Sunday, February 26, 2017

चुनावी दलबदल में नारेबाज़ों की मुश्किल

उत्तर प्रदेश में बस पांचवे चरण की वोटिंग होनी है। चुनाव में ज़बानी जमा-खर्च और लफ्फाजियों के साथ नारों का होना जरूरी होता है। सिर्फ ज़रूरी नहीं, बहुत ज़रूरी।

इस बार चुनाव में घूमते वक्त कई नारे कान में पड़े। अश्वमेध का घोड़ा है, मोदीजी ने छोड़ा है। जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। भ्रष्टाचार मिटाना है, राहुल ने यह ठाना है। जीत गया भई जीत गया, शेर हमारा जीत गया। कांशीराम का मिशन अधूरा, मायावती करेंगी पूरा।

इस बार उत्तर प्रदेश के चुनावी बुखार में मौसम ने साथ दिया। वरना, गरमियों में होते तो हालत पतली होती। उम्मीदवारों की भी, वोटरों की भी और हम जैसे चुनाव कवर करने वाले पत्रकारों की भी। लेकिन, इसी मुद्दे पर एक पानवाले की राय अलग थी, न सरदी, न गरमी, चुनाव में हर मौसम गुलाबी लगता है।

लेकिन इस बार नारों में कुछ गड़बड़ हो गई। गड़बड़ की वजहः वह लोग बहुत मुश्किल में थे जिनके नेता ने हाल ही में दल बदल लिया था। वह नारे लगाने में वह बार-बार अटक रहे थे। बीच-बीच में पुराने दल का नारा जुबां पर आता और अगले ही पल उसे सुधारते।

सियासी दल कोई भी हो, हवा चाहे किसी की बहे, बुंदेलखंड में एक दर्जन नेता ऐसे हैं, जहां वे खड़े होते हैं राजनीति वहीं से शुरू होती है। बुंदेलखंड की राजनीति में गहरी पैठ बनाने वाले तमाम नेताओं ने यह साबित कर दिया है कि वह खुद में एक दल हैं। दल बदलकर दंगल लड़कर सियासी सूरमा आज बुंदेलखंड की राजनीति में दस्तक दे रहे हैं। सक्रिय राजनीति में आने के बाद इन नेताओ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।

सियासी पार्टियां कभी इनकी राह में रोड़ा बनीं, तो उनसे भी किनारा करने में गुरेज नहीं किया। हालांकि इस काम मे हर किसी को कामयाबी नहीं मिली, फिर भी आगे के चुनाव में पार्टियां इनसे किनारा नहीं कर सकीं।

ऐसे कई सियासी दिग्गज हैं जो दो से ज्यादा पार्टियां बदल चुके हैं। अरिमर्दन सिंह, सिद्धगोपाल साहू, आरके सिंह पटेल, अशोक सिंह चंदेल, विवेक कुमार सिंह कई बार पार्टियां बदलने के बाद भी राजनीति में मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।

2017 के विधानसभा चुनाव में कई दिग्गजों की साख दांव पर है। कांग्रेस छोड़कर सपा में आए सिद्धगोपाल साहू 2012 में चुनाव हार गए। अबकी सपा ने उन्हें फिर से प्रत्याशी बनाया। जनता दल से राजनीति की शुरूआत करने वाले अरिदमन सिंह सपा में रह चुके हैं। 2007 में वह बसपा में भी रह चुके हैं। 2012 में वह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे। इस बार बसपा से महोबा सदर के प्रत्याशी हैं।

राकेश गोस्वामी बसपा से विधायक थे। 2012 में उनको टिकट नहीं मिला, इस बार भाजपा के प्रत्याशी हैं।

झांसी के मऊरानीपुर से परागीलाल पहले भाजपा से विधायक थे। वहां टिकट कटा तो बसपा से टिकट ले लिया। बिहारी लाल पहले कांग्रेस के विधायक थे और इस बार भाजपा के टिकट पर लड़ रहे हैं।

हमीरपुर सीट पर अशोक कुमार चंदेल जनता दल से विधायक रह चुके हैं। बाद में बसपा जॉइन की। एक बार निर्दलीय विधायक भी रह चुके हैं। इस बार भाजपा ने हमीरपुर सदर से प्रत्याशी बनाया है। राठ के विधायक गयादीन अनुरागी भाजपा और बसपा से गुजरते हुए पिछले विधानसभा में कांग्रेस में गए और जीते। इसबार फिर से कांग्रेस के टिकट पर किस्मत आजमा रहे हैं।

बांदा में विवेक सिंह 1996 में लोकतांत्रिक कांग्रेस से विधायक थे। 2002 में बीजेपी के टिकट पर लड़े और हार गए। 2007 और 12 में कांग्रेस के टिकट पर लड़कर जीते। इस बार भी कांग्रेस प्रत्याशी हैं। बबेरू के विधायक पहले बसपा में थे। फिर सपा में आए तो पिछला चुनाव जीता, इस बार भी मैदान में हैं।

