Saturday, April 16, 2022

पर्यावरण के प्रति प्रेम का पर्व है मिथिला के नववर्ष का त्योहार जूड़-शीतल

देश के विभिन्न हिस्सों में नववर्ष अलग रीतियों से मनाए जाते हैं. गुड़ी परवा हो या बैशाखी, बिहू हो या फिर जूड़-शीतल. जूड़ शीतल मिथिला का परंपरागत त्योहार है, जो मूल रूप से पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और स्वच्छता से जुड़ा है. इस त्योहार के साथ ही मिथिला के नववर्ष की शुरुआत होती है.

असल में, यह मिथिला की प्रकृतिपूजक संस्कृति का अद्भुत त्योहार है. इस त्योहार के संबंध में अयोध्या प्रसाद ‘बहार’ ने अपनी किताब ‘रियाज-ए-तिरहुत’में भी ऐसा ही जिक्र किया है. लेकिन, परंपराओं के परे, ग्लोबल वॉर्मिंग के इस दौर में, जब समूची कुदरत में अलग-अलग किस्म के बदलाव दिख रहे हैं और दर्ज किए जा रहे हैं, जब परंपराओं को खारिज किया जा रहा है, उस वक्त इस त्योहार की सार्थकता और उपयोगिता और अधिक बढ़ जाती है.

जूड़-शीतल उस इलाके की परंपरा है जहां डूबते सूर्य को भी छठ में अर्घ्य दिया जाता है. जूड़ शीतल में गर्मी से पहले तालाब की उड़ाही और चूल्हे की मरम्मत भी की जाती है. चूल्हे को भी आराम देने की शायद मैथिला की संस्कृति एकमात्र संस्कृति है.

जूड़-शीतल में कर्मकांड नहीं होते. यह लोकपर्व है. इससे जुड़ी कहानियां भी नहीं हैं और बाजार को भी इससे कुछ खास हासिल नहीं होता, न ग्रीटिंग कार्ड और न बेचने लायक कुछ सामान, ऐसे में भारत के लोग इसके बारे में ज्यादा नहीं जानते. यहां तक कि मिथिला में भी अब इसका दायरा सिमटता जा रहा है.

मूलतः यह त्योहार शुचिता और पवित्रता का त्योहार है. और इस दो दिनों तक मनाया जाता है. इसके पहले दिन को कहते हैं सतुआइन और दूसरे दिन को कहते हैं धुरखेल.

सतुआइनः अमूमन यह 14 अप्रैल को मनाया जाता है और जैसा कि इसके नाम से ही प्रतीत होता है, इसका रिश्ता सत्तू के साथ है. सतुआइन के दिन लोग सत्तू और बेसन से बने व्यंजन खाते हैं. वैसे भी सत्तू को बिहारी हॉर्लिक्स कहा जाता है. पर गर्मी के इस मौसम में, सत्तू और बेसन के व्यंजनों के खराब होने का अंदेशा कम होता है, इसलिए सत्तू और बेसन के इस्तेमाल के पीछे यह तर्क दिया जा सकता है. आखिर, अगले दिन चूल्हा नहीं जलना और बासी खाना ही खाना होता है.

सतुआइन के दिन की भोर में घर में सब बड़ी स्त्री परिवार के सभी छोटों के सर पर एक चुल्लू पानी रखती है. ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से पूरी गर्मी के मौसम में सर ठंडा रहेगा. सतुआइन के दिन अपने सभी पेड़ों में पानी देना जरूरी होता है. गांव के हर वर्ग, और वर्ण के लोग हर पेड़ में एक-एक लोटा पानी जरूर डालते हैं. हालांकि, इस काम को अनिवार्य बनाने के वास्ते इसको भी पाप और पुण्य से जोड़ दिया गया है और इसलिए कहा जाता है कि सतुआइन के दिन पेड़ों में जल देने से पुण्य हासिल होता है.

धुरखेलः धुरखेल 15 अप्रैल को मनाया जाता है और मिथिला में इस दिन की बहुत अहमियत है. साल का यह ऐसा दिन होता है जब घर के चूल्हे की मरम्मत होती है. याद रखना चाहिए कि यह त्योहार उस दौर के हैं जब घरों में लकड़ी के चूल्हे चलते थे जो मिट्टी के बने होते थे.

इस दिन सुबह उठकर लोग उन सभी स्थानों की सफाई करते हैं जहां पर पानी जमा होता है. मसलन, तालाब, कुएं, मटके, आदि. तालाबों की उड़ाही की जाती है और उसकी तली से निकली चिकनी मिट्टी से चूल्हों की मरम्मत होती है. मिट्टी की उड़ाही के दौरान लड़के-बच्चे एक-दूसरे पर पानी या कीचड़ फेंकते हैं.

पर वह कीचड़ गंदा नहीं होता था. क्योंकि तालाब और पोखरे रोजमर्रा के इस्तेमाल में आते थे और पानी गंदा नही हो पाता था. प्रदूषण भी कम होता था, लोगों और मवेशियों के लिए अलग तालाब होते थे. बहरहाल, तालाबों और कुओं की सफाई के दौरान इस छेड़छाड़ और मजाक से समाज के विभिन्न वर्गों में मेल-मिलाप बढ़ता था.

