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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

पाकिस्तान का सिक्योरिटी स्टेट- आतंकवाद, राजनीतिक टकराव और भारत की सीमा के सामने नई चुनौतियाँ

इस लेख में जानिए
  • पाकिस्तान में सुरक्षा और राजनीति का टकराव: आतंकवाद से निपटने की चुनौती और PTI तथा संघीय सरकार के बीच विवाद का क्या संबंध है?
  • अफगानिस्तान और TTP का संकट: पाकिस्तान और तालिबान सरकार के बीच तनाव का क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या असर पड़ सकता है?
  • सेना, सरकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही: आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और प्रांतीय स्वायत्तता के बीच संतुलन क्यों जरूरी है?
भारत की सीमा सुरक्षा के लिए मायने: पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता, अफगानिस्तान से जुड़े उग्रवादी नेटवर्क और नियंत्रण रेखा की संवेदनशीलता पर भारत को किन पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए?

पाकिस्तान आज एक ऐसे संकट के सामने खड़ा है, जिसमें आतंकवाद से मुकाबला, प्रांतीय स्वायत्तता, नागरिक सरकार की वैधता और सेना की भूमिका एक-दूसरे से उलझते दिखाई देते हैं. अफगानिस्तान के साथ बढ़ता तनाव, खैबर पख्तूनख्वा में राजनीतिक टकराव और नियंत्रण रेखा के निकट विस्फोटों की खबरें इस संकट के अलग-अलग पहलू हैं.

इन्हें एक ही साजिश या सीधे जुड़े घटनाक्रम के रूप में देखना जल्दबाजी होगी. लेकिन इनसे एक बड़ा सवाल जरूर उठता है: क्या पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था राजनीतिक स्थिरता पैदा कर पा रही है, या सुरक्षा का प्रश्न ही उसके भीतर सत्ता-संघर्ष का नया केंद्र बनता जा रहा है?

12 अक्टूबर 2026 को सामने आई खबरों के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई.

इस घटनाक्रम को लेकर संघीय सत्ता और PTI के बीच मतभेद सामने आए. इसे केवल कानून-व्यवस्था की कार्रवाई या केवल राजनीतिक प्रतिशोध मान लेने से पहले घटनाओं, सरकारी आदेशों और संवैधानिक प्रक्रियाओं की स्वतंत्र जांच आवश्यक है.

इसी समय अफगानिस्तान की तालिबान सरकार और इस्लामाबाद के बीच तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को लेकर तनाव जारी है.

पाकिस्तान का आरोप है कि अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल उसके खिलाफ हमले करने वाले उग्रवादी समूह करते हैं. काबुल इन आरोपों और अपनी जिम्मेदारी को लेकर अलग रुख रखता है.

दूसरी ओर, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 12 अक्टूबर को हुए IED विस्फोट में चार नागरिकों की मौत की खबर भी सामने आई. इन घटनाओं को भारतीय सीमा पर बारूदी सुरंगों की अलग-अलग खबरों से जोड़ने का कोई पुष्ट आधार फिलहाल नहीं है.

इन घटनाओं का महत्व केवल उनकी तात्कालिक गंभीरता में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक ढांचे में है जिसके भीतर पाकिस्तान इन चुनौतियों का सामना कर रहा है.

सुरक्षा संकट और संघीय ढांचे की परीक्षा

खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का सीमावर्ती प्रांत है, जहां अफगानिस्तान से लगी सीमा, उग्रवादी गतिविधियां और स्थानीय राजनीतिक असंतोष लंबे समय से एक-दूसरे को प्रभावित करते रहे हैं.

यहां TTP की गतिविधियां पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती हैं. लेकिन इस चुनौती का सामना करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका सैन्य पक्ष.

11 अक्टूबर को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लागू करने की घोषणा की और PTI की प्रांतीय सरकार को निलंबित कर दिया. संघीय सरकार ने इसे आतंकवाद से निपटने में प्रांतीय सरकार की विफलता से जोड़ा, जबकि PTI ने इसे अपने राजनीतिक अधिकारों पर हमला बताया है.

यहां संवैधानिक प्रश्न उठता है कि क्या सुरक्षा संबंधी विफलता निर्वाचित प्रांतीय सरकार को हटाने के लिए पर्याप्त आधार हो सकती है?

