Sunday, August 9, 2026

कहानी कश्मीर कीः शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?

कश्मीर की कहानी- भाग एक

आज जब अनुच्छेद 370 को संशोधित किए ठीक 7 साल गुजर गए हैं. कश्मीर को लेकर कुछ बातों का पुनरावलोकन जरूरी है. इसमें से शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू के अद्भुत प्रेम को समझना महत्वपूर्ण है, जिसने कश्मीर के एक गुट के नेता को ऐसे समय में केंद्रीय मंच पर पहुंचा दिया, जब ध्यान पूरी तरह से राष्ट्र निर्माण पर होना चाहिए था।

शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू की निष्ठा से भारत के हितों को चोट

कश्मीर की पहली राजनीतिक पार्टी, ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन 1932 में हुआ था. लेकिन 1939 में यह अधिक तटस्थ 'नेशनल कॉन्फ्रेंस' में बदल गई. शेख अब्दुल्ला इसके संस्थापक-अध्यक्ष बने.

पार्टी अध्यक्ष रहते अब्दुल्ला नेहरू के संपर्क में आए और उनकी बार-बार की मुलाकातों ने उस यारी की नींव रखी जो इतिहास पर अपनी एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ने वाली थी, जो भारत के लिए लगभग घातक साबित हुई.

अब्दुल्ला और नेहरू के बीच एक सहज और त्वरित रिश्ते के पीछे की एक संभावित वजह है कि नेहरू का कश्मीर के साथ संबंध महज राजनैतिक नहीं, बल्कि बेहद निजी भी था, इसके साक्ष्य उन खतों में मिलते हैं जिसमें उन्होंने उस स्थान की यात्रा करने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त की है, जिसे वह अपनी मातृभूमि कहते हैं.

संभव है कि अब्दुल्ला ने सोचा होगा कि सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में उन्हें एक समान विचारों वाला सहयोगी मिल गया है.

1936 में अब्दुल्ला को लिखे नेहरू के पत्र, जिसे 30 जून, 1936 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित किया गया था, में लिखा थाः

आपके लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप मुझे अपनी मातृभूमि पर आमंत्रित करें, क्योंकि वहाँ जाने की इच्छा मेरे भीतर हमेशा मौजूद रहती है. अब मुझे वहां गए 19 साल हो गए हैं और मैं अक्सर वहां लौटने के लिए उत्सुक रहता हूं, लेकिन परिस्थितियाँ मेरे लिए बहुत अलग रही थीं और उसकी वजह से मैं ऐसा नहीं कर पाया... भारत की बड़ी समस्याओं ने मुझे भारत के इस हिस्से से बांधे रखा है. जैसा आप जानते हैं, वे समस्याएँ अंततः कश्मीर को भी प्रभावित करती हैं, क्योंकि कश्मीर का भाग्य शेष भारत के साथ जुड़ा हुआ है. यदि भारत आजाद हुआ तो कश्मीर उस आजादी में शामिल होगा.

नेहरू और शेख अब्दुल्ला के राजनैतिक विचारों में बहुत सी बातें साझा थीं और इसलिए 1937 में लाहौर में उनकी मुलाकात के बाद दोनों का गठजोड़ और अधिक गहरा हो गया.
 
अपनी मनुहार की शक्ति का इस्तेमाल करके नेहरू ने अब्दुल्ला को उत्तर-पश्चिम सरहद की यात्रा पर अपने साथ चलने के लिए मना लिया. नेहरू की कश्मीर की बाद की यात्राओं से अब्दुल्ला की लोकप्रियता में उनका विश्वास मजबूत होता गया.

मई-जून 1940 में, नेहरू ने खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ कश्मीर का दौरा किया, जो दो दशकों से अधिक समय में अपनी मातृभूमि की उनकी पहली यात्रा थी.

1945 में कश्मीर के एक अन्य दौरे में, नेहरू का स्वागत नावों के विहंगम जुलूस के साथ किया गया. इस दौरे में, नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में भाषण देते हुए नेहरू ने अब्दुल्ला के नेतृत्व पर भी मुहर लगा दी.

उनके शब्दों में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में स्वतंत्र कश्मीर की उम्मीदों का प्रतिबिंब झलक रहा थाः

‘इसके (नेशनल कॉन्फ्रेंस) दरवाजे हर कश्मीरी के लिए खुले हैं... कश्मीर बहुत खूबसूरत जगह है और जो लोग यहाँ रहते हैं वे बड़े किस्मत वाले हैं. लेकिन असली खुशकिस्मती उसी दिन आएगी, जब लोगों के पास आजादी होगी... मुझे उम्मीद है कि शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के दूरदर्शी नेतृत्व में, यह अपना मकसद हासिल करने में कामयाब होगी.’

शेख अब्दुल्ला के संबंध में नेहरू की दो ग़लतफ़हमियाँ

अब्दुल्ला के साथ अपनी शुरुआती बातचीत के दौरान नेहरू के मन में दो बेहद महत्वपूर्ण गलतफहमियाँ पैदा हुईं जो बाद में भारत के हितों के लिए हानिकारक साबित होने वासी थीं. पहली ग़लतफ़हमी थी, पूरे कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की अपार लोकप्रियता में उनका अटूट विश्वास था.

जम्मू और कश्मीर क्षेत्र में कश्मीर घाटी, जम्मू क्षेत्र और लद्दाख क्षेत्र शामिल थे. अब्दुल्ला का प्रभाव सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बीच सीमित था और क्षेत्र की अन्य मुस्लिम जातियों और जम्मू और लद्दाख के अन्य समुदायों के बीच उनकी अपील नगण्य थी या कोई अपील थी ही नहीं.

1945 तक, नेहरू अब्दुल्ला के प्रति इतने आसक्त हो गए थे कि उन्होंने पार्टी के कैडर के खिलाफ धार्मिक असहिष्णुता के सभी आरोपों को खारिज कर दिया.

असल में, नेहरू ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के निर्णयों को प्रभावित करने या देश से अलग होने के जोखिम के मद्देनजर हिंदुओं से इसमें शामिल होने का आग्रह किया.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन में नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को कहीं अधिक सख्त सलाह दी. नेहरू की सलाह थी: 'यदि गैर-मुस्लिम कश्मीर में रहना चाहते हैं, तो उन्हें नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल हो जाना चाहिए या देश को अलविदा कह देना चाहिए.'

अपने उसी दौरे में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं की एक सभा को संबोधित किया और यही सलाह दोहराईः


‘मैं सलाह दूंगा कि अधिक संख्या में इसमें (नेशनल कॉन्फ्रेंस) शामिल होइए और इसके फैसलों पर प्रभाव डालिए। उन्हें निष्क्रिय दर्शक और आलोचक ही नहीं बने रहना चाहिए. यह स्पष्ट है, और यहां तक कि एक बच्चे को भी पता होना चाहिए, कि यदि आप देश की जनता के साथ नहीं खड़े होंगे तो महाराजा और अंग्रेज आपको हमेशा गुलाम बनाकर रखेंगे.’

असल में, नेहरू ने कश्मीरी हिंदुओं को यह याद दिलाते हुए एक कड़ी चेतावनी दी थीः ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस एक असली राष्ट्रीय संगठन है और भले ही एक हिंदू इसका सदस्य ने बने, तो भी यह ऐसा ही रहेगा. अगर पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, यदि पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, तो कोई भी सुरक्षा उपाय और महत्व उनकी रक्षा नहीं करेगा.’

कांग्रेस पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता की ओर से दी गई नेहरू की सलाह का कश्मीरी हिंदुओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जो अपने साथ पिछले पलायन की पीढ़ीगत स्मृति लेकर आए थे.

अब्दुल्ला को लेकर नेहरू के मन में दूसरी गलतफहमी, जो घटनाओं की एक श्रृंखला से शुरू हुई थी, और जिसका अंत इसमें शामिल सभी लोगों के लिए त्रासद रूप से हुआ था, 1946 में अब्दुल्ला द्वारा शुरू की गई कश्मीर छोड़ो (क्विट कश्मीर) आंदोलन था. (तस्वीर देखिए, 30 मई, 1946 में हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में शेख अब्दुल्ला के 'पूर्ण उत्तरदायी सरकार' को छोड़कर 'कश्मीर छोड़ो' शुरू करने का दस्तावेजीकरण किया गया था.)

यह आंदोलन महाराजा हरिसिंह के अधीन ‘पूर्ण उत्तरदायी सरकार’ के लिए पूरे समर्थन से वादाखिलाफी था. इस आंदोलन के दौरान नेहरू द्वारा अब्दुल्ला को सक्रिय समर्थन दिया गया था और इसने महाराजा के साथ उनके रिश्तों में खटास लानी शुरू कर दी और इससे इन घटनाओं के लिए मंच तैयार हो गया जो 1947 में देखने को मिलने वाली थीं.

शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और नेहरू की हिरासत-

जब कश्मीर छोड़ो आंदोलन ने गति पकड़ ली, तो हरि सिंह ने 20 मई, 1946 को शेख अब्दुल्ला को दिल्ली के रास्ते में गिरफ्तार कर लिया. अब्दुल्ला नेहरू के अनुरोध पर उनसे मिलने दिल्ली जा रहे थे.

कुछ ही दिनों बाद, 26 मई को एक सार्वजनिक संबोधन में इस गिरफ्तारी की नेहरू ने तीखी आलोचना की थी.
इस भाषण में, नेहरू ने न केवल राज्य प्रशासन को फटकार लगाई, बल्कि इसकी तुलना कुख्यात जलियांवाला बाग नरसंहार के साथ कर दी. (चित्र देखिए जिसमें दो क्लिप हैं.)
 


उन्होंने प्रशासन पर असहमतियों को दबाने का आरोप लगाया और यह दावा करके भावनात्मक लहर पैदा की कि ऑल-इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने संवैधानिक प्रमुख के रूप में शासक के अधीन एक सरकार का समर्थन किया—जो अब्दुल्ला के 'कश्मीर छोड़ो' का विरोधाभास है—और श्रीनगर को उन्होंने 'मुर्दों का शहर' बताया.
नेहरू ने अपने संबोधन में अब्दुल्ला के प्रति अटूट समर्थन व्यक्त किया और उन्हें पूरे कश्मीर में बेहद लोकप्रिय नेता बताया.

बहरहाल, एक महीने के भीतर ही, नेहरू को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि 26 मई के उनके संबोधन में किए गए दावे झूठे थे हालांकि, इस समय तक पर्याप्त नुक्सान हो चुका था. (चित्र देखिए ) 




#कश्मीरकीकहानी #Jammuandkashmir #ManjitThakur 

FAQ
1. शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के कैसे थे रिश्ते?
2. कश्मीर भारत में विलय क्यों नहीं चाहता था?
3. कश्मीर के भारत में विलय पर पंडित नेहरू की क्या राय थी?

Friday, July 10, 2026

गंगा जल संधि पर भारत को बांग्लादेश के साथ क्या सुलूक करना चाहिए? दिसंबर में होना है रिन्यू

बांग्लादेश को उम्मीद है कि उसकी तमाम भारत विरोधी रवैए के बावजूद, भारत गंगा जल संधि को नवीनीकृत करने के लिए सकारात्मक सहयोग देगा. आप ध्यान दें कि बांग्लादेश के साथ गंगा जल संधि 1996 में हुई थी और इसका नवीकरण इसी साल दिसंबर में होना है.
 
इस संधि पर बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के पहले कार्यकाल के दौरान हस्ताक्षर किया गया था. बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबेद इस्लाम को विश्वास है कि 'भारत इसके महत्व को समझेगा और उसी के अनुरूप आगे बढ़ेगा.'

अब प्रश्न है कि भारत विरोधी रवैए के बावजूद बांग्लादेश इतना आश्वस्त क्यों है? ध्यान रखना चाहिए कि बांग्लादेश और भारत के बीच गंगा सहित 54 प्रमुख नदियों का जल साझा है.

भारत में बांग्लादेश के पूर्व उच्चायुक्त तारिक ए. करीम ने हाल में कहा था कि 1996 की गंगा जल संधि ने यह दिखाया कि ‘‘संवेदनशील मुद्दों पर भी’’ सहयोग संभव है. अब बांग्लादेश को भारत विरोधी रुख भी अपनाना है, लगभग पाकिस्तान भी बन जाना है और पानी भी चाहिए. ऐसा कैसे होगा?

पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता फिलहाल निलंबित है और इसकी वजह से पूरे पाकिस्तान को दिक्कत हो रही है ऐसा पाकिस्तान के लोग मानते हैं. भारत का विपक्ष (और कुछ झंडू यूट्यूबर) भले ही शक कर रहा है और पूछ रहा है कि सिंधु का जल रखोगे किधर? तो मेरा प्रश्न यही है कि अगर संधि को खटाई में डालने से पाकिस्तान की मिर्च नहीं लगी है तो पानी के नाम पर जंग की धमकी वहां की सेना से लेकर बिलावल भुट्टो तक काहे दे रहे हैं?

खैर, बांग्लादेश पर लौटिए. वहां की मंत्री शमा ओबेद इस संधि को लेकर विश्वास जता रही हैं कि 'भारत इन बातों और इस साझा हित को ध्यान में रखते हुए सही निर्णय लेगा, ताकि हमारे द्विपक्षीय संबंधों को किसी भी तरह की क्षति न पहुंचे।'

द्विपक्षीय संबंधों को क्षति पहुंचने की इतनी चिंता है तो भारत के परम शत्रु पाकिस्तान का बगलबच्चा बनने से बचना चाहिए था. अगर भारत इस पानी वाले मसले पर बांग्लादेश की बांह नहीं मरोड़ता है तो इसे कूटनीतिक फेलियर माना जाना चाहिए.

Friday, June 12, 2026

क्या टीएमसी के भीतर की हलचल सिर्फ सत्ता का गणित है, या सुरक्षा की राजनीति भी?

आपने कभी सोचा है कि तृणमूल के सांसदों-नेताओं का अचानक हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? आंखों में काबा वाली गायिका-अभिनेत्री घोष को अचानक अयोध्याजी कैसे प्रिय हो गए और कित-कित-कित-कित वाले कल्याण को ममता की छांव से बाहर अपना कल्याण कैसे दिखने लगा?

मुझे शक है कि यह सुनियोजित राजनैतिक कदम है. जिसमें ममता खुद को बलिदान करता हुआ दिखा रही हैं. अब अगर, ममता पर कोई कार्रवाई य कार्यवाही होती है तो शहीद की भूमिका ओढ़ने में उन्हें जरा भी वक्त नहीं लगेगा. आखिर, पैर पर प्लास्टर बांधकर और माथा फुड़वाकर बहते खून की धार के साथ चुनावी अभियान को नई शक्ल देनी वाली ममता इतनी सरल राजनीतिज्ञ तो नहीं.

हम और आप होते तो फूटे कपार को पहले रूमाल से पोंछते—और ममता के लिए रुमाल तो क्या धोती तक उपलब्ध हो जाती—और तब ही प्राथमिक चिकित्सा के लिए अस्पताल जाते. यह मिसाल इसलिए क्योंकि ममता छोटी बात को तूल देकर उसे ‘हूल’ में बदल देने की क्षमता वाली नेता हैं.

अगर टीएमसी के एक बड़े धड़े ने एनडीए को समर्थन देने की बात की है या ऐसा रुख दिखा रहे हैं, तो समझिए उनको बचाने की जद्दोजहद है.

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के रुख में जो बदलाव देखने को मिला है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सिर्फ राजनीतिक अवसरवाद है, या इसके पीछे कोई गहरी चिंता भी काम कर रही है.

इस पर ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बंगाल में कटमनी, तोलाबाजी और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर जनता का गुस्सा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है और स्थानीय टीएमसी नेताओं की पिटाई से लेकर सर मूंडकर सड़क पर दौड़ाने तक के वीडियो सामने आ रहे हैं.

मैं दोहरा रहा हूं आंखों में काबा वाली सयोनी घोष से लेकर कित-कित-कित वाले कल्याण बनर्जी तक अचानक ममता के विरोधी हो गए, यह बात कम से कम मुझे पच नहीं रही है.

पार्टी के भीतर मचे इस 'महा-विखंडन' को महज एक राजनीतिक असंतोष कहना वास्तविकता को नजरअंदाज करना होगा. यह दरअसल अस्तित्व बचाने की वह जद्दोजहद है, जहाँ नेता अपनी विचारधारा से अधिक अपनी 'सुरक्षा' को प्राथमिकता दे रहे हैं.

