Wednesday, August 10, 2011

बेपानी होते समाज की कहानीः बुंदेलखंड का सच

पिछली पोस्ट से आगे...

 पानी की कमी ने बुंदेलखंड के समाज को बेपानी बना दिया है। बादल रुठे, तो केत वीरान हो गए। हर गांव में कई बदोलन बाई हैं, जो भूख से रिरियाती फिर रही हैं, कहीं बच्चों को घास की रोटी खाने पर मजबूर होना पड़ रहा है..यह सब उस देश में जहां पॉपकॉर्न और पित्सा कल्चर पॉपुलर कल्चर के नाम से जाना जा रहा है। क्या हमें शर्मिन्दा होना चाहिए?

हमारे एक ब्लॉगर दोस्त राहुल सिंह ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि क्या बुंदेलखंड में यह समस्या हमेशा से रही है? क्या यह इलाका पहले से खुशहाल रहा है...?

मुमकिन है मेरे पोस्ट से उन्हें एक एक कर जवाब मिलता जाएगा। 
बुंदेलखंड के ज्यादातर लोग खेती करते हैं...तकरीबन 85 फीसदी लोगों के पेट भरने का ज़रिया खेती ही है। लेकिन, पिछले कई साल से बादल रुठ गए..खेत वीरान हो गए। 

सूखा...जिसने किसानों के हलक सुखा दिए। हालांकि, सूखा बुंदेलखंड के लोगों के लिए नई बात नहीं है, नई बात जो है वह है इससे होने वाली तबाही। सूखे ने उत्तर प्रदेश के हिस्से के बुंदेलखंड की आधी से ज्यादा खेती को तबाह कर दिया है। 

गहराते सूखे को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2008 में एक केंद्रीय टीम बनाई। 2008 में आई उसकी रिपोर्ट के मुताबिक, 19वीं और 20वीं शताब्दी के 200 वर्षों में इस इलाके में केवल 12 साल सूखे के थे। यानी इस दौरान  सूखा हर 16 साल में एक बार पड़ता था। लेकिन 1968 से लेकर पिछली सदी के आखिरी दशक में हर पांचवां साल सूखा रहने लगा। 

....और अब तो पिछले दस साल से बुंदेलखंड पानी की बूंद-बूंद को तरस रहा है।

पिछले दशक भर से बारिश की मात्रा साल दर साल कम होती गई है। बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश के सात जिलों की बारिश की मात्रा बताती है कि स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैँ।

साल 2 हजार तीन-चार में औसत सालाना बारिश की मात्रा 987 मिलीमीटर थी, जबकि साल 2 हजार 4-05 में यह 530 मिलीमीटर, 2005-06 में 424 मिलीमीटर, 2006-07 में 330 मिलीमीटर, 2007-08 में 240 मिलीमीटर ही हुई।


सूखे की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बुंदेलखंड के अधिकतर किसान पिछले साल खरीफ फसल की अपनी लागत भी हासिल नहीं कर पाए। खेती चौपट होने के कारण आपदा जैसी स्थितियां तो बननी ही हैं।

..आपदा जैसी इस स्थिति ने बदोलन बाई का परिवार ही उजाड़ दिया। 
बदोलन की भूख से देश को शर्मिन्दा होना चाहिए.


बदोलन बाई का घर किसी भी कोण से झोंपड़ा भी नहीं लगता। तीन तरफ की गिरी हुई दीवारों ने घर को खंडहर कहलाने लायक नहीं छोड़ा है। 

चित्रकूट जिले के पवा गांव की बदोलन के पति भूमिहीन मजदूर थे। कई साल से चल रहे सूखे ने जब 2007 में भयावह रुप अख्तियार किया तो बदोलन के पति को मजदूरी मिलनी भी बंद हो गई। पूरा परिवार भुखमरी की चपेट में आ गया।

..आखिरकार बदोलन के पति को आखिरी बार भूख लगी...। पिता की मौत के बाद बदोन का बड़ा लड़का दिमागी संतुलन खो बैठा, छोटा दिल्ली जाकर रिक्शा चलाने लग गया।

अब गांव में बदोलन अकेली भूख से जूझ रही है। उसके विक्षिप्त हो चुके लड़के को गांववाले दया से कुछ खिला देते हैं। लेकिन, ये सारी स्थिति बयान करते समय विगलित होने का दौर आता है। उम्र में मेरी दादी जैसी बदोलन कभी मेरे तो कभी अभय निगम (कैमरामैन) के पैरों पर गिरी जाती है। 'सब राज-काज चलत दुनिया में, एक हमारे सुधि न ले है कोई...' उसकी शिकायत में भारतीय प्रजातंत्र का पोस्टमॉर्टम हो जाता है।




मेरे मन में एक साथ शर्मिंन्दगी और गुस्से के भाव आते हैं। व्य़वस्था के खिलाफ़ मेरे मन में एक और परत बैठ जाती है।

