एक बार फिर बातें करना,
ज़िंदगी की गर्माहट की,
ताकि कुछ तो जान सकें--
वह गर्म नहीं है।
पर वह गर्म हो सकती थी।
मेरी मौत के पहले
एक बार फिर बातें करना
प्यार की,
ताकि कुछ तो जान सकें,
वह था--
वह ज़रूर होगा।
फिर एक बार बातें करना,
खुशी की, उम्मीद की,
ताकि कुछ लोग सवाल करें,
वह क्या थी, कब आएगी वह ?
मंजीत ठाकुर
Friday, November 30, 2007
फिल्म- द पोएट चाइल्ड
जिजीविषा की अद्भुत गाथा
भारत में ही नहीं दुनिया भर में ईरानी फिल्मों को लेकर एक शानदार उत्साह है। लोग उन्हें देखना चाहते हैं। गोवा में भी दो ईरानी फिल्में हैं, एक तो है द ईरानियन प्रिंस जिसे दुर्भाग्यवश मैं देख नहीं पाया हूं अभी तक। लेकिन एक अन्य फिल्म थी द पोएट चाइल्ड। ये देखी। ये फिल्म एक अनपढ़ पिता, जो अब अपंग होने की वजह से कारखाने में काम नहीं कर सकता और उसके बेटे के बीच के बेहद मार्मिक रिश्ते की कहानी है. पिता-पुत्र में एक शानदार कैमिस्ट्री है। बच्चे का अभिनय वयस्कों को भी मात दे दे।
बच्चा स्कूल में पड़ने जाता है, लेकिन अनपढ़ पिता अपने रिटायरमेंट के लिए खुर्राट सरकारी अधिकारियों से पार नही पा पाता। एक समझदार की तरह लड़का अपने पिता को पढ़ाई न करने के बुरे नतीजे बताता रहता है, और साथ ही साथ सरकारी अधिकारियों को नियम-कायदों की असली और नई किताब के ज़रिए लाजवाब भी करता जाता है.( वैसे यह साबित हो गया कि ईरान हो या भारत, सरकारी अधिकारी हर जगह एक जैसे अडंगेबाज होते हैं)
फिल्म में कई प्रसंग ऐसे हैं, जो बच्चे को बच्चा नहीं एक पूरी पीढ़ी का प्रतिनिधि साबित करते हैं। कई जगहों पर प्रतिनिधि ने एक्वेरियम की अकेली मछली के ज़रिए बेहतरीन मेटाफर का इस्तेमाल किया है।
वह बच्चा जो अपनी दुनिया में अकेला है, जिसे बूढे बाप की देखभाल भी करनी है, उससे संवाद भी करना है, अधिकारियों से अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी है। और बीच-बीच में अपना बचपन भी बचाए रखना है। यह फिल्म समाकालीन झंझावातों के बीच जिजीविषा की अनोखी दौड़ है। फिल्म के एक दृश्य में एक चोर उसके पिता की एकमात्र संपत्ति साइकिल चोरी करके भागने लगता है। उसी दिन जिस दिन सरकारी अधिकारी लड़के के पिता को पेंशन देना मंजूर कर लेते हैं। हाथ में मछली लिए का बरतन लिए लड़का उस चोर के पीछे भागता है। और अचानक आपको द बाइसिकिल थीव्स की याद आ जाती है.।
बहरहाल, चोर का पीछा करके आखिरकार उसे पकड़ लेता है। पर भागमदौड़ में मछली का बरतन टूट जाता है... लड़का कपड़े वाले प्लास्टिक के थैले में नाली का पानी भर के मछली डालता है। फिल्म के इस आखिरी दृश्य में नाली के पानी में भी मछली जिंदा है, लड़के के बाप को नाममात्र को पेंशन मिली है, फिर भी वह खुश है, लड़का अपने पिता को पढना सिखाता है। इससे बेहतर जिजीविषा की गाथा क्या हो सकती है भला? जहां तक साक्षरता के सवाल है.. यह फिल्म किसी भी सरकारी प्रचार से ज़्यादा प्रभावी साबित होगी।
मंजीत ठाकुर
भारत में ही नहीं दुनिया भर में ईरानी फिल्मों को लेकर एक शानदार उत्साह है। लोग उन्हें देखना चाहते हैं। गोवा में भी दो ईरानी फिल्में हैं, एक तो है द ईरानियन प्रिंस जिसे दुर्भाग्यवश मैं देख नहीं पाया हूं अभी तक। लेकिन एक अन्य फिल्म थी द पोएट चाइल्ड। ये देखी। ये फिल्म एक अनपढ़ पिता, जो अब अपंग होने की वजह से कारखाने में काम नहीं कर सकता और उसके बेटे के बीच के बेहद मार्मिक रिश्ते की कहानी है. पिता-पुत्र में एक शानदार कैमिस्ट्री है। बच्चे का अभिनय वयस्कों को भी मात दे दे।
