Monday, July 26, 2010

बदलता दौर, बदलते नायक

(दैनिक जागरण के 8 जुलाई के अंक में प्रकाशित)

मंजीत ठाकुर

भारत में सिनेमा जब शुरु हुआ, तो फिल्में मूल रुप से पौराणिक आख्यानों पर आधारित हुआ करती थीं। लिहाजा, हमारे नायक भी मूल रुप से हरिश्चंद्र, राम या बिष्णु के किरदारों में आते थे।

पहली बोलती फिल्म आलम आरा’ (1931) के पहले ही हिंदी सिनेमा की अधिकांश परिपाटियाँ  तय हो चुकी थीं, लेकिन जब पर्दे पर आवाज़ें सुनाई देने लगीं तो अभिनेताओं के चेहरों और देह-भाषा के साथ अभिनय में गले और स्वर की अहमियत बढ़ गई। 

1940 का दशक हिंदी सिनेमा का एक संक्रमण-युग था। वह सहगल, पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी, जयराज, प्रेम अदीब,  किशोर साहू, मोतीलाल, अशोक कुमार सरीखे छोटी-बड़ी प्रतिभाओं वाले नायकों का ज़माना था तो दूसरी ओर दिलीप कुमार,  देव आनंद, किशोर कुमार और भारत भूषण जैसे नए लोग  दस्तक दे रहे थे।

पारसी और बांग्ला अभिनय की अतिनाटकीय शैलियां बदलते युग और समाज में हास्यास्पद लगने लगीं, उधर बरुआ ने बांग्लादेवदासमें नायक की परिभाषा को बदल दिया।
अचानक सहगल और सोहराब मोदी जैसे स्थापित नायक अभिनय-शैली में बदलाव की वजह से भी पुराने पड़ने लगे। मोतीलाल और अशोक कुमार पुराने और नए अभिनय के बीच की दो अहम कड़ियाँ हैं। इन दोनों में मोतीलाल सहज-स्वाभाविक अभिनय करने में बाज़ी मार ले जाते हैं। लेकिन कलकत्ता में लगातार तीन साल चलने वाली क़िस्मत  में प्रतिनायक के किरदार में अशोक कुमार एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे। 

आजा़दी के आसपास ही परदे पर देवानंद, राजकपूर और दिलीप कुमार सितारे की तरह उगे। दिलीप कुमारनुमा रोमांस का मतलब था ट्रैजिक रोमांस। दिलीप कुमार, रोमांस हो या भक्ति, मूल रुप से अपनी अदाकारी को केंद्र में रखते थे, और वे ट्रेजिडी किंग के नाम से मशहूर भी हो गए। दिलीप कुमार ने अभिनय की हदें बदल डालीं।

आजादी के बाद के युवाओं में रोमांस का पुट भरा, देवानंद ने। देवानंद कॉलेज के लड़कों में, एडोलेसेंट लेवल पर काफी लोकप्रिय थे। देव आनंद हॉलीवुड के बड़े नायक ग्रेगरी पेक से प्रभावित तो हुए लेकिन पेक की कुछ अदाओं को छोड़कर उन्होंने उनसे  अच्छा अभिनय कभी नहीं सीखा जो पेक की रोमन हॉलिडे’, ‘टु किल ए मॉकिंग बर्डया दि गांस ऑफ़ नावारोनेमें दिखाई देता है। 

एक मज़ेदार प्लेब्वॉय बनकर ही रह गए देवानंद की लोकप्रियता कई बार दिलीप कुमार और राजकपूर से ज़्यादा साबित हुई। इस तिकड़ी में देव ही ऐसे थे जिनकी नकल करोड़ों दर्शकों ने की, लेकिन उनके किसी समकालीन ने उसकी नकल करने की ज़ुर्रत नहीं की। 