पाकिस्तान के संविधान में आपातकाल और प्रांतीय शासन से जुड़े प्रावधान हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जा सकता है, यह कानूनी प्रक्रिया, उपलब्ध साक्ष्यों और संवैधानिक सीमाओं से तय होना चाहिए.

आतंकवाद से मुकाबले के लिए संघीय और प्रांतीय सरकारों के बीच समन्वय जरूरी है. लेकिन यदि सुरक्षा विफलताओं की जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित होती दिखाई दे, तो संस्थाओं पर भरोसा कमजोर हो सकता है.

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में स्थानीय आबादी का सहयोग निर्णायक होता है. उस सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रशासनिक क्षमता के साथ राजनीतिक वैधता भी आवश्यक है.

अफगानिस्तान: सैन्य दबाव या कूटनीतिक समाधान?

इस संकट का दूसरा पहलू अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के संबंध हैं. 12 अक्टूबर को पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने तालिबान सरकार से अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करने वाले उग्रवादी समूहों को रोकने की मांग दोहराई.

दोनों देशों के बीच सीमा पर झड़पों और पाकिस्तानी हवाई हमलों के कारण तनाव बढ़ा है.

इस्लामाबाद के सामने समस्या यह है कि अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता से उसके संबंध पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो चुके हैं.

पाकिस्तान चाहता है कि काबुल TTP के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करे. लेकिन केवल आरोपों और सैन्य दबाव के सहारे सीमा पार उग्रवाद का स्थायी समाधान निकालना कठिन होगा.

जरूरत ऐसे तंत्र की है, जिसमें खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, सीमा प्रबंधन, संदिग्ध ठिकानों के बारे में सत्यापन और हिंसा रोकने के लिए नियमित संवाद शामिल हों.

इसके साथ यह भी आवश्यक है कि सीमा पार सैन्य कार्रवाई में नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, सितंबर 2026 तक अफगानिस्तान में सीमा पार हिंसा से 1,100 से अधिक नागरिकों के मारे जाने या घायल होने के मामले दर्ज किए गए थे.

पाकिस्तान को यह समझना होगा कि पड़ोसी देश पर दबाव डालना और वहां मौजूद उग्रवादी नेटवर्क को प्रभावी ढंग से समाप्त करना दो अलग-अलग लक्ष्य हैं. पहला कदम दूसरे की गारंटी नहीं है.


सेना, सरकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही

पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका लंबे समय से बहस का विषय रही है. मौजूदा घटनाक्रम में भी सुरक्षा का प्रश्न संघीय सरकार, PTI और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच जारी टकराव से अलग नहीं है.

हालांकि यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि हर सुरक्षा निर्णय सेना के निर्देश पर ही लिया गया है. महत्वपूर्ण यह देखना है कि फैसले किस संवैधानिक प्रक्रिया से लिए जा रहे हैं और उनकी जवाबदेही किसके प्रति है.

यदि आतंकवाद से निपटने के नाम पर राजनीतिक असहमति के लिए जगह संकुचित होती है, तो सुरक्षा और लोकतंत्र के बीच तनाव बढ़ सकता है. दूसरी ओर, निर्वाचित सरकारों को भी कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं माना जा सकता.

लोकतांत्रिक जवाबदेही का अर्थ है कि सरकारों के प्रदर्शन की समीक्षा हो, लेकिन वह समीक्षा पारदर्शी और संवैधानिक तरीके से की जाए.

भारत के लिए क्या मायने हैं?

भारत के लिए पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता का महत्व मुख्यतः सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता के संदर्भ में है.

12 अक्टूबर को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हजीरा क्षेत्र में बारूदी उपकरण के विस्फोट से चार नागरिकों की मौत हुई. इसी दौरान पुंछ के मेंढर क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा बलों को पुरानी बारूदी सुरंगें मिलीं. उपलब्ध रिपोर्टों में इन घटनाओं के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि नहीं हुई है.

भारत को इसलिए घटनाओं के सत्यापित तथ्यों और संभावित सुरक्षा जोखिमों के आधार पर अपनी तैयारी बनाए रखनी होगी.

पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक संकट अपने आप में सीमा पार हमले की आशंका का प्रमाण नहीं है. लेकिन अफगानिस्तान से जुड़े उग्रवादी नेटवर्क, पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा और नियंत्रण रेखा की संवेदनशीलता को अलग-अलग निगरानी में रखना आवश्यक है.