मानिकपुर विधानसभा के चुनाव मैदान में उतरे आर के सिंह पटेल कई पार्टियां आजमा चुके हैं। वह बसपा से विधायक और सपा से सांसद रह चुके हैं। एक बार फिर 2014 में बसपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था।

चुनावी व्यंजन में नारों का तड़का लगाना बहुत ज़रूरी होता है, लेकिन इस दल-बदल ने नारेबाज़ों का कम मुश्किल कर दिया है।

फिलहाल तो दलबदलू नेताओं के लिए एक मशहूर कवि की यह पंक्तियां—

पहले हवा का रुख़ देखना है

फिर यह तय करना है किस आले पर दिया रखना है।



मंजीत ठाकुर

Monday, February 13, 2017

बुंदेलखंड में ग्लैमरस डाकू और सियासत

एक फिल्म थी पान सिंह तोमर जिसमें पान सिंह कहता है कि चंबल में डकैत नहीं होते, बाग़ी होते हैं। लेकिन चुनावों के मद्देनज़र अगर चित्रकूट इलाके में इन डकैतों की सियासी चहलकदमी देखें तो कहा जा सकता है कि इस इलाके में डकैत नहीं, सियासत में घुसने की तमन्ना भी होती है।

यह बात और है कि खुद ददुआ ने अपने परिवार को और बाद में ठोकिया ने भी अपने परिवार को सियासत की राह दिखाई और दोनों ही इस इलाके के नामी और इनामी डकैत रहे हैं।

चित्रकूट और आसपास के इलाके में पिछले तीन दशकों से डकैतों का राजनीति में प्रभाव रहा है। ददुआ यही कोई चार दशक पहले जरायम के पेशे में उतरा था और उसने इस इलाके में काफी आतंक मचाया था।

साल 1977-78 के आसपास अपने आंतक का राज कायम किया और सियासत में हर कोई उसके असर को अपने पक्ष में करना चाहता था। उसका राजनीति में इतना दखल था कि ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक, हर कोई चुनाव जीतने के लिए उसका आशीर्वाद चाहता था।

सबसे पहले कम्युनिस्ट पार्टी के रामसजीवन सिंह पटेल ने ददुआ के सहयोग से विधानसभा का चुनाव जीता था, पहले उनकी सीट कर्वी हुआ करती थी, बाद में चित्रकूट सीट हो गई। अगले दो चुनाव तक ददुआ की मदद कम्युनिस्ट पार्टी को मिलती रही।

उधर ददुआ ने मानिकपुर सीट पर दद्दू प्रसाद को मदद दी और वह लगातार तीन बार विधायक रहे। वह बीएसपी के थे।

1993 में कर्वी सीट पर आर के पटेल बीएसपी ने ददुआ का सहयोग लिया। इनका राजनीति में उदय तो हुआ लेकिन पहला चुनाव हार गए थे। 1996 से दो बार लगातार विधायक रहे, लेकिन उस समय ददुआ का नारा थाः वोट पड़ेगा हाथी पर, नहीं तो गोली खाओ छाती पर।

साल 2007 में भी इस सीट से बीएसपी ही जीती, लेकिन बीएसपी से टिकट मिला था दिनेश प्रसाद मिश्र को, जो ददुआ के सफाए के नारे पर वोट मांगने पहुंचे और चुनाव जीत भी गए। 2007 के चुनाव के बाद ददुआ पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। उनसे पहले कर्वी सीट पर जीत रहे आर के पटेल तब तक समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे और चुनाव हार गए। 2009 में पटेल ने लोकसभा का चुनाव सपा के टिकट पर जीता, लेकिन तब तक ददुआ मारा जा चुका था।

ददुआ के बाद इलाके में एक नए डकैत ठोकिया का आंतक कायम हो चुका था और सियासत में भी उसकी चलती बढ़ गई। ठोकिया ने अपने परिवार के लोगों को सियासत में उतारा और ज्यादातर अपने सजातीय उम्मीदवारों का ही समर्थन किया। उसने इस मामले में कभी बसपा को तो कभी सपा को समर्थन किया।

इलाके के तीन बड़े नेताओ आर के पटेल, रामसजीवन पटेल और दद्दू प्रसाद पर ददुआ को संरक्षण देने का मुकदमे भी दर्ज हुए थे।

आज की तारीख में यानी 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में ददुआ के समर्थने में जीतने वाले विगत के सारे प्रत्याशी जो कभी बसपा में थे, आज चार विभिन्न दलों से मैदान में है। सभी एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं।

