Wednesday, September 7, 2011

ये सोना, वो सोना

सोकर उठा तो सुना कि सोना 28 हजार रुपये तोला हो गया। पहले तो डर लगा, सोना इतना मंहगा !  जबकि सोना मेरा शगल है। जैसे ही मौका मिलता है, सो लेता हूं। मेरे सोने के कई रुप हैं...पॉवर नैप, झपकी, तंद्रा, उबासियां, नींद..गहरी नींद।...और मेरे नींद का एक अपररुप ऐसा भी है जिसमें मै प्रायः मरा हुआ मान लिया जाता हूं।

लेकिन इन सबका सोने से क्या लेना देना..। है लेना देना है। ऐसी ही एक सुबह जब मैं सोकर जगा तो मेरे मां के गले में पड़ा रहने वाला सोने का हार गायब हो चुका था। फिर एक-एक कर सारे गहने गायब हो गए। सोना फिर हमने अपने घर में कभी नहीं देखा। उस पीले सोने के साथ रात को चैन से सोना भी जाता रहा।

लेकिन मां लौह-महिला थीं। हम तीन भाईयों को पढा-लिखा दिया। दीदी की शादी भी हो गई, बड़े को नौकरी हुई..। फिर, हम सोने लगे। मैं गरमी की दुपहरों में अपने यायावर स्वभाव के अनुकूल ही इमली के पेड़ के नीचे भटकते रहने को अभिशप्त था, मां को कुछ चैन का सोना नसीब हुआ। (सोने की चेन अब भी नहीं मिली थी)
सर्वेगुणाःकांचनमाश्रियन्ति, सोने में हैं सारे गुण

फिर मुझे चस्का लगा सिनेमा देखने का। घर में हम लोग बेहद सस्ता वाला बिस्किट ही खाते थे। और हमारे घर में शाम की चाय के साथ बिस्किट कुतरने का चलन शुरु नहीं हुआ था। बिस्किट हम बस बीमार होने पर ही खाते थे। मैं प्रायः बीमार रहा करता था, बिस्किट भी मेरे ही हिस्से में ज्यादा आते थे। धीरे-धीरे मुझे बिस्किट से नफरत होने लगी। अपनी बीमारियों के दौरान मैं बेहद लंबी नींद लिया करता था। मेरे भाई को कई बार लगता था कि मैं मर गया हूं। सोने का वह मृत्यतुल्य आनंद आज खोजे से भी नहीं मिलता।

लेकिन, अचानक एक दिन मुझे ज्ञात हुआ कि बिस्किट महज मैदे या आटे के ही नहीं हुआ करते। बिस्किट अब सोने के भी होते थे। जिनके कंसाइऩमेंट को किसी जूहू या बोरीबंदर से अमिताभ तस्कर बन कर दूसरे तस्करों से छीन लाया करते, या खुद पुलिसवाले होते फिर भी तस्करों से छीन ही लाते।
हमने सीखा बिस्किट सोने के भी होते हैं

सोने के इन बिस्किटों से नायक विजय अर्थात् अमिताभ ने अपनी मां के लिए कई इमारतें खरीद दीं, या अपनी भाभी के लिए सुख-सुविधाओं और देवरानी का इंतजाम कर लिया। उस दिन हमने जाना कि बिस्किटें महज नफरतों के लायक नहीं होतीं। चैने से सोने के लिए सोने का होना बहुत जरुरी है।

फिर, जीवन की आपाधापी में सोने के लिए रात के सोने की कुरबानियां देनी पड़ी। पेशा ऐसा अपना लिया कि 10 जनपथ के सामने फुटपाथ पर रात गुजारनी पड़ जाती है। वहां भी सोना नहीं, गोल्ड फ्लेक की पूरी डिब्बी फूंक कर।
साठ-सत्तर के दशक में सोने की तस्करी को नए आयाम दिए


मेरी पसंदीदा सिगरेट का हिंदी तर्जुमा भी स्वर्ण फलक (गोल्ड फ्लेक) ही है। इसमें भी सोना..सोना बहुत अहम है। जीवन का दर्शन सोना है। संस्कृत वांगमय कहता भी है-सर्वेगुणाः कांचनमाश्रियान्ति, सभी गुण सोने में ही हैं।