इस विद्रोह का नेतृत्व चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय जैसी वरिष्ठ नेता कर रही हैं, जो सीधे तौर पर संकेत देता है कि यह कोई छिटपुट असंतोष नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पलायन है.

सत्ता परिवर्तन के बाद पाला बदलने वाले नेताओं की मंशा को समझना कठिन नहीं है. राजनीति के जानकार मानते हैं कि बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद, राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति और 'बुलडोजर संस्कृति' (जो देश के अन्य हिस्सों में देखी गई है) के डर ने इन नेताओं को एनडीए के सुरक्षा घेरे में जाने के लिए मजबूर कर दिया है. इसे आप अपनी गर्दन बचाने के लिए पहना गया 'सुरक्षित कवच' कह सकते हैं.

आपके मन में सहज प्रश्न उठेगा कि ये लोग सीधे भाजपा में क्यों नहीं शामिल हो गए? आपको याद हो कि बंगाल भाजपा में नए नेताओं की भर्ती पर रोक लगा दी गई है. दूसरी तरफ, वॉशिंग मशीन वाली बात इतनी दफा कही जा चुकी है कि खुद भाजपा में जाने में इन्हें शर्म आ रही होगी और भाजपा वालों को इनको शामिल करने में. तीसरी और मार्के की बात है कि टीएमसी का यह धड़ा अपनी बार्गेनिंग पावर बनाए रखना चाहता है.

एनडीए में शामिल होकर टीएमसी के इस धड़े को कुछ न कुछ तो मिलता रहेगा. पार्टी में शामिल होने पर वैचारिक रूप से ‘हृदये मदीना’ और कित-कित भूल जाना होगा. भाजपा का नफा यह है कि राज्यसभा में शक्ति बढ़ेगी, राष्ट्रपति चुनाव आने वाले हैं उसमें किसी विशेष व्यक्ति के राष्ट्रपति चुने जाने के लिए जरूरी संख्याबल मिलेगा और हां, नीतीश और नायडू की बार्गेनिंग पावर को कम किया जा सकेगा.

तो, हृदय परिवर्तन सिर्फ गांधी के टाइम होते थे. अब सिर्फ स्टांस चेंज होता है. टीएमसी वालों का ये मूव सिर्फ कॉलगेट का सुरक्षा चक्र है. ममता शहीद के भाव में आएंगी और बंगाल के लोगों के ममत्व को अपने पाले में वापस लाने के लिए पहले एफआइआर के बाद सड़क पर आएंगी. आखिर जेपी की कार की बोनट पर कूद कर डांस करने वाली और भरी संसद में सपा सांसद दारोगा प्रसाद सरोज का गट्टा (कॉलर) पकड़ लेने वाली ममता दी अभी अपनी कला भूली तो नहीं होंगी.

सलमान काला हिरण खान की फिल्म सुल्तान का वह संवाद तो याद ही होगा आपकोः मैंणे पैलवाणी छोड्डी है, लड़ना नीं भूल्या.

Thursday, May 7, 2026

कतरनी चावल चूड़ा और देवघर का पेड़ा

कुछ खुशबुएँ ऐसी होती हैं जो समय की धूल में भी धुंधली नहीं पड़तीं. वे हमारी इंद्रियों के किसी गुप्त झरोखे में दुबक कर बैठ जाती हैं और एक मामूली से स्पर्श मात्र से पूरे अतीत को पुनर्जीवित कर देती हैं.

पिछली बार जब मैंने गोविंदभोग चावल पर लिखा था तो कई लोगों ने उस चावल जैसा चावल देश के अन्य हिस्सों में होने की बात कही थी. लेकिन यकीन मानिए, गोविंदभोग चावल यूनीक है और इसलिए उसे जीआइ टैग मिला है.
बहरहाल, कुछ लोगों ने कतरनी चावल की याद दिलाते हुए उस पर लिखने के लिए भी कहा था. और कतरनी के बारे में सोचते हुए मुझे सबसे पहले उसकी खुशबू याद आई.

बिहार के ‘अंग क्षेत्र’ (भागलपुर और बांका) के खेतों में जब कतरनी का धान पकता है, तो उसकी सोंधी महक केवल हवा में नहीं तैरती, बल्कि वह उस माटी के संस्कार और आतिथ्य का उद्घोष करती है.

यह केवल एक अन्न नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अस्मिता है. आज के इस मशीनी जमाने में जब ‘फास्ट फूड’ ने थालियों पर कब्ज़ा कर लिया है, तब कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का मिलन एक ऐसी सात्विक तृप्ति प्रदान करता है, जिसकी तुलना किसी भी वैश्विक व्यंजन से नहीं की जा सकती.




कतरनी: सुगंध का स्वर्ण-अक्षत

भागलपुर और बांका की जलोढ़ मिट्टी में जब कतरनी धान के पौधे लहलहाते हैं, तो उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है. कतरनी चावल अपने छोटे कद, तीखे और सुगंधित दानों के लिए विश्वविख्यात है. इसे जीआई टैग प्राप्त है, जो इसके विशिष्ट होने की मुहर लगाता है. लेकिन इसका महत्व केवल सरकारी दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं है.
यह टैग क्यों महत्वपूर्ण है?

जीआई टैग मिलने का अर्थ यह है कि ‘कतरनी’ नाम का उपयोग केवल उसी चावल के लिए किया जा सकता है जो भागलपुर और बांका के भौगोलिक क्षेत्र में पारंपरिक विधियों से उगाया गया हो. यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी शुद्धता की गारंटी देता है और स्थानीय किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य दिलाने में मदद करता है.

कतरनी चावल को 28 मार्च, 2018 को आधिकारिक तौर पर भारत सरकार के भौगोलिक उपदर्शन रजिस्ट्री (जीआइ रजिस्ट्री) द्वारा जीआई टैग प्रदान किया गया था.

इस चावल के पंजीकृत रूप से मालिकाना हक भागलपुर जिला कतरनी धान उत्पादक संघ के पास है और उसके उत्पादन का इलाका भागलपुर, बांका और मुंगेर जिलों के विशिष्ट क्षेत्र हैं.

बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर ने कतरनी चावल के जीआई टैगिंग की प्रक्रिया में मुख्य तकनीकी भूमिका निभाई थी. मार्च, 2018 की सरकारी रिपोर्टों में बिहार के चार कृषि उत्पादों (कतरनी चावल, जर्दालु आम, मगही पान और शाही लीची) को एक साथ जीआई टैग मिलने का उल्लेख है.

अंग की लोक-संस्कृति में कहा जाता है कि कतरनी का धान जब घर आता है, तो पड़ोसी को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती; खुशबू खुद गवाही दे देती है. यह चावल जब पकता है, तो इसके दाने किसी श्वेत मोती की भांति चमकते हैं. इसकी मिठास और कोमलता इसे ‘चावलों की महारानी’ बनाती है. यह वह चावल है जिसे केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि मन को तृप्त करने के लिए खाया जाता है.


चूड़ा: सघन तपस्या का मधुर फल

कतरनी के धान से जब ‘चूड़ा’ (चिड़वा, पोहा) तैयार किया जाता है, तो यह एक लंबी प्रक्रिया और सघन धैर्य का परिणाम होता है. कतरनी के धान को हल्के गर्म पानी में भिगोकर, भूनकर और फिर लकड़ी के ओखल या मिल में कूटकर जो पतले, कागज़ जैसे झिलमिलाते चूड़े निकलते हैं, वे अद्भुत होते हैं.

कतरनी चूड़ा की विशेषता यह है कि यह अत्यंत सुपाच्य और स्निग्ध होता है. इसकी महक कच्चे धान की सोंधी खुशबू को समेटे रहती है.

बिहार के खान-पान में ‘दही-चूड़ा’ का स्थान सर्वोपरि है. मकर संक्रांति हो या जेठ की दुपहरी में मेहमान का स्वागत, चूड़ा-दही और चीनी/गुड़ का मेल एक मुकम्मल भोजन है. लेकिन जब यह चूड़ा कतरनी का हो, तो वह भोजन से ऊपर उठकर एक ‘अनुभव’ बन जाता है.

अंग से बाबाधाम: कतरनी और पेड़े का दिव्य संबंध

अब बात करते हैं उस ‘त्रिवेणी’ की, जो भागलपुर, सुल्तानगंज और देवघर के बीच बहती है. अंग प्रदेश की सीमाएं देवघर (झारखंड) की पहाड़ियों से जा मिलती हैं. यह संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और स्वादजन्य भी है.

सावन का महीना हो और सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर कांवड़िए जब बाबाधाम (देवघर) की ओर प्रस्थान करते हैं, तो उनकी पोटली में अक्सर ‘कतरनी का चूड़ा’ होता है. यात्रा के दौरान जब वे विश्राम करते हैं, तो मोटी मलाई वाली दही और कतरनी चूड़ा उनका मुख्य संबल बनता है.

लेकिन इस स्वाद की पूर्णता तब होती है, जब इसमें देवघर के विश्वविख्यात ‘पेड़े’ का समावेश होता है.
देवघर का पेड़ा, जो शुद्ध खोया और चीनी के मंद आंच पर कैरेमलाइज्ड होने से बनता है, अपनी एक विशिष्ट भूरी आभा और सोंधी मिठास के लिए जाना जाता है.

स्वाद का रसायन: चूड़ा-दही और पेड़ा

अंग क्षेत्र की मेहमानी में एक विशिष्ट परंपरा है—’दही-चूड़ा-पेड़ा’. कतरनी चूड़ा: जो आधार है, जो सुगंधित और हल्का है. गाढ़ा दही: जो शीतलता और क्रीमी टेक्सचर प्रदान करता है. और इसके साथ देवघर का पेड़ा, जो मिठास का वह चरम है, जो इस पूरे भोजन को एक ‘शाही डेजर्ट’ में बदल देता है.

अक्सर लोग दही-चूड़ा में चीनी या गुड़ मिलाते हैं, लेकिन मुझ जैसे पारखी लोग पेड़े को चूड़े के साथ मसलकर खाते हैं.

पेड़े की वह सोंधी मिठास जब कतरनी की खुशबू और दही की खटास के साथ मिलती है, तो मुँह में रसों का एक ऐसा विस्फोट होता है जिसे शब्दों में बांधना कठिन है. पेड़े का दानेदार होना और चूड़े का करारापन एक अद्भुत विरोधाभास पैदा करता है जो स्वाद की ग्रंथियों को झंकृत कर देता है.

सांस्कृतिक ताना-बाना और विरासत

भागलपुर का रेशम और यहाँ की कतरनी, दोनों ही सूक्ष्मता के प्रतीक हैं. वहीं देवघर का पेड़ा उस भक्ति और श्रद्धा का अंश है जो बाबा बैद्यनाथ के चरणों से जुड़ा है.

जब कोई व्यक्ति देवघर से लौटता है, तो उसके पास प्रसाद के रूप में पेड़े होते हैं और जब वह भागलपुर से गुजरता है, तो झोले में कतरनी चूड़ा. इन दोनों का साथ होना दो संस्कृतियों के मिलन का प्रतीक है.

जाहिर है, यह सब लिखते हुए मैं उस समय में लौट गया हूं, जब जीवन की गति धीमी थी. जब खेतों से अनाज सीधे ओखल तक आता था और पेड़े शुद्ध दूध से घंटों कढ़ाई में जलकर बनते थे. आज ‘पैकेज्ड’ और ‘इंस्टेंट’ के युग में कतरनी और देवघर के पेड़े का यह मेल हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है.

कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का यह कनेक्शन केवल भोजन की बात नहीं है; यह अंग और संथाल परगना के बीच के मधुर रिश्तों का सेतु है. यह माँ के हाथों से सानकर खिलाए गए उस ग्रास की याद है, जिसमें ममता का नमक और संस्कार की खुशबू मिली होती है.

यदि आप कभी अंग प्रदेश की यात्रा पर हों और दोपहर की सुनहरी धूप में आपको कोई कतरनी चूड़ा, गाढ़ी दही और देवघर के पेड़े परोस दे, तो समझियेगा कि आप केवल खाना नहीं खा रहे, बल्कि आप उस प्राचीन सभ्यता का हिस्सा बन रहे हैं जिसने स्वाद को भी ईश्वर की आराधना के समान पवित्र माना है. कतरनी की महक और पेड़े की मिठास, यही है हमारे अंग का असली गौरव, जो सदियों से हमारी जीभ पर एक मीठी याद बनकर अमर है.

अंग की धरती पर कतरनी का उगना केवल एक कृषि प्रक्रिया नहीं, बल्कि माटी के साथ किया जाने वाला एक प्रेम-अनुष्ठान है. आधुनिकता की आंधी के बावजूद, भागलपुर और बांका के गाँवों में आज भी कतरनी को सहेजने की विधियाँ वैसी ही हैं जैसी पूर्वजों के समय में थीं.

असल में, कतरनी चावल की पैदावार विशिष्ट पारंपरिक विधियों से की जाती है जो इस चावल की सुगंध और स्वाद को अक्षुण्ण रखती हैं:

पहली बात कि कतरनी की पैदावार के लिए विशिष्ट भूखंड का चयन किया जाता है. स्थानीय (और भौगोलिक रूप से) इसे दिआरा और तारी की माटी कहा जाता है.

कतरनी हर कहीं नहीं उग सकती. अंग के किसान आज भी पारंपरिक रूप से उन्हीं खेतों को चुनते हैं जहाँ गंगा या उसकी सहायक नदियों का पानी लौट चुका हो. विशेषकर ’तारी’ (ऊँची भूमि) और ’बलगाथ’ (हल्की दोमट) मिट्टी इसके लिए श्रेष्ठ मानी जाती है.

मान्यता है कि इस मिट्टी में मौजूद विशिष्ट खनिजों के कारण ही कतरनी में वह ‘2-AP’ नामक सुगंधित तत्व विकसित होता है.

पारंपरिक खेती में कतरनी के साथ यूरिया या रासायनिक खाद का प्रयोग वर्जित माना जाता है.

गाँवों में किसान आज भी ’गोबर की खाद’ और ’खेत की पुरानी कचवा’ (सड़ी हुई घास-फूस) का उपयोग करते हैं. तकनीकी रूप से यह सच है कि अधिक नाइट्रोजन (यूरिया) डालने से धान की लंबाई तो बढ़ जाती है, लेकिन उसकी मूल सुगंध कम हो जाती है. इसीलिए अंग के किसान ‘कम पैदावार’ मंजूर करते हैं, लेकिन ‘कम सुगंध’ नहीं.
कतरनी की रोपाई का समय बहुत महत्वपूर्ण है. सावन के आगमन के साथ ही इसके ’बिचड़े’ (नर्सरी) तैयार किए जाते हैं. पारंपरिक विधि में रोपाई के समय दो पौधों के बीच एक निश्चित दूरी रखी जाती है, ताकि हवा का संचार सही हो.

पारंपरिक ढेंकी, मशीनी युग में इसे कौन याद रखता है!


किसान रोपाई के समय अक्सर लोकगीत (कजरी) गाते हैं, जो इस थकाऊ काम को एक उत्सव बना देता है. साथ ही, बरहमासा गीत भी होते हैं.

फसल की कटाई और ‘अदहन’ का ध्यान

कतरनी को काटने का एक विशिष्ट समय होता है. जब बालियां सुनहरी हो जाएं और उनमें दूध सूखकर दाना कड़ा हो जाए, तभी इसे काटा जाता है. अधिक देर करने पर दाने खेत में ही झड़ने लगते हैं. कटाई के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में ’अदहन देना’ कहते हैं.

कतरनी चूड़ा बनाने की प्राचीन ‘भट्टी’ विधि

कतरनी का असली जादू उसके चूड़े में है, जिसे बनाने की पारंपरिक विधि आज भी मशीनों को मात देती है. सबसे पहले धान को बड़े लोहे के कड़ाहों में रात भर भिगोने के बाद आधा उबाला जाता है. यह प्रक्रिया बहुत सावधानी से की जाती है ताकि दाना फटे नहीं.

उबले हुए धान को मिट्टी के चूल्हे पर बालू के साथ भूना जाता है. यहाँ ‘अंदाज’ ही सब कुछ है; जरा सी चूक चूड़े को जला सकती है या उसे कच्चा छोड़ सकती है.

हालाँकि अब मशीनें आ गई हैं, लेकिन आज भी कुछ पुराने घरों में ’ढेंकी’ (लकड़ी का भारी लीवर) का प्रयोग होता है. ढेंकी से कूटा हुआ चूड़ा मोटा होता है, लेकिन उसकी मिठास और खुशबू मशीन वाले चूड़े से कहीं अधिक होती है.