बच्चा स्कूल में पड़ने जाता है, लेकिन अनपढ़ पिता अपने रिटायरमेंट के लिए खुर्राट सरकारी अधिकारियों से पार नही पा पाता। एक समझदार की तरह लड़का अपने पिता को पढ़ाई न करने के बुरे नतीजे बताता रहता है, और साथ ही साथ सरकारी अधिकारियों को नियम-कायदों की असली और नई किताब के ज़रिए लाजवाब भी करता जाता है.( वैसे यह साबित हो गया कि ईरान हो या भारत, सरकारी अधिकारी हर जगह एक जैसे अडंगेबाज होते हैं)
फिल्म में कई प्रसंग ऐसे हैं, जो बच्चे को बच्चा नहीं एक पूरी पीढ़ी का प्रतिनिधि साबित करते हैं। कई जगहों पर प्रतिनिधि ने एक्वेरियम की अकेली मछली के ज़रिए बेहतरीन मेटाफर का इस्तेमाल किया है।
वह बच्चा जो अपनी दुनिया में अकेला है, जिसे बूढे बाप की देखभाल भी करनी है, उससे संवाद भी करना है, अधिकारियों से अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी है। और बीच-बीच में अपना बचपन भी बचाए रखना है। यह फिल्म समाकालीन झंझावातों के बीच जिजीविषा की अनोखी दौड़ है। फिल्म के एक दृश्य में एक चोर उसके पिता की एकमात्र संपत्ति साइकिल चोरी करके भागने लगता है। उसी दिन जिस दिन सरकारी अधिकारी लड़के के पिता को पेंशन देना मंजूर कर लेते हैं। हाथ में मछली लिए का बरतन लिए लड़का उस चोर के पीछे भागता है। और अचानक आपको द बाइसिकिल थीव्स की याद आ जाती है.।
बहरहाल, चोर का पीछा करके आखिरकार उसे पकड़ लेता है। पर भागमदौड़ में मछली का बरतन टूट जाता है... लड़का कपड़े वाले प्लास्टिक के थैले में नाली का पानी भर के मछली डालता है। फिल्म के इस आखिरी दृश्य में नाली के पानी में भी मछली जिंदा है, लड़के के बाप को नाममात्र को पेंशन मिली है, फिर भी वह खुश है, लड़का अपने पिता को पढना सिखाता है। इससे बेहतर जिजीविषा की गाथा क्या हो सकती है भला? जहां तक साक्षरता के सवाल है.. यह फिल्म किसी भी सरकारी प्रचार से ज़्यादा प्रभावी साबित होगी।
मंजीत ठाकुर
Wednesday, November 28, 2007
क्या आप मुबारक बेगम को जानते हैं?
चढ़ते सूरज को सलाम करना फिल्म इंडस्ट्री की खासियत है। जो एक बार नज़र से उतर गया उसे फिर कोई याद भी नहीं करता। बीते जमाने की बेहद प्रतिभाशाली ओर मशहूर गायिका मुबारक बेगम इन दिनों गोवा में हैं। भारत के ३८ वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के गैर फीचर फिल्मों के वर्ग में विपिन चौबल की फिल्म मुबारक बेगम भी दिखाई जा रही है। यह बीते दिनों की इस मशहूर पार्श्व गायिका के जीवन पर आधारित है। उनके साथ बातचीत में हमने बांटे कुछ खास पल और अतीत वर्तमान हो गया।- गुस्ताख़
गुस्ताख़- आपके ज़माने और आज में क्या कोई फर्क पड़ा है?
गुस्ताख़- बहुत दिनों के बाद इंडस्ट्री ने आपको याद किया है?
मुबारक बेगम- हां, ...आखिरकार याद तो किया। ये तो फिल्म्स डिवीजन वाले और विपिन जी हैं, जिन्होने लोगो को बताया कि मुबारक अभी भी ज़िंदा है। मेरे घर आकर फिर से उतना सम्मान मिलने से खुश हूं.. फिल्म्स डिवीजन की आभारी हूं। यहां लोग अब फिल्म देखकर जान रहे हैं कि मुबारक बेगम ने भी कुछ गाया था।
गुस्ताख़- आपके ज़माने और आज में क्या कोई फर्क पड़ा है?
