके (नेशनल कॉन्फ्रेंस) दरवाजे हर कश्मीरी के लिए खुले हैं... कश्मीर बहुत खूबसूरत जगह है और जो लोग यहाँ रहते हैं वे बड़े किस्मत वाले हैं. लेकिन असली खुशकिस्मती उसी दिन आएगी, जब लोगों के पास आजादी होगी... मुझे उम्मीद है कि शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के दूरदर्शी नेतृत्व में, यह अपना मकसद हासिल करने में कामयाब होगी.’

शेख अब्दुल्ला के संबंध में नेहरू की दो ग़लतफ़हमियाँ

अब्दुल्ला के साथ अपनी शुरुआती बातचीत के दौरान नेहरू के मन में दो बेहद महत्वपूर्ण गलतफहमियाँ पैदा हुईं जो बाद में भारत के हितों के लिए हानिकारक साबित होने वासी थीं. पहली ग़लतफ़हमी थी, पूरे कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की अपार लोकप्रियता में उनका अटूट विश्वास था.

जम्मू और कश्मीर क्षेत्र में कश्मीर घाटी, जम्मू क्षेत्र और लद्दाख क्षेत्र शामिल थे. अब्दुल्ला का प्रभाव सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बीच सीमित था और क्षेत्र की अन्य मुस्लिम जातियों और जम्मू और लद्दाख के अन्य समुदायों के बीच उनकी अपील नगण्य थी या कोई अपील थी ही नहीं.

1945 तक, नेहरू अब्दुल्ला के प्रति इतने आसक्त हो गए थे कि उन्होंने पार्टी के कैडर के खिलाफ धार्मिक असहिष्णुता के सभी आरोपों को खारिज कर दिया.

असल में, नेहरू ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के निर्णयों को प्रभावित करने या देश से अलग होने के जोखिम के मद्देनजर हिंदुओं से इसमें शामिल होने का आग्रह किया.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को कहीं अधिक सख्त सलाह दी. नेहरू की सलाह थी: 'यदि गैर-मुस्लिम कश्मीर में रहना चाहते हैं, तो उन्हें नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल हो जाना चाहिए या देश को अलविदा कह देना चाहिए.'

अपने उसी दौरे में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं की एक सभा को संबोधित किया और यही सलाह दोहराईः


‘मैं सलाह दूंगा कि अधिक संख्या में इसमें (नेशनल कॉन्फ्रेंस) शामिल होइए और इसके फैसलों पर प्रभाव डालिए। उन्हें निष्क्रिय दर्शक और आलोचक ही नहीं बने रहना चाहिए. यह स्पष्ट है, और यहां तक कि एक बच्चे को भी पता होना चाहिए, कि यदि आप देश की जनता के साथ नहीं खड़े होंगे तो महाराजा और अंग्रेज आपको हमेशा गुलाम बनाकर रखेंगे.’

असल में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को यह याद दिलाते हुए एक कड़ी चेतावनी दी थीः ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस एक असली राष्ट्रीय संगठन है और भले ही एक हिंदू इसका सदस्य ने बने, तो भी यह ऐसा ही रहेगा. अगर पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, यदि पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, तो कोई भी सुरक्षा उपाय और महत्व उनकी रक्षा नहीं करेगा.’

कांग्रेस पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता की ओर से दी गई नेहरू की सलाह का कश्मीरी हिंदुओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जो अपने साथ पिछले पलायन की पीढ़ीगत स्मृति लेकर आए थे.

अब्दुल्ला को लेकर नेहरू के मन में दूसरी गलतफहमी, जो घटनाओं की एक श्रृंखला से शुरू हुई थी, और जिसका अंत इसमें शामिल सभी लोगों के लिए त्रासद रूप से हुआ था, 1946 में अब्दुल्ला द्वारा शुरू की गई कश्मीर छोड़ो (क्विट कश्मीर) आंदोलन था. (तस्वीर देखिए, 30 मई, 1946 में हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में शेख अब्दुल्ला के 'पूर्ण उत्तरदायी सरकार' को छोड़कर 'कश्मीर छोड़ो' शुरू करने का दस्तावेजीकरण किया गया था.)

यह आंदोलन महाराजा हरिसिंह के अधीन ‘पूर्ण उत्तरदायी सरकार’ के लिए पूरे समर्थन से वादाखिलाफी था. इस आंदोलन के दौरान नेहरू द्वारा अब्दुल्ला को सक्रिय समर्थन दिया गया था और इसने महाराजा के साथ उनके रिश्तों में खटास लानी शुरू कर दी और इससे इन घटनाओं के लिए मंच तैयार हो गया जो 1947 में देखने को मिलने वाली थीं.

शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और नेहरू की हिरासत-

जब कश्मीर छोड़ो आंदोलन ने गति पकड़ ली, तो हरि सिंह ने 20 मई, 1946 को शेख अब्दुल्ला को दिल्ली के रास्ते में गिरफ्तार कर लिया. अब्दुल्ला नेहरू के अनुरोध पर उनसे मिलने दिल्ली जा रहे थे.

कुछ ही दिनों बाद, 26 मई को एक सार्वजनिक संबोधन में इस गिरफ्तारी की नेहरू ने तीखी आलोचना की थी.
इस भाषण में, नेहरू ने न केवल राज्य प्रशासन को फटकार लगाई, बल्कि इसकी तुलना कुख्यात जलियांवाला बाग नरसंहार के साथ कर दी. (चित्र देखिए जिसमें दो क्लिप हैं.)
 


उन्होंने प्रशासन पर असहमतियों को दबाने का आरोप लगाया और यह दावा करके भावनात्मक लहर पैदा की कि ऑल-इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने संवैधानिक प्रमुख के रूप में शासक के अधीन एक सरकार का समर्थन किया—जो अब्दुल्ला के 'कश्मीर छोड़ो' का विरोधाभास है—और श्रीनगर को उन्होंने 'मुर्दों का शहर' बताया.
नेहरू ने अपने संबोधन में अब्दुल्ला के प्रति अटूट समर्थन व्यक्त किया और उन्हें पूरे कश्मीर में बेहद लोकप्रिय नेता बताया.

बहरहाल, एक महीने के भीतर ही, नेहरू को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि 26 मई के उनके संबोधन में किए गए दावे झूठे थे हालांकि, इस समय तक पर्याप्त नुक्सान हो चुका था. (चित्र देखिए ) 




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FAQ
1. शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?
2. कश्मीर भारत में विलय क्यों नहीं चाहता था?
3. कश्मीर के भारत में विलय पर पंडित नेहरू की क्या राय थी?

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