मंगलवार, 17 अगस्त 2010

जीवन के चक्रव्यूह में अभिमन्यु हो गया हूं...

याद है पिछली बार हम कब रोए थे?

कभी जिंदगी में ऐसे क्षण आते हैं, जब आप रोना चाहते हैं..बुक्का फाड़कर। लेकिन रो नहीं सकते..क्योंकि आपकी रेपुटेशन ही नहीं है, उदास दिखने की। हर गम में खुश दिखना होता है, जोकर की तरह। मेरे साथ यही मुश्किल है। लाल दंत मंजन छाप दांत दिखाने की ऐसी आदत है कि लोग-बाग ज़रा सीरियस होते ही पूछ बैठते हैं- क्या बात है, उदास हो?

हर बात पर हंसो, तो दोस्त ताना देते हैं मेरी बात पर सीरियस नहीं हो, सीरियसली नहीं ले रहे हो?? क्या किया जाए। मौलिक कैसे बना जाए?

कभी एक शेर सुना था- बहुत संजीदगी भी चूस लेती है लहू दिल का, 
                                   फकत इस वास्ते जिंदादिली से काम लेते हैं...
एक और था ऐसा ही, ..... मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं वाला।

लेकिन, मजाक-मजाक में जिंदगी निकल ली..।  अपने आसपास से गजब के लोगों को जाते देख रहा हूं, मानता हूं मेरी उम्र अभी मरने की नहीं। लेकिन मरने की कोई खास उम्र भी होती है क्या?

लोग धरती की गरमाहट से हवा की सनसनाहट और राजनीति से लेकर पता नही क्या-क्या डिस्कस कर ले रहे हैं। पता नहीं मुझे क्या हो रहा है..। खुद पर से भरोसा उठता जा रहा है..।

कुछ दोस्त भी साथ छोड़ रहे हैं, कुछ ने ताजिंदगी दोस्त बने रहने का वायदा किया था...वह भी छोड़ चले... हमने वायदों पर  यकीन करना छोड़ दिया है।

दिल में कई ऐसी बाते होती हैं, जो किसी को भी नहीं बता सकते बेहद करीबी दोस्तों को भी नहीं। कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिनपर आप सिर्फ आप खुद से बतिया सकते हैं। ऐसे ही कुछ मुद्दों से घिरा बैठा हूं.. अभिमन्यु की तरह..

रविवार, 15 अगस्त 2010

पीपली लाइव- मेरी नजर में (पुनर्मूल्यांकन)




पीपली लाइव हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के राजनैतिक कमेंट्स को फिर से पढ़ने सरीखा है। आप पैनेपन को अगर महसूस नहीं  कर सकते तो आपको यह फिल्म नहीं देखनी चाहिए।

हर चीज की तरह पीपली लाइव को देखने के दो नजरिए हो सकते हैं, पहला नज़रिया तो मीडिया की अतिसक्रियता वाला है। दूसरा नज़रिया, गांव के किसानों की आत्महत्या का है। पूरी फिल्म में सिनैमेटोग्रफी जानदार है..। बहुत दिनों के बाद, संभवतः वेलकम टू सज्जनपुर के बाद- मैंने गांव का पैनोरमिक व्यू अपने खालिस और सही रुप मे रुपहले परदे पर देखा।

पीपली लाइव समाज या प्रशासन, मीडिया या राजनीति शहर और गांव को निशाना नहीं बनाती। यह सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए परेशान तंत्रों द्वारा ओढ़ ली गई जिम्मेदारी की चादर को खींच देती है। ढाई सौ या ज्यादा में टिकट खरीद कर पॉपकॉर्न और ठंडा पीते हुए इस फिल्म का मजा एकआयामी होकर रह जाता है। 

दरअसल, फिल्म में संजीदगी लाने वाले मुझे महज दो पात्र लगे, एक राकेश- जो छोटे अखबार का रिपोर्टर है...और दूसरा होरी महतो। पीपली लाइव में राकेश और होरी ही लेखक-निर्देशक की सोच, जिज्ञासा, मजबूरी और दुखद अंत का संवाहक है।


पीपली लाइव समाज की विडंबनाओं और विद्रूपताओं को उजागर करती हुई नत्था, बुधिया, झुनिया, बूढ़ी मां, होरी के जीवन का परिचय देती है। नत्था की आत्महत्या की घोषणा खबर है, लेकिन होरी की गुमनाम मौत का कोई गवाह नहीं है। निश्चित ही अनुषा के मानस में प्रेमचंद की गोदान का नायक होरी जिंदा रहा होगा। 

पूरी फिल्म में आर कई बार नत्था को देखते हैं। उनके हिस्से में संवाद कम हैं...लेकिन रघुवीर यादव ने अपने कंधे पर कई जिम्मेदारियां ढोई हैं। फिर भी यादव का किरदार भी बहुआय़ामी नहीं हो पाया है। 