लोकपर्व छठ की ही तह जूड़-शीतल में न तो कोई कर्मकांड होता है और न ही कोई धर्म या जाति का बंधन. गांव के लोग मिल-जुलकर सार्वजनिक और निजी जलागारों की सफाई करते हैं.

हालांकि, परंपरापसंद लोग शहरों में अपने वॉटर फिल्टर, टंकियों और पंप की सफाई करके इस त्योहार को मनाते हैं. मिट्टी के चूल्हे की मरम्मत की जगह कई लोग गैसचूल्हे की ओवरहॉलिंग करवा लेते हैं.

जूड़-शीतल में तालाबों से लेकर रसोई तक की सफाई के बाद लोग बासी भोजन करते हैं. खासतौर पर बासी चावल और दही से बने कढ़ी-बड़ी (पकौड़े) खाने का चलन है. कई स्थानों पर पतंगें भी उड़ाई जाती हैं और कई गांवों मे जूड़-शीतल के मेले भी लगते हैं.

मिथिला में तालाबों की उड़ाही के दौरान धुरखेल किया जाता है और तालाब की तली की मिट्टी से एकदूसरे को नहलाया जाता है

Tuesday, March 22, 2022

विश्व जल दिवसः 2030 तक बेरोकटोक बढती आबादी होगी 9 अरब, खाने और पीने का संकट होगा गहरा

अप्स्वडन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये देवा भक्त वाजिनः

ऋग्वेद की इस ऋचा में कहा गया है, “हे मनुष्यो! अमृततुल्य तथा गुणकारी जल का सही प्रयोग करने वाले बनो. जल की प्रशंसा और स्तुति के लिए सदैव तैयार रहो.”

दूसरी तरफ, इस्लाम धर्म में जल को ‘जीवन के रहस्य’ की प्रतिष्ठा दी गई है. कुरान में पानी को न सिर्फ ‘पाक’ करार दिया गया है बल्कि इसे अल्लाह की तरफ से मनुष्य के लिये एक नेमत बताया गया है. इस्लाम में पानी की बर्बादी की सख्त मनाही तो है ही; साथ ही मुनाफे के लिए इसके उपयोग को गुनाह करार दिया गया है. मनुष्य, जंतु, पक्षी और पेड़- पौधों के लिए पीने योग्य पानी के संरक्षण को इबादत का ही एक रूप कहा गया है और मान्यता है कि इससे अल्लाह खुश होते हैं.


आने वाले सालों में पानी का संकट बढ़ता जाएगा (फोटो सौजन्यः आवाज द वॉयस)

Monday, March 14, 2022

राजनीतिः क्या केजरीवाल बगैर कांग्रेस वाकई मोदी के विकल्प बन सकते हैं?

आम आदमी पार्टी ने पंजाब में प्रचंड जीत दर्ज की है. और देश की गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेसी एकमात्र पार्टी है जो एकाधिक राज्यों में सत्ता में है. जाहिर है, मेरे कई मित्रो ने भाजपा के खिलाफ 2024 के संभावित गठबंधन की धुरी के रूप में आप को देखना शुरू कर दिया है.

लेकिन, आप के लिए यह रास्ता आसान नहीं होगा.

1. गैर-भाजपा गठबंधन का कोई ढांचा तय नहीं है.

2. ममता और केसीआर विपक्ष की ओर से मुख्य खिलाड़ी बनने का दावा ठोंके हुए हैं.

3. विपक्षी खेमे में अभी भी एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस है और वह अपना रुतबा यूं ही नहीं छोड़ देगी.

4. आम आदमी पार्टी राज्य के लिहाज से महज 20 लोकसभा सीटों पर असरदार होगी. ममता के पास 42 सीटों का असर होगा. यहां तक कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ (कांग्रेसनीत राज्य) में भी कुल मिलाकर 36 सीटें हैं.

5. आप अभी तक विधानसभा के प्रदर्शनों को लोकसभा जीतों में बदलने में नाकाम रही है. दिल्ली में अभी तक यह एक भी सीट नहीं जीत पाई है. पंजाब में भी 2014 के चार से गिरकर यह 2019 में एक पर आ गया.

6. गुजरात विधानसभा में प्रदर्शन पर निगाह रखनी होगी, वह भी तब अगर केजरीवाल गुजरात के दोतरफा मुकाबले को त्रिकोणीय बना पाएं. इस राज्य में दो दशकों से भाजपा एक भी विस या लोस चुनाव नहीं हारी है. कांग्रेस ने 2017 में मुकाबला कड़ा किया था पर 2019 में भाजपा कि किल में यह खरोंच तक नहीं लगा पाई थी.