मुबारक बेगम- बहुत फर्क पड़ा है। लोग डूब के गाते थे। आज की तरह नहीं। म्यूजिक सिर्फ पैसे कमाने का ज़रिया नहीं था। लोग अपने लिए भी गाते थे. संतुष्टि के लिए। आज तो गाने क्या होते हैं...गिनती की तरह एक दो तीन चार होते हैं। पहले ऐसा नहीं था।
गुस्ताख़- आजकल तो आपके गाने का रीमिक्स भी आ गया है?
मुबारक बेगम-( पूछती हैं..) किस गाने का आया है? .. (मैं बताता हूं) ...अच्छा वो वाला...क्या अच्छे भले गाने का कचरा करके रख दिया है। ... चेहरे पर असंतुष्टि के भाव हैं।
गुस्ताख़- कुछ गा सकती हैं? हमारे लिए...???
मुबारक बेगम- विवशता में सर हिलाती हैं... नहीं गा सकती.. गला खराब रहता है.. खांसी के दौरे होते रहते हैं..(फिर पूछती हैं) क्या नाम है तुम्हारा? मैं बताता हूं.. अच्छा... चलो तुम कह रहे हो तो गा देती हूं... गाती हैं.. फिल्म हमारी याद आएगी का गना... कभी तनहाईयों में हमारी याद आएगी.......पुरकशिश आवाज़ की तान होटल में लॉबी में बैठे लोगों को ध्यान खींचती है, फिर वह आवाज़ पास ही हिलोरें मार रहे समंदर की आवाज़ से बंदिश करने लग जाती है। गाना खत्म होता है, मेरा कैमरामैन कैबल समेट रहा है.. मैं ठगा-सा बैठ हूं। निर्देशक विपिन चौबल की आंखे पनीली हैं।
मुबारक बेगम के काम के बारे में और हाल ही में सारेगामा पर जारी सीडी पर कभी फिर लिखूंगा..
मंजीत
मंजीत
Tuesday, November 27, 2007
समकालीन जादुई यथार्थ जी रहा हूं...
समकालीन जादुई यथार्थ जी रहा हूं...क्या यह लाईन ज़्यादा बौद्धिक लग रही है आपको? लेकिन सत्य यही है। मुझ जैसे नौसिखिए जर्नलिस्ट के लिए जादुई क्या हो सकता है? अपने से वरिष्ठ लोगों का साथ... जिनको पढ़कर, सुनकर या देखकर बड़ा हुआ। कहीं न कहीं, किसी की तरह बनने या लिखने का विचार मन को सपनों की सुनहरी दुनिया में ले जाता है। उन सबको अपने पास देखकर, या मोबाईल पर सुनकर, या उनका मेसेज पढ़कर, मेरे रिपोर्टस पर उनके विचार जान कर..गहरी अनुभूति होती है।
गोवा आया, तो यहां मिले..वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज, नवभारत टाइम्स के मुंबई संस्करण के सुरेश शर्मा , राजस्थान पत्रिका के राम कुमार और जनसत्ता-हंस के जाने माने अजित राय... से मिलकर समय गुजार कर इनसे जान-समझकर लगा कि उन लोगों के बीच हूं, जो सचमुच पड़ने-लिखने वाले हैं। वीकीपिडिया के फिल्मी पत्रकारों न दिल्ली में नाक में दम कर दिया। वहां किसी चैनल के मझ जैसे ही किसी टुटपूंजिया मुझसे पूछता है शुक्रवार को कौन सी रिलीज़ है...। गोवा में उससे इतर हम बातें करते हैं फिल्मों की क्वॉलिटी पर, उस की सिनेमाई भाषा पर, उसके कथानक के विस्तार और उसकी प्रासंगिकता पर। पता है कि वापस फिर उसी खोल में जाना है। लेकिन इस माहौल को जीना सच में जादुई है।
सुरेश शर्मा मंगल पांडे पर बनी फिल्म द राईजिंग की सच्चाई पर केतन से बहस करते हैं। अजय जी का शाहरुख से लव-हेट का रिश्ता चल रहा है। अमिताभ बच्चन इफी में क्यों नहीं हैं, इस पर चर्चा और चिंता होती है। एक नदीर गल्प और मीरा नायर की फिल्म पर बातें... किंगफिशर का लाउंज..दारू नदी की तरह बह रही है। एडलैब्स का अड्डा....सागर तट पर गीली हवा के झोंकों के बीच चिली-चिकन... पता चलता है..फिल्में देखना उतना आसान नहीं..जितना हम पूरे बचपन से दो साल पहले पत्रकार बनने तक मानते रहे। दिल्ली में रवीश कुमार और क़ुरबान अली मुझ पर सदय रहते हैं। उनसे मार्गदर्शन लेता रहता हूं।
