Friday, September 20, 2019

नदीसूत्रः गोमती अवध की एक नदी के वध की कथा है

गोमती नदी को सजाने के लिए लखनऊ में रिवर फ्रंट बनाया गया, पर अभी भी 36 गंदे नाले गिरते हैं. गोमती के पानी में आर्सेनिक के साथ भारी धातुओं की मात्रा भी पाई गई है. शिवपुराण में गोमती को शिव की पुत्री बताया गया है, पर हम धर्मभीरू भारतीय अवध की इस जीवनरेखा का वध कर रहे हैं

हम तो अब तक यही मानते हैं कि भारतवर्ष में जिस इलाके को कुदरत से जो मिला है, वह ईश्वर का वरदान ही है. पर शिव पुराण में एक नदी को ईश्वर ने खुद आदेश दिया कि वह मां बन कर जनता का लालन-पालन करे. इस पुराण में भगवान शिव स्वयं नर्मदा और गोमती को अपनी पुत्रियां स्वीकार करते हैं. आज की बात उन्हीं में से एक गोमती की. वही गोमती, जिसे ऋग्वेद के अष्टम और दशम मण्डल में सदानीरा बताया गया है. गोमती अवध को मिला ईश्वर का वरदान ही है. पर हमें अब ऐसे वरदानों की परवाह ही कहां है!

असल में, नदियां महज पानी को ढोने वाला रास्ता नहीं होती. इनके किनारे, पूरा इतिहास, पूरी विरासत और एक तहजीब का किस्सा होता है.

गोमती नदी तो साक्षी रही होगी कि कैसे भगवान राम के छोटे भाई ने अपनी नगरी इसके किनारों पर बसाई होगी. गोमती ने देखा होगा कि कैसे लव और कुश ने अपनी मां को जंगल में छोड़ देने के अपने पिता के फैसले का विरोध किया होगा. अगर पौराणिक कहानियों में आपकी आस्था है, तो आपको यह भी पता होगा कि गोमती के किनारे भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम या हलधर ने अपने अपराध का प्रायश्चित किया था. भगवान बुद्ध ने इसके तटों पर विश्राम किया होगा, धम्म के उपदेश दिए होंगे. चीनी यात्री ह्वेनसांग इसके किनारों से होकर गुजरा होगा.

कैसे पृथ्वीराज चौहान के शत्रु बने राजा जयचंद ने मशहूर योद्धा बंधुओं आल्हा- ऊदल को पासी और भारशिवों का दमन करने के लिए यहां भेजा था. मुगल बादशाह अकबर ने यहीं पर तो वाजपेय यज्ञ कराने के लिए एक लाख रुपये ब्राह्मणों को दिये थे और तब गोमती का तट वैदिक ऋचाओं से गूंजा होगा. तुलसी की प्रिय नदी यही धेनुमती तो थी.

यही धेनुमती आज गोमती है, जिसका पानी शोधन के बाद भी इस्तेमाल के लायक नहीं बचा.

इस नदी का यह हाल नालों का पानी बिना ट्रीटमेंट के सीधे नदी में गिराने से हुआ है. नतीजतन, गोमती नदी में पेट की बीमारियों के लिए जिम्मेदार कॉलीफोर्म बैक्टीरिया ट्रीटमेंट को लिए जाने वाले पानी के मानक से 34 गुना अधिक है.

गोमती नदी उत्तर प्रदेश की सबसे अधिक प्रदूषित नदी बन चुकी है. उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के आंकड़े देखें तो इस पूरे साल यानी 2019 के सभी महीनों में हालात खराब ही मिले है.

जनवरी से जुलाई तक के आंकड़ों के मुताबिक केवल कॉलीफोर्म ही नहीं पानी में जलीय जीवन बनाए रखने के लिए जरूरी घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा भी न्यूनतम हो गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जलीय जीवन ही नदी के पानी के शुद्ध और प्रदूषणमुक्त होने का संकेत होता है. पानी में ऑक्सीजन नहीं होगी तो जलीय जीवन बच नहीं पाएगा.

इतना ही नहीं, अंग्रेजी के अखबार न्यू इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक, पर्यावरण वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की है कि गोमती नदी में भारी धातुओं की काफी मात्रा मौजूद है. इस साल पहली बार लखनऊ में गोमती नदी के पानी में आर्सेनिक की मात्रा भी मिली है और जाहिर है नदी संरक्षण की तमाम पहलों को इससे धक्का पहुंचा है.

यूपीपीसीबी के मुताबिक, पिछले कई बरसों के दौरान गोमती नदी की धारा में 35 से 40 फीसदी तक की कमी आई है. अखबार में छपी रिपोर्ट कहती है कि गोमती नदी की धारा में लेड, कैडमियम और तांबे जैसे धातुओं की मात्रा की मौजूदगी है जो काफी खतरनाक है. इन धातुओं की मौजूदगी की मात्रा सतही जल के मुकाबले नदी की तली में कई गुना अधिक है.

इनमें भी तांबे की मात्रा कैडमियम, आर्सेनिक और लेड के मुकाबले काफी अधिक है. वैज्ञानिकों का कहना है कि कैडमियम, क्रोमियम, कोबाल्ट, मर्करी, मैंगनीज, निकल, लेड, टिन और जिंक जैसे धातु अगर 5 से अधिक के घनत्व में मौजूद हों तो काफी कम मात्रा में होने पर भी पर्यावरण के लिए काफी घातक होते हैं.

पेयजल के जरिए भोजन श्रृंखला में प्रविष्ट होने वाला आर्सेनिक कैंसर और त्वचा रोग पैदा करता है जबकि कैडमियम लीवर और किडनी को क्षतिग्रस्त कर देता है.

असल में, सिर्फ नवाबों के शहर लखनऊ में ही 36 गंदे नाले गोमती में गिरते हैं. शहर के आसपास के चीनी मिल से निकले अपशिष्ट भी इसी नदी में प्रवाहित होते हैं और जाहिर है इस नदी को काफी गंदा और प्रदूषित कर देते हैं.

गोमती नदी में घुले हुए ऑक्सीजन की मात्रा 1 मिग्रा/लीटर या कहीं-कहीं तो शून्य है. जबकि सामान्य जलीय जीवन के लिए इसे 4 मिग्रा/लीटर होना चाहिए.