7. 2024 के लोस चुनावों से पहले 10 राज्यों में विस चुनाव होने हैं—हिमाचल, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड और मिजोरम. इन ग्यारह राज्यों (गुजरात समेत) कुल 146 लोस सीटें हैं. इनमें से 121 पर

भाजपा काबिज है. इन सभी राज्यों में भाजपा के मुकाबिल सिर्फ कांग्रेस है.

8. गुजरात, हिमाचल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में 95 सीटें हैं. यहां सीधा मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है.

9. कांग्रेस का चार राज्यों में शासन है—दो में यह सीधे सत्ता में है और दो में गठबंधन के जूनियर साझीदार के रूप में, लेकिन पार्टी 15 अन्य राज्यों में प्रमुख खिलाड़ी है. सात राज्यों—अरुणाचल, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड—में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है, इन राज्यों में लोस की 102 सीटें हैं. इन राज्यों मे अन्य क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी तकरीबन नगण्य है ऐसे में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब होगा तो भाजपा को नुक्सान पहुंचा सकने वाली अन्य ताकत दिखेगी भी नहीं. असल में इन राज्यों में कांग्रेस का बोदा प्रदर्शन ही भाजपा की शक्ति है.


 

10. पंजाब, असम, कर्नाटक, केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, गोवा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और नगालैंड में कांग्रेस निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है. इन राज्यों में लोस की 155 सीटें हैं.

कांग्रेस से अलग कोई भी गठबंधन भाजपा विरोधी मतों के बिखराव का सबब बनेगा. याद रखिए, 2019 में कांग्रेस ने 403 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 196 पर सेकेंड आई थी. भले ही जीती 52 हो.

इसलिए, मोदी का विकल्प बनने की केजरीवाल की महत्वाकांक्षा, कम से कम 2024 के लिए दूर की कौड़ी लगती है. हो सकता है केजरीवाल कदम दर कदम आगे बढ़ाएं, पर इसमें वक्त लगेगा. 2024 में वह ऐसा तभी कर पाएंगे अगर कांग्रेस उनको आगे करे. और कांग्रेस ऐसा क्यों करेगी?

Monday, January 10, 2022

पंचतत्वः ज्यों ‘ताड़’ माहिं ‘तेल’ है

पाम ऑएल की पैदावार देश में बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार पूर्वोत्तर समेत देश के कई हिस्सों में इसकी खेती को बढ़ावा दे रही है, पर इसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव काफी गंभीर होंगे

मंजीत ठाकुर


देश में मुद्दे और मसले इतने सारे हैं कि किसी का ध्यान महंगाई की तरफ जा ही नही रहा है. बे-गुन जैसी चीज 15 रुपए का पाव मिल रहा है, और सरसों तेल और रिफाइंड ऑइल की तो बात ही मत कीजिए. हमारे सार्वजनिक विमर्श में एकाध मीम और दसेक ट्वीट को छोड़कर महंगाई है नहीं कहीं.

मैं भी महंगाई की बात करके नक्कू थोड़े ही बनूंगा. पर सरकार सोच रही है कि खाद्य तेलों की महंगाई कैसे कम की जाए. इसके लिए तिलहन और पाम ऑयल पर राष्ट्रीय मिशन को वनस्पति तेलों के उत्पादन पर निर्भरता कम करने के लिहाज से नीति-नियंता देख रहे हैं. पर, यह नीति एकांगी है और महज एक ही दिशा की ओर देखती है. आपको ‘पीली क्रांति’ की याद होगी. नब्बे के दशक की इस ‘क्रांति’ ने तिलहन की पैदावार को बढ़ाया था. हालांकि, इसके बाद विभिन्न तिलहनों, मसलन मूंगफली, सरसों, सोयाबीन और राई, की पैदावार में लगातार बढ़ोतरी हुई है, लेकिन तेल सरपोटने वाले देश में घरेलू मांग से यह अभी भी कम है.

अब सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑएल पाम (एनएमईओ-ओपी) योजना पेश की है, जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर खास ध्यान दिया गया है. इस योजना का मकसद खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भारत के ताड़ तेल (पाम ऑएल) पैदावार को बढ़ाना है.

सरकार का लक्ष्य अगले पांच साल में सालाना पैदावार को 11 लाख टन और अगले दस साल में बढ़ाकर 28 लाख करना है. और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश में ताड़ तेल के रकबे को बढ़ाकर 6,50,000 हेक्टेयर किया जाएगा. अगले एक दशक में इस रकबे में 6,70,000 हेक्टेयर और जोड़ा जाएगा.

नीति-नियंताओं का आकलन है कि भारत में, ताड़ तेल, (अरे वही पाम ऑएल) की खेती 28 लाख हेक्टेयर में की जा सकती है जिसमें से करीब 9 लाख हेक्टेयर पूर्वोत्तर में हैं. एनएमईओ-ओपी योजना की कुल लागत 11,040 करोड़ रुपए है, जिसमें से 8,844 करोड़ रुपए केंद्र देगा और बाकी का हिस्सा राज्य सरकारें वहन करेंगी.