कतरनी को लोहे के साइलो में नहीं, बल्कि मिट्टी से बनी ‘कोठी’ या ’बखार’ में रखा जाता है. मिट्टी के ये पात्र तापमान को नियंत्रित रखते हैं, जिससे कतरनी की सुगंध लंबे समय तक सुरक्षित रहती है.

अंग के गाँवों में कतरनी का उत्पादन कोई ‘बिजनेस’ नहीं, बल्कि एक ‘विरासत’ है. यहाँ का किसान अपनी फसल को संतान की तरह पालता है. कतरनी की वह विशिष्ट महक दरअसल उस किसान के पसीने, गंगा की माटी और ढीकी की थाप का सामूहिक संगीत है.

(तस्वीरें ढेंकी-जो अब दुर्लभ है. तथा कतरनी चावल की हैं. देवघर के पेड़े तो अब अमेजन पर भी उपलब्ध हैं)

Thursday, April 16, 2026

पुस्तक चर्चाः डोढ़ाय चरित मानस आम आदमी का महाकाव्य और भारतीय लोकतंत्र का कच्चा चिट्ठा

मैं लंबे समय से कथा और कथेतर पढ़ता आ रहा हूं. माटी की अद्बुत गंध की वजह से रेणु जी का लेखन बहुत पसंद रहा है और रेणुजी के बारे में भाई गिरीन्द्रनाथ झा से सुनना आह्लादकारी अनुभव रहा है.

इस महीने की शुरुआत में पटने में राजकमल के किताब उत्सव में गिरीन्द्रनाथ बारं-बार डोढ़ाय चरित मानस का जिक्र कर रहे थे. रही-सही कसर सत्यानंद निरुपम ने पूरी कर दी. नतीजतन, किताब उत्सव में ही मैंने सतीनाथ भादुड़ी का उपन्यास डोढ़ाय चरित मानस खरीद लिया और अड्डे पर विमान का दो-ढाई घंटे इंतजार करते हुए 35-40 पेज पढ़ डाले.

किताब पढ़ने की यह गति? नहीं. मैं उस किताब की भाषा से चमत्कृत हो गया था. मूल बांग्ला में लिखा यह उपन्यास उन जादुई हाथों की सरस्वती कलम से अनूदित हुआ है कि असल जैसा मजा आ जाता है. रेणुजी जैसी भाषा. वैसी ही शब्दावली. वैसे ही तेवर.

राजकमल प्रकाशन ने डोढ़ाय चरित मानस को
फिर से प्रकाशित किया है
                                  
असल में, हिंदी और भारतीय भाषाओं के साहित्य में कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ना भर एक पाठकीय अनुभव नहीं, बल्कि समय और समाज के भीतर उतरने की एक यात्रा होता है. डोढ़ाय चरित मानस ऐसी ही कृति है.
यह उपन्यास अपने समय के साथ-साथ हमारे समय को भी उतनी ही तीक्ष्णता से पढ़ता है. इसे पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि हम किसी बीते हुए भारत की कहानी नहीं, बल्कि आज के भारत की जड़ों को पढ़ रहे हैं.

सतीनाथ भादुड़ी का यह उपन्यास शीर्षक से ही एक दिलचस्प छल करता है. ‘चरित मानस’ यह शब्द आते ही स्मृति में सिर्फ भगवान श्रीराम की छवि उभरती है, जहाँ नायक एक आदर्श पुरुष है, मर्यादा का प्रतीक. लेकिन यहाँ भादुड़ी जिस ‘चरित’ को लिखते हैं, उसका नायक है डोढ़ाय.

एक साधारण, उलझा हुआ, परिस्थितियों में बहता हुआ मनुष्य.

यह शीर्षक दरअसल एक विडंबनात्मक उद्घोषणा है: यहाँ कोई राम नहीं है, यहाँ मनुष्य है, अपने सारे दोषों, कमजोरियों और भ्रमों के साथ.

सतीनाथ भादुड़ी


डोढ़ाय कोई असाधारण पात्र नहीं है. वह न तो क्रांतिकारी है, न दार्शनिक, न ही कोई नैतिक नायक. वह वही है, जो भारत के गाँवों में हर जगह दिखाई देता है. एक ऐसा आदमी, जो परिस्थितियों के साथ बहता है, कभी इधर, कभी उधर.

लेकिन भादुड़ी की ताकत यही है कि वे इसी ‘साधारण’ को असाधारण बना देते हैं.

डोढ़ाय का जीवन दरअसल उस दौर के भारतीय समाज का दर्पण बन जाता है, जहाँ स्वतंत्रता आंदोलन की ऊँची-ऊँची बातें गाँव की जमीन पर आकर अजीब-सी विडंबनाओं में बदल जाती हैं.



इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत इसका राजनीतिक दृष्टिकोण है. लेकिन, यह राजनीति ऊपर से नहीं, नीचे से देखी गई है. यहाँ गांधी, कांग्रेस, आंदोलन ये सब मौजूद हैं, लेकिन केंद्र में नहीं हैं. केंद्र में है वह आदमी, जो इन सबके बीच फँसा हुआ है.

डोढ़ाय राजनीति को समझने नहीं जाता, राजनीति उसे घेर लेती है. वह कभी आंदोलन का हिस्सा बनता है, कभी उससे दूर चला जाता है, कभी उसका इस्तेमाल होता है, और कभी वह खुद दूसरों का इस्तेमाल करता है. इस पूरे खेल में आदर्श धीरे-धीरे छीजते जाते हैं और बचती है सिर्फ एक कच्ची, असहज सचाई.

भादुड़ी का व्यंग्य यहाँ बहुत धारदार है, लेकिन वह शोर नहीं करता. वह चुपचाप, लगभग सहज ढंग से हमारे सामने खुलता है. यह व्यंग्य किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर है. उस राजनीति पर, जो जनता के नाम पर चलती है, लेकिन जनता को ही सबसे ज्यादा भ्रमित करती है.

इस लिहाज से देखें तो यह उपन्यास आगे चलकर राग दरबारी जैसी कृतियों की जमीन तैयार करता दिखाई देता है. फर्क बस इतना है कि जहाँ ‘राग दरबारी’ में व्यंग्य खुलकर सामने आता है, वहीं भादुड़ी के यहाँ वह धीमे-धीमे रिसता है.

उपन्यास का आंचलिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है. यह सिर्फ एक राजनीतिक कथा नहीं, बल्कि गाँव के जीवन का सूक्ष्म दस्तावेज़ है. भाषा, बोली, रीति-रिवाज, सामाजिक संबंध सब कुछ इतनी बारीकी से दर्ज है कि पाठक को लगता है, वह किसी गाँव में बैठा यह सब देख रहा है.

भादुड़ी की भाषा में एक तरह की ‘लोक गंध’ है. वह सजावटी नहीं है, लेकिन बेहद प्रभावी है. यह भाषा अपने आप में एक सांस्कृतिक प्रतिरोध भी है, क्योंकि यह उस समय के साहित्यिक मानकों से अलग रास्ता चुनती है. और जैसा, गिरीन्द्र बता रहे थे, यह रेणुजी की औपन्यासिक कथा-भूमि का प्रीक्वल है.

लेकिन इस उपन्यास को सिर्फ आंचलिकता तक सीमित करना उसके साथ अन्याय होगा. इसकी असली शक्ति इसके दार्शनिक अंतरतम में है.

डोढ़ाय का जीवन हमें बार-बार यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या मनुष्य वास्तव में अपने निर्णयों का स्वामी है, या वह सिर्फ परिस्थितियों का परिणाम है? क्या वह सच में कोई रास्ता चुनता है, या रास्ते उसे चुन लेते हैं? यह सवाल उपन्यास में कहीं सीधे नहीं पूछा गया, लेकिन हर घटना, हर मोड़ पर यह हमारे सामने खड़ा हो जाता है.

डोढ़ाय का चरित्र इसी संदर्भ में बेहद जटिल हो जाता है. वह न तो पूरी तरह निर्दोष है, न पूरी तरह दोषी. वह कभी सहानुभूति जगाता है, तो कभी झुंझलाहट. लेकिन शायद यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी सफलता है. यह हमें किसी एक नैतिक निष्कर्ष तक नहीं पहुँचने देता. यह हमें मजबूर करता है कि हम मनुष्य को उसकी पूरी जटिलता में देखें.

यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि भादुड़ी अपने पात्रों के साथ कोई नैतिक निर्णय नहीं सुनाते. वे उन्हें जज नहीं करते. वे सिर्फ उन्हें प्रस्तुत करते हैं. जैसे वे हैं. यह दृष्टिकोण अपने आप में बहुत आधुनिक है. यह हमें याद दिलाता है कि

साहित्य का काम सिर्फ उपदेश देना नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं को उजागर करना भी है.

अगर इस उपन्यास की तुलना करनी हो, तो हिंदी में गोदान का नाम स्वाभाविक रूप से आता है. लेकिन ‘गोदान’ जहाँ किसान जीवन की त्रासदी को अधिक भावुक और नैतिक धरातल पर प्रस्तुत करता है, वहीं ‘डोढ़ाय चरित मानस’ उस त्रासदी को एक राजनीतिक और विडंबनात्मक परिप्रेक्ष्य में देखता है. यहाँ करुणा है, लेकिन वह करुणा भी एक तरह की बेचैनी के साथ आती है.

आज के समय में इस उपन्यास को पढ़ना एक अलग ही अनुभव है. जब हम लोकतंत्र, राजनीति और आम आदमी की बात करते हैं, तो अक्सर हम बड़े सिद्धांतों और आदर्शों की बात करते हैं. लेकिन भादुड़ी हमें उस जमीन पर ले जाते हैं, जहाँ ये आदर्श टूटते हैं, बिखरते हैं और कई बार अपना अर्थ ही खो देते हैं.

संभवतया, अपने कथा वितान को अधिक तानने के लिए ही भादुड़ी डोढ़ाय को अपने गांव के मरनाधार से उठाकर (भगाकर) कोयरीटोला में जाकर स्थापित करते हैं. अपने मूल गांव में जहां बहुत सारे किरदार हैं, बौका बाबा हैं, रमिया है. महतो हैं, छड़ीदार हैं. रबिया है, नायब है, वहीं कोयरी टोला में भी सगिया नायिक है, मोसम्मात है, गिदन है, बाबू साहेब हैं.

राजनीति और जातीय कोण इस कथा को अधिक जटिल और अधिक परतदार बनाते हैं.

यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र सिर्फ चुनावों और नारों का खेल नहीं है, बल्कि वह उन लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी से बनता है, जिनकी आवाज़ अक्सर कहीं दर्ज ही नहीं होती.

‘डोढ़ाय चरित मानस’ इस मायने में सिर्फ एक उपन्यास नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ है. यह हमें उस भारत से मिलवाता है, जो अक्सर इतिहास की किताबों में नहीं मिलता. यह हमें बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ एक महान कथा नहीं था, बल्कि उसमें असंख्य छोटी-छोटी कहानियाँ थीं. भ्रम की, संघर्ष की, और कई बार विफलताओं की.

भादुड़ी की यह कृति इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह हमें अपने समय को समझने का एक आईना देती है. यह आईना चमकदार नहीं है, उसमें धुंधलापन है, खरोंचें हैं. लेकिन शायद सच हमेशा ऐसा ही होता है.

अगर आपने डोढ़ाय चरित मानस नहीं पढ़ा है और आप साहित्य के अनुरागी हैं तो आपको पहली फुरसत में यह किताब पढ़नी चाहिए. राजकमल ने नए कलेवर में इसी साल फिर से उतारा है.












Tuesday, March 31, 2026

महावीर का मार्ग: युद्धग्रस्त विश्व की रक्तिम क्षितिज पर शांति का सूर्योदय

मंजीत ठाकुर

आज की दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है. अगर हम वैश्विक मानचित्र पर नजर डालें, तो शांति के टापू कम और संघर्ष के अंगारे ज्यादा नजर आते हैं. रूस-यूक्रेन के अंतहीन मैदान हों, गाजा की मलबे में तब्दील होती गलियाँ हों, सूडान का रक्तरंजित गृहयुद्ध हो या म्यांमार की सुलगती सीमाएँ, मानवता आज अपनी ही बनाई घृणा की आग में झुलस रही है.

आधुनिक विज्ञान ने हमें विनाश के घातक हथियार तो दे दिए, लेकिन शांति से जीने का विवेक छीन लिया, ऐसे में 2500 वर्ष पूर्व वर्धमान महावीर द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत केवल ‘धार्मिक उपदेश’ नहीं, बल्कि वैश्विक अस्तित्व को बचाने के ‘रणनीतिक सूत्र’ प्रतीत होते हैं.

भगवान महावीर का दर्शन मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिका है, जो आज के भू-राजनीतिक संकटों का सटीक उपचार प्रतीत होता है.
भगवान महावीर


महावीर की अहिंसा कायरता का नाम नहीं है, बल्कि यह विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है. उन्होंने कहा था, ‘अहिंसा परमो धर्मः’.

मौजूदा वक्त में रूस और यूक्रेन तथा अमेरिका-इजरायल-ईरान के बीच के संघर्ष मूलतः ‘अहं’ और ‘विस्तारवाद’ की उपज है.

महावीर सिखाते हैं कि हिंसा केवल शरीर की नहीं होती, वह वाणी और विचार की भी होती है. जब तक एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के अस्तित्व को सहिष्णुता के साथ स्वीकार नहीं करेगा, तब तक युद्ध के बादल नहीं छंटेंगे. उनका सूत्र ‘जियो और जीने दो’ आज के ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता यानी सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ के हिंसक सिद्धांत का मानवीय विकल्प है.

आज की दुनिया में सबसे बड़ा संघर्ष ‘विचारधारा’ का है. ‘मेरा सच ही एकमात्र सच है’ यह हठधर्मिता ही इजरायल-फिलीस्तीन जैसे दशकों पुराने संघर्षों की जड़ है.

महावीर ने ‘अनेकांतवाद’ का सिद्धांत दिया, जिसका अर्थ है कि सत्य के कई पहलू हो सकते हैं.

यदि आज के राजनेता और राष्ट्रों के नेतृत्वकर्ता ‘अनेकांतवाद’ को अपना लें, तो वे समझेंगे कि विरोधी पक्ष का भी अपना एक सत्य हो सकता है.

यह सिद्धांत ‘वैचारिक सहिष्णुता’ पैदा करता है. यदि हम दूसरे के दृष्टिकोण को स्थान देना शुरू कर दें, तो संवाद के द्वार खुलेंगे और युद्ध की विभीषिका स्वतः समाप्त होने लगेगी. अनेकांतवाद वास्तव में आधुनिक ‘लोकतंत्र’ और ‘बहुलवाद’ की रूह है.

इतिहास गवाह है कि अधिकांश युद्ध जमीन, तेल, पानी या खनिजों के कब्जे के लिए लड़े गए हैं. सूडान और मध्य अफ्रीका में चल रहे गृहयुद्धों के पीछे संसाधनों की अंधी दौड़ है. महावीर का ‘अपरिग्रह’ (सीमा से अधिक संग्रह न करना) का सिद्धांत आज के ‘कंज्यूमरिज्म’ (उपभोक्तावाद) पर करारा प्रहार है.

यदि मनुष्य और राष्ट्र अपनी जरूरतों को सीमित करना सीख लें, तो संसाधनों के लिए होने वाली मारकाट खत्म हो सकती है.

अपरिग्रह केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं, बल्कि एक ‘इकोनॉमिक मॉडल’ है जो पारिस्थितिक संतुलन और वैश्विक न्याय की बात करता है.

आज दुनिया दो गुटों में बंटी है. एक तरफ नाटो जैसे सैन्य गठबंधन हैं, तो दूसरी तरफ उनके विरोधी. इस गुटबाजी ने शीत युद्ध के उस दौर को वापस ला दिया है जहाँ ‘परमाणु निवारण’ (न्यूक्लियर डेटरेंस) ही शांति का एकमात्र आधार माना जा रहा है. लेकिन क्या भय के आधार पर स्थापित शांति स्थायी हो सकती है?

आज के दौर में ऐसा प्रतीत होता है मानो तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में टुकड़ो-टुकड़ों में लड़ा जा रहा है. ईरान-अमेरिका-इजरायल तथा रूस-यूक्रेन समेत बड़े-छोटे युद्धों और गृहयुद्धों तथा नस्लीय लड़ाइयों को मिला लें इस वक्त पूरी दुनिया में 67 युद्ध हो रहे हैं.

