Thursday, February 16, 2012

बौद्धिकता के बहाने

आपने मेरी तस्वीर, जिसे मैं प्यार से फोटू कहता हूं, देख ही ली होगी। इस तस्वीर को खिंचवाने में बहुत मेहनत करनी पड़ी मुझे। मुझे लगा कि ऐसी तस्वीर के ज़रिए लोग मुझे भी बुद्धिजीवी समझने लगेंगे। मैं सीधे तोप हो जाऊंगा। टाइमबम। किसी ने छेड़ा नहीं कि सीधे फट पड़ने वाला...। घाघ तोपचियों की खुर्राट किस्म की तस्वीरों से मुझमें हीन भावना आने लगी थी...यह तस्वीर जरुरी हो रिया था।

कृपया, यह सवाल न करें कि आखिर बौद्धिक होने के लिए तस्वीर की क्या जरुरत आन पड़ी। लेकिन यह तय है कि आप सवाल पूछेंगे ही, बिना पूछे आप मानने वाले कहां ठहरे?

दरअसल, तस्वीर खिंचवाने और मन की स्थिति को बुद्धिजीवियों के स्तर तक लाने में बहुत झख मारनी पड़ती है। लेकिन मन में बैठी उस बात का क्या किया जाए। बचपन से देखता आया हूं कि जिस किसी को भी मन ही मन यह यक़ीन हो कि उसमें भी इंटेलेक्चुअलत्व है ज़रा भी। वह अपनी खुद की प्रायोजित किताब में ऐसी ही तस्वीरें चस्पां करवाते हैं।

जितने विचारक जाति के लोग हैं, साहित्यकारनुमा लोग, साहित्यिक लठैतों  से लेकर साहित्यिक चपरासी तक, साहित्यिक पान वाले से लेकर पानेवाले तक, गाल बजाने वाले से लेकर गाने-बजाने वाले तक...वह ऐसी ही तस्वीर खिंचवाते हैं।

हाथ गाल पर..या यूं कहें कि ठुड्डी पर। आंखें उधर .. जिधर फोटोग्राफर के स्टूडियो में कंघी-शीशा टांगने की जगह होती है।

पहले तो मैंने भी वैसा ही करने का पूरा प्रयास किया था। हाथ को ठुड्डी पर टिकाया, लेकिन ससुरा टिका ही नहीं। हाथ और ठुड्डी में उमा भारती और राहुल गांधी जैसा बुआ-भतीजे का रिश्ता...या यह रिश्ता भी समझ में न आए तो आरएसएस और दिग्गी राजा जैसा रिश्ता...अब समझे। आप लोगों को भी एक दम ऐसे समझाना पड़ता है जैसे राहुल वोटरों को समझाते हैं कि पैसा भेजा था केन्द्र से और बीच में न जाने कहां तो अटक गया।

हत् तेरे की...।

तो जनाब ठुड्डी और हाथ एक दसरे के साथ न जमे। काहे कि मेरे चेहरे पर दाढ़ी भी वैसे ही उगती है, जैसे चुनाव के ऐन पहले न जाने कैसी-कैसी नई  पार्टियां उग आती हैं, या पाक-नापाक, साफ-हाफ गठबंधन तैनात हो लेते हैं।

ये पार्टियां जैसे जीतनेवाले मजबूत उम्मीदवारों की आंखों में गड़ती हैं ना, वैसे ही दाढी के कड़े बाल मेरे हथेलियों में गड़ने लगे। बुद्धिजीवी की तरह तस्वीर खिंचवाने के मेरे प्रण का कौमार्य भंग होने लगा।

मुट्ठी खोलने की कोशिश की तो हथेलियों से चेहरा छिपने लगा, कैमरावाला मोबाईल फोन हाथ में लिए दोस्त फिकरा कसने लगा, यार मनोज कुमार की तरह लग रहे हो। मै पस्त हो गया। लेकिन मैं भी बुद्धिजीवी बनने के लिए उतारू था।

हाथ में कलम लेकर ऊपर की तरफ ताकना..शून्य में निहारना..मानो दुनिया में सुकरात के अब्बा और अफलातून के दादा,  मेरे कंधो पर सारी दुनिया की समस्याओं का बोझ डालकर निंश्चिंत हो गए हों, निश्चिंत होकर ज़न्नत की अप्सराओं के साथ चांदनी रात में नौका विहार कर रहे हों..।