जो सीन आपको याद रखना चाहिए और जिस सीन को ज्यादातर लोग रिकॉगनाइज़ नहीं कर पाएऐगे वह है विभिन्न बाइट्स और लोगों के चेहरों के मोंटाज के बीच कठपुतलिय़ों का इंसर्ट..और फिर राकेश को जब पता लगता है होरी की मौत का तब उसे मीडिया की असलियत और जिंदगी की असलियत का भान होता है। उस दौरान आप देखते हैं कि एक लड़की रस्सी पर अपना संतुलन बनाने की कोशिश कर रही होती है। 

कभी मीडिया में रही अनुशा रिज़वी के लिए यह सीन बड़ा इंपॉर्टेंट रहा होगा। उनकी पटकथा का जानदार हिस्सा..यह सीन संतुलन साधने की सीमारेखा बताता है।

बहरहाल, पीपली लाइव हमारे किसानों की दशा पर एक डॉक्यु-ड्रामा सरीखा है। लेकिन कुछेक लूपहोल्स भी है। जैसे कोई भी चैनल अपने ओबी वैन को छतरी तान कर सड़क पर चलने की इजाजत नहीं देगा। यह गलती अनुशा ने कैसे की मुजे नहीं पता। 

दूसरे, दीपक (अर्थात् चौरसिया) का किरदार ज्यादा हल्का और इंडियाटीवीनुमा है। लेकिन वहीं अंग्रेजी की पत्रकार (संभवतः- बरखा) ज्यादा संतुलित नजर आती है। इसके मुझे कुछ कारण पहले ही नजर आ गए। फिल्म शुरु होने से पहले ही प्रणय और राधिका को धन्यवाद दिया गया है। ऐसे में अंग्रेजी चैनल से जुड़ी रहीं अनुषा अंग्रेजी के पक्ष मे ही खड़ी नजर आएं तो क्या हैरत? 

बहरहाल, पूरी फिल्म प्रशासन और और सरकार, मीडिया और राजनितिज्ञों पर कटाक्ष करती जाती है। इस फिल्म को आर्ट और कमर्शियल सिनेमा के बीच की कड़ी होने का पूरा हक़ है। 

लेकिन फिल्म देखने जा रहे हैं, तो इसकी गालियों बेहद ओरिजिनल चरित्रों और संवादों पर हंस कर वापिस मत आ जाएं। इससे निर्देशक की कोशिशों पर पानी फिर जाएगा। अच्छो हो आप व्यंग्य और विद्रूप को समंझें ....व्यंग्य सिर्फ हंसी में उडाने की चीज़ नहीं। 

और हां, दस्तावेज़ की तरह बनी ये फिल्म आने वाले दिनों में सिनेमा के विद्यार्थियों को स सिनेमा पर समाज के असर पढाने के काम आएगी।

बैठे-ठाली छंदब्द्ध गुस्ताखी

जय भोले महादेव-शिव-शंकर
मार दो अब दुश्मन को कंकर,

आज अखाडे मे भगवान,
घुमा दो तेजों में निज लंगर,

सामने दुश्मन आने ना पावे,
आ जाए तो जाने ना पावे.

मन के लड्डू फोड़-फोड़ के,
खाना चाहे तो खाने ना पावे,


उसे फंसा दो ऐसे जाल में,
घूमता फिरे फटे हाल में,


एक लंगड़ी ऐसी मारो,
बारहों महीना पिटे साल में

मारो ऐसा मिले ना पानी,
याद करा दो उसको नानी,

बुधवार, 11 अगस्त 2010

पिता को खोना सबसे बड़ा नुकसान है...

सावन की अमावस्या मेरे पिता की पुण्यतिथि होती है..। यह तारीख कल थी..। पिता रोज़ याद आते हैं लेकिन कल उन्हें याद करने की कई वजहें पैदा हो जाती हैं।

मैं मानता हूं कि जीवन में मां की मौजूदगी उसी तरह ज़रुरी होती है जैसे कि पौधे के लिए पानी। लेकिन पिता की मौजूदगी वैसी ही होती है जैसे उसी पौधे के लिए धूप, जैसे आंगन में नीम का छायादार पेड़...। मेरे पिता कोई बहुत असादारण इंसान नहीं थे। असाधारण इस अर्थ में कि उन्होंने किसी अंबानी की तरह न तो कोई बिज़नेस अंपायर खड़ा कर दिया, न अमिताभ की तरह कोई इतना नाम पैदा कर पाए कि बेटे-बेटियों यानी हमलोगों का भविष्य कुछ सुरक्षित कहा जा सके।


मेरे पिता महज एक टीचर थे। टीचरी उनका खानदानी पेशा था..मेरे पिता यानी रामदेव ठाकुर के पिता भी टीचर थे..क्योंकि आजादी के आंदोलन से जुड़ने खासकर गरमपंथियों से जुड़ने की वजह से सरकार ने खेती की सारी जमीनें छीन लीं। उनदिनों मिथिला दरभंगा महाराज की ज़मींदारी में था, और उनके दायाद-बांधव होते हुए भी अंग्रेज सरकार के खिलाफ होना कोई बुद्धिमानी मानता न था। उनदिनों भी टीचरी कोई पेट पालने का जरिया तो नहीं था कि ट्यूशन वगैरह पढ़ा लेते।