म्यांमार से लेकर सीरिया तक, जहाँ भाई भाई के खून का प्यासा है, वहाँ महावीर का ‘आत्मौपम्य’ (स्वयं के समान दूसरों को समझना) का सिद्धांत प्रासंगिक है. जब हम दूसरे के दुख को अपना दुख समझने लगते हैं, तो हाथ की तलवार अपने आप गिर जाती है.

यह दौर सूचना युद्ध का है. आज नफरत फैलाने के लिए ‘डिजिटल हिंसा’ का सहारा लिया जा रहा है. महावीर की ‘सत्य’ और ‘अचौर्य’ की शिक्षाएँ हमें सिखाती हैं कि भ्रामक सूचनाओं के माध्यम से किसी की प्रतिष्ठा की चोरी करना भी हिंसा है.

भगवान महावीर ने राजपाट छोड़कर जंगलों में तपस्या इसलिए नहीं की थी कि वे दुनिया से भागना चाहते थे, बल्कि इसलिए की थी ताकि वे मनुष्य के भीतर छिपे ‘आंतरिक शत्रुओं’ यानी क्रोध, मान, माया और लोभ को जीत सकें.

उन्होंने कहा था कि “हजारों योद्धाओं पर विजय पाना आसान है, लेकिन स्वयं पर विजय पाना ही असली जीत है.”

आज के दौर के ‘पुतिन’, ‘नेतन्याहू’ या अन्य वैश्विक नायकों को जिस जीत की तलाश है, वह लाशों के ढेर से होकर गुजरती है. लेकिन महावीर की जीत ‘हृदय परिवर्तन’ से शुरू होती है.

यदि वर्तमान विश्व को तृतीय विश्व युद्ध की विभीषिका से बचना है, तो उसे ‘संयुक्त राष्ट्र’ के चार्टर के साथ-साथ महावीर के ‘अनेकांतवाद’ के घोषणापत्र को भी अपनी मेज पर रखना होगा.

भगवान महावीर आज केवल जैन धर्म के तीर्थंकर नहीं, बल्कि एक वैश्विक नागरिक (ग्लोबल सिटीजन) के रूप में प्रासंगिक हैं. उनकी शिक्षाएँ उस ‘मरहम’ की तरह हैं जो युद्धग्रस्त दुनिया के घावों को भर सकती हैं.

शांति सेनाओं से नहीं, बल्कि उस चेतना से आएगी जो यह स्वीकार करे कि ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ अर्थात सभी जीव एक-दूसरे के पूरक हैं.

Saturday, March 21, 2026

सेमल: पर्यावरण, वन्य जीवन और साहित्य और जीवन दर्शन का पेड़

मंजीत ठाकुर

इन दिनों सड़कों पर ऊंचे तने वाले तने हुए पेड़ों पर लाल बड़े और मांसल फूलों के खिलने का मौसम है. इन्हें देखकर मुझे हितोपदेश की कहानी याद आती है जो हमने आठवीं की संस्कृत की किताब में पढ़ी थी—

अस्ति गोदावरी तीरे एकः शाल्मलीः तरूः

गोदावरी नदी के किनारे सेमल का एक पेड़ था. कहानी में आगे क्या हुआ इसे छोड़िए पर पेड़ याद रह गया. यह पेड़ था सेमल का, जिसके फूलों से इन दिनों फिजां रंगीन है.

प्रकृति के पंचांग में वसंत केवल फूलों के खिलने का मौसम नहीं है; यह एक विराट उत्सव है, एक ऐसा समय जब पृथ्वी अपने मौन को तोड़कर रंगों और सुगंधों के माध्यम से बोल उठती है. आम में जब बौर आते हैं, जिसे हमलोग मिथिला में इसे आम में मंजर आना कहते हैं, तो आम की बौर की मादक गंध और पलाश की प्रचंड लपटों के बीच, एक और जादुई उपस्थिति होती है, जो अपनी भव्यता और निश्छलता में बेजोड़ है. यह उपस्थिति है सेमल की.

महाभारत के ‘शांति पर्व’ में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को ‘अहंकार के दुष्परिणाम’ समझाने के लिए एक कहानी सुनाते हैं.

हिमालय पर एक विशाल और प्राचीन शाल्मली (सेमल) का वृक्ष था. उसे अपनी विशालता और मजबूती पर बड़ा गर्व था. एक बार उसने पवन देव को चुनौती देते हुए कहा, “हे वायु! तुम दुनिया के बड़े-बड़े वृक्षों को उखाड़ फेंकते हो, लेकिन मेरा एक पत्ता भी नहीं हिला सकते. इसका अर्थ है कि मैं तुमसे अधिक शक्तिशाली हूँ.”

वायुदेव ने उसे बहुत समझाया कि उनकी शक्ति से ही जीवन चलता है, पर वृक्ष नहीं माना. अंत में, वायुदेव ने कहा कि वे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेंगे. सेमल के वृक्ष को अपनी भूल का आभास हुआ कि कल जब तेज आंधी आएगी, तो वह टूट जाएगा.

अपने मान की रक्षा के लिए उसने स्वयं ही अपनी टहनियाँ और पत्ते त्याग दिए ताकि वायु को टकराने का मौका न मिले.

जब वायुदेव आए, तो उन्होंने देखा कि वृक्ष पहले ही ‘नग्न’ और ‘शक्तिहीन’ हो चुका है. वायुदेव ने कहा, “अहंकार का अंत स्वयं के विनाश से ही शुरू होता है.” 

यह घटना आज भी भारतीय दर्शन में ‘विनम्रता’ के महत्व को दर्शाने के लिए उद्धृत की जाती है.

बहरहाल, सेमल रंग और सौंदर्य का एक तिलिस्म रचता है. यह विशाल, रक्तिम मशाल आसमान की तरफ सर उठाकर वसंत के आगमन की घोषणा करती है.

सेमल केवल एक पेड़ नहीं है; यह एक मौसम है, एक परंपरा है, एक ऐसा अनुभव है जो हमारी संस्कृति के रग-रग में समाया हुआ है.

इन दिनों, जब हवा गुनगुनी हो चली है और धूप में हल्की तपिश आ गई है, सेमल का मौसम अपने चरम पर है, चारों ओर एक रक्तिम और श्वेत उत्सव रच रहा है.




सेमल है कुदरत की रक्तिम कविता

वसंत के आते ही, सेमल का पेड़ एक नए रूप में अवतार लेता है. इसकी नग्न शाखाएँ, जो सर्दियों की ठिठुरन में सूखी और बेजान-सी लग रही थीं, अचानक गहरे लाल रंग के बड़े, कटोरे जैसे फूलों के गुच्छों से लद जाती हैं. ये फूल, मांसल और ठोस, जैसे प्रकृति के सिंदूर के पात्र हों, सीधे आकाश की ओर मुख किए हुए होते हैं.

सेमल के फूल का सौंदर्य इसकी सघनता और इसकी ज्वलंतता में निहित है. एक ही पेड़ पर सैकड़ों फूल, एक साथ खिलकर, एक ऐसा दृश्य रचते हैं जैसे कोई पेड़ों की शाखाएं आग की लपटों से जल रहा हो.

इन फूलों की रक्तिम आभा दूर से ही आँखों को चकाचौंध कर देती है, जैसे हवा में तैरता हुआ कोई विशाल अग्निकुंड.

सेमल के फूलों का खिलना केवल आँखों के लिए ही सुखद नहीं है; यह प्रकृति के अन्य प्राणियों के लिए भी एक बुलावा है.

जैसे ही ये फूल खिलते हैं, पेड़ पक्षियों के लिए एक महान सभा स्थल बन जाता है. मैना, कोयल, तोते, और अनगिनत अन्य पक्षी फूलों पर बैठते हैं, उनके पराग का आनंद लेते हैं, और एक-दूसरे से गुफ्तगू करते हैं. सेमल का पेड़ एक जीवित, जीवंत मंच बन जाता है, जहाँ वसंत का संगीत और नृत्य एक साथ चलता है. फूलों के गिरते ही, ज़मीन पर एक रक्तिम कालीन बिछ जाता है, जो किसी शाही बारात के लिए तैयार किया गया हो. इस कालीन पर चलना, जैसे वसंत के हृदय पर चलना हो.

लोककथाओं में सेमल को ‘पशु-पक्षियों का सराय’ कहा जाता है. चूंकि इसके फूल रसीले होते हैं और इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है, इसलिए भीषण गर्मी में जब जंगल के अन्य स्रोत सूख जाते हैं, तब सेमल के फूल पक्षियों और बंदरों की प्यास बुझाते हैं.



सेमल के फूलों का सौंदर्य और उनकी बहुतायत ने प्राचीन काल से ही कवियों और साहित्यकारों को आकर्षित किया है. संस्कृत साहित्य में वसंत का वर्णन सेमल के बिना अधूरा है. महाकवि कालिदास ने अपने विख्यात ग्रंथ ‘ऋतुसंहार’ में वसंत ऋतु का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है, जहाँ वे सेमल के फूलों का उल्लेख करते हैं:

प्रफुल्लचूतद्रुमकोरकाणां विकाशिनां शाल्मलिपादपानाम्.

चकास्ति लोकेऽयमतुल्यरागः सर्वत्र संचारिणि पुष्पकाले॥”


(ऋतुसंहार, वसंत-वर्णनम्, श्लोक 7)

इस श्लोक का अर्थ है: “जब आम के पेड़ों पर बौर खिल रहे होते हैं और सेमल के पेड़ फूलों से लद जाते हैं, तब इस अतुलनीय प्रेममय पुष्प-काल में सब कुछ देदीप्यमान हो उठता है.” यहाँ ‘शाल्मलि’ सेमल के लिए प्रयुक्त संस्कृत शब्द है, जो इस पेड़ की प्राचीनता और साहित्यिक महत्ता को दर्शाता है.

झारखंड के इतिहास में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए ‘उलगुलान’ (विद्रोह) के दौरान भी पेड़ों का बड़ा महत्व था. हालांकि साल का पेड़ मुख्य था, लेकिन सेमल के लाल फूलों का उपयोग अक्सर संदेश भेजने या ‘क्रांति के रंग’ के रूप में लोकगीतों में किया जाता था. सेमल की रुई के उड़ने को अक्सर ‘आजादी के सपनों’ के फैलने की उपमा दी गई है.

भारतीय जनमानस में सेमल से जुड़ा एक बहुत प्रसिद्ध मुहावरा है “सेमल का फूल होना.” इसका अर्थ है— ‘किसी ऐसी चीज पर मोहित होना जिसका परिणाम शून्य या व्यर्थ हो.’

यह लोककथा एक तोते पर आधारित है जो सेमल के बड़े और सुंदर फूल को देखकर इस उम्मीद में बैठा रहता है कि जब यह फल बनेगा, तो उसे मीठा गुदा मिलेगा. लेकिन अंत में जब फल फटता है, तो केवल ‘रुई’ निकलती है जो हवा में उड़ जाती है. यह मुहावरा संसार की माया और मोह के झूठे आकर्षण को दर्शाने के लिए सदियों से इस्तेमाल होता आ रहा है.

बहरहाल, मौसम में गरमाहट बढ़ती है तो सेमल के फूलों का स्थान फल लेने लगते हैं. कली से फल बनने की यह प्रक्रिया एक और चमत्कार है. फल, जो शुरू में छोटे और हरे होते हैं, धीरे-धीरे बढ़ते हैं और एक विशिष्ट आकार ले लेते हैं.

कुछ समय बाद, जब धूप और तेज हो जाती है, ये फल पककर फट जाते हैं. और तब शुरू होता है सेमल का एक और अद्भुत मौसम. रुई का मौसम.

फलों के फटने से सफेद, रेशमी रुई के अनगिनत गुच्छे हवा में तैरने लगते हैं. यह जैसे हवा में उड़ते हुए श्वेत बादल हों, या तैरते हुए सपने.

सेमल की रुई का उड़ना, वसंत के अंत और ग्रीष्म के आगमन का संकेत है. हवा शांत हो जाती है, और केवल ये श्वेत गुच्छे हवा में तैरते हुए दिखाई देते हैं. यह एक शांत, मौन उत्सव है.

बच्चे इन उड़ते हुए गुच्छों के पीछे भागते हैं, उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं, जैसे किसी परी को पकड़ने की कोशिश कर रहे हों. सेमल की रुई को ‘शाल्मली-रुई’ भी कहा जाता है, जो अपने रेशमीपन और कोमलता के लिए प्रसिद्ध है. हालांकि, इसे फ्री या नश्वर कहा जाता है, क्योंकि इसका कोई स्थायी उपयोग नहीं है, जैसे सूती रुई का होता है. यह रुई केवल कुछ दिनों के लिए हवा में तैरती है और फिर गायब हो जाती है.

यही नश्वरता सेमल की रुई को साहित्यिक प्रतीक बनाती है. यह जीवन की व्यर्थता, सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता, और भौतिक वस्तुओं के प्रति मोह को दर्शाती है.

‘भर्तृहरि-शतकत्रय’ में एक श्लोक है-

शाल्मलीतरुणि प्रोद्यत्कुसुमे शुकसङ्गतिः।

केवलं फललोभेन फले सति तु तूलिका॥

यानी, सेमल के वृक्ष पर खिले हुए (लाल और आकर्षक) फूलों को देखकर तोता उस पर बड़ी आशा के साथ आता है. वह वहाँ केवल भविष्य में मिलने वाले मीठे फल के लोभ में रुकता है, लेकिन अंततः जब फल पकता है, तो उसमें से केवल तूला (रुई) निकलती है.

सेमल केवल एक फूल और रुई देने वाला पेड़ नहीं है; यह एक बहुआयामी विरासत है. इसकी लकड़ी हल्की और टिकाऊ होती है, जिसका उपयोग माचिस की तिल्लियाँ, पैकिंग बॉक्स, और अन्य घरेलू वस्तुएँ बनाने में किया जाता है. इसकी छाल, पत्ते, और फूल कई औषधीय गुणों से भरपूर हैं, जिनका उपयोग आयुर्वेद में विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है.

सेमल के तने पर काँटे होते हैं, जो इसे एक सुरक्षात्मक घेरा प्रदान करते हैं, जैसे कोई योद्धा अपनी सुरक्षा के लिए हथियार धारण किए हो. यह काँटेदार तना, इसे “जंगल का रक्षक” बनाता है.

मान्यता है कि जब भक्त प्रह्लाद को खंभे से बांधा गया था, तो वह खंभा सेमल का ही था. भगवान की कृपा से वे कांटे प्रह्लाद के लिए कोमल बन गए. आज भी कई गाँवों में होली जलने के बाद उस सेमल के डंडे को जलने से बचाकर सुरक्षित निकाल लिया जाता है, जो प्रह्लाद की विजय का प्रतीक माना जाता है.

इसकी दृढ़ता और विशालता भी इसे एक विशेष स्थान देती है. यह एक ऐसा पेड़ है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है, और एक अनूठे तरीके से सौंदर्य और उपयोगिता दोनों प्रदान करता है. सेमल का पेड़, अपनी रक्तिम मशाल और श्वेत सपनों के साथ, हमारे लिए प्रकृति की उस शक्ति का प्रतीक है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखती है और एक अनूठे तरीके से सौंदर्य और उपयोगिता दोनों प्रदान करती है.

आज जब हम सेमल के मौसम का आनंद ले रहे हैं, तो हमें इस बहुमूल्य विरासत को सहेजने और उसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता है. यह केवल एक पेड़ नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारे साहित्य, और हमारी परंपराओं का एक अभिन्न हिस्सा है.

सेमल का मौसम हमें यह याद दिलाता है कि सौंदर्य और उपयोगिता दोनों एक साथ रह सकते हैं, और यह कि प्रकृति के हर पहलू में एक गहरा संदेश छिपा होता है. आइए, इस रक्तिम और श्वेत उत्सव को मनाएँ, और सेमल की विरासत को अगली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें. सेमल का मौसम एक बार फिर आएगा, अपनी रक्तिम मशाल और श्वेत सपनों के साथ, और हमें फिर से एक नया संदेश देगा.