गोमती को तो अवध को सींचने का काम दिया गया था, पर इसके जन्मस्थान पीलीभीत में ही इसका वध होने लगता है. गोमती किसी ग्लेशियर का पानी लेकर नहीं चलती, यह भूजल की वजह से बनती है और उसी से रिचार्ज होकर नदी बन जाती है. पर, पीलीभीत में ही इसके उद्गम पर अवैध कब्जों ने इसकी सांसे रोकनी शुरू कर दी हैं.

गोमती की सहायक नदियों का इससे भी बुरा हाल है. बंडा-खुटार रोड पर झुकनिया नदी जलकुंभी, प्लास्टिक की थैलियों और गंदगी से भरी हुई है. जबकि बंडा-पुवायां रोड पर भैंसी नदी पूरी तरह सूख चुकी है.

गमती के बेसिन में साठा धान यानी गरमियों में लगाई जाने वाली धान के लिए जरूरी पानी नदी से ही उलीचा जाता है. नदी को जीवन देने वाले भूजल के स्रोत सूखते जा रहे हैं. नदी का आंचल खाली करके और उसके मौजूदा बहाव में अपनी गंदा जल गिराकर हम उसका वध कर रहे हैं.

हां, उत्तर प्रदेश में सरकारों ने लखनऊ शहर में इस मरती हुई नदी को रिवर फ्रंट के जरिए सुंदर बनाने का काम किया. खूबसूरत घाट बनाकर रंग-रोगन भी किया गया है. कुछ ऐसे ही जैसे हमारे बिहार में एक कहावत हैः ऊपर से फिट-फाट, नीचे से मोकामा घाट. हमें यह जानने की जरूरत है कि गोमती अब अपनी आखरी सांसे गिनने लगी है. गोमती बहे ही नहीं तो काहे की नदी? नदी के घाट ही नदी नहीं होते. उसको सुंदर बनाने की बजाए साफ बनाया जाना जरूरी है. हम अब भी नहीं चेते, तो अवध की इस नदी के वध के भागीदार होंगे.पनी देवी की हत्या पर उतारू हैं.

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Friday, September 13, 2019

हैप्पी हिंदी डे ड्यूड

ऐतिहासिक रूप से हिंदी के साथ कई समस्याएं हैं और मौजूदा दौर में यह समस्याएं अधिक गहरी हो गई है. पहली समस्या इसके दिवस का मनाया जाना है. अंग्रेजी भाषा का भी कोई दिवस है इस बारे में मुझे ज्ञात नहीं है. अगर हो, तो समझदार लोग ज्ञानवर्धन करें. कुछ वैसे ही जैसे महिलाओं की सशक्तिकरण के लिए दिवस तो मनाया जाता है पर संभवतया कोई मर्द दिवस नहीं है. अस्तु.

हिंदी के साथ दूसरी समस्या यह है कि हिंदी में सामान्य पाठक वर्ग का घनघोर अभाव है. हिंदी में पढ़ते वही हैं जो लिखते हैं यानी लेखक हैं. यानी कि साहित्य या राहित्य, जो भी मुमकिन हो लिख डालते हैं.

हिंदी क्षेत्र का सामान्य छात्र हिंदी में लिखे को पढ़ना प्रायः अपमानजनक, अति अपमानजनक या घोर अपमानजनक मानता है. इसको आप पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण की तरह अधिक इंटेंस मानते चलें. वह अंग्रेजी में चेतन भगत पढ़ लेगा पर हिंदी में अज्ञेय, जैनेंद्र या ऐसे ही किसी दूसरे लेखक का नाम सुनकर हंस देगा. हाल में मीडिया के छौनों (समझें, छात्रों) के साथ बातचीत का मौका मिला. उनको हिंदी लिखने का मतलब शुद्ध हिंदी बताया गया था. हिंदी की शुद्ध हिंदी वाली छवि क्या है? संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्द लिखा जाना? क्या वाकई हिंदी में वैसा लिखा गया है या लिखा जाता है? मुझे लगता है एतद् द्वारा वाली हिंदी अब सरकारी विज्ञप्तियों के अलावा कहीं बची नहीं है.

बचे हिंदी के लेखक. उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूल में पढते हैं (गलत नहीं है अंग्रेजी पढ़ना) अंग्रेजी बोलते हैं (यह भी गलत नहीं) अंग्रेजी से मुहब्बत करते हैं (किसी भी भाषा से मुहब्बत करें गलत नहीं है) पर अपने ही हिंदी में लिखने वाले पिता के लेखन को कुछ तुच्छ-सा, घटिया-या, दोयम दर्जे का या अत्यधिक शास्त्रीय समझते हैं

इतनी देर में आप समझ गए होंगे कि हिंदी से मेरा मतलब महज हिंदी व्याकरण या कविता संग्रह या अभिव्यक्ति की आजादी को सातवें आसमान तक ले जाने वाले उपन्यास नहीं है. मेरा तात्पर्य हिंदी में लिखे कुछ भी से है. विज्ञान भी, और इतिहास भी. पर सामान्य जन का मन हिंदी में लगे भी कैसे? हिंदी में लिखने का मतलब सीधे-सीधे साहित्य वह भी दुरूह भाषा से लगा लिया जाता है.

जो हिंदी में लिखता है वह क्या सिर्फ कविता लिखेगा, या कहानी? या उपन्यास? यह मानिए कि हिंदी में स्तरीय नॉन-फिक्शन खासकर इतिहास, भूगोल, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, राजनीति पर लेखन कम होता है. जो होता है उसकी कीमत औसत हिंदी पाठक की जेब से बाहर की होती है. बात रही स्तरीय अनुवाद की. हिंदी में स्तरीय अनुवाद करने वाले लोग मुट्ठी भर हैं. जो करते हैं प्रकाशक उनको भुगतान करना नहीं चाहते. अनुवादक को न तो पर्याप्त सम्मान मिलता है और न पैसा. प्रकाशक सस्ते में अनुवाद कराने के चक्कर में पूरी कृति का तिया-पांचा हो जाने देते हैं.