मेरा स्वभाव भी कुछ ऐसा ही ऐं-वईं हंसी आने लगती है। सोनिया जी भ्रष्टाचार पर बोलें,  आडवाणी रथ यात्रा का प्रण साध लें, मनमोहन कहें हम लोकपाल पास कराने के लिए कृतसंकल्प हैं....ऐसी ही तमाम उम्दा बातों पर हंसी आने लगती है।

आम आदमी हूं..आम आदमी अपनी बुरी दशा में भी हंसता है, नेताओं के बयानों पर हंसता है। आम आदमी कुल मिलाकर खुश रहता है, नेता कहते हैं हमने आम आदमी को हंसाया, आम आदमी हंसता-हंसता अपनी जाति के नेता जी को वोट दे आता है।

हंसता नहीं होता आम आदमी तो हम खुश रहने वालों के सूचकांक में इतने ऊपर होते क्या? हमें तो रोटी के साथ नमक मिल जाता है तो हम खुश हो जाते हैं। ध्यान दीजिए. प्याज और तेल नहीं जोड़ा है मैंने।

सरकार की महती कृपा से मैं पूर्णतया शाकाहारी और अल्पहारी हो गया हूं। हरी सब्जियां खरीदने की औकात रही नहीं, वेतन वृद्धि के आसार दिल्ली में हिमपात की तरह दूर-दूर तक नजर नहीं आते, आलू उबालकर खा रहा हूं। रही बात अल्पहारी की तो कृषि मंत्री शरद पवार ने क्रिकेट की राजनीति और मुंबई नगर निगम चुनावों के बीच आम आदमी को अपनी कीमती वक्त देते हुए कहा था कि आम आदमी खाने लगा है इसलिए मंहगाई बढ़ रही है।

देश का नागरिक होते हुए मुझे मंहगाई कम करने की कोशिश तो करनी चाहिए ना। और योजना आयोग का बहु-प्रशंसति 32 रुपये वाला समीकरण भी है।

मां को शक हो गया है कि घर के सभी लोगों को पेट की कोई गंभीर बीमारी हो गई है, जभी मैंने सबके तेल और प्याज खाने पर रोक लगा दी है। कौन समझाएगा कि बीमारी किसको हुई है पेट की.. बीजेपी की तरह मुझे एक बीमारी ज़रूर हो गई है, मुद्दे से भटकने की। माफी चाहूंगा...बात मैं कर रहा था, तस्वीर खिंचवाने की।

तो जनाब, तस्वीर खिंचवाने के लिए गंभीर होना सबसे बड़ी समस्या थी। वैसे किसी दोस्त ने सलाह दी कि कुरता पहनो , बुद्धिजीवी लगोगे..बुद्धिजीवी होने के लिए कुरता पहनना बहुत ज़रूरी है। लेकिन हमारे शरीर की ढब कुछ ऐसी है कि कुरता पहनूं तो लगता है, खूंटी में टांग दी गई है। सो यह ख़्याल हमने खुदरा में एफडीआई के विचार और राइट टू रिजेक्ट की तरह तत्काल प्रभाव से खारिज कर दी।

वैसे जहां तक गंभीरता का सवाल है, वह तो हम आजतक हुए ही नहीं.. बहुत कोशिश की गौतम गंभीर ही हो जाएं, कभी तो धोनी का छींका टूटेगा और हम भी कप्तान बन लेंगे की तरह की उम्मीद में...लेकिन जानकार कहते हैं गंभीरता आते-आते ही आती है।

गोया गंभीर हम तब हो गए, जब हमारे मजहब के बड़े स्तंभों ने हमें निराश करना शुरु  कर दिया। सुनने लगे कि सहवाग-गंभीर वगैरह धोनी के खिलाफ साजिश रचने में लगे हैं, इंग्लैंड में चार और पाताल देश में चार टेस्ट यानी कुल आठ टेस्ट हारने के बाद हमको बहुत जोर का झटका लगा। वो भी इसलिए कि पैसों की खातिर खिलाड़ी उसी से दगा कर रहे हैं, जिसने उनको बनाया, स्टार बनाया रुतबा दिया। यानी क्रिकेट।

इन पराजयों से हम गंभीर (संजीदा गुरु.. गौतम वाला नहीं) हो गए, मेरा दोस्त मेरा खांटी दोस्त है, इसी मौके की तलाश में था, चट् से फोटू टांक दी। तबसे हर जगह यही तस्वीर टांकता चलता हूं, ताकि लोगों को लगता रहे कि यह जो चंट जैसा इंसान पिचके गालों को ढंकने के लिए चेहरे पर हाथ रखे हुए है, छंटा हुआ बुद्धिजीवी है।

Wednesday, February 15, 2012

शहरयार का जाना..