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Saturday, March 14, 2026

अफवाह, डर और बाजार: भारत में पैनिक बाइंग का सामाजिक मनोविज्ञान

आज रसोई गैस सिलिंडर देश की कथित कमी देश की सबसे महत्वपूर्ण समस्या बनी दिख रही है. जिसकी टाइम लाइन पर जाइए, यही दिख रहा है. मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसी समस्या नहीं होगी, या यह निरी झूठ है. पर इसी के बहाने आज की पोस्ट अफवाहों के आधार पर होने वाली पैनिक बाइंग और उसकी साइकोलजी पर.

भारत जैसे बड़े और विविध समाज में अफवाहें केवल सूचना की गलती नहीं होतीं, वे अक्सर सामूहिक व्यवहार को बदल देने वाली सामाजिक शक्ति बन जाती हैं. पिछले दो दशकों में कई बार ऐसा देखा गया है कि नमक, दाल, नींबू, प्याज या पेट्रोलजैसी चीजों की कमी की खबर फैलते ही लोग अचानक दुकानों पर टूट पड़ते हैं और जरूरत से कहीं ज्यादा खरीदारी करने लगते हैं. इस तरह की स्थिति को पैनिक बाइंग कहा जाता है.

2006 और 2016 में उत्तर भारत के कई हिस्सों में नमक को लेकर अचानक अफवाह फैल गई कि नमक बाजार से गायब हो जाएगा या बहुत महंगा हो जाएगा. परिणाम यह हुआ कि लोग रातों-रात दुकानों पर लाइन लगाकर नमक खरीदने लगे.

 

2006 में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के कई हिस्सों में अचानक यह अफवाह फैल गई कि नमक बाजार से गायब होने वाला है या बहुत महंगा हो जाएगा. कई जगह 5–10 रुपये किलो वाला नमक 50 से 100 रुपये किलो की रेट पर बिकने लगा.

सरकार और प्रशासन को सार्वजनिक घोषणा करके कहना पड़ा कि नमक की कोई कमी नहीं है. तब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी.

नवंबर 2016 में नोटबंदी के कुछ दिनों बाद फिर से उत्तर भारत में नमक महंगा होने और खत्म होने की अफवाह फैल गई. दिल्ली, यूपी, बिहार, उत्तराखंड और हरियाणा में दुकानों पर भीड़ लग गई. सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप मैसेज इस अफवाह के मुख्य कारण बताए गए. सरकार ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि नमक का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है.

यह केवल आर्थिक घटना नहीं है; इसके पीछे सामाजिक मनोविज्ञान काम करता है, इसके पीछे डर, असुरक्षा, भीड़-व्यवहार और अफवाहों का असर. खासकर भारतीयों की आदत है, कल पेट्रोल का दाम बढ़ेगा तो आज ही टंकी फुल करवा लो.

लॉ कडा उन की घोषणा होते ही लोगों ने बड़ी मात्रा में आटा, दाल, चावल और अन्य जरूरी चीजें खरीदना शुरू कर दिया. असल में उस समय वस्तुओं की आपूर्ति पूरी तरह बंद नहीं हुई थी, लेकिन अनिश्चित भविष्य की आशंका ने लोगों को अधिक खरीदारी करने के लिए प्रेरित किया.

पैनिक बाइंग का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है अफवाहों का तेज़ प्रसार.

आज सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप के दौर में अफवाह फैलाने यह प्रक्रिया और तेज़ हो गई है. एक गलत संदेश कुछ ही घंटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाता है और धीरे-धीरे विश्वसनीय सूचना जैसा दिखने लगता है. खासकर, सरकार विरोधी लोगों को इससे काफी मौका मिला है. आप अपने ही टाइम लाइन पर देखें तो आपको मोदी, भाजपा, सरकार विरोधी रुझान रखने वाले लोगों की वॉल पर सिलिंडर की कतारों वाली वीडियो या पोस्ट किसी न किसी रूप में दिख ही जाएगी. दूसरी तरफ, सरकार का बचाव करने वाले या मोदी या भाजपा समर्थक हास्यास्पद रूप से लकड़ी के चूल्हे के इस्तेमाल या उस पर बनी रोटियों के फायदे गिनवा रहे हैं और इसमें कई सारे अहमक लेकिन मशहूर एंकर भी शामिल हैं.

लेकिन अफवाहों से साथ एक बात यह है कि जब तक सरकार या प्रशासन सफाई देता है, तब तक बाजार में अफरातफरी फैल चुकी होती है.

सामाजिक मनोविज्ञान का एक सिद्धांत है ‘हर्ड बिहेवियर’ यानी झुंड की तरह व्यवहार करना. इसका मतलब है कि लोग अक्सर दूसरों को देखकर अपना निर्णय बदल लेते हैं.

अगर किसी व्यक्ति को यह खबर मिलती है कि नमक या दाल खत्म हो सकती है, तो वह शायद तुरंत प्रतिक्रिया न दे. लेकिन जब वह देखता है कि पड़ोसी, रिश्तेदार या बाजार के लोग तेजी से खरीदारी कर रहे हैं, तो उसे लगता है कि शायद वास्तव में संकट है.

इस तरह दूसरों का व्यवहार ही सबसे बड़ा संकेत बन जाता है और अफवाह सच जैसी लगने लगती है.

2019–2020 तो आप शायद भूल ही गए होंगे जब प्याज और दाल की जमाखोरी शुरू हो गई थी. हालांकि यह पूरी तरह अफवाह नहीं थी, लेकिन प्याज और दाल की कीमतों में अचानक उछाल के कारण लोगों ने बड़े पैमाने पर खरीदारी शुरू कर दी.

कई शहरों में लोगों ने महीनों का स्टॉक खरीद लिया. सरकार को आयात और स्टॉक लिमिट जैसे कदम उठाने पड़े.

मार्च 2020 में जब देश में कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन की घोषणा हुई, तब लोगों ने दाल, आटा, नमक, तेल, मसाले और सूखी सब्जियों का बड़े पैमाने पर स्टॉक करना शुरू कर दिया. कई शहरों में दुकानों पर लंबी कतारें लग गईं. सरकार और राज्यों को बार-बार कहना पड़ा कि खाद्य आपूर्ति बाधित नहीं होगी.

2022 में गर्मियों के दौरान नींबू की कीमत अचानक कई शहरों में 300–400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई. सोशल मीडिया पर खबरें फैलने लगीं कि नींबू की भारी कमी हो गई है. कई जगह लोगों ने नींबू खरीदकर स्टॉक करना शुरू कर दिया. सोशल मीडिया पर बौद्धिक समझी जाने वाली लेखक-लेखिकाओं तक ने नींबू-राग गाना शुरू कर दिया था.

2023 में टमाटर की कीमत 200 रुपये किलो तक पहुंचने पर लोगों ने टमाटर, प्याज और मसालों की अतिरिक्त खरीदारी शुरू कर दी. कई घरों में धनिया और सूखे मसालों का स्टॉक जमा किया गया.

2024 में अरहर दाल और कुछ मसालों के दाम बढ़ने की खबरों के बाद कई शहरों में लोगों ने दाल और मसालों की ज्यादा मात्रा में खरीदारी शुरू कर दी. सरकार को स्टॉक सीमा और आयात बढ़ाने जैसे कदम उठाने पड़े.

इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखाई देता है: अफवाह या कीमत बढ़ने की खबर, सोशल मीडिया या लोकल चर्चा से डर का फैलना, लोगों द्वारा जरूरत से ज्यादा खरीदारी, सरकार या प्रशासन द्वारा सफाई

दिलचस्प बात यह है कि कई बार असली कमी बाद में पैदा होती है.

जब हजारों लोग एक साथ जरूरत से ज्यादा खरीदारी करते हैं, तो दुकानों का स्टॉक जल्दी खत्म हो जाता है. इससे बाजार में यह संदेश जाता है कि वस्तु सचमुच कम हो गई है. इस तरह पैनिक बाइंग खुद ही कृत्रिम कमी पैदा कर देती है.

उदाहरण के लिए, नींबू या प्याज की कीमतें बढ़ने पर लोग अचानक अधिक मात्रा में खरीदने लगते हैं, जिससे बाजार में मांग अचानक बढ़ जाती है और कीमतें और ऊपर चली जाती हैं.

पैनिक बाइंग के पीछे एक गहरा कारण सिस्टम पर भरोसे की कमी भी है.

अगर लोगों को भरोसा हो कि सरकार, बाजार और आपूर्ति प्रणाली स्थिर है, तो वे घबराहट में खरीदारी नहीं करेंगे. लेकिन जब लोगों को लगता है कि व्यवस्था कमजोर है या सूचना विश्वसनीय नहीं है, तो वे अपने स्तर पर सुरक्षा तलाशने लगते हैं.

इसलिए पैनिक बाइंग केवल बाजार की समस्या नहीं, बल्कि विश्वास की सामाजिक समस्या भी है.

मीडिया और सोशल मीडिया दोनों इस स्थिति को प्रभावित करते हैं.

अगर किसी वस्तु की कीमत बढ़ने की खबर सनसनीखेज तरीके से दिखाई जाती है, तो यह भी घबराहट पैदा कर सकती है. वहीं जिम्मेदार पत्रकारिता अफवाहों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

स्पष्ट, त्वरित और भरोसेमंद सूचना पैनिक बाइंग को काफी हद तक रोक सकती है.

सबसे जरूरी यह है कि समाज समझे कि जरूरत से ज्यादा खरीदारी केवल व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं, बल्कि सामूहिक संकट पैदा कर सकती है.

अगर समाज यह समझ ले कि घबराहट की जगह विवेक से काम लेना ही सबसे बड़ा सुरक्षा उपाय है, तो शायद नमक, दाल या नींबू जैसी साधारण चीजें भी कभी राष्ट्रीय चिंता का विषय नहीं बनेंगी.

Thursday, February 26, 2026

AI के भय और इसके अत्यधिक इस्तेमाल पर छोटी टीप

आजकल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पर लिखा जाने वाला लगभग हर दूसरा लेख किसी मर्सिए की तरह लगता है. हर किसी का ऐलान है, यह तकनीक आपकी नौकरी छीन लेगी, आपका दिमाग़ खोखला कर देगी या पूरी सभ्यता की ज्ञान-प्रणाली को ही ध्वस्त कर देगी और कुछ लेखों में तो तीनों काम एक साथ होने का पूर्वानुमान भी है. सोशल मीडिया इन अंदेशों को तेजी से फैलाता है, भले ही खुद सोशल मीडिया एआइ के दम पर उड़ान भरता है.

लेकिन सोचिए जरा. लोग वास्तव में क्या कर रहे हैं? लोग इन दिनों लगभग हर काम के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. जो लेखक ‘मौलिक सोच के खात्मे’ की चेतावनी देते हैं, वही इससे ईमेल लिखवाते हैं और लेख संपादित कराते हैं. जो पेशेवर विशेषज्ञता के पतन का रोना रोते हैं, वही इससे कानूनी धाराएं और टैक्स से जुड़े सवाल पूछते हैं. यहां एक विरोधाभास है, और इससे भागने के बजाय इस पर ठहरकर सोचने की ज़रूरत है.

 

यह स्थिति सहज नहीं है. कभी तो इसका भाषा मॉडल ज्ञान-कर्म, लेखन और शायद मानव चिंतन की नींव को ही कमजोर करता लगता है और कभी उसी की मदद से लोग डॉक्टर की पर्ची समझने की कोशिश कर रहे होते हैं। यह तो सचमुच अद्भुत है.

तकनीकी डर कोई नई बात नहीं है. इतिहास में नई तकनीकों को लेकर घबराहट की लंबी और कुछ हद तक हास्यास्पद परंपरा रही है. जब 1830 के दशक में ब्रिटेन में रेल आई, तो डॉक्टरों ने गंभीरता से चेतावनी दी कि मानव शरीर इतनी गति सह नहीं पाएगा. ‘रेलवे मैडनेस’ जैसी बीमारी की खबरें छपने लगीं. एक अमेरिकी यात्री तो कथित पागलों से बचने के लिए रिवॉल्वर लेकर चलता था.

रानी विक्टोरिया ने भी 1842 में पहली रेल यात्रा के बाद लिखा कि उन्हें यह बहुत पसंद आई, लेकिन वे गति से चिंतित थीं. उन्होंने दिन में 40 और रात में 30 मील प्रति घंटा की सीमा तय कर दी.

किताबों के आने पर भी ऐसी ही चिंता हुई थी. 1481 में वेनिस के संपादक हियरोनिमो स्क्वार्सियाफिको ने कहा था कि छपाई अशिक्षित लोगों के हाथों में पड़ गई है और सब कुछ बिगाड़ रही है. उन्होंने लिखा कि किताबों की अधिकता लोगों को ‘कम अध्ययनशील’ बना देती है और यह बात उन्होंने एक छपी हुई किताब में लिखी.

बीसवीं सदी में टेलीविजन को लेकर भी ऐसी ही बातें और गप चली. न्यूटन मिनो ने 1961 में इसे हिंसा और मूर्खता से भरा बताया. बाद में उन्होंने कहा कि वे असल में ‘लोकहित’ की याद दिलाना चाहते थे.

इसका मतलब यह नहीं कि डर बेबुनियाद थे. हर बदलाव में कुछ नुकसान भी हुए. इंग्लैंड के हथकरघा बुनकरों की दुनिया ही खत्म हो गई थी. नुकसान असली थे. असली सवाल यह है कि समाज सुरक्षा-व्यवस्था बनाता है या नहीं. एआई के मामले में तकनीक आ चुकी है, लेकिन नियम नहीं. असली समस्या यही है.

एक और भ्रम यह है कि हम औज़ार और उसके उपयोग को एक मान लेते हैं. चाकू रोटी भी काट सकता है और हत्या भी कर सकता है. दोष चाकू का नहीं, इस्तेमाल करने वाले का होता है. एआई भी ऐसा ही है.

गलत सूचना और प्रचार भी एआई की देन नहीं हैं. 1994 में रवांडा नरसंहार भड़काने वाला रेडियो स्टेशन साधारण तकनीक से चलता था.

एआई ने अमानवीयता नहीं बनाई, बस उसे नया मंच दिया है. इसलिए नियम ज़रूरी हैं. सवाल तकनीकी नहीं, राजनीतिक हैं. लेकिन एक बात जो अक्सर छूट जाती है: एआई जितना नुकसान कर सकता है, उतनी ही मुक्ति भी दे सकता है. अंग्रेज़ी लंबे समय तक ज्ञान के पहरेदार की तरह काम करती रही. अब एआई उस बाधा को तोड़ रहा है. जो लोग इसे ‘अप्रामाणिक’ कहते हैं, वे वही हैं जिनके पास पहले से संसाधन थे. यह वर्गीय तर्क है.

हैलुसिनेशन यानी गलत जानकारी देना एक समस्या है, लेकिन टीवी चैनलों और सरकारों ने यह काम पहले से किया है. कम से कम एआई की गलतियों को पहचाना जा सकता है.

सबसे गंभीर समस्या है एआई का पक्षपात. नौकरी, कर्ज़, जमानत या इलाज में इसका इस्तेमाल भेदभाव को स्थायी बना सकता है. समाधान मशीन को दोष देना नहीं, व्यवस्था सुधारना है.

इससे मुझे एक बड़ा सवाल लगा—अगर हमारी बनाई प्रणालियां पहले ही यह सोचें कि सवाल ही गलत तो नहीं, तो क्या होगा?

यही असली बहस है. डर भी सच है, संभावना भी. सवाल यह है कि हम इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं. इतिहास बताता है कि हम गलतियां करते हुए भी आगे बढ़ते हैं. यह लापरवाही का बहाना नहीं, बल्कि थोड़ी जिज्ञासा और कम डर के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा है.

(फ्रंटलाइन के संपादकीय लेख का अनूदित और संपादित अंश)

Wednesday, February 25, 2026

पलाश : वसंत की आग में दहकता सौंदर्य

आप कभी चलिए मेरे साथ मधुपुर. जैसे ही आप जमुई स्टेशन पार करेंगे और दोनों तरफ जंगलों और ऊंची-नीची घाटियों का इलाका शुरू होगा, आपको विलक्षण चीज दिखेगी. झाझा, सिमुलतला, जसीडीह और मधुपुर... इस पूरे रास्ते में रेल लाईन के दोनों तरफ घाटी जंगलों से भरी है और अब, फरवरी में गरमाहट आने के बाद इन जंगलों में खिलते हैं पलाश.