किंगफिशऱ लाउंज में एक दूसरे की तस्वीरें उतारी जाती हैं। अगले दिन अजय जी को वापस मुंबई जाना है। सुरेश जी भी जाएंगे.. बचेंगे दो.. मैं और अजित जी..। इस बार बॉलिवुड की नामी हस्तियां नदारद हैं। कथित मुख्यधारा की फिल्में भी नहीं हैं। भारतीय पैनोरमा में धर्म और गफला ही हैं। सिनेमाई रूप से साधारण गफला में कम से कम तो कथ्य की मजबूती है, धर्म में भावन तलवार चीजों को अतिरंजित रूप में दिखाती हैं। देखना न देखना एक जैसा। किसी और दिन बताउंगा कि खोया-खोया चांद के निर्देशक सुधीर मिश्रा लोगों से क्यो कहते हैं कि ये फिल्म देखनी चाहिए और हज़ारों ख्वाहिशों .. के निर्देशक मानते हैं कि इस फिल्म की वजह से लोगों ने उन्हे गलत मान लिया है। वह सब बाद मे..
जारी..
मंजीत ठाकुर
गोवा आया, तो यहां मिले..वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज, नवभारत टाइम्स के मुंबई संस्करण के सुरेश शर्मा , राजस्थान पत्रिका के राम कुमार और जनसत्ता-हंस के जाने माने अजित राय... से मिलकर समय गुजार कर इनसे जान-समझकर लगा कि उन लोगों के बीच हूं, जो सचमुच पड़ने-लिखने वाले हैं। वीकीपिडिया के फिल्मी पत्रकारों न दिल्ली में नाक में दम कर दिया। वहां किसी चैनल के मझ जैसे ही किसी टुटपूंजिया मुझसे पूछता है शुक्रवार को कौन सी रिलीज़ है...। गोवा में उससे इतर हम बातें करते हैं फिल्मों की क्वॉलिटी पर, उस की सिनेमाई भाषा पर, उसके कथानक के विस्तार और उसकी प्रासंगिकता पर। पता है कि वापस फिर उसी खोल में जाना है। लेकिन इस माहौल को जीना सच में जादुई है।
सुरेश शर्मा मंगल पांडे पर बनी फिल्म द राईजिंग की सच्चाई पर केतन से बहस करते हैं। अजय जी का शाहरुख से लव-हेट का रिश्ता चल रहा है। अमिताभ बच्चन इफी में क्यों नहीं हैं, इस पर चर्चा और चिंता होती है। एक नदीर गल्प और मीरा नायर की फिल्म पर बातें... किंगफिशर का लाउंज..दारू नदी की तरह बह रही है। एडलैब्स का अड्डा....सागर तट पर गीली हवा के झोंकों के बीच चिली-चिकन... पता चलता है..फिल्में देखना उतना आसान नहीं..जितना हम पूरे बचपन से दो साल पहले पत्रकार बनने तक मानते रहे। दिल्ली में रवीश कुमार और क़ुरबान अली मुझ पर सदय रहते हैं। उनसे मार्गदर्शन लेता रहता हूं।
किंगफिशऱ लाउंज में एक दूसरे की तस्वीरें उतारी जाती हैं। अगले दिन अजय जी को वापस मुंबई जाना है। सुरेश जी भी जाएंगे.. बचेंगे दो.. मैं और अजित जी..। इस बार बॉलिवुड की नामी हस्तियां नदारद हैं। कथित मुख्यधारा की फिल्में भी नहीं हैं। भारतीय पैनोरमा में धर्म और गफला ही हैं। सिनेमाई रूप से साधारण गफला में कम से कम तो कथ्य की मजबूती है, धर्म में भावन तलवार चीजों को अतिरंजित रूप में दिखाती हैं। देखना न देखना एक जैसा। किसी और दिन बताउंगा कि खोया-खोया चांद के निर्देशक सुधीर मिश्रा लोगों से क्यो कहते हैं कि ये फिल्म देखनी चाहिए और हज़ारों ख्वाहिशों .. के निर्देशक मानते हैं कि इस फिल्म की वजह से लोगों ने उन्हे गलत मान लिया है। वह सब बाद मे..