कल शाम रितु वर्मा का मेसेज आय़ा...शहरयार पर कुछ लिख रहे हो? तब तक ये पता न था कि शहरयार नहीं रहे...फिर नेट पर ही शहरयार को बहुत पढा।


मुझे लगा कि शहरयार जैसे ब़ड़े शायर पर लिखने के लिए मैं बहुत छोटा इंसान हूं।

जिस शायर की शायरी, जिनकी पोएट्री बरगद के पेड़ सरीखी थी, जिसकी छांव में उदासी ही उदासी ही बिखरी नजर आती है, जिनके जिंदगी को देखने का अंदाज ही अलहदा था, उसके बारे में मैं क्या लिखूं।

शहरयार ने जिंदगी के भी एक अलग अंदाज में पेश किया. उनका यही अलहदा लहजा उनकी पहचान भी रहा। जिनके तईं हम शहरयार को जानते रहे। याद आ  रहा है, सीने में जलन दर्द का तूफ़ान-सा क्यूं है, इस शहर में हर शख्स परेशां-सा क्यूं है....सवाल अब भी अनुत्तरित है शहरयार साब।

अपने खास  लहजे में उन्होंने नज्में भी कहीं और खूबसूरत गजलें भी। 

इसे हमारे दौर की विडंबना ही कहना चाहिए कि एक बड़े शायर को शोहरत फिल्मों में इस्तेमाल की गई उनकी गजलों से मिली। जबकि वे गजलें एक अरसे से लिख रहे थे। बहरहाल अच्छा शायर इस शोहरत व नाम की परवाह करता तो शायद कुछ और करता शायरी न करता। शहरयार ने शायरी की और हमारे दौर के दर्द, उदासी, खालीपन समेत अनेक चीजों को उसमें पिरोते गए :

चमन दर चमन पायमाली रहे
हवा तेरा दामन न खाली रहे।
जहां मुअतरिफ हो तेरे कहर का
अबद तक तेरी बेमिसाली रहे।

---(स्रोत-कविताकोश)

यह पूरी गजल कुदरत के गुस्से का बयान करती है और शहरयार अपनी जुबां से कहते हैं कि जैसी जिंदगी हम जीने लगे हैं मुमकिन है उसका अंजाम कुछ ऐसा हो। वैसे इसका आखिरी शेर अलग मिजाज का है :

न मैली हो मेंहदी कभी हाथ की
सदा आंख काजल से काली रहे।

या फिर,

तू ही मुझसे अजनबी बनकर मिला हर मोड़ पर
मेरी आंखों में तो था रंगे शनासाई बहुत।

शेर उन्होंने किसी भी मूड के कहे हों उनमें गहरी उदासी का हिस्सा जरूर होता है। देखिए रात का जिक्र वे किस दर्द में डूबकर करते हैं :

पहले नहाई ओस में, फिर आंसुओं में रात
यूं बूंद-बूंद उतरी हमारे घरों में रात।
आंखों को सबकी नींद भी दी, ख्वाब भी दिए
हमको शुमार करती रही दुश्मनों में रात।


शहरयार की ही कविता थी, जिसमें जीना भी एक कारे-जुनूं है, उनके जाने के बाद याद आता है कि किसी को कभी मुकम्मल जहां नही मिलता, कहीं ज़मी तो कहीं आसमां नहीं मिलता.....शहरयार साब का जाना हमारे लिए हतोत्साहित होने की एक और बड़ी वजह है। हमें रौशनी दिखाने वाली मीनारें एक-एक कर गुजरती जा रही हैं। जोशी जी गए, जगजीत चले गए, देव साहब...और अब शहरयार...।


बड़े गौर से सुन रहा था ज़माना...तुम्ही सो गए दास्तां कहते कहते

Monday, February 13, 2012

हतोत्साहित हूं...