लेकिन भूख से जूझने वाली बदोलन अकेली नहीं है। चित्रकूट के पाठा इलाके में कई ऐसे घर हैं, जहां के बच्चों को खर-पतवार यानी चौलाई की रोटी खानी पड़ रही है। घर में आटे की कमी है, लेकिन भूखों की पेट का क्या करें...जंगली खर-पतवार को पीसकर आटे में मिलाकर खाने का बंदोबस्त किया जा रहा है। 

तीन-चार घरों में जाता हूं, महिलाएं सिल-बट्टे पर चौलाई कूटती हैं, उसे आटे में मिलाकर रोटियां तैयार करती हैं। दिखने में यह रोटीपालक-परांठे जैसा ही है, लेकिन घास की रोटी मूलतः घास की रोटी होती है। दिखने में चाहे जैसी हो...।


मुझे याद आते हैं दिल्ली के मॉल्स में घूमते वो बच्चे, कैप्री पहने बच्चे, कई सौ रुपये की आइसक्रीम पर हाथ साफ कर जाने वाले, सिनेमा देखने जाएं तो मल्टीप्लेक्स में पॉपकॉर्न के साथ कोक के कॉम्बो ऑफर के लिए सैकड़ों खर्च कर देने वाले, अपनी ही उम्र के न जाने कितने बच्चों की रोटी का हिस्सा खा जा रहे हैं। 



मौज-मजे के लिए पॉपकॉर्न खाने के आदी हो रहे देश में यह घटना दिल दहला देने वाली है।

बेपानी होते समाज की कहानी
यह भूख अकेली नहीं, इसका साथ दे रही है प्यास..।


यूपी-बुंदेलखंड के सात जिलों के कुल 4551 गावों में से करीब 3 सौ में ही साल भर पीने का पानी रहता है, जबकि 74 गांवों में सिर्फ एक महीने पीने का पानी मिलता है।

पानी के संकट का सबसे बडा असर पड़ता है महिलाओं पर। उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी का बड़ा हिस्सा पानी ढोने में गुज़र जाता है। 

पूरे बुंदेलखंड के लगभग 2 लाख 80 हजार कुओं में से अधिकतर बेकार पड़ गए हैं - या तो मरम्मत के अभाव में वे गिर गए हैं या वे सूख गए हैं। 

पानी का संकट पूरे बुंदेल समाज को बेपानी बना रहा है। पूरा समाज पानी के लिए तरस रहा है। लोग गंदा पानी पीने के मजबूर हैं। 

आपने शायद पहले कभी देखा न होगा...कि एक ही गड्ढे से सूअर और इंसान दोनों ही पानी पी रहे हैं। लेकिन सड़क के एक ओर गड्ढे से पानी लेती लड़की को देखता हूं, पानी बेहद गंदा है। उससे भी जुगुप्सापूर्ण बात ये कि लड़की के ठीक पीछे पानी पी रहा सूअर दिखता है। 

सारी मानवीयता भूलकर मैं राजकुमार पर चिल्लाता हूं, शूट कर, शूट कर, विजुअल बना। वह पूरी ईमानदारी से अपना काम करता है। मेरे अंदर का आदमी धीमी मौत मर रहा है उस वक्त। उस वक्त मैं सिर्फ एक रिपोर्टर की तरह देख रहा हूं। 

बोतलबंद पानी के बढ़ते बाजार भारत में मैं अगर अमानवीय रुख अपना रहा हूं, तो यह घटना अमानवीयता से कुछ ज्यादा ही है। 

हम केन नदी तक पहुंचते हैं। कुछ लोग पीने के लिए पानी ढोकर ले जा रहे हैं। पानी बैलगाडियों से ढोई जा रही हैँ। किनारे गंदा पानी है, मछलियां मरी पड़ी है, बगल में बैल भी पानी में घुसे हैं, कुछ लोग नदी की बीच धारा से पानी ले कर आ रहे हैं, कमर भर पानी में घुस कर...इन लोगों को लग रहा है कि शायद नदी की बीच धारा से पानी लाने पर उसकी गुणवत्ता बोतलबंद पानी जैसी हो जाएगी। 

पानी ढो रहगी महिला शिकायत करती है, सारे नल और कुएं सूख चुके हैं। इसी पानी में मुरदे पड़े रहते हैं...लेकिन पानी कहीं और मिलता ही नहीं। पानी के इसी संकट ने कई बार आबरु का व्यापार भी करवाया है। एक बाल्टी पानी रके लिए एक महिला को अपनी इज़्ज़त तक दांव पर लगानी पड़ी। लेकिन वह कहानी अगली कड़ी में।




जारी....

Friday, August 5, 2011

बुंदेलखंड का सच-अंतर्गाथा चौथी किस्त


पिछली पोस्ट से जारी...