जारी..
मंजीत ठाकुर
Sunday, November 25, 2007
खुदा के लिए- लाजवाब
यह न माना जाए कि कहानी आतंकवाद को ध्यान में रककर बुनी गई है, इसलिए पसंद की जाएगी। फिल्म का संगीत पक्ष बेहद मज़बूत है। लेकिन बात पहले कुछ और.. पूरी फिल्म ऐसी है कि यह न तो इस्लाम के खिलाफ जाती है, न आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का दम भरने वाले पश्चिमी देशों के हक़ में। यह सिर्फ कट्टरपंथ के खिलाफ है और है इस्लाम की ग़लत व्याख्या करने वाले कठमुल्लाओं के खिलाफ़। कैसे भोले नौजवानों को अपने हक़ में कठमुल्ला इस्तेमाल करते हैं उसकी बेहतरीन मिसाल पेश करती है ये फिल्म। साथ अमेरिकी तंज़ नज़र को भी उघाड़कर नंगा करती है. (इसे निर्देशक की किसी को तुष्ट करने की कोशिश न माना जाए, तो बेहतर)
बहरहाल, औरत के हुकूक, इस्लाम की व्याख्या और जिहाद के लिए नशीली चीज़ो के व्यापार भी करने वाले लोगों की चर्चा करती फिल्म कई बार आपको सोचने के लिए मजबूर भी करेगी। खास कर शिकागो के एक दृश्य में जहां मंसूर संगीत की शिक्षा के लिए जाता है, उसे गाने के लिए कहा जाता है। वहीं परिचय के दौरान एक लड़की उसेस उसके मुल्क का नाम पूछती है..और वह पाकिस्तान को नहीं जान रही होतीहै। विदेशों में आम लोगों के मन में अब भी पाकिस्तान भारत का पडो़सी देश ही है। ताजमहल वाले देश का पड़ोसी...।
खैर.. लड़का जब गाना शुरु करता है तो वह गीत होता है...नीर भरन जाऊं कैसे... भारतीय गीत...। लेकिन उसेके आलाप के साथ दूसरे देशों के संगीतकार भी अपेन वाद्य बजाने लग जाते हैं..और निर्देशक का यह अपना तरीका है यह कहने का कि दुनिया की सबी संस्कृतियां मूल रूप में एक ही चीज़ सिखाती हैं.. भाईचारा।फिल्म में एकाध जगहों को छोड़कर तकनीक भी सही है। खासकर इस साउंड बेचैन कर देता है कभी-कभी। खासकर, कट्टरपंथी मुल्ला के लहू गरमाने वाली तकरीर के दौरान ध्वनि में एक खास कंपन है जो निश्यच ही बेचैन करने वाली है।
नसीरूद्दीन शाह फिल्म में उदारवादी मौलवी की भूमिका में हैं, जो बताते हैं कि संगीत इस्लाम में नाजायज़ नहीं। कुल मिलाकर रोहिल हयात का संगीत फिल्म के प्रभाव में खास योगदान देता है। अदालत में हुई पूरी तकरीर के बाद सरमद अपीन ग़लती मान लेता है, लेकिन अदालत में ही कट्टरपंथी उसकी खूब पिटाई करते हैं।
बहरहाल, मंसूर अमेरिकी प्रशासन की आतंकवादी विरोधी गतिविधियों के नतीजतन लकवाग्रस्त और पागल होकर वापस लौटता है... लेकिन इसके बाद फिल्म में जो होता है..वह वास्तविक लगने की बजाय जनहित मे जारी सरकारी एड की तरह लगने लगता है। मेरी लंदन वापस जाने की बजाय वजीरिस्तान जाकर बच्चों को पढ़ाने लग जाती है.। इस कहानी का इतना सुखद अंत पचता नहीं है... मंसूर के हिस्से आया क्लाईमेक्स ज़्यादा अपील करता है। बहरहाल, फिल्म बेहद शानदार है।
इसे न देख पाए, और अच्छी फिल्में देखने के शौकीन हैं, तो ज़रूर कुछ मिस करेंगे। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए प्रासंगिक है। फिल्म समारोह से एकाध पुरस्कार बटोर ले जाए तो मुझे हैरत नहीं होगी।
मंजीत ठाकुर