इनमें से दो, आर के पटेल और दद्दू प्रसाद बसपा के सरकार में मंत्री भी रह चुके हैँ। इलाके में आतंक का पर्याय बन चुका ठोकिया 2008 में बसपा के शासनकाल में ही मार गिराय गया, लेकिन तब तक इलाके में नया डकैत बबली उभर चुका था। ददुआ, ठोकिया, रागिया, गुड्डा और बबली और गुप्पा ये सभी इस इलाके में सियासत में खासी दखल देते रहे हैं।

जब से उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव का बिगुल बजा, तभी से चित्रकूट और उसके आस-पास के क्षेत्रों में डकैतों ने अपनी चहलकदमी बढ़ा दी है। ददुआ, ठोकिया, बलखडिया और रागीया जैसे कुख्यात दस्यु सरगनाओं के खात्मे के बावजूद चुनाव में अपनी हनक दिखाने को लेकर चित्रकूट के कई इलाकों पर इनामी डकैतों में भी स्पर्धा है।

चित्रकूट जिले के चार इनामी सरगनाओं में बबली कोल, गोपा यादव, गौरी यादव और ललित पटेल ने अपने-अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए फतवे देने शुरू कर दिए हैं। मानिकपुर मऊ के जंगलों में इनका आना-जाना बढ़ गया है।

इलाके के लोगों का कहना है कि डकैतों ने पहले तो समझा-बुझाकर वोटरों को अपने-अपने प्रत्याशी को जिताने की बात कही है। कुछ ने धमकी भरे शब्दों का प्रयोग भी शुरू कर दिया है। ग्रामीणों के अनुसार बबुली, गौरी यादव, गोपा यादव और ललित पटेल गिरोह के बदमाश गांवों के चक्कर काट रहे है।

चित्रकूट की दोनों विधानसभाओं में लड़ने वालों में एक तरफ कुख्यात डकैत ददुआ का पुत्र वीर सिंह पटेल समाजवादी पार्टी से कर्वी विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी है। वहीं मऊ मानिकपुर विधानसभा से डकैतों का संरक्षण लेने के आरोपी रहे दद्दू प्रसाद, आर के सिंह पटेल, चंद्रभान सिंह पटेल चुनाव मैदान में हैं।

ठीक है, कि कभी पान सिंह तोमर में इरफान ने कहा था कि बीहड़ में बाग़ी होते हैं और डकैत तो संसद में होते हैं और हम सब को यह बात नागवार गुज़री थी, लेकिन कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि बाग़ी भले ही चित्रकूट के जंगल में हो लेकिन यूपी विधानसभा के कई सदस्य उनकी मदद लेकर ही विधायकी पाते हैं।

Sunday, February 5, 2017

चंदे पर फंदा

एक संस्था है असोसिएशन ऑफ डिमोक्रेटिक राइट्स यानी एडीआर और दूसरी संस्था है, नैशनल इलेक्शन वॉच। यह दोनों ही संस्थाएं भारत में राजनीतिक दलों और नेताओं की दौलत वगैरह का ब्योरा वक्त-वक्त पर पेश करती रहती हैं और चुनावों में काले धन के इस्तेमाल और भ्रष्टाचार पर भी उनकी निगाह रहती है। इन दोनों संस्थाओं ने 2004 से 2015 के बीच भारत में सियासी दलों को मिलने वाले चंदे के स्रोतों का व्यापक विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण से तमाम सुबूत मिलते हैं कि अब सियासी दलों को मिलने वाले चंदे पर लगाम लगाने या कहिए कि उसमें पारदर्शिता लाने के लिए सख्त कानून की ज़रूरत है।

अब, इस बार के बजट में केन्द्र सरकार ने दो हज़ार से अधिक नकद चंदे पर रोक लगा दी है, तो इसे इसी वित्तीय गड़बड़ियों पर रोक की दिशा में एक कदम माना जाना चाहिए। कुछ लोग दलील देंगे कि सियासी दल ऐसी बंदिशों का तोड़ निकाल लेंगे, लेकिन इस बात से एक बेहतर कानून या नियम की ज़रूरत को कम नहीं किया जा सकता।

बजट में इस बात के उल्लेख से एक बात तो साफ है कि केन्द्र सरकार चुनावी प्रक्रिया को साफदामन बनाने के चुनाव आयोग के सुझावों पर अमल के लिए कदम उठा रही है।

ऐसे कदम इसलिए भी ज़रूरी हैं कि अगर सियासी दलों को मिले चुनावी चंदो की बात की जाए, तो एडीआर के ही मुताबिक, पिछले एक दशक में देश के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को तककरीबन 11,367 करोड़ रूपये चंदे के रूप में हासिल हुए हैं। लेकिन इस राशि में से करीब 7,833 करोड़ की रकम अज्ञात स्रोतों से मिली है। अज्ञात स्रोतों से राशि हासिल करने में कांग्रेस सबसे आगे रही है और उसे करीब 3,323 करोड़ रूपये इन अज्ञात स्रोतों ने दिए। यह भी गौरतलब है कि पिछले एक दशक में (यानी एडीआर के अध्ययन की अवधि में) कांग्रेसनीत यूपीए ही सत्ता में थी।