हां, सभी गुण सोने में ही हैं। कल रात जब सोनिया गांधी महामाई के इंतजार में हम रात भर 10 जनपथ के सामने पहरा देते रहे...महामाई आवें..हम उनकी एक झलक को कैमरे में कैद करें...देशवासियों को उनकी वही झलक दिखलावें, देशवासी दिन भर कृत-कृत्य होते रहें।

क्या गजब, सोनिया के नाम में भी सोना है, सोनी के नाम में भी। बहरहाल, रात भर जागने के बाद जब झपकियां आने लगीं, तब पता चला सोने का सही अर्थ।

हमारे बिजनेस रिपोर्टरों ने एक दिन शिलाजीत के महत्व की तरह सोने का महत्व समझाया। कहा, कच्चे तेल की कीमत गिरती है, तो सोने की कीमत बढ़ती है। काला सोना बनाम पीला सोना। यहां भी सोना।
टीवी के एक क्राइम शो का एंक चीख-चीख कर चैन से सोने के लिए जाग जाने का आह्वान किया करता है।

यह तो टीवी का ही महात्म्य है कि सोने की आसमान की तरफ उछलती कीमतों से घरवाली कभी भी गहनों की मांग नहीं करती। वरना मेरी नींद पर डाका डलता।

मेरी नजर में तो तकिए पर सिर रखकर सोना एक बेहद कीमती एहसास है, वरना हमने तो वेंटिंग रुम में बिना तकिए के कई रातें गुजारी हैं। सोने के दौरान आप करवट बदल सकते हैं, खर्राटे मार सकते हैं, सपने में जिसे चाहे उसे बुला सकते हैं। कालकवलित हो चुकी डायना से लेकर किसी डायन तक को, मधुबाला से लेकर कैटरीना कैफ तक। आप कई क्विंटल सोना खर्च कर दें, मधुबाला से तो नहीं मिल सकते..लेकिन तकिए पर सोना सब मुमकिन कर देता है।....तो बताइए कौन ज्यादा बेहतर है, 28 हजार रुपये तोला या नरम गद्दे पर तकिए पर सिर टिका कर, खर्राटायुक्त सोना..।


बहरहाल, रात गहराती जा रही है मेरे लिए 28 हजार रुपये तोला से

Saturday, September 3, 2011

पुरवैया-सी आंखेः कविता



वो आंखे,
जिनमें जहान समाया था
वो आंखे,
जो बोलती थीं
फर-फर
पुरवैया की तरह,
वो आंखे,
जिनमें थी हरकतें किसी-
गोरैया की तरह,
वो आंखे-उनींदी-सी आंखें
जिनमें देखा था मैंने खुद को
खुदा को
जिनमें बहती थी नदी
अविरल
जिनमें मैं बह गया
अविकल
उसी नदी के किनारे
बैठकर देखता रहा अपनी ही परछाई
उन्हीं आंखों में,
जिनमें जहान समाया था
जिनके बंद पलकों को-
जिनको मैं बस छू भर पाया था।


उन्हीं आंखो-पलकों में
बंद हैं मेरे सपने
मेरे अपने
जैसे भंवरा क़ैद हो जाता है
किसी कमल की पंखुडियों में।।

Wednesday, August 31, 2011

बुंदेलखंड की बेटियां

सरकारी योजनाओं का जंजाल अनपढ़ गांववालों के लिए एक उलझाऊ तानाबाना है।

इसी तानेबाने में फंस कर रह गई उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष वृक्षारोपण योजना। साल 2008 में यूपी सरकार ने 10 करोड़ पेड़ लगाने की योजना बनाई। इस काम में वन विभाग के साथ-साथ विद्युत विभाग, पीडब्ल्यूडी, सिंचाई विभाग, पंचायतें और प्राइवेट ठेकेदार लगे। हर पेड़ की लागत बैठी तकरीबन 600 रुपये..पैसा था मनरेगा और वन विभाग का..लेकिन बुंदेलखंड के किसी जिले में वो 10 करोड़ पेड़ कहीं नहीं दिखते।

इस वृक्षारोपण की मॉनीटरिंग करने वाले पी के सिंह कहते हैं कि उन्हें ज्यादातर पौधे पॉलीथीन बैग समेत ही मिले, उन पर मिट्टी डालने की जहमत भी नहीं उठाई गई थी, उन्हें यूं ही गड्ढों में फेंक दिया गया था।