एक अन्य बात हिंदी पट्टी के अधिकतर लोगों की मुफ्तखोरी की मानसिकता की भी है. हिंदी वाले जो लोग पढ़ना चाहते हैं, वह खरीदना नहीं चाहते. वह चाहते हैं गणतंत्र दिवस परेड या प्रगति मैदान के ट्रेड फेयर के पास की तरह किताब भी उनको मुफ्त में मिल जाए. वह एहसान जताएं, देखो मैंने तुम्हारी किताब पढ़ी.

एक अन्य बड़ी समस्या भाषा की है. हिंदी के ज्यादातर लेखक ऐसी भाषा लिखते हैं (मेरा मतलब दुरूह से ही है) कि सामान्य पाठक सर पकड़कर बैठ जाता है. (ऐसी समस्या अंग्रेजी में नहीं है) हिंदी के विरोधी ज्यादा हैं इसलिए हिंदी में सरल लिखने का आग्रह टीवी और डिजिटल माध्यम में अधिक रहता है. यह आग्रह कई बार दुराग्रह तक चला जाता है.

देश में 3 फीसदी अंग्रेजी बोलनेवाले लोगों के लिए चल रही अंग्रेजी मीडिया में मीडियाकर्मियों की तनख्वाह हिंदी वालों से कर लें तो उड़ने वाले सभी हिंदी पत्रकार भी औकात में आ जाएंगे. अंग्रेजी में फां-फूं करने वाले औसत छात्र भी इंटरव्यू में शीर्ष पर बैठते हैं. बाकी देश में हिंदी की स्थिति क्या है यह वैसे किसी बालक से पूछिएगा जो हिंदी माध्यम से यूपीएससी वगैरह की परीक्षा में बैठता है.

खैर, शुक्रिया कीजिए हिंदी सिनेमा का कि हिंदी का प्रसार किया. टीवी का भी. पर यहां भी हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन को छोड़कर बाकी सभी लोग अपने संवाद रोमन में और फिल्म की पटकथा का बाकी ब्योरा अंग्रेजी में लेते हैं. इंटरव्यू देने में भी उन्हें अंग्रेजी ही मुफीद लगती है. अंग्रेजी में कुछ भी बोलने वाले की बात को गौर से सुनना और हिंदी में गहरी अच्छी बात को भी हल्के में लेना भारतीय मानसिकता का वही पक्ष है जिसे गोरा रंग सुंदर लगता है और गहरा रंग असुंदर. हिंदी पट्टी की मानसिकता वही है जिसकी वजह से चमड़ी के रंग को गोरा बनाने वाली क्रीमें बाजार में सबसे ज्यादा बिकती हैं.

बुरा लगेगा पर, हिंदी के प्रसार खासकर सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के भाषणों में हिंदी लाने का अहम काम नरेंद्र मोदी ने किया है. आप को चुभेगी यह बात पर सच है.

आखिरी बात, ऊंचे दर्जे के साहित्यकारों ने हिंदी के प्रसार के लिए कुछ भी नहीं किया है. हो सकता है समृद्धि आई हो हिंदी के खजाने में. पर प्रसार तो नहीं हुआ. आजकल नई वाली हिंदी भी है, जिसमें मैं नयापन खोजता रह गया.

बहरहाल, नई हो, पुरानी हो, तमिल, तेलुगू, बंगाली, बिहारी, मैथिली, ओडिया..चाहे जिस भी लहजे में हो, हिंदी हिंदी ही है. रहेगी. हो सकता है अगले 50 साल में हिंदी विलुप्त हो जाए. कम से कम लिपि तो खत्म हो ही जाए. लेकिन तब तक अगर बाजार ने इसे सहारा दिए रखा तो चलती रहेगी, चल पड़ेगी. तब तक के लिए हैप्पी हिंडी डे ड्यूड.

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Thursday, September 12, 2019

'नरेंद्र मोदी सेंसर्ड' फेक नैरेटिव को चुनौती देती काउंटर नैरेटिव की किताब है

पिछले सातेक साल में टीवी, रेडियो, बेवजगत और अखबारों में जितने नरेंद्र मोदी दिखे, सुने और पढ़े गए हैं उतनी जगह शायद ही किसी दूसरे नेता को दी गई होगी. ऐसे में अगर किसी किताब का शीर्षक नरेंद्र मोदी सेंसर्ड हो, तो चौंकाने वाला ही होगा. टीवी पत्रकार अशोक श्रीवास्तव की यह किताब ऐसे दौर में और अधिक दिलचस्प लग सकती है जब हाल ही में चुनाव आयोग ने डीडी न्यूज़ को विभिन्न दलों को दिए जा रहे एयर टाइम में गैर-बराबरी पर फटकार लगाई है. 

चुनाव का वक्त हो तो राजनीति या राजनेताओं से जुड़ी किताबों का प्रकाशन होना कोई नई बात नहीं. राजनीति और चुनाव से जुड़े कथित तौर पर रहस्योद्घाटन करने वाली किताबें दुकानों पर नमूदार होने लगती हैं. इस साल भी जनवरी से ही ऐसी कई किताबें दिखने और बिकने लगी हैं. पर किताब नरेंद्र मोदी से जुड़ी हो तो मामला खास हो जाता है.

इसमें शक नहीं कि पिछले सातेक साल में टीवी, रेडियो, बेवजगत और अखबारों में जितने नरेंद्र मोदी दिखे, सुने और पढ़े गए हैं उतनी जगह शायद ही किसी दूसरे नेता को दी गई होगी. ऐसे में अगर किसी किताब का शीर्षक नरेंद्र मोदी सेंसर्ड हो, तो मामला चौंकाने वाला ही होगा. इस किताब को लिखा है प्रसार भारती के चैनल और सरकार के अनाधिकारिक प्रतिनिधि टीवी चैनल डीडी न्यूज़ के वरिष्ठ एंकर अशोक श्रीवास्तव ने. श्रीवास्तव टीवी की दुनिया के जाने-माने नाम हैं और उनकी यह किताब नरेंद्र मोदी के खिलाफ गढ़े जा रहे कथित फेक नैरेटिव से दो-दो हाथ करती है. नरेंद्र मोदी सेंसर्ड का केंद्रीय विषय तो नरेंद्र मोदी का एक साक्षात्कार है, जिसे डीडी न्यूज़ के लिए अशोक श्रीवास्तव ने लिया था और उसमें डीडी प्रशासन ने कांट-छांट और कतर-ब्योंत की पूरी कोशिश की थी.