तो पिताजी का जीवन गरीबी में शुरु हुआ और खत्म भी गरीबी में ही हुआ। गरीबी से निकलने का न तो उन दिनों कोई उपाय था, आज भी नहीं है।

हाल ही में घर गया था, मधुपुर, तो पिताजी के हस्तलेख में कविता-पुस्तक पर नजर पड़ी। मां ने अमानत की तरह इसे गोदरेज के आलमिरे में संभाल रखा है। लॉकर में। कविता-पुस्तक कोई किताब नहीं है, यह लाल-नीली-हरी रोशनाई से पिताजी के सुंदर हस्तलेख में उनकी रचनाओं का संकलन भी है और उनकी डायरी भी।

उस दौर में जब पूरे देश में रौमांस का जादू सर चढ़कर बोलता था और देव आनंद और उसके बाद राजेश खन्ना लोगों के आइडल थे, पिताजी ने सिनेमा को कभी आम आदमी का माध्यम नहीं माना। उनके हिसाब से सिनेमा भूखे लोगों की भूख नहीं मिटा सकता है और यह भूखे लोगों की भूख को उसी तरह कुछ देर के लिए सुन्न कर देता है जैसे सिरदर्द की गोली दर्द को खत्म नहीं करती सुन्न कर देती है तंत्रिका तंत्र को।

मेरे पिता हारमोनियम, सितार और तबले बहुत अच्छी तरह बजा लेते थे। कविताएं लिखते थे..उनकी कविताओं में मैथिली कविताएं बाहुल्य में हैं। एक सब्जी होती है तोरी- जिसे मैथिली में कहते है झिंगुनी, या झिमनी। उसपर कविता है...उसके हरे पन पर उसके ताज़ेपन पर।

खैर..पिता को मैंने तब खो दिया जब मैं यह भी नहीं जानता था कि जीवन है क्या...जीवन में चीजों और इंसानों की अहमियत क्या होती है...जब मैंने बोलना भी नहीं सीखा था। 1982 से 2010....28 साल कम नहीं होते। अतीत की गर्द हर चीज़ पर जम जाती है। लेकिन पिता की स्मृतियां ऐसी हैं कि लगता है पिता आज भी मेरे सामने खड़े हैं। बेशक, उनकी तस्वीर कुछ धुंधली सी है।

दिक्कत ये कि पिता को तस्वीरें खिंचवाने से नफरत। बस , उनकी एक ही तस्वीर हमारे पास बची थी। और वह थी उनके शव के पास बिसूरती मां और हम सारे बच्चे..। वह तस्वीर हमें हमेशा विचलित ही करता है। फिर मेरे अध्वसायी बड़े भैया ने पिता के कॉलेज, मधुबनी से उनकी तस्वीर निकलवायी। अब वह एक कॉपी के तौर पर हमारे सामने हमारे दिलों के पास है।

मेरे पिता चित्रकला में भी हाथ आजमाते थे। रोशनाईयों से द्विआयामी चित्र उकेरना उनका शगल था। और इसी वजह से उनके कई विद्यार्थियों में चित्रकला की लगन भी लगी। पिता की मृत्यु के ठीक बाद सुरेश मांवडिया, जो बीएचयू से ताजा-ताजा बीएफए कर निकले थे या उस दौरान पढाई कर ही रहे थे...उनका एक पोट्रेट बनाकर मां  को भेंट की थी।

बहरहाल, पिता और उनके मूल्यों ने झंझावातों से हमें निकाला है। विरासत में कोई दौलत वह छोड़ नहीं पाए, लेकिन अपने बच्चों को अच्छा इंसान बनाने की उनकी चाहत पर हम कितने खरे उतर पाए यह तो वह स्वर्ग से ही देख पा रहे होंगे।

लेकिन फिर भी यह तय है कि जिन परिस्थितियों से मैं दो-चार हुआ, जो संघर्ष करना पड़ा, वह शायद पिता जीवित होते तो मुझे नहीं करना होता। जिन पलों में मुझे जीवन के आगे झुक कर समझौता करना पडा, पिता होते तो शायद मुझ जैसे कमजोर पौधे को सहारा दे देते...पर अफसोस। पिता को खोना दुनिया का सबसे बड़ा नुकसान है.....

रविवार, 1 अगस्त 2010

कितना विचारवान है हिंदी सिनेमा?

क्या हिंदी सिनेमा में कोई विचार है? या सिर्फ पैसा ही एकमात्र विचार है..

