Monday, May 28, 2018

क्या मधुपुर बेतहाशा भागने से पहले थोड़ा सोचेगा?

मधुपुर डायरीः पहला दिन

मधुपुर में जब उतरा जो आदतन पूर्वा एक्सप्रेस कोई 4 घंटे लेट हो चुकी थी. बाहर प्लेटफॉरम पर बड़े भैया खड़े थे. हम लोग बाहर निकले तो मधुपुर पहले से अधिक साफ-सुथरा था, स्टेशन पर पान के पीक मौजूद तो थे, लेकिन पहले की तरह हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं करा रहे थे. गरमी काफी ज्यादा थी और स्टेशन के बाहर निकलते ही हम जिस तरह हमेशा चाय पिया करते, वह करने की हिम्मत नहीं हुई. 

मधुपुर लाओपाला पार्क में सेल्फी, साथ हैं भैया, रितुराज और अभिषेक


स्टेशन में कुछ अच्छे बदलाव दिख रहे थे. स्टेशन के अहाते के बीच मे लोहे की पटरी से बना गोलंबर जिसमें पहले गुलमोहर के पेड़ हुआ करते थे, अब कट गए थे और उसमें बढ़िया फूल-पत्तियां लगाई जा चुकी थीं.
 
शाम को हम तीन लोग, यानी मैं, मेरे मंझले भैया रतन ठाकुर, भतीजे रितुराज और अभिषेक बाहर की हवा लेने निकले. हमारे पड़ोस के मुहल्ले में केलाबागान में नया मंदिर बन रहा था. शहीद निर्मल महतो चौक यानी ग्लास फैक्ट्री मोड़ पर भी सब कुछ यथावत् था. वहां से हमलोग पहले के लाओपाला पार्क में घुस गए थे.

मधुपुर का लाओपाला पार्क अब अव्यवस्था का शिकार है. फोटोः मंजीत ठाकुर


हमारे ज़माने में यह पार्क शहर भर के लोग लुच्चों, उचक्कों, लफाड़ियों का अड्डा होता था, हालांकि ला-ओपाला ने इसे बहुत करीने से सजाया था. खैर, जिन लड़कों को अपने एकतरफा या दोतरफा प्यार का चेहरा देखना नसीब नहीं होता था वह यहां आकर दर्शन लाभ लिया करते थे.

लेकिन आज यह बेहद छोटा सा पार्क उपेक्षा का शिकार है.

मधुपुर के इस पार्क में कभी जमघट लगता था युवाओं का. फोटोः मंजीत ठाकुर

हम तीनों फिर भगत सिंह चौक होते हुए मधुपुर में बन रहे फ्लाईओवर देखते हुए (जी हां, फ्लाई ओवर्स पर अब सिर्फ बड़े शहरों का हक नहीं. मधुपुर जैसे छोटे शहर भी फ्लाईओवरों के चक्कर में हैं) गांधी चौक पर गए. गांधी चौक का नजारा भी बदला हुआ था. साफ-सफाई थी. न कहीं मिट्टी के कुल्हड़ों का ढेर था न कूड़ा था. जगह-जगह कूड़ेदान लगे थे. 
पंचमंदिर के पास लगे कूड़ेदान और पृष्ठभूमि में गोयठे फोटोः मंजीत ठाकुर


इतनी सफाई! वाकई प्रशासन इस मामले में दुरुस्त हुआ था. पर इसे बनाकर रखने की जिम्मेदारी तो सिर्फ और सिर्फ मधुपुर वासियों की ही है. मधुपुर के सामने यहां से दो रास्ते जाते हैं, पहलाः यहां से वह विकास की अंधी दौड़ में सामिल होकर कंक्रीट के जंगल में बदल सकता है. दूसरा, यहां से वह अपनी हरी-भरी विरासत, हरियाली, नदियों, झरनों को बचाते हुए देश भर के लिए मिसाल बन सकता है.

खूबसूरत लक्ष्मी-नारायण मंदिर फोटोः मंजीत ठाकुर


बहरहाल, गांधी चौक पर हमारे स्कूली मित्र अटल चौरसिया आने वाले थे और साथ में विजय सिंह और प्रमोद झा भी. कामयाब कारोबारी बन चुके अटल जी अपनी लंबी कार के साथ आए थे. विजय और प्रमोद ने अपनी बाइक गांधी चौक पर ही पार्क कर दीं और हम सब नीमतल्ला भेड़वा की तरफ निकल पडे. हल्की चांदनी में खुली हवा में मन कर रहा था खूब खींच-खींचकर सांस लूं और ऑक्सीजन अपने फेंफड़ों में भर लूं. गोकि दिल्ली में प्रदूषण ने फेफड़ो में कालिख भर दी होगी.

मधुपुर में गांधी चौक ने अपनी रंगत बदल दी है. पहले चाय के ठेलों से रौनक ज्यादा होती थी. फोटोः मंजीत ठाकुर


गांधी चौक पहले हमारा गजब का अड्डा हुआ करता था. जहां, कोने पर लिट्टी, मुड़ी-घुघनी, सिंघाड़े (समोसे) खाए जाते थे. चाय की अनेकानेक ठेलियां होती थीं, जिनमें एक रूपए की चाय पी जा सकती थी. कोल्हा डोसा बनाता था और छोटू की चाट मशहूर थी. लेकिन अभी वहां यह सब नहीं है. गांधी चौक पर रोजन ठाकुर के राजबोग और जिलेबियों का स्वाद तो नहीं ले पाया पर बर्दवान मिष्टान्न भंडार में राबड़ी चाभते वक्त पता चल गया कि क्यों इस दुकान ने कृष्णा स्वीट्स की रंगत फीकी कर दी है.

बहरहाल, इन्ही विषय़ों पर विजय, प्रमोद और अटल के साथ चर्चा में वक्त पंछी की तरह उड़ गया. फिर रात घिरने लगी थी और हम सब अपने घोंसलों में वापस लौट पड़े थे. 

अगले दिन का किस्सा कल.

Wednesday, May 9, 2018

विकास की दौड़ में मिथिला को नेहरू ने दिया था उपेक्षा का दंश

सन 2008 में जब कोसी में बाढ़ की वजह से मिथिला का एक बहुत बड़ा हिस्सा तबाह हुआ था, उस समय द टेलिग्राफ के स्वनामधन्य पत्रकार विजय देव झा ने कोशी पर एक ब्लॉग लिखा था कि कैसे स्वतंत्रता से पूर्व और यहां तक की बाद में दिल्ली और बिहार की सरकार ने मिथिला को कोसी की तबाही से जूझने के लिए बेसहारा छोड़ दिया था. इस आलेख पर पत्रकार हितेंद्र गुप्ता की नजर पड़ी और उन्होंने अपने ब्लॉग हेलो मिथिला में इसे छापा था.

इस लेख में घोघरडीहा के सरौती गाँव के कवि मोहम्मद अब्दुल रहमान की चर्चा की थी. इनके बारे में जानकारी विजयदेव झा को उनके बाबूजी डॉ रामदेव झा ने दी थी.

स्वतंत्रता से कुछ साल पहले कोशी की विभीषिका पर मोहम्मद अब्दुल रहमान ने काव्य रचना की थी जिसका नाम था "अकाल का हाहाकार उर्फ कोशी की तूफान".  रहमान जी ट्रेन में अपनी किताबें बेचते थे इस किताब पर अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था क्योंकि इन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से अंग्रेज़ी सरकार की पोल खोल दी थी. यह पुस्तिका कोशी की विभीषिका पर आधारित थी.