सोच रहा हूं एक किताब लिख डालूं।  पत्रकारिता के पेशे में आने के बाद सोचना शुरु कर दिया है। हालांकि स्थिति ये है कि मेरे कई साथी सोचते नहीं पूछते हैं अर्थात् बाईट लेते हैं और अपना उपसंहार पेलते हैं। पहले अपने भविष्य के बारे में सोचता रहता था। वह सेक्योर नहीं हो पाया तो देश के भविष्य के बारे में सोचने लगा।

एक मित्र हैं सुशांत भाई..उन्होंने लगे हाथ सुझाव दिया। किताब लिख डालो। देश की व्यवस्था पर लिख डालो.. लोग लिख रहे हैं तो तुम क्यों नहीं लिखते।

एक अन्य  मित्र हैं.. उन्होंने टिप्पणी दी, लिख कर के समाज को क्या दे दोगे? कौन पढेगा, पढ भी लेगा तो क्या अमल मे लाएगा? अमल में लाना होता तो रामचरित मानस ही अमल मे ले आते। तुम्हारा लिखा कौन पढेगा।? क्यों पढेगा। मैं हतोत्साहित हो गया।

हतोत्साहित होना मेरा बचपन का स्वभाव है। कई बार हतोत्साहित हुआ हूं।

परीक्षाएं अच्छी जाती रहीं, लेकिन परीक्षा परिणांम हतोत्साहित करने वाले रहे। अपने कद में मैं अमिताभ बच्चन की कद का होना चाहता था। ६ फुट २ इंच लंबाई का गैर-सरकारी मानक था उस वक्त॥लेकिन अफसोस हमारे अपने क़द ने हमें हतोत्साहित किया। चेहरे-मौहरे से हम कम से कम शशि कपूर होना चाहते थे, लेकिन हमारे थोबड़े ने हमें हतोत्साहित कर दिया।

रिश्तदारों ने रिश्तों में हतोत्साहित किया, कॉलेज में लड़कियों ने हतोत्साहित किया। भाभी की बहन ने हमें देखकर कभी नहीं गाया कि दीदी तेरा देवर दीवाना... हम कायदे से बहुत हतोत्साहित महसूस कर रहे हैं। देश की दशा ने, महंगाई ने, राजनीति के गिरते स्तर, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में धोनी के लड़ाकों का घटिया प्रदर्शन, सचिन के सौवें शतक के लंबे होते इंतजार से हतोत्साहित हो रहा हूं।

एक आम आदमी की हैसियत से हतोत्साहित हूं। क्या कोई मेरे हतोत्साहित होने पर ध्यान देगा?

हतोत्साहित करने वाले वाकये बढ़ते जा रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले योजना आयोग के नीली पगड़ी वाले असरदार सरदार मोंटेक ने कहा था कि शहरों में आम आदमी के जीने के लिए 32 रुपये काफी हैं। भिंडी 15 रुपये पाव बिक रहा है, प्याज 20 रुपये किलो....आटे और दाल की कीमतों पर कोई टिप्पणी किए बिना इतना ही हतोत्साहित होने के लिए काफी लग रहा है। मकान खरीदने के लिए बैंक से ली गई कर्ज की  मेरी ईएमआई लगातार बढ़ती जा रही है...कर्जे ब्याज दर लगातार बढ़ रही है। हर महीने मैं वेतन पाने के बाद ज्यादा हतोत्साहित हो जाता हूं।


मोंटेक का बंगला दिल्ली के लुटियन ज़ोन में आता है। कीमत होगी करीब 400 करोड़ रुपये। उनकी लॉन में करीने से कुतरी गई  हर घास की कीमत 32 रुपये से ज्यादा ठहरती है। हतोत्साहित होने के लिए यह भी पर्याप्त है।

कल वैलेंटाईन डे हैं...यह एक ऐसा दिन है जो सालाना मुझे हतोत्साहित करता है।

Sunday, January 29, 2012

कहानीः बोंसाई भाग दो

मास्टर साहब के दावे उसे आज भी याद हैं...क्योंकि वो सच ही निकले थे। बनवारी लाल दसवीं की परीक्षा तीसरे दर्जे-जिसे अँग्रेजी में थर्ड डिवीजन और उसके बड़े भाई फर्स्ट डिवीजन विद टू बॉडीगार्ड कहते थे-में ही पास हुए। यह इंटर यानी 12वीं में और फिर आगे भी जारी रहा।