केंद्र सरकार ने 7,277 करोड़ रुपए का पैकेज पिछले साल नवंबर में बुंदेलखंड को दिया। इनमें से 3,506 करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के हिस्से आएंगे। हालांकि इस रकम से उम्मीदें बढनी चाहिए थीं...लेकिन उम्मीदों से अधिक चिंताओं ने सिर उठाना शुरू कर दिया है।

ये चिंताएं इतनी बड़ी राशि की लूट से जुड़ी चिंताएं हैं, क्योंकि यह रकम भी उसी चैनल के जरिए और उन्हीं योजनाओं पर खर्च होनी है जिनकी कहानी हमने आपको दिखाई है।

2010-11 में केन्द्र सरकार ने बुंदेलखंड को दिए पैकेज से मिले पैसों में राज्य सरकार के 10 विभाग शामिल किए गए। इनकी योजनाओं को 2 साल के लिए मंजूरी मिली। उम्मीद तो जगी लेकिन प्रबंधन की असलियत कुछ और ही है।

बांदा जिले को 2010-11 के लिए 213 करोड़ रुपये आवंटित हुए। जिनमें से पहले साल 10 सरकारी महकमों को 40 करोड़ दिए गए।

पशुपालन विभाग 1.75 करोड़ रुपयों में से महज 4 लाख रुपये खर्च कर पाया। जबकि, भूमि विकास विभाग 5.22 करोड़ में से 2.37 करोड़, लघु सिंचाई विभाग 12.01 करोड़ में से 7.95 लाख, कृषि विभाग 5.30 लाख में से 3.20 करोड़, सिंचाई विभाग 12.89 करोड़ में से 9.72 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाया।

इस तरह बांदा जिले को आवंटित 40.38 करोड़ रुपयों में महज 29.73 करोड़ ही खर्च हो पाए और 10.65 करोड़ रुपये बगैर खर्च हुए वापस चले गए। पशुपालन विभाग को पैकेज के तहत 28 कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र खोलने थे और इसके लिए 1 करोड़ 44 लाख रुपये उसे मिले भी, लेकिन पशुपालन विभाग एक भी गर्भाधान केन्द्र खोलने में नाकाम रहा।

जिस क्षेत्र में और जिस काम में सरकारी मशीनरी नाकाम रही, वहीं कुछ लोगों के व्यक्तिगत प्रयासों ने साबित किया कि हिम्मत और लगन हो, इच्छा हो तो कोई भी काम नामुमकिन नहीं रहता।

हालांकि, इन व्यक्तिगत प्रयासों से बुंदेलखंड की हर समस्या का स्थायी समाधान मुमकिन नहीं, लेकिन ये प्रयास उम्मीद जगाते हैं..और नई राह दिखाते हैं।

नई राह दिखाने वाली शख्सियतों में से एक हैं नीतू सक्सेना। उनकी दुबली काया पर मत जाइए, एमए पास यह लड़की बुंदेलखंड की असली बेटी है। फौलादी इरादों वाली नीतू ने अपने आस-पास आत्महत्याओँ का दौर देखा। पिता के भी उसी राह चले जाने के डर ने उनके अंदर एक नई राह को रौशनी दिखाई।

नीतू सक्सेना ने अपनी सहेलियों रीना और गुड़िया परिहार के साथ घर-घर जाकर पहले तो कर्जदारों और भूखे परिवारों की सूची बनाई। इनमें से उनके गांव में छह परिवार बूखमरी के शिकार निकले। नीतू ने इसके लिए नई राह खोज निकाली।

महिलाओं को दादरा यानी गाने बजाने के लिए इकट्ठा किया। बुंदेलखंड में दादरा के दौरान आखत की परंपरा है। यानी गाने के लिए आने वाली महिलाएं अपने साथ अनाज लाकर इकट्ठा करती है, जो बुलावा देने वाले नाई का होता है। लेकिन यहीं नीतू ने एक छोटा-सा बदलाव किया।