वहीं, अज्ञात स्रोतों से बीजेपी को 2126 करोड़ रूपये हासिल हुए। यह उस पार्टी की कुल आमदनी का करीब 64 फीसद थी। सिर्फ यही दल नहीं, वामपंथी पार्टियों और ईमानदारी के मुद्दे पर चुनावी चौसर खेल रही आम आदमी पार्टी को भी चंदे में अज्ञात स्रोतो से मिली राशि ही सबसे अधिक रही है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को करीब 766 करोड़ चंदे में मिले और इसका 95 फीसद हिस्सा अज्ञात स्रोतों से मिला।

अब बात बसपा की, जिसने नोटबंदी के दौरान यह स्पष्ट कर दिया था कि उसे कभी 20 हजार से अधिक कोई रकम नकद चंदे के रूप में नहीं मिला। यानी उसकी तो तकरीबन सौ फीसद आय अज्ञात स्रोतो से ही रही। ज़रा आंकड़ो पर गौर करिए, बसपा की आमदनी 2004 में 5 करोड़ रूपये थी जो आज की तारीख में 112 करोड़ है। आमदनी में यह इजाफा तकरीबन दो हजार प्रतिशत का है।

चुनाव आय़ोग अब इस छूट के दुरूपयगो पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहा है तो इसे स्वागतयोग्य इसलिए भी माना जाना चाहिए क्योंकि अब तक अगर किसी ने 20 हज़ार रूपये से कम का चंदा दिया हो तो उसका नाम गुप्त रखा जा सकता था।

अब इसी वजह से सियासी दल के खाते मोटे होते जाते हैं लेकिन किसने उन्हें यह रकम दी, इसका कोई पता ही नहीं चल पाता। 2014-15 के एडीआर के आंकड़ो ने स्पष्ट किया है भारत के राजनीतिक दलों की आमदनी का करीब 71 फीसद तो इन्ही अज्ञात स्रोतो से हासिल हुआ है।

जो लोग बेनामी रूप से चंदा देते हैं उसके बारे में यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि उन लोगों की यह कमाई या बचत काली कमाई का ही हिस्सा रही होगी। ऐसे में, चुनावी प्रक्रिया में इस काले पैसे को आने का एक लूपहोल बचा हुआ ही दिखता है।

इस छेद को बंद करने के बाद ही चुनावी प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाने की कोशिश को नख-दांत मिलेंगे। असल में, मज़ा तो तब आए, जब ईमानदारी को चुनावी मुद्दा बनाने वाली पार्टियां सबसे पहले चुनावी चंदे में मिली रकमों को नाम के साथ अखबारों या अपने साइट पर प्रकाशित करे।

नकद चुनावी चंदे को 2 हजार रूपये तक सीमित करके केन्द्र सरकार ने एक उम्मीद को नया जन्म दिया है। यह काम ठीक से चला, तो बात ऐसी है कि फिर दूर तलक जाएगी।

Tuesday, January 24, 2017

उज्जवल करती उज्जवला

जब हम गांव की बात करते हैं तो जेहन में एक तस्वीर ज़रूर घूम जाती है, शाम के वक्त हवा में घुलता और हर घर से उठने वाला चौके का धुआं। एक तस्वीर और कौंधती है, वह है चूल्हा फूंकती औरतें।

बात गांव की करें, और साथ में अनुसूचित जाति या जनजाति के गांवों की करें तो स्थिति और बदतर हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले साल के मई महीने में इस स्थिति को सुधारने के लिए एक योजना शुरू की थी, नाम था उज्जवला योजना। योजना में देश के गरीब घरों तक गैस कनेक्शन देने की बात कही गई थी। शायद इससे प्रदूषण पर भी लगाम लगाई जा सकती है लेकिन बड़ा फायदा यही गिनाया गया कि घर में चूल्हा फूंकने वाली औरते हर रोज़ धुएं की उतनी ही मात्रा फेंफड़े में लेती हैं, जो 40 सिगरेट के बराबर होती है।

चूल्हे के धुएं में कार्बन मोनोक्साइड, सल्फर और तमाम ऐसी गैसे होती हैं, जिनको ज़हरीली गैस कहा जाता है। निजी तौर पर मैं मानता हूं कि कोई योजना तभी कामयाब मानी जा सकती है, जब उसका फायदा समाज के सबसे वंचित तबके को मिले। उज्जवला योजना की कामयाबी को ग्राउंड लेवल पर जांचने हम मध्य प्रदेश-राजस्थान की सरहद पर शिवपुरी पहुंचे थे। यह इलाका सहरिया जनजाति का है, जो पहले जंगलों के भीतर थे और विस्थापित होकर अब नए बसाए गांवों में या फिर इधर-उधर अस्थायी ठिकाना बनाकर रह रहे हैं।