सरकार बेशक खाद्य तेलों का आयात कम करना चाह रही है और देश के कुल खाद्य तेल आयात में ताड़ तेल का हिस्सा 50 फीसद से अधिक है. आपने गौर किया होगा, पिछले साल भर में इस तेल की कीमत 60 फीसद तक बढ़ गई है. 1 जून, 2021 ताड़ तेल की कीमत 138 रुपए प्रति किलो तक हो गई थी, जो 1 जून, 2020 को 86 रुपए प्रति किलो था. यह पिछले 11 सालों में सर्वाधिक कीमत थी.

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए, सरकार ताड़ तेल के उत्पादक किसानों को इनपुट लागत में मदद दे रही है और यह मदद 29,000 रुपए प्रति हेक्टेयर कर दी गई है. उपज के लिए भी खेतिहरों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ एक तय कीमत दी जाएगी.

लेकिन, असली चिंता यह नहीं है कि इस कृषि वानिकी की लागत क्या होगी. असली चिंता वह लागत है जो पारिस्थितिकी के नुक्सान से पैदा होगी. सुमात्रा, बोर्नियो और मलय प्रायद्वीप मिसालें हैं जहां वैश्विक पाम ऑयल का 90 फीसद पैदा उत्पादित किया जाता है. इन जगहों पर इसकी व्यावसायिक खेती के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए और स्थानीय जल संसाधनों पर इसका भारी बोझ पड़ा, क्योंकि ताड़ तेल की खेती के लिए पानी की काफी जरूरत होती है.

अंग्रेजी के अखबार, द इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, “इंडोनेशिया में सिर्फ 2020 में ही मुख्य रूप से तेल ताड़ के वृक्षारोपण के लिए 1,15,495 हेक्टेयर वन क्षेत्र का नुक्सान हुआ है. सन 2002-18 की अवधि में, इंडोनेशिया में 91,54,000 हेक्टेयर प्राथमिक वन क्षेत्र का नुक्सान हुआ है. इस जंगल कटाई ने वहां की जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के साथ-साथ जल प्रदूषण को भी बढ़ाया है.”

ताड़ तेल के बागानों से सरकारी नीतियों और परंपरागत भूमि अधिकारों के बीच संघर्ष हो सकता है. अपने देश में, पूर्वोत्तर के राज्य राजनैतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र हैं और पाम ऑयल की खेती की पहल से वहां तनाव पैदा हो सकता है.

दूसरी तरफ, पूर्वोत्तर में पक्षियों की करीबन 850 नस्लें पाई जाती हैं. पूरे पूर्वोत्तर में खट्टे फल पाए जाते हैं, औषधीय पौधे और दुर्लभ पौधों और जड़ी-बूटियां यहां कुदरती तौर पर उगती हैं. यही नहीं, पूर्वोत्तर के विभिन्न इलाकों में 51 प्रकार के वन हैं. सरकारी अध्ययनों में भी पूर्वोत्तर की समृद्ध जैव विविधता पर प्रकाश डाला है. ऐसे में, पाम तेल नीति इस क्षेत्र की जैविक समृद्धि को नष्ट कर सकती है.

वैसे, पर्यावरण और जैव-विविधता की रक्षा के लिए इंडोनेसिया और श्रीलंका ने पाम ट्री पौधारोपण पर बंदिशें आयद करनी शुरू कर दी हैं. 2018 में, इंडोनेशिया सरकार ने पाम आयल उत्पादन के लिए नए लाइसेंस जारी करने पर तीन साल की रोक लगा दी. पिछले साल, श्रीलंका सरकार ने भी चरणबद्ध तरीके से ताड़ तेल के पेड़ों को उखाड़ने के आदेश जारी किए थे.

ताड़ तेल की पैदावार को भारत में बढ़ावा दिया जा रहा है जबकि तथ्य यह भी है कि देश के अधिकांश परिवार रोजाना के खर्च में पारंपरिक तेलों (सरसों, नारियल, सोयाबीन, तिल) का इस्तेमाल ही करता है. ऐसे में, ताड़ तेल पर जोर देने से वर्षाआधारित तिलहन से ध्यान हट जाएगा. इसका असर लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सेहत पर क्या पड़ेगा इसका गहरा अध्ययन जरूरी है.


Sunday, August 29, 2021

दुनिया का पहला सच्चा वैज्ञानिक इब्न अल-हैतम

हुआ यूं कि मिस्र का खलीफा नील नदी में हर साल आने वाले बाढ़ से बड़ा हैरान था. उसने एक साइंसदान को कहा कि वह नील नदी की बाढ़ से निबटने का कोई हल निकाले. वह वैज्ञानिक उन दिनों बसरा में था और उसने दावा किया कि नील नदी के बाढ वाले पानी को पोखरों और नहरों के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है और उस पानी को गर्मी के सूखे दिनों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

अपना यह सुझाव लेकर, वह वैज्ञानिक काहिरा आया, और तब जाकर उसे यह इल्म हुआ कि इंजीनियरिंग के लिहाज से उसका सिद्धांत अव्यावहारिक है. लेकिन मिस्र के क्रूर और हत्यारे खलीफा के सामने अपनी गलती मान लेना, अपने गले में फांसी का फंदा खुद डालने जैसा ही था, ऐसे में उस वैज्ञानिक ने तय किया कि सजा से बचने के लिए वह खुद को पागल की तरह पेश करे.