उसी समय श्री दिनेश मिश्रा कोशी पर एक पुस्तक लिख रहे थे इस आलेख पर उनकी नजर पड़ी उन्होंने विजय से  यह जानने के लिए संपर्क किया कि क्या मोहम्मद रहमान की वह किताब वह कहीं से मिल सकती है. 
आकाल का हाहाकार उर्फ कोशी की तूफान, साभारः विजयदेव झा


8 साल बाद वह दुर्लभ पुस्तिका विजयदेव जी को बाबूजी के संकलन से मिली. इसमें से एक कविता इस प्रकार से थीः

"दौड़ू दौड़ू हो सरकार

प्रजा सब दहाइए भैया कोशी के मझधार।।

चारू कात से कोशी माता घेरलक घर वो द्वार।

भागै के नै रास्ता छोड़लक काने काश्तकार।।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाते हैं जिन्होंने पूरे देश में कल कारखाने और बांध का जाल बिछाया. मिथिला के बच्चे भी पाठ्यक्रम में यही पढ़ा करते हैं. लेकिन आधुनिक भारत के निर्माता का संसाधन और संकल्प मिथिला तक आते आते समाप्त हो चुका था जिसकी कई वजहें थी.

देश की आजादी के तुरंत बाद पंजाब में अकाल का साया मंडराने लगा और उसी समय विशाल भाखड़ा नांगल डैम का निर्माण हुआ था.

मिथिला का कोशी की विभीषिका से कोई नया रिश्ता नहीं है. सरकार के पास भाखड़ा नांगल डैम बनाने के लिए पैसे तो थे लेकिन जब कोशी पर बांध बनाने की बात आई तो सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पैसे नहीं है इसलिए लोग श्रमदान कर बांध बना लें.

उस समय मिथिला राज्य के लिए आंदोलन करने वालों में अग्रणी मिथिला विभूति डॉ. लक्ष्मण झा ने चर्चा की थी कि ब्रिटिश सरकार ने जाते-जाते नेशनल डिजास्टर फंड के अंतर्गत कोशी पर बांध बनाने के लिए पैसे दिए थे जिसे नेहरू ने भाखड़ा नांगल डैम बनाने केेेे लिये डाइवर्ट कर दिया. लोगों में भारी आक्रोश था. इस काम के लिए पंडित नेहरू ने अपने वित्त मंत्री गुलजारी लाल नंदा को लगाया. उस समय अखबारोंं में गुलजारीलाल नंदा केे कई बयान छपे थे जिसमें उन्होंने मिथिला के लोगों से अपील की थी कि वे श्रमदान के माध्यम से बांध बनाएं क्योंकि सरकार के पास इतने पैसे नहीं हैं.

1954 में बांध बनाने के लिए ब्रह्मचारी श्री हरि नारायण के नेतृत्व में भारत सेवक समाज की स्थापना हुई और कोशी के कुछ हिस्सों पर लोगों ने खुद ही श्रमदान कर बांध बनाया था.

श्रमदान की शुरुआत मिथिला के 150 पंडितों के द्वारा हुई जिन्होंने वैदिक मंत्र और कोशी महात्म्य आदि के साथ विधिवत पूजा-पाठ करने के बाद कुदाल और फावड़ा उठाया. उस समय मिथिला के गणमान्य साहित्यकार और बुद्धिजीवियों ने लोगों की सहभागिता के लिए जनजागरण अभियान चलाया था.

स्कूली बच्चे, कॉलेज के छात्र, युवा, बुजुर्ग सभी बांध बनाने के अभियान में जुटे थे. कोशी क्षेत्र में कई जगह श्रमदान शिविर बने. मिथिला के विभिन्न कोने से लोग बांध बनानेेे के लिए पहुंच रहेे थे और कुछ एक वर्षों के अथक मेहनत के बाद भुतहा, कुनौली, महादेव मठ, डुमरा आदि कोशी के प्रवाह क्षेत्र में बांध बनकर तैयार हुआ.

लेकिन यह मिथिला के लोगों के लिए एक कटु अनुभव था कि आजादी से पूर्व ब्रिटिश सरकार ने मिथिला को अविकसित और अकिंचन बनाकर रखा था और आजादी के बाद भी अपनी सरकार मिथिला भूभाग के साथ सौतेला व्यवहार करती है. ललितेश्वर मल्लिक ने उस समय कोशी पर एक विशद पुस्तक प्रकाशित किया था. बाद में मिथिला के लोगों ने नेहरूजी को सड़ा आम उपहार में भेजा था.

प्रकृति के साथ साथ सरकारों ने भी मिथिला को क्षत-विक्षत और विभाजित करने में कोई कोताही नहीं की. एक योजना के तहत मिथिला के कोशी प्रक्षेत्र को शेष मिथिला भूमि से अलग-थलग रखा गया. कोशी हर एक साल अपना रास्ता बदलती रही और वह अपना रास्ता बदलते-बदलते पूर्णिया से दरभंगा तक पहुंच गई.

15 जनवरी, 1934 के भूकंप के बाद कोशी दरभंगा की तरफ आ गई. इस भूकंप ने मिथिला के रेल और सड़क यातायात को बुरी तरह से प्रभावित किया. निर्मली-सुपौल रेल लाइन क्षतिग्रस्त हो गयी. इस रेल लाइन को कभी भी दुरुस्त नहीं किया गया. इसका यातायात पर ऐसा असर पड़ा कि दरभंगा से सहरसा की दूरी तय करने में लोगों को 24 घंटे का समय लगताा था. बाद में तत्कालीन रेलवे मंत्री ललित नारायण मिश्र ने जानकी एक्सप्रेस चलाई जो लंबी परिक्रमा करने के बाद सहरसा पहुंचती थी, इसमें भी करीब 16 घंटे का समय लगता था. लेकिन देखा जाए तो दरभंगा और सहरसा की दूरी महज घंटे ढाई घण्टे की है.

मिथिला क्षेत्र अभी भी औपनिवेशिक त्रासदी से बाहर नहीं निकल पाया है. ब्रिटिश सरकार से लेकर स्वतंत्र भारत की सरकारों ने मिथिला को खंड-खंड में बांटकर रखने की पॉलिसी पर ही काम किया. सरकार योजनाबद्ध तरीके से मिथिला को धीरे-धीरे टुकड़ों में बांट रही है. मिथिला की जगह मिथिलांचल, पूर्णिया के इलाकों को सीमांचल भागलपुर के इलाकों को अंगिका मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और अब दरभंगा को भी बज्जिका क्षेत्र कहकर संबोधित किया जा रहा है जबकि ये सभी मिथिला के अखंड भाग हैं. 

कोसी क्षेत्र को मिथिला से अलग-थलग करने के पीछे भी यही राजनीति थी कि कालक्रम में इसे शेष मिथिला से अलग कोशिकांचल के रुप में स्थापित किया जाए. मिथिला के विभाजन के दर्द को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने समझा. कोसी महासेतु का निर्माण हुआ, सड़क मार्ग बने और रेल लाइन पुनर्निर्माण को सहमति दी गई.

यद्यपि मिथिला के लोगों ने अटल बिहारी वाजपेयी को लोकसभा चुनाव में मिथिला से ऐसा रिटर्न गिफ्ट दिया कि भविष्य में कभी भी किसी भलेमानस राजनेता की हिम्मत नहीं होगी कि वह मिथिला के हित के लिए कुछ करे.

मोहम्मद अब्दुल रहमान के पीछे अंग्रेज सरकार बुरी तरह पड़ गई थी. बाद में उन्होंने पाचक बेचना शुरू कर दिया लेकिन वह लोगों को कोशी की विभीषिका की कहानी बताते रहे. 1961 में विजयदेव झा के बाबूजी ने मिथिला मिहिर में रहमान पर एक विस्तृत लेख लिखा था. 