मध्य प्रदेश घाटीगांव के ऐसे ही एक अस्थायी पुरवे में मेरी मुलाकात हुई थी रज्जोबाई से। रज्जोबाई अमले को देखते ही डर गई, लेकिन जब हमने उनसे गैस चूल्हा दिखाने को कहा तो फिर उनका डर धीरे-धीरे कम हुआ। यह बात और है कि उस वक्त उनके पास गैस चूल्हे पर उबालने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन उस सहरिया बस्ती में रज्जोबाई समेत तकरीबन सभी के पास गैस कनेक्शन पहुंच चुका था। योजना में बीपीएल परिवारों को गैस कनेक्शन और पहली बार भरा हुआ सिलिंडर मुफ्त मिलता है।

असल में, इस योजना के तहत तीन साल के भीतर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले कुल 5 करोड़ परिवारों को गैस कनेक्शन दिए जाने वाले थे। इसके तहत पहले साल डेढ़ करोड़, दूसरे साल डेढ़ करोड़ और तीसरे साल दो करोड़ गैस कनेक्शन बांटे जाने का लक्ष्य तय किय़ा गया था। लेकिन योजना की कामयाबी यही है कि अभी तक यानी लागू होने के नौ महीने के भीतर ही करीब 1 करोड़ 70 लाख कनेक्शन वितरित कर दिए गए हैं।

लेकिन, इस योजना को लागू कराने में कुछ ज़मीनी स्तर की परेशानियां भी हैं। योजना के तहत, दिए जा रहे कनेक्शन साल 2011 की सामाजिक-आर्थिक जनगणना पर आधारित हैं और उनमें लाभार्थियों के पूरे पते नहीं है। ऐसे में लाभार्थी को खोज निकालना मुश्किल काम है। यह कठिनाई जनजातीय इलाकों में बढ़ जाती है जहां विस्थापन जीवन का स्थायी भाव बन गया है।

वैसे भी इस योजना की कामयाबी देश की भी ज़रूरत है क्योंकि देश के कुल 24 करोड़ घरो में से 10 करोड़ घर अब भी ऐसे हैं जो जलावन क लिए लकड़ी, कोयले, गोयठे या उपलों पर निर्भर हैं।

मुझे इस योजना की कामयाबी पर हैरत इसलिए भी हुई क्योंकि इस के तहत बांटे जाने वाले गैस सिलिंडर वही होने थे जो प्रधानमंत्री के गिव-अप स्कीम के तहत अमीर लोगों की सब्सिडी वाले सिलिंडर के तौर पर एजेंसियों को वापस मिलने वाले थे। याद कीजिए, साल 2014 का लोकसभा चुनाव, कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में सब्सिडी वाले 9 सिलिंडरों की जगह 12 सिलिंडर देने का वायदा जनता से किया था। लेकिन केन्द्र सरकार ने इसके उलट लोगों से सब्सिडी छोड़ने की अपील की। हर चीज़ मुफ्त पाने को ललायित भारतीयों में से डेढ़ करोड़ लोगों ने अगर प्रधानमंत्री की अपील पर रसोई गैस की सब्सिडी छोड़ दी, तो हैरत तो होनी ही है।

अब, पहले 9 महीने में इस योजना ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया है तो बारी पूर्वोत्तर राज्यों की है जहां सिर्फ असम से ही एक 1.74 लाख गैस कनेक्शन के आवेदन आ चुके हैं।

उज्जवला योजना में फिलहाल तो वोट बैंक की सियासत दिखती नहीं है। गांव के गरीबों के घर में गैस चूल्हे की नीली लौ जलने लगी है यह संतोष की बात है। अब यह सवाल तो बिलकुल अलहदा है न कि उस पर पकेगा क्या?


