Thursday, March 10, 2011

सिनेमा-राजा रविवर्मा का असर

राजा रवि वर्मा भारतीय चित्रकला के इतिहास में एक खास स्थान रखते हैं। भारतीय चित्रकला के सौंदर्यबोध को उन्होंने एक जीवंत छवि दी। बेशक उनपर यूरोपीय खासकर रोमन शैली का प्रभाव था। लेकिन इससे भारतीय चित्रकला को नए आयाम मिले।


कई जानकार मानते हैं कि राजा रवि वर्मा का योगदान इससे कहीं बढ़कर रहा और कला के क्षेत्र में इसने राष्ट्रीयता की भावना को बढावा दिया। राजा रवि वर्मा पहले भारतीय चित्रकार थे, जिन्होंने पश्चिमी शैली के रंग-रोगन-सामग्रियों और तकनीक का प्रयोग भारतीय विषयवस्तुओं पर किया।  तकनीक का यह फ़्यूज़न कला के क्षेत्र में आधुनिकता और राष्ट्रीयता के विकास के सहायक सिद्ध हुआ।
        छाया-प्रकाश का अद्भुत मेलः चित्र राजा रवि वर्मा 
 
रवि वर्मा ने भारतीय मिथकों के चित्रों में पश्चिमी प्रकाश-छाया तकनीक और पर्सपेक्टिव का इस्तेमाल किया।


राजा  रवि वर्मा पर तंजाउर की कला शैली का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। साथ ही उन्नसीवी सदी की यूरोपीय कला के नव-शास्त्रीय यथार्थवादी चित्रकला का असर भी उन पर था, जिनमें ऐतिहासिक विषयों की चित्रकारी की जाती थी। जाहिर है, यह यथार्थवादी असर रवि वर्मा की चित्रकला पर भी पड़ा। 

यथार्थवाद का यह आयात देश में अनोखा था, क्योंकि उस वक्त तक ऐसी कोई यथार्थवादी कला धारा मौजूद नहीं थी। जाहिर है, रवि वर्मा के चित्रों की कामयाबी ने हिंदू देवी-देवताओं की ऐसी छवियां पेश करनी शुरु की, जैसी पहले कभी नहीं की गई थीँ। देवताओं की यह छवियां चित्रीय रुप में पहले से दैवीय और शारीरिक गुणों को प्रदर्शित करने वाली थीं। रिकन्स्ट्रक्शन और महिमामंडन करनेवाले इन चित्रों ने शिक्षित कुलीनों का ध्यान आकर्षित किया, और रवि वर्मा की कला को नई चित्रकला और भारतीय संवेदऩाओं की चित्रकला माना गया। जाहिर है, इसके इन्हीं गुणों ने रवि वर्मा की चित्रकला को राष्ट्रीयता के गुण भी दिए। 

उनके चित्रों की मांग इतनी ज्यादा थी कि रवि वर्मा ने बॉम्बे के पास 1892 में एक प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया, जो उनके चित्रों को ओलियोग्राफ के रुप में छापता था। ये कैलेंडरनुमा चित्र बहुत लोकप्रिय हुए और रवि वर्मा के चित्रों को पूना चित्रशाला प्रेस और कलकत्ता आर्ट स्टूडियो ने भी बड़े पैमाने पर छापा।

इन प्रिंट्स(कैलेंडरों) को अगर शुरुआती फिल्मो से मिलाएं तो साफ हो जाता है कि शुरुआती मिथकीय. फिल्मों के पोस्टर इसी शैली में चित्रित  किए गए हैं। 1927 में बाबूराव पेंटर के निर्देशन में बनी फिल्म सती सावित्री के पोस्टर से यह बात साबित भी होती है।