राजनीतिक मकड़जाल और उदासीनता के बीच मैथिल समाज मेमोरी लॉस के उस उच्चतम स्टेज तक पहुँच चुका है जहाँ उसे कुछ भी याद नहीं.

(यह लेख मूल रूप से विजयदेव झा के फेसबुक पेज से लिया गया है और उसे थोड़ा संपादित भर किया गया है)

...और क़यामत नहीं ही आई!

क़यामत भी नेताओं और माशूकाओं की तरह धोखेबाज़ है. आते-आते नहीं आती है. वायदा करती है और नहीं आती है.

कई दिनों से टीवी वाले चीख रहे थे, पाकिस्तान से धूल भरी आंधी से, यह उड़ जाएगा. तूफानी बारिश से वह बह जाएगा. मौसम विभाग ने स्कूल बंद करवा दिए, लोगों से घरों में दुबके रहने को कहा. कहा, किसी छोटे पेड़ के नीचे न खड़े हों. टीन-टप्पर का सहारा न लें. मजबूतों की शरण में जाएं. भाई, यह कर्नाटक चुनाव नहीं है कि हम किसी बड़ी पार्टी की ही शरण लें और टीन-टप्पर और पेड़ों जैसी छोटी जेबी पार्टियों से दूर रहें.

मौसम विभाग ने कहा, यह आंधी दूर तलक जाएगी. हम धड़कते दिल से घर से दफ्तर के लिए निकले थे. धड़कते दिल से तेज हवा और धूल का इंतजार कर रहे थे. धड़कते दिल से आसमान में चमकती हुई तेज गरजों और बिजली का इंतजार कर रहे थे, जिसको सुनते ही मचकती हुई प्रेमिका प्रेमियों से लिपट जाती है. और फिर पार्क में दो फूल आपस में टकरा जाते हैं.

ऐसे ही कई फिल्मों में वाक़या होता है कि ओलों वाली बारिश में लड़की भींग जाती है. बेसुध हो जाती है. उसके शरीर को गरमी की जरूरत होती है. कोई उपाय नहीं. कहीं न डॉक्टर न कुछ और मदद. किसी खंडहर में आसरा लिया नायक उसको अपनी देह की गरमी देता है. नतीजतन, कुछ दिनों बाद लड़की गर्भवती हो जाती है. कुछ कार्य-कारण संबंध सरीखा मामला दिखने लगता है. मुख्तसर यह कि हम डरे हुए थे और बड़े एंडवेंचरस से विचार आ रहे थे.

हम भी बड़ी शिद्दत से क़यामत का इंतज़ार कर रहे थे. हम बहुत नजदीक से देखना चाहते थे कि क़यामत आखिर होती कैसी है. सुना था क़यामत के रोज़ क़ब्र से मुरदे उठ खड़े होंगे और सबके पाप-पुण्य का हिसाब-किताब होना है.

फिर मन में बड़े गहन विचार उत्पन्न हुए आखिर क़यामत है क्या... लोगों ने समझाया कि इस के बाद धरती पर सारे लोग खत्म हो जाएंगे. धरती लोगों के रहने लायक नहीं रह जाएगी. एक सवाल अपने आप सेः धरती अभी लोगों के रहने लायक है क्या?

कुछ लोग अपनी महबूबा को क़यामत सरीखा मानते हैं, कुछ अपनी पत्नी को कहते तो शरीक-ए-हयात हैं लेकिन मानते क़यामत ही हैं. पहले पत्नियों वाली बात. बीवी को क़यामत ने मानने वालों के लिए, श्रीमतीजी का जन्मदिन, उनके भाई का जन्मदिन, अपनी शादी की सालगिरह की तारीख़ भूलकर देखिए (यद्यपि हमारा विचार है कि यह तारीख़ भूलने योग्य ही हुआ करती है.) आपके लिए वही तारीख़ क़यामत सरीखी हो जाएगी. उस दिन कायदे से क़यामत बरपा होगा आप पर.

आपकी महबूबा ने फोन पर आपसे कहा, फलां दिन मिलते हैं. किस जगह, किस वक़्त, ये बाद में बताने का वायदा. फिर आप तैयार होना शुरू करते हैं...सिगडी़ पर दिल सेंक रहा हूं, तेरा रास्ता देख रहा हूं, गुनगुनाते हुए...आपकी क़यामत सरीखी महबूबा, जिनकी आंखों, भौंहों, पलकों, अलकों (बाल की लटों) बालों, गालों, गाल पर के तिल, होठों, मुस्कुराहट, गरदन, ठोड़ी, कलाइयों, कलाई के ऊपर के एक और तिल, कमर सबको एक-एक कर आप पहले ही क़यामत बता चुके हैं.

सोमवार को आपने उनके चलने को क़यामत कहा था. मंगलवार को उनकी मुस्कुराहट से क़यामत आई थी. गुरुवार को उऩकी आवाज़ क़यामत सरीखी थी. शुक्रवार को वो क़यामत का पूरा पैकेज लग रही थी. मतलब सर से पैर तक क़यामत ही क़यामत. बहरहाल, आपने तय किया था कि इसी क़यामत से मिलकर क़यामत की घटना को सत्य ही घटित करना...लेकिन असली क़यामत की बारी तो अब आती है.

आप टापते रह जाते हैं. आपके जिगर पर छुरी चल जाती है. लड़को का जिगर प्रायः छुरियों के नीचे ही पड़ा रहता है. आपकी उनने कुछ किया या न किया, आपकी तरफ देखा, नहीं देखा, आपसे समय पूछा, हंसी, नहीं हंसी, आज उनने जीन्स पहनी है, आज उनने सलवार सूट पहना है, आज उन्होंने आपकी तरफ देखा, आज उनने आपकी तरफ देखकर थूका नहीं...आपको वह क़यामत लगेगी. आपके दिल पर छुरियां चल जाएगी.

बहरहाल, ये तो बहुत निजी क़िस्म की क़यामतें हैं. जहां प्रेमिकाएं अपने प्रेमी से फायरब्रिगेड मंगवाने की इल्तिजा करती हों, जहां प्रेमी को प्रेमिका का प्यार हुक्काबार लगे, या तस्वीर को फेविकोल से चिपका लिया जाए वहां बाकी की क़यामतों पर क्या नज़र जाएगी.

पिछले कुछ दिनों से क़यामत से सामना हो रहा है.

जरा उनसे पूछिए जो इन दिनों रेल से उर्दू वाला सफ़र करते हुए अंग्रेजी में भी सफर कर रहे हैं. जिन्ना साहेब के फोटो पर क़यामत बरपा हो रहा है. अभी खबर मिली कि अकबर रोड पर किसी ने महाराणा प्रताप रोड लिख दिया. यह बात और है कि पोस्टर लिखने वाला रोड का हिज्जे नहीं लिख पाया. पर सड़क का नाम अकबर रोड हो या तॉल्सतॉय रोड, महाराणा प्रताप रोड हो या शिवाजी रोड, मर्सिडीज से चलने वाले उस पर उसी तरह स्वैग से चलेंगे, चप्पल घिसने वाले घिसते ही रहेंगे. पैदल.