नतीजतन, खलीफा ने उसे मौत की सजा तो नहीं दी, लेकिन उसको उसी के घर में नजरबंद कर दिया. उस वैज्ञानिक को मनमांगी मुराद मिल गई. अकेलापन और पढ़ने के लिए बहुत कुछ.

दस साल बाद जब उस खलीफा की मौत हुई, तब जाकर वैज्ञानिक छूटा. यह वापस बगदाद लौट गया और तब तक उसके पास बहुत सारे ऐसे सिद्धांत थे, जिसने उसे दुनिया का पहला सच्चा वैज्ञानिक बना दिया.

उस वैज्ञानिक का नाम था, इब्न अल-हैतम जिसने दस साल की नजरबंदी के दौरान भौतिकी और गणित के सौ से अधिक काम पूरे कर लिए थे.

हम सब जानते हैं और पढ़ते आ रहे हैं कि सर आइजक न्यूटन ही दुनिया के अब तक के सबसे महान वैज्ञानिक हुए हैं, खासकर भौतिकी (फिजिक्स) की दुनिया में उनका योगदान अप्रतिम है.

सर आइजक न्यूटन को आधुनिक प्रकाशिकी (ऑप्टिक्स) का जनक भी कहा जाता है. न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण और गतिकी के अपने नियमों के अलावा लेंसों और प्रिज्म के अपने कमाल के प्रयोग किए थे. हम सबने ने अपने स्कूली दिनों में, प्रकाश के परावर्तन और अपवर्तन के उनके अध्ययन के बारे में जाना है और यह भी कि प्रिज्म से होकर गुजरने पर प्रकाश सात रंगों वाले इंद्रधनुष में बंटकर दिखता है.

लेकिन, न्यूटन ने भी प्रकाशिकी के अपने अध्ययन के लिए एक मुस्लिम वैज्ञानिक की खोजों का सहारा लिया है जो न्यूटन से भी सात सौ साल पहले हुए थे.

वैसे, आमतौर पर यही माना जाता है, और खासतौर पर विज्ञान के इतिहास की चर्चा करते समय यही कहा जाता है कि रोमन साम्राज्य के उत्कर्ष के दिनों के बाद और आधुनिक यूरोप के रेनेसां (नवजागरण) की बीच की अवधि में कोई खास वैज्ञानिक खोजें नहीं हुईं. पर यह एकतरफा बात है और जाहिर है, भले ही यूरोप अंधकार युग में रहा हो, पर यह जरूरी नहीं है कि बाकी दुनिया में भी ज्ञान के मामलें में अंधेरा छाया था. असल में, यूरोप के अलावा बाकी जगहों पर बदस्तूर वैज्ञानिक खोजें चल रही थीं.

अरब प्रायद्वीप के इलाके की बात करें तो नवीं से तेरहवीं सदी के बीच का दौर वैज्ञानिक खोजों के लिहाज से सुनहरा दौर माना जा सकता है.

इस दौर में गणित, खगोल विज्ञान, औषधि, भौतिकी, रसायन और दर्शन के क्षेत्र में बहुत प्रगति हुई. इस अवधि के बहुत सारे विद्वानों और वैज्ञानिकों में एक नाम था इब्न अल-हैतम का, जिनका योगदान सबसे बड़ा माना जा सकता है.

अल-हसन इब्न अल-हैदम का जन्म 965 ईस्वी में इराक में हुआ था और उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक तौर-तरीकों का जनक माना जाता है.

आमतौर पर माना जाता है कि वैज्ञानिक तौर-तरीकों से खोज करने में घटनाओं की परख, नई जानकारी हासिल करना या पहले से मौजूद जानकारी को ठीक करना या उसे प्रेक्षणों तथा मापों के आंकड़ों के आधार पर फिर से साबित करना, संकल्पनाएं नाकर उनके आंकड़े जुटाना है और इस तरीके की स्थापना का श्रेय 17वीं सदी में फ्रांसिस बेकन और रेने डिस्कार्तिया ने की थी, पर इब्न अल-हैतम यहां भी इनसे आगे हैं.

प्रायोगिक आंकड़ों पर उनके जोर और एक के आधार पर कहा जा सकता है कि इब्न अल-हैदम ही इस ‘दुनिया के पहले सच्चे वैज्ञानिक’ थे.

इब्न अल-हैदम ही पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने यह बताया कि हम किसी चीज को कैसे देख पाते हैं.

उन्होंने अपने प्रयोगों के जरिए यह साबित किया कि कथित एमिशन थ्योरी (जिसमें बताया गया था कि हमारी आंखों से चमक निकलकर उन चीजों पर पड़ती है जिन्हें हम देखते हैं) जिसे प्लेटो, यूक्लिड और टॉलमी ने प्रतिपादित किया था, गलत है. इब्न अल-हैदम ने स्थापित किया कि हम इसलिए देख पाते हैं क्योंकि रोशनी हमारे आंखों के अंदर जाती है. उन्होंने अपनी इस बात को साबित करने के लिए गणितीय सूत्रों का सहारा लिया था. इसलिए उन्हें पहला सैद्धांतिक भौतिकीविद भी कहा जाता है.

