Saturday, July 8, 2017

टाइम मशीन चारः अमर्ष

सती के अथाह प्रेम में डूबे शिव उनकी बेजान देह लिए हिमालय की घाटियों-दर्रों में भटकते रहे. न खाने की सुध, न ध्यान-योग की. सृष्टि में हलचल मच गई, सूर्य-चंद्र-वायु-वर्षा सबका चक्र गड़बड़ हो गया.
तारकासुर ने हमलाकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था. प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठी थी. तारकासुर की अंत केवल शिव की संतान ही कर सकती थी, सो ब्रह्मा चाहते थे कि अब किसी भी तरह शिव का विवाह हो जाए. बिष्णु ने अपने चक्र से सती की देह का अंत तो कर दिया, लेकिन महादेव का बैराग बना रहा.
चतुर इंद्र ने प्रेम के देवता कामदेव को बुलाया था.
कामदेव जानते थे शिव को. उनकी साधना के स्तर को और उनके प्रचंड क्रोध को भी. इंद्र का आदेश था तो कामदेव ने डरते-डरते हां कर दी थी।

कामदेव कैलाश पहुंचे तो वहां का बर्फ़ीला वातावरण देखकर निराश हो गए. इस निर्जन में साधना-तपस्या तो की जा सकती है, प्रेम के लिए यह जगह उपयुक्त नहीं. कामदेव ने कैलाश के इस बर्फीले मौसम को वसन्त में बदल दिया. हल्की-हल्की बयार बहने लगी, पत्थरों की जगह फूल खिल गए, भौंरो की गुनगुनाहट गूंजने लगी, हवा में खुशबू तैरने लगी और पूरे माहौल में फगुनाहट चढ़ आया. नदियों का कल-कल बहता पानी, फूलों की क्यारियां...प्रेम के लिए ज़रूरी हर चीज पैदा कर दी थी कामदेव ने।
लेकिन कामदेव भूल गए थे शिव को कौन बांध सका है आजतक...जिसकी मरजी से हवाएं चलती हों, सूरज निकलता हो, चांद-सितारे जगमगाते हों, धरती घूमती हो, समंदर में लहरें उछाहें मारती हो, उसको कामदेव बांधने चले थे!
कामदेव ने अपने प्रेम की प्रत्यंचा पर पुष्पबाण चढ़ाकर शिव की तरफ मोड़ा ही था कि अचानक मौसम बदल गया. नदियों का पानी खौलने लगा, धरती में दरारें पड़ गई और उनसे लावा बहने लगा. भयानक भू-स्खलन हुआ. जोर के बवंडर में शिव की तीसरी आंख खुल गई थी।
पलभर में कामदेव की देह में आग लग गई और वह भस्म होकर राख बन गए.

Friday, July 7, 2017

ये जो देस है मेराः बूंद चली पाताल

बुंदेलखंड हमेशा से कम बारिश वाला इलाका रहा है, लेकिन 2002 से लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया है. यह जमीनी रिपोर्ट बताती है कि बुंदेलखंड को ईमानदार कोशिशों की ज़रूरत है. साफ-सुथरी सरकारी मशीनरी अगर आम लोगों को साथ लेकर कोशिश करे तो सूखता जा रहा बुंदेलखंड शायद फिर जी उठे.

मैंने देश के विभिन्न इलाकों में माइनर विस्थापनों पर और अल्पविकसितइलाकों की स्थिति पर बहुत लंबे समय तक नजर रखने के बाद एक किताब लिखी हैः ये जो देस है मेरा। इस किताब का पहला अध्याय, 'बूंद चली पाताल' बुंदेलखंड की समस्या पर आधारित है.

किस तरह पानी ने बुंदेलखंड को बेपानी बना दिया है, उसकी रपट में मैंने केस स्टडीज और आंकड़ो का सहारा लिया है. कुछ परंपरा की बातें भी हैं, हल्के फुल्के इतिहास की भी.  इसमें, जरूरी आंकड़े भी हैं, ताकि सनद रहे और वक्त पड़ने पर काम आए. कोशिश की है, ज़रूर कुछ न कुछ छूट गया होगा, लेकिन उसे मानवीय भूल माना जाए.