पाकिस्तान की चुनौती केवल आतंकवादियों को रोकने की नहीं है. उसे यह भी तय करना है कि सुरक्षा के नाम पर सत्ता का इस्तेमाल किस सीमा तक हो सकता है, प्रांतों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी और अफगानिस्तान के साथ तनाव को स्थायी टकराव बनने से कैसे रोका जाएगा.

किसी भी देश की सुरक्षा केवल सेना और हथियारों से नहीं बनती. वह मजबूत संस्थाओं, जवाबदेह सरकार, प्रभावी कानून-व्यवस्था और पड़ोसियों के साथ व्यावहारिक संबंधों पर भी निर्भर करती है.

पाकिस्तान के लिए आज असली परीक्षा यही है कि वह सुरक्षा संकट का समाधान अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किए बिना निकाल पाता है या नहीं.

एआइ जनरेटेड कैरिकेचर

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: पाकिस्तान में आतंकवाद देश की राजनीति और सुरक्षा को कैसे प्रभावित करता है?

उत्तर: पाकिस्तान में TTP जैसे उग्रवादी संगठनों की गतिविधियाँ आंतरिक सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और अफगानिस्तान के साथ संबंधों को प्रभावित करती हैं। आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बलों की कार्रवाई के साथ संघीय और प्रांतीय सरकारों के बीच समन्वय, प्रभावी प्रशासन और स्थानीय आबादी का सहयोग भी आवश्यक है।

प्रश्न 2: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव की प्रमुख वजह क्या है?

उत्तर: दोनों देशों के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण पाकिस्तान में होने वाले हमलों में अफगान क्षेत्र के कथित इस्तेमाल को लेकर मतभेद है। पाकिस्तान TTP के खिलाफ कार्रवाई की मांग करता है, जबकि तालिबान सरकार अपनी जिम्मेदारी और इन आरोपों को लेकर अलग रुख रखती है। सीमा प्रबंधन, उग्रवादी नेटवर्क और नागरिकों की सुरक्षा इस विवाद के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं।

प्रश्न 3: पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता का भारत की सीमा सुरक्षा पर क्या असर पड़ सकता है?

उत्तर: पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति भारत के लिए सीमा प्रबंधन, उग्रवादी नेटवर्क और नियंत्रण रेखा की निगरानी के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है। हालांकि, पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता अपने आप में भारत पर संभावित हमले का प्रमाण नहीं है। भारत के सुरक्षा आकलन को सत्यापित खुफिया सूचनाओं, सीमा पर वास्तविक घटनाओं और विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

सिंधु जल समझौता: पाकिस्तान के आरोप और भारत के खिलाफ नैरेटिव की राजनीति

इस लेख में जानिए

  • पानी को हथियार बनाने का आरोप: पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की जल नीति को किस तरह पेश कर रहा है?
  • यूरोप से इस्लामाबाद तक नैरेटिव की लड़ाई: सीमा-पार जल संसाधनों पर आयोजित सम्मेलनों और पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयासों में क्या संदेश दिया जा रहा है?
  • सिंधु जल समझौते में पानी का बँटवारा: पूर्वी और पश्चिमी नदियों के पानी के उपयोग के अधिकार भारत और पाकिस्तान को कैसे दिए गए?
  • धमकियाँ बनाम जलविज्ञान: चिनाब नदी के प्रवाह, रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं और भारत पर लगाए जा रहे आरोपों को समझना क्यों जरूरी है?
सिंधु जल समझौते पर नेतागण देश के अंदर चाहे जितने ताल ठोंक लें, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी बातें नहीं चलतीं. दूसरी बात, सिंधु का पानी रोक देंगे जैसे दक्षिणपंथी दावों से भी पाकिस्तान का पक्ष मजबूत होता है.

आजादी के बाद से ही पाकिस्तान फॉल्स नैरेटिव गढ़ने का उस्ताद रहा है. उसका आरोप है कि भारत पानी को हथियार बना रहा है.

असल में, ब्रसेल्स में “ट्रांसबाउंड्री वॉटर रिसोर्सेजः अ वीपनाइज्ड ग्लोबल कॉमन” नाम से आयोजित एक महत्वपूर्ण नीति सम्मेलन में सीमा-पार जल संसाधनों को ‘हथियार बनाए जा सकने वाला वैश्विक साझा संसाधन’ बताया गया. अब ध्यान दीजिए कि इस सम्मेलन का आयोजन किसने किया था! सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी स्टडीज (सीईपीएस) और और यूरोपीय संघ में पाकिस्तान के मिशन ने मिलकर.