मंजीत ठाकुर

भारतीय सिनेमा खासकर हिंदी सिनेमा में विचारधारा की बात थोड़ी अटपटी लग सकती है, क्योंकि ज्यादातर हिंदुस्तानी फ़िल्में मसाले की एय्यारी और मनोरंजन का तिलस्मी मिश्रण होती हैं। लेकिन यह भी सच है कि मनोरंजन के तमाम सीढियों पर जाने और कला-शिल्प की आरोह-अवरोहों के बावजूद सिनेमा ने पिछले आठ दशकों में सामाजिक मकसद को भी एक हद तक पूरा किया है। फूहड़ से फूहड़ फिल्म में भी कोई एक दृश्य मिसाल की तरह बन जाता है और बेहद व्यावसायिक मसाला फिल्म में भी लेखक अपनी विचारधारा उसी तरह पेश कर देता है, जैसे समोसे के भीतर आलू।  
बहुत गंभीर फिल्में, जिनके निर्देशक कला पक्ष को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं- वहां विचारधारा निर्देशक पर आधारित और सोच समझ कर फिल्म में डली होती हैं। 1930 में, जब आजादी का आंदोलन जोर पकड़ चुका था व्रत नाम की एक फिल्म का मुख्य पात्र महात्मा गांधी जैसा दिखता था और लोगों से सच्चरित्रता की बातें करता था और इसी वजह से ब्रितानी सरकार ने इस फिल्म को बैन कर दिया। 


1936 में देविका रानी और अशोक कुमार की अछूत कन्या में दलित समस्या जो बाद में सुजाता में भी उभरकर सामने आई और बाद में 1937 में वी शांताराम ने दुनिया न माने में बाल-विवाह के खिलाफ आवाज बुलंद की।

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो दादा साहब फाल्के की मूक फ़िल्मों से लेकर नए दौर के सिनेमा और समांतर सिनेमा के युगों से होते हुए श्याम बेनेगल की ताजातरीन वेलकम टू सज्जनपुर तक जो विचारधारा हिंदुस्तानी फिल्मों में दिखती है वह उदारवादी मार्क्सवाद है। इसमें-बजाय व्यवस्था और सत्तातंत्र के खिलाफ हिंसक क्रांति के-सामाजिक न्याय और उदारवादी विरोध है। यह करीब-करीब गांधीवादी आदर्शवाद ही है।


हिंदुस्तान में कट्टर और क्रांतिकारी वामपंथी विचारधारा अगर फिल्मों में विकसित नहीं हो पाई तो इसकी वजह हिंदुस्तानी जनता ही है, जो अध्यात्म और भाग्य पर ज्यादा भरोसा करती है। यहां विभाजन वर्ण का है, वर्ग का नहीं; इसलिए यहां जाति, वर्ग से ज्यादा अहम है। इसलिए कुछ अपवादों को छोड़कर भारतीय सिनेमा में जो विचारधारा दिखती है वह सामाजिक न्याय की हिमायत करने वाली विचारधारा है।



इतालवी नव-यथार्थवादी विचारधारा के असर से भारत में एक फिल्म बनी- दो बीघा ज़मीन। इस फिल्म पर विक्तोरियो डि सिका की लीद्री दि वीसिक्लित्ते (वायसिकिल थीव्स) का असर साफ देखा जा सकता है। ग्रामीण अत्याचारी ज़मींदारी व्यवस्था और शहरी नव-सामंतवाद के खिलाफ इस फिल्म को एक दस्तावेज़ माना जा सकता है।


सत्तर के दशक की शुरुआत में एक ओर तो अमिताभ का अभ्युदय हुआ दूसरी ओर समांतर सिनेमा का। बहुधा लोग अमिताभ के गुस्सैल नौजवान को एक सामाजिक चेतना के तौर पर स्वीकार करते हैं। जंजीर का गुस्सेवर पुलिस इंस्पैक्टर हो या दीवार का नाराज़ गोदी मज़दूर, या फिर त्रिशूल का बदला भंजाने पर उतारु नौजवान..। हालांकि यह जनता की नाराजगी के रुप में स्वीकृत हुआ है, लेकिन है यह निजी गुस्सा ही। तीनों ही फिल्मों का नायक अपने परिवार का बदला ले रहा होता है, यह बात दीगर है कि किरदार के निजी अनुभव आम जनता से मेल खा गए। बनिस्बत इसके, अर्धसत्य के ओम पुरी के किरदार का गुस्सा अमिताभ के किरदारों से गुस्से से कहीं ज्यादा वैचारिक और सामाजिक चिंता से उपजा है।
दूसरी ओर उसी दौर के समांतर सिनेमा में वामपंथी विचारधारा अधिक मुखर हुईं। अंकुर, पार, निशांत अंकुश और आक्रोश जैसी फिल्में इसी वैचारिक संघर्ष को पेश करती हैं।


कई बार मुख्यधारा की फिल्मों में भी कई लेखकों ने कई ऐसे किरदार रच दिए जो पूरी विचारधारा तो पेश नहीं करते लेकिन आप तक अपनी बात पहुंचा कर ही दम लेते हैं। फिल्म बंडलबाज़ में जिन्न बने शम्मी कपूर आम इंसान की तरह पहाड़ चढ़ते वक्त राजेश खन्ना से कहते हैं कि आम आदमी होना कितना मुश्किल है।
अमिताभ बच्चन की प्रतिभा का फिल्मकारों ने विशुद्ध व्यावसायिक दोहन किया। लेकिन याद कीजिए फिल्म कुली का वह दृश्य जिसमें सुरेश ओबेरॉय और अमिताभ के बीच स्विमिंग पूल के पास मारपीट होती है। ओबेरॉय हथौड़ा उठा लेते हैं और अमिताभ के हाथ लग जाता है हंसिया। फिर हंसिया और हथौड़े का एक्सट्रीम क्लोज शॉट...निर्देशक ने अपना काम पूरा कर दिया, लेखक ने अपना। विचारधारा को बगैर फतवे के पेश कर दिए जाने का नायाब नमूना है यह।