पर यह किताब ऐसे दौर में और अधिक दिलचस्प लग सकती है जब हाल ही में चुनाव आयोग ने डीडी न्यूज़ को विभिन्न दलों को दिए जा रहे एयर टाइम में गैर-बराबरी की बात पर फटकार लगाई है.



अशोक श्रीवास्तव की लिखी किताब नरेंद्र मोदी सेंसर्ड
बहरहाल, किताब को आप जैसे ही हाथ में लेते हैं शीर्षक में चस्पां सेंसर शब्द का मंतव्य स्पष्ट करने के लिए काले रंग का एक आवरण आपको दिखता है, जिस पर नरेंद्र मोदी की तस्वीर है. मोदी गौर से आपको ही देखते हुए प्रतीत होते हैं. शीर्षक में सेंसर्ड शब्द रोमन में लिखा है, जो खलता है.

इस किताब में श्रीवास्तव उन पत्रकारों-बुद्धिजीवियों को खुलेआम चुनौती देते दिखते हैं जो 2014 के बाद से मोदी राज में देश में अघोषित आपातकाल का आरोप लगाते रहे हैं और कहते हैं कि पत्रकारों को काम करने की आज़ादी नहीं है. श्रीवास्तव कहते हैं कि जो पत्रकार यह फेक नैरेटिव खड़ा कर रहे हैं वो पत्रकारिता नहीं, राजनीति कर रहे हैं. अपनी बात को साबित करने के क्रम में श्रीवास्तव कई दिलचस्प तथ्य पेश करते हैं.

वैसे, यह तय है कि पिछले लोकसभा चुनाव में डीडी पर प्रसारित होने और न होने के दोराहे पर खड़ा यह इंटरव्यू खासा विवादित रहा था. पर 22 अध्यायों में एक इंटरव्यू के इर्द-गिर्द घूमती हुई किताब कई जगहों पर दोहराव की शिकार है.

वैसे, यह जानी हुई बात है कि नरेन्द्र मोदी के इस इंटरव्यू को पहले गिरा देने की कोशिश हुई थी बाद में इंटरव्यू टेलिकास्ट तो हुआ लेकिन उसे बुरी तरह कांट-छांट दिया गया. यूपीए के दौर में डीडी न्यूज नरेन्द्र मोदी का इंटरव्यू प्रसारित करने पर क्यों मजबूर हुआ, श्रीवास्तव ने इसकी अंतर्गाथा इस किताब में लिखी है.

टीवी पत्रकारों के साथ एक दिक्कत यह हो जाती है कि प्रिंट में लिखते समय भी उनकी भाषा टीवी वाली ही रहती है. यह बात एक साथ ही अच्छी और बुरी दोनों है. भाषा की सरलता एक बात हो सकती है, लेकिन साथ ही कई बातों का टीवीनुमा दोहराव खिजाने वाला भी होता है.

इस किताब का पहला अध्याय, यह किताब क्यों...यह साबित करता है कि श्रीवास्तव खुद को कहां खड़ा करते हैं. वह कथित सेकुलर पत्रकारों का फेक नैरेटिव खड़ी करने के लिए उपहास उड़ाते हैं और फिर असहिष्णुता के आरोप में पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकारों को अवॉर्ड वापसी गैंग का नाम देते हैं. मॉब लिंचिंग के खिलाफ श्रीवास्तव लिंचिंग में मारे गए दो हिंदुओं चंपारण के मुकेश और दिल्ली के पंकज नारंग की मिसाल देते हैं. फिर उनके निशाने पर पुण्य प्रूसन वाजपेयी और आशुतोष आते हैं. श्रीवास्तव अरविंद केजरीवाल पर निशाने साधते हैं कि उन्होंने एक पत्रकार को नौकरी से निकलवा दिया था. लेकिन जहां भी वह किताब में अतिरिक्त हमलावर और आक्रामक दिखे हैं उन्होंने महिला पत्रकार या बुद्धिजीवी कहकर काम चला लिया है.

बहरहाल, बाद में किताब को लेकर प्रधानमंत्री की अनुमति वाले प्रकरण में श्रीवास्तव उनकी सदाशयता का हवाला भी देते हैं कि किताब का विषयवस्तु देखने से प्रधानमंत्री कार्यालय ने मना कर दिया. फिर यह किताब जिक्र करती है कि किस तरह उनके चैनल ने नरेंद्र मोदी के साक्षात्कार को लेकर अनमनापन दिखाया और किसतरह श्रीवास्तव ने बड़ी कठिनाई से इसे पूरा किया.

यह बात सोलहो आने सच है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी डीडी के मुख्य समाचार चैनल पर ब्लैक आउट कर दिए गए थे और उनकी खबर दिखाई ही नहीं जाती थी. पर लोकसभा चुनाव 2014 के समय दूसरे टीवी चैनलों की तरह डीडी पर भी उनकी रैलियों से महत्वपूर्ण हिस्से दिखाए जाते थे, यह भी उतना ही सच है. श्रीवास्तव ने अपनी किताब में मोदी के न दिखाए जाने का जिक्र किया है जो सच है पर वह डीडी के जनादेश जैसे चुनावी कार्यक्रम को भूल गए हैं, जिसमें मोदी के रैलियों पर रोजाना खबर बनती थी. श्रीवास्तव इस बात का जिक्र करना भूल गए कि 16 मई को मतगणना के दिन ठीक शाम 4 बजे मोदी पर आधे घंटे की डॉक्युमेंट्री प्रसारित हुई थी. डॉक्युमेंट्री बनने में काफी वक्त लगता है और जाहिर है डीडी न्यूज़ ने इसकी तैयारी पहले से कर रखी होगी. श्रीवास्तव को अपनी किताब में इन बातों का भी जिक्र करना चाहिए था कि सेंसरशिप के उस दौर में यह कैसे मुमकिन हुआ होगा.
श्रीवास्तव अपनी किताब में मोदी के साक्षात्कार के रुकने, कटने और काट-छांट के साथ प्रसारित होने के लिए तब के डीजी एस.एम. खान को दोषी ठहराते हैं. वह उनका नाम लेते हैं, (गौरतलब है कि मोदी सरकार आने के बाद खान को हाशिए पर डाल दिया गया और फिर वह रिटायर हो गए) पर सुविधाजनक तरीके से उन एडीजी या समाचार निदेशकों का नाम उजागर नहीं किया गया है जो छिपे तौर पर संदेशों के जरिए श्रीवास्तव के इंटरव्यू की तारीफ कर रहे थे और एक तरह से उनके साथ थे.