अब यूरोपीय देश पानी की कमी से मर रहे किसानों और खासकर प्यास से तड़पते बच्चों की तस्वीरें देखकर पिघलने का नाटक करने में भी आला दर्जे के हैं. पर बात यहीं नहीं रुकी है.

इसी साल 30 जून को इस्लामाबाद के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार “द इंडस वॉटर ट्रीटीः एन इंस्ट्रूमेट ऑफ पीस ऐंड रीजनल स्टैबिलिटी” में पाकिस्तान ने सिंधु नदी की तुलना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक समुद्री चोकपॉइन्टस् से करने की कोशिश की.

पाकिस्तान का तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसे वैश्विक नियम बनाने चाहिए, जो ऊपरी धारा वाले देशों (अपर राइपेरियन कंट्रीज) को पानी का इस्तेमाल भूराजनीतिक दबाव के साधन के रूप में करने से रोकें.

लेकिन जिस तरह का भ्रामक नैरेटिव सेट किया जा रहा है उससे क्षेत्रीय सहयोग को नुक्सान ही होगा.

लेकिन, आस्तीनें चढ़ाकर शेखी बघारने में भी पाकिस्तानियों का मुकाबल बुड़बक से बुड़बक हिंदुस्तानी दक्षिणपंथी ट्रोल नहीं कर सकता.

एक पाकिस्तानी कैबिनेट मंत्री ने तो पश्चिमी नदियों (सिंधु जल समझौते वाली) पर पानी मोड़ने वाली संरचनाएं बनाने वाले किसी भी व्यक्ति के ‘हाथ काट देने’ की धमकी दी.

इसी तरह, जनरल असीम मुनीर ने अमेरिका के टैम्पा में पाकिस्तानी प्रवासियों को संबोधित करते हुए भारत के खिलाफ सीधे सैन्य और परमाणु हमले की धमकियां दीं.

इन धमकियों में उन्होंने चेतावनी दी कि सिंधु नदी बेसिन पर भारत द्वारा भविष्य में बनाए जाने वाले किसी भी बांध को नष्ट करने के लिए पाकिस्तान मिसाइल हमले कर सकता है.

इतना तो जाहिर है कि हिंदी मुहावरा कोश में ऐसी ही बकर को गीदड़भभकी कहा गया है.

आपको पता ही होगा फिर भी सोचा याद दिला दूं कि सिंधु जल संधि के तहत भारत को पूर्वी नदियों के पानी पर विशेष अधिकार मिला, जिसकी अनुमानित मात्रा 40.7 अरब घन मीटर (बीसीएम), यानी 33 मिलियन एकड़-फीट (एमएएफ) है.

वहीं पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के लगभग पूरे पानी के उपयोग का अधिकार दिया गया, जिसकी अनुमानित मात्रा 168 से 170 बीसीएम (135 से 140 एमएएफ) है.

गौर करने वाली बात यह है कि सिंधु नदी तंत्र के कुल पानी का केवल लगभग 19.6 प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है, जबकि इस हिस्से से संबंधित जलग्रहण क्षेत्र भारत में पाकिस्तान की तुलना में लगभग दोगुना है. इसके विपरीत, पाकिस्तान को लगभग 81 प्रतिशत पानी मिलता है, जबकि संबंधित जलग्रहण क्षेत्र का केवल लगभग आधा हिस्सा ही उसके क्षेत्र में आता है.

1941 की जनगणना के अनुसार, सिंधु नदी तंत्र के पानी पर निर्भर आबादी में पाकिस्तान की हिस्सेदारी करीब 2.5 करोड़ यानी 54 प्रतिशत थी, जबकि भारत में करीब 2.1 करोड़ यानी 46 प्रतिशत लोग इस जल प्रणाली पर निर्भर थे. भारतीय हिस्से की 46 प्रतिशत आबादी को सिंधु तंत्र के केवल 19.6 प्रतिशत पानी पर निर्भर रहना पड़ा, जबकि पाकिस्तान के पंजाब की 54 प्रतिशत आबादी को लगभग 80 प्रतिशत पानी मिला.