कभी अमिताभ के लिए कठिन प्रतिद्वंद्वी बन चुके मिथुन फूहड़ फिल्में बनाने में उनके भी उस्ताद निकले। लेकिन ज़रा ध्यान दीजिए, मिथुन ने ज्यादातर फिल्मों में गरीब आदमी के किरदार निभाए हैंऔर उनकी प्रेमिका और खलनायक हमेशा धनी-पूंजीपति होते हैं। वर्ग संघर्ष दिखाने का यह तरीका आम आदमी को बहुत भाया। मिथुन की इसकी परंपरा को बाद में गोविंदा ने चलाया, लेकिन बाद में वह दादा कोंडके की राह पर चले गए।


एक दशक होने को आए, लगान ने भी क्रिकेट के बहाने निहत्थे आम आदमी के जीवन-संग्राम में  महज  साहस के बल पर कूद जाने की कहानी कही। नागेश कुकूनूर की इकबाल भी इसी आम आदमी के और भी छोटे स्वरूप को पेश किया। हाल में लगे रहो मुन्ना भाई और रंग दे बसंती ये दो फिल्में ऐसी ज़रुर आईं, जिनमें विचार हैं। प्रायः माफिया का किरदार निभाने वाले संजय दत्त लगे रहो..में गांधीगिरी करते नज़र आए। इस फिल्म ने उस दौर में जनता को अहिंसक विरोध के नए स्वर दिए, जब बदलती दुनिया में युवा पीढी गांधी को तकरीबन आप्रासंगिक मानने लगी थी। दूसरी ओर इसी युवा पीढी को विरोध का एक और विकल्प दिया, रंग दे बसंती ने।  

हालांकि, रंग दे.. में विरोध हिंसक है..लेकिन फिल्म सोचने पर मजबूर करती है। इसमे एक विचारधारा तो है। 


जाहिर है, हिंदी सिनेमा ने मनोरंजन तो किया है लेकिन उसकी भी सीमा है। सामाजिक मकसद से फिल्में तो बनी हैं, लेकिन बाजार ने हमेशा पैसे को विचारों से ऊपर जगह दी है। ऐसे में जब मणिरत्नम् भी डिस्ट्रीब्यूटर्स को लेकर जवाबदेह गो जाते हैं..तो बाकियों को क्या कहना। और नैतिकता...फिल्मी दुनिया में यह अनचीन्हा शब्द है।

शनिवार, 31 जुलाई 2010

सिनेमा में महिलाएं- बंदिनी और रुदाली



( यह आलेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 10 जुलाई को प्रकाशित हो चुका है)
मंजीत ठाकुर

"ये एक मज़लूम लड़की है जो इत्तेफ़ाक़न मेरी पनाह में आ गई है" फिल्म पाकीज़ा में यह डायलॉग बोलते वक्त राजकुमार को इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं रहा होगा कि वह भारतीय सिनेमा के एक सच का खुलासा कर रहे हैं। भारतीय फ़िल्मों की नायिका दशकों से ‘मज़लूम’ होने का बोझ ढोती आ रही हैं और ये सिलसिला कुछ अर्थों में आज भी क़ायम है।


हिंदुस्तानी सिनेमा के शुरुआती दौर में नायिकाओं के किरदार भी पुरुष ही निभाया करते थे और  सोलंके नामक एक अभिनेता को नारी की भूमिका निभाने के लिए पुरस्कार भी मिला था। गौर से देखे तों आज तक फिल्मों में नारी पात्रों को पुरुषवादी नज़रिए और अहं के साथ ही गढ़ा गया है। 

हिंदुस्तानी सिनेमा के पहले दशक की फ़िल्में धार्मिक किस्म की थीं और उनमें महिलाएँ देवियों जैसी थीं, जबकि कैकेयी और मंथरा वगैरह बुरी महिला पात्रों के स्टीरियोटाइप बने। गाँधी जी के असर में भारतीय समाज और सिनेमा दोनों ही बदलने लगे। 1937 में वी शांताराम  की ‘दुनिया ना माने’ में बूढे़ विधुर से ब्याही नवयुवती इस बेमेल विवाह को नाजायज़ मानती है।

लेकिन 'दुनिया न मानें' की शांता आप्टे को छोड़ दें तो शोभना समर्थ से लेकर ‘तदबीर’ की नरगिस या ‘तानसेन’ की खुर्शीद तक सभी नायिकाएँ वैसी ही गढ़ी गईं, जैसा हमारा समाज आज तक चाहता आया है।