बहरहाल, डीडी न्यूज़ सरकारी अधिकारियों के हाथ का खिलौना और सरकार की कठपुतली है इसमें दो राय नहीं है. एनडीए, फिर यूपीए ने, और फिर मोदी सरकार ने अपनी तरह से इसका इस्तेमाल किया है. चुनाव से ऐन पहले समाचारवाचकों के पीछे स्क्रीन पर सरकारी योजनाओं के प्रचार का बैनर इसकी मिसाल है. यह प्रचार किस बेशर्मी से किया गया है इसका उदाहरण है कि एक बुलेटिन में समाचार वाचिका खबर तो पुलवामा हमले का पढ़ रही थी पर उसके पीछे स्क्रीन पर लगातार उज्ज्वला योजना का बैनर लगा हुआ था. ऐसा पूरे समय तक रहता था, हर बुलेटिन में, हर रोज.

बहरहाल, किताब का कलेवर ऊपर से अच्छा है पर भीतर पन्नों में प्रूफ की गलतियां उघड़कर सामने आती हैं. और चुनाव पूर्व दिलचस्प वाकयों को बदमजा कर जाती हैं. यहां तक कि किताब के पिछले आवरण पन्ने (ब्लर्ब) पर भी गलतियां जायका खराब करती हैं. ऐसा लगता है कि किताब को बहुत हड़बड़ी में लिखा और प्रकाशित किया गया हो. किताब किसी अच्छे संपादक की कैंची से होकर गुजरती तो कसावट के साथ आ सकती थी.

बेशक, इस किताब के जरिए अशोक श्रीवास्तव ने मोदी के इंटरव्यू के इर्द-गिर्द बुनकर एक दिलचस्प वाकया पेश किया है और वह फेक नेरेटिव के खिलाफ भी दिखाई देते हैं, पर साथ ही वह इस फेक नैरेटिव के बरअक्स एक काउंटर नैरेटिव भी खड़ी करने की कोशिश करते हैं, जो उतना ही एकपक्षीय है जितना मोदी-विरोधियों की बौद्धिक जुगाली.

किताबः नरेंद्र मोदी सेंसर्ड
लेखकः अशोक श्रीवास्तव
मूल्यः 300.00 रु.
प्रकाशकः अनिल प्रकाशन

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Wednesday, September 11, 2019

हरियाणा के लोहारू किले का इतिहास खोजती है आदित्य सांगवान की डॉक्युमेंट्री फिल्म

हरियाणा के भिवाऩी के आदित्य सांगवान ने जब एक दिन फिल्मकार बनने का फैसला किया तो उनके पास विषय की कमी नहीं थी. बचपन के दिनों से ही वह रोज स्कूल जाते समय एक किले को देखा करते थे, जो सुनसान पड़ा रहता था. सांगवान जब बड़े हुए तो उस किले का इतिहास जानने की इच्छा जोर मारने लगी. फिर इस युवा फिल्मकार ने 18 मिनट की एक डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाई और उसे निर्देशित भी किया. भिवाऩी के उपेक्षित लेकिन शानदार और गौरवशाली इतिहास वाले लोहारू किले की कहानी कहने वाली उनकी फिल्म कई फिल्म महोत्सवों में दिखाई जा चुकी है. 

लोहारू किले को लोहारु के नवाबों ने 1802 में बनवाया था और यह बिट्स पिलानी से यह महज 10 किलोमीटर की दूरी पर है. सांगवान कहते हैं, " मैंंने फ़िल्म इसलिए बनाई क्योंकि लोहारू ही मेरा घर है. ये किला बहुत जीर्ण-शीर्ण हालत में था और हम चाहते थे इसकी मरम्मत की जाए और इसको पर्यटन स्थल की तरह विकसित किया जाए. ताकि लोहारू के लोगों को रोजगार मिल सके और यहां के इतिहास के बारे में लोगों को पता लग सके."
आदित्य सांगवान की फिल्म का पोस्टर. फोटो सौजन्यः आदित्य सांगवान


अब जबकि फिल्म बन गई है इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोगों का ध्यान खींचा है और 9 फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जा चुकी यह फिल्म दो पुरस्कार भी जीत चुकी है.

लोहारू रियासत को अंग्रेजों के शासनकाल में 9 तोपों की सलामी दी जाती थी. सांगवान के मुताबिक, इस किले के स्थापत्य ने उनका मन मोह लिया, जिसमें बहुत किस्म की वास्तु शैलियों का मिश्रण है. यह किला 1971 तक नवाबों के अधिकार में रहा. आखिरी नवाब ने इस किले को सरकार के हाथों बेच दिया. उसके बाद से यह किला बेसहारा हो गया और उपेक्षित पड़ा रहा. 
लोहारू का वीरान पड़ा किला फोटो सौजन्यः आदित्य सांगवान

लोहारू से उर्दू-फारसी साहित्य का भी रिश्ता है और मिर्ज़ा ग़ालिब की पत्नी उमराव जान लोहारू के नवाब की बेटी थीं. मिर्जा गालिब प्रायः लोहारू आया करते थे. गालिब ही नहीं, गालिब के समकालीन एक और बड़े शायर दाग देहलवी का भी ताल्लुक इस किले से था. सांगवान कहते हैं, "अगर इस किले की मरम्मत की जाए और आम लोगों के लिए खोलकर पर्यटन के लिहाज से इसका प्रचार-प्रसार किया जाए तो लोग इसकी बेशकीमती इतिहास और विरासत को जान पाएंगे."

वे कहते हैं, "लोहारू में पर्यटन की संभावनाएं हैं क्योंकि यह हरियाणा और राजस्थान के बॉर्डर पर है और इस के आस-पास पिलानी ओर मंडावा जैसे पर्यटन स्थल हैं जहां पर काफी सैलानी आते-जाते हैं. इसको भी उस बेल्ट में जोड़ा जा सकता है. इसके लिए मैंने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से भी मुलाकात की थी. पर कोई खास परिणाम नहीं निकला. इस किले को लाईब्रेरी या कोई आर्ट सेंटर भी बना सकते हैं."