देश की प्रतिव्यक्ति आमजदनी से यूपी-बुंदेलखंड की प्रतिव्यक्ति आय तीन गुनी कम है। यह तो सिर्फ आंकड़ा है, जमीनी हकीकत ज्यादा बदतर है

गढा़ गांव से हम निकले तो बारिश ने इलाके की काली चिकनी लसेदार मिट्बुंटी से गठजोड़ कर लिया था। हमारी गाड़ी घुटनों (पहियों ) तक धंस चुकी थी। आसपास के गांववालों ने मदद की। खुद पुष्पेन्द्र भाई भी कपड़े घुटनों तक चढा कर मैदान में कूदे। कार को धकेलते घसीसते हम उसे पक्की सड़क तक ले आए। 


लेकिन इस कसरत में जितना तन थका, उससे ज्यादा मन थका था। वापसी में में सोचता रहा कि आखिर क्या वजह है इस इलाके में बढी हुआ आत्महत्याओं के पीछे। 


बैंक और साहूकारों के कर्जों को इऩ आत्महत्याओं के पीछे मानने की खासी वजहें हैं।

मिसाल के तौर पर, बांदा जिले के खुरहंड गांव के इंद्रपाल तिवारी को अपने बीघे जमीन के लिए ट्रैक्टर की कोई खास जरूरत नहीं थीलेकिन एक ट्रैक्टर एजेंट के दबाव में आकर उन्होंने 2004 में अतर्रा स्थित भारतीय स्टेट बैंक से इसके लिए लाख 88 हजार रुपए कर्ज लिए। फसलों से बीज तक न निकल पाने के कारण उनकी हालत खस्ता थी इसलिए वे उसकी किस्तें नहीं चुका पा रहे थे। 

आखिरकार 2006 में झांसी स्थित मेसर्स सहाय एसोसिएट्स के कुछ लोग तिवारी के पास आए और खुद को बैंक का आदमी बताकर उनका ट्रैक्टर छीन कर ले गए। तिवारी ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से आरटीआई कानून के तहत बैंक से जानकारी मांगी। पता चला, बैंक ने रिकवरी एजेंसी सहाय एसोसिएट्स के जरिए ट्रैक्टर को तिवारी से लेकर लाख 99 हजार रु में नीलाम कर दिया था।
यह तो एक बानगी भर है...ऐसे कई मामले हैं, जिनमें बैंको का मनमाना रवैया सामने आता है।

बुंदेलखंड के ग्रामीण बैंकों की किसानों पर मौजूदा कुल बकाया रकम 4,370 करोड़ रुपये से ज्यादा ही है। यह 2010 के कुल बकाया रकम 3,613 करोड़ रुपये से 21 फीसदी ज्यादा है।

बांदा जिले में मार्च 2011 तक बैंक की रकम वापस करने में नाकाम रहने वाले कर्जदारों में एक लाख से ज्यादा लोग छोटे और सीमांत किसान हैं, और इन पर बैंकों का 453 करोड़ रुपया बकाया है। बांदा जिले में 31 मार्च 2011 तक खेती के काम के लिए दिए गए कुल बकाया कर्ज की रकम 740 करोड़ से ज्यादा थी।

पड़ोसी जिलों जालौन, ललितपुर, झांसी हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट में भी स्थिति इतनी ही बदतर है। जालौन जिले में किसानों पर बैंको का करीब 866 करोड़, झांसी में 776 करोड़, ललितपुर में 645 करोड़, हमीरपुर में 575 करोड़, महोबे में 455 करोड़ और चित्रकूट में 311 करोड़ रुपये बकाया है।

आखिर, बुंदेलखंड की यह हालत कैसे हुई..। लोग बैंको का कर्ज क्यों नहीं चुका पा रहे।

कहते हैं कि प्रतिव्यक्ति आय से इलाके की खुशहाली का पता चलता है। बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले सात जिलों में चित्रकूट जिले में प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 9106 रुपये है। जबकि इन सात जिलों में बांदा में यह 14,117 रुपये, जालौन में 16,711 रुपये, महोबा में 15,744 रुपये, हमीरपुर में 15,984 रुपये, ललितपुर में 14,872 रुपये और झांसी में 21,397 रुपये हैं।

जबकि भारत के प्रतिव्यक्ति आय की बात करें तो जिस दौरान के आँकड़े मैंने दिए हैं, उस दौरान यानी 2009-10 में 46, 533 रुपये था। 2011 के फरवरी में देश की प्रतिव्यक्ति आमदनी 54 हजार रुपये के आसपास है। 

लेकिन प्रतिव्यक्ति आय का यह आंकड़ा भी महज एक झलकी भर है। ज़मीनी हक़ीक़त इन आकड़ों को और भी डरावना बनाते हैं...

Saturday, July 30, 2011

बुंदेलखंड का सच-अंतर्गाथा तीसरा हिस्सा

पिछले पोस्ट से आगे---

सिर्फ प्रह्लाद सिंह जैसे जीवट वाले इंसान ही हैं, जो त्रासदी से निपट रहे हैं। उन्ही के गांव गढ़ा की राजकिशोर ने जीने की हर उम्मीद छोड़ दी है। राजकिशोर के पति ने अपनी खेती को बेहतर बनाने के लिए एजेंटों के झांसे में आकर ट्रैक्टर खरीद तो लिया, लेकिन साल-दर-साल के सूखे ने जिंदगी को भी नीरस बना दिया। तिस पर, ट्रैक्टर नीलामी के लिए हर हफ्ते आने वाले नोटिसों ने जीना हराम कर रखा था।