इन्ना-जिन्ना के चक्कर में हमारी फौज पर गर्व करने वाली सरकार ने नई योजनाओं के लिए मांगे गए बजट में से साढ़े 15 हजार करोड़ कम आवंटन दिए. फौज फटेहाल है. न नए हथियार हैं. पेंशन का बोझ है सो अलग. लेकिन 56 इंच सीने वाली सरकार फौज की झूठी तारीफ तो करता है, बस पैसे नहीं देती. समझने वाले चाहें तो इसे क़यामत समझ सकते हैं. ग़ोकि एक तरफ चिर-शत्रु पाकिस्तान और मौकापरस्त चीन ने हमला कर दिया तो जिन्ना की तस्वीर लेकर खड़े होने से भी पाकिस्तान नहीं मानने वाला.

इधर, राहुल गांधी बोलते भए कि अगर कांग्रेस को बहुमत आ गया (चिचा, यही तो शाश्वत प्रश्न है) तो वह प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं. राहुल भिया, यह सवाल क़यामत भरा ही है. मैं तो कहता हूं अगर मेरी पार्टी को बहुमत आ गया तो हम भी पीएम बन के ही मानेंगे.

वैसे प्रधानमंत्री भी कमाल हैं, राहुल को ललकारा उन्होंने की बिना कागज 15 मिनट बोल के दिखाएं (क़यामत यह कि इस मामले में राहुल की मां को घसीट लिया) लेकिन राहुल बाबा 15 मिनट बोल देते तो क़सम कलकत्ते की क़यामत उसी रोज़ आ जाती....

क़यामत भी नेताओ और माशूकाओँ की तरह धोखेबाज़ है. मौसम विभाग सांत्वना दे रहा है कि रुको बेटा, तूफान अगले तीन घंटे में दिल्ली में आएगा. मौसम बदलेगा. हम सूखे से त्रस्त किसान की तरह आसमान निहारते हैं. कयामत है आते, आते नहीं आती है. वायदा करती है और नहीं आती है.

Thursday, May 3, 2018

महाभारत का युद्ध असल में स्पैक्ट्रम हासिल करने की लड़ाई थी!

ठर्रा विद ठाकुर

गुड्डू भैया को आज अलग धज में देखकर मैं चौंक गया. क्या भैया, आज यह पूरे माथे पर त्रिपुंड और यह रामनामी चादर...क्या हो गया है आपको? और इस कमंडली में क्या है?

गुड्डू ने कमंडली में झांका और मुस्कुराते हुए कहाः कमंडली में तो वही है जो होना चाहिए. पूरे अद्धे में गंगाजल मिलाकर शुद्धोदक बना लिया है.

यह परिवर्तन कैसे भैया...

अरे, देख नहीं रहे हो. वामपंथ के पंथ पर चलने वाले राज्य त्रिपुरा के दक्षिणपंथी मुख्यमंत्री ने क्या कहा सुना तुमने? बिप्लव देब का बयान एक दम विप्लवी है. कह रहे हैं कि महाभारत काल में भी इंटरनेट था. उन्होंने कहा कि देश में महाभारत युग में भी तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध थीं, जिनमें इंटरनेट और सैटेलाइट भी शामिल थे. यह वह देश है, जिसमें महाभारत के दौरान संजय ने हस्तिनापुर में बैठकर धृतराष्ट्र को बताया था कि कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध में क्या हो रहा है. संजय इतनी दूर रहकर आंख से कैसे देख सकते हैं, सो, इसका मतलब है कि उस समय भी तकनीक, इंटरनेट और सैटेलाइट था.

सच क्या? मैं हैरत में पड़ गया. तो फिर उसके केबल किधर डले थे? मैंने सहज जिज्ञासा में मजाक कर दिया. गुड्डू भैया बोल पड़े, केबल वगैरह नहीं भी हो सकते हैं. लेकिन मेरी जिज्ञासा इस बात में अधिक है कि कौन कंपनी उस वक्त फ्री डेटा मुहैया करा रही थीं? सेवा 4जी थी या 3जी. स्पैक्ट्रम बंटवारे का ही झंझट कौरवों-पांडवों में था या कुछ और भी. नेट की स्पीड कैसे मापते थे?

गुड्डू भैया रुके नहीं. सुनो तो सही. बयानवीर ने और भी बहुत कुछ कहा है. बिप्लब के मुताबिक, डायना हेडन इंडियन ब्यूटी नहीं हैं. डायना हेडन की जीत फिक्स थी. उन्होंने कहा कि डायना हेडन भारतीय महिलाओं की सुंदरता की नुमाइंदगी नहीं करतीं. ऐश्वर्या राय करती हैं.

मैंने गुड्डू को रोकाः भैया, उन्होंने तो अपने बय़ान पर खेद जताया है बाद में.

लेकिन ठाकुर, वह रुके कहां हैं. बेरोजगारों को दी पान की दुकान खोलने और गाय पालने की नसीहत दे डाली और बाद में कहा कि

मैकेनिकल नहीं सिविल इंजीनियर्स दें सिविल सर्विसेज की परीक्षा बाकियों को समाज निर्माण में लगना चाहिए.

मुझसे रहा नहीं गया, भैया ये भाजपा के नेता अक्सर अपने बयान और अजीबो-गरीब वैज्ञानिक तर्कों को लेकर विवादों में रहते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई मंत्री सार्वजनिक मंचों पर ऐसी बातें कह चुके हैं कि जिनके कारण उनको हंसी का पात्र बनना पड़ा है.

मुझे हंसी तो आ रही थी कि लेकिन क्या पता ऐसा ही हुआ हो. आखिर मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे नेता को तरी-घटी का ज्यादा पता होगा न किसी आम आदमी की तुलना में?

गुड्डू के माथे से पसीना बह निकला और उनके त्रिपुंड का कुछ हिस्सा धुल सा गया, हथेली से उसे पोंछते हुए बोले, ये तो सिर्फ सीएम हैं. पीएम की मानो तो जलवायु परिवर्तन कुछ नहीं होता है. बढती उम्र के कारण लगती है ठंड. और यह बात नरेंद्र मोदी जी ने 5 सितंबर, 2014 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए देश भर के स्कूली बच्चों से सवाल-जवाब सत्र में कहा था. असम के एक छात्र ने पर्यावरण में आ रहे बदलावों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की और प्रधानंत्री से पूछा कि उनकी सरकार इसे रोकने के लिए क्या कदम उठा रही है. इस पर मोदी ने कहा कि हमारे बुजुर्ग हमेशा यह शिकायत करते हैं कि इस बार पिछले साल से अधिक ठंड है. असल में यह उनकी बढ़ती उम्र और सहने की कम होती शक्ति की वजह से उन्हें ज्यादा ठंड महसूस होती है.

इतना ही नहीं 2014 में एक निजी अस्पताल का उद्घाटन करते हुए तुम्हारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि, 'विश्व को प्लास्टिक सर्जरी का कौशल भारत की देन है. दुनिया में सबसे पहले गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी हुई थी, जब उनके सिर की जगह हाथी का सिर लगा दिया गया था.

गुड्डू भैया अभी चुप होने के मूड में नहीं थे.

तुम्हारे मंत्रियों ने तो चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत तक को गलत साबित कर दिया. वह भी ऐसे मंत्री ने जो पहले आईपीएस अधिकारी रह चुके हैं. केंद्र में मंत्री सत्यपाल सिंह एक कार्यक्रम के दौरान यह दावा करते नजर आए थे कि मानव के क्रमिक विकास का चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत ‘वैज्ञानिक रूप से गलत है’ और स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में इसे बदलने की जरूरत है.

बाप रे, मेरे मुंह से निकल ही गया.

गुड्डू भैया ने कमंडल से शुद्धोदक का लंबा घूंट भरा और कहाः आगे सुनो. राजस्थान के शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर ही दावा जता दिया था. उन्होंने कहा था कि, 'हम सब ने पढ़ा है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत न्यूटन ने दिया था, लेकिन गहराई में जानने पर पता चलेगा कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत न्यूटन से एक हजार वर्ष पूर्व ब्रह्मगुप्त द्वितीय ने दिया था.