बहरहाल, औरत के हुकूक, इस्लाम की व्याख्या और जिहाद के लिए नशीली चीज़ो के व्यापार भी करने वाले लोगों की चर्चा करती फिल्म कई बार आपको सोचने के लिए मजबूर भी करेगी। खास कर शिकागो के एक दृश्य में जहां मंसूर संगीत की शिक्षा के लिए जाता है, उसे गाने के लिए कहा जाता है। वहीं परिचय के दौरान एक लड़की उसेस उसके मुल्क का नाम पूछती है..और वह पाकिस्तान को नहीं जान रही होतीहै। विदेशों में आम लोगों के मन में अब भी पाकिस्तान भारत का पडो़सी देश ही है। ताजमहल वाले देश का पड़ोसी...।
खैर.. लड़का जब गाना शुरु करता है तो वह गीत होता है...नीर भरन जाऊं कैसे... भारतीय गीत...। लेकिन उसेके आलाप के साथ दूसरे देशों के संगीतकार भी अपेन वाद्य बजाने लग जाते हैं..और निर्देशक का यह अपना तरीका है यह कहने का कि दुनिया की सबी संस्कृतियां मूल रूप में एक ही चीज़ सिखाती हैं.. भाईचारा।फिल्म में एकाध जगहों को छोड़कर तकनीक भी सही है। खासकर इस साउंड बेचैन कर देता है कभी-कभी। खासकर, कट्टरपंथी मुल्ला के लहू गरमाने वाली तकरीर के दौरान ध्वनि में एक खास कंपन है जो निश्यच ही बेचैन करने वाली है।
नसीरूद्दीन शाह फिल्म में उदारवादी मौलवी की भूमिका में हैं, जो बताते हैं कि संगीत इस्लाम में नाजायज़ नहीं। कुल मिलाकर रोहिल हयात का संगीत फिल्म के प्रभाव में खास योगदान देता है। अदालत में हुई पूरी तकरीर के बाद सरमद अपीन ग़लती मान लेता है, लेकिन अदालत में ही कट्टरपंथी उसकी खूब पिटाई करते हैं।
बहरहाल, मंसूर अमेरिकी प्रशासन की आतंकवादी विरोधी गतिविधियों के नतीजतन लकवाग्रस्त और पागल होकर वापस लौटता है... लेकिन इसके बाद फिल्म में जो होता है..वह वास्तविक लगने की बजाय जनहित मे जारी सरकारी एड की तरह लगने लगता है। मेरी लंदन वापस जाने की बजाय वजीरिस्तान जाकर बच्चों को पढ़ाने लग जाती है.। इस कहानी का इतना सुखद अंत पचता नहीं है... मंसूर के हिस्से आया क्लाईमेक्स ज़्यादा अपील करता है। बहरहाल, फिल्म बेहद शानदार है।
इसे न देख पाए, और अच्छी फिल्में देखने के शौकीन हैं, तो ज़रूर कुछ मिस करेंगे। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए प्रासंगिक है। फिल्म समारोह से एकाध पुरस्कार बटोर ले जाए तो मुझे हैरत नहीं होगी।
मंजीत ठाकुर
फिल्म- ख़ुदा के लिए
समारोह में पाकिस्तान की पहली आधिकारिक प्रविष्टि फिल्म ख़ुदा के लिए (इन द नेम ऑफ गॉड) देखी। शोएब मंसूर की ३ घंटे की यह फिल्म निश्चित रूप से कायल कर जाती है। फिल्म की शुरुआत से ही कट्टरपंथ पर चोट निर्देशक अपेन खास अंदाज़ में करता चलता है। कहानी है एक ऐसे इंसान की जिसने खुद तो गोरी मेम से शादी की है (जिससे बाद में वह तलाक़ ले लेता है) लेकिन अपनी बेटी को वह किसी गोरे के साथ ब्याह करने की मंजूरी नहीं देता। खुद उसका भाई पाकिस्तान में रह रहा है, लेकिन वह उदारवादी है जसके दोनों बेटे संगीतकार हैं। लेकिन एक प्रभावशाली भाषण देने वाला, अपने तर्क से लाजवाब कर देने वाला धर्मांध जहीन इंसान सरमद (छोटे भाई) को इस्लाम की कट्टरवादी धारा की तरफ मोड़ने में कामयाब हो जाता है।
