शनिवार, 7 नवंबर 2026

70 घंटे काम करने से डर क्यों? भारत को डिग्री नहीं, हुनर और काम की संस्कृति चाहिए

मुख्य बिंदु
  • नारायण मूर्ति ने अक्टूबर 2023 में युवाओं से 70 घंटे काम करने की अपील की थी।
  • PLFS 2023-24 में अप्रैल-जून 2024 के दौरान नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों के वास्तविक काम के घंटे औसतन 48.2 प्रति सप्ताह दर्ज हुए।
  • 15–59 वर्ष के केवल 4.1 प्रतिशत लोगों को औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण मिला।
  • 15–29 वर्ष के युवाओं में यह हिस्सा 4.9 प्रतिशत था।
  • भारत में प्रति कामकाजी घंटे GDP का मूल्य अमेरिका और चीन की तुलना में काफी कम है।
  • व्यावसायिक शिक्षा और हाथों से काम करने वाले हुनर को सामाजिक सम्मान देना जरूरी है।
  • भारत की चुनौती केवल अधिक घंटे काम करने की नहीं, बल्कि बेहतर कौशल और अधिक उत्पादकता की है।

कुछ वक्त पहले इन्फोसिस वाले नारायण मूर्ति ने युवाओं से हफ्ते में 70 घंटे काम करने की अपील क्या कर दी, कुछ लोग भड़क उठे.

भड़कने वाले लोगों में अधिकतर लोग 35 प्लस के थे. पर इससे मालूम होता है कि देश में काम को लेकर लोगों के तेवर क्या हैं.

मन में आकांक्षा चीन जैसी वृद्धि दर की है और अमेरिका जैसी संपन्नता की है, लेकिन अपने लिए काम के घंटे इनको लेबर लॉ के हिसाब से चाहिए.

मुझे पता है कि शिकायत करने वाले लोगों में अधिकतर लोग ऐसे हैं जिनके लिए काम का मतलब होता है, नौकरी. और नौकरी का मतलब होता है सरकारी नौकरी, वह भी ऐसी कि सुबह की ताजी सब्जी खरीद कर लाए, बनवाया, खाए और तब दफ्तर गए और शाम के 5 बजे की चाय पीने फिर से घर में उपस्थित.

श्रीमान/मती, आपसे काम के 70 घंटे तो क्या हफ्ते में 42 घंटे भी पूरे नहीं होंगे.

हमारे एक परिचित बिहार सचिवालय में काम करते थे और उनके बारे में मशहूर था कि 12 बजे लेट नहीं, 4 बजे भेंट नहीं. 70 घंटे वाली बात से उन जैसों को दिक्कत होगी ही.

सवाल है कि क्या भारतीय सचमुच 70 घंटे काम नहीं करते?

यहाँ एक बहुत रोचक आँकड़ा है.

भारत में काम के घंटों पर बहस करते समय हमें सरकारी आँकड़ों पर भी नजर डालनी चाहिए. PLFS 2023-24 के मुताबिक, भारत में नियमित वेतनभोगी कर्मचारी औसतन हफ्ते में 48.2 घंटे काम कर रहे थे. शहरी क्षेत्रों में यह औसत 48.1 घंटे था.

स्वरोजगार करने वालों का औसत 39.6 घंटे और सभी श्रेणियों के कामगारों का औसत 41.7 घंटे था. इससे साफ है कि भारत में काम के घंटे रोजगार की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग हैं. इसलिए 70 घंटे की बहस को केवल आलस्य या मेहनत के सवाल में सीमित नहीं किया जा सकता.

इससे एक दिलचस्प सवाल उठेगा: जब औसत नियमित वेतनभोगी कर्मचारी लगभग 48 घंटे काम कर रहा है, तो 70 घंटे की बहस को केवल कामचोरी बनाम मेहनत के चश्मे से देखना कितना उचित है?

एक और बात: ये वास्तविक काम के घंटे हैं, कार्यालय में बिताया गया कुल समय नहीं। दोनों में अंतर है.

पर यकीन मानिए, मूर्ति ने यह बात उन युवाओं के लिए कही है, जो जीवन में वाकई कुछ हासिल करना चाहते हैं. मैं नाम नहीं लेना चाहता, पर मैं एक ऐसे लड़के को नजदीक से जानता हूं, जिसके पास लैपटॉप नहीं था और वह रोज 4000 शब्द फोन से टाइप करके भेजता था. कॉन्टैंट राइटिंग का काम था उसका. आज वह तरक्की कर रहा है.

आज देश में मड़ुआ के दोबर ग्रेजुएट हैं जो यूपीएससी की परीक्षा देते हैं पर सही मायनों में उनके पास कोई कौशल नहीं होता. स्किल का कोई सेट नहीं होता इनके पास.