आखत में आने वाला अनाज नीतू ने भूखे परिवारों में बांट दिया। नीतू का यह प्रयास आज अगल-बगल के 58 गांवों में फैल चुका है। लेकिन, नीतू सिर्फ अनाज बांट कर ही चुप नहीं बैठी..। उन्होंने महिलाओं को साथ लेकर आसपास के नलों के पास बेकार पड़े पानी को जमा करने के लिए वॉटर रिचार्ज पिट बनाए। इससे सूखे पड़े नल भी जी उठे।


...सवाल है कि बुंदेलखंड को क्या चाहिए...बुंदेलखंड को ईमानदार कोशिशों की जरुरत है। साफ-सुथरी सरकारी मशीनरी अगर आम लोगों को साथ लेकर कोशिश करे तो सूखता जा रहा बुंदेलखंड शायद फिर जी उठे। समाज को पानीदार बनाने की कोशिशे...और लोगो के साथ की जरुरत है बुंदेलखंड को। वरना अकाल पड़ने से ज्यादा खतरनाक है अकेले पड़ जाना। 

संकट के समय समाज में एक दूसरे का साथ निभाने की परंपराएं पूंजी की तरह थीं...संवेदना की इस पूंजी के सहारे हमने कई बड़े संकट पार किए हैं। लेकिन सवाल है कि मशीनरी में आए ईमानदारी के अकाल का क्या करें..सवाल ये भी है कि संवेदना की पूंजी हमारे पास बची भी है या नहीं।



Thursday, August 25, 2011

लोकतंत्र-लोकतंत्रः कविता


लोकतंत्र-शोकतंत्र
हो गया वोटतंत्र
वोटतंत्र-चोटतंत्र
शोषण का एक यंत्र
लोकतंत्र शोकतंत्र
लूट-खसोटतंत्र
सब हमारा मालतंत्र
कैसा से कमाल तंत्र
माथे गिनते रहे
बन गया अब थोकतंत्र
थोकतंत्र-थूकतंत्र
कमाई का अचूकतंत्र
चूकतंत्र, भूखतंत्र
तन गया है सूखतंत्र
सूखतंत्र, रसूखतंत्र
सबसे बड़ा चूसतंत्र
चूसतंत्र, थूकतंत्र
थूकतंत्र-थोकतंत्र
शोकतंत्र-फोकतंत्र
लोकतंत्र-लोकतंत्र

Wednesday, August 24, 2011

फलक (फेसबुक लघु कथाएं)- तीन उम्दा रचनाएं

मित्रों, नई मीडिया के सामने आने पर हमने सोचा की कथा के स्वरुप में भी एक बदलाव जरुर आना चाहिए। फेसबुक पर इसी अंदाज में रवीश कुमार लप्रेक (लघु प्रेम कथाएं) लिख रहे हैं। हमने सोचा सभी कथाएं प्रेमकथाएं नही होती, ऐसे में फलक की शुरुआत हुई। पहले इसका नाम फेलक था, लेकिन अजय ब्रह्मात्मज के सुझाव पर इसे फलक कर दिया, जाहिर है बेहतर है। फलक के हाल-फिलहाल की तीन कथाओं को हम यहां साझा कर रहे हैं, इनके शीर्षक भी नहीं है। आप चाहें तो शीर्षक सुझा सकते हैं।---


कथा एकः  
'कभी हमारे घर को भी पवित्र करो।' करूणा से भीगे स्वर में भेड़िये ने भोली-भाली भेड़ से कहा 'मैं जरूर आती बशर्ते तुम्हारे घर का मतलब तुम्हारा पेट न होता।' भेड़ ने नम्रतापूर्वक जवाब दिया।
कथाकार- नीरज शर्मा। 