इस किताब के छपने में रेणु अगाल जी के साथ, रेयाज़ुल हक़ का भारी योगदान है. जिन्होंने तकरीबन डांट-डांटकर मुझसे लिखवाया. अन्यथा मैं पर्याप्त या पर्याप्त से भी अधिक आलसी हूं.

पुस्तक अंशः

बुंदेलखंड का नाम हमेशा सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियों की याद दिलाता रहा है, बुंदेले-हरबोलों के मुंह सुनी गई कहानियों वाला बुंदेलखंड। जिसके नाम से आल्हा-ऊदल याद आते रहे, जा दिन जनम लियो आल्हा ने, धरती धंसी अढाई हाथ...। महोबे का पान, और चंबल का पानीः बुंदेलखंड के बारे में अच्छा-अच्छा सा बहुत कुछ सुना था।
बुंदेलखंड की जिस माटी के गुण कवि गाते नहीं थकते थे, लगता है वह माटी ही थक चली है। सुजला, सुफला, शस्य-श्यामला धरती बंजर बनती जा रही है। कुछ तो सूखे ने, कुछ सूखे की वजह से कर्ज़ ने, और बाकी बैंकों-साहूकारों के छल-कपट-प्रपंच ने बुंदेलखंड को किसानों की नई क़ब्रगाह बना दिया है।

बुंदेलखंड की धरती का सच, अब न तो आल्हा-ऊदल जैसे वीर हैं, न कीरत सागर, मदन सागर जैसे पारंपरिक तालाबों वाली उसकी पहचान। अब शायद किसानों की आत्महत्या और व्यापक पलायन ही इसकी पहचान बन गया है। बुंदेलखंड की अंदरूनी तस्वीर भयानक और अंदर तक हिला देने वाली है। बुंदेलखंड के किसानों में आत्महत्या की एक प्रवृत्ति हावी होने लगी है। बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट, छतरपुर ज़िलों में न जाने कितने गांव हैं, जहां ज़्यादातर घरों में दरवाज़ों पर ताले लटक रहे हैं। हर गांव में ऐसे घर हैं, जिनमें अकेले बुज़ुर्ग बचे हैं और जो भूख से रिरियाते फिर रहे हैं। गांव के कई घरों में सिर्फ़ महिलाएं बची हैं। सात ज़िलों के चालीस फ़ीसदी से ज़्यादा लोग इलाक़े से पलायन कर गए हैं। इतनी बड़ी आबादी दिल्ली में रिक्शा चलाती है, इटावा में ईंट-भट्ठों पर काम करती है, सूरत में मज़दूरी करती है।
खाली घरों और घरवालों को अपने प्रियजनों की वापसी की इंतज़ार है और धरती को पानी का।

जीने की जानलेवा शर्तः कर्ज़

गढ़ा गांव में ही सुराजी का घर भी है। उनके घर में दो मौतें हुई हैं। राज्य सरकार के अधिकारी उनके घर की आत्महत्याओं को भी ‘गृह-कलह’ से हुई मौतें बताते हैं। सुराजी के घर में नितांत अकेलापन पसरा रहता है। बीवी बहुत पहले भगवान को प्यारी हो गई। सुराजी की एकमात्र पोती का ब्याह हो गया तो सुराजी ने चैन की सांस ली थी। 2010 में एक दिन जब पोती अपने पति के साथ घर आई तो हालात सूखे की वजह से बदतर हो चुके थे।
बताते हुए सुराजी की आंखें डबडबा जाती हैं, ‘पिछले ही साल, पोती और उसके पति पहली बार अपने घर आए, घर में सेर भर भी गल्ला (अनाज) नहीं था।’ इसी अपमान से भरे सुराजी के बेटे ने पास के नीम के पेड़ से फांसी लगा ली। सुराजी तर्जनी से सामने नीम का पेड़ दिखाते हैं। पिता की आत्महत्या के अपराधबोध में पोती ने भी जान दे दी। सुराजी के दुख में सारा गढ़ा गांव साथ है। लेकिन गांव के हर किसी के साथ परिस्थितियां कमोबेश ऐसी ही हैं।
नीम का वह पेड़ गांव भर के लिए अपशगुन का प्रतीक बन गया है, और यह अब भी हरा है, उस पर सुराजी की आहों का कोई असर नहीं हुआ है।