हालांकि पोस्टर बनाने वाले कलाकारों का काम रवि वर्मा के सधे हाथों के मुकाबले करीब-करीब बेडौल लगता था, लेकिन ये पोस्टर रवि वर्मा के प्रकाशित सस्ते कैलेंडरों की ठेठ नकल थे। जिस कलात्मकता और राष्ट्रीयता की झलक हम वर्मा के चित्रों में पाते हैं, सिनेमाई रुप में वह फाल्के की फिल्मों में प्रतिध्वनित होता दिखता है। फाल्के ने भी हिंदू देवताओं को पट पर उतारा और उनका चित्रण भी तकरीबन वैसा ही किया जो वर्मा की शैली थी। अब यह भी संयोग ही है कि फिल्मकार बनने से पहले और अपना खुद  का कामयाब प्रिंटिंग प्रेस खोलने से पहले फाल्के 1905 तक रवि वर्मा के प्रैस में ही काम करते थे।


अगला हिस्साः रवि वर्मा का असर..


Sunday, March 6, 2011

....मुहबब्त एगो चीज है-चौथी किस्त

"दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे,
डर है कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे।"

हम नंबरों को अपने फोन में सुरक्षित कर लेते हैं...आदमी नंबरों में तब्दील हो गए...कहानियां टेक्स्ट मेसेजेज में। किसी का टेलिफोन नंबर पूछे तो पहले की तरह आप फटाक-देनी से बता नहीं पाएँगे। पहले नंबर आदमी पर हावी नहीं थे..पहले कितना अच्छा था

सुबह तक दारु का नशा बिलकुल उतर चुका था...दारु पीकर आदमी दार्शनिक हो जाता है। मेरी डायरी में दारुबाजी के बाद ऐसे ही दर्शन और तमाम किस्म के ब्रह्मज्ञान चस्पां हो जाते हैं।

बेग़म अख़्तर तकदीर के तमाशा न बनने और दीवाना बनना मंजूर करने के बाद डीवीडी में तब्दील होकर रह गईं थीं। एक बार फिर मैं और मेरी तन्हाई...।

एक बार फिर फोन देखा, पहुंचेली का मिस्ड कॉल..और एक मेसेज था। सुबह सात बजकर तैंतीस मिनट का कॉल..और मेसेज था--जाग जाओ तो कॉल बैक करो..।

बातचीत बेहद संक्षिप्त थी...पहुंचेली ने बुलाया था एक मॉल में। मैं मॉल में उसे खोजता रहा..हर सुंदर आंखों वाली लड़की मुझे पहुंचेली ही लगी। फोन आया--'कहां हो.?'
.मैंने कहा- 'बस आपको ही खोज रहा हूं..'
'सीसीडी आ जाओ..तुम्हारे इंतजार में पांच कप कॉफी गटक चुकी हूं..'.मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गई। जीवन में पहली बार कोई लड़की, मेरे सपनों को शहज़ादी मेरा इंतजार कर रही थी ....सीसीडी में एक कुरसी को धन्य बनाती हुई पहुंचेली बैठेली थी..और हमेशा की तरह ऑरेंज सूट में सजेली थी..

पहुंचेली का आंखों का सुरुर हमेशा की तरह अपने शबाब पर था..।
 'सुनो..'उसने कटाक्षपूरित नयनों के बाण चलाए...'जी '---मैंने अपना सारा ध्यान उसकी बातों की तरफ लगा दिया। --'तुमने कल कहा था...कि तुम्हे एक सीढी लगानी है मेरे कंधों पर.." मैंने कहा।
'मैंने कल तुमसे बात की थी..?" -- वो हैरत में पड़ गई। हैरत में ही उसने कॉफी के कुछ सिप लिए। विस्फारित हो गई आंखों से उसने आगे कहा कि दरअसल वह यही बात करने मुझे सीसीडी तक खींच लाई है..और उसे बहुत हैरत हो रही है कि मैंने उसके कहने से पहले ही सारी बातें कह दी हैं।