कथा दोः
इंद्रप्रस्थ मे अन्ना की रैली देखने युधिष्ठिर भी पहुंचे। कुछ देर बाद गला प्यास से सूखने लगा तो पास के नल पर पहुंचे। नल खोला तो सूं सूं की आवाज के बाद एक कीड़ा नल से टपका और देखते ही देखते एक यक्ष मे तब्दील हो गया। यक्ष ने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक युधिष्ठिर से प्रश्न पूछा " हे युधिष्ठिर! इस रैली के बाद फिर से कौन छला जाएगा? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया हे यक्ष! इस बार फिर जनता ही छली जाएगी। यक्ष ने फिर प्रश्न पूछा "तो युधिष्ठिर इस भारत भूमि पर फिर कौन राज करेगा? युधिष्ठिर ने जवाब दिया " हे यक्ष! इस भारत भूमि पर राजपरिवार की अगली पीढ़ी ही हज़ारे उपनाम लगा कर राज करेगी। नल से पानी शर्मसार होकर बहने लगा था।
कथाकारः सिद्धार्थ श्रीवास्तव।  
(2 दिसंबर 1972 को पैदा हुए  सिद्धार्थ ने गोविंद वल्लभ पंत यूनिवर्सिटी ऑफ अग्रीकल्चर एंड टेक्नॉलजी से पढाई की है। फेसबुक पर मेरे मित्र है।)

कथा तीनः
सरकारी नाई ने बाल काटते समय कपिल सिब्बल से पूछा- 'साहब, यह स्विस बैंक वाला क्या लफड़ा है? सिब्बल चिल्लाये, 'अबे, तू बाल काट रहा है या इन्क्वारी कर रहा है?
नाई बोला, सॉरी। 
अगली बार नाई ने चिदम्बरम से पूछा- 'यह काला धन क्या होता है? चिदम्बरम चिल्लाये- तुम हमसे ये सवाल क्यूँ पूछता है? 
अगले दिन सीबीआई की टीम ने नाई से पूछताछ की। 
क्या तुम बाबा या अन्ना के एजेंट हो? 
नहीं, 
तो फिर तुम बाल काटते वक़्त काग्रेस के नेताओं से फालतू सवाल क्यूँ करते हो? 
नाई बोला- साहब ना जाने क्यूँ स्विस बैंक और काले धन के नाम पर इन कांग्रेसियों के बाल खड़े हो जाते है और मुझे बाल काटने में आसानी हो जाती है. इसलिए पूछता रहता हूँ...!
कथाकार- सुशांत झा। 
आईआईएमसी से रेडियो-टीवी पत्रकारिता पढ़ चुके सुशांत की राजनीतिक समझ बहुत बेहतर है। फिलहाल, कुछ अंग्रेजी किताबों के अनुवाद में लगे हैं। शीघ्र प्रकाश्य।
 

Thursday, August 18, 2011

राहत के सूखे चैक- बुंदेलखंड का सच

बुंदेलखंड का त्रासदी सिर्फ बारिश की कमी ही नहीं है। प्रशासन में समझदारी और संवेदनशीलता की कमी हालात को बदतर बना रहे हैं। सरकारी मशीनरी के चक्कर में आम जनता चकरघिन्नी बनी है।सूखा राहत में 12 रुपये के चैक किसानों को दिए गए हैं..ये आखिर माजरा क्या है?


2002 से ही सूखे की स्थिति से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने सूखा राहत अभियान चलाया..और किसानों को इसके लिए मुआवजा भी दिया। लेकिन..10 बीघे के काश्तकार के लिए सूखा राहत की रकम अगर 12 रुपये हो तो... तो आपको ये एक मज़ाक लग सकता है।

..थोड़ा कड़वा सही, लेकिन सच यही है कि सूखा राहत के नाम पर किसानों को 12, 15, 27, 30 और 39 रुपये के चैक राज्य सरकार ने दिए हैं। मालूम हो कि इन चैकों को भुनाने के लिए खुलने वाले बैंक खाते का खर्च 500 रुपये आता है।

सुशील कुमार, मंझोले किसान हैं। उनके तीन भाईय़ों को सरकार ने 30-30 रुपये के सूखा राहत चैक दिए। चैक तुलसी बैंक का है। सुशील कहते हैं, ये राज्य सरकार ने हमारे साथ अच्छा मजाक किया है, सूखा राहत के नाम पर।

लेकिन बुंदेलखंड में सूखे से राहत पाना कोई मजाक नहीं।

पानी की समस्या से निजात पाने के लिए ही बड़े किसानों ने ट्यूब वैल का सहारा लिया। ट्यूब-वैलों के बढ़ते चलन से भूमिगत जल का दोहन बढता गया...और अब यह जलस्तर खतरनाक तरीके से नीचे जा रहा है। 