बेचारे स्टीफन हॉकिंग कुछ दिन पहले गुजर गए. लेकिन भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने दावा किया था कि महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग भारतीय वेदों को अल्बर्ट आइंस्टाइन की महान थिअरी और सिद्धांत E=mc2 से काफी बेहतर मानते थे. हालांकि, जब हर्षवर्धन से इस दावे का प्रमाण मांगा गया, तो उन्होंने कहा, 'आप लोग सोर्स ढूंढें. इस बात का रेकॉर्ड है कि स्टीफन ने कहा था कि वेदों में इंस्टाइन के दिए फॉर्म्युले से बेहतर फॉर्म्युला है.

मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने आइआइटी के छात्रों को कहा था कि पुष्पक विमान से ही दुनिया में विमान बनाने का आइडिया आया. उन्होंने कहा कि 'राइट ब्रदर्स' से पहले ही एक भारतीय शिवकर बाबुजी तलपड़े ने एयरप्लेन का आविष्कार कर दिया था. कहा जाता है कि तलपड़े ने वैदिक ग्रंथों से ही उन्हें सबसे पहले एअरक्राफ्ट का आइडिया दिया था. दावा किया जाता है कि तलपड़े ने साल 1895 में मुंबई के जुहू बीच पर भीड़ के सामने इसका प्रदर्शन भी किया था. वहां बड़ौदा के राजा भी मौजूद थे. एयरक्राफ्ट 1500 फीट की ऊंचाई पर गया था और वहां कुछ मिनट रुका.

गुड्डू भैया, आप मजाक में कुछ कह दें, लेकिन सीधे-सीधे खारिज तो मत कीजिए भारतीय ज्ञान-विज्ञान को. प्राचीन भारत का साहित्य बेहद विपुल और विविधतासंपन्न है. हमारी विरासत में धर्म, दर्शन, भाषा, व्याकरण के साथ ही गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, रसायन, धातुकर्म, सैन्य विज्ञान जैसे विषयों का भी उल्लेख है. मिसाल के तौर पर, वैदिक साहित्य शून्य के कांसेप्ट, बीजगणित की तकनीकों तथा कलन-पद्धति, वर्गमूल, घनमूल के कांसेप्ट से भरा हुआ है. ऋग्वेद (2000 ईसापूर्व) में खगोलविज्ञान का उल्लेख है. 600 ईसापूर्व के भारतीय दार्शनिक कणाद ने परमाणु एवं आपेक्षिकता के सिद्धान्त का स्पष्ट उल्लेख किया है. इत्र का आसवन, गन्दकयुक्त द्रव, वर्ण और रंजकों (डाई और पिगमेंट्स) का निर्माण, शर्करा का निर्माण हमारी विरासत में रहा है. 800 ईसापूर्व में भारत में सुश्रुत और चरक ने आयुर्विज्ञान एवं शल्यकर्म पर पूरा ग्रंथ लिखा है.

सामवेद में सुरों का पूरा उल्लेख है. यानी वैदिक काल में ही ध्वनि और ध्वनिकी का सूक्ष्म अध्ययन शुरू हो चुका था. ग्रीक इतिहासकारों ने भारत में चौथी शताब्दी ईसापूर्व में ही धातुओं की स्मेल्टिंग का जिक्र किया है. हम लोहा बनाते थे भैया.

मुएनजोदड़ो एवं हड़प्पा से प्राप्त नगरीय सभयता उस समय में उन्नत सिविल इंजीनियरी एवं आर्किटेक्चर के अस्तित्व को प्रमाणित करती है. मैंने अपनी बात पूरी की तो गुड्डू मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देख रहे थे.

अच्छा हुआ जो तुमने परमाणु विज्ञान का जिक्र करते हुए एटम बम और ब्रह्मास्त्र को हाइड्रोजन बम नहीं बताया. पुष्पक विमान को हेलीकॉप्टर न बता दिया. तर्क वाली बात करोगे तो दुनिया सहमत होगी, लेकिन उन्हीं ज्ञान-विज्ञान की चीजों को धर्म से जोड़कर मूर्खतापूर्ण बयान दोगे तो सोशल मीडिया पर खिंचाई होगी ही.

मैं हैरत से गुड्डू का बात सुन रहा था. गुड्डू कुछ पलों के लिए रुके और बोले, देखो बे पत्रकार, ज्ञान की चार अवस्थाओं में से तीसरा और चौथा बड़ा खतरनाक होता है. तीसरा है, आप नहीं जानते हैं कि आप क्या जानते हैं और चौथा होता है आप नहीं जानते हैं कि आप क्या जानते हैं.

ददा, मैं प्रणाम की मुद्रा में झुककर बोलाः जाते-जाते जरा ज्ञान की पहली और दूसरी अवस्थाएं भी उचारिए.

गुड्डू मुस्कुरा उठेः शाम को चखने के साथ हवेली पर पधारो. रही बात बिल्लवी मुख्यमंत्री की, तो सुना है इस बयानवीर को दिल्ली से बुलावा आया है. पीएम से मिलकर शायद उनके बयान कम हो जाएं या कम से कम अनाप-शनाप तो न आएं. वह खीसें निपोरते हुए चल दिए और जाते-जाते मुनीश्वरलाल चिंतामणि की कविता गुनगुनाते गएः

मेरे भाई भोलेराम, तुम मूर्ख बने रहना,

कल्याण इसी में है तुम्हारा.

सच मानो बड़ी मस्ती है मूर्खता में,

कुछ रखा नहीं है विद्वता में.



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Monday, April 23, 2018

कृषि सरकार की प्राथमिकताओं में कहां खड़ी है?

खुदा का शुक्र है कि इस साल इंद्र भगवान भारत पर अपनी कृपा बनाएंगे. इस साल मौसम विभाग ने मॉनसून सामान्य रहने का अनुमान लगाया है. यह अनुमान कितने राहत से भरा है यह वही लोग बता सकते हैं जिनके खेत में बिवाइयों की दरारें पड़ी हैं या फिर दिल्ली में बैठे नीति-नियंता जो बारिश की बूंदों की उम्मीद चातक की तरह लगाए हैं. अब इन नीति नियंताओं की नीतियों का सूचकांक भी बारिश की नमी से हरा-भरा होगा.

इस साल पिछले दस साल के औसत के मुकाबले 97 फीसदी बारिश होने के आसार हैं. किसानों के लिए ये राहत की खबर है.

बारिश जब होती तब होगी, फिलहाल तो इस अनुमान से ही राहत है क्योंकि दक्षिण भारत के कुछ राज्य पानी के गहरे संकट से जूझ रहे हैं. केरल सरकार 27 मार्च को राज्य के 14 ज़िलों में से 9 ज़िलों को सूखा-ग्रस्त घोषित कर चुकी है. राज्य के प्रभावित ज़िलों में टैंकरों से पानी पहुंचाने के लिए बड़े स्तर पर पहल की गई है. साफ है, केरल के सूखा प्रभावित किसानों को देश में मॉनसून का सबसे ज्यादा इंतजार है.

पिछले साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच औसत से कम बारिश हुई है जिसका असर देश के बड़े हिस्से में साफ तौर पर दिख रहा है. सबसे ज्यादा चिंता उत्तर भारत को लेकर है जहां 2013 के बाद से कुछ राज्यों में सूखा पड़ चुका है. इस इलाके के 6 बड़े जलाशयों में सिर्फ 20% पानी बचा है जो पिछले साल इस समय 23% था.