राज कपूर, एक अच्छे अभिनेता तो थे ही लेकिन उससे भी बड़े निर्देशक थे। अपनी फिल्मों में अदाकार के तौर पर उन्होंने हमेशा आम आदमी को उभारने की कोशिश की। आर के लक्ष्मण के आम आदमी की तरह के चरित्र उन्होने रुपहले परदे पर साकार करने की कोशिश की।
राज कपूर, दिलीप कुमार और देवानंद, ये तीनों एक स्टाइल आइकॉन थे। लेकिन इन तीनों का जादू तब चुकने लगा, जब एक किस्म का रियैलिटी चेक (जांच) जिदंगी में आया।
इस तिकडी़ के शबाब के दिनों में ही बलराज साहनी ने दो बीघा ज़मीन के ज़रिए मार्क्सवादी विचारों को सिनेमाई स्वर दिए। दो बीघा ज़मीन उ ज़माने की पहली फिल्म थी, जिसमें इटालियन नव-यथार्थवाद की झलक तो थी ही, इसका कारोबार भी उम्दा रहा था।

फिल्म में बेदखल सीमांत किसान की भूमिका को बलराज ने जीवंत कर दिया था। बेहद हैंडसमरहे साहनी  हिंदी सिनेमा के पहलेअसलीकिसान-मज़दूर के रूप में पहचाने गए। दरअसल, अभिनय के मामले में अपने समकालीनों से बीस ही रहे साहनी, ओम पुरी, नसीर और इरफान के पूर्वज ठहरते हैं।

गुरुदत्त बेहद निजी किस्म की फिल्में बनाते थे। लेकिन उनका दायरा बेहद सार्वजनिक हुआ करता था।
गुरुदत्त ने परदे पर एक अलग तरीके के नायक की रचना की। काग़ज़ के फूल के नायक ने दुनिया के बेगानेपन पर अपनी तल्ख़ टिप्पणी छोड़ी।

इसी दशक में मदर इंडिया भी आई। परदे पर विद्रोह और आदर्शवाद साथ दिखा। भारत माता के रुप में उकेरी गई नरगिस ने अपने ही डकैत बेटे को गोली मारकर आदर्शवाद की नई छवि गढ़ दी। लेकिन दर्शकों का एक ऐसा वर्ग तैयार होना शुरु हो चुका था, जिसकी सहानुभूति डकैत बेटे सुनील दत्त से थी।
उधर अभिनय-शैली के मामले शुरु में एल्विस प्रेस्ली से प्रभावित शम्मी कपूर ने बाद में खुद की जंगलीशैली विकसित की । इसका गहरा असर जितेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती वगैरह से होता हुआ गोविंदा तक आता है। यह संकोचहीन नाच-गाने का पॉपुलर कल्चर है। 

1969 में को शक्ति सामंत की ब्लॉकबस्टर आराधना ने रोमांस के एक नए नायक को जन्म दिया, जो पूछ रहा था, मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू....इस के साथ ही हिंदी सिनेमा में सुपरस्टारडम की शुरुआत हुई। राजेश खन्ना दिलीप कुमार की परंपरा में थे और रोमांटिक किरदारों में नजर आते रहे। किशोर कुमार की आवाज़ गीतों के लिए परदे पर राजेश खन्ना की आवाज़ बन गई, और इसने राजेश खन्ना को एक मैटिनी आइडल बना दिया। परदे पर पेड़ों के इर्द-गिर्द नाच-गाने लोगों को दुनियावी मुश्किलों से कुछ देर के लिए तो दूर कर देते थे लेकिन समाज परदे पर परीकथाओं जैसी प्रेमकहानियों को देखकर कर कसमसा रहा था।

जाहिर है, सिनेमा का एक बेहद प्रचलित मुहावरा विलिंग सस्पेंसन ऑफ़ डिसविलिफ़ सच होता दिख रहा था।
 
लेकिन तभी परदे पर रोमांस की नाकाम कोशिशों के बाद फिल्म जंज़ीर में एक बाग़ी तेवर की धमक दिखी, जिसे लोगों ने अमिताभ बच्चन के नाम से जाना। गुस्सैल निगाहों को बेचैन हाव-भाव और संजीदा-विद्रोही आवाज़ ने नई देहभाषा दी। और उस वक्त जब देश जमाखोरी, कालाबाज़ारी और ठेकेदारों-साहूकारों के गठजोड़ तले पिस रहा था, बच्चन ने जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों के ज़रिए नौजवानों के गुस्से को परदे पर साकार कर दिया।
विजय नाम का यह नौजवान इंसाफ के लिए लड़ रहा था, और उसे न्याय नहीं मिले तो वह अकेला मैदान में कूद पड़ता था।