मंजीत ठाकुर

Wednesday, January 18, 2017

सिंचाई के लिए अतीत की नाकामी से सबक

अभी ग्वालियर-धौलपुर-भरतपुर इलाके में घूम रहा हूं। देश में पिछले दो साल मॉनसून की कमी वाले साल रहे हैं और इस साल की अच्छी बारिश ने रबी फसलों की बुआई में जोरदार बढ़ोत्तरी दिखाई है। लेकिन यह मानना होगा कि देश में खेती का ज्यादातर हिस्सा अभी भी इंद्र देवता के भरोसे हैं। देश में कुल बोए रकबे का आधा से अधिक वर्षा-आधारित पानी पर निर्भर है। ऐसे में हर खेत तक पानी पहुंचाने में सरकार को बहुत कुछ उद्योग करने की जरूरत है।

देश में सूखा अभी भी किसानों के लिए बुरे सपने जैसा है और गलत वक्त पर हुई बारिश भी खेती के लिए नुकसानदेह ही साबित होती है। सही वक्त पर बारिश न होने से फसल बेकार हो जाती है। ऐसे में केन्द्र सरकार ने साल 2015 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरूआत की ताकि प्रधानमंत्री के नारे को अमली जामा पहनाया जा सके जिसमें वह हर बूंद से अधिक फसल की बात कहते हैं। साथ ही, इस लघु सिंचाई योजना की लागत 50 हज़ार करोड़ रूपये की रखी गई। ऐसी योजना से अनुमान है कि खेती से जुड़े जोखिम को कम किया जा सके।

बजट में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के आवंटन को मिला दें तो पिछले साल ही रकम को दोगुना कर दिया गया। लेकिन सवाल सिर्फ बज़ट में आवंटन बढ़ाने से ही नहीं होगा। अतीत के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो मेरी इस बात को बल मिलेगा। साल 1991 से 2007 के बीच भारत ने सार्वजनिक नहर तंत्र में 2.55 लाख करोड़ रूपये का निवेश किया। यह मौजूदा प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के निवेश से पांच गुना ज्यादा की राशि थी। लेकिन इतनी बड़े निवेश के बाद भी, देश में नहरों से सिंचित क्षेत्र में 38 लाख हेक्टेयर कम हो गया।

करीब 50 से 90 फीसद की सब्सिडी वाले दौर में भी माइक्रो सिंचाई वाले क्षेत्र का रकबा कुल रकबे का 5 फीसद भी नहीं हो पाया। जाहिर है, हमें इस योजना को लागू करने में अतीत की गलतियों से सबक लेना होगा।

ग्वालियर के जिस इलाके में मैं घूम रहा हूं, वहां पानी की पर्याप्त कमी है। मैंने इधर से भरतपुर की तरफ का रूख किया, वहां भी नहरें बनी हुई तो हैं। भरतपुर के दीग तहसील में तो 1982 में नहरें खुद गई थीं, लेकिन बिन पानी के नहरों का क्या काम?

सिंचाई के मामले में मध्य प्रदेश में काम अच्छा हुआ दिखता है। नहरों के मामले में मध्य प्रदेश ने उपलब्धिपूर्ण काम किया है और वह दिखता भी है। डबरा-भीतरवाड़ इलाके में खेतों में गेहूं और सरसों की लहलहाती फसलें नहर सिंचाई की कामयाबी का हरभरा सुबूत हैं।

मध्य प्रदेश ने सन् 2003 से 2014 के बीच अपने नहर सिंचित क्षेत्रों में करीब 20 लाख हेक्टेयर का इजाफा किया है। साल 2000 में मध्य प्रदेश में कुल सिंचित इलाका 4.14 मिलियन हेक्टेयर था जो 2014 में 8.55 मिलियन हेक्टेयर हो गया है। इस बढोत्तरी के लिए सूबे को करीब 2000 करोड़ रूपये का निवेश करना पड़ा, लेकिन इसका फल ज़मीन पर दिखता है। सिंचाई के संसाधनों के बेहतर प्रबंधन ने भी राज्य में चमत्कारिक परिणाम दिए हैं।

भरतपुर के इलाके में किसानो की शिकायत है कि पानी पहले उनके नहरों तक नहीं पहुंचता था, हालांकि पिछले छह महीने से पानी आना शुरू हुआ तो अगल बगल के कुओं में पानी आ गया। दीग में ज़िला प्रशासन ने वॉटरशेड प्रबंधन की शुरूआत की है, क्योंकि पानी आयात करके लोगों तक पहुंचाना खर्चीला भी है और हरियाणा पानी देने में अड़ंगेबाज़ी पर उतारू है।

जो भी हो, हर खेत तक पानी पहुंचाने के बड़े यज्ञ में, आखिरी खेत तक पानी पहुंचाना लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना बाकी की योजनाओं की ही तरह मुफीद तो है, लेकिन इसके लिए नाकाम योजनाओं के अतीत से सबक सीखना बेहद जरूरी है।



मंजीत ठाकुर





Monday, January 16, 2017

सही वक़्त पर सही फ़ैसले का नाम धोनी

यह बात और है कि हम भारतीय पर्याप्त नाशुक़रे हैं और अपने नायकों को तभी तक याद रखते हैं जब तक उनमें चमक रहती है। लेकिन कुछ ग़लती तो हमारे इन नायकों की भी रही ही है। सौरभ गांगुली हों या कपिल देव या फिर कोई भी और मिसाल ले लीजिए, उन्होंने तब तक संन्यास की घोषणा नहीं की, जब तक उनका करिअर घिसता रहा।