जैसे ही फाल्गुन की ठंडी सुबहें ढलने लगती हैं और हवा में वसंत की हल्की सुगंध घुलने लगती है, धरती पर एक अद्भुत चमत्कार घटित होता है. न जाने कहाँ से अचानक हमारे जंगलों, खेतों की मेड़ों, नदी किनारों और पथरीली भूमि पर लाल-नारंगी आग की लपटों से सुलग उठती है. यह अग्नि किसी विनाश की नहीं, बल्कि सौंदर्य और जीवन के उत्सव की होती है. यही है पलाश का फूल.




संस्कृत में किंशुक और ढाक तथा अंग्रेज़ी में फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट. वसंत का सबसे प्रखर उद्घोषक है. जब अधिकांश वृक्ष अभी पत्तियों के बोझ से मुक्त होकर निर्वस्त्र खड़े होते हैं, तब पलाश अपनी नग्न शाखाओं पर अग्नि-सा सौंदर्य ओढ़ लेता है. ऐसा लगता है मानो धरती ने खुद अपने लिए केसरिया वस्त्र बुन लिए हों.

संस्कृत साहित्य में पलाश का उल्लेख अत्यंत भावपूर्ण ढंग से मिलता है. अमरकोश में कहा गया है-

किंशुकः पलाशो ढाकः

कालिदास ने अपने काव्य में पलाश को वसंत का प्रतीक बनाकर बार-बार उकेरा है. ऋतुसंहार में वे लिखते हैं-

“प्रफुल्लकिंशुकवनानि शोभन्ते”

(फूलों से भरे किंशुक वन शोभायमान हो उठे हैं.)

कालिदास के लिए पलाश केवल वृक्ष नहीं, ऋतुओं का जीवंत चरित्र है. मेघदूत में भी वह प्रकृति के चित्रण में पलाश की आभा को समाहित करते हैं. उनके यहाँ पलाश प्रेम, विरह और सौंदर्य तीनों का साक्षी है.

हिमालय की तराइयों से लेकर दक्कन के पठार तक, राजस्थान की शुष्क भूमि से लेकर मध्य भारत के जंगलों तक, हर जगह पलाश ने अपने लाल-नारंगी दस्तख़त छोड़े हैं. बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में तो पलाश मानो लोकजीवन का अभिन्न अंग है. बसंत आते ही गाँवों के बच्चे इसकी पंखुड़ियाँ बटोरते हैं और स्त्रियाँ इन्हें पूजा-पाठ में अर्पित करती हैं.

हमलोग होली के टाइम में खूब पलाश तोड़कर लाते थे. उनके फूलों को डंठल से अलग करते और फिर चूने का साथ मिलाकर पानी में उबालते थे. फिर जो ऐसा पक्का रंग तैयार होता था कि साइकिल पर झक्क सफेद कुरते-धोती में जाने वाले काका हों या कुरते-पाजामे में मौलाना चा, सब रंग जाते थे.

जिस पलासी के युद्ध ने भारत का इतिहास बदल दिया, असल में उसका नाम पलासी इसलिए ही पड़ा था क्योंकि उसके आसपास पलाश का बहुत घना जंगल था. हालांकि, अब इस इलाके में पलाश का जंगल छोड़िए, एक पेड़ तक नहीं बचा है.

हमारा जब उपनयन हुआ था तो भिक्षाटन के समय कौपीन पहने हमने हाथ में पलाश का दंड ही रखा था. पलाश दंड का ऋषियों के लिए अगर महत्व रहा है. वैदिक काल में पलाश की लकड़ी से यज्ञकुंडों के उपकरण बनाए जाते थे. शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि पलाश को पवित्र वृक्ष माना जाता था. यज्ञ की अग्नि में पलाश की समिधा डालना शुभ समझा जाता था. यह वृक्ष तपस्या, साधना और संयम का प्रतीक बन गया.

प्राचीन भारत में पलाश से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे. होली के अवसर पर पलाश के फूलों से तैयार किया गया केसरिया रंग त्वचा के लिए सुरक्षित होता था. यह परंपरा आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में जीवित है. आधुनिक रासायनिक रंगों के बीच पलाश का प्राकृतिक रंग मानो हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है.

लोकसाहित्य में पलाश का स्थान अत्यंत भावुक है. भोजपुरी, अवधी, बुंदेली और छत्तीसगढ़ी गीतों में पलाश प्रेम, विरह और प्रतीक्षा का प्रतीक है. कहीं यह प्रिय की लाल चुनरी बन जाता है, तो कहीं विरहिणी नायिका के हृदय की ज्वाला.

पलाश का फूल देखने वाला व्यक्ति अनायास ही ठहर जाता है. उसकी दृष्टि कुछ क्षणों के लिए संसार से कट जाती है. लाल-नारंगी पंखुड़ियों में जैसे सूर्य का अंश समा गया हो. यह रंग केवल आँखों को नहीं, आत्मा को भी आलोकित करता है.

पलाश की छाल, फूल और बीज आयुर्वेद में औषधि की तरह इस्तेमाल तो होते हैं ही, रक्तशोधक, सूजन-नाशक और त्वचा रोगों में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है.

पलाश केवल एक पेड़ नहीं, एक ऋतु है. यह वसंत का घोष है, इतिहास की स्मृति है, साहित्य की पंक्ति है, लोकगीत की धुन है और साधना की अग्नि है. इसके फूलों में भारत की आत्मा झलकती है — रंगों में, विश्वास में, परंपरा में और सौंदर्य में.

जब अगली बार आप कहीं निर्जन पथ पर पलाश को दहकते देखें, तो क्षणभर ठहर जाइए. समझिए कि यह केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि सदियों से बहती भारतीय संस्कृति की मौन कविता है, जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाती है.

Wednesday, January 21, 2026

भूतों की अभूतपूर्व कथा- भाग दो

मेरी मां भूतों को 'हवा-बताश' कहती है. हम भूतों के बारे में सुनते तो हैं लेकिन यह पहचान कैसे हो कि कोई हवा-बताश भूत ही है?

परंपराओं के लिहाज से, कम से कम तीन ऐसे अचूक टेस्ट हैं जिनसे आप भूत को पहचान सकते हैं. सबसे पहले, भूतों की कोई परछाई नहीं होती. मतलब यह कि तेज धूप या रोशनी में भी भूतों का साया नहीं बनता. इसी बात पर एकठो शेर याद आ रहा है, जिसे सवा सेर एक्टर-डायरेक्टर गुरुदत्त ने फिल्म 'प्यासा' में माला सिन्हा को देखते हुए कहा थाः जो मैं चलूं तो साया भी अपना साथ न दे...

जलील मानिकपुरी का है शायद, इच्छा हो तो कमेंट में इस शेर को पूरा कर दें. बहरहाल, दत्त साहब भूत नहीं थे, भले ही 'साया' उनके साथ नहीं था. पर 'प्रॉपर भूतों' की परछाईं नहीं बनती.

दूसरी बात, भूत अपने आसपास हर अल्लम-गल्लम चीज बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन जलती हुई हल्दी की गंध नहीं बर्दाश्त कर सकता. भारत और दुनिया के कई हिस्सों में हल्दी से भूत भगाए जाते हैं.

तीसरी बात, एक जेनुइन भूत हमेशा नकिया कर बोलता है. हो सकता है इसी वजह से मध्ययुगीन नाटकों और आधुनिक अंग्रेजी में 'बकवास' के लिए 'पिशाच भाषा' (लैंग्वेज ऑफ गॉब्लिन) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.
कुछ भूतों का गला सुई जितना पतला होता है, लेकिन वे एक बार में कई गैलन पानी पी सकते हैं. मादा भूतों (सॉरी दैनिक भास्कर, आप फीमेल टीचर लिखते हैं इसीलिए मैंने मादा भूत लिखा है, वरना फीमेल टीचर को 'शिक्षिका' और मादा भूत को 'भूतनी' कहा जाता है). हां, तो मादा भूतों, ओह भूतनियों का एक प्रकार होता है, चुड़ैल और चुड़ैलों के के पैर पीछे की ओर मुड़े होते हैं.

तो जिस नकियाती हुई औरत ने आपको हद से ज्यादा सताने की चेष्टा की हो, उसके पैर अवश्य देखने की कोशिश करें. लेकिन सावधानी से.

कुछ, जैसे ब्राह्मण भूत (ब्रह्मराक्षस टाइप के) गेहुंआ रंग के होते हैं या कुछ, जैसे किसी गोरे यूरोपियन का भूत काले दिखते हैं, और जरूरत से ज्यादा डरावने होते हैं.

इस तरह के एक मशहूर भूत का ठिकाना कलकत्ता की एक गली में था और वह ब्रिटिश काल में चर्चा में था और उस गली को उसी भूत के नाम पर जाना जाता था. बहरहाल, भूतों के कई प्रकार भी होते हैं. मसलन, बंगाल में ऑर्डिनरी भूत क्षत्रिय, वैश्य, या शूद्र वर्ग का सदस्य होता है. ब्राह्मण भूत, या ब्रह्मदैत्य, बिल्कुल अलग तरह का होता है. सामान्य किस्म के भूत ताड़ के पेड़ों जितने लंबे होते हैं, आमतौर पर पतले और बहुत काले होते हैं. वे पेड़ों पर रहते हैं लेकिन उन पेड़ों की तरफ रुख नहीं करते जहां ब्रह्मराक्षस या ब्रह्मदैत्य रहते हैं.

भूतों के प्रकारों पर अगली पोस्ट में चर्चा करूंगा.






Monday, January 5, 2026

फिल्म समीक्षाः मानवीय संबंधों पर बनी बेहतरीन फिल्म केडी

इन दिनों मुझे तमिल फिल्में देखने का चस्का लग गया है. बेशक, दक्षिण भारतीय फिल्मों में पर लाउड होने का आरोप लगता है और ज्यादातर मामलों में सही हो होता है. पर अब हिंदी फिल्में लाउड हो रही हैं और ज्यादातर हिंदी फिल्मों में कथानक गुम हो रहा है.

बहरहाल, मैंने एक तमिल फिल्म के.डी. देखकर खत्म की. फिल्म नई है, 2019 में रिलीज हुई थी. लेकिन मुझे नहीं पता कि हम उत्तर भारतीय लोगों में से कितने लोगों ने इसे देखा है.

मेरा सुझाव, और मेरी सिफारिश है आप इस फिल्म को देखें.

फिल्म केडी का एक दृश्य. तस्वीरः प्राइम वीडियो


असल में, यह फिल्म कुरुप्पु दुर्रै नाम के एक बुजुर्ग की कहानी है. दुर्रै लंबे समय से कोमा में होता है और उसके घर वाले उसकी बीमारी बर्दाश्त नहीं पा रहे होते हैं. उसके बेटे दुर्रै को मार डालने की योजना बनाते हैं, आप चाहें तो इसे मर्सी कीलिंग कर सकते हैं. संयोग से उसी वक्त दुर्रै होश में आ जाता है और इस पूरी योजना को अपने कानों से सुन लेता है. कुरुप्पा दुर्रै मरने के डर से कम और बेटों की इस योजना से व्यथित होता है और उसी वक्त घर छोड़ देता है.

अगर आप फिल्मों के मिजाज को रंग के जरिए सूंघने लायक दर्शक हैं तो आप इस वक्त बीमारी भरे पीलेपन के कलर टोन को देखकर खुद बहुत उदास-से हो जाएंगे. बहरहाल, फिल्म में यह रंग ज्यादा देर तक तारी नहीं रहता. फिल्म रोने-धोने वाली या नैतिक शिक्षा देने वाली विज्ञापन सरीखी नहीं है. आगे कड़वे-मीठे आते हैं. मजा तो इसके बाद आता है.

घर से निकले कुरुप्पु दुर्रै एक मंदिर में कुट्टी से मिलते हैं. नागा विशाल ने कुट्टी की भूमिका की है. कुट्टी अनाथ है और वह मंदिर के बारामदे पर ही रहता है. दोनों एक-दूसरे के अकेलेपन के दोस्त बन जाते हैं. कुट्टी ही कुरुप्पु दुर्रै का नाम केडी रखता है और वह उसका मानवीय संबंधों पर फिर से भरोसा जगाने का काम करता है. कई बार तो मुझे कुट्टी को देखते हुए प्रेमचंद के किरदार हामिद की याद आई जो बूढ़ी अमीना का दादा जैसा बर्ताव करता है. यहां भी कुट्टी केडी के लिए बकेट लिस्ट तैयार करता है और कहता है कि मरने से पहले इनको पूरा करना है.

यह फिल्म इन दोनों दादा-पोते जैसे रिश्ते को बिल्कुल निजी और जीवन के निकट लाकर परदे पर उकेरती है और इन दोनों किरदारों की यात्रा में हंसी, उदासी, प्रेम, डर, और यहां तक कि गुस्से से भरे पल भी हैं. कुल मिलाकर निर्देशक मधुमिता ने जीवन को परदे पर ही उकेर दिया है. केडी के किरदार में मु रामास्वामी बेहद सहज और विश्वसनीय हैं और खासकर बकेट लिस्ट की एक विश यानी पसंदीदा व्यंजन मटन बिरयानी खाते वक्त उनके चेहरे पर अव्यक्त तृप्ति के जो भाव आते रहते हैं, उससे बढ़िया भाव मैंने क्लोज शॉट में बेहद कम ही देखे हैं.

फिल्म में कुछ भी फ्लैशी नहीं है, बल्कि कैमरे और संपादन की गतियों ने फिल्म की गति बनाए रखी है. संपादन और पृष्ठभूमि का संगीत इतना जादुई है कि अगर आप इसका व्याकरण पकड़ पाए तो खो जाएंगे. कुट्टी के किरदार में नाग विशाल ने क्या सामर्थ्य दिखाया है! यह एक आत्मविश्वास से भरे अनाथ बच्चे की भूमिका है, आत्मविश्वास न रहे तो वयस्कों की यह दुनिया उसे जीने भी देगी?

इन दो मुख्य कलाकारों के साथ पटकथा में कहानी के प्रवाह को बनाए रखने में कई और किरदार आते हैं. इसमें कोथू कलाकार, बिरयानी दुकानवाला, मंदिर का पुजारी और यहां तक कि केडी का पता खोजने के लिए लगाए गए प्राइवेट जासूस, सबने प्रवाह को बनाए रखा है.

कहानी में आपको अगर कुछ चुभ सकता है कि केडी के बाल-बच्चे इनते हृदयहीन कैसे हो सकते हैं? उनके किरदारों की कुछ और परते हो सकती थीं, पर यह बहुत बारीक-सा सवाल है. फिर भी ऐसा लगता ही नहीं कि परिवार मे किसी को केडी की कोई फिक्र थी या उससे जरा भी प्यार था. जबकि बाकी के सभी लोग मानते हैं कि केडी एक अच्छा इंसान और एक अच्छा पिता था. 

एक झोल यह भी है कि जब परिवार वालों को पता लगता है कि केडी कोमा से बाहर आ गया तब भी वे लोग उसको खोजने के लिए जासूस लगवाते हैं, वह भी इसलिए ताकि उसको पकड़कर यूथेनेशिया वाला अधूरा कर्मकांड पूरा किया जा सके. बहरहाल, पटकथा की इस कमजोरी से आंखें मूंद सकें तो बाकी फिल्म आला दर्जे की है. हो सके तो देखिए और बताइए कि आपको कैसी लगी.

ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइमवीडियो पर फिल्म मौजूद है.

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Sunday, December 28, 2025

टेस्ट में टी-20 का मजा. बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच दो दिन में फिनिश

बेशक, एशेज में चौथा टेस्ट् इंग्लैंड के लिए ऑस्ट्रेलिया में 14 साल बाद जीत की खुशबू लेकर आया पर मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (एमसीजी) की पिच बॉक्सिंग डे एशेज टेस्ट के बाद जांच के दायरे में आ गई है, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच यह मैच महज़ दो दिनों के भीतर ही खत्म हो गया.

चारों पारियों में कोई भी टीम 175 रन का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई. इंग्लैंड को चौथी पारी में 175 रन बनाने थे, जो उन्होंने बैजबॉल के नाम पर टी-20नुमा आड़े-तिरेछे शॉट खेलकर खींच-तान कर बना लिए. मुझे इस मैच में इंग्लैंड के बल्लेबाजों में सूर्य कुमार यादव का अक्स दिखा, जिसमें कला कम और दम अधिक होता है. पर यह विकेट गेंदबाजों के लिए जन्नत थी.

विकेट पर 10 मिमी घास थी और टप्पा खाने के बाद गेंद केले की तरह घुमाव ले रही थी. करीबन 30 फीसद रन बल्ले की कन्नी लगकर स्लिप या लेग स्लिप में फिसलकर बने.