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बुंदेलखंड में आत्महत्या करने वाले किसानों की गिनती उत्तर प्रदेश सरकार के आंकड़ों से काफी ज़्यादा है। राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में 56 और 2016 में 163 किसानों ने आत्महत्या की और उनकी मौत की वजहें भी कुछ अलग ही रहीं। लेकिन, इलाके में काम कर रहे किसान नेता शिवनारायण सिंह परिहार के पास एक ऐसी डायरी है जिसमें तस्वीरों के साथ किसानों के नाम-पते दर्ज़ हैं जिन्होंने कर्ज़ के मर्ज़ से छुटकारा पाने का रास्ता मौत को ही समझा। शिवनारायण ने काले रंग की इस डायरी को ‘मौत की डायरी’ नाम दिया है और यह राज्य सरकार के आंकड़ों को मृतक किसानों के नाम-पते के साथ झुठलाती है। इस डायरी के मुताबिक, पिछले 20 महीनों में उप्र के तहत बुंदेलखंड के सात ज़िलों में करीब साढ़े आठ सौ किसानों ने आत्महत्या कर ली है।

पिछले दो साल भी खेती की हालत कुछ ठीक नहीं रही है और उत्तर प्रदेश सरकार भी अपनी रिपोर्ट में 2015-16 में खरीफ की फसल में 70 फीसदी का नुकसान मान रही है। अकेले बांदा में 95,184 हेक्टेयर रकबे में दलहन और तिल की खेती चौपट हुई है। यहां छोटे सीमांत किसानों ने 68,241 हेक्टयेर में तिल, ज्वार, बाजरा, अरहर और धान बोया था, जिसकी लागत भी वसूल नहीं हो सकी।
बुंदेलखंड के सभी तेरह ज़िलों में साल 2010-2015 के बीच कुल मिलाकर करीब 3000 किसानों ने आत्महत्या की है। यह आत्महत्याओं का आधिकारिक आंकड़ा है जो राष्ट्रीय मीडिया में कभी-कभार और उस इलाके में अमूमन सुर्ख़ियां पाता रहता है। इसमें आत्महत्या की कोशिशों के मामले शामिल नहीं हैं, क्योंकि आत्महत्याओं की गिनती करते वक़्त उन्हें नहीं गिना जाता। इसके बावजूद अगर नज़र रखी जाए, तो बुंदेलखंड में हर तीसरे दिन किसी न किसी ज़िले से किसी न किसी किसान की आत्महत्या की ख़बर आ ही जाती है।

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Tuesday, July 4, 2017

टाइम मशीन 3ः शिवः बैराग

अपने घर विशाल यज्ञ की सफलता से सम्मोहित दक्ष प्रजापति ने समारोह में दामाद शिव को न्योता नहीं दिया था. अभिमान से बेटी सती को सुनाया था दक्ष नेः "अघोरी शिव देवताओं में उठने-बैठने लायक नहीं. देवताओं से लकदक कपड़े, सुगंधित तेल-फुलेल और कीमती गहने...कुछ भी तो नहीं पाखंडी शिव के पास." सती की बहनें ओट से खिलखिला पड़ी थीं।

सती का चेहरा गुस्से और अपमान से लाल पड़ता चला गया। उसके खुद के पिता ने त्यागी, सहनशील, सबसे प्रेम करने वाले शिव को पाखंडी कहा! सती गुस्से में भर उठीः मान-अपमान से परे शिव विषपायी हैं तो वह तांडव भी करते हैं!

मानो यह चेतावनी थी आने वाले विनाश की...और देखते ही देखते सती विशाल यज्ञकुंड के भीतर कूद गई थीं.