वैसे...मुझे मॉडलिंग करनी है..मुझे पता चला है कि तुम्हारी पहचान कुछ डिजाइनर्स के साथ है। रैम्प पर मेरी पूछ बहुत कम होती जा रही है...कामयाबी के लिए जो सीढियां चढ़नी होती हैं उन्हें कंधों पर रखना होता है जानू...माइ बेस्ट फ्रेंड। ...और मैंने सोचा सिर्फ तुम मेरी मदद कर सकते हो।

मैं ही क्यों तुम्हारे तो सिर्फ फेसबुक पर ही 5 हजार से ज्यादा दोस्त हैं, न जाने कितने ऑरकुट पर होंगे..कितने हाईफाइव पर न जाने कितने कहां कहां होंगे...कंधों के लिए मुझे ही क्यों चुन  रही हो तुम?....


Saturday, March 5, 2011

सिनेमाः प्रचार के निहितार्थ- दूसरी किस्त

शुरुआती फिल्मों के विज्ञापनों पर रहा ललित कलाओं का असर, बाद में शुद्धतावादियों को लगी हेठी

सजीव फोटॉग्रफी जैसे शब्दों के विज्ञापनों में इस्तेमाल ने इसे उत्पाद (सिनेमा) के गुण के तौर पर प्रचारित किया। दरअसल, सजीव तस्वीर कहने से तस्वीरों के गुण के सिनेमा में परिवर्तित और हस्तांतरित होना सुगम हो गया। फोटॉग्रफी का गुण था यथार्थ को पूरी सच्चाई और वस्तुनिष्ठता के साथ छापने का...फोटॉग्रफी इस लिहाज से भी चित्रकला से आगे की चीज थी।

सिनेमा ने फोटॉग्रफी के इसी गुण को आगे बढाया था..लेकिन सिनेमा में सजीवता भी थी..गति भी।


सिनेमा के शुरु के दौर में प्रचार का काम  बैलगाडियों के ज़रिए हुआ करता था..परचे बांटे जाते थे। प्रचार का काम तांगों से भी किया जाता था। तांगों से प्रचार करने की तरकीब अभी भी जारी है. कम से कम मेरे शहर मधुपुर में तो फिल्मों का प्रचार अब भी तांगे से ही होता है।

दरअसल, भारतीय सिनेमा पर पारसी थियेटर के असर की बात की जाती है। और यह असर प्रचार के मामले में भी इतना ही सच है। पारसी थियेटरों की ही तरह शुरुआती दौर में सिनेमा में परचे बांटे जाने लगे। लेकिन ये परचे सिर्फ शब्दाधारित होते थे। इनमें तस्वीरें अभी तक जगह नहीं बना पाईं थी।
शुरुआती दौर की फिल्म का प्रचार हैंडबिल

छपाई तकनीक में विकास के साथ ही इन परचों की छपाई में भी सुधार आने लगा। 1920 के दशक में अक्षरों की छपाई में कैलिग्राफीनुमा लैटर्स के ब्लॉक बनाए जाने लगे। इसी दशक के आखिरी सालों में बुकलेट्स छपने लगे। इन बुकलेट्स में फिल्मों की कुछ तस्वीरें और सिनॉप्सिस भी दी जाने लगीं।


बुकलेट्स लेकर जिस फिल्म का प्रचार सबसे पहले किया गया, वो थी- प्रेम सन्यास। गौतम बुद्ध के जीवन पर बनी यह फिल्म भारत और जर्मनी का संयुक्त निर्माण थी और इसे जर्मन निर्देशक फ्रेंज ऑस्टिन और भारतीय हिमांशु राय ने निर्देशित किया था। 1926 में रिलीज इस फिल्म का हिंदी में नाम प्रेम सन्यास था तो जर्मन दर्शको के लिए यह लाइट ऑफ एशिया था।