पूरे मैच के दौरान विकेट पर सीम मूवमेंट रही और बल्लेबाज़ों की नाक में दम रहा. मैच में कुल 142 ओवरों में 36 विकेट गिरे, जिसमें तेज़ गेंदबाज़ों का पूरी तरह दबदबा रहा और एक भी ओवर स्पिन गेंदबाज़ी का नहीं डाला गया.
हालांकि, पर्थ टेस्ट के मुकाबले इस टेस्ट में पांच गेंदे अधिक डाली गईं. इंग्लैंड के कप्तान बेन स्टोक्स ने अपनी राय बेबाकी से रखी है और संकेत दिया कि यदि ऐसी पिच दुनिया के किसी और हिस्से में तैयार की जाती, तो उस पर कड़े सवाल खड़े होते.

वैसे, दिलचस्प बात यह है कि पिछले महीने पर्थ में खेले गए टेस्ट को ,जो तीसरे दिन तक भी नहीं पहुँच सका आईसीसी ने “बहुत अच्छी” पिच की रेटिंग दी थी, जो सर्वोच्च रेटिंग है.

बहरहाल, मैं यह तय नहीं कर पा रहा था कि मैं लाइव मैच देख रहा हूं या हाइलाइट. यह भी हो सकता है कि आइसीसी टी-20 के दौर में टेस्ट मैचों को जीवन्त और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए ही ऐसे विकेट तैयार करवाने के निर्देश दे रहा हो.

Saturday, December 13, 2025

भूतों की अभूतपूर्व कथा- भाग एक

 


भूतों के बारे में आपने सुना तो होगा ही. लेकिन कुछ दिलचस्प बातें मैंने इकट्ठी की है. हॉरर स्टोरी नहीं सुना रहा, सिर्फ परंपराएं इकट्ठी कर रहा हूं. मसलन, भूतों की परिभाषा क्या है? भूत कौन होते हैं?

असल में, भूत एक आम शब्द है जिसमें कई तरह की बुरी आत्माएँ शामिल हैं जिन्हें अलग-अलग करके समझने की कोशिश करेंगे. हालाँकि, पहले आम तौर पर भूतों में पाए जाने वाले कुछ आम लक्षणों के बारे में बात करना अधिक दिलचस्प होगा.

परिभाषा के मुताबिक, "प्रॉपर भूत ऐसी आत्मा है जो हिंसक तरीके से मरे हुए लोगों की होती है. चाहे वह मौत दुर्घटना से हो, आत्महत्या से हो या मौत की सज़ा पाए लोगों से।"

ऐसी आत्माएं भी भूतों की श्रेणी में आती हैं अगर मौत के बाद उसका ठीक से अंतिम संस्कार न किया गया हो.
बहरहाल, बहुत सारी ऐसी आत्माओं का (भय से) कई इलाकों में पूजा-पाठ भी किया जाता है. कई स्थान पर उन्हें मनुख देवा का दर्जा मिला है. बाघ का शिकार हुए लोगों का अस्थान बघौत कहा जाता है. बिजली गिरने से मरे लोगों का अस्थान 'बिजलिया बीर' के नाम से प्रसिद्ध है. ताड़ के पेड़ से गिरे इंसान का अस्थान 'ताड़ बीर' के नाम से और सांप काटने से मरे व्यक्ति का अस्थान नगैया बीर के नाम से जाना जाता रहा है.

जनरल कनिंघम ने (मैं एक किताब के अनुवाद के सिलसिले में उनके विवरणों को देख रहा था), हाथी के महावत के अस्थान (श्राइन) का जिक्र किया है, जो पेड़ से गिरकर मर गया था, उसी तरह, एक ब्राह्मण की मौत गाय के ढूंसने से हो गई थी, उसका भी अस्थान बनाया गया था, एक कश्मीरी महिला, जिसका एक पैर था और जिसकी मृत्यु दिल्ली से अवध जाते समय थकान से हो गई थी, उसके भी अस्थान का जिक्र कनिघम ने किया है.

भूतों के कई प्रकार हैं. चुड़ैल, किच्चिन, बैताल, प्रेत, जिन्न, ... इनके बारे में आपकी क्या राय और क्या जानकारी है और क्या आपका कोई अनुभव रहा है? भूतों के प्रकार या उनसे जुड़े किस्से हो तो वह भी साझा करें.


(नोटः पोस्ट के साथ चस्पां भूत की तस्वीर एआइ जनरेटेड है. भूत का फोटो आजतक ले नहीं पाया हूं, अतएव तस्वीर को प्रतीकात्मक ही समझें.)








Thursday, December 11, 2025

15 करोड़ की किताब, साहित्य है या पब्लिसिटी का मजाक!

मैं रत्नेश्वर जी से बहुत बार नहीं मिला हूं। इस बार सुना कि उन्होंने 15 करोड़ की किताब लिख डाली। उनके लिए यह कोई नई बात नहीं। पिछली बार रत्नेश्वर जी ने, जब हमारी मुलाकात हुई थी, तब तीन करोड़ रुपए एडवांस में लिए थे, ऐसा उन्होंने बताया था। अगर यह कदम महज खबर बनाने के लिए थी तो खबर बन गई। पर अब आगे की बात। 

कुछ महीने पहले शैलेश भारतवासी जी ने आदरणीय विनोद कुमार शुक्ल को तीस लाख रुपए का रायल्टी का चेक सौंपा था। चेक प्रदान करते हुए तस्वीरें थी। तीस लाख भी हिंदी साहित्यकार के लिए लगभग मूं बा देने की स्थिति थी। रत्नेश्वर जी भी स्पष्ट कर दें कि पंद्रह करोड़ का क्या मसला है? प्रकाशक ने दिए? आपने प्रकाशन के लिए दिए? इतने रकम की बिक्री? मतलब थोड़ा स्पष्ट कर देते तो हम ज्वलनशील लोगों के कलेजे को ठंडक पड़ती।

लोकसभा 2025- जब संसद में राहुल गांधी की बात पर अमित शाह को आया तेज गुस्सा


 

Monday, November 24, 2025

मारे तो धरमिन्दर


हिंदी मुंबइया सिनेमा के पर्दे पर सबसे ‘मर्दाना चेहरा’ सिर्फ एक था, धर्मेंद्र. मधुपुर में हमलोग अपने साथियों में मांसपेशीय शक्ति की सबसे ज्यादा नुमाइश और शेखी बघारने वाले साथी को ‘बड़का आया धरमिन्दर’ कहकर बुलाते थे.

धर्मेंद्र सिनेमा के परदे पर मसल पावर के प्रतीक थे.

यह तुलना ऐं-वईं नहीं थी. धर्मेंद्र परदे पर किसी को पीटते थे तो उनकी आंखों में गुस्सा नहीं, आग दिखती थी और वाकई लगता था कि अगर उनका घूंसा किसी को लगा, तो बंदा हफ्तों के लिए बिस्तर पर पड़ जाएगा.

उनकी चाल में अदा नहीं, आत्मविश्वास था. और उनकी मुस्कान में वह सादगी, जिसने दर्शकों को यह भरोसा दिलाया कि यह आदमी जब लड़ेगा, तो सच के लिए लड़ेगा.

लेकिन धर्मेंद्र का यह एक्शन हीरो बनना सिर्फ कैमरे का खेल नहीं था. यह उनके जीवन का संघर्ष था, मिट्टी, मेहनत और मोहब्बत से बना हुआ. धर्मेंद्र यानी पंजाब की माटी की सुगंध.

जहां तक मुझे खयाल है, पहली बार शर्ट फाड़कर गुंडों की पिटाई धर्मेंद्र ने ही की थी, फूल और पत्थर थी फिल्म. और इसी फिल्म के साथ धर्मेंद्र दर्शकों के चहेते बन गए थे.
 



इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे बदमाश का किरदार निभाया, जो अंदर से नेकदिल है.

क्लाइमेक्स के उस सीन में, जिसका जिक्र मैंने किया है कि धर्मेंद्र शर्ट फाड़कर गुंडों को मारते हैं, सिनेमाघर सीटियों से गूंज उठता था. इसी फिल्म से पैदा हुए हीमैन.

असल में, इस समय तक परदे पर दांत पीसते और आंखों से गुस्सा बरपाते अमिताभ का आगाज नहीं हुआ था लेकिन एक्शन का दूसरा नाम धर्मेंद्र बन गए थे.

शोले का जिक्र तो जितनी बार किया जाए कम ही होगा. फिल्म का एक्शन उस समय के लिहाज से तकनीकी रूप से नया था, लेकिन धर्मेंद्र के स्टंट वास्तविक थे. उन्होंने ट्रेन के ऊपर से कूदने वाले दृश्य, और ठाकुर के साथ लड़ाई वाले सीन खुद किए. शोले में जय की मौत के बाद वीरू का दांत पीसकर, ‘गब्बर मैं आ रहा हूं’ कहना कौन भूल सकता है!

मनमोहन देसाई की 1977 की फिल्म धरम वीर एक फैंटेसी-एक्शन थी, जहाँ धर्मेंद्र ने ऐसे मध्यकाल के किसी योद्धा का किरदार निभाया था, जिसकी नकल करके आज भी कई हास्य कलाकारों की रोजी-रोटी चल रही है और जिसकी नकल फिल्म राजाबाबू में गोविन्दा ने भी की थी.

बहरहाल, धरमवीर में तलवारबाजी, घुड़सवारी और योद्धा वाली पोशाकों के बीच धर्मेंद्र का एक्शन पूरी तरह अलग था. उन्होंने अपने शरीर और चेहरे से जो जज्बात दिखाए, वह भारतीय सिनेमा में उस दौर की तकनीक से कहीं आगे थे.

उनका घोड़े पर कूदना, तलवार घुमाना और संवाद बोलते हुए अभिनय में ‘फिल्मीपन’ कम और फिजिकल रियलिज्म ज्यादा था.

1978 की शालीमार में धर्मेंद्र ने इंटरनेशनल स्टाइल में एक्शन किया. लड़कियों के लिए यह फिल्म उनकी ‘जेम्स बॉन्ड’ इमेज का प्रतीक बन गई. उनकी चाल, बॉडी लैंग्वेज और कैमरे पर पकड़—सबने उन्हें ग्लोबल एक्शन हीरो का लुक दिया.

1980 की राम बलराम में वे अमिताभ बच्चन के साथ थे. दो भाइयों की इस कहानी में धर्मेंद्र ने अमिताभ के बड़े भाई का किरदार निभाया, जिसमें उनका अनुभव और जोश दोनों दिखे.

यहां उनका हर फाइट सीन डांस की तरह तालमेल वाला था.

पर सबसे बड़ा एक्शन धर्मेंद्र ने पर्दे पर नहीं, अपने जीवन में किया. जब करियर शिखर पर था, तब आलोचना और निजी परेशानियों ने उन्हें तोड़ दिया. उन्होंने किसी इंटरव्यू में कहा था, ‘मैंने अपने दर्द को शराब में डुबोया, पर किसी को तकलीफ नहीं दी. मैं गिरा, मगर फिर उठा.’

धर्मेंद्र की यह स्वीकारोक्ति ही उनका सबसे बड़ा ‘एक्शन’ था. जहाँ एक हीरो खुद से लड़कर बाहर निकला.

आज जब हाई-टेक एक्शन, वायर वर्क और कंप्यूटर ग्राफिक्स फिल्मों में आम हैं, एआइ का इस्तेमाल असली को भी मात दे रहा है और वीएफएक्स ने सिनेमा के परदे को आश्चर्य लोक में बदल दिया है, धर्मेंद्र की पुरानी फिल्मों का एक्शन आज भी असली लगता है क्योंकि उसमें ईमानदारी थी.

धर्मेंद्र की पहचान सिर्फ एक्शन से नहीं, बल्कि उनके मानवीय स्पर्श से बनी. वह गुस्से में भी सज्जन थे, और लड़ाई में भी सच्चे. उनके स्टंट्स में हिंसा नहीं, इंसाफ की चाह थी. आज की पीढ़ी अगर धर्मेंद्र को ‘रेट्रो एक्शन स्टार’ कहती है, तो ये याद रखना चाहिए कि उन्होंने स्क्रीन पर वह किया था जो जिंदगी में हर किसी को करना पड़ता है- मुश्किल हालात से लड़कर मुस्कुराना.



स्मृतिशेषः धर्मेंद्र का हीमैन से परे गहराई से अभिनय वाला चेहरा

मंजीत ठाकुर

हिंदी सिनेमा के उस युग में जब एक्शन-हीरो, मसाला सिनेमा और बड़े स्टारडम का जोर था, धर्मेंद्र ने समय-समय पर ऐसी फिल्मों में अभिनय किया जो मुख्यधारा से हटकर थीं. आमतौर पर धर्मेंद्र को हम ‘बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना’ वाले गुस्सैल तेवर वाले नायक के रूप में जानते हैं. लेकिन उन्होंने अपने मसल ब्रांड के बाहर निकलकर संवेदनशीलता, अंतर्मन के उकेरने वाली और सामाजिक नियमों से टकराने वाले नायकों के किरदार निभाए.

सिनेमा में जिन ब्रांड्स की नाम होती है उसमें धर्मेंद्र की उपाधि हीमैन की थी. लेकिन धर्मेंद्र ने अपनी लोकप्रिय ब्लॉकबस्टर छवि से हटकर ‘आंखों से अभिनय’ करने वाली फिल्में भी की.

ऐसी फिल्मों में पहला नाम उभरता है बंदिनी का. 1963 में रिलीज हुई इस फिल्म में धर्मेंद्र करियर के शुरुआती दौर में थे.



जिस हुगली-किनारे के जेल सेटअप ने हमें यह एहसास दिलाया कि ‘स्वतंत्रता’ सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, मानसिक भी होती है. बंदिनी में धर्मेंद्र ने डॉ. देवेंद्र का किरदार निभाया. यह भूमिका उनके लिए उस समय अप्रत्याशित थी, जहाँ ‘ही-मैन’ का टैग असर था. लेकिन एक जेल-डॉक्टर का शांत, संवेदनशील और नजरें मिलाने से पहले सोचने वाला स्वभाव उन्होंने सहजता से निभाया. इस फिल्म की समीक्षा करते हुए द क्विंट में एक फिल्म समीक्षक ने बाद में लिखा, “एक युवा, करिश्माई और संवेदनशील जेल डॉक्टर जो ‘गंदे कैदी’ वाली सोच में यकीन नहीं करता… मेरी पीढ़ी के लोगों के लिए, धर्मेंद्र और जेल, शोले में पानी की टंकी पर खड़े होकर ‘चक्की पीसींग’ चिल्लाने की इमेज है. लेकिन बंदिनी में, वह एक कमाल हैं.”

उनकी यह भूमिका बताती है कि धर्मेंद्र उस ब्लॉक को तोड़कर भी अभिनय कर सकते थे जहाँ उन्हें केवल ‘एक्शन-रॉबस्ट’ हीरो के रूप में देखा जाता था.

धर्मेंद्र के करियर में दूसरी ऐसी ही फिल्म थी 1966 की अनुपमा. निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म में धर्मेंद्र ने अशोक नामक शिक्षक-कवि की भूमिका निभाई थी. यह एक ऐसा किरदार था, जिसमें उन्होंने मजबूती और नजाकत का अद्भुत संयोजन दिखाया था. डॉ. स्नेहा कृष्णन ने इस फिल्म की समीक्षा में लिखा, “धर्मेंद्र ने अपने शुरुआती करियर में एक बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है, जिसमें एक केयरिंग, प्रेरक और प्यारी स्क्रीन प्रेजेंस है.”

अनुपमा में एक शिक्षक-कवि के रूप में उनके संतुलित स्वभाव ने उनके अभिनेता होने की एक और तह खोली.

यह किरदार उनकी कद्दावर सिनेमाई छवि से बहुत दूर था: न कोई बड़ी मशीन-गन, न कोई फिसलता एक्शन-सिक्वेंस, बल्कि एक धीमी गति की संवेदना, एक सांस्कृतिक बेड़ियों से उबरने की कहानी. धर्मेंद्र की आंखों में और धैर्य में वह सादगी दिखी, जिसने उस समय के ‘नायक’ के प्रतिमानों को चुनौती दी थी.

धर्मेंद्र की ऑफबीट फिल्मों में एक फिल्म का नाम न लिखा जाए तो सारी सूची बेकार होगी और वह थी 1969 में आई सत्यकाम.