और जब सिविल सेवाओं में इनका चयन नहीं होता, तो फिर इनके पास आगे करने के लिए कुछ ज्यादा होता नहीं है.

आज अगर युवा रोजगार का मतलब नौकरी समझते हैं तो इसकी एक वजह यह भी है कि हमारे समाज में हाथों से काम करना एक वर्जना है. हाथों से काम करने वालों को सामाजिक पदानुक्रम में निचले स्तर पर रखा जाता है.

स्कूली शिक्षा से व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए अपेक्षया कम छात्र ही जाते हैं. बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) में अनुमान लगाया गया था कि भारतीय कार्यबल के 19-24 वर्ष आयु वर्ग का 5 फीसद से भी कम हिस्से को औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण मिला था.

इसके आंकड़े नए आ गए हैं. पत्र सूचना कार्यालय पर प्रकाशित, PLFS 2023-24 के अनुसार: 15–59 वर्ष के केवल 4.1 प्रतिशत लोगों ने औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया था. इनमें से 30.6 प्रतिशत ने अनौपचारिक स्रोतों से प्रशिक्षण पाया था.

एक और दिलचस्प आँकड़ा यह भी है कि 15–29 वर्ष के युवाओं में औपचारिक प्रशिक्षण पाने वालों का हिस्सा लगभग 4.9 प्रतिशत था.

इसका अर्थ है कि औपचारिक प्रशिक्षण का दायरा अब भी बहुत सीमित है.

इसकी तुलना में अमेरिका में 52 फीसद, जर्मनी में 75 फीसद और दक्षिण कोरिया में 96 फीसद लोग वोकेशनल ट्रेनिंग कर चुके थे.

हम चीन और अमेरिका जैसी आर्थिक ताकत बनना चाहते हैं. लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इन देशों की उत्पादकता और हमारी उत्पादकता में कितना अंतर है?

Penn World Table के 2025 संस्करण पर आधारित 2023 के आँकड़ों के अनुसार, अमेरिका में प्रति कामकाजी घंटे GDP का मूल्य 83.5 अंतरराष्ट्रीय डॉलर था, चीन में 17.7 डॉलर और भारत में केवल 8.1 डॉलर.

इसका मतलब यह नहीं कि भारतीय मेहनत नहीं करते. इसका अर्थ यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था में एक घंटे के श्रम से पैदा होने वाला आर्थिक मूल्य बहुत कम है. हमें अधिक मेहनत के साथ बेहतर तकनीक, प्रशिक्षण, पूँजी और कार्यकुशलता की भी जरूरत है.

दूसरी तरफ, हिंदुस्तान में स्थिति है कि ग्रेजुएट हुए. काम कोई आता नहीं. कॉलेज में स्किल सिखाया नहीं गया.

समस्या की गंभीरता समझनी हो तो ताजा सरकारी आँकड़े देखिए. आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (PLFS) 2023-24 के मुताबिक, 15 से 59 वर्ष के भारतीयों में महज 4.1 प्रतिशत को औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण मिला था.

लगभग 30.6 प्रतिशत लोगों ने अनौपचारिक स्रोतों से कुछ प्रशिक्षण हासिल किया. यानी हमारे यहाँ बड़ी आबादी काम तो कर रही है, लेकिन उसके पास प्रमाणित और व्यवस्थित कौशल प्रशिक्षण का अभाव है.

सवाल यह है कि हम युवाओं को केवल डिग्रियाँ दे रहे हैं या उन्हें किसी काम के लायक भी बना रहे हैं?

डिग्री हासिल कर लेना और रोजगार के योग्य हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं। Wheebox की India Skills Report 2024 के अनुसार, भारत के युवाओं की employability 51.25 प्रतिशत आँकी गई थी.

यानी लगभग आधे युवाओं को रोजगार के योग्य बनाने के लिए अभी और प्रशिक्षण की जरूरत है. यह आँकड़ा बताता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में डिग्री और कौशल के बीच की खाई कितनी बड़ी है.

जो स्किल सिखाने वाले कॉलेज हैं, मसलन इंजीनियरिंग, वहां से ही कितने काम के इंजीनियर निकलते हैं भला? अभी एक सर्वे डाटा देखा मैंने, जिसमें स्पष्ट उल्लेख था कि करीब 67 फीसद सिविल इंजीनियरों को कंस्ट्रक्शन के मैकेनिक्स की बुनियादी जानकारी नहीं थी.

असल में, इंजीनियरिंग को अपने देश में स्किल नहीं, सामाजिक रुतबा माना जाता है.

बहरहाल, अपनी छोड़िए किसी नाई को देखिए वह सुबह 8 से शाम 8 तक काम करता है या नहीं, किसी बढ़ई को देखिए, किसी सब्जीवाले, वेल्डिंग करने वाले, किसी मीडियाकर्मी को देखिए. सबके सब 12 घंटे रोजाना से अधिक काम करते हैं.

