Sunday, January 14, 2018

ये जो देश है मेरा

मित्रों, मेरी किताब 'ये जो देश है मेरा' छपकर आ गई है. यह किताब  पांच लंबी रिपोर्ताज का संकलन है. मेरी यह किताब मेरी लंबी यात्राओं का परिणाम है.इनमें बुंदेