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शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

सिंधु जल समझौता: पाकिस्तान के आरोप और भारत के खिलाफ नैरेटिव की राजनीति

इस लेख में जानिए

  • पानी को हथियार बनाने का आरोप: पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की जल नीति को किस तरह पेश कर रहा है?
  • यूरोप से इस्लामाबाद तक नैरेटिव की लड़ाई: सीमा-पार जल संसाधनों पर आयोजित सम्मेलनों और पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयासों में क्या संदेश दिया जा रहा है?
  • सिंधु जल समझौते में पानी का बँटवारा: पूर्वी और पश्चिमी नदियों के पानी के उपयोग के अधिकार भारत और पाकिस्तान को कैसे दिए गए?
  • धमकियाँ बनाम जलविज्ञान: चिनाब नदी के प्रवाह, रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं और भारत पर लगाए जा रहे आरोपों को समझना क्यों जरूरी है?
सिंधु जल समझौते पर नेतागण देश के अंदर चाहे जितने ताल ठोंक लें, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी बातें नहीं चलतीं. दूसरी बात, सिंधु का पानी रोक देंगे जैसे दक्षिणपंथी दावों से भी पाकिस्तान का पक्ष मजबूत होता है.

आजादी के बाद से ही पाकिस्तान फॉल्स नैरेटिव गढ़ने का उस्ताद रहा है. उसका आरोप है कि भारत पानी को हथियार बना रहा है.

असल में, ब्रसेल्स में “ट्रांसबाउंड्री वॉटर रिसोर्सेजः अ वीपनाइज्ड ग्लोबल कॉमन” नाम से आयोजित एक महत्वपूर्ण नीति सम्मेलन में सीमा-पार जल संसाधनों को ‘हथियार बनाए जा सकने वाला वैश्विक साझा संसाधन’ बताया गया. अब ध्यान दीजिए कि इस सम्मेलन का आयोजन किसने किया था! सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी स्टडीज (सीईपीएस) और और यूरोपीय संघ में पाकिस्तान के मिशन ने मिलकर.

अब यूरोपीय देश पानी की कमी से मर रहे किसानों और खासकर प्यास से तड़पते बच्चों की तस्वीरें देखकर पिघलने का नाटक करने में भी आला दर्जे के हैं. पर बात यहीं नहीं रुकी है.

इसी साल 30 जून को इस्लामाबाद के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार “द इंडस वॉटर ट्रीटीः एन इंस्ट्रूमेट ऑफ पीस ऐंड रीजनल स्टैबिलिटी” में पाकिस्तान ने सिंधु नदी की तुलना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक समुद्री चोकपॉइन्टस् से करने की कोशिश की.

पाकिस्तान का तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसे वैश्विक नियम बनाने चाहिए, जो ऊपरी धारा वाले देशों (अपर राइपेरियन कंट्रीज) को पानी का इस्तेमाल भूराजनीतिक दबाव के साधन के रूप में करने से रोकें.

लेकिन जिस तरह का भ्रामक नैरेटिव सेट किया जा रहा है उससे क्षेत्रीय सहयोग को नुक्सान ही होगा.

लेकिन, आस्तीनें चढ़ाकर शेखी बघारने में भी पाकिस्तानियों का मुकाबल बुड़बक से बुड़बक हिंदुस्तानी दक्षिणपंथी ट्रोल नहीं कर सकता.

एक पाकिस्तानी कैबिनेट मंत्री ने तो पश्चिमी नदियों (सिंधु जल समझौते वाली) पर पानी मोड़ने वाली संरचनाएं बनाने वाले किसी भी व्यक्ति के ‘हाथ काट देने’ की धमकी दी.

इसी तरह, जनरल असीम मुनीर ने अमेरिका के टैम्पा में पाकिस्तानी प्रवासियों को संबोधित करते हुए भारत के खिलाफ सीधे सैन्य और परमाणु हमले की धमकियां दीं.

इन धमकियों में उन्होंने चेतावनी दी कि सिंधु नदी बेसिन पर भारत द्वारा भविष्य में बनाए जाने वाले किसी भी बांध को नष्ट करने के लिए पाकिस्तान मिसाइल हमले कर सकता है.

इतना तो जाहिर है कि हिंदी मुहावरा कोश में ऐसी ही बकर को गीदड़भभकी कहा गया है.

आपको पता ही होगा फिर भी सोचा याद दिला दूं कि सिंधु जल संधि के तहत भारत को पूर्वी नदियों के पानी पर विशेष अधिकार मिला, जिसकी अनुमानित मात्रा 40.7 अरब घन मीटर (बीसीएम), यानी 33 मिलियन एकड़-फीट (एमएएफ) है.