सरमद संगीत को इस्मामविरोधी मान कर तालिबानों में शामिल हो जाता है। बड़ा भाई उसे समझाने की कोशिश तो करता है, लेकिन बात बिगड़ती हुई देखता रह जाता है। बड़े भाई को संगीत की शिक्षा के लिए शिकागो जाना पड़ता है।उधर, मेरी का पिता उसे धोखे से लंदन से लाहौर ले आता है। फिर जबरन उसकी शादी सरमद के साथ वजीरिस्तान ले जाकर करा दी जाती है। इस बीच सीन-दर-सीन मौलवी साहब का धर्मोपदेश जारी रहता है। अमेरिका में इसी दौरान ११ सितंबर की घटना घट जाती है। सारे मुसलमानों पर मानो कहर टूट पड़ता है। मंसूर (बड़े भाई ) को गिरफ्तार कर लिया जाता है। फिर उस पर जुल्मोसितम की इंतिहा हो जाती है। हवालात में उससे बार-बार ओसामा बिन लादेन से उसेक संबंधों के बारे में पूछा जाता है। उसे पेशाब पीने के लिए बाध्य किया जाता है।
उधर मेरी वजीरिस्तान से भागने की नाकाम कोशिशें करती है। वह लंदन में रह रहे अपने प्रेमी को एक खत लिखती है। फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेरी को छुड़ाने की कवायद शुरु होती है। मेरी को छुडा़ लिया जाता है। फिर लाहौर की अदालत में मुकदमा चतलता है। सरमद और मेरी की संतान का वारिस कौन होगा... या इस्लाम में जबरिया शादी की इजाज़त है या नहीं। एक लंबी जिरह होती है, जिसमें इस्लाम के कुछ हिस्सों की व्याख्या हमारे नसीर साहब करते हैं। फिल्म के अंत में मेरी लंदन जाने से इंकार कर देती है, और वजीरिस्तान वापस जाकर बच्चो को पढ़ाने का जिम्मा लेती है।
जारी
Saturday, November 24, 2007
फिल्म ४ मंथ्स...- पुनर्मूल्यांकन
कल ओपनिंग सेरेमनी में रोमानिया की पूरी फिल्म देखने को मिली। फिल्म की शुरुआत होती है एक लड़की की भागदौड़ से। लड़की अपनी दोस्त के लिए एक होटल का कमरा खोज रही होती है। इसी दौरान कॉलेज जाकर अपने पुरुष मित्र से मिलना.. उसकी मां के जन्मदिन पर जाकर फूल भंट करने का वादा भी करती है। यूं तो पूरी फिल्म में है , लेकिन शुरुआत के तीन सीन, सीन न रहकर सीक्वेंस बन जाते है। मौंगू (निर्देशक) का कैमरा पहले सीन में ४ मिनट और उसके अगले दृश्य में ७ मिनट तक कट नहीं होता। फिर के बाद एक कई ऐसे दृश्य आते हैं, जहां यह लगता है कि हम रियलिटी में हों। वर्चु्अलिटी का खात्मा हो जाता है। बहरहाल, लड़की जद्दोजहद करके एक होटल का कमरा खोज निकालती है।
कम्युनिस्ट शासन.. कड़ाई के दिन.. दर्शकों को लगता है कि लड़की अपने और अपने दोस्त के लिए एकांत की तलाश में हैं.. यह धारणा पुष्ट होती है तब जब वह किसी मि. बेबे को लेकर उस कमरे तक आती है। बातो ही बातों में पता चलता है कि बेबे महोदय चोरी-छिपे गर्भपात को अंजाम देते हैं। वह लड़ीक से जितनी रकम की मांग करते हैं, वह न तो उसके पास होता न ही उसकी सहेली के पास। याद रखना ज़रूरी है कि लड़की की सहेली गर्भवती है, लड़की नहीं। फिर पता यह चलता है कि लड़की को ५ माह का गर्भ है, जिसेक गर्भपात पर १०साल की कैद हो सकती है। यानी हत्या का मुदमा। डॉक्टर साबहब लड़की को कहते हैं कि वह यह काम महज कुछ हज़ार रुपयो के लिए नहीं करते बल्कि वह तो कुछ और मांग करते हैं। लड़की डॉक्टर के साथ हमबिस्तर होती है।.