पहले पत्रकार रहे सांगवान की कला, संस्कृति, सिनेमा, संगीत और रंगमंच में गहरी रुचि है. फिल्म निर्माण का किस्सा बताते हुए वे कहते हैं, "इस फ़िल्म में काम करने वाले सभी आर्टिस्ट कॉलेज के छात्र थे. किसी ने सिनेमैटोग्राफी की है तो किसी ने फ़िल्म को डिज़ाइन किया है और किसी ने स्क्रिप्ट लिखी है. ये किला मेरे घर के पास होने की वजह से हमेशा से मुझे लगता था कि इस पर काम होना चाहिए तो जब मौका मिला तो फ़िल्म बना दी."
आदित्य सांगवान उभरते हुए फिल्मकार हैं.

वे कहते हैं, फिल्म बनाने के लिए इसमें दाखिल होना भी मुश्किल था. पूरी टीम को किले के अंदर दीवार फांदकर जाना पड़ा था. लेकिन यह चुनौती उतनी बड़ी नहीं थी. असली चुनौती थी इस किले से जुड़े तथ्यात्मक दस्तावेजों की कमी. ऐसे में सांगवान और उनके दोस्तों ने किले के आसपास रहने वाले लोगों से बातचीत शुरू की और इस किले के बारे में लिखी किताबों को ढूंढना शुरू किया. साथ ही किले के वास्तुकला, और नवाबों की जीवनशैली पर भी उन्होंने काफी शोध किया. सांगवान बताते हैं, "किले के बारे में रिसर्च के लिए लोहारू के नवाब खानदान से मिला और कई किताबें पढ़ीं. मिर्जा गालिब इंस्टीट्यूट से भी जानकारी मिली, कई ऐसे लोगों से मिला जो इस किले से जुड़े हुए हैं और इसके बारे में जानते हैं. मिसाल के तौर पर, जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे बदर दुरेज अहमद और लेखिका नमिता गोखले से भी काफी जानकारी मिली. लोहारू के बारे में लिखा हुआ इतिहास बहुत कम है तो लोगों से ही ज्यादा जानकारी मिली."

सांगवान की 18 मिनट की फिल्म ने 9 फिल्म महोत्सवों में दर्शकों का ध्यान खींचा है और 2 महोत्सवों में पुरस्कृत भी हुई है. अब सांगवान का सारा ध्यान अपनी अगली परियोजना पर है. पर, उनको उम्मीद है कि हरियाणा और केंद्र की सरकार लोहारू के लिए कुछ करेगी.

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Tuesday, September 10, 2019

जीएम फसलों पर दुविधा में फंसी सरकार और किसान

संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए सरकार ने कहा कि इस बात का कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है कि ये फसलें मानव उपभोग के लिए ठीक नहीं हैं. हालांकि इससे जीएम फसलों पर पूरी पाबंदी का मामला फिट नहीं बैठता, लेकिन पर्यावरण को लेकर चिंतित लोग और कुछ किसानों के समूह भी, कहते हैं कि सरकार इस मसले पर ऐसे अध्ययनों को नजरअंदाज कर रही है जो जीएम फसलों की पैदावार को सेहत के नुक्सान से जोड़कर देखते हैं


महाराष्ट्र, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों के किसान आनुवंशिक इंजीनियरिंग से दुरुस्त किए गए फसलों (जीएम) को उगाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उनका तर्क है कि इन्हें उगाने में कम लागत आती है, उपज अधिक होती है और इनपर कीटों और खरपतवारों का हमला भी कम होता है. सरकार ने जीएम कॉटन (कपास) की एक प्रजाति को छोड़कर बाकी जीएम फसलों पर पाबंदी लगा रखी है.

लेकिन 19 जुलाई को संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए सरकार ने कहा कि इस बात का कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है कि ये फसलें मानव उपभोग के लिए ठीक नहीं हैं. हालांकि इससे जीएम फसलों पर पूरी पाबंदी का मामला फिट नहीं बैठता, लेकिन पर्यावरण को लेकर चिंतित लोग और कुछ किसानों के समूह भी, कहते हैं कि सरकार इस मसले पर ऐसे अध्ययनों को नजरअंदाज कर रही है जो जीएम फसलों की पैदावार को सेहत के नुक्सान से जोड़कर देखते हैं. पर्यावरणविदों का कहना है कि जीएम फूड के इस्तेमाल से कैंसर भी हो सकता है.

अब सवाल यह भी है कि क्या आनुवंशिक इंजीनियरिंग से तैयार फसलें सेहत की लिए ठीक है या नहीं, इस पर निगाह कौन रखेगा. या खेती में अधिक पैदावार हासिल करने की इच्छा से हम पर्यावरण और सेहत की चिंता को ताक पर रख दें. इसके बरअक्स एक सवाल यह पैदा होता है कि जीएम फसलें बदलते पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के दौर में मुफीद साबित हो सकती हैं और इससे बढ़ती आबादी का पेट भी भरा जा सकता है.

असल में, बीटी कॉटन को मंजूरी मिले 17 साल बीत गए हैं. यह एकमात्र जीएम फसल है जिसे भारत में उगाने की कानूनी मंजूरी मिली हुई है. हालांकि बीटी ब्रिंजल (बैंगन) और जीएम सरसों को भी 2017 में सरकारी मंजूरी दी जा चुकी है.

पिछली जुलाई में महाराष्ट्र में 12 किसानों को सरकारी बंदिश का उल्लंघन करते हुए गिरफ्तार किया गया था. ये किसान बिना मंजूरी वाले जीएम कपास के बीजों का इस्तेमाल कर रहे थे. इस बाबत, 60 एफआइआर दर्ज किए गए और 1100 किलोग्राम गैरकानूनी बीज भी जब्त किया गया था.

गौरतलब है कि गैरकानूनी जीएम फसलें उगाने पर पांच साल की कैद और 1 लाख रूपए के जुर्माने का प्रावधान है.