सिंधु नहर प्रणाली से सिंचित कुल 2.6 करोड़ एकड़ भूमि में से करीब 2.1 करोड़ एकड़ पाकिस्तान में और केवल 50 लाख एकड़ भारत में सिंचित होती थी.

विभाजन के बाद बने नए राजनीतिक माहौल ने न केवल भारत की खाद्य आपूर्ति व्यवस्था को बाधित किया, बल्कि सिंधु नदी तंत्र की सदियों पुरानी जल-भौगोलिक एकता को भी तोड़ दिया. इससे भारत के सिंधु बेसिन के उन कई मिलियन एकड़ क्षेत्रों के विकास पर गंभीर खतरा पैदा हुआ, जो अत्यंत शुष्क होने के बावजूद उपजाऊ थे.

इसके बावजूद, पाकिस्तान लंबे समय से ऐसी दलीलें देता रहा है, जिन्हें भ्रामक नैरेटिव ही कहा जाना चाहिए, बल्कि मैं तो कहता हूं कि यह पाकिस्तान के 1952 के उसके रुख से मिलता-जुलता ही कहूंगा. वही संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी मंत्री की हायतौबा. (पिछले पोस्ट को देखें)

बहरहाल, पाकिस्तान छाती पीटता है भारत, पाकिस्तान में सूखा पैदा करने के लिए नदी के प्रवाह को नियंत्रित करता है और मानसून के दौरान बाढ़ पैदा करने के लिए भी पानी के बहाव से छेड़छाड़ करता है. हमारे दक्षिणपंथी भारतीय सोशल मीडिया रणबांकुरे भी ऐसा दावा करके पाकिस्तान की बात को एक तरह से सपोर्ट ही करते हैं.

पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस नैरेटिव को जोर-शोर से उठाया है. विशेष रूप से चिनाब नदी के प्रवाह में होने वाले उतार-चढ़ाव को लेकर भारत पर ऊपरी धारा के देश के रूप में पानी को नियंत्रित करने के आरोप लगाए जाते हैं.

जाहिर है कि ऐसे आरोप सिंधु नदी की वास्तविक जलवैज्ञानिक परिस्थितियों और रन ऑफ द रिवर जलविद्युत परियोजनाओं के स्थापित संचालन तंत्र की अनदेखी करते हैं और फर्जी हैं.

आगे कभी मौका लगा तो सिंधु जल समझौते में अमेरिका और यूरोपीय दवाब की भी चर्चा करेंगे जिसकी वजह से यह अन्यायपूर्ण समझौता भारत को करना पड़ा था.

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सिंधु जल समझौते के तहत भारत और पाकिस्तान को कितना पानी मिलता है?

उत्तर: सिंधु जल समझौते, 1960 के तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों के जल के उपयोग का अधिकार मुख्यतः भारत को दिया गया, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग मुख्यतः पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। इन नदियों के पानी की मात्रा मौसम और प्रवाह के अनुसार बदलती है, इसलिए दोनों देशों के हिस्से को केवल एक निश्चित प्रतिशत के रूप में समझना उचित नहीं है।

प्रश्न 2: पाकिस्तान भारत पर सिंधु नदी का पानी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप क्यों लगाता है?

उत्तर: पाकिस्तान का तर्क है कि ऊपरी धारा में स्थित भारत अपनी जलविद्युत परियोजनाओं और बाँधों के जरिए नदी के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। भारत की परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद रहा है। हालाँकि, किसी परियोजना के वास्तविक प्रभाव का आकलन उसके तकनीकी डिजाइन, संचालन नियमों, संधि की शर्तों और जलवैज्ञानिक आँकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3: क्या भारत सिंधु नदी तंत्र की पश्चिमी नदियों का पानी पूरी तरह रोक सकता है?

उत्तर: नहीं, ऐसा सामान्यीकृत दावा करना सही नहीं होगा। सिंधु जल समझौते के तहत भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ निर्दिष्ट उपयोगों की अनुमति है, जिनमें घरेलू और गैर-उपभोगी उपयोग, निर्धारित कृषि उपयोग तथा संधि की शर्तों के अनुरूप जलविद्युत उत्पादन शामिल हैं। रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएँ बिजली उत्पादन के लिए नदी के प्रवाह का उपयोग करती हैं, लेकिन उनका प्रभाव परियोजना की संरचना और संचालन पर निर्भर करता है। इसलिए पानी रोकने या प्रवाह नियंत्रित करने से जुड़े दावों की जाँच तकनीकी प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।