फिल्में शुरु से ही कला से जुड़ी चीज मानी जाती रही है। ऐसे में ललित कलाओं से जुड़े लोगों को इसमें(विज्ञापनों में ) प्राथमिकता मिलती रही। लेकिन विज्ञापन कला में ललित कला से जुड़े लोगों को कभी भी पूरी तरह से कलात्मक आजादी नहीं मिली। और कला की शास्त्रीयता से जुड़े लोग पोस्टरों और फिल्म प्रचार सामग्री बनाने को कभी भी उत्कृष्ट कला कार्य मानने में हेठी समझते रहे।

दूसरी तरफ विज्ञापन कला से जुड़े लोगों ने भी शास्त्रीयता को ज्यादा भाव नहीं दिया, हालांकि, वह छवियां गढ़ने की बुनियादी बातें ललित कलाओं की उधारी लेते रहे। विज्ञापन कलाओं के विकास ने भारत की ललित कलाओं को भी एक नया तेवर दिया इसमें शक नहीं। इन विज्ञापनों ने एक नए युग की शुरुआत की, जिसमें सिनेमैटिक छवियों को सिनेमाघरों से बाहर और विस्तार दिया।

छवियों के इस नए युग में दादा साहेब फाल्के-जिनने 1913 से 1937 के बीच फिल्में बनाई- एक अलग मुकाम इसलिए भी रखते हैं क्योंकि उनने सिनेमा को एक नई कलात्मक ऊंचाई बख्शी थी। फाल्के की फिल्मों पर राजा रवि वर्मा की चित्रकला का बहुत असर था...जाहिर है यह प्रभाव विज्ञापन कला पर भी पड़ा।

अगलाः रवि वर्मा का असर

Thursday, March 3, 2011

सिनेमाः प्रचार के निहितार्थ

7 जुलाई 1896...टाइम्स ऑफ इंडिया...। भारत में प्रदर्शित होने वाली पहली फिल्म का प्रचार के लिए कुछ वैसा ही प्रकाशित हुआ था, जैसा आजकल अखबारों में वर्गीकृत विज्ञापनों का कॉलम छपता है। एक बॉक्स में
टाइपसैट मेसेज छपे थे---
 " The marvel of the century, The wonder of the world, Living Photographic pictures,...in life sized reproduction."

उस वक्त में भारत अपने सामाजिक बदलावों के दौर से गुजर रहा  था। इन विज्ञापनों को भी आधुनिकीकरण का जरिया और प्रतीक माना जाने लगा। बदलते भारत में आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक विकास ने आधुनिकीकरण को नई परिभाषाएं और नए आयाम दिए। इऩ सभी क्षेत्रों के नए तौर-तरीके विज्ञापन कला और सौदर्यशास्त्र में भी दिखे।
पहली सवाक फिल्म 'आलमआरा' का विज्ञापन

             
 बदलाव का वह दौर प्रचार सामग्रियों की कलात्मकता को ऩए तेवर देता रहा। विज्ञापन सिर्फ अखबारों तक सीमिच नही रहे और इसके लिए अलग से परचे प्रकाशित किए जाने लगे। जिनमें उस दौर के सांस्कृतिक वातावरण के विचारों, आस्थाओं, नजरियों और मूल्यों का कलात्मक पर्याय दिखता रहा।

अखबारों में विज्ञापन देने की प्रथा भारत में अखबारो के प्रकाशन के साथ ही शुरु हो गई थी। यानी 18वीं सदी में ही। इंगलैंड के अखबारों में छपे विज्ञापनों की तर्ज पर छपे ये विज्ञापन आखिरी पेज पर छापे जाते थे।

भारत में पहली फिल्म के प्रदर्शन से जुडी़ नोटिस भी अखबार में नए विज्ञापन कॉलम के तहत छपी थी। इस कॉलम में जहाजरानी और कार्गो से जुड़े विज्ञापन छपा करते थे।