लेकिन, धोनी तो अपवादों की मिसाल हैं।

याद कीजिए कि साल 2014 में बीच श्रृंखला में धोनी ने टेस्ट की कप्तानी और टेस्ट मैचों से संन्यास की घोषणा की थी। टी-20 और एकदिवसीय मैचों की कप्तानी छोड़ने का ऐलान भी उसी बेसाख़्ता अंदाज़ में हुआ है।

ऐसा नहीं है कि लोगों ने कप्तानी छोड़ने के उनके इस फ़ैसले के कयास नहीं लगाए थे, लेकिन तटस्थ होकर कहें तो धोनी का फ़ैसला बिलकुल सही वक़्त पर आया है।

इस वक्त जब बल्ले से भी और कप्तानी में भी विराट कोहली जगमगा रहे हैं, धोनी ने खेल के सभी फ़ॉर्मेट में कप्तानी उनके हवाले करके अपनी निस्पृहता का सूबूत भी दिया और सटीक फ़ैसले लेने की अपनी क्षमता का भी। अभी कोहली शानदार रंगत में हैं और उनके फ़ैसले भी सही साबित हो रहे हैं। विराट कोहली की कप्तानी में भारत की जीत का प्रतिशत 63 फीसद से अधिक का है। 18 मैचों से भारत अजेय रहा है और बल्ले से भी विराट ने अच्छे हाथ दिखाए हैं। वह तीन दोहरा शतक बनाने वाले भारत के एकमात्र कप्तान भी हैं।

विराट कोहली ने सचिन तेंदुलकर और उनसे पहले से चले आ रहे उस विचार और आशंका को भी खत्म कर दिया है कि कप्तानी का भार निजी प्रदर्शन पर असर डालता है। हालांकि, कैप्टन कूल धोनी के कप्तानी का अंदाज़ दूसरा था और विराट का अलहदा। विराट आक्रामक कप्तानी करते हैं और धोनी चतुर लोमड़ी की तरह मौके का फायदा उठाते थे, दांव लगाते थे।

सिर्फ हम भारतीय ही नहीं, पूरी दुनिया धोनी की कप्तानी सूझबूझ की कायल रही है। लेकिन सिर्फ कप्तानी के दम पर आप टीम में हमेशा नहीं बने रह सकते। धोनी की पहचान बना हेलिकॉप्टर शॉट खो गया है। मैच फिनिशर की उनकी विश्व-प्रसिद्ध पहचान भी संकच में है। वनडे मैचों में धोनी की रनों की रफ्तार भी साल-दर-साल धीमी पड़ती गई है। धोनी ने 2012 में करीब 65 की औसत से बल्लेबाज़ी की थी जो अब 2016 में करीब-करीब 29 के आसपास है। टी-20 में धोनी का औसत करीब 47 है।

यह औसत धोनी की हैसियत के आसपास भी नहीं ठहरता। इसी के बरअक्स विराट कोहली ने वनडे में 92 और टी-20 में 106 की औसत से रन कूटे हैं। यानी, विराट अपने सबसे बेहतरीन दौर में हैं और धोनी की करिअर ढल रहा है।

सबसे अच्छी बात वैसे यह है कि धोनी ने सिर्फ कप्तानी छोड़ी है और अभी संन्यास नहीं लिया है। उनमें कम से कम दो साल का क्रिकेट बचा हुआ है, और अब जब वह विपक्षी टीमों के खिलाफ रणनीतियां बनाने के दवाब से दूर रहेंगे तो शायद हमें वह धोनी वापस मिल जाए जिसका बल्ला, बल्ला नहीं तोप था, और जिसकी धमक से गेंदबाज़ों के पसीने छूट जाते थे।

पैरलल छक्के, और शानदार चौकों (हेलिकॉप्टर शॉट तो बहुत चर्चा में हैं, तो वह तो उम्मीदों की लिस्ट में है ही) की बरसात एक बार फिर शुरू हो, यह दर्शक भी चाहेंगे और खुद धोनी भी।

धोनी की शख्सियत का कमाल है कि आठ साल तक भारतीय क्रिकेट के शीर्ष पर रहने, कप्तानी करने और साथी खिलाडियों को डांटने-डपटने से परहेज़ नहीं करने वाले कैप्टन कूल अपने से जूनियर खिलाड़ी के मातहत खेलने को तैयार हैं।

वक्त के साथ, नायक बदल जाते हैं, बस ईश्वर नहीं बदलते। सचिन की जगह कोई नहीं ले सकता, लेकिन धोनी ने सचिन का नायकों वाला रुतबा हासिल कर लिया था। यह ताज अब कोहली के सिर है। अच्छी बात यह कि इसे धोनी ने जल्दी मान लिया।