..... कहानी पूरी तरह बताना मेरे बस में नहीं... फिर खेल शुरु होता है कि किस तरह पेट में पल रहे बिना जन्मे बच्चे को क्रूरता से वह डॉक्टर मार डालता है।फिल्म के आखिर में पता चलता है कि अपनी सहेली की सहायता के के लिए डॉक्टर के साथ हमबिस्तर होने वाली लड़की खुद गर्भवती हो गई है. उसके पेट में उसी डॉक्टर का गर्भ पल रहा होता है। फिल्म आपोक सन्नाटे में छोड़ देती है। कुछ महसूस करने के लिए.... रोमानिया में गर्भपात पर से कानूनी अड़चन हटने के बाद किस तरह से गर्भपातों के मामले बढ़ गए , इसका जिक्र हम पहले ही कर चुके हैं. २ साल में १० लाख गर्भपात...
४ मंथ्स... का कैमरा शानदार है, उससे भी शानदार है निर्देशन क्रिस्टीन मोंगू का। गर्भपात वाले दृश्य में एक पल के लिए तो कलेजा मुंह को आने लग जाता है। हालांकि हमने जहां देखा वह हॉल साउंड के लिहाज से उत्तम नहीं कहा जा सकता ..लेकिन तब भी जितना हम महसूस कर सकते थे, सिनेमैटोग्राफी और साउंड ने..गीले-गीले वातावरण बारिश और बरफीले माहौल ने कहानी के मौतनुमा वातावरण को सिरजने में मदद ही दी है।
बहरहाल, मनीष झा की फिल्म मातृभूमि की चर्चा किए बगैर मैं नही रह सकता..कहना होगा कि मातृभूमि एक तरह से इस फिल्म का तीसरा अध्याय है। दूसरा अध्याय कोई और बनाएगा. जो अभी अधूरा रह रहा है।
मंजीत ठाकुर
कम्युनिस्ट शासन.. कड़ाई के दिन.. दर्शकों को लगता है कि लड़की अपने और अपने दोस्त के लिए एकांत की तलाश में हैं.. यह धारणा पुष्ट होती है तब जब वह किसी मि. बेबे को लेकर उस कमरे तक आती है। बातो ही बातों में पता चलता है कि बेबे महोदय चोरी-छिपे गर्भपात को अंजाम देते हैं। वह लड़ीक से जितनी रकम की मांग करते हैं, वह न तो उसके पास होता न ही उसकी सहेली के पास। याद रखना ज़रूरी है कि लड़की की सहेली गर्भवती है, लड़की नहीं। फिर पता यह चलता है कि लड़की को ५ माह का गर्भ है, जिसेक गर्भपात पर १०साल की कैद हो सकती है। यानी हत्या का मुदमा। डॉक्टर साबहब लड़की को कहते हैं कि वह यह काम महज कुछ हज़ार रुपयो के लिए नहीं करते बल्कि वह तो कुछ और मांग करते हैं। लड़की डॉक्टर के साथ हमबिस्तर होती है।.
..... कहानी पूरी तरह बताना मेरे बस में नहीं... फिर खेल शुरु होता है कि किस तरह पेट में पल रहे बिना जन्मे बच्चे को क्रूरता से वह डॉक्टर मार डालता है।फिल्म के आखिर में पता चलता है कि अपनी सहेली की सहायता के के लिए डॉक्टर के साथ हमबिस्तर होने वाली लड़की खुद गर्भवती हो गई है. उसके पेट में उसी डॉक्टर का गर्भ पल रहा होता है। फिल्म आपोक सन्नाटे में छोड़ देती है। कुछ महसूस करने के लिए.... रोमानिया में गर्भपात पर से कानूनी अड़चन हटने के बाद किस तरह से गर्भपातों के मामले बढ़ गए , इसका जिक्र हम पहले ही कर चुके हैं. २ साल में १० लाख गर्भपात...
४ मंथ्स... का कैमरा शानदार है, उससे भी शानदार है निर्देशन क्रिस्टीन मोंगू का। गर्भपात वाले दृश्य में एक पल के लिए तो कलेजा मुंह को आने लग जाता है। हालांकि हमने जहां देखा वह हॉल साउंड के लिहाज से उत्तम नहीं कहा जा सकता ..लेकिन तब भी जितना हम महसूस कर सकते थे, सिनेमैटोग्राफी और साउंड ने..गीले-गीले वातावरण बारिश और बरफीले माहौल ने कहानी के मौतनुमा वातावरण को सिरजने में मदद ही दी है।
बहरहाल, मनीष झा की फिल्म मातृभूमि की चर्चा किए बगैर मैं नही रह सकता..कहना होगा कि मातृभूमि एक तरह से इस फिल्म का तीसरा अध्याय है। दूसरा अध्याय कोई और बनाएगा. जो अभी अधूरा रह रहा है।
मंजीत ठाकुर
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