लेकिन इब्न अल-हैदम की प्रसिद्धि पिन होल कैमरे की खोज के लिए अधिक है और इसतरह उनके हिस्से में प्रकाश के अपवर्तन (रिफ्रैक्शन) के नियम की खोज का श्रेय भी आना चाहिए. इब्न अल-हैदम ने प्रकाश के प्रकीर्णन (डिस्पर्शन) की खोज भी की कि किसतरह प्रकाश विभिन्न रंगों में बंट जाता है. इब्न अल-हैदम ने छाया, इंद्रधनुष और ग्रहणों का अध्ययन भी किया और उन्होंने यह भी बताया कि पृथ्वी के वायुमंडल से किस तरह प्रकाश का विचलन होता है. इब्न अल-हैदम ने वायुमंडल की ऊंचाई भी तकरीबन सही मापी और उनके मुताबिक पृथ्वी के वायुमंडल की ऊंचाई करीबन 100 किमी है.

कुछ जानकारों का कहना है कि इब्न अल-हैतम ने ही ग्रहों की कक्षाओं की व्याख्या की थी, और उनकी इसी बात के आधार पर बाद में कॉपरनिकस, गैलीलियो, केपलर और न्यूटन ने ग्रहों की गतिकी का सिद्धांत दिया.

(यह लेख इल्म की दुनिया सीरीज का हिस्सा है)

Sunday, June 13, 2021

क्या आप डॉ बुशरा अतीक को जानते हैं?

डॉ. बुशरा अतीक कई मायनों में प्रेरणास्रोत हैं. पहली बात तो यही कि वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की छात्रा रही हैं और उन्हें पिछले साल 2020 में भारत के सबसे प्रतिष्ठित विज्ञान पुरस्कार शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार दिया गया है. उन्हें यह पुरस्कार मेडिकल साइंस के क्षेत्र में उनके अहम योगदान के लिए दिया गया है.

यह योगदान छोटा-मोटा नहीं है.

आइआइटी कानपुर में डिपार्टमेंट ऑफ बायोलजिकल साइंसेज ऐंड बायोइंजीनियरिंग में प्रोफेसर बुशरा अतीक की अगुआई में कई संस्थानों को मिलाकर बनी टीम ने एक अध्ययन किया और कैंसर के 15 फीसद मरीजों पर असर डालने वाले बेहद आक्रामक स्पिंक 1-पॉजिटिव (SPINK1-positive) प्रोस्टेट कैंसर के एक सब-टाइप की मॉलेक्यूलर मैकेनिज्म और उसकी पैथोबायोलजी का पता लगा लिया.

डॉ अतीक ने अपनी बीएससी, एमएससी और पीएचडी का पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ जूलॉजी से की. बाद में यूनिवर्सिटी ऑफ मिशीगन के मिशीगन सेंटर फॉर ट्रांसलेशनल पैथोलजी में उन्होंने डॉ अरुल चिन्नैय्या के तहत पोस्टडॉक्टोरल फेलो के रूप में प्रशिक्षण हासिल किया.

डॉ अतीक के शोध में कैंसर बायोमार्कर्स, कैंसर जीनोमिक्स, नॉन-कोडिंग आरएनए, ड्रग टारगेट और प्रोस्टेट कैंसर जैसे विषय शामिल हैं.

उनका काम प्रोस्टेट, स्तन और बड़ी आंत के कैंसर पर केंद्रित है. उनका शोध कैंसर बायोमार्कर और मॉलेक्यूलर बदलावों पर आधारित है जिससे प्रोस्टेट और स्तन कैंसर में बढ़ोतरी होती है.

वेबसाइट फर्स्टपोस्ट को दिए अपने इंटरव्यू में वह कहती हैं, “हमारी प्रयोगशाला कैंसररोधी उपचार के टारगेट्स की खोज करना चाहती है.” वह साथ में कहती हं कि इन टारगेट्स की पहचान से कैंसर का जल्दी ही पता लगाया जा सकेगा, और यह बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि जल्दी से पता लगने से कामयाबी के साथ उपचार होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

2019 में, डॉ. अतीक ने उस टीम की अगुआई कर रही थी जिसने जिसने स्पिंक1 पॉजिटिव प्रोस्टेट कैंसर सबटाइप के आणविक तंत्र और रोगविज्ञान को खोज निकाला. डॉ अतीक ने अंग्रेजी अखबार द हिंदू को बताया, "हमने पाया कि EZH2 प्रोटीन का बढ़ा हुआ स्तर SPINK1 पॉजिटिव कैंसर में इन दो माइक्रोआरएनए के संश्लेषण में कमी को ट्रिगर करता है. और दो माइक्रोआरएनए के निम्न स्तर बदले में SPINK1 के अधिक उत्पादन की ओर ले जाते हैं.,