सन्नाटा छा गया। ऋषियों का मंत्रजाप रुक गया। मंडप के किनारे बज रही वीणाओं की झनकार थम गई। लोगो की मानो सांस रूक गई। सूरज की रौशनी का तेज खत्म हो गया, हवा भी स्थिर हो गई।

दक्ष को काटो तो खून नहीं। वह शिव के विरोधी तो थे लेकिन उनकी अपनी ही बेटी उनकी दुश्मनी की बलि चढ़ गई थी। सती की मां आंगन में पछाड़े खा-खाकर रोने लगी थीं।

पता नहीं कैसे, अचानक चारों तरफ से काले-काले बादल घिर आए थे। घुप्प अंधेरा छा गया। तेज़ हवाएं चलने लगीं। इस मौसम में बारिश नहीं होती थी कभी दक्ष के राज्य में, लेकिन आसमान से कड़कती बिजली के बीच न जाने कैसे मोटे-मोटे बड़े-बड़े ओले गिरने लगे, और बारिश की तो मत पूछिए। धारासार! इतनी जोरदार बरसात कि एक हाथ दूर कुछ नजर न आता था। सारे देवता और आम लोग मंडप से उठकर ओट की तलाश करने लगे थे।

अंधेरे और बरसात के बीच कुछ भी तभी नजर आता था, जब बादलों में तेज़ बिजली कड़कती थी। महल और मंडप की सारी रौशनियां पहले ही बुझ गई थीं। घुप्प अंधेरे में बस एक रौशनी थी, उस हवन कुंड की, जिसमें सती ने कूदकर जान दे दी थी। पवित्र माहौल अचानक डरावना हो गया था।

हवन कुंड की बुझी हुई आग में से बस लाल रंग के अंगारों की रौशनी थी और उसी रौशनी में सबने देखाः जटाएं खोले, हाथों में त्रिशूल लिए, बाघों की खाल कमर में लपेटे, एक भयानक-सा साया वहां खड़ा है। भयानक सायाः जी नहीं, यह तो गुस्से में भरे शिव खुद आ पहुंचे थे। रुद्राक्ष की मालाएं टूटकर नीचे बिखर गईं थी। जिधर देखो सांप ही सांप नजर आ रहे थे।

सती के अंगरक्षक बनकर आए वीरभद्र के ललकारते ही शिव के गण डमरू बजाते हुए पूरे आंगन में फैल गए। लोग सिहर उठे। डमरू की आवाज उस वक्त हमेशा की तरह आशीर्वाद जैसी नहीं, बल्कि दहशत लाने वाली लग रही थी और लग रहा था शिव डमरू की ताल पर नाच रहे होः तांडव नाच।

हर कोई बस अपनी सांस रोके अगली घटना का इंतजार कर रहा था।

पलक तक नहीं झपका सका था कोई कि दक्ष प्रजापति का कटा हुआ सिर आंगन में लुढ़कता हुआ नज़र आया। हर कोई खामोश था। सब जानते थे गलती दक्ष की थी। सबने उसके बाद इतना ही देखाः शिव ने हवनकुंड में सती की बेजान देह उठाकर कंधे पर रखी और चल दिए। 


इसकी पूरी कहानी को आप यहां य़ू-ट्यूब पर सुन सकते हैं---
शिव-सती की कहानी

Friday, June 30, 2017

टाइम मशीन 2ः क़िस्सा नल-दमयंती

नल को दमयंती से प्यार था और दमयंती को नल से. न कभी मिले, न कभी देखा...बस आवाज़ सुनी. दोनों सपनों में एक-दूसरे को देखते, कभी कश्मीर की वादियों में मिलते. चिनार के नीचे बिछी बर्फ़ीली चादर पर अंधेरी रातों में चलते, नश्तर चुभोती हवा में हाथ थामे सबसे चमकते तारे को निहारते और फिर सीसीडी के भीतर जाकर हॉट-चाकलेट और ब्राउनी ऑर्डर करते. 

वे कभी जंगलों में मिलते, कभी रेगिस्तान में. कभी दमयंती नल को अपने हाथों से आलू के परांठे खिलाती, कभी दोनों साथ झूले पर झूलते हुए अतीत और भविष्य बतियाते.
लेकिन दोनों कभी मिले नहीं थे. 

...और अब दमयंती का स्वयंवर था. स्वयंवर में दिलेर और सुंदर राजकुमारों, कमनीय देवताओं की भीड़ में नल कहीं दुबका हुआ था.
देवताओं को भी दमयंती पसंद थी और उनतक दमयंती के मुहब्बत के क़िस्से पहुंच चुके थे. आनन-फानन में देवताओं ने नल का बाना धर लिया. दमयंती परेशान. पांच-पांच नल जैसे लोग! कौन है असली?
दमयंती पास गई तो देखाः पांच में से सिर्फ एक की परछाईं है, माथे पर पसीने की बूंद है, देह की एक ख़ास गंध है, जिसे सूंघकर दमयंती ने कहा था- "मुझे तुम पसंद हो. तुम्हारी गंध भी."