एक दिन ऐसा हुआ कि राजकिशोर के पति का ट्रैक्टर चोरी हो गया। शाम को वे घर तो लौटे लेकिन देर रात उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। अब राजकिशोर और उनकी युवती होती बेटी के लिए रोजी-रोटी मुहाल है। इज्जतदार किसान की विधवा घर-घर जाकर झाडू-कटकी करती है। लेकिन जिनके घर में वह झाडू-कटकी करती हैं, उनकी भी हालत कोई अच्छी नहीं। राजकिशोर अपनी बेटी के विवाह की चिंता में घुली जाती हैं। हमसे बातें करते समय उनकी आंखों से उनकी मजबूरी बह निकलती है।

हमारे बगल में ही सुरादी बैठे हैं। उनके घर में दो मौते हुई हैं। राज्य सरकार के अधिकारी उनके घर की आत्महत्याओं को गृहकलह का नाम देती है।

सुराजी के घर में अब कोई नहीं। बीवी बहुत पहले भगवान को प्यारी हो गई। एकमात्र पोती को ब्याह कर उऩका बेटा निश्चिंत हो गया था। लेकिन, एक दिन जब बेटे के बेटी दामाद घर आए तो सूखे की वजह से हालात बदतर हो चुके थे। पिछले ही साल की बात है।
बुंदेलखंड में किसानों की मौत का जिम्मेदार कौन है?


....सुराजी की आंखें डबडबा जाती हैं। पिछले ही साल, पोती और उसके पति पहली बार अपने घर आए, घर में सेर भर भी गल्ला नहीं था। इसी संकोच के मारे सुराजी के बेटे ने पास के नीम के पेड़ से फांसी लगा ली। ...सुराजी तर्जनी से सामने नीम का पेड़ दिखाते हैं। पिता की आत्महत्या के अपराधबोध से पोती ने भी जान दे दी। सुराजी के साथ-साथ वहां दालान पर जमा पूरा समुदाय रो पड़ा।

नीम का पेड़ अब भी हरा है, उस पर सुराजी की आहों का कोई असर नहीं..।

हमारी पूरी टीम स्तब्ध होकर देखती रहती है। बाहर दालान में हम बैठे हैं। बारिश हो रही है। पुष्पेन्द्र भाई के कहने पर गांववाले हमारे लिए रोटी और करेले की सब्जी लेकर आते हैं। घर पर में खाने के मामले में बहुत नकचढा माना जाता हूं...आजतक कभी करेला खाया नहीं।

पहली बार जिंदगी में खाने की अहमियत सामने दिखती है। (पढा और सुना बहुत था) मां की हिदायत को पोटली याद आ जाती है। मां आज भी कहती है, बेटा, अन्न अन्नपूर्णा है। इसे बेकार न जाने दो।

पता नहीं क्यों मैं रुआँसा हो उठता हूं। सामने प्रह्लाद सिंह है, राजकिशोर हैं...सुराजी हैं। निवाला अंदर नहीं जा रहा..पहली बार करेला कड़वा नहीं लग रहा। मैं खाना खत्म करता हूं। आशुतोष शुक्ला भी संजीदा हैं..।

खाने की थाली समेटने आती है सोनू। पुष्पेन्द्र भाई बताते हैं, इसने भी जान देने की कोशिश की थी। वजहः सोनू के पिता रामकिशोर बैंक के कर्जदार हैं। बड़ी बहन की शादी में दो-तीन लाख और चढ़ गए। 8वीं में पढ़ने वाली सोनू ने सोचा अगर वही न रहे, तो पिता को शादी की चिंता भी न करनी होगी, और न ही कर्ज लेना पड़ेगा।

कर्ज के बोझ और उसके बाद आत्महत्या से बचाने के लिए एक रात सोनू डाई ( बाल रंगने वाले रसायन) को पीकर सो गई। वक्त रहते ही उसका उपचार शुरु कर दिया गया और सोनू बचा ली गई।
सोनू के पिता घटना बयान करते-करते अचानक चुप होकर शून्य में निहारने लगते हैं।

सोनू भी हमसे बात करने सो थोडा़ कतराती है। आशुतोष पूछते हैं, मरने की कोशिश कर क्या साबित करना चाहती थी, वह मासूमियत से बताती है, जब हमहीं ना रहेगें तो पापा को कर्ज नहीं लेना पडेगा ना। आशुतोष के पास जवाब नहीं है, मैं कैमरामैन राजकुमार को कुछ प्रोफाइल और क्लोज-अप शॉट्स लेने के निर्देश देने में खुद को व्यस्त कर लेता हूं।

आखिर उम्र से पहले बड़ी हो गई, इस लड़की से क्या पूछूं...क्या टीवी माध्यम का सबसे बदनाम सवाल....? मरते वक्त कैसा लग रहा था?