महबूब ख़ान ने 1939 में औरत और 1956 में इसका भव्य रंगीन संस्करण मदर इंडिया बनाई।  केंद्रीय पात्र अपने सबसे लाडले विद्रोही पुत्र को गोली मार देती है क्योंकि वह गाँव की लाज को विवाह मंडप से उठाकर भाग रहा था। नरगिस द्वारा अभिनीत इस किरदार को ही दीवार में निरूपा राय के रुप में एक और शेड मिलता है।  बाद में मां के चरित्र का सशक्त विस्तार राम लखन, करण अर्जुन और रंग दे बसंती में दिखता है।




आज़ादी के बाद के आदर्श प्रेरित कुछ फ़िल्मों में नारी मन को भी उकेरने की कोशिश की गई। अमिया चक्रवर्ती की ‘सीमा’ और बिमल रॉय की ‘बंदिनी’ में महिला पात्रों ने कमाल किया। बिमल रॉय की सुजाता हरिजन लड़की के सपने और डर को तो ऋषिकेश मुखर्जी की 'अनुपमा' और 'अनुराधा' भी नारी की पारंपरिक छवि को जीती है। 

लेकिन फ़िल्म ‘जंगली’ के साथ रंगीन होते ही हिंदुस्तानी सिनेमा की पलायनवादी धारा ने नारी को वस्तु की तरह प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। सातवें दशक में श्याम बेनेगल ने ‘अंकुर’ और ‘निशांत’ में महिलाओं के खिलाफ सामंतवादी अन्याय की कहानी पेश की, और ये भी स्थापित किया कि भारतीय लोकतंत्र सामंतवाद का नया चेहरा है। लेकिन इस दौर की मुख्यधारा के सिनेमा में महिला किरदारों का काम महज नाच-गाने तक ही सीमित रहा।

नरगिस, कामिनी कौशल, मधुबाला और गीताबाली के साथ मीना कुमारी और नलिनी जयवंत भी अपने अभिनय से दर्शकों पर छाप छोड़ चुकी थीं, फिर भी 'अंदाज़' दिलीप कुमार की ही फ़िल्म मानी जाती रही, 'बरसात' राजकपूर की और 'महल' अशोक कुमार की।
हालांकि राज कपूर की ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ में अंग प्रदर्शन चरम पर था तो बाद में ‘प्रेम रोग’ विधवा समस्या पर सार्थक फ़िल्म थी। राजकपूर को यह श्रेय ज़रूर देना चाहिए कि उनकी नायिकाएँ किसी भी अर्थ में हीरो से कमतर नहीं रहीं।  वे औरत के उसी रूप में पेश करते रहे जिस रूप में वह हमारे समाज की देहरी के अंदर और बाहर रही हैं।

अमिताभ बच्चन के दौर में मारधाड़ में नायिका कहीं हाशिए पर फिसल गई। ‘अभिमान’ या 'मिली'  जैसी फिल्में जया भादुड़ी पर मेहरबान ज़रूर हुईं, पर इसी बीच परवीन बॉबी और जीनत अमान जैसी अभिनेत्रियों को केवल अपने जिस्म का जलवा दिखाकर ही संतुष्ट होना पड़ा।

सत्तर के दशक में भी नायिकाएं त्यागमयी, स्नेही, और नायक की राह में आँचल बिछाए बैठी एक आदर्श नारी बनी रही। इसके साथ ही ख़ूबसूरत होना और पार्क में साइकिल चलाते हुए गाना भी उसकी मजबूरी रहा है।




अस्सी का दशक हिंदी फिल्मों में कई लिहाज से अराजकता का दशक माना जाता है। इस दशक में कथा' और चश्मेबद्दूर  या 'गोलमाल' जैसी अलग महिला किरदारों वाली फ़िल्में तो आती हैं, पर ये परंपरा कायम नहीं रह पाती।

महेश भट्ट की अर्थ ने हालांकि महिला किरदारों की परंपरा को नए अर्थ दिए। फिल्म से हमें साधारण चेहरे-मोहरे लेकिन असाधारण प्रतिभा वाली अभिनेत्री शबाना आज़मी मिली। भट्ट की इस फ़िल्म ने एक मशहूर अभिनेत्री का मर्द पर हद से ज़्यादा आश्रय और बरसों से परित्यक्ता पत्नी के आत्मसम्मान को  दिखाया।

‘सुबह’ और ‘भूमिका’ भी इसी दशक में आईं और स्मिता पाटिल अपनी चमत्कारिक अभिनय क्षमता का लोहा मनवा गईं। अपनी मादक छवि से परेशानहाल डिंपल ने ‘जख्मी औरत’ ‘रुदाली’ और ‘लेकिन’ से महिला किरदारों के अलग आयाम प्रस्तुत किए।

‘सावन भादो’ से एक अनगढ़ लड़की के रुप में आई रेखा ने उमराव जान और खूबसूरत जैसी फिल्मों से  अपना अलग मुकाम बनाया लेकिन उनके किरदार में वैविध्य खून भरी मांग से ही आया।
काजोल ‘दुश्मन’ और ‘बाज़ीगर’ में कुछ अलग क़िस्म की भूमिकाओं में दिखीं लेकिन यहां भी उन किरदारों को हीरो का सहारा चाहिए था। रानी के 'ब्लैक' में कमाल के पीछे कहीं अमिताभ बच्चन का चेहरा झाँकता रहा। बहरहाल, रवीना टंडन की ‘सत्ता’ या गुलजार की 'हू तू तू' बेशक महिलाओं पर बनी अच्छी राजनीतिक कहानियां हैं। ऐसी ही कुछ प्रकाश झा की राजनीति भी है, जिसमें पहली बार कतरीना कैफ सिर्फ पलकें झपकाने की बजाय अभिनय करती नजर आई हैं।