 
पूरे यूपी-बुंदेलखंड में समूचे खेती लायक ज़मीन का 41 फीसदी ही सिंचित है। कुल सिंचित भूमि का 48 फीसद नहरों से, 4 फीसद कुओं से, 7 फीसद निजी स्रोतों से और 41 फीसद बाकी के दूसरे साधनों से सींचा जाता है। ट्यूब वैल और पंपिंग सैट इन्ही बाकी के 41 फीसद में आते हैं।

जाहिर है, भूमिगत जल पर दबाव काफी बढा है।

साल 2003 में बांदा में भूमिगत जलस्तर 0.75 मीटर, चित्रकूट में 1.05 सेमी, महोबा में 2.11 सेमी, और हमीरपुर में 1.55 सेमी था। साल 2005 में भूमिगत जलस्तर घटकर बांदा में 1.02 सेमी, चित्रकूट में 1.79 सेमी, महोबा में 1.89 सेमी, और हमीरपुर में 1.59 सेमी हो गया। जबकि, 2006 में इसी ट्रेंड में बांदा में यह 1.62 सेमी, चित्रकूट में 2.19 सेमी, महोबा में 2.09 सेमी, और हमीरपुर में 1.69 सेमी तक चला गया।

बारिश की कमी से भूमिगत जलस्तर रिचार्ज नहीं हो पा रहा..और सूखे की वजह से लगातार हो रहे दोहन ने धरती का कलेजा तार-तार कर दिया।

अब यह कुदरत का कहर है या धरती के भीतर से लगातार खींचे जा रहे पानी की वजह, बुंदेलखंड में धरती कई जगहों पर फट पड़ी है। सूखे के बाद कुदरत का ये एक और क़हर बुंदेलखंड के लोगों को डरा रहा है। 

क्या बुंदेलखंड को सूखे से बचाने का एकमात्र ज़रिया बारिश ही है..? क्या कोई और उपाय नहीं..? उपाय है..और था।

बुंदेलों ने इस सूखे इलाके को हरा रखने के पुख्ता इंतजाम किए थे। तालाब बनाकर। लेकिन बदलते राज और समाज ने तालाबों को बिसरा दिया।


सूखे की वजह से पूरे बुंदेलखंड के करीब 2 लाख 80 हजार कुओं में से अधिकतर बेकार पड़ गए हैं। हालांकि, कुछ खर्च से उन्हें फिर से इस्तेमाल के लायक बनाया जा सकता है। लेकिन, ठेकेदारों और अधिकारियों के लिए नए कुएं-तालाब खुदवाना फायदे का सौदा होता है।

इसकी मिसाल हैं कुलपहाड़ तहसील के बरजोरा करन। बुंदेलखंड में सरकार की 30,000 कुएं खोदने की योजना के तहत बरजोरा करन की जमीन में कुएं खोदने को मंजूरी मिली। लेकिन पानी नहीं निकला...क्योंकि बरजोरा करन के बेटे ने 5 हजार की रिश्वत देने से इनकार कर दिया था।

ठेकेदार ने उनके पहले से ही खुदे हुए सूखे कुएं में थोड़ी खुदाई कर दी, और फिर उसे वैसे ही छोड़ गए।

बरजोरा के भाई इस समझौते के लिए तैयार थे...ऐसे में थोड़ी ही दूर पर उनके खेत में खुदे कुएं में पानी निकल आया।


ऐसी गड़बडियों का विस्तार तालाब की तरह चौड़ा है। राज्य सरकार की योजना थी, 30 हजार तालाब खुदवाने की। नारा था, खेत का पानी खेत में। इसके तहत ठेकेदारों के ज़रिए मॉडल तालाब खुदवाए गए।

इन मॉडल तालाबों के चारों ओर बाड़ लगी है। तर्क ये कि इससे तालाबों के किनारे लगाए गए पेड़ सुरक्षित रहेगे। ..लेकिन बाड़ से घिरी इस जमीन से पेड़ भी अदृश्य हैं, पानी भी..। इस जमीन को तालाब कहना बहुत मुश्किल है..जब तक कि यहां मॉडल तालाब का साइन बोर्ड न लगा हो।