दमयंती ने पसीने-देहगंध और परछाईं वाले इंसान नल को चुन लिया.

#टाइममशीन #एकदा #प्रेमकहानी

Monday, June 19, 2017

टाइम मशीन 1ः फौलाद

दोनों बालकों को दीवार में चिनवाया जा रहा था. मिस्त्री एक-एक ईंट रखता और दीवार ऊंची हो जाती. सरहिन्द के दीवान सुच्चा सिंह ने कई बार दोनों को समझाने की कोशिश की थीः इस्लाम अपना लो. आखिर, दोनों की उम्र ही क्या थी? बड़ावाला जोरावर सिंह करीब आठ साल का, और दूसरा फतेह तो सिर्फ छह का. लेकिन दोनों बालक तो मानो फौलाद के बने थे. डिगे तक नहीं. डिगते भी क्यों? आखिर दोनों फौलादी शख्सियत गुरु गोविन्द सिंह के बेटे थे. 

इनके दो भाई चमकौर में वीरगति हासिल कर चुके थे और इनके दादा गुरू तेगबहादुर ने दिल्ली में शहादत दी थी.
अचानक जोरावर की आंखों से आंसू बहने लगे थे. धारासार.
सुच्चा सिंह को लगा, शायद बच्चा डर गया हो, अब बात मान ले.
सुच्चा सिंह ने पूछाः क्यों जोरावर डर लग रहा है? रो क्यों रहे हो?
“दीवान साहब, डरते तो मुर्गे-तीतर हैं. हम क्यों डरें, हम तो दशमेश के बेटे हैं. ये आंसू तो इसलिए निकल रहे हैं क्योंकि मैं पैदा तो फतेह के बाद हुआ लेकिन आज शहादत की बारी आई, तो वह मुझसे पहले शहीद का दर्जा पा लेगा. मैं लंबा हूं न...”
सुच्चा सिंह अवाक् रह गया. दीवार चिनती गई, ऊंची...और ऊंची.

Tuesday, June 13, 2017

धूप लिफाफे में

दिल्ली में मौसम मां-बाप की लड़ाई सरीखा हो गया है।

दिल्ली की धूप हमारे जमाने के मास्टर की संटी सरीखा करंटी हुआ करती है। हमारे जमाने इसलिए कहा, काहे कि आज के मास्टर बच्चों को कहां पीट पाते हैं?

दिन की धूप में बाप-सा कड़ापन है। होमवर्क नहीं किया, ज्यादा देर खेल लिए, पड़ोसी के बच्चे से लड़ लिए, किसी के पेड़ से अमरूद तोड़ लाए...ले थप्पड़, दे थप्पड़। बस बीच में मां के आंचल की तरह कहीं से झोंका आता है बारिश का...मां का लाड़ बीच में कूद पड़ता है। यों कि अब बाबू जी के अनुशासन और मां के लाड़ के खींचतान में बच्चे की तो दुविधा द्विगुणित हो जाए।

अब धूप का रंग बाबूजी से मिला ही दिया है तो उसके भी कई तेवर हैं...सुबह की धूप, सुबह 11 बजे की धूप, दोपहर की सिर पर तैनात धूप...खेल के वक्त की कनपटी पर पड़ती धूप, ड्रिल मास्टर सरीखी...शाम की धूप विदा कहती प्रेमिका-सी, जाड़े की धूप, भादो के दोपहर की धूप...और न जाने कितने रंग हैं।


रघुवीर सहाय को ये रंग तो कई तरीके का नजर आया हैः

‘एक रंग होता है नीला,
और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है,
इसी तरह लाल भी लाल नहीं है,
बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग,
दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है,
सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है,
और कोई एक रंग जो तेरी बांह पर पड़ा हुआ है।’


धूप पिताजी के अवतार में है, पापा के भी, डैडी के भी...अलग अलग लोगों के लिए अलग-अलग संबोधन..अलग चरित्र। मोंटेक की धूप, मनमोहन की धूप, जेटली-मोदी और शाह की धूप, शिवराज की धूप और विजय माल्या की धूप...मेरे, आपके और एक मजदूर की धूप में अंतर तो होगा ना।