मेरे अंदर का शख्स मुझसे पूछ रहा था, इस व्यवस्था के खिलाफ कोई हथियार क्यों न उठा ले, मेरे अँदर का पत्रकार इस बात का पूरा समर्थन कर रहा था। दोपहर बाद हमें वहां से निकलना था, कैमरामेन कुछ शॉट्स लेने में व्यस्त हो गया।

मैं और आशुतोष सिगरेट पीने के बहाने एक कच्ची दुकान में रुक गए। उसने आदर से बिठाया, सिगरेट दी और कहने लगा कि अब तो आप लोगों के ही हाथ ही है सब..।

गढा गांव नाउम्मीदी की जीती-जागती मिसाल बन गया है। हम केन को फिर से पार कर उस जगह आ गए। रास्ते फिसलन भरे हो गए थे।मैं फिर सोचने लगा था, क्या जीने के रास्ते सच में इतने ही फिसलन भरे हो जाते हैं...??

....जारी

Tuesday, July 26, 2011

बुंदेलखंड का सच 2- 519 आत्महत्याओं का इलाका


 बुंदेलखंड-यूपी के सात जिलों में पिछले 5 महीनों, यानी जनवरी 2011 से 31 मई तक 519 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। राज्य सरकार इन आत्महत्याओं का गृहकलह जैसी वजहों से जोड़ती है। सवाल ये है कि गृहकलह तो अंबानी भाईय़ों के बीच भी हुआ था, और हजार-लाख रुपयों के लिए नहीं, कई हजार-लाख करोड़ रुपयों के लिए हुआ था। उनने आत्महत्या क्यों नहीं की, तनाव पवा गांव की रामकली को ही क्यों..कोकिलाबेन को क्यों नहीं..?

सुबह जब हम बांदा के पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस से निकले तो मेरे मन में कहीं भी यह बात नहीं थी कि आज का दिन मेरी जिंदगी, खासकर पत्रकारीय अनुभवों को एकदम से बदल देगा। हमारे पास छोटी कार थी। हमलोग, यानी मैं, कैमरामैन राजकुमार रॉकी, साथी रिपोर्टर आशुतोष शुक्ला, ड्राइवर राकेश और साथ में थे भाई पुष्पेन्द्र। 


दिल्ली से जाने वाले पत्रकारों के लिए भाई पुष्पेन्द्र मार्गदर्शक का काम करते है। स्वाति माथुर, टाइम्स ऑफ इंडिया वाली रिपोर्टर, जिनकी रिपोर्ट पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था, वो भी पुष्पेन्द्र भाई की मदद से ही रिपोर्ट लिख पाई थीं।


बहरहाल, हम बांदा जिला के आखिरी छोर पर पहुंच गए। केन नदी के किनारे। जिसके दूसरी तरफ था हमीरपुर जिला। केन नदी दोनों जिलों का बांटती तो है लेकिन वह नहीं बांट पाई है तो दोनों तरफ भूख की तस्वीर को, लोगों की तकदीर को और आत्महत्याओं के सिलसिले को। 

केन पार करने के लिए हमारी पूरी टीम को पैंट उतारनी पड़ी। पुष्पेन्द्र भाई मजाक में बोले कि वह हर पत्रकार की पैंट बुंदेलखंड दर्शन से पहले उतरवा लेते हैं। हम हंसे। लेकिन हमारी यह हंसी थोड़ी ही देर में काफूर हो गई। जब हम गढ़ा गांव में दाखिल हुए। गढ़ा गांव,  किसी भी आम हिंदुस्तानी गांव की तरह ही है...घरौंदों की तरह कच्चे-पक्के मिट्टी के घर, और आटा-चक्की से आती एक जानी-पहचानी आवाज..लेकिन इस गांव में आज की तारीख में कहीं उम्मीद की झलक तक नहीं दिखती।

उम्मीद...जिसके सहारे जिंदगी आगे बढ़ती है। शायद इसी उम्मीद ने जिंदा रखा था, गढा गांव के प्रह्लाद सिंह को। बड़ी-बड़ी शानदार मूंछों वाले प्रह्लाद सिंह ने अपनी जवानी में किसी का क़त्ल कर दिया था। कत्ल के जुर्म में 1962 में सज़ा-ए-मौत मिली। लेकिन, प्रह्लाद सिंह ने अपनी जिंदगी की उम्मीद नहीं छोड़ी थी उन्होंने राष्ट्रपति से जीवनदान की गुहार लगाई। उनकी सज़ा आजीवन कारावास में बदल गई। 

सन बहत्तर में उनकी नेकचलनी से उन्हें वक्त से पहले रिहा कर दिया गया। गांव लौटे तो नई उम्मीद के साथ जिंदगी फिर शुरु की। 

अभी एक दशक पहले तक उनके साथ कोई समस्या नहीं थी। लेकिन परिवार बड़ा हुआ तो प्रह्लाद सिंह और उनके भाई ने मिलकर ट्रैक्टर के लिए बैंक से कर्ज ले लिया...और इसी कर्ज ने उनके परिवार को बरबाद कर दिया।

पिछले साल बुंदलेखंड-यूपी में हुई सिर्फ 120 मिमी बारिश

2002 के बाद बुंदेलखंड लगातार सूखे की गिरफ्त में आता गया। पहले से ही कम बारिश वाला इलाका धीरे-धीरे अकाल की चपेट में आता गया। साल 2007 में बैंक ने भाड़े के गुंडों से प्रह्लाद सिंह के ट्रैक्टर को कब्जे में ले लिया...ट्रैक्टर नीलामी के बाद बाकी की रकम की देनदारी की आखिरी नोटिस भी निकाल दी गई। पहले तो परेशान भाई ने फिर बेटे, बच्ची सिंह ने आत्महत्या कर ली। पोती मनोरमा भी ब्याह के खर्च से बेचारे दादा को बचाने की खातिर एक दिन डाई पीकर हमेशा के लिए सो गई। 