लेकिन बदलते वक्त के साथ इस नौजवान के चरित्र में भी बदलाव आया। जंजीर में उसूलों के लिए सब-इंसपेक्टरी छोड़ देने वाला नौजवान देव तक अधेड़ हो जाता है। देव में इसी नौजवान के पुलिस कमिश्नर बनते ही उसूल बदल जाते हैं, और वह समझौतावादी हो जाता है।

90 के दशक की शुरुआत में अमिताभ बच्चन का गुस्सैल नौजवान अप्रासंगिक होता दिखा। 90 के दशक में भारत बदला, नई नीतियां आ गईं और तरक्की की ओर जाने के रास्ते बदल गए, तो बाग़ी तेवरों के लिए दर्शकों के लिए जो अपील थी, वो ख़त्म होने लगी।

रेगुलराइजेशन होने लगा तो नए हिंदुस्तान को दिखाने के लिए सिनेमा में नए चेहरों की ज़रुरत पड़ी। इस मौके को वैश्विक भारतीय बने राज मल्होत्रा यानी शाहरुख ख़ान ने थाम लिया। इनका किरदार नौकरी के लिए कतार में नहीं लगता,  उसे भूख की चिंता नहीं है, वह एनआरआई है, और अपने प्यार को पाने लंदन से पंजाब के गांव तक आ जाता है।

आमिर में शाह रुख़ जैसी अपील तो नही है लेकिन वह अदाकारी में शाह रुख़ से कई क़दम आगे हैं। शाह रुख़ तड़क-भड़क में आगे हैं लेकिन अपनी फ़िल्मों में मैथड एक्टिंग के ज़रिए आमिर, शाह रुख़ के जादू पर काबू पा लेते हैं। एक तरह से आमिर मिडिल सिनेमा में मील के पत्थर है तो शाहरुख सुपर सितारे की परंपरा के वाहक।

 




Thursday, July 22, 2010

समाज का अक्स है ,सिनेमा

भाग-1
(मेरा यह आलेख धारावाहिक रुप में दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित हुआ है, यह लेख आप 7 जुलाई के अंक में भी पढ़ सकते है- गुस्ताख)