वहीं पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के लगभग पूरे पानी के उपयोग का अधिकार दिया गया, जिसकी अनुमानित मात्रा 168 से 170 बीसीएम (135 से 140 एमएएफ) है.

गौर करने वाली बात यह है कि सिंधु नदी तंत्र के कुल पानी का केवल लगभग 19.6 प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है, जबकि इस हिस्से से संबंधित जलग्रहण क्षेत्र भारत में पाकिस्तान की तुलना में लगभग दोगुना है. इसके विपरीत, पाकिस्तान को लगभग 81 प्रतिशत पानी मिलता है, जबकि संबंधित जलग्रहण क्षेत्र का केवल लगभग आधा हिस्सा ही उसके क्षेत्र में आता है.

1941 की जनगणना के अनुसार, सिंधु नदी तंत्र के पानी पर निर्भर आबादी में पाकिस्तान की हिस्सेदारी करीब 2.5 करोड़ यानी 54 प्रतिशत थी, जबकि भारत में करीब 2.1 करोड़ यानी 46 प्रतिशत लोग इस जल प्रणाली पर निर्भर थे. भारतीय हिस्से की 46 प्रतिशत आबादी को सिंधु तंत्र के केवल 19.6 प्रतिशत पानी पर निर्भर रहना पड़ा, जबकि पाकिस्तान के पंजाब की 54 प्रतिशत आबादी को लगभग 80 प्रतिशत पानी मिला.

सिंधु नहर प्रणाली से सिंचित कुल 2.6 करोड़ एकड़ भूमि में से करीब 2.1 करोड़ एकड़ पाकिस्तान में और केवल 50 लाख एकड़ भारत में सिंचित होती थी.

विभाजन के बाद बने नए राजनीतिक माहौल ने न केवल भारत की खाद्य आपूर्ति व्यवस्था को बाधित किया, बल्कि सिंधु नदी तंत्र की सदियों पुरानी जल-भौगोलिक एकता को भी तोड़ दिया. इससे भारत के सिंधु बेसिन के उन कई मिलियन एकड़ क्षेत्रों के विकास पर गंभीर खतरा पैदा हुआ, जो अत्यंत शुष्क होने के बावजूद उपजाऊ थे.

इसके बावजूद, पाकिस्तान लंबे समय से ऐसी दलीलें देता रहा है, जिन्हें भ्रामक नैरेटिव ही कहा जाना चाहिए, बल्कि मैं तो कहता हूं कि यह पाकिस्तान के 1952 के उसके रुख से मिलता-जुलता ही कहूंगा. वही संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी मंत्री की हायतौबा. (पिछले पोस्ट को देखें)

बहरहाल, पाकिस्तान छाती पीटता है भारत, पाकिस्तान में सूखा पैदा करने के लिए नदी के प्रवाह को नियंत्रित करता है और मानसून के दौरान बाढ़ पैदा करने के लिए भी पानी के बहाव से छेड़छाड़ करता है. हमारे दक्षिणपंथी भारतीय सोशल मीडिया रणबांकुरे भी ऐसा दावा करके पाकिस्तान की बात को एक तरह से सपोर्ट ही करते हैं.

पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस नैरेटिव को जोर-शोर से उठाया है. विशेष रूप से चिनाब नदी के प्रवाह में होने वाले उतार-चढ़ाव को लेकर भारत पर ऊपरी धारा के देश के रूप में पानी को नियंत्रित करने के आरोप लगाए जाते हैं.

जाहिर है कि ऐसे आरोप सिंधु नदी की वास्तविक जलवैज्ञानिक परिस्थितियों और रन ऑफ द रिवर जलविद्युत परियोजनाओं के स्थापित संचालन तंत्र की अनदेखी करते हैं और फर्जी हैं.

आगे कभी मौका लगा तो सिंधु जल समझौते में अमेरिका और यूरोपीय दवाब की भी चर्चा करेंगे जिसकी वजह से यह अन्यायपूर्ण समझौता भारत को करना पड़ा था.

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सिंधु जल समझौते के तहत भारत और पाकिस्तान को कितना पानी मिलता है?