उन्होंने सीएसआइआर-सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट, लखनऊ और कनाडा, अमेरिका और फिनलैंड के प्रोस्टेट कैंसर पर काम करने वाले अन्य समूहों के सहयोग से आइआइटी कानपुर के अन्य शोधकर्ताओं के साथ हाल के एक अध्ययन में इस बात का पता लगाया कि एंड्रोजन डिप्रिवेशन थेरेपी, जिसका उपयोग प्रोस्टेट के उपचार के लिए किया जाता है, वह इसे ठीक करने के बजाय इसे बढ़ा देता है. प्रोफेसर अतीक ने रिसर्च मैटर्स को बताया, “फिलहाल, प्रोस्टेट कैंसर के रोगियों के लिए एण्ड्रोजन डिप्रिवेशन थेरेपी के व्यापक उपयोग को देखते हुए, हमारे निष्कर्ष खतरनाक हैं. प्रोस्टेट कैंसर के रोगियों को एंटी-एंड्रोजन थेरेपी देने से पहले काफी सोच-विचार लेना चाहिए.”

अब बुशरा भारतीय आबादी के म्युटेशनल परिदृश्य को जीन सीक्वेंसिंग के जरिए खोजना चाहती हैं. इसके साथ ही वह ऐसी विधि भी खोज निकालना चाहती हैं जिसके तहत प्रोस्टेट कैंसर के खास बायोमार्कर्स विकसित किए जा सकें और जिसकी पहचान महज यूरिन टेस्ट के जरिए ही हो सके. अभी प्रोस्टेट ग्रंथि में 12 छेद मोटी सुइयों से करके बायोप्सी की जाती है और तब उस कैंसर का पता लगाया जाता है. उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा भी है, “बायोप्सी होते देखना ही काफी दर्दनाक है, और इस वजह से मुझे लगता है कि कोई खून के परीक्षण या यूरिन बेस्ड जांच का तरीका खोजा जाना चाहिए.” डॉ अतीक को लगता है कि प्रोस्टेट कैंसर की जांच के लिए यूरिन टेस्ट में बायोमार्कर्स खोजे जा सकते हैं.

भारत के सबसे बड़े विज्ञान पुरस्कार के बाद डॉ बुशरा अतीक के लिए उनका महिला होना मायने नहीं रखता. लेकिन करियर की शुरुआत में उनके एक सहपाठी ने उन्हें अंडर-ग्रेजुएट कॉलेज में टीचर बनने की सलाह दी थी. जाहिर है, डॉ. बुशरा ने उसकी बात को तवज्जो नहीं दी थी.

आज भी उनकी सलाह यही है, धीरज रखो और आलोचनाओं को आड़े न आने दो.

लगता तो यही है कि भारतीय विज्ञान का भविष्य डॉ बुशरा अतीक जैसे वैज्ञानिकों के हाथ मे सुरक्षित है.

Wednesday, May 26, 2021

शख्सियतः पूर्वोत्तर के चाणक्य हेमंत विस्व सरमा

शख्सियत । हेमंत विस्व सरमा

मंजीत ठाकुर

बहुत साल हुए, हेमंत विस्व सरमा ने एक असमिया फिल्म में बाल कलाकार के तौर पर अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत की थी. अभिनेता वाला कैरियर उतना नहीं चला, पर बतौर नेता हेमंत विस्व सरमा वाकई पूर्वोत्तर के चाणक्य की भूमिका में मशहूर हो गए हैं और 10 मई, 2021 सोमवार की दुफहरिया में उन्होंने असम के मुख्यमंत्री का ताज भी पहन ही लिया.

हेमंत विस्व सरमा इसकी तलाश में न जाने कब से थे.

असम के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की है. पिछली बार असम की कुरसी केंद्र से असम भेजे गए सर्बानंद सोनोवाल को मिल गई थी और इस बार यह पद मिला सरमा को. सोनोवाल और सरमा के बीच सियासी तनातनी बनी रहेगी और दोनों के बीच यह प्रतिस्पर्धा पुरानी है, तब से, जब दोनों ही 1980 के दशक में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के सदस्य थे.

बहरहाल, 23 अगस्त, 2015 को जब तिवा स्वायत्त परिषद में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन वाले नतीजे एक दिन पहले ही आए थे और सरमा ने ट्वीट करके कांग्रेस को बधाई दी, उस समय तक किसी को यह इल्म नहीं था कि सरमा भाजपा में शामिल होने वाले थे. क्षेत्रीय न्यूज चैनलो में भी खबर यही चल रही थी कि भाजपा के असम प्रदेश अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य पार्टी के खराब प्रदर्शन की वजह से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से शाम में मिलेंगे और कयास लगाए गए कि भट्टाचार्य अपना इस्तीफा सौंपेंगे.

लेकिन कहानी दूसरी थी.