बनवारी ग्रेजुएशन में डिजॉनर होने से बाल बाल बचा। कई साल तक वह घर में पड़ा रहा, ये करुं या नो करुं के पेशो-पेश में। कभी मन व्यापार का होता, लेकिन पूंजी नहीं थी...फिर मन होता बच्चों को ट्यूशन पढाने का। लेकिन उसका अकादमिक करिअर इतना शानदार था कि कोई भी इंसान अपने बच्चों को उससे पढ़वाकर उनका भविष्य अंधकारमय बनाने का जोखिम नहीं ले सकता था।


उसके तमाम दोस्त वक्त गुजारने के लिए क्रिकेट खेलते थे। लेकिन बनवारी को क्रिकेट खेलनी ही नहीं आती..उसे बल्ले पकड़ने तक का शऊर न था। फील्डिंग में भी कुछ ऐसे थे कि थर्ड मैन-जिसे मुहल्ले के क्रिकेट खिलाड़ी बेहद घटिया जगह मानते,क्योंकि मैदान के उस हिस्से में एक गंदा नाला बहता था जहां मुहल्लेभर के बच्चे हगते थे-पर ही लगाए जाते।


वहां भी गेंद किस्मत की ही तरह बनवारी को दगा दे जाती। उसके पैर के नीचे से निकल जाती। बनवारी गेंद के पीछे दौड़ता तो बाकी के खिलाडी खेल छोड़ उसका दौड़ना देखने लगते। बनवारी दौड़ता तो उसके पैरों की दोनों एडियां अपेक्षाकृत पास-पास गिरतीं। यह हंसने के लिए बेहतर मसाला था।

आखिरकार, बनवारी को क्रिकेट से घृणा हो गई। धीरे-धीरे उसे बहुत सी चीजों से घृणा हो गई, जो दिन ब दिन गहराती ही गई। सबके सामने खुलकर बोलने से,क्योंकि बनवारी ऐसे मौकों पर बोलने से अटकने लगता था। क्रिकेट से, रसायन विज्ञान से, अलजेबरा और ज्योमेट्री से, लडकियों से (क्योंकि लड़कियो ने उसे कभी गौर से देखना तक गवारा न किया)  और अंग्रेजी से..।

और आज उस बॉस ने उसी घृणास्पद अंग्रेजी में बनवारी को डांटा था।

बनवारी को याद आया, बॉस की टेबल पर एक पेड़ रखा था। आम का, गमले में...बोंसाई। आम के पेड़ को बोंसाई बनाकर रख देना बनवारी को कुछ अच्छा नहीं लगा। उसे लगा कि आम का वह बौना पेड़ वही है...न फल देने वाला न असली आकार का। बस नाम का ही पेड़।

...जारी

Wednesday, January 25, 2012

पंजाबः गड्डमड्ड समीकरण

पंजाब मैं पहले भी आय़ा था, लेकिन इसे इतने करीब से देखने का मौका नहीं मिला था। चुनावी हलचल हवा में है, लेकिन बड़े पैमाने पर कहीं भी पोस्टर नहीं दिखे, जो दृश्य पिछले अप्रैल में मैने पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के दौरान देखे थे वो यहां नदारद हैं। 


पंजाब की चुनावी फिजां का रंग जरा हटके है। शिरोमणि अकाली दल (बादल)-शिअद और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन को उम्मीद है कि वह अपनी पिछली कामयाबी को दोहरा पाएंगे। चुनावी रैलियों में भी वो जनता के सामने बिहार और गुजरात का हवाला देते हैं, जहां विकास के मुद्दे पर जनता ने उन्हें दोबारा सत्ता की कुरसी नवाजी।
मोगा में भाजपा-शिअद की रैली


जालंधर की बीजेपी-शिअद रैली में बधिया रोड विच चलावांगा गड्ड़ी हम्मर नूं, यूके वाल बनात्तां शहर जलंधर नूं..का गीत बज रहा था। यानी, निवर्तमान सरकार के नुमाइँदे विकास को मुद्दा बना रहे हैं, वही कांग्रेस ने धीमी विकास दर को चुनावी मुद्दा बनाया है। दोनों ही पार्टियां एक ही मुद्दे् पर वोट मांग रही है। पहली बार धर्म और जाति पीछे और विकास आगे की कतार में है।


इधर, कांग्रेस जीत को लेकर आश्वस्त है। इतनी आश्वस्त कि 25 जनवरी को जालंधर में युवराज राहुल गांधी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को भावी मुख्यमंत्री कह कर पुकारा। हालांकि यह तय था कि होना ऐसा ही है और कैप्टन की पत्नी परणीत कौर का नाम महज ऐंवईं हवा में उछला है-लेकिन अब यह औपचारिक हो गया है।
कपूरथला में सोनिया गांधी ने कहा, केन्द्र की योजनाएँ पंजाब नहीं करता लागू 