वैसे मॉनसून की बारिश भारत की राजनीति को भी प्रभावित करती है. प्रधानमंत्री कार्यकाल के आखिरी साल में ये खबर उनके लिए भी राहत देने वाली है. फसल अच्छी हुई तो किसानों की नाराजगी कुछ कम होगी.

किसानों की नाराजगी दूर करना बेहद अहम है, क्योंकि भारत में चुनाव दालों और प्याजों की कीमतों के आधार पर जीते और हारे जाते हैं (मंदिर वगैरह तो भावनात्मक मुद्दे हैं)

कुछ साल पहले, तब के आंध्र प्रदेश में. तेलुगूदेशम पार्टी हैदराबाद को आधुनिक बनाने के चंद्रबाबू नायडू की पुरजोर कोशिशों के बाद भी चुनाव में पटखनी खा गई थी. हाल में, गुजरात में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का जनादेश सिकुड़ गया. दोनों ही मामलों में किसानों और ग्रामीण आबादी की नाराजगी बड़ी वजह बताई गई.

हालांकि ग्रामीण आबादी और खेती को एक दम से एक ही घेरे में नहीं रखा जा सकता, लेकिन यह सच है कि दोनों एक दूसरे से नजदीकी और जरूरी रिश्ता रखते हैं. पिछले कुछ साल से हमारे कृषि विकास के आंकड़े गोते लगा रहे हैं.

ऐसे में, वक्त का तकाजा है कि बारिश की उम्मीदों के साथ ही खेती को आधुनिक बनाने और साथ में कृषि गतिविधियों को थोड़ा तकनीक का साथ मिले. पिछले ब्लॉग में मैंने ग्रीन रिवॉल्यूशन के बाद जीन रिवॉल्यूशन की बात की थी.

अब जरूरत है कि केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र में कुछ और नई पहल करे और खेती के विकास को समग्रता की तरफ ले जाए. इन पहलों को लागू करने में राज्यों की सहमति के साथ उनके तर्कों को भी स्थान देना चाहिए. आखिर कृषि राज्य का विषय होने के साथ अलग-अलग राज्यों की जरूरतें भी अलग और स्थानीय किस्म की होती हैं.


भारत में कृषि नीतियों में बदलाव की सोचने से पहले जरा एक नजर अतीत पर डालने की जरूरत है. जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने अपने कार्यकाल में नीलम संजीव रेड्डी को कृषि मंत्री पद का प्रस्ताव दिया था, जिसे रेड्डी ने ठुकरा दिया.

वजहः उनके पूर्ववर्ती, जयराम दास दौलतराम दास, के.एम. मुंशी और रफी अहमद किदवई जैसे कृषि मंत्री कृषि क्षेत्र के भले के लिए नगण्य उपलब्धियां ही हासिल कर पाए थे. ऐसे में शास्त्री जी ने उद्योगों के मुकाबले कमजोर दिख रहे इस सेक्टर की कमान तब भारी उद्योग मंत्री रहे सी.सुब्रह्मण्यम को सौंपी थी.

पहले तो सी.सुब्रह्मण्यम को लगा कि उनका डिमोशन कर दिया गया है लेकिन उसके बाद एम.एस. स्वामीनाथन और एस. शिवरामन के साथ इस तिकड़ी ने भारतीय कृषि की किस्मत बदलने की नींव रखनी शुरू कर दी थी.

साल 2000 तक हरित क्रांति अपनी रफ्तार से चलती रही, जब तक कि नए नई राष्ट्रीय कृषि नीति (एनएपी) की नींव तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने नहीं रखी. एनएपी का लक्ष्य सालाना 4 फीसदी कृषि विकास दर हासिल करने का था (जो कभी हासिल नहीं किया जा सका) और किसानों को बेहतर जीवन शैली मुहैया कराने के लिए ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत करना था.

बहरहाल, इस कदम के बाद यूपीए सरकार ने किसानों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन 2004 में किया था और इसकी रिपोर्ट 2006 में आई.

इतनी बातों का मर्म यही है कि इतनी रस्साकस्सी के बाद भी देश में कृषि को लेकर एक समग्र नीतिगत फ्रेमवर्क नहीं बन पाया है, ताकि कृषि, पशुपालन, और इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों को आगे बढ़ाया जा सके.

इसी कमी का नतीजा है कि कृषि उत्पादन को लेकर देश भर में असमानता है. हम हर बार बारिश और मौसम पूर्वानुमानों के आधार पर शेयर बाजार की बढ़त और घटत की ओर टकटकी लगाए रहते हैं.

जलवायु परिवर्तन के दौर में खेती को नए नजरिए की दरकार है. जिसमें तकनीक और बाकी जरूरतों का ख्याल रखा जाए. एक मजबूत फ्रेमवर्क ही जीन क्रांति समेत कृषि से जुड़ी अन्य जरूरतों का ख्याल रख सकता है.

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Thursday, April 12, 2018

सन्तो जागत नींद न कीजै

जीवन में सबसे जटिल दिखने वाली चीजें सबसे सरल होती हैं, यह कहना किसी को उम्मीद का दिया दिखाने जैसा है. किसी लड़ रहे शख्स के अंदर के नैराश्य को मारकर उसे फिर से हथियार तान लेने के लिए तैयार करने जैसा. वैसे यह सत्य है कि ऐसी प्रेरणाओं की ज़रूरत सबको होती है. कुछ वैसे ही जैसे कि ईश्वर की.

ईश्वर की मौजूदगी आपको सबल बनाती है. आप ईश्वर को नहीं मानते (या खुद को नास्तिक कहते हैं) इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर का विरोध करें. या किसी मंदिर मस्जिद या किसी और पूजा स्थान न जाएं. नास्तिक होने के लिए किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होनी चाहिए. आजकल होती है. लोग कहते हैं तुम्हारे व्यवहार से तो लगता नहीं कि तुम नास्तिक हो. नास्तिक होना तर्कशील होना होता है. ईश्वर का विरोध करना नहीं. विरोध करना किसी के होने को स्वीकार्यता देना होता है और आप किसी के नहीं होने की बात को अंतःकरण से मानते हुए भी उसके होने से जुड़े कई कामों से जुड़ सकते हैं और आपको जुड़ना पड़ेगा.

फिर एक तरफ है परंपरा, दूसरी तरफ समाज तीसरी तरफ आपका विचार और चौथी तरफ आप खुद, यानी मैं. यद्यपि मैं मानता हूं कि अगर ईश्वर है तो वह ‘मैं’ ही है. अध्यात्म में ‘तुम’ का स्थान नहीं है. वहां अगर ईश्वर की अवधारणा है तो वह ‘मैं’ ही है. मैं का होना और विद्यमान होने को महसूस करना ही ईश्वर की खोज है. वस्तुतः सत्य यही है.

फिर सत्य की अवधारणा को लेकर कई सवाल हैं. आखिर, सत्य क्या है? जो आपने सुना क्या वह सत्य है? क्या आपने अपनी आंखों से देखा वह सत्य है? आप कहेंगे शायद हां.

सुनी हुई बातें तो आधी सच्ची आधी झूठी. आंखो देखी को आप सत्य मान सकते हैं, लेकिन यकीन करिए वह भी सत्य हुआ नहीं करतीं. एक ने कहा है, Reality is merely an Illusion.

यथार्थ महज एक संभ्रम है. मैं बताता हूं कैसे.