दिवंगत बेटे और पोती की तस्वीर दिखाते प्रह्लाद सिंह कहते हैं कि उन्होंने ऐसे बुढापे के लिए क्षमादान नहीं मांगा था राष्ट्रपति से। उनके घर में उनके एक पोते का विवाहोत्सव है, लेकिन खुशियों की बूंद तक नहीं दिखती। 

हमें देखते ही गांव के कई लोगों को लगता है कि हम उनकी रिपोर्ट दिखाएंगे तो शायद उनका कर्ज माफ हो जाएगा। बुंदलेखंड का एक खुद्दार किसान,  कर्ज चुकाना तो चाहता है लेकिन प्रह्लाद सिंह की मजबूरी है कि जिस खेती पर उन्होंने अपनी जिंदगी गुजार दी वह खेती आज उनके बीज तक वापस नहीं कर पा रही। 

2002 से 2011 दस साल हो गए, उनकी खेती उन्हें दाने-दाने को मोहताज बना दे रही है। 

सात जिले, 5 महीने, 519 किसान आत्महत्याएं




प्रह्लाद सिंह की यह कहानी पूरे बुंदेलखंड की 2 करोड़ 10 लाख की आबादी की कहानी से कमोबेश मिलती-जुलती है। प्रह्लाद सिंह की ही तरह बाकी के लोगों की उम्मीदों की डोर टूटने लगी है। कर्ज एक तरह से गांव के लोगों के लिए जीने की शर्त बन गए हैं।..लेकिन ये शर्त जानलेवा है।



बुंदेलखंड के 13 में से सात जिले उत्तर प्रदेश में हैं...और उनमें सबसे ज्यादा बदहाली है बांदा में..। इस साल जनवरी से लेकर मई तक सिर्फ बांदा जिला अस्पताल में ही आत्महत्या के करीब 330 मामले दर्ज हैं। 


हालांकि, यह सिर्फ दर्ज हुए मामले ही हैं। असली तस्वीर ज्यादा भयानक हो सकती है। इस साल के पहले पांच महीने में ही बुंदेलखंड के सात जिलों में 519 मौतों की  खबर है। 
 

पिछले पांच महीने बुंदेलखंड के लोगों के लिए अच्छे नहीं रहे। 519 लोगों की आत्महत्याओं की खबर खतरे की एक घंटी है। साल 2009 में बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले हिस्से में सात जिलों, यानी महोबा, चित्रकूट, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा, झांसी और जालौन में कुल 568 मौते दर्ज की गई थीं। साल 2010 में आत्महत्याओं का आंकड़ा 583 था। जबकि, साल 2001 से 2005 के बीच 1275 आत्महत्याओं के मामले सामने आए थे। 




ध्यान देने वाली बात यह है कि इन 1275 आत्महत्याओं में साल 2002 और 2004 का वह दौर भी शामिल है, जो सूखे के सबसे भयावह साल थे। यानी आत्महत्याओं का सूखे से संबंध तो है, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं।  

आल्हा-ऊदल की धरती, जंग में हमेशा सीना तानकर लड़ने वाले जुझारु वीरों की धरती के लोग सिर्फ सूखे से ही मौत की राह चलने को मजबूर नहीं हुए हैं।

कुछ तो ऐसा है जिसने इस इलाके में आत्महत्या की सामूहिक प्रवृत्ति को बढावा दिया है। 

....जारी

Sunday, July 24, 2011

बुंदेलखंड का सच-अंतर्गाथा

पिछले दिनों मेरी एक रिपोर्ट आई थी। बुंदेलखंड पर। एक बार जब रिपोर्ट दिखा चुका, तो दोबारा लिखने की जरुरत क्या है..। सच तो ये है कि टीवी पर हमने जिताना दिखाया, उससे कहीं ज्यादा दिलो-दिमाग पर छप गया। टीवी की अपनी मजबूरियां हैं। जितने विजुअल्स हैं, उतना ही कह सकते हैं।

बहुत पहले एक मुहावरा सिखाया गया था- एक तस्वीर हजार शब्दों से भी ज्यादा बयां करती है। लेकिन बावजूद इस मुहावरे के, यह भी सच है कि तस्वीरों की अपनी एक सीमा होती है।

जितना आपने कैमरे में क़ैद किया, जिस वक्त कैद किया...उसके अलावा उसके आगे-पीछे का सच मामूली होकर रह जाता है। बहरहाल, कहने को बहुत कुछ है..।

18 जून को बॉस ने कहा कि एक रिपोर्ट बनाओ, चाहो तो दो एपिसोड बनाना। बॉस को मामले की गंभीरता का ज्यादा आइडिया था नहीं...कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है मामले का। आगे देख लो..। कमरे से निकलता ही कि रोककर कहा, सुना है बारिश नहीं होती उधर..खेतों मे दरारे पड़ी हैं। उसके शॉट जरुर ले आना।