उत्तर: सिंधु जल समझौते, 1960 के तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों के जल के उपयोग का अधिकार मुख्यतः भारत को दिया गया, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग मुख्यतः पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। इन नदियों के पानी की मात्रा मौसम और प्रवाह के अनुसार बदलती है, इसलिए दोनों देशों के हिस्से को केवल एक निश्चित प्रतिशत के रूप में समझना उचित नहीं है।

प्रश्न 2: पाकिस्तान भारत पर सिंधु नदी का पानी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप क्यों लगाता है?

उत्तर: पाकिस्तान का तर्क है कि ऊपरी धारा में स्थित भारत अपनी जलविद्युत परियोजनाओं और बाँधों के जरिए नदी के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। भारत की परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद रहा है। हालाँकि, किसी परियोजना के वास्तविक प्रभाव का आकलन उसके तकनीकी डिजाइन, संचालन नियमों, संधि की शर्तों और जलवैज्ञानिक आँकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3: क्या भारत सिंधु नदी तंत्र की पश्चिमी नदियों का पानी पूरी तरह रोक सकता है?

उत्तर: नहीं, ऐसा सामान्यीकृत दावा करना सही नहीं होगा। सिंधु जल समझौते के तहत भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ निर्दिष्ट उपयोगों की अनुमति है, जिनमें घरेलू और गैर-उपभोगी उपयोग, निर्धारित कृषि उपयोग तथा संधि की शर्तों के अनुरूप जलविद्युत उत्पादन शामिल हैं। रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएँ बिजली उत्पादन के लिए नदी के प्रवाह का उपयोग करती हैं, लेकिन उनका प्रभाव परियोजना की संरचना और संचालन पर निर्भर करता है। इसलिए पानी रोकने या प्रवाह नियंत्रित करने से जुड़े दावों की जाँच तकनीकी प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।

सिंधु जल समझौता: 1948 में पाकिस्तान ने कैसे गढ़ा भारत के खिलाफ झूठा नैरेटिव?

  • इस लेख में जानिए

    • 1948 के नहर जल विवाद की पृष्ठभूमि
    • भारत और पाकिस्तान के बीच जल बँटवारे का विवाद
    • संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के दावों की पड़ताल
विभाजन के बाद, अविभाजित पंजाब की 143 नहरों में से केवल 12 नहरें पूर्वी पंजाब (भारत) को आवंटित की गईं, जबकि 131 नहरें पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) को मिलीं.

सबसे अधिक लाभदायक और तकनीकी रूप से व्यवहार्य योजनाएँ पश्चिमी पंजाब में स्थित थीं, जिससे पूर्वी पंजाब, विशेष रूप से नदियों से दूर स्थित क्षेत्रों में, विकास से काफी वंचित रह गया.

भारत के हिस्से में आया सिंधु घाटी का मैदानी इलाका पाकिस्तान के मैदानों की तुलना में काफी कम विकसित थे.
अधिकांश बड़ी नहरें पूरी तरह से पाकिस्तान में स्थित थीं और कुछ पूरी तरह से भारत में। ऊपरी बारी दोआब नहर (यूबीडीसी) एकमात्र प्रमुख नहर प्रणाली थी जिसका उद्गम माधोपुर हेडवर्क्स में था, लेकिन अब विभाजन के बाद इस पर से कई स्थानों पर सीमा गुजर रही थी.

कई यूबीडीसी चैनलों के निचले हिस्से जो पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) की ओर जाते थे, उन्हें मध्य बारी नहर के नाम से जाना जाता था।

मध्य बारी दोआब नहर (सीबीडीसी) को पूर्वी पंजाब (भारत) में स्थित उन नहरों के ऊपरी हिस्सों से पानी प्राप्त करना पड़ता था। दीपालपुर नहर, जो विशेष रूप से पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) की जल आपूर्ति करती थी, का जल स्रोत फिरोजपुर में स्थित था।

विभाजन के बाद, पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) के आग्रह पर, पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब के दो मुख्य अभियंताओं ने 20 दिसंबर, 1947 को यूबीडीसी और फिरोजपुर हेडवर्क्स की यथास्थिति को 31 मार्च, 1948 तक बनाए रखने के लिए एक समझौता किया.

जानबूझकर या अनजाने में, पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) ने 31 मार्च, 1948 तक सेंट्रल बारी दोआब नहर और दीपालपु नहर को पानी की आपूर्ति के संबंध में पूर्वी पंजाब के साथ किसी भी समझौते पर बातचीत करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया.

किसी भी समझौते के अभाव में, पूर्वी पंजाब ने 1 अप्रैल, 1948 को पश्चिम पंजाब में सीबीडीसी के लाभ के लिए अपनी सुविधाओं का उपयोग बंद कर दिया.