धूप में पसीना बहाना...कुछ ऐसा मानो कह रहा हो, आदमी जब तक हारता रहता है जिंदा रहता है। जब जीतने लगता है आदमी नहीं रहता।

लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित ही है...धूप बाप-सा तीखा क्यों हो गया।लेकिन जो भी हो, यह धूप इंसान को लड़ना सिखाता है। कनपटी से बहता पसीनी बेरोकटोक यहां-वहां, जहां-तहां जा रहा है। आपकी मेहनत का द्रवीकृत रूप पसीना है तो वाष्पीकृत रूप आपके देह की गंध।


इस गंध का आनंद लीजिए जब बालो में बेला के फूल खोंसे आपकी प्रेयसी आपसे कान में फुसफुसाते हुए कहे, मुझे तुम्हारी देह की गंध पसंद है, तुम डियो मत लगाया करो।


आखिर में, शाहरुख खान को याद कीजिए, हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी, धूप है कभी कभी है छांव जिंदगी...जिंदगी में अभी धूप वाला दौर है।

Sunday, May 21, 2017

भावनाएं आहत होने की मूर्खता के पैमाने

सोशल मीडिया पर मूर्खता के तय पैमाने नहीं हैं। अगर मैं ऐसा कह रहा हूं तो इसके पीछे वैलिड रीज़न है। कई मिसालें है, लेकिन आज मिसाल दूंगा हालिया एक पोस्ट पर मचे हड़कंप की।

हड़कंप मचा है मुजफ्फरपुर नाउ नाम के एक फेसबुक ग्रुप पर। हड़कंप क्यों मचा और उसके बाद क्या हुआ उससे पहले ज़रूरी है कि अनु रॉय नाम की मुंबईवासी लेखिका का ओरिजिनल पोस्ट पढ़ा जाए।

अनु रॉय का ओरिजिनल पोस्टः

फेसबुक में एक ग्रुप पर लिखा अनु रॉय के पोस्ट का स्क्रीन शॉट


वो सारी लड़कियाँ चरित्रहीन होती हैं जो,

- शॉर्ट्स में घूमतीं हैं
- जिनके ब्रा का स्ट्रेप दिखता है
- जो सिगरेट पीती हैं नुक्कर पर खड़ी हो कर
- जो मंगलसूत्र टाँग कर नहीं घूमतीं
- जिनके पैरों में बिछुय्ये नहीं होते
- जो पिरीयड पर बात करती है खुले में
- जो शादी के बाद भी पुरुषों से बात करती है
-जिनके पुरुष मित्र शादी के बाद बनते है
- जो सिंदूर नहीं लगाती
- जो पति का फ़ोटो कलेजा से सटाये नहीं घूमतीं
- जो समाज के बनाए नियमों को तोड़ कुछ अलग करना चाहतीं हैं!


वो सबकी सब चरित्रहीन होती है! मुझे चरित्रहीन लड़कियाँ पसंद हैं क्यूँकि वो ज़िंदा हैं, सिर्फ़ साँस लेती चलती फिरती कठपुतलियाँ नहीं हैं। चरित्रहीनता से अगर तुम्हारा अस्तित्व है तो चरित्रहीन होने में कुछ ग़लत नहीं है। बाक़ी तो सीता को भी एक गँवार धोबी जज करता है और उसका पति छोड़ देता है उसे। और वही पति भगवान है! ख़ैर!

PS :- लिस्ट में कुछ रह गया हो तो बता देने कष्ट करें हम अप्डेट कर देंगे
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बहरहाल, लड़कियों के कपड़े पहनने पर मुजफ्फरपुर के लोगों के इस ग्रुप की भावनाएं आहत हो गईं। संभवतया लड़कियों का खुलकर बोलना इस ग्रुप के करीब एक लाख पैंसठ हजार लोगों को ठीक नहीं लगा। या यह भी हो सकता है, कि सीता पर उंगली उठाने वाले धोबी का गंवार कहना लोगों को पसंद नहीं आया। या राम पर उठा कोई भी सवाल ही नही जंचा लोगों को।