उसी शाम हेमंत विस्व सरमा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे. यह हैरतअंगेज था क्योंकि लंबे अरसे तक सरमा असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के दाहिने हाथ माने जाते थे और जानकारों का मानना है कि 2011 में असम में कांग्रेस की जीत की रणनीति खुद सरमा ने तैयार की थी. सरमा को शायद गोगोई के बाद मुख्यमंत्री की कुरसी मिलने की उम्मीद थी.

पर, तरुण गोगोई शायद वंशवाद में यकीन रखते थे और उन्होंने अपने बेटे गौरव गोगोई को बतौर वारिस पेश किया तो सरमा का संयम टूट गया. बाद में, सरमा ने मीडिया के सामने इंटरव्यू में कहा कि वह जब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मिलने पहुंचे थे तो कांग्रेस नेता का ध्यान उनसे अधिक अपने कुत्ते पर था. असल में, अपने सियासी उस्ताद तरुण गोगोई से सरमा की तनातनी चार साल से अधिक समय तक चली थी और उस जंग में राहुल गांधी ने गोगोई का पक्ष लिया था और सरमा उसी बाबत गांधी से बात करने आए थे. सरमा ने खुद ट्वीट करके यह बताया था कि जब कांग्रेस उपाध्यक्ष (राहुल गांधी) के साथ असम के अहम मसलों पर वह बातचीत चाहते थे, उस वक्त राहुल अपने पालतू कुत्ते को बिस्किट खिलाने में व्यस्त थे.

उस वक्त की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, असम के सात में से छह भाजपा सांसद सरमा को पार्टी में लाने के खिलाफ थे. तो फिर नेतृत्व कैसे तैयार हुआ?

क्योंकि भाजपा नेतृत्व को सरमा के रणनीतिक कौशल पर पूरा भरोसा हो गया था. सरमा के पास गजब का राजनैतिक प्रबंधन और चुनावी कारीगरी तो है ही, सूबे भर में उनकी लोकप्रियता भी है. असल में, भाजपा नेतृत्व जानता था कि 2010 और 2014 में असम राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में भाजपा विधायकों की तरफ से सरमा ने ही क्रॉस वोटिंग करवाई थी. भाजपा अब इस कारीगरी का अपने लिए इस्तेमाल करना चाहती थी.

2006 से 2014 के बीच स्वास्थ्य मंत्री के रूप में जालुकबारी से तीन बार विधायक रहे सरमा ने कई लोकप्रिय कदम उठाए, जिनमें 24 घंटे की एंबुलेंस सेवा और ग्रामीण अस्पतालों में डॉक्टरों की मौजूदगी की अनिवार्यता शामिल थे. इसी तरह 2011 से 2014 तक शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने स्कूली शिक्षकों की भर्ती की एक पारदर्शी प्रक्रिया पेश की जिसकी परिणति लगभग दो लाख नई भर्तियों में हुई.

जाहिर है, सरमा की इस लोकप्रियता से गौरव गोगोई असुरक्षित महसूस करने लगे थे. इस बार असम की 126 विधानसभा सीटों में भाजपा ने 75 सीटों पर जीत हासिल की है और हेमंत विस्व सरमा ने जालुकबाड़ी सीट पर लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की है.

हेमंत विस्वा सरमा 1990 के दशक में कांग्रेस में शामिल हुए थे और 2001 में पहली बार उन्होंने गुवाहाटी के जालुकबाड़ी से चुनाव लड़ा. उन्होंने यहां असम गण परिषद के नेता भृगु कुमार फुकन को हराया और उसके बाद से इस सीट पर सरमा अजेय बने हुए हैं.

कांग्रेस में रहते हुए सरमा ने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, कृषि, योजना और विकास, पीडब्ल्यूडी और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का काम संभाला है.

बहरहाल, सरमा का भाजपा में आना पूर्वोत्तर में उसके लिए भाग्योदय जैसा हुआ है. सरमा के पास न सिर्फ असम की, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर की अच्छी समझ है. वह बीते 19 साल से सरकार में मंत्री रहे हैं इसलिए उनके पास प्रशासन का भी अगाध अनुभव है.

असल में मुख्यमंत्री बदले जाएंगे इसका आभास तो तभी हो गया था, जब भाजपा ने चुनाव से पहले अपने मुख्यमंत्री पद उम्मीदवार की घोषणा नहीं की थी. आमतौर पर भाजपा अपने सत्तासीन राज्यों में ऐसा नहीं करती.

बहरहाल, हेमंत विस्व सरमा की कहानी में वह मंजिल आ ही गई जिसके लिए उन्होंने गोगोई पिता-पुत्र के खिलाफ बगावत की थी. जानकार बताते हैं कि 23 अगस्त को भाजपा में सरमा के शामिल होने के बाद राहुल गांधी ने बजरिए अहमद पटेल अपना निजी फोन नंबर सरमा को भिजवाया था. राहुल गांधी को सरमा ने फोन नहीं किया, क्योंकि सरमा का सिद्धांत है, पलटकर नहीं देखना.

असम कांग्रेस वाकई सरमा को खोकर पछता रही होगी.