सिनेमा, जिसके भविष्य के बारे में इसके आविष्कारक लुमियर बंधु भी बहुत आश्वस्त नहीं थे, आज भारतीय जीवन का जरूरी हिस्सा बना हुआ है। 7 जुलाई 1896, जब भारत में पहली बार किसी फिल्म का प्रदर्शन हुआ था, तबसे आज तक सिनेमा की गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका है। हम अपने निजी औरसामाजिक जीवन की भी सिनेमा के बग़ैर कल्पना करें तो वह श्वेत-श्याम ही दिखेगा।
सिनेमा ने समाज के सच को एक दस्तावेज़ की तरह संजो रखा है। चाहे वह 1930 में आर एस डी चौधरी की बनाई व्रत हो, जिसमें मुख्य पात्र महात्मा गांधी जैसा दिखता था और इसी वजह से ब्रितानी सरकार ने इस फिल्म को बैन भी कर दिया था, चाहे 1937 में वी शांताराम की दुनिया न माने। बेमेल विवाह पर बनी इस फिल्म को सामाजिक समस्या पर बनी कालजयी फिल्मों में शुमार किया जा सकता है।
जिस दौर में पाकिस्तान अलग करने की मांग और सांप्रदायिक वैमनस्य जड़े जमा चुका था, 1941 में फिल्म बनी पड़ोसी, जो सांप्रदायिके सौहार्द्र पर आधारित थी। फिल्म शकुंतला के भरत को नए भारत के मेटाफर के रुप में इस्तेमाल किया गया था। जाति हालांकि आज भी लगान और राजनीति तक में दिखी है,लेकिन इससे बहुत पहले 1936 में ही देविका रानी और अशोक कुमार बॉम्बे टॉकीज़ की अछूत कन्या में जाति प्रथा का मुद्दा उठा चुके थे। दलित मुद्दे पर फिल्मों में बाद में बनी फिल्म सुजाता को कोई कैसे बिसरा सकता है।
देश आजाद हुआ तो एक नए किस्म का आदर्शवाद छाया था। फिल्में भी इस लहर से अछूती नहीं थीं। देश के नवनिर्माण में उसने कदमताल करते हुए युवा वर्ग को नई दिशा, नया सोच और नए सपने बुनने के अवसर प्रदान किए।
50 का दशक संयुक्त परिवार और सामाजिक समरता की फ़िल्मोंका दशक था। संसार’, ‘घूँघट’,घराना’, औरगृहस्थीजैसी फ़िल्मों ने समाज की पारिवारिक इकाई में भरोसे को रुपहले परदे पर आवाज़ दी।
इन्हीं मूल्यों और सुखांत कहानियों के बीच कुछ ऐसी फिल्में भी इस दौर में आईं, जिनने समाज में वैचारिक स्तर पर आ रहे बदलाव को रेखांकित भी किया।
एक ओर तो राज कपूर-दिलीप कुमार-देव आनंद की तिकड़ी अपने रोमांस के सुनहरे रोमांस से दुनिया जीत रहे थे। लेकिन राज कपूर की फिल्मों एक वैचारिक रुझान साफ दिख रहा था, और वह असर था मार्क्सवादका। गौरी से करिअर शुरु करने वाले राज कपूर अभिनेता के तौर पर चार्ली चैप्लिन का भारतीय संस्करण पेश करने की कोशिश में थे। हालांकि श्री 420 में वह नायिका के साथ एक ही छतरी के नीचे बारिश में भींगकर गाते भी हैं, और इस तरह राज कपूर ने दब-छिप कर रहने वाले भारतीय रोमांस को एक नया अहसास दिया।
हालांकि, भारतीय सिनेमा के संदर्भ में किसी विचारधारा की बात थोड़ी विसंगत लग सकती है। लेकिन पचास के दशक के शुरुआती दौर में विचारधारा का असर फिल्मों पर दिखा। बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन भारत में नव-यथार्थवाद का मील का पत्थर है।
लेकिन ज्यादातर भारतीय फिल्मों में वामपंथी विचारधारा के दर्शन होते हैं वह कोई क्रांतिकारी विचारधारा न होकर सामाजिक न्याय की हिमायत करने वाली है। इसमें समाज सुधार, भूमि सुधार,गाँधीवादी दर्शन और सामाजिक न्याय सभी कुछ शामिल है। लेकिन हर आदर्शवाद की तरह फिल्मों का यह गांधी प्रेरित आदर्शवाद ज्यादा दिन टिका नहीं। ऐसे में आराधना से राजेश खन्ना का आविर्भाव हुआ। खन्ना का रोमांस लोगों को पथरीली दुनिया से दूर ले जाता, यहां लोगों ने परदे पर बारिश के बाद सुनसान मकान में दो जवां दिलों को आग जलाकर फिर वह सब कुछ करते देखा, जो सिर्फ उनके ख्वाबों में था।
इस तरह का पलायनवाद ज्यादा टिकाऊ होता नहीं। सो, ताश के इस महल को बस एक फूंक की दरकार थी। दर्शक बेचैन था। मंहगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और पंगु होती व्यवस्था से लड़ने वाली एक बुलंद आवाज़ कीज़रुरत थी। ऐसे में एक लंबे लड़के की बुलंद आवाज़ परदे पर गूंजने लगी गई। इस नौजवान के पास इतना दम था कि वह व्यवस्था से खुद लोहा ले सके, और ख़ुद्दारी इतनी कि फेंके हुए पैसे तक नहीं उठाता।
कुछ लोग तो इतना तक कहते है कि अमिताभ के इसी गुस्सेवर नौजवान ने सत्तर के दशक में एक बड़ी क्रांति की राह रोक दी। बहरहाल, अमिताभ का गुस्सा भी कुली, इंकलाब आते-आते टाइप्ड हो गया। जब भी इस अमिताभ ने खुद को या अपनी आवाज को किसी मैं आजाद हूं में, या अग्निपथ में बदलना चाहा, लोगों ने स्वीकार नहीं किया।
तो नएपन के इस अभाव की वजह से लाल बादशाह, मत्युदाता, और कोहराम का पुराने बिल्लों और उन्हीं टोटकों के साथ वापस आया अमिताभ लोगों को नहीं भाया। वजह- उदारीकरण के दौर में भारतीय जनता का मानस बदल गया था। अब लोगो के पास खर्च करने के लिए पैसा था, तो वह रोटी के मसले पर क्यों गुस्सा जाहिर करे।
ऐसे में एक और नए लड़के ने दस्तक दी। यह लड़का कूल है, इतना कि अपने प्यार को पाने लंदन से पंजाब के गांव तक चला आए। परदेसी भारतीयों की कहानियों पर और परदेसी भारतीयों के लिए बनाई गई फिल्मों में शाहरुख खान का किरदार राज मल्होत्रा एक सिंबल के तौर पर उभरा।
हालांकि, परदेसी भारतीयों के लिए बनाए जा रहे सिनेमा में तड़क-भड़क ज्यादा हो गया और भारत के आम आदमी का सिनेमा के कथानक से रिश्ता कमजोर हो गया। ऐसे में मिड्ल सिनेमा ताजा हवा का झोंका बनकर आया है। व्यावसायिक रुप से सफल इन फिल्मों का क्राफ्ट और कंटेंट दोनों मुख्यधारा की फिल्मों से बेहतर है। आमिर खान की लगान, तारे ज़मीन पर जैसी कई फिल्मों, शाहरुख की स्वदेश और चक दे इंडिया,और श्याम बेनेगल की वेवकम टू सज्जनपुर और बेलडन अब्बा ने सामयिक विषयों को फिल्मो में जगह दी है। और तब अलग से यह कहने की ज़रुरत रह नही जाती कि सिनेमा समाज का अक्स है।