सेंट्रल बारी दोआब नहर और दीपालपुर नहरों से पाकिस्तान के कुल सिंचित क्षेत्र के केवल छह प्रतिशत हिस्से की सिंचाई होती थी.

तत्कालीन पाकिस्तान के सेक्रेट्री जनरल और बाद में प्रधानमंत्री बने चौधरी मोहम्मद अली ने कहा था: "...पश्चिमी पंजाब के कुछ हिस्सों में कर्तव्य की उपेक्षा, आत्मसंतुष्टि और सामान्य विवेक की कमी थी - जिसके पाकिस्तान के लिए विनाशकारी परिणाम हुए."

Water has practically dried near #Akhnoor after significant reduction in water levels due to India's suspension of the Indus Waters Treaty. People have no memory of crossing the river on foot.

पाकिस्तान ने यह झूठा नैरेटिव गढ़ा कि भारत ने 1 तारीख को अपने प्रतिनिधि के समक्ष सभी छह नदियों का पानी बंद कर दिया था.

16 दिसंबर, 1952 को सुरक्षा परिषद की बहस में पाकिस्तान के प्रतिनिधि एम. ज़फरुल्ला खान ने कहा: "...1 अप्रैल, 1948 को... भारत ने उन नदियों का पानी रोक दिया जो पाकिस्तान में बहती थीं."

विडंबना यह है कि बैठक के रिकॉर्ड से पता चलता है कि सुरक्षा परिषद के किसी भी स्थायी या अस्थायी सदस्य ने इस बयान की सत्यता पर कोई संदेह नहीं जताया।

1952 में पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद में पूरी तरह से झूठा विवरण प्रस्तुत किया.

यह स्पष्ट है कि 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, भारत ने 31 मार्च, 1948 तक के नौ महीनों के दौरान इन छह नदियों में से किसी पर भी ऐसी कोई संरचना नहीं बनाई थी जो इन सभी छह नदियों के जल को नियंत्रित कर सके.

1952 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि सुरक्षा परिषद को गुमराह करने में सफल रहे. एम. ज़फरुल्ला खान ने जल प्रवाह को रोकने की व्यवस्था और इन छह शक्तिशाली नदियों के जल को छह सप्ताह तक नियंत्रित करने या संग्रहित करने की भारत की क्षमता का उल्लेख नहीं किया, और न ही उनसे सुरक्षा परिषद में इस बारे में कोई प्रश्न पूछा गया.
इस झूठे विवरण के माध्यम से, 1952 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि सुरक्षा परिषद और विश्व को गुमराह करने में सफल रहे.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सिंधु जल समझौता कब हुआ था?

उत्तर: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते पर 19 सितंबर, 1960 को कराची में हस्ताक्षर किए गए थे। विश्व बैंक ने इस समझौते की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस समझौते से पहले, 1948 में दोनों देशों के बीच पंजाब की नहरों के पानी को लेकर विवाद हुआ था।

प्रश्न 2: 1 अप्रैल, 1948 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद क्यों हुआ था?

उत्तर: पंजाब के विभाजन के बाद कुछ नहर प्रणालियों के जलस्रोत भारत में थे, जबकि उनसे सिंचित होने वाले क्षेत्र पाकिस्तान में स्थित थे। 31 मार्च, 1948 को अंतरिम व्यवस्था समाप्त होने के बाद पूर्वी पंजाब ने सेंट्रल बारी दोआब और दीपालपुर नहरों के लिए अपनी जलापूर्ति बंद कर दी। इस विवाद के समाधान के लिए दोनों देशों के बीच 4 मई, 1948 को अंतर-डोमिनियन समझौता हुआ।

प्रश्न 3: क्या भारत ने 1 अप्रैल, 1948 को सिंधु नदी प्रणाली की सभी छह नदियों का पानी रोक दिया था?

उत्तर: यह दावा 1948 के नहर जल विवाद से संबंधित घटनाओं का व्यापक वर्णन नहीं करता। उस समय विवाद विशेष रूप से सेंट्रल बारी दोआब और दीपालपुर नहरों की जलापूर्ति को लेकर था। पाकिस्तान के प्रतिनिधि एम. ज़फरुल्ला खान ने 16 दिसंबर, 1952 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत पर नदियों का पानी रोकने का आरोप लगाया था। इस दावे की ऐतिहासिक पड़ताल करते समय 1948 के समझौतों, राजनयिक पत्राचार और सुरक्षा परिषद के मूल अभिलेखों को साथ पढ़ना आवश्यक है।