यहां ध्यान देने वाली बात है कि देश में साल 2017-18 में 62 लाख मीट्रिक टन कपास की पैदावार हुई थी. चीन के बनिस्बत यह उपज काफी अधिक थी. चीन में 60 लाख मीट्रिक टन, अमेरिका में 46 लाख मीट्रिक टन, ब्राजील में 19 लाख मीट्रिक टन और पाकिस्तान में 18 लाख मीट्रिक टन कपास उगाया गया. भारत से 2017-18 में 11.3 लाख मीट्रिक टन कपास का निर्यात किया गया था. निर्यात के मामले में भारत अमेरिका से काफी पीछे है. अमेरिका में 34.5 लाख मीट्रिक टन कपास उस साल निर्यात किया गया था. भारत कपास का आयात करने में पूरी दुनिया में सातवें पायदान पर है जहां 3,70,000 मीट्रिक टन कपास का आयात किया गया.

देश में कपास की खेती का रकबा करीबन 1.17 करोड़ हेक्टेयर है. यानी दुनिया भर में जितनी जमीन में कपास उगाया जाता है उसका 37.5 फीसदी खेत भारत में है. देश के 10 राज्यों के 65 लाख कपास किसान और करीबन 6 करोड़ लोग कपास से जुड़े कामकाज से अपनी रोटी कमाते हैं.

देश के कपास पैदा करने वाले इलाकों में से 15 फीसदी इलाके महाराष्ट, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हैं जहां गैर-कानूनी जीएम कपास (2017-18 में) उगाई गई थी. इसमें हर हेक्टेयर में करीबन 2800 से 5000 रुपए तक का फायदा हुआ था.

कॉटन एसोशिएसन ऑफ इंडिया के मुताबिक, साल 2010 से 2015 के बीच प्रति हेक्टेयर 73,200 रुपये की औसत आमदनी कपास उगाने वाले किसानों को हुई थी. जबकि इसी अवधि में कपास उगाने का प्रति हेक्टेयर औसत खर्च 63,941 रुपये था.

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Monday, September 9, 2019

पुस्तक समीक्षाः सूखे पत्तों का राग मर्मस्पर्शी गिरहों को आहिस्ते से खोलता है.

गुरमीत बेदी का कथा संग्रह 'सूखे पत्तों का राग' में 14 कहानियां हैं. इस किताब कि कहानियां वर्तमान दौर में लिखी जा रही अधिकांश कहानियों से कुछ अलग एवं उम्दा हैं. कुछेक कहानियों को छोड़ दें तो, सभी कहानियों में लेखक ने पहाड़ों और पर्वतीय राज्य और शहरों का परिवेश बनाये रखा है. पहली कहानी पुल से लेकर आखिरी कहानी चिड़िया तक यह साफ झलकता है.

ज्वारभाटा कहानी में एक विधवा स्त्री के अपने मृत पति के लिए प्रेम का खूबसूरती से वर्णन किया गया है, वहीं पांचवी कहानी खिला रहेगा इंद्रधनुष में एक युवा जोड़े की मर्मस्पर्शी प्रेम कहानी है, जो किसी को भी भावुक कर सकती है.

नींद से बाहर में आज के समाज में सोशल मीडिया से मनुष्य के पारिवारिक जीवन में पड़ते प्रभाव का उल्लेख प्रभावी रुप से किया गया है. एक रात कहानी में एक पुत्र का मां के प्रति लगाव के बारे में तो, हवा में ठिठकी इबारत के माध्यम से समाज में होती बेमेल शादियों के बारे में जिक्र किया गया है.

सूखे पत्तों का राग कहानी में हेम सिंह का भोलापन हंसाता और गुदगुदाता तो है ही इसके साथ-साथ गरीबी में भी हार नहीं मानने की उसकी आदत पाठक के मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं. आखिरी कहानी चिड़िया एक अकेली लड़की की कहानी है जो एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका है. अकेली लड़की के बारे में समाज क्या सोचता है इस बारे में कहानी अपने तरीके से बात कहती है. 

इस कहानी के माध्यम से जो सच सामने आता है वह दिल दहला देने के लिए काफी है.





सूखे पत्तों का राग किताब की कुछ कहानियों को छोड़ दें तो ज्यादातर कहानियां मर्मस्पर्शी हैं, जो भावुक करने के साथ-साथ मानस पटल पर एक गहरा असर डालती हैं. कहीं-कहीं इस किताब में मुद्रण की गलतियां भी हैं. कहानी पढ़ने में रुचि रखने वालों के लिए एक अच्छी किताब है. चूंकि गुरमीत बेदी की यह दूसरी ही किताब है फिर भी इस संग्रह की प्रतीक्षा बहुत दिनों से थी.

लेखक गुरमीत बेदी ने अपनी इस किताब में आसान भाषा का चयन किया है, जिससे किसी भी कहानी को समझने में किसी प्रकार कि मुश्किल नहीं होती है. यह हिंदी के पाठकों से इतर दूसरे भाषा-भाषियों तक पहुंच बना पाएगी.

किताबः सूखे पत्तों का राग
लेखकः गुरमीत बेदी
प्रकाशनः भावना प्रकाशन
मूल्यः 250 रुपए
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Wednesday, September 4, 2019

नदीसूत्रः बेतवा नदी का राख से घुटता दम

बेतवा देश की 38 सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है. इसमें केमिकल ऑक्सीजन डिमांड 250 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से भी अधिक है. यह पानी में प्रदूषण का वह स्तर है जिसे सीवेज ट्रीटमेंट में भेजे जाने की जरूरत है. बेतवा अकाल मौत की तरफ बढ़ रही है


बेतवा नदी को बुंदेलखंड की गंगा कहा जाता है. खेती-बाड़ी, पीने से लेकर उद्योग-धंधे सब बेतवा के भरोसे चलता है यहां. बेतवा नहीं तो कुछ नहीं. इसकी अहमियत कुछ ऐसे समझी जा सकती है कि बुंदेलखंड को सूखे से निजात दिलाने के लिए नदी जोड़ने की परियोजना में केन और बेतवा नदियों को जोड़ा जा रहा है. या कम से कम यह मान लेना चाहिए कि सरकार की सदिच्छा दोनों नदियों को जोड़ने की है.