Monday, July 19, 2010

बेख़बरी का फ़ायदा


लबलबी दबी – पिस्तौल से झुँझलाकर गोली बाहर निकली.
खिड़की में से बाहर झाँकनेवाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया.
लबलबी थोड़ी देर बाद फ़िर दबी – दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली.
सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुँह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में हल होकर बहने लगा.
लबलबी तीसरी बार दबी – निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज़्ब हो गई.
चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख़ भी न सकी और वहीं ढेर हो गई.
पाँचवी और छठी गोली बेकार गई, कोई हलाक हुआ और न ज़ख़्मी.
गोलियाँ चलाने वाला भिन्ना गया.
दफ़्तन सड़क पर एक छोटा-सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया.
गोलियाँ चलानेवाले ने पिस्तौल का मुहँ उसकी तरफ़ मोड़ा.
उसके साथी ने कहा : “यह क्या करते हो?”
गोलियां चलानेवाले ने पूछा : “क्यों?”
“गोलियां तो ख़त्म हो चुकी हैं!”
“तुम ख़ामोश रहो....इतने-से बच्चे को क्या मालूम?”

मंटो की लघुकथा

Wednesday, July 14, 2010

तेरे लिए-कविता

 सुना है 
तुम रेत पर चलती हो, 
बरहना-पा,
रेत के रंग की हो,
सुनहरी, 
सुना है-
तुम्हारी आंखों के काजल,
बादल को मात देते हैं..
सुना है,
तुम्हारी देह में आदिम रात्री की महक है..
महज सुना ही है..

Monday, July 5, 2010

इसलाह

"कौन हो तुम..?
तुम कौन हो?"
"हर हर महादेव"!
"हर हर महादेव"!
हर हर महादेव!
"सुबूत क्या है?"
सुबूत! मेरा नाम धर्मचंद है...
"यह कोई सुबूत नहीं"
"चार वेदों में कोई बात मुझसे पूछो"
 'हम वेदों को नहीं जानते, सुबूत दो"
"क्या...?
"पायजामा ढीला करो"
पायजामा ढीला हुआ तो शोर मच गया
मार डालो, ...मार डालो
ठहरो,! ठहरो! मैं तुम्हारा भाई हूं-- भगवान की कसम मैं तुम्हारा भाई हूं!