इस पोस्ट के बाद उस ग्रुप में अनु रॉय को दी जाने वाली धमकियां, निन्दात्मक टिप्पणियों, गाली-गलौज और इनबॉक्स में की जाने वाली अश्लील बातों से क्या साबित होता है? जो भी हो, लेकिन उस ग्रुप में कुछ लोगों ने कानूनी कार्रवाई की धकी दी तो ग्रुप के एडमिन ने पोस्ट डिलीट कर दी, पर मुझे नहीं लगता कि उस पोस्ट में ईशनिन्दा जैसा कुछ था। या राम के जिस काम पर उनके भक्त भी सवाल उठाते हैं, उस पर सवाल खड़ा किया जाना कहां से भावनाएं आहत करने वाला हो गया।

मैं एक बात और कहना चाहूंगा, उन मूर्खों से जो इस बात को राम का अपमान समझ बैठे। एक बार जरा मिथिला का दौरा कर आएं। राम मिथिला के जमाई हुए क्योंकि सीता से बियाहे गए। सो मिजाज़ के हिसाब से मिथिलावाले राम को अपने तरीके से बधाई देते हैं। लेकिन राम के लिए मिथिला के लोग आज भी उदासीन हैं।

रामचंद्र आज तक जवााब नहीं दे पाए कि वह सीता को अपनी मर्यादा पुरुषोत्तम वाली छवि की खातिर जीवन भर क्यों प्रताड़ित करते रहे। एक धोबी के बोल पर पत्नी को घर से निकाल दिया। यह भी नहीं सोचा कि वह आठ महीने की गर्भवती हैं, जबकि आठ महीने की गर्भवती स्त्री को लोग एहतियातन घर की चौखट से कदम बाहर नहीं करने देते। न कोई फरियाद का मौका दिया।

आज की तारीख में अगर यह सब होता तो भगवान् राम आज मिथिला के किसी कोर्ट में मुकदमे की हाजरी दे रहे होते। उन्हें खुद पर ही विश्वास नहीं था, जबकि वह एक बार खुद ही सीता की अग्नि-परीक्षा ले चुके थे।

यह तो रामचंद्र का खानदानी दोष है। पिता ने एक नौकरानी के कहने पर पुत्र को वनवास दे दिया और पुत्र ने एक धोबी के कहने पर वाइफ को। मिथिला के लोग, न तो अपनी बेटी की शादी विवाह-पंचमी के दिन करते हैं और ना ही बेटी को सीता जैसे भाग्य का आशीर्वाद देते हैं।

मिथिला के लोग विष्णु के इस अवतार के प्रति इतने उदासीन रहे कि मिथिला में रामायण 19वीं सदी के उत्तरार्ध में लिखा गया, जब चंदा झा विरचित रामायण को तत्कालीन दरभंगा नरेश लक्ष्मीश्वर सिंह ने छपवाया था। लेकिन इसका कारण धार्मिक कतई नहीं था। उस समय मैथिली को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए अभियान चल रहा था। लेकिन मैथिली विरोधी हिंदी की लॉबी ने तर्क दिया कि जिस भाषा (मैथिली) में रामायण जैसे क्लासिक की रचना नहीं की गयी हो, उस भाषा को स्कूली शिक्षा का माध्यम कैसे बनाया जा सकता है।

यह भी कहा जाता है कि कृतिवास ओझा की रचित रामायण मैथिली में ही लिखी गयी थी लेकिन आम लोगों की उदासीनता की वजह से वह रामायण लोगों के चित्त पर नहीं चढ़ पायी फलतः कृतिवास बंगाल चले गए। एक समय था कि जब अयोध्या रामाश्रयी संप्रदाय और ऐसे ही अन्य संप्रदायों का आध्यात्मिक केंद्र हुआ करता था लेकिन जब बाबर ने राम मंदिर तोड़ा और दूसरे धर्मांध मुगल शासकों ने धार्मिक उत्पीड़न शुरू किया, तब इन धर्मावलंबियों ने सीता के जन्मस्थल मिथिला का रुख करना शुरू कर दिया। लेकिन राम और उनको पूजने वाले वैष्णव मत को मिथिला ने आत्मा से स्वीकार नहीं किया।