उस दौर में टाइम्स ऑफ़ इंडिया सिर्फ विदेशी विज्ञापन ही छापा करता था, ऐसे में शुरुआती भारतीय फिल्मों को उस अखबार में जगह नहीं मिल पाई। 1913 में रिलीज हुई पहली भारतीय फिल्म राजा हरिश्चंद्र का विज्ञापन बॉम्बे क्रॉनिकल में छपा था। -----
"A Powerfully instructive subject from Indian mythology. first film Of Indian manufacture, Specially prepared at enormous cost. Original scenes from city of Banares. Sure to appeal to our Hindu patrons."
बड़े शहरों मे तो इस विज्ञापन का असर ठीर रहा लेकिन प्रांतो में जब इसे प्रदर्शित किया गया, तो यह विज्ञापन बेअसर साबित हुआ।

अबकी बार दादा साहेब फाल्के ने विज्ञापन में कुछ बदलाव किए। विज्ञापन में लिखा गया--" 57000 से भी अधिक तस्वीरों का प्रदर्शन, दो मील लंबी तस्वीर"......लंबाई पर दिया गया जोर 6 घंटे लंबा नाटक देखने वाले दर्शकों को अपने असर में लेने लगा।


जारी.....


Thursday, February 24, 2011

अथ 'पहुंचेली' कथा उर्फ....मुहब्बत एगो चीज है-तीसरा हिस्सा

...अचानक आंखें खुली तो सूरज बाहर कहीं बहुत ऊपर उठ आया है इसका अहसास हो रहा था। रात का नशा सिर पर ऐसे चढा हुआ था मानो किसी ने चक्की रख दी हो ...।

रात को जो भी हुआ था, अक्षर-अक्षर याद है।

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ,
हर वक्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ।।

साफ-सुथरा होकर चाय बनाने में लगा हूं..। इवनिंग शिफ्ट है। वापसी रात ग्यारह बजे के बाद ही होगी, यानी संध्यावंदन के लिए इंतजाम दफ्तर में ही करना होगा, अगर किसी खास कवरेज में न उलझना पड़े।

तभी देखता हूं मोबाईल फोन की घंटी बज रही है। कोई अनजान सा नंबर है..एक ऐसा नंबर जिस पर आज से पहले कभी बात नही हुई।

"हलो"...
उधर से एक मीठी सी आवाज...मैं चौंकता हूं। आवाज पहचानी तो कत्तई नहीं है। इधर फोन पर बात कर रहा हूं..चाय उबलकर गिरने को तैयार है..दरवाजे पर घंटी बजती है।
मैं पूछता हूं--"कौन..?"(कूड़े वाला है।)
उत्तर मिलता है- "पहुंचेली।" पहुंचेली कहने के बाद एक खनकती हुई हंसी ...जनाब आवाज इतनी मीठी..खनक ऐसी की चांदी के सिक्कों में भी न हो।

वॉयस ओवर के लिए परफैक्ट..लोन बांटने के लिए परफैक्ट..एक ही कॉल पर लोग लोन लेने और फिर लौटाने को तैयार हो जाएँ।

"अरे पहुंचेली जी नाम क्या है आपका..?"
"कहा तो पहुंचेली..."फिर हंसी।
"अरे वास्तविकता तो बताइए..!"
"वास्तविकता पहुंचेली है –आप पता लगाएँगे तो कोई मेरा नाम तारा झावेरी बताएगा कोई महामाया सेनगुप्ता...." फिर एक खनकदार हंसी।

मुझे ऐसे में बहुत गुस्सा आता है, या तो हंस लो या बातें कर लो।

"सुनो...तुम मुझे कितना चाहते हो?"---- वह फोन से निकल कर सीधे सामने आ खड़ी हुई। काजल से पुती बड़ी-बड़ी गहरी आंखों में मैं कूद गया। मुझे तैरना नहीं आता..आंखों में तो बिलकुल नहीं। तैरना न सही..भींग गया बुरी तरह। "सुनो ना...
.....
"तुम मुझे कितना पसंद करते हो।"
"बहुत.."
"बहुत कितना.."
"बहुत ज्यादा.."
"तो सुनो...मेरा एक काम करोगे..?"
"क्या..."
"मुझे ऊपर चढ़ना है..तुम्हारे कंधे पर सीढी रखनी है। प्लीज अपने कंधे पर सीढी लगा लो, जब मैं ऊपर से वापस लौटूंगी तो तुम्हारे छिले कंधों के लिए मरहम लेती आऊंगी...पक्का। प्रॉमिस..."