बाजार की शक्तियों ने नायिकाओं को अभिनेत्री के आसन से उतार कर आइटम बना दिया। मल्लिका शेरावतों और मलाइका अरोड़ाओं के सामने तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त बेहद सीधे-साधे गीत नजर आते हैं।

हाल की इश्क़िया में विद्या बालन का किरदार अलग है। मिस्टर एंड मिसेज अय्यर और पेज थ्री की कोंकणा हालांकि शबाना और स्मिता की याद दिलाती हैं, लेकिन आज भी भारतीय दर्शक अपनी हीरोइन से यही कहना चाहता है, "आपके पाँव देखे, बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें ज़मीन पर न रखिएगा मैले हो जाएँगे..."











क्या लौटेगा खलनायक?

हिंदी सिनेमा में खलनायकों की सीमित और खत्म होती भूमिका
( यह आलेख दैनिक जागरण के 9 जुलाई 2010 के अंक में प्रकाशित हुआ है)

मंजीत ठाकुर


हिंदी फिल्मों का एक सच है कि अगर नायक की को बड़ा बनाना हो तो खलनायक को मजबूत बनाओ। उसे नायक जैसा बना दो। यह साबित करता है कि रामायण और महाभारत केवल राम और कृष्ण की वजह से ही नहीं, रावण और दुर्योधन की वजह से भी असरदार हैं। 

हिंदुस्तानी सिनेमा के पहले दशक में धार्मिक कथाओं और किंवदंतियों पर सारी फ़िल्में बनीं। इन कथाओं के नायक देव थे और खलनायक राक्षसगण।


हिंदुस्तानी सिनेमा में गांधी जी असर बेहद खास था और शायद इसी वजह से पहले चार दशक तक खलनायक बर्बर नहीं थे और उनके चरित्र भी सुपरिभाषित नहीं थे। उस दौर में प्रेम या अच्छाई का विरोध करने वाले सामाजिक कुप्रथाओं और अंधविश्वासग्रस्त लोग थे।


‘अछूत कन्या’ में प्रेम-कथा के विरोध करने वाले जाति प्रथा में सचमुच विश्वास करते थे। इसीतरह महबूब खान की ‘नज़मा’ में पारंपरिक मूल्य वाला मुसलिम ससुर परदा प्रथा नामंजूर करने वाली डॉक्टर बहू का विरोध करता है और 1937 में ‘दुनिया ना माने’ का वृद्ध विधुर युवा कन्या से शादी को अपना अधिकार ही मानता है।
 पचास और साठ के दशक में साहूकार के साथ दो और खलनायक जुड़े- डाकू और जमींदार। खलनायक का ये चरित्र ‘साहूकारी पाश’ का सूदखोर महाजन मंटो की लिखी ‘किसान हत्या’ से होते हुए अपनी बुलंदियों पर महबूब खान की ‘औरत’ में पहुंचा और कन्हैयालाल ने इसी भूमिका को एक बार फिर 1956 में ‘मदर इंडिया’ में प्रस्तुत किया।


भारत में डाकू की एक छवि रॉबिनहुडनुमा व्यक्ति की भी रही है और समाज में मौजूद अन्याय और शोषण की वजह से मजबूरी में डाकू बनने वाले किरदार लोकप्रिय रहे हैं। सुनील दत्त की सतही ‘मुझे जीने दो’ के बाद यह पात्र दिलीप कुमार की ‘गंगा-जमुना’ में 'क्लासिक डायमेंशन' पाता है।


सत्तर और अस्सी के दशक में तस्कर और व्यापारी विलेन बन गए और अब वे अधिक सुविधा-सम्पन्न और खतरनाक भी हो गए थे। चूंकि स्मगलिंग विदेशों में होती थी, इसलिए खलनायक के साथ एक अंग्रेज-सा दिखने वाला किरदार भी परदे पर आने लगा, जो दर्शर्कों की सहूलियत के लिए हिन्दी बोलता था।  


यह उस युग की बात है जब अर्थनीति 'सेंटर' में थी और आज जब अर्थनीति की रचना में ‘लेफ्ट’ शामिल है, ‘गुरू’ जैसी फ़िल्म बनती है जिसमें पूंजीपति खलनायक होते हुए भी नायक की तरह पेश है और आख़िरी रील में वह स्वयं को महात्मा गाँधी के समकक्ष खड़ा करने का बचकाना प्रयास भी करता है।


पाँचवे और छठे दशक में ही देवआनंद के सिनेमा पर दूसरे विश्वयुद्ध के समय में अमेरिका में पनपे (noir) नोए सिनेमा का प्रभाव रहा और खलनायक भी जरायमपेशा अपराधी रहे हैं जो महानगरों के अनियोजित विकास की कोख से जन्मे थे।