खेत का पानी खेत में के नारे ने कई छोटे किसानों के खेत छीन लिए। तालाब खुदवाने के दौरान स्थानीय लोगों के तजुरबे को तवज्जो नहीं दी गई। नतीजा ये कि तालाब सबसे ऊंची जमीन पर खोद डाले गए। नतीजतन ये तालाब बारिश का पानी मापने के कटोरे बनकर रह गए हैं। कई किसान अब इन तालाबों की वजह से अपना सर पीट कर रह गए हैं।


तालाबों के ये काम मनरेगा के पैसे से किए गए थे। सोच ये थी कि शायद इससे सूखे से त्रस्त लोगों को थोड़ी राहत मिल जाएगी।

लेकिन महोबा जिले में मनरेगा लागू करने वाली पंचायत ही गड़बडियों की जड़ साबित हो रही है। जिले के बेलाताल विकास खंड के बमहोरी गांव में कच्ची सड़क बनाने का काम चल रहा है। लोग मनरेगा में काम तो कर रहे हैं...लेकिन उनके पास जॉब कार्ड नहीं है। सवाल है कि अगर जॉब कार्ड नहीं है तो मजदूरों को भुगतान कैसे होता है..? भुगतान होता है नकद, जो कि मनरेगा के निर्देशों का खुला उल्लंघन है।

मनरेगा के तहत काम कर रहे मजदूरों में महिलाएं भी हैं। लेकिन, न तो पानी पिलाने वाले की व्यवस्था है न बच्चों की देखभाल करने वाले की। मेडिकल किट की बात तो भूल ही जाइए। पंचायत सदस्य खुद काम के मेट बने हैं..इसके लिए रोजाना सौ रुपये उन्हें मिलते भी हैं, लेकिन हमें उनसे सवालों के जवाब नहीं मिलते। 

इस काम में बच्चे भी लगे हैं। काम में बच्चों का लगाना भी मनरेगा के निर्देशों का खुला उल्लंघन है। बच्चों का पैसा उनके मां बाप को मिलता है। खाता नहीं है, जॉब कार्ड नहीं है..

भुगतान होता कैसे हैं..मेट साहब के पास फिर से जवाब नहीं..। मजदूरों का पिछला भुगतान भी बकाया है.. मेट साहब के पास इसका भी जवाब नहीं. वो ब्लॉक दफ्तर पर टालते हैं।

कुलपहाड़ तहसील में ही कर्रा गांव कौशल किशोर चतुर्वेदी बैंक के हाथों ट्रैक्टर और साढे तीन एकड़ जमीन गंवाने के बाद कौशल खेती छोड़कर मजदूरी में लगे। अब मनरेगा की मजदूरी उनके उसी बैंक के खाते में आई जिससे उन्होंने कर्ज लिया था। अब बैंक पहले उनसे कर्ज चुकाने को कह रहा है, उसके बाद ही वह मनरेगा की मजदूरी का भुगतान करेगा।

अब कौशल किशोर बकाया रकम केलिए बैंक का चक्कर काटने का भी कोई फायदा नहीं देखते। निराश आंखों से अपने बाकी के खेतों की तरफ देखते हैं।

कर्रा गांव के ही अमर सिंह, 2008-09 से ही मनरेगा के तहत किए गए अपने काम की मजदूरी के लिए भटक रहे हैं..वह न तो उनके जॉब कार्ड में दर्ज है न वन विभाग वाले बता रहे हैं। टालमटोल का यह खेल, चिंता पैदा करता है।

बेसहारा हनसू की वृद्धावस्था पेशन पिछले तीन साल से बंद है। उनकी सुनने वाला कोई नहीं। अनपढ़ गांववालों के लिए यह सब एक उलझाऊ तानाबाना है।

जारी....

Monday, August 15, 2011

चल उड़ जा रे पंछीः बुंदेलखंड का सच

पिछले पोस्ट से आगे...