एक पत्रकार की हैसियत से मेरी हसरत थी कि कुछ ऐसी रिपोर्टिंग करूं..जो ज़मीनी हो। कुछ ऐसी कसमसाहट थी अंदरखाने कि, लोगों से जुड़े मुद्दे उठा सकूं।

19 जून को मैं लखनऊ के लिए निकला। वहां से मुझे आशुतोष शुक्ला को साथ लेना था। वहां, शुक्ला जी मेरे ही होटल के कमरे में आकर जम गए। तत्वसेवन के लिए। बाद में, रिपोर्ट के बाद उन्होंने मुझे कितने मानसिक कष्ट दिए, इसका जिक्र बाद में।

20 की सुबह, गाड़ी मिलने में काफी जद्दोज़हद के बाद मैं टीम के साथ बांदा के लिए रवाना हुआ। मेरी कैमरा टीम इलाहाबाद से आकर मेरे साथ हो चुकी थी। लखनऊ से निकलते-निकलते मॉनसून की ऐसी झड़ी लगी कि लगा आज ही बरस लेंगे बदरा...सारी जमा पानी आज ही उड़ेल कर मानेंगे।

कानपुर पार कर गए, बारिश ने फिर भी पीछा नहीं छोड़ा।

सारे रास्ते दिमाग में यही चलता रहा कि आखिर कहां से शुरु करुं और किस चीज से शुरु करूं। शाम होते-होते बांदा पहुंच गया। सुमन मिश्रा (हमारे स्थानीय संवाददाता) ने हमारा स्वागत किया।

सुमन मिश्रा को मंदिरों मे दर्शन का बडा़ शौक है। वह अड़ गए की भारी-भरकम नाश्ते के बाद वह हमें पहाड़ी पर बनी काली माई का मंदिर दिखाकर ही मानेंगे।

हम तो ठहरे नास्तिक, उधर शुक्ला जी भी मय के आगे भगवान को भी कुछ नहीं गिनते...ड्राइवर भी थका हुआ था, कैमरा मैन भी कन्यामित्र से बातचीत में व्यस्त...उधर मिश्रा जी हमें आस्तिक बनाए जाने पर उतारु थे।

बहरहाल, हमने ही मना किया। मंदिर से पीछी तो छूट गया..रात में खाकर सोए...दिमाग में इस योजना के साथ कि कल करना क्या है।

सुमन मिश्रा के यहां ही पुष्पेन्द्र भाई से मुलाकात हो गई। वैसे कुमार आलोक ने भी उनका नंबर हमें दे दिया था। पुष्पेन्द्र भाई के बारे में विस्तार से फिर कभी..। लेकिन पहले ही दिन शूट पर जाने का उनका दिया वक्त हमारी पकड़ से छूट गया। सात बजे उनसे मिलना था और देर रात सोई टीम में से कोई भी, ( मैं तो शाश्वत कुंभकर्ण हूं) आठ बजे से पहले जाग नहीं पाया।

...और जब जागे तो देखा, आसमान में काले-काले बादल छाए हैं। बांदा में दुर्ळभ बारिश होने वाली थी। कैमरामैन बोला, काम कैसे होगा..। हमने कहा धीरज धरो..।


...जारी

Tuesday, June 7, 2011

कविता- दांत दर्द के नाम

मैं अपने आप को जब आईने में देखता हूं,
चेहरे पर एक दर्द की गहरी छाया नजर आती है,
हंसता हूं,
तो एक फूल (अंग्रेजीवाला) बन जाता हूं,
पलभर में,
मेरे आगे,मेरे पीछे
मेरी हालत पर, सब लोग हंसते हैं
मुझे मौसम पुराने याद आते हैं,
कहते हैं अगर ये बत्तीसवें दांत जिन्हे न हो,
दुनियावी मामलो में कहे जाते
बच्चे हैं
अगर समझदारी यूं दर्दनाक मंजर होके आती है,
कसम से,
नासमझ अच्छे हैं।
न खाया जाए, भले से
न दर्शन ठंडे-गरम का,
ये सब दर्शन-फलसफास
जीवन में भरम का,
कहीं दांतों से किसी को अक्ल आती है?
अगर दांतों से आती है,

कहूं में आपसे कि--
दाढ अक्ल की नहीं ये,
शैतान की खाला है,
जो अचानक कच्चे ही फूटा है,
मेरे सीने का छाला है।

ये ऐसी टीस है,
हर वक्त तेरे होने का अहसास होता है,
तू जब भी याद आता है,
मेरे दिल कस के रोता है,
तू ईश्वर है या माशूका,
उससे क्या होता है,
अकल की दाढ
उगती है तो
हरेक शख्स रोता है।।

Saturday, May 14, 2011

मां, माटी मानुष से आगे क्या?