मंटो की लघुकथाओं से

Sunday, June 20, 2010

तारीफ और हक़ीक़त

आज शहंशाह का जन्मदिन था। एक चमकता हुआ दिन..। एक पुरानी रस्म के मुताबिक हर महीने जन्म दिन वाली तारीख को सभी वजीर, ओहदेदार, आलिम और शायर इकट्ठा होते थे और शहंशाह की तारीफ करने में होड़ करते थे । इनमें से जो अव्वल आता उसे इनाम इकराम मिलता, मनसबदार बना दिए जाते।


बहरहाल, उस दिन, दिन भर तमाम तरह के और हरेक के कसीदा पढ़ने के बावजूद अमीर को तसल्ली नहीं हुई। वह बोले, -- पिछली दफा भी तुम लोगों ने यही बातें बोली थीं। हम देखते हैं कि तारीफ करने में तुम लोग माहिर और मुकम्मल नहीं हो। तुम लोग अपने दिमागो पर ज़ोर डालने को तैयार नहीं हो। लेकिन आज हम तुमसे काम लेकर मानेंगे। हम सवाल करेंगे और तुम्हें इस तरह का जवाब देना है कि हमारी तारीफ भी हो और जवाब में सचाई का पुट भी हो।

ग़ौर से सुनो, हमारा सवाल है कि अगर हम इतने ही बड़े हैं, कतवर हैं और जैसा कि तुम लोगों का दावा है, तानाकाबिले-फतह हैं, तो पड़ोसी सूबे की महारानी ने और तमाम देशो के सुल्तानों ने  हमारी शहंशाहियत मानकर अपनी उम्दा सौगातें क्यों नहीं भेजीं। हम तुम्हारे जवाबों का इंतजार कर रहे हैं। कहकर शहंशाह ने अपनी राजमाता की तरफ देखा, जिनके गरवीले चेहरे पर बेटे की ताकत और बुद्धि का दर्प था।

वजीर की पगड़ी कमजोर होने लगी। जवाब के लिए वह बगले झांकने लगे। पहले वह वजीरे-खज़ाना हुआ करते थे, अब वजीर बने हैं, सो परेशानी में डूब गए।

वजीर और दूसरे दरबारी सीदा जबाव न देकर भिनभिनाने लगे, अकेला नसरु्ददीन बिना घबराए अपनी जगह बैटा रहा। उसकी बारी आई तो बोला,  अमीरे-आजम। मेरे हकीर लफ़्ज़ों को सुनने की मेहरबानी अता फरमाएं। शहंशाह के सवाल का जवाब आसान है। पड़ोस के सभी मुल्कों के सुल्तान हमारे आका की ताकत के डर से हमेसा कांपते रहते हैं। वे सोचते हैं कि अगर हम बढिया सौगात भेजेंगे तो बुखारे का तकतवर अजीमुश्शान अमीर समझेंगे कि हमारा मुल्क रईस है, जिससे उन्हें फौज लेकर यहां आने और हमारे मुल्क पर कब्जा करने का लालच होगा। लेकिन अगर हम उन्हें मामूली सौगात भेजेगे तो वह नाराज होकर अपनी फौज भेज देंगे। बुखारा के अमीर ताकतवर हैं, अजीमुश्शान हैं, सो हिफाजत इसी में है कि अपनी नाचीज हस्ती की उन्हें याद ही न दिलाई जाए।

( इस कहानी का भारत के युवराज राहुल बाबा के जन्मदिन से कोई संबंध न जोड़ा जाए। ऐसा करना बेतुका होगा)- गुस्ताख

Thursday, June 17, 2010

कविता-हवा का रुख

हवा का रुख़,
भांपते हैं रखे पेपरवेट,
और कलमें कर रही हैं,
काग़ज़ी आखेट।

सुरक्षित खुद को समझते,
पहनकर इस्पात,
राष्ट्र को संदेश, करते
सौ टके की बात।

सुनों उनकी,
अक्षरों से नहीं जिनकी भेंट
बोलती लू,
वनस्पतियों पर कठिन हमला,

किंतु उनका क्या कि जिनके
घर स्वयं शिमला

ये हरे हैं

भले सिर पर तप रहा हो जेठ