देखिए, पृथ्वी से सबसे नजदीक का तारा है सूर्य और दूसरा सबसे नजदीक का तारा प्रॉक्सिमा सेंचुरी है. प्रकाश की गति करीब 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड होती है और सूर्य पृथ्वी से कोई 15 करोड़ किमी दूर है. इस तरह, सूर्य की रोशनी पृथ्वी तक पहुंचने में 8 मिनट और 20 सेकेंड का वक्त लेती है.

इसीतरह, प्रॉक्सिमा सेंचुरी पृथ्वी से कोई साढ़े 4 प्रकाश वर्ष दूर है. एक प्रकाश वर्ष यानी एक साल में प्रकाश जितनी दूरी तय करे. याद रखिए प्रकाश की गति एक सेकेंड में 3 लाख किमी है.

अब फर्ज कीजिए कि सूर्य की बत्ती अचानक गुल हो जाए तो हमें यह पता चलने में 8 मिनट बीस सेकेंड लगेंगे और प्रॉक्सिमी सेंचुरी का दिया बुझ जाए तो हमें यह पता चलने में साढ़े चार साल का वक्त लगेगा.

इसके बरअक्स, हम अगर कोई ऐसा यान बना लें, जो प्रकाश की गति से चले और हम प्रॉक्सिमा सेंचुरी की तरफ ही चल पड़ें तो दो साल चलने के बाद हमारे पास वह सूचना होगी जिसकी पृथ्वी पर पहुंचने में दो साल और लगेंगे. यानी हम भविष्य की यात्रा पर होंगे. प्रॉक्सिमा सेंचुरी और सूर्य जैसे खबरों तारे हमारी आकाशगंगा में, विभिन्न मंदाकिनियों में और पूरे ब्रह्मांड में मौजूद है. जिनमें से ज्यादातर हमसे कई करोड़ प्रकाश वर्ष दूर हैं. यानी हम अपनी खुली आंखों से आसमान में जो तारे देखते हैं उनमें से कई असल में मौजूद हैं ही नहीं. यथार्थ वाकई भ्रम ही है. इसलिए भ्रम को सत्य न मानिए.

सन्तो जागत नींद न कीजै.

आइए, वापस धरती पर लौटते हैं, जहां प्रकृति ने हमें एक ज्यादा अनमोल उपहार सौंपा है. जिसे हम प्रेम कहते हैं. एक तरफ हम कहते हैं अहं ब्रह्मास्मि. मैं ही ब्रह्म हूं. ब्रह्म में मैं ही हूं...

दूसरी तरफ कहते हैं, मैं तो कूतरा राम का मोतिया मेरा नाम.

प्रेम का कौन सा स्वरूप आपको भाता है? पूजित होना या मंसूर की तरह अन लहक, अन लहक कहकर अपने यार के लिए खुद को बिसरा देना? विकल्प आपके पास है. खुशी किससे ज्यादा मिलती है? जो भी हो यह अनंत की दिव्य विभूति है जो जीवन का आवश्यक अंग है.

क्या आपको अपने प्रिय तक पहुंचकर भावोन्माद होता है? आपकी आंखें भर आती हैं, मन में कसक उठती है? कि इसकी ताबीज की तरह गले से लटकाकर मलंग बन जाऊं?

सोचिए, अगर इंन्द्रियां अपनी-अपनी कार्यशक्ति एक-दूसरे से बदल ले तो संसार में क्या परिवर्तन हो जाएगा? मसलन, हम रंगों को सुनने लगें और ध्वनियों को देखने लगें तो हमारे जीवन में क्या अंतर आ जाएगा?

अपनी किताबह मिस्टिसिज्म में अंडरहिल लिखते हैं,

I Heard flowers that sounded and saw notes that shone.

मैंने उन फूलों को सुना जो शब्द करते थे और उन ध्वनियों को देखा जो जाज्वल्यमान थीं.

प्रेम में शरीर की सारी शक्तियां निरालम्ब होकर अपने को अनन्त की गोद में छोड़ देती हैं. एक तरफ यथार्थ है, जो संभ्रमित करता है अगर आप उस पर विचार करें, दूसरी तरफ अहं ब्रह्मास्मि है जो आपको कहता है कि ब्रह्मांड के केंद्र एक मात्र आप ही है और दुनिया के सार काम आपको केंद्र में रखकर होने चाहिए तीसरी तरफ प्रेम है, जिसमें अगर आप हैं तो आप जॉन स्टुअर्ट ब्लैकी की तरह कहते हैं,

As Fishes swim in briny sea,

As Fouls do float in the air,

From thy embrace we cannot flee,

We breathe and thou art there.

(जिसतरह मछलियां समुद्र में तैरती हैं, जिस प्रकार परिन्दे हवा में झूलते हैं, तेरे आलिंगन से हम अलग नहीं हो सकते. हम सांस लेते हैं, क्योंकि तू वहां मौजूद है.)
यह अनुभूति इतनी दिव्य और अलौकिक होती है कि संसार के शब्दों में स्पष्टीकरण असंभव नहीं तो कम से कम कठिन जरूर है. आप खुद को मैं समझें या खुद को तुम समझें, लेकिन बाकी के लोगों के विचार उस गहराई तक नहीं पहुंच सकते जहां वह जटिल को जटिल और सरल को जटिल और सरल को सरल या जटिल को सरल समझने की पर्याप्त व्याख्या कर सकें.

खुद को और तुम को भी, मैं समझने की स्थिति एक सफर है, उस दिव्य अनुभूति में इंद्रियां अपना काम करना भूल जाती हैं. वे निस्तब्ध होकर अपना काम-काज अव्यवस्थित रूप से करने लगती हैं. इसका विश्लेषण करें तो उसमें हम जाने कितने गूढ़ रहस्यों पर से परदा उठा सकते हैं. फारसी के कवि शम्स तबरीज लिखते हैं,

ब यादे बज़्मे विसालश् दर आरज़ू ए जमालश्

फ़ुतादा बे ख़बर अन्द ज़ेआँ शराब कि दानी

चि खुँशबूअद कि बदूयश बर आस्तान ए कूयश

बराए दीदने रूयश शमे बरोज़ रसानी

हवा से ज़ुल्मए खुद रा बनूरे जाने तो बर अफ़रोज़

(दीवान-ए-शमसी तबरीज़)

(उसके सम्मलिन की स्मृति में,

उसके सौंदर्य की आकांक्षा में,

वे उस मदिरा को—जिसे तू जानता है—

पीकर बेसुध पड़े हैं.

कैसा अच्छा हो कि उसकी गली के द्वार पर

उसका मुख देखने के लिए

वह रात को दिन तक पहुंचा दे

तू अपने

शरीर की इंद्रियों को

आत्मा की ज्योति से जगमगा दे.

ज्ञान की अवस्था चार तरह की होती है, पहला आप जानते हैं कि आप क्या जानते हैं. दूसरा, आप जानते हैं कि आप क्या नहीं जानते. तीसरा आप नहीं जानते हैं कि आप क्या जानते हैं और चौथा आप नहीं जानते कि आप क्या नहीं जानते.

विज्ञान इन चारों कसौटियों पर खुद को सकता है. इसलिए वह विज्ञान है. जो वह नहीं जानता उसे जानने की कोशिश करता है. विज्ञान में कुछ भी अंतिम सत्य नहीं है. नए समाधान हमेशा अपनाए जाते हैं. अध्यात्म में भी थोड़ा बहुत ऐसा है लेकिन कर्मकांड तो कत्तई नहीं है. विज्ञान इसीलिए मौलिक है. धर्म इसीलिए रोकता है. ईश्वर की जो सत्ता है, उस पर आप सवालिया निशान खड़े नहीं कर सकते. समाज आपको रोकेगा, और तब अनहल्लाज मंसूर की तरह आप अपनी अनुभूति के गीत गाते-गाते थक जाएंगे, लोग समझ ही नही पाएंगे, समाज आपको ईश्वरीय सत्ता का विनाश करने वाला समझकर मंसूर की ही तरह धड़नतख्ते पर भी झुला सकता है.