यह फिल्म धर्मेंद्र के अभिनय-सफर में एक मील का पत्थर मानी जाती है. उन्होंने सत्यप्रिय आचार्य नामक ईमानदार इंजीनियर की भूमिका निभाई थी. अपने उसूलों के लिए वह उस समय के साथ सामाजिक ताने-बाने, रिश्तों और व्यवस्था से टकरा जाता है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने बाद में इस फिल्म का जिक्र करते हुए लिखा कि हृषिकेश मुखर्जी के सत्यकाम में धर्मेंद्र ने अपनी सबसे वास्तविक परफॉर्मेंस दी थी.

इस फिल्म को देखते हुए आप उनकी आँखों की गहराई, आवाज के उतार-चढ़ाव को देखिए ही, साथ में इस फिल्म में उनके मौन (या पॉज) भी अभिनय को नई ऊंचाइयों तक ले जाते हैं.

लेकिन, सत्यकाम की क्लाइमेक्स में, जब धर्मेंद्र का किरदार देखता है कि उसका आदर्श टूट रहा है—उनकी आँखों में निराशा, दृढ़ता और खुद से सवाल के भ्रम यह तीनों भाव एक साथ चलते दिखते हैं.

यह बात और है कि सिने आलोचकों ने इस फिल्म को सर-आंखों पर बिठाया, लेकिन जनता को थियेटर तक नहीं ला पाई. बेशक, बॉक्स-ऑफिस मार्केट के हिसाब से यह सफलता नहीं थी, पर अभिनय-दृष्टि से यह धर्मेंद्र का सर्वश्रेष्ठ माना गया है.

अभिनय के लिहाज से धर्मेंद्र की एक अन्य फिल्म है जिसे अमिताभ के साथ उन्होंने किया था और यह थी 1975 में रिलीज हुई फिल्म चुपके चुपके.

यह फिल्म भारी व्यावसायिक मसाले से अलग थी. फिल्म में कॉमेडी थी लेकिन सादगी और बुद्धिमत्ता भी थी. धर्मेंद्र ने प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी और कार ड्राइवर प्यारे मोहन इलाहाबादी का किरदार निभाया.

हिंदुस्तान टाइम्स की टिप्पणी थीः ‘कालजयी कहानी... और धर्मेंद्र जिन्होंने अपने हास्य और गरमाहट भरी ऊर्जा से कॉमिडी को नया स्तर और परिभाषा दी.’

सत्तर के दशक का उत्तरार्ध अमिताभ बच्चन की धूम-धड़ाके वाली एक्शन फिल्मों का था. लेकिन गब्बर को हराने वाले धर्मेंद्र ने इस फिल्म में मुस्कुराहट और सादगी से शर्मिला टैगोर और दर्शकों दोनों का दिल जीत लिया,

चुपके चुपके में धर्मेंद्र ने संवाद-प्रवाह, शारीरिक हाव-भाव, टाइमिंग सबमें सहजता दिखायी और इस फिल्म ने जाहिर किया कि अभिनेता के रूप में उन्हें अपनी कला में महारत है.

लेकिन चुपके-चुपके से पहले 1966 में धर्मेंद्र की एक अन्य फिल्म थी फूल और पत्थर.

हालाँकि यह फिल्म व्यावसायिक रूप से भी कामयाब थी और इसे अक्सर धर्मेंद्र की सुपरस्टार बनने की फिल्म माना जाता है, लेकिन इस फिल्म को धर्मेंद्र की ‘ऑफ-बीट राह की शुरुआत’ भी माना जा सकता है क्योंकि इसमें उन्होंने परदे पर कमाल की संवेदनशीलता दिखाई थी.

फूल और पत्थर में उन्होंने “हीरो” होने के साथ-साथ मानव-कमज़ोरियों का स्वीकार दिखाया—यह कदम उस जमाने के हीरो इमेज के लिए साहसपूर्ण था.

धर्मेंद्र सुपरस्टार थे और आखिरी क्षणों तक सुपरस्टार ही रहे. बेशक, शोले, लोहा, हकीकत, धर्म-कांटा जैसी फिल्मों ने उनको दर्शकों के दिलों तक पहुंचाया.

धर्मेंद्र ने अपने करियर में दिखाया कि वे सिर्फ़ ही-मैन नहीं, बल्कि एक ऐसे अभिनेता हैं जो भूमिका में उतरने और किरदार के भीतर उतरने का हुनर रखते हैं. उसकी इस क्षमता ने उन्हें सिर्फ़ कमर्शियल स्टार नहीं, बल्कि अभिनय-सिद्ध कलाकार बना दिया.

सत्यकाम ने सिनेमा की दुनिया को अलविदा कह दिया है लेकिन जब तक भारत में सिनेमा और कला की बात होगी, धर्मेंद अपनी पूरी शख्सियत के साथ, अपनी एक्शन फिल्मों और कला की गहराइयों दोनों के लिए याद किए जाते रहेंगे.

Saturday, November 15, 2025

झारखंड राज्य का आंदोलन, गठन और मुसलमानों की अनदेखी भूमिका

-मंजीत ठाकुर

झारखंड राज्य 15 नवंबर, 2000 को बिहार से अलग करके गठित किया गया था। यह महज एक सियासी फैसला नहीं था, बल्कि एक सदी से अधिक समय तक चले सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष का नतीजा था। इस संघर्ष में जितना योगदान आदिवासी समुदायों, छात्रों और स्थानीय संगठनों का रहा, उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा मुसलमानों का भी रहा है। परंतु, आज झारखंड की राजनैतिक स्मृति में मुस्लिमों की भूमिका लगभग गायब कर दी गई है।

स्वाधीनता आंदोलन में मुस्लिमों की शहादत

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड के मुस्लिमों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। शेख भिखारी उस दौर के सबसे बहादुर योद्धाओं में गिने जाते हैं। ठाकुर विष्णुनाथ शाहदेव के नेतृत्व में मुक्ति वाहिनी के सक्रिय सदस्य बने शेख भिखारी ने रांची और चुटूपाल की लड़ाइयों में अंग्रेज़ों के खिलाफ असाधारण साहस दिखाया था।

2 अगस्त, 1857 को रांची पर ब्रिटिश हमले के दौरान भिखारी और विष्णु सिंह की रणनीति ने अंग्रेज़ों की योजनाओं को विफल कर दिया।

शेख भिखारी ने संताल परगना के संतालों को भी संगठित किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ विद्रोह को प्रेरित किया। लेकिन देशी बंदूकों से लैस यह सेना भारी हथियारों के सामने टिक नहीं सकी।

इसी युद्ध में शेख भिखारी, नादिर अली (चतरा), सलामत अली और शेख हारू जैसे योद्धाओं ने अपने प्राण न्योछावर किए। नादिर अली और ठाकुर विष्णुनाथ पांडे को फांसी दी गई जबकि सलामत अली और शेख हारू को कालापानी की सजा सुनाई गई।

यह वही झारखंड था जहाँ धर्म और जाति की दीवारें टूटकर एक साझा संघर्ष में बदल गई थीं।


मॉमिन कॉन्फ्रेंस और झारखंडी चेतना का सूत्रपात

1923 में रांची के पास मुरमा में मॉमिन कॉन्फ्रेंस की स्थापना ने मुस्लिम समाज को एक संगठित रूप दिया। इस संगठन ने जलियांवाला बाग हत्याकांड की निंदा की, शहीदों को श्रद्धांजलि दी और बुनकरों को ब्रिटिश आर्थिक अत्याचार से बचाने का आह्वान किया।

इमाम अली (ब्राम्बे), नज़हत हुसैन (बुंडू), जग्गू मियां (बिजुलिया), फ़र्ज़ंद अली (इटकी), अब्दुल्ला सरदार (सिसई), ज़ाकिर अली (इटकी), सोहबत मियां (रांची) और चंदन मियां (डुमरी) जैसे नेताओं ने राष्ट्रीय एकता के साथ-साथ स्थानीय पहचान के लिए भी आवाज़ उठाई।

1912 से शुरू हुई झारखंड राज्य की मांग

जब 1912 में बिहार को बंगाल से अलग किया गया, तब झारखंड के कुछ हिस्से बंगाल में और कुछ बिहार में शामिल कर दिए गए। उस समय असमत अली नामक मुस्लिम नेता ने पहली बार चेताया कि झारखंड की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान इस नये प्रशासनिक ढांचे में खो जाएगी।

असमत अली ने उसी वर्ष झारखंड को अलग राज्य बनाने की मांग रखी। यह झारखंड राज्य निर्माण की पहली राजनीतिक पुकार थी।

1919 में चिराग अली ने इस आंदोलन को और मज़बूत किया। इसके बाद अनेक मुस्लिम नेताओं मसलन, मोहम्मद मुर्तज़ा अंसारी (चक्रधरपुर), अशरफ ख़ान (खेलारी), मोहम्मद सईद और ज़ुबैर अहमद (जमशेदपुर), वहाब अंसारी (पुरुलिया) और एस.के. क़ुतुबुद्दीन (मेदिनीपुर) ने 1980 के दशक तक इस संघर्ष में अपनी जानें दीं।

राजनीतिक संगठनों में मुस्लिम नेतृत्व

1936 में मॉमिन कॉन्फ्रेंस ने झारखंड राज्य की मांग पर प्रस्ताव पारित किया। 1937 के चुनाव में आर. अली ने मुस्लिम लीग उम्मीदवार को हराकर बिहार विधानसभा में प्रवेश किया। यह मुस्लिम समाज की स्वायत्त राजनीतिक सोच का उदाहरण था।

1937 के बाद जब आदिवासी प्रोग्रेसिव सोसायटी बनी, तो हाजी इमाम अली, नज़रत हुसैन, अब्दुल्ला सरदार, फ़र्ज़ंद अली, शेख़ अली जान और मौलवी दुखू मियां जैसे मुस्लिम नेता उसके सक्रिय सदस्य बने। यह एक सामाजिक गठजोड़ था, जिसने आदिवासियों और मुसलमानों के बीच साझा पहचान और परंपराओं की रक्षा की भावना को जन्म दिया।

इतिहास की जड़ों में मुस्लिम उपस्थिति

प्रसिद्ध इतिहासकार आर.आर. दिवाकर अपनी पुस्तक ‘बिहार थ्रू एजेज’ में लिखा है कि लगभग आठ सौ वर्ष पहले मुस्लिम समूह पहली बार झारखंड क्षेत्र में पहुँचे और यहाँ के मुंडा गाँवों में बस गए। वे स्थानीय समुदायों में इस तरह घुल-मिल गए कि अपनी पुरानी भाषा, रीति-रिवाज और जीवनशैली लगभग भूल गए।

दिवाकर अपनी किताब में पादरी हॉफमैन को उद्धृत करते हैं कि, “इन क्षेत्रों के निवासियों ने अरबी और फ़ारसी शब्दों को अपनी भाषा में अपनाया।”

यह सांस्कृतिक समागम झारखंडी समाज की एक अनोखी पहचान बन गया, जहाँ धर्म से अधिक मानवता का रिश्ता प्रधान रहा।

1661 में दायूदनगर में पहली बार मुसलमानों ने मस्जिद बनाई और बाद में मदरसों की स्थापना भी हुई। 1740 में हिदमतुल्लाह ख़ाँ झारखंड के जपला के पहले मुस्लिम जागीरदार बने।

यह इस बात का संकेत था कि मुस्लिम समाज यहाँ केवल धार्मिक रूप से ही नहीं, प्रशासनिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय भूमिका निभा रहा था।


आधुनिक काल में झारखंड कौमी तहरीक की भूमिका

1989 में जमशेदपुर के सीताराम डेहरा में झारखंड कौमी तहरीक (जेक्यूटी) का गठन हुआ। प्रोफेसर ख़ालिद अहमद इसके पहले अध्यक्ष बने और अफ़ताब जमी़ल, मोहम्मद रज़ान, इमरान अंसारी तथा बशीर अहमद इसके संस्थापक सदस्य थे।

इस संगठन ने छात्रों के संगठन ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (एजेएसयू) के साथ मिलकर आंदोलन का मोर्चा संभाला।

23 जुलाई, 1989 को रांची विश्वविद्यालय परिसर में हुई इसकी पहली कॉन्फ्रेंस में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, शिक्षा और प्रतिनिधित्व से जुड़ी नीतियाँ तय की गईं। इसमें कुछ बातें तय की गई थीं।

इन नीतियों में तय किया गया कि झारखंड में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा, अल्पसंख्यकों को राजनीति, शिक्षा और प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा, मुस्लिमों को उनकी आबादी के अनुपात में शिक्षा और रोजगार में आरक्षण दिया जाएगा, सभी स्थानीय भाषाओं को समान दर्जा मिलेगा, अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित शैक्षणिक संस्थानों को सरकारी मान्यता और सहायता दी जाएगी, अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए अल्पसंख्यक आयोग, हज समिति, मदरसा बोर्ड और वक्फ बोर्ड गठित किए जाएंगे।

जेक्यूटी की ये नीतियाँ झारखंड तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया। सांसद सैयद शहाबुद्दीन ने झारखंड आंदोलन में गहरी रुचि दिखाई। मुस्लिम युवाओं ने भी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

साझा संघर्ष और बलिदान की गाथा

झारखंड कौमी तहरीक से जुड़े अनेक युवाओं को आंदोलन के दौरान पुलिस की हिंसा और जेल की यातना झेलनी पड़ी। मोहम्मद फैज़ी, सरफ़राज़ अहमद, मुश्ताक अहमद, इमरान अंसारी, मुजीबुर्रहमान, सरवर सज्जाद और सुबरान आलम अंसारी जैसे कार्यकर्ताओं ने झारखंड राज्य के लिए अपनी जिंदगी लगा दी।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अधिकारों और आत्मसम्मान का आंदोलन था। मुसलमानों ने यहाँ धर्म नहीं, बल्कि झारखंडियत को अपनी पहचान का हिस्सा बनाया।


राज्य बनने के बाद उपेक्षा का सिलसिला

15 नवंबर, 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ और भाजपा के बाबूलाल मरांडी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। परंतु नवगठित राज्य की सरकार में एक भी मुस्लिम मंत्री या विधायक नहीं था। न तो राज्यपाल प्रभात कुमार और न ही मुख्यमंत्री मरांडी ने अपने प्रारंभिक भाषणों में अल्पसंख्यकों की भूमिका या अधिकारों पर एक शब्द कहा।

यह स्थिति उस ऐतिहासिक अन्याय की ओर इशारा करती है जिसमें मुसलमानों ने तो झारखंड के निर्माण के लिए आंदोलन किया, परंतु इतिहास की किताबों और राजनीतिक मान्यता में उनका नाम तक दर्ज नहीं हुआ।


गठन के 25 साल बाद झारखंड के सामने चुनौती

झारखंड की पहचान बहुसांस्कृतिकता और साझी विरासत में निहित है। यहाँ आदिवासी, दलित, पिछड़े और मुसलमान सदियों से साथ रहते आए हैं। राज्य की स्थायी शांति और विकास के लिए यह आवश्यक है कि सरकार मुस्लिम समुदाय की ऐतिहासिक भूमिका को मान्यता दे और उन्हें राजनीतिक, शैक्षिक और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व प्रदान करे।

सरकार को तत्काल झारखंड उर्दू अकादमी, मदरसा बोर्ड, वक्फ बोर्ड, अल्पसंख्यक आयोग और उर्दू निदेशालय की स्थापना करनी चाहिए। इससे न केवल मुस्लिम समाज का भरोसा बहाल होगा बल्कि राज्य की समावेशी राजनीति की जड़ें भी मज़बूत होंगी।

झारखंड की मिट्टी ने शेख भिखारी जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को जन्म दिया, जिन्होंने अंग्रेज़ों से लोहा लिया। उसी धरती पर असमत अली और चिराग अली ने अलग राज्य की मांग उठाई। 1980 के दशक में झारखंड कौमी तहरीक ने इस आंदोलन को नई ऊर्जा दी। लेकिन आज इन नामों को जानने वाले भी कम हैं।

अब समय आ गया है कि झारखंड के इतिहास को एकतरफ़ा दृष्टि से नहीं, बल्कि उसके साझे संघर्षों और बहुलतावादी चरित्र के रूप में देखा जाए। झारखंड की असल पहचान किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों की है जिन्होंने इस भूमि की अस्मिता के लिए संघर्ष किया, जिनमें मुसलमानों का योगदान कभी भी कम नहीं रहा।