इतना कह कर वह फिर फोन में घुस कर एक नंबर बन गई...मुझसे कोई जवाब देते नहीं बन रहा था। आखिर महामाया सेनगुप्ता उर्फ तारा झावेरी उर्फ पहुंचेली चाहती क्या है...

"तुम्हारे पास सोचने का बहुत वक्त है..शाम में फिर फोन करुंगी...बाय ..".फिर खनकती हंसी।

मैं नंबर सेव करने में लग गया। हम नंबरों को नाम देकर पता नहीं क्यों निंश्चित हो जाते हैं।

Monday, February 21, 2011

बाली उमरिया में कमर दर्द

बीमार हूं..। कमर और घुटने में दर्द है। लगता है किसी ग़ज़ल को सुन लिया है खुदा ने।
 
दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह, 
फिर चाहे दीवाना कर दे, या अल्लाह..।

अल्लाह मियां ने इतना दर्द दे दिया कि न सोते बन रहा न जागते, न उठते बन रहा न बैठते..। दर्द ने दीवाना कर दिया है..। सुना है मुहब्बत में भी दर्द होता है होता होगा..लेकिन तय  है वह दर्द कमर और घुटने का तो नहीं ही होगा। कल ही जन्मदिन था..। ढेरों बधाईयां मिलीं..। लेकिन इतना बुढापा भी नहीं आ गया। टर्निंग 30 क्या बुढापे की निशानियां लेकर आ जाता है..?

लगता है बधाईयों का बोझ उठाते-उठाते कमर में मोट आ गई..। आज सुबह डॉक्टर के पास गया। कमर में दर्द की बात सुन कर डॉक्टर हंसा..उसकी आँखों में एक किस्म की शरारत थी। मजाक टाइप..बाली उमरिया में कमर दर्द..। फिर जैसी की उम्मीद थी, उसने दो -तीन टेस्ट ठोंक दिए।

ब्लड प्रेशर चेक किया। वह दुरुस्त। मुझे चैन आय़ा। फिर एक सिरिंज खून निकाल लिया। मैंने सोचा, एक बूंद से टेस्ट करेगा, बाकी या तो खुद पिएगा या फिर बेच देगा। कई डॉक्टरों में नेताओं वाले गुण आ जाते हैं।

फिर जब कंपाउंडर ने वजन किया, तो सहसा मुझे भरोसा ही नहीं हुआ। 74 किलो..मेरे कद के हिसाब से मेरा वजन 73 किलो तक हो सकता है। लेकिन  एक किलो सरप्लस जीवन में पहली बार। विकास सारथी ने जब मेरे छात्र जीवन का फोटो अपलोड कर दिया था, तो कई यों को भरोसा ही नहीं हुआ। कई लोग मानने लगे कि मैंने पढाई-लिखाई भारतीय जनसंचार संस्थान से नहीं इथयोपिया या सोमालिया से पूरी की है।

मैंने मुंहतोड़ किस्म के उत्तर देने तो चाहे लेकिन फेसबुकिया मित्र ज्यादा वाचाल निकले। उन्होने साबित कर दिया कि उस दौरान 54 किलो का वज़न मैं अपनी मर्जी से और हरामीपने की वजह से ढो रहा था। बाकी चिंरंतर सत्य तो यही है कि सन 94 से 2005 तक मैं 54 किलो का बना रहा।