बंगाल में बदलाव की बयार नही, अंधड़ आ गया। मेरे अनुमानों से कहीं ज्यादा घना बदलाव था यह। ममता की आंधी में खुद मुख्यमंत्री उड़ गए।  वह भी साढे 17हजार से ज्यादा वोटों से। लेकिन यहां कहानी खत्म नहीं होती। चुनौतियों की तो यहां से शुरुआत होती है। ममता बनर्जी ने जो दावे और  वायदे किए है बंगाल की जनता के साथ...उन्हें निभाना होगा।

पहले उत्तर से शुरु करते हैं। पहली बार चुनाव में उतरी, लेकिन सौ फीसदी परिणाम पाने वाली पार्टी, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का आत्मविश्वास सबसे ज्यादा उबाल खा रहा होगा। दीदी कही जाने वाली, अबतक सबसे बेचैन दिखने वाली नेताओं में से एक ममता माटी  और मानुष  से जुड़े इस साव पर क्या करेंगी। ममता ने पहले ही साफ कर दिया है कि गोरखालैंड अलग करने के मसले पर वह कोई बात नहीं करने वाली हैं। तो गोरखा जनमुक्ति मोर्चा आगे क्या करेगा..यह देखने वाली बात होगी।

हालांकि जीजेएम ने पहाड़ की तीन और दुआर की एक सीट पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे (और सभी जीते) लेकिन बाकी  की जगहों पर उसने तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन को समर्थन किया था। ममता ने अगले 200 दिनों के अजेंडे में दार्जिलिंग को स्विट्ज़रलैंड बनाने का वायदा किया है...फिलहाल तो स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। दार्जिलिंग में सबसे खराब स्थिति सड़कों की है। पर्यटकों का आना बेहद कम हो चुका है। न्यूजलपाईगुड़ी से बेहतर स्थिति तो हमारे झारखंड मे मधुपुर-गिरिडीह रोड की है। (जो अपने आप में घटिया सड़कों के मामले में एक मिसाल है।)

ममता ने मुर्शिदाबाद-बहरामपुर इलाके में अधिरंजन चौधुरी के किले में सेंध लगा दी है। अगली बार, यानी अगले लोकसभा चुनाव में वह इन इलाकों में सीटों की मांग करेंगी..अधीर चौधरी इसी के विरोध में बागी उम्मीदवारो को सपोर्ट कर रहे थे, लेकिन फौरी तौर पर तो यही लगता है कि वह नाकाम रहे हैं। लेकिन आने वाले वक्त में वह अगर इसी तरह उपेक्षित होते रहे तो कांग्रेस के अगले ममता बनर्जी साबित होगे।

दक्षिण में सुंदरबन इलाके में सात में से पांच सीटें तृणमूल ने जीती हैं। मुझे इसका कत्तई इल्म नहीं था कि कांति गांगुली जैसा जमीन से जुडा़ नेता भी हार सकता है। लेकिन जनता का फैसला। वैसे अब सबसे पहले तो ममता को इस इलाके में आईला तूफान की वजह से बरबाद हुए गांवों तक मुआवजा पहुंचाना होगा। क्योंकि इसी तूफान के सहारे वह जीत का परचम लहरा पाई हैं।

ममता बनर्जी ने वाम ( यानी व्यवस्था विरोधी) शासन के सामने खुद वामपंथी राह पकड़ी। वह वाम की  भी वाम साबित हुई। लेकिन जिस नंदीग्राम और सिंगूर के दम पर ममता ने जीत हासिल की है। वह उनके सामने भी सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ा होगा।

अगर ममता की मंशा सूबे का विकास होगा, तो उन्हें औद्योगीकरण की राह पर चलना होगा। लेकिन अगर वह उद्योगों और निवेश का आना राज्य में ठीक करना चाहती हैं तो यह बहुत मुश्किल साबित होनेवाला है। पहली बाधा तो खुद उनकी उद्योग-भगाऊ छवि है। दूसरे, उद्योग लगाने के लिए उन्हे भी जमीनों का अधिग्रहण करना होगा...फिर वाममोर्चा अपनी पारंपरिक राजनीति अपनाएगा।
यानी जिस राजनीति का हाइजैक ममता ने वाम से कर लिया था वह उनको वापस मिल जाएगा। फिर हर अधिग्रहण के मोर्चे पर वाम कई नंदीग्राम और कई सिंगूर बनाएगा।

लब्बोलुआब यह कि ममता के लिए राह उतनी आसान नहीं। रेलवे के पिछले  दो साल के कामकाज से मुझे तो ममता से कोई उम्मीद नहीं । वैसे,, खुद माओवादियों से हाथ मिलाकर ममता ने राज्य सरकार के लिए शांति के कुछ महीने  तो सुरक्षित कर लिए हैं, लेकिन माओवादी चरमपंथी निश्चित रुप से केंद्र के लिए खतरनाक साबित होंगे। ममता उनके लिए बंगाल को पनाहगाह बनाएगी तो झारखंड और छत्तीसगढ़ को नुकसान होगा।

बीती वामपंथी सरकार ने ममता के लिए कई मोर्चे खुले छोड़ दिए हैं..उनसब पर काम करना इस क्रांतिकारी तैवरों वाली इस नेता के लिए आसान नहीं होगा। अभी तो उनकी पहली चिंता रेलमंत्री पर अपने किसी सिपहसालार को बिठाने की होगी।