वैष्णव अपने माथे पर तीन लकीरनुमा तिलक लगाते हैं तो आज भी उन्हें मिथिला में उपहास में 111 एक सौ ग्यारह और राम फटाका वाला महात्मा कहा जाता है। वह गले में तुलसी की माला पहनते हैं तो लोग उन्हें उपहास में कंठमलिया बोलते हैं। वैष्णव गुरु जब कभी भी किसी को मत में दीक्षित करते हैं तो उस व्यक्ति के कान में कुछ मंत्र पढ़ते हैं। और मिथिला में उन वैष्णव गुरुओं को कनफुसकी बाबा बोलते हैं। कभी कोई मैथिल हुआ करते थे जो शायद राम के प्रति अपने आशक्ति की वजह से विष्णुपुरी नाम से जाने जाते थे जब उन्होंने संन्यास ग्रहण करने का विचार किया तो समाज के लोगों ने उन्हें समाज से ही बहिष्कृत कर दिया। योगी जी को अयोध्या में राम मंदिर जरूर बनवा देना चाहिए, काहे कि पता नहीं कब किस दिन कोई चोटाया हुआ मैथिल लव-कुश की तरफ से टाइटल केस कर दे। जो सीता से बियाहे गये, सो भगवान् हुए वरना कहलाते रामचंद्र वल्द दशरथ 
जय सीता माई रहेगा।
पिछले दो दशक की राजनीति ने राम को सांप्रदायिक बना दिया है वरना उस ग्रुप के अहमकों को पता होता कि पहले मुसलमान भी राम-राम कहकर अभिवादन किया करते थे। आपने अपनी हिन्दुत्ववादी आक्रामकता को जय श्री राम में बदल दिया है। 

अनु रॉय की इस पोस्ट पर टिप्पणी करने वाले ज्यादातर लोग अनपढ़ ही लगे  मुझे। साक्षरता के संदर्भ में नहीं, दिमागी परिपक्वता के संदर्भ में। इनमें से ज्यादातर ने रामचरित मानस या रामायण (इसके बारे में छोड़ ही दीजिए, यह संस्कृत में है) पढ़ा नहीं होगा। राम के बारे में इनका अधिकतम ज्ञान रामानंद सागर या बाद के चैनलों पर चलने वाले धार्मिक सीरियलों से आय़ा होगा। 

एक बात तय है, पहली बात कि सीता के चरित्र पर सवाल करने वाला धोबी गंवार नहीं था, गंवार तो वे लोग है जिनका मर्दवादी अहंकार शॉर्ट्स पहनने वाली लड़की के पोस्ट को स्वीकार नहीं कर पाया. आहत हुए इन लोगों में ज्यादातर लोग सुबह सुबह वॉट्सएप पर जीजा-साली के जोक शेयर करने वाले लोग हैं। 

अब ग्रुप के एडमिन ने एक माफीनामा भी पोस्ट किया है। सोशल मीडिया पर बढ़ती इस--मैं असहिष्णुता नहीं कहूंगा--अहमकपने, मूर्खता और नीचता ने एक बात साबित कर दिया है। उसकी मिसाल मैं एक छोटी सी कहानी से दूंगा, जो आपने पहले सुन रखी होगीः
पानी में भींगते-ठिठुरते बंदर को चिड़िया ने देखा तो कहा, बंदर भैया आप भी अपना घर क्यों नहीं बनाते। जवाब में बंदर ने चिड़िया का घोंसला उजाड़ दियाः बड़ी आई, मुझे उपदेश देने वाली. 

फिलहाल सवाल यह है कि सोशल मीडिया पर इन ट्रोल या साइबर बुलीज़ पर कैसे नकेल कसी जाए। अनु रॉय के पास एक विकल्प है कि वह धमकी देने वालों के खिलाफ साइबर क्राइम समेत एफआईआर दर्ज करवाएं, ताकि मुजफ्फरपुर के इन कथित आहत लोगों को दो चार बार मुंबई पुलिस का लाफा पड़े तो भावनाओं के साथ कनपटी भी आहत हो।

बहरहाल, ट्रोल करने वाले इन बंदरों के हाथ में सोशल मीडिया का टूल आ गया है,  और इन्हें अदरक का स्वाद तो बिलकुल पता नहीं।