सोनिया हों या मनमोहन सिंह या फिर राहुल गांधी सबने केन्द्र की सरकार के कामकाज के आधार पर ही वोट मांगे हैं। मुझे एंटी-इंकम्बेन्सी का उतना असर तो दिखा नहीं कहीं, क्योंकि ग्रामीण पंजाब में अकाली के मजबूत आधार से निबटना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रही है। हालांकि, मनप्रीत बादल ने अकालिय़ों को हलकान जरुर किया है और इतना तय है कि अकालियों के वोट इससे कटेंगे। 

एक सर्वेक्षण के मुताबिक, पंजाब में अकाली-शिअद गठबंधन को 7 फीसद वोटों को नुकसान और कांग्रेस को 2 फीसद वोट का फायदा हो सकता है। इसका मतलब है कि गठबंधन को करीब 27 सीटों का नुकसान झेलना पड़ सकता है और कांग्रेस की 25 सीटें बढ़ जाएंगी। लेकिन यह सर्वे जनवरी के पहले हफ्ते में किया गया था। और अभी के हालात थोड़े बदले-से हैं।


कांग्रेस को सबसे नुकसान होने वाला है दलित वोटों के खिसकने से। जितना नुकसान अकालियों को मनप्रीत की पीपीपी ( पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब) से होने वाला है । तकरीबन उतना बहुजन समाज पार्टी भी कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने वाली है। दूसरी तरफ, कांग्रेस के 23 बागी प्रत्याशी भी मैदान में डटे हैं, जिनमें से एक दर्जन को कैप्टन ने पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया है।


वैसे, यह तय है कि भाजपा अपना पिछला प्रदर्शन दोहरा नहीं पाएगी। उसका जनाधार पहले के मुकाबले थोड़ा खिसका है। मेरा अनुमान है कि इस बार उसे 23 सीटों में से 10 से संतोष करना होगा। अकाली अपना आधार भले बचा लें जाएं, लेकिन सरकार बनाने में उन्हें मुश्किल होगी। 


वाम दलों और पीपीपी का साझा मोर्चा अभी खेल में किसी की नजर में नहीं, लेकिन मुझे लगताहै कि वो किंगमेकर बन सकते हैं। भले ही इनके पास 5-6 विधायक ही हों। 


मौजूदा हालातों में, जिनमें मैं मालवा इलाके की बात बिलकुल नहीं कर रहा क्यों कि मैं उधर गया ही नहीं हूं, माझा-दोआबा के हालातों के मद्देनजर फिलहाल तो मुकाबला बराबरी का लग रहा है। वोटर मुंह खोलने को तैयार नहीं, ऐसे में आखिरी क्षणों में स्विंग होने वाले वोटर ही तय करेंगे कि कमान आखिरी पारी खेल रहे बादल के हाथों जाएगी, या कैप्टन बादलों के बीच से सूरज की तरह उभरकर सामने आएंगे। 

पंजाब में कुल सीटें-117, बहुमत के लिए चाहिए-64
मेरा अनुमान- कांग्रेस-55
शिअद-भाजपा- 52
साझा मोर्चा-6
अन्य- 4





Tuesday, January 17, 2012

मेरी पहली कहानीः बोंसाई

वह बेहद खिसियाआ हुआ सा बैठा था। जिंदगी ने उसे कुछ नहीं दिया था। स्साली ये भी कोई जिंदगी है। आज बॉस ने हड़का दिया था उसे...। कुछ इस तरह कि भरी मीटिंग में बेहद अपमान-सा महसूस हुआ। 


यो उसे कभी अपमान महसूस होता नहीं, किसी भी तरह से ...कभी भी। स्कूल में भी कभी मास्साब ने कान उमेठा ( जो कि प्रायः उमेठा जाता था) तो भी उसे ऐसा महसूस नहीं हुआ था। 


वह चाहता है कि दुनिया में से कुछ चीजें हमेशा के लिए डिलीट हो जाएं। कुछ चीजों का अनडू भी करना चाहता है, लेकिन जनाब यह कोई कंप्यूटर का सॉफ्टवेयर तो है नहीं...जिंदगी है जिंदगी। 