वजन बढने की हिंदू विकास दर आगे भी कायम रही 2010 के जून तक के सांख्यिकीय आंकड़े यह साबित करने के लिए काफी है कि मैं 63 किलो पर स्थिर था। लेकिन सिर्फ छह महीने मे शरीर उदारीकृत बाजार-व्यवस्था का हिस्सा होकर, विश्व बैंक के लोन से चलने लगा। वजन इतना बढ़ जाएगा इसकी खुशफहमी कभी थी ही नहीं।

जीवन में पहली बार वजन कम करने  की चिंता की। यह बेटी के ब्याह के बाद बाप के आंसू की तरह खुशी देने वाली चिंता जैसी लगी आज दिन भर।

लेकिन कमर का दर्द चिंता दे रहा है असल वाली..।

बाली उमरिया में दरद फूटे हो रामा....हमरे जौबन में लग गइल आग हो रामा...

Wednesday, February 9, 2011

अथ 'पहुंचेली' कथा-दूसरी किस्त

....हाथ की सिगरेट राख हो गई। 'पहुंचेली' पता नहीं किधर निकल ली। मैंने धीरे से बाहर झांका। मन का अंधेरा खिड़की बाहर दिखने लगा था। मच्छरों की वजह से शाम संगीतमय लगने लगी थी।

लाई हयात आये कज़ा ले चली चले...अपनी खुशी न आए न अपनी खुशी चले...पड़ोस के घर में बेग़म अख्तर की आवाज़ दिल के ग़म को गहराई देने लगे। मैं उस आदमी को कोसने लग गया, एक तो 'पहुंचेली' के अचानक ग़ायब हो जाना, उस पर से बेग़म अख़्तर...।

सामने एक पैग बनाकर मैने रख ली। ग़म का सारे  इंतज़ाम मुकम्मल हो गए।

न जाने क्यों मन फिर 'पहुंचेली' की ओर खिंच गया। मेरी फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट का जवाब देने से पहले ही 'पहुंचेली' पेज में तब्दील हो गई। उसके दोस्त पांच हजार से ज्यादा हो गए। अब मैं उसका फॉलोअर हो सकता था, दोस्त और प्रेमी नहीं...तमाम किस्म के भावुकता भरे मेसेज भेजने के बाद भी 'पहुंचेली' पहुंच से बाहर ही रही।

इस कन्या के बारे में कई मित्रों ने कहा भी कि बहुत पहुंचेली लड़की  है...लेने के देने पड़ जाएंगे। लेकिन दिल का क्या है मानता ही नहीं। एक दोस्त ने फेसबुक पर ही स्टेटस अपडेट किया था, चाहना न चाहना किसके बस की बात है, दिल का आ जाना किसी पे किस्मतों की बात है...

मैं फटीचर प्रेमी की तरह फिर से 'पहुंचेली' के प्रोफाइल की गलियों में भटक रहा हूं। उसके कई सारे फोटो डाउनलोड कर लिए...टाइट क्लोज अप  और एक्स्ट्रीम क्लोज अप को और भी टाइट बनाने के वास्ते सिर्फ आंखों वाले हिस्से क्रॉप कर लिए...मैं दीवाना हूं, मैं पागल हूं..तमाम किस्म की बॉलिवुडीय भावुकता मेरे सर पर भन्ना रही है। दारु का नशा काम कर रहा है।

मैंने आंखें उठाई। पहुंचेली फिर सामने थी। पलंग पर अधलेटी।

"कहां चली गई थी तुम.."?
ऑरेंज सूट में सज रही पहुंचेली, होठों पर सज रही लिपस्टिक में जानमारु लग रही थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी चुप्पी भी जानमारु है।

वह मुस्कुरा रही है, वह अंगडाईयां ले रही है, वह कटाक्षपूरित आंखों से देख रही है...पर बोल नहीं रही है।  उसका लेटेस्ट मॉडल का फोन, एक नहीं दो-दो, लगातार उसके इनबॉक्स में मेसेज भर रहे हैं। फोन हर तीसरे सेंकेड वाइव्रेट कर जाता है....साइलेंट पर हैं दोनों, फोन भी, फोन की मालकिन भी, पर हमेशा कार्यशील...किसी ना किसी का फोन या मेसेज आ रहा है।