पर, अगर कभी आप उत्तर प्रदेश के झांसी जिला मुख्यालय से कानपुर हाइवे पर 25 किलोमीटर चलें और परीछा थर्मल पॉवर प्लांट और बेतवा नदी के बीच स्थित रिछौरा और परीछा गांव जाएं तब जाकर आपको पता चलेगा कि विकास की कितनी कीमत खुद नदी और उसके किनारे रहने वाले लोग अदा कर रहे हैं. इन गांवों में आपको एक भी मवेशी दिखाई नहीं पड़ेगा. रिछौरा गांव के 30 वर्षीय अमर सिंह अहिरवार पांच वर्ष पहले दो गाय खरीदकर लाए थे. पर कुछ ही दिन बाद उनकी गायें बीमार रहने लगीं. डॉक्टरों से पता चला कि बेतवा नदी का प्रदूषित पानी पीने से गायों के पेट में राख जमा हो रही है.

कुछ ही दिनों में अमर की दोनों गायें चल बसीं. बुंदेलखंड पैकेज के तहत अमर सिंह को जो तीन बकरियां मिली थीं, उनमें से आखिरी ने पिछले हफ्ते दम तोड़ दिया. बेतवा नदी के किनारे फैली राख को दिखाते हुए अमर सिंह बताते हैं कि पॉवर प्लांट लगने से गांव में बिजली तो मिली लेकिन प्लांट की राख ने बेतवा नदी की सांसें छीन ली हैं.
झांसी-कानपुर हाइवे पर जैसे-जैसे परीछा पॉवर प्लांट के नजदीक पहुंचते हैं, तापघर की ओर जाने वाली सड़कें राख से पटी नजर आती हैं. मकानों की छतों पर राख का साम्राज्य है. हाल में हुई बारिश ने कुछ राहत दी है. छतों पर जमी कोयले की राख को बारिश का पानी बहा तो ले गया पर इसने गांव के किनारे बह रही बेतवा को और "विषैला'' करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

इस राख ने बिजलीघरों के इर्द-गिर्द बसे इलाकों में लोगों का जीवन नारकीय बना दिया है.

परीछा थर्मल पॉवर प्लांट के ठीक पीछे स्थित रिछौरा और परीछा गांवों में पसरा सन्नाटा अलग किस्सा बताता है. 30 वर्ष पहले दस हजार से अधिक आबादी वाले इन गांवों से आधे से ज्यादा लोग पलायन कर गए हैं.

पानी के लिए तरस रहे बुंदेलखंड में नदी का पानी ही जहरीला हो जाए तो इनके किनारे बसे गांवों की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. वर्ष 1984 में काम शुरू करने वाले परीछा थर्मल पॉवर प्लांट में अब छह इकाइयां हैं जहां रोजाना 16,000 मीट्रिक टन कोयले की खपत होती है और रोजाना 14,000 मीट्रिक टन गीली राख निकलती है जिसे डैम में भेजा जाता है.

परीछा थर्मल पॉवर प्लांट के एक अधिकारी बताते हैं, "210 मेगावाट क्षमता वाली इकाइयों से निकलने वाली राख के लिए बने दोनों डैम भर चुके हैं जबकि 110 मेगावाट क्षमता वाली इकाइयों के लिए बने डैम का एक कंपार्टमेंट भर चुका है. अब राख दूसरे कंपार्टमेंट में डाली जा रही है. इसमें भी छह महीने तक ही राख रखने की व्यवस्था है.''

बेतवा में मिलाई जा रही राख से जहरीले हुए पानी ने पिछले दो साल में परीछा और रिछौरा गांवों में 50 से ज्यादा पालतू पशुओं की जान ले ली है. परीछा गांव के जगदीश परिहार बताते हैं, "बेतवा में केमिकल वाली राख मिलने का असर गांव के हैंडपंपों पर भी पड़ा है.

अब इन हैंडपंपों से भी प्रदूषित पानी ही मिलता है.'' रिछौरा गांव के प्रधान कुलदीप सिंह बताते हैं, "बेतवा नदी की तलहटी में 20 से 25 फुट तक राख जमा हो जाने से नदी छिछली हो गई है. जरा-सा पानी बढऩे पर यह गांव में पहुंच जाता है.''

नदी पर बना परीछा बांध भी छिछला हो गया है. झांसी में सिंचाई विभाग में तैनात इंजीनियर श्रीशचंद बताते हैं, "बांध की तलहटी में राख जमने से इसकी भंडारण क्षमता काफी कम हो गई है जिससे आने वाले दिनों में सिंचाई पर संकट हो सकता है.'' परीछा बिजलीघर की राख को ठिकाने लगाने के लिए एक नया ऐश डैम बनाने की भी योजना है. इसके लिए प्लांट से सटे गांव महेबा, गुलारा और मुराटा की 572 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की जानी थी. किसानों को जमीन का मुआवजा देने के लिए "सेंट्रल पॉवर फाइनेंस कार्पोरेशन'' से 195 करोड़ रुपए का ऋण भी परीछा थर्मल पॉवर प्लांट को मिल गया.

लेकिन प्रशासन को पर्यावरण मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं मिल पाया क्योंकि नियमानुसार डैम की जमीन को नेशनल हाइवे और नदी से 500 मीटर दूर होना चाहिए. लेकिन बेतवा नदी और हाइवे के बीच की दूरी ही 500 मीटर से कम है और इसी के बीच में अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन है.

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पिछले नवंबर में बेतवा नदी की पानी की जांच की और पाया कि बेतवा के पानी में टोटल डिजॉल्वड सॉलिड (टीडीएस) की मात्रा 700 से 900 पॉइंट प्रति लीटर और टोटल हार्डनेस (टीएच) 150 मिलीग्राम प्रति लीटर से ऊपर पहुंच गया है.

वैसे इससे पहले मार्च, 2018 में पर्यावरण मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि बेतवा देश की 38 सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है. इसमें केमिकल ऑक्सीजन डिमांड 250 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से भी अधिक है.मंत्रालय ने माना है कि यह पानी में प्रदूषण का वह स्तर है जिसे सीवेज ट्रीटमेंट में भेजे जाने की जरूरत है.

फिलहाल, आप हर घर नल योजना के बारे में सोच-सोचकर पुलकित होइए कि गरीब से गरीब आदमी के किचन में सीधे झर्र से नल का पानी आएगा. पर, इस शोशेबाजी से थोड़ी मोहलत मिले तो सोचिएगा कि झर्र से आने के लिए पानी होना बहुत जरूरी होगा. और पानी का स्रोत रही नदियां तो अकाल मौत का शिकार हो रही हैं.

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