बांदा जिले में ही सूखे की कहानी का यह सबसे बुरा किस्सा है। गांव में सारे पानी के स्रोत सुख गए। एक धनी-मानी घर को छोड़कर, सिर्फ एक तालाब बचा था, जिसमें पानी गड्ढे में बचा था। उसके लिए भी मारा-मारी।

पानी की मारामारी में कभी पानी मिल पाता कभी नहीं। उस पैसेवाले के घर के पास ही रहती थी वह महिला। पड़ोस से पानी, जेट पंप से लेना आसान भी था, और साफ पानी भी मिल जाता था। एक दिन मौका देखकर उस घर के मनचले नौजवान ने महिला को छेड़ दिया। महिला चुपचाप चली आई। तीन-चार दिन वह पडोसी के घर पानी लेने नहीं गई। लेकिन कोई रास्ता न था।

पानी फिर लेने गई तो वह नौजवान ढीठाई पर उतर आया था। आखिरकार, एक बाल्टी की पानी एक महिला की इज्जत बैठी।

इस खबर ने बुंदलेखंड के लोगों को आंदोलित किया, और कई गांवों में तालाब खोदने जैसे प्रयास शुरु हुए। लेकिन प्यास बुझाने का कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं हो पाया।


भूख और प्यास ने बुंदेलखंड के लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल की आंतरिक समिति की रपट के मुताबिक झांसी जिले से लाख 58 हजारललितपुर से लाख 81 हजारहमीरपुर से 4लाख 17 हजारचित्रकूट से लाख 44 हजारजालौन से लाख 38हजारबांदा से लाख 37 हजार, और महोबा से लाख 97 हजार किसान अपना घर-बार छोड़कर बाहर निकल चुके हैं।

यानी सात जिलों की 82 लाख की आबादी में से 32 लाख लोग बुंदेलखंड से बाहर रह रहे हैं। यह पूरी आबादी का 40 फीसदी से ज्यादा है।

वीर आल्हा-ऊदल की धरती....जिन्होंने कभी मैदान में पीठ नहीं दिखाई। उन्हें पानी अपनी धरती छोड़ने पर मजबूर कर रहा है। जिन्हें हमलावरों की फौजे हरा नहीं पाई...उन्हें पानी ने हारने पर मजबूर कर दिया है।

पानी की कमी ने बुंदेलखंड के अतर्रा इलाको को भी बदल डाला है।  अतर्रा डेढ़ दशक पहले तक एशिया की दूसरी सबसे बड़ी धानमंडी हुआ करती थी। उस वक्त तक यहां 37 चावल की मिलें हुआ करती थीं। लेकिन आज की तारीख में सारी की सारी बंद हो चुकी हैं।

अतर्रा के मिलों के सारे पल्लेदार (चावल मिलों में काम करने वाले) बेरोज़गार हो गए हैं। जाहिर है, वह अब अगल बगल के शहरों इटावा के ईंट भट्ठों का रुख कर रहे हैं, या फिर दि्ल्ली जैसे शहरों में रिक्शा चला रहे हैं। दरअसल,. पिछले कुछ साल में बुंदेलखंड में नहरों का कमांड एरिया सिकुड़ गया है। 

बुंदेलखंड का यह इलाका एशिया में बांधों की सबसे ज्यादा घनत्व के लिए जाना जाता है। बांध की तली में जमी गाद  से बांधों की क्षमता बहुत कम हो गई है। साथ ही नहरों में भी जमा गाद की बरसों से सफाई नहीं हुई है। ऐेसे में पानी कम खेतों तक ही पहुंच पा रहा है। 

राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बांदा जिले में पिछले साल कुल 3.4 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में से सिर्फ 27 हजार हेक्टेयर भूमि को ही इन बांधों से पानी मिल पाया था।


सिंचाई विभाग के लोग ऐसे में किसानों को बताना भी ठीक नहीं समझते। पहले जब बारिश ठीक होती थी, या नहरों का पानी इतना कम नहीं आता था तो किसान धान की फसल के लिए बीज खेतों में डालते थे, लेकिन जब बिचड़े खेतों में ही सूख जाने लगे, तो पता लगा नुकसान बहुत गहरा है। 

(पंद्रह साल पहले तक बुंदेलखंड में 54 दिन बरसात के होते थे। लेकिन अब ...बरसात के ये 54 दिन घटकर 20 हो गए हैं।)

नहरों और बांधों की क्षमता पहले से 65 प्रतिशत कम हो गई है, और धान का उत्पादन पहलेसे महज 30 फीसद ही रह गया है। ...अतर्रा का मशहूर सेला चावल बीते दिनों की बात हो गई है। यहां के किसान पुराने जमाने की शरबती और ऐसी ही दुर्लभ धान की नस्लों को याद कर आह भरते हैँ।