"पहुंचेली तुम इतनी मशहूर क्यों हो, मुझे जलन हो रही है। तुम्हारा वक्त मेरे लिए क्यों नहीं है...??"
"क्या बात कर रहे हो..तुम्ही मेरे मंदिर हो, तुम्ही देवता हो..." पहुंचेली गा रही है या गुनगुना रही है..मुझे पता नहीं चलता। मैं तंन्द्रा में हूं...उसने सिर्फ कोई गीत गाया है या उसका जवाब है।

मैं फ्रस्ट्रेट हो रहा हूं। मैं अब सोचने भी हिंग्लिश में रहा हूं...परसों एक वीओ-वीटी लिखते टाइम 'पलायन' वर्ड लिख दिया था। मेरे कॉपी एडिटर ने ऐसे देखा जैसे मैं टीवी इँडस्ट्री का सबसे चूतियाटिक रिपोर्टर हूं। ....स्साला...भैन....बहरहाल, फ्रेस्टेट के लिए क्या वर्ड हैं, हताश..?? शायद ...अगर हां तो मैं हताश हो रहा हूं।

'पहुंचेली' तिरछी आंखों से मेरी तरफ देखती है। कैमरा मेरे ओवर द सोल्डर से ट्रैक होता हुआ 'पहुंचेली' की आंखों पर एक्सट्रीम क्लोज अप तक ज़ूम होता है। लेकिन मैं इन आंखों के भाव नहीं पढ़ पा रहा। आँखों में भाव तो हैं लेकिन कौन से...मेरा गला सूख रहा है।

गला सूखने का यह क्रम एक महीने से जारी है। एक महीने पहले भी ऐसे ही चार पैग के बाद मेरा गला सूखा था, आज भी पैगों की संख्या और गले सूखने की प्रक्रिया एक-सी है।

कोई आवाज़ आई, मैं चौंका। "सुनो..सुनो ना.."पहुंचेली अनुनय भरे आवाज में बोल रही थी। मुझे सहसा भरोसा नहीं हुआ। मुझसे बोल रही थी..मुझसे। मिल गया आज का फेसबुक अपडेट..।

हां जी कहिए...मैं ने कहा। 'पहुंचेली' अचानक इनसैट में चली गई तस्वीर हो गई। उसका नाम केस सेंसिटिव हो गया, क्लिक करते ही कई लिंक खुलते हैं, एक तो उसकी प्रोफाइल ही..पहुंचेली के बारे में बताने वाले। फिलहाल, छोटी सी तस्वीर के सामने हरी बत्ती जल गई।

पहुंचेली ऑन लाइन आ गई थी, और अनुनय कर रही थी---"सुनो ना।"

पहुंचेली मेरी दोस्त नहीं, फिर ऑनलाइन कैसे दिख गई मुझे...मैंने आंखें मलने की कोशिश की...पहुंचेली दो-तीन बार ऑनलाइन ऑफलाईन दिखी, मैंने जवाब दिया --कहिए । एक बार, दो बार, तीन बार...सात बार..दस बार।

बस्स। अब नहीं। मेरे इस मारु प्रेम का अंत हो ना चाहिए, फौरन से पेश्तर..अदालती भाषा में कहें तो विद इमीडिएट इफैक्ट..मेरा लीगल कॉरेस्पॉन्डेंट यही भाषा बकता है।

करीब 20 मिनट बाद फिर पॉप अप विंडो में मेसेज दिखा, तुम्हारा फोन नंबर बताओ...।

या तो मैं नशे में हूं..या मर गया हूं। जिंदा होता तो इतनी खुशी बर्दाश्त कर पाता क्या..।