फिर समाज में हाजी मस्तान का उदय हुआ। सलीम-जावेद ने मेर्लिन ब्रेंडो की ‘वाटर फ्रंट’ के असर और हाजी मस्तान की छवि में ‘दीवार’ के एंटी-नायक को गढ़ा जिसमें उस दौर के ग़ुस्से को भी आवाज़ मिली।


इसी वक्त नायक-खलनायक की छवियों का घालमेल भी शुरु हुआ। श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ और ‘निशांत’ में खलनायक तो जमींदार ही रहे लेकिन अब वे राजनीति में सक्रिय हो चुके थे। इसी क्रम में पुलिस में अपराध के प्रवेश को गोविंद निहलानी की ‘अर्धसत्य’ में आवाज मिली और पुलिस के राजनीतिकरण और जातिवाद के असर को ‘देव’ में पेश किया गया।


इसी दौरान खलनायक अब पूरे देश पर अपना अधिकार चाहने लगे। सिनेमा ने अजीबोगरीब दिखने वाले, राक्षसों-सी हंसी हंसने वाले, सिंहासन पर बैठे, काल्पनिक दुनिया के से खलनायकों को जन्म दिया। शाकाल, डॉक्टर डैंग और मोगेंबो इन्हीं में से थे।


इसी बीच 1975 में एक ऐसा खलनायक आया जिसके बुरा होने की कोई वजह नहीं थी। वह बस बुरा था। वह गब्बर सिंह था, जिसका नाम सुनकर पचास कोस दूर रोते बच्चे भी सो जाते थे। हिन्दी समझने वाला ऐसा भारतीय मुश्किल ही मिलेगा, जिसने ‘अब तेरा क्या होगा बे कालिया’ न सुना हो।


अमजद खान के बाद वैसा खौफ सिर्फ ‘दुश्मन’ और ‘संघर्ष’ के आशुतोष राणा ने ही पैदा किया। इन दोनों फिल्मों का सीरियल किलर नब्बे के दशक के उत्तरार्ध के उन खलनायकों का प्रतिनिधित्व करता है, जो मानसिक रूप से बीमार थे।


मानसिक अपंगता के साथ शारीरिक अपंगता भी बॉलीवुड में खलनायकों के गुण की तरह इस्तेमाल की जाती रही है। अपनी क्षतिग्रस्त आंख के कारण ललिता पवार सालों तक दुष्ट सास के रोल करती रहीं। ‘डर’ के हकलाते शाहरुख और ‘ओमकारा’ का लंगड़ा त्यागी भी इसी कड़ी में हैं।


इसी बीच हीरो हीरोइन के घर से भागकर शादी करने वाली फिल्मों ने उनके माता-पिता को ही खलनायक बनाना शुरु कर दिया। इसके उलट ‘बागबान’ और ‘अवतार’ की संतानें अपने माता-पिता की खलनायक ही बन गईं। कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा तो ‘रोजा’ ने पाकिस्तान और आतंकवादियों के रूप में बॉलीवुड को एक नया दुश्मन दिया। इन्ही दिनों बॉलीवुड के चरित्न वास्तविक जीवन के चरित्नों की तरह आधे भले-आधे बुरे होने लगे। ‘परिंदा’, ‘बाजीगर’, ‘डर’, ‘अंजाम’ और अग्निसाक्षी जैसी फिल्मों ने एक नई परिपाटी शुरु की, जिनके मुख्य चरित्न नकारात्मकता लिए हुए थे।


लेकिन पहले सूरज बड़जात्या और फिर आदित्य चोपड़ा और करण जौहर ने अपनी फिल्मों से विलेन को गायब कर दिया। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में पिता शुरु में विरोध करते हैं और लगता है कि वे हीरो-हीरोइन के प्रेम में विघ्न पैदा करेंगे, लेकिन हीरोइन उनसे बगावत नहीं करती और हीरो मुकाबला नहीं करता। दोनों पिता का दिल जीतते हैं, इस कहानी में हीरोइन का मंगेतर हीरो के मुकाबले में आता है, लेकिन पूरी कहानी में उसकी जगह किसी प्यादे से ज्यादा नहीं है।


संयोग ऐसा रहा कि तीनों की फिल्में सफल रहीं। लिहाजा बाकी निर्देशकों को भी लगा कि अब फिल्मों में विलेन की जरूरत नहीं रह गई है। पिछले दस सालों में तनुजा चंद्रा की फिल्म दुश्मन का गोकुल पंडित ही ऐसा विलेन आया है, जिसे देखकर घृणा होती है। फिल्मों से खलनायकों की अनुपस्थिति का सबसे बड़ा नुकसान यही हुआ कि फिल्मों की कहानियों से नाटकीयता गायब हो गई है।


बहरहाल, सिनेमा अपने एकआयामी चरित्रों और कथानकों के साथ जी रहा है, लेकिन तय है कि खलनायकों की वापसी होगी, क्योंकि खलनायकत्व उत्तेजक है।