इसलिए आप तर्कवादी है, आप के पास ईश्वर, सत्य और यथार्थ से जुड़े अपने तर्क हैं तो आप को चुप रह जाना पड़ता है. आपके पास अपार प्रेम है तो आप कई दफा खामोश रह जा सकते हैं कि जिससे आप प्रेम कर रहे हैं वह इसको कितना समझेगा, किस स्तर तक समझेगा, समझेगा भी या नहीं,

नश्वर स्वर से कैसे गाऊं आज अनश्वर गीत!


जारी रहेगा







Wednesday, April 4, 2018

कृषि में ग्रीन के बाद अब जीन क्रांति का वक्त

महाराष्ट्र के किसान जब बिवाई फटे पैरों के साथ नासिक से मुंबई पहुंचे तो सोशल मीडिया में जैसे जाग पड़ गई. सोशल मीडिया पर उधड़ी चमड़ी वाले पैरों की तस्वीरों ने बताया कि बुलेट ट्रेन के सपनों के बाजार में नंगे पैरों से रोटी और राजा का फासला नापते किसानों का कदमताल भारतीय लोकतंत्र का वह विहंगम दृश्य है, जिस पर समय शर्मिंदा है. 21वीं सदी के 18वें बरस के मचान से अपने अन्नदाताओं के पैरों से रिसता हुआ खून पूरा देश देख रहा था.

लेकिन असल सवाल यह नहीं है. यह बेहद फौरी-सा सवाल है, जिसका अर्थ कत्तई कर्जमाफी जैसे छोटे उपायों में नहीं ढूंढा जाना चाहिए. किसानों को मछली देने की बजाय, उन्हें मछली पकड़ना सिखाना होगा.

देश जिस कृषि संकट से गुजर रहा है, जहां गुजरात में पानी की कमी की वजह से बुवाई पर रोक है और कहीं अधिक पैदावार की वजह से उपज की बाजिव कीमत नहीं मिल पा रही है तो वहां किसान तिलमिलाए न तो क्या करे?

भारत में आज की तारीख में भी, जब सेवा क्षेत्र के विस्तार और संभावनाओं की कहानियां कही और सुनाई जा रही हैं, करीब 65 करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए खेती या इससे जुडे क्षेत्रों पर निर्भर हैं. यह संख्या देश की आबादी का तकरीबन 50 फीसदी है. साठ के दशक के मध्य से भारत में हरित, श्वेत, पीली और नीली क्रांतियां हो चुकी हैं और भारत खाद्यान्न आयात करने वाले से खाद्यान्न उत्पादन करने वाले ताकतवर देश में बदल चुका है. भारत एफएओ यानी खाद्य और कृषि संगठन में सबसे अधिक अनाज दान करने वाला देश है. लेकिन तथ्य यह भी है कि दुनिया की एक चौथाई भूखी और गरीब आबादी भारत में रहती है.

करीब 12 करोड़ किसान परिवार सबसे गरीब तबके में आते हैं और खेती तथा गैर-खेतिहरों के बीच आमदनी की खाई करीब 1:4 तक बढ़ गई है. औसतन कृषि उत्पादन और कुल कारक उत्पादकता वृद्धि तो कम है ही. एक ओर तो जमीन, पानी, जैव विविधता, और दूसरे प्राकृतिक संसाधन लगातार छीज रहे हैं, दूसरी तरफ भारत बहुत तेजी से, यानी अगले पांच साल में, दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने की दिशा में अग्रसर है.

इन सबके बरअक्स जलवायु परिवर्तन से खेती पर पड़ने वाला असर अलग ही है.

राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक विश्लेषण बताते हैं कि भारत जैसे खेती पर निर्भर या कृषि के लिए महत्वपूर्ण देशों में खेती का विकास गरीबी और भुखमरी के खात्मे में तिगुना अधिक प्रभावी साबित होते हैं, जबकि दूसरे सेक्टर में विकास से यह फर्क उतना अधिक नहीं पड़ता.

अब जिस तरह के कृषि संकट से देश दो-चार है, ऐसे में भारतीय कृषि को एक नए बदलाव की जरूरत है. इसे अधिक समावेशी होना होगा. इसके लिए एमएलएम समीकरण इसे अपनाना होगा, मोर फ्रॉम लेस फॉर मोर यानी कम संसाधनों में अधिक लोगों के लिए अधिक उत्पादन.

इसके लिए खेती-किसानी में आधुनिकता लानी होगी, इसमें उत्पादकता बढ़ाने के लिए वैल्यू चेन का समुचित होना होगा. इसे ही हम इनपुट यूज एफिशिएंसी या इनपुट के इस्तेमाल की अधिकतम योग्यता कहते हैं. खेती को जाहिर है लाभदायक बनाना होगा, जिसके लिए कीमतों का स्थिरीकरण और किसानों का बाजार से सीधे जुड़ाव जरूरी है. खेती को टिकाऊ बनाना होगा यानी इसमें संसाधनों के संरक्षण, उसे बचाने और वृद्धि करने के विकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा. खेती में समानता लानी होगी, खेती को हर हालत में गरीबों के पक्ष में और किसान हितैषी बनाना ही होगा. इसमें एक लक्ष्य 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करना भी है.


खेती में आधुनिकीकरण का रास्ता

ग्रीन रिवॉल्यूशन का दौर तो बीत गया. अब जीन रिवॉल्यूशन का दौर आने वाला है. आपको बीटी कॉटन की याद है? एक संकर बीज? भारत में आज की तारीख में कुल 1.2 करोड़ हेक्टेयर में कपास की खेती होती है इसमें से 1.1 करोड़ हेक्टेयर में बीटी कॉटन उगाया जाता है. बीटी कॉटन करीब 70 लाख लघु और सीमांत किसानों के हित में उठाया गया एक कामयाब कदम माना जा सकता है.

इसकी वजह से कपास उत्पादन में कीटनाशकों के इस्तेमाल में सात गुना कमी आई है, दूसरी तरफ, 2001-02 में कोई 4 करोड़ कपास की गांठों का उत्पादन होता था जो अब 14 करोड गांठों तक बढ़ गया है. प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी 278 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 570 किग्रा प्रति हेक्टेयर हो गया है. रूपयों-पैसों के मामले में इसे बताएं तो यह 60 अरब डॉलर का नफा है. इससे भारत कपास के निर्यातकों में पहले और दूसरे पायदान पर आ गया है.

नीतियों और उसके क्रियान्वयन की जड़ता की वजह से साथ ही तकनीक बदलाव में पीढ़ीगत जड़ता की वजह से ऐसे फायदे दूसरी फसलों में नहीं उठाए जा सके हैं. समावेशी रूप से जैवसुरक्षा और संरक्षा को अपनाकर भारत को विज्ञान की अगुआई वाली बायोटेक नीति को लागू करना चाहिए, लेकिन इसका एक मानवीय पहलू होना चाहिए.

ऐसा कर पाए तो समूचे खाद्य और कृषि सेक्टर में इसका फायदा मिलेगा और इस क्षेत्र की अगुआ तकनीकों का फायदा नई खोजी जा रही तकनीकों के जरिए उठाकर जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुक्सान को कम किया जा सकेगा.

(यह लेख इंडिया टुडे में प्रकाशित हो चुका है)