UNESCO-UNEVOC के भारत संबंधी TVET प्रोफाइल में उच्च माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक कार्यक्रमों में नामांकन का हिस्सा लगभग 4.2 प्रतिशत बताया गया है.

अब मेरे कुछ प्रश्नों के जवाब दीजिएः

-कितने बच्चे स्कूल के बाद ITI या पॉलिटेक्निक जाना चाहते हैं?

-कितने परिवार अपने बच्चों को प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, कारपेंटर, वेल्डर या मशीन ऑपरेटर बनाना चाहते हैं?

-क्या हमारे समाज में किसी कुशल कारीगर को उतना सम्मान मिलता है जितना किसी सामान्य स्नातक को?

नारायण मूर्ति की 70 घंटे वाली सलाह से सहमत होना या असहमत होना हर व्यक्ति का अधिकार है. लेकिन इस बहस को केवल काम के घंटों तक सीमित कर देना हमारी असली समस्या से आँख चुराना होगा.

भारत को ऐसे युवाओं की जरूरत है जो केवल नौकरी की तलाश न करें, बल्कि किसी काम में दक्ष भी हों. जिन्हें मशीन चलानी आती हो, जो कोड लिख सकें, जो बढ़िया रिपोर्ट तैयार कर सकें, जो किसी व्यवसाय को खड़ा कर सकें और जो अपने हाथों से कोई उत्पाद बना सकें.

हमें चीन जैसी उत्पादन क्षमता और अमेरिका जैसी आर्थिक समृद्धि चाहिए तो केवल अधिक घंटे काम करने की इच्छा नहीं, बल्कि अधिक मूल्य पैदा करने की क्षमता भी विकसित करनी होगी.

70 घंटे काम करने वाला अकुशल व्यक्ति और 40 घंटे में अधिक मूल्य पैदा करने वाला कुशल व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते.

भारत की असली चुनौती काम के घंटों की नहीं, काम की संस्कृति, कौशल और उत्पादकता की है।

भड़किए मत, आप बेशक नव्बाब के नाती हैं, पर सब नहीं हैं. देश को तरक्की पर लाने का एकमात्र रास्ता युवाओं का 70 घंटे हफ्ते काम करने का है. और हां, ह्यूमन स्किल सेट सीखने का भी. 


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. नारायण मूर्ति ने युवाओं को 70 घंटे काम करने की सलाह कब दी थी?

नारायण मूर्ति ने अक्टूबर 2023 में 3one4 Capital के पॉडकास्ट The Record में कहा था कि भारत के युवाओं को देश की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए सप्ताह में 70 घंटे काम करने की इच्छा रखनी चाहिए।

2. भारत में कर्मचारी औसतन सप्ताह में कितने घंटे काम करते हैं?

PLFS 2023-24 के अनुसार, अप्रैल-जून 2024 में नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों ने औसतन 48.2 घंटे प्रति सप्ताह काम किया। सभी श्रेणियों के कामगारों का औसत 41.7 घंटे था।

3. भारत में कितने लोगों को औपचारिक कौशल प्रशिक्षण मिला है?

PLFS 2023-24 के अनुसार, 15–59 वर्ष की आबादी में केवल 4.1 प्रतिशत लोगों ने औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

4. भारत में युवाओं के बीच औपचारिक कौशल प्रशिक्षण की स्थिति क्या है?

15–29 वर्ष के आयु वर्ग में औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों का हिस्सा 4.9 प्रतिशत था।

5. श्रम उत्पादकता का अर्थ क्या है?

श्रम उत्पादकता का अर्थ है कि किसी अर्थव्यवस्था में एक कामकाजी घंटे के दौरान कितना आर्थिक मूल्य पैदा होता है। इसे सामान्यतः प्रति कामकाजी घंटे GDP के आधार पर मापा जाता है।

6. क्या अधिक घंटे काम करने से उत्पादकता अपने आप बढ़ जाती है?

नहीं। उत्पादकता पर कौशल, तकनीक, पूँजी, प्रबंधन, कार्यस्थल की परिस्थितियों और काम की गुणवत्ता का भी असर पड़ता है। अधिक घंटे काम करना अपने आप अधिक उत्पादकता की गारंटी नहीं है।

7. भारत में व्यावसायिक शिक्षा क्यों जरूरी है?

व्यावसायिक शिक्षा युवाओं को प्लंबिंग, इलेक्ट्रिकल काम, मशीन संचालन, वेल्डिंग, निर्माण, तकनीकी सेवाओं और अन्य पेशों में व्यावहारिक दक्षता देती है। इससे रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं.

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