मंजीत ठाकुर

Sunday, January 1, 2017

रबी की बुआई पर नहीं नोटबंदी का असर

8 नवंबर को काले धन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के वास्ते जब केन्द्र सरकार ने 500 और एक हज़ार रूपये के नोट को चलन से बाहर करने का फ़ैसला किया तो दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं, एक तो वह, जो नोटबंदी के समर्थन में थीं। दूसरी प्रतिक्रियाः आलोचनात्मक कम और निंदात्मक ज्यादा थी। इसमें सियासी तबके के अलावा एक धड़ा ऐसा भी था जो मीडिया का हिस्सा है और प्रधानमंत्री मोदी के हर काम में नुक्स निकालने के लिए छिद्रान्वेषण की हद तक जाता है।

इसी मीडिया ने कहा कि गांवों में किसानो को बहुत दिक्कत होगी और इसका असर खेती पर भी बहुत होगा।

बहरहाल, मैंने पंजाब का दौरा किया था क्योंकि धनी और बड़े किसानों के इस सूबे में खेती पर असर देखना ज्यादा दिलचस्प र महत्वपूर्ण था क्योंकि यही राज्य हमारे अनाज भंडार में अहम तरीके से इजाफ़ा भी करता है। उस दौरान जब नोटबंदी के असर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हुए अरण्य-रोदन किया जा रहा था, पंजाब में तकरीबन 90 फीसद किसानों ने रबी की बुआई कर ली थी।

जब ज़रा इन आंकड़ो पर गौर फरमाइएः मौजूदा रबी सीज़न में देश में गेहूं का रकबा पिछले साल इसी अवधि के मुकाबले आठ फीसद बढ़ गया है। यानी इस बार रबी की बुआई में गेहूं का हिस्सा 292.39 लाख हेक्टेयर है। जबकि दलहन का रकबा 13 फीसद बढ़कर 148.11 लाख हेक्टेयेर हो गया है।

इस बढ़त की एक वजह गेहूं और दलहन के समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी को भी माना जा सकता है कि इसी की वजह से इस रबके को बढ़ाने में मदद मिली है। वैसे, धान और मोटे अनाज पिछले साल की तुलना में अभी पीछे ही हैं।

केन्द्र सरकार के मुताबिक, राज्यों से मिली प्राथमिक जानकारी के अनुसार, देश में 30 दिसंबर तक कुल 582.87 लाख हेक्टेयर रबी की फसल की बुआई हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि के दौरान 545.46 लाख हैक्टेयर में रबी की फसलें बोई गई थीं।

इस समीक्षा अवधि के दौरान देश में तिलहन का रकबा भी बढ़ा है। पिछेल साल यह 71.83 लाख हेक्टेयर था जबकि इस दफा 79.48 लाख हेक्टेयर हो गया है।

रबी सीजन में सबसे ज्यादा पैदा होने वाले दलहन चने की बात करें तो 28 दिसंबर तक देशभर में 94.92 लाख हेक्टेयर में बुआई दर्ज की गई है जो इस अवधि तक अब तक की सबसे ज्यादा बुआई है, पिछले साल इस दौरान देशभर में 82.88 लाख हेक्टेयर में चने की खेती हुई थी। इस दौरान, देश में औसतन 85.03 लाख हेक्टेयर में चने की बुआई होती है और पूरे सीजन के दौरान करीब 88.37 लाख हेक्टेयर में फसल लगती है।

चने के बाद दूसरे नंबर पर ज्यादा पैदा होने वाले दलहन मसूर की बुआई पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ चुकी है, आंकड़ों के मुताबिक, 28 दिसंबर तक देशभर में 16.07 लाख हेक्टेयर में मसूर की खेती दर्ज की गई है जो अब तक किसी भी साल हुई बुआई में सबसे अधिक है। पिछले साल इस दौरान देश में 13.51 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई थी। वैसे, औसतन पूरे सीजन के दौरान 14.79 लाख हेक्टेयर में मसूर की बुआई होती है।

कुल मिलाकर कहा जाए, नोटबंदी का असर कम से कम रबी की बुआई पर नहीं दिखा है। केन्द्र सरकार ने रबी की बुआई के जो लक्ष्य तय किए हैं, वह अच्छी बारिश और समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी की वजह से पूरे होते दिख रहे हैं। कुदरत साथ दे रही तो फायदा किसानों और आम लोगों का होना चाहिए। अच्छी खेती से शेयर बाजारो में भी तेज़ी रहेगी। लेकिन मुझे ज्यादा चिंता उन लोगों की है जिन्होंने नोटबंदी की वजह से रबी की बुआई की मर्सिया पढ़ा था।

मंजीत ठाकुर