जिंदगी भी स्साली अजीब शै है।


जियो तो गलीज, मरने की सोचो तो और भी गलीज। गोली से मरो तो तस्वीरों में पैंट उतरी हुई दिखती है, रेल से कट मरो तो ...ओह..उसे कुछ बेहद दर्दनाक सी तस्वीरों की याद हो आई। 


वह इतना भी बहादुर या कायर नहीं कि मर सके। घरवालों ने भी कभी उसे लायक नहीं समझा। जिंदगी को जीना या झेलना जो भी मुनासिब शब्द हो...आज ही कहीं पढा़ उसने, जिंदगी अजीब शै है। सच लिखा है।


अगर जिंदगी से कुछ डिलीट करना मुमकिन हो, तो वह पहले अपना नाम ही डिलीट करेगा। यह भी कोई नाम है..भला..? बनवारी लाल...मां-बाप
ने जरा भी नहीं सोचा कि तमाम आधुनिक नामों के बीच ये बनवारी लाल कैसे जिएगा...हुंह। नाम बदलने की कोशिशें..लेकिन नाकाम। 


तो सबसे पहले अपना नाम बदलूंगा। दफ्तर के सामने पार्क की बेंच पर बैठे हुए उसने सोचा। ...और इस कद का क्या करुं...5 फुट 2 इंच। दसवीं के बाद उसके दोस्त तकरीबन 6 फुटे हो गए...एक दो जो कम थे वो भी भारतीय मानकों पर खरे उतरे..और वो, जिसने हमेशा अमिताभ जितना लंबा होने की हसरत पाली थी. वह पांच फुट दो इंट पर अटक कर रह गया।


पार्क की करीने से कुतरी गई घास को अंगूठे से उखाड़ते हुए बनवारी लाल ने सोचा, इस बॉस को तो मैं गोली मार दूंगा। बिलकुल करीब से। मन में समस्या थी कि इसे पकडूं कहां। दफ्तर के सामने नीली वर्दी में 4 स्टार वाले गार्ड होते हैं। पकड़ा गया तो वहीं कूटकर कीमा कर देंगे। ...और समस्या तो रिवॉल्वर पाने की भी है।...वो कहां से मिलेंगे।

मारने से याद आया, बॉडीगार्ड में किस तरह सलमान खान आदित्य पंचोली को उछाल-उछाल कर मारता है, ठीक वैसे ही टांग दूंगा खूंटी पर बॉस को। बनवारी के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। लेकिन जैसे ही उसे अपना शरीर याद आया, मुस्कुराहट काफूर हो गई। 


पसलियां तक दिखती हैं उसकी। नितम्बों पर मांस नहीं, इसलिए जींस नहीं पहनता। पुराने कपड़े। जिनकी रंगत तक उतर गई है। कूरिअर पहुंचाते-पहुंचाते चप्पलें घिस गईं है। दिल्ली जैसे शहर में क्या करना 8 हजार का। संगम विहार में रहता हूं, किसी तरह खा-पका कर बाकी के पैसे घर भेजने पड़ते हैं। 


बनवारी ने अपना चेहरा याद किया, उसे अपने बाप का चेहरा भी दिखा उसमें। आईने के सामने खड़ा हो तो खुद को गुस्सा आता है। आईना देखो तो हमेशा फिजिक्स के मास्टर साहब पुनू पंडित की याद आती है। अमरीश पुरी जैसी भारी आवाज वाले पुनू पंडित गणित भी पढ़ाते थे।


अंकगणित तो बनवारी ठीक-ठाक कर लेता था, लेकिन पिछली बेंट पर बैठने वाले के लिए बीजगणित और ज्यामिति दोनों ही दुश्मन सरीखे थे। संस्कृत में शब्दरुप धातु रुप उसे कष्ट देते और इतिहास में राजाओं के खानदानों के नाम याद रखना भारी था। पुनू पंडित ने भरी क्लास में कह दिया था, अगर बनवारी मैट्रिक में सैकिंड डिवीजन भी पास कर गया तो वह टीचरी छोड़ देगे।


...जारी

Sunday, January 1, 2012

वर्ष नव, हर्ष नवः शुभकामनाएँ

वर्ष नव,
हर्ष नव,


वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव


नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग


नवल चाह
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह


गीत नवल,
प्रीति नवल,
जीवन की रीत नवल
जीवन की नीति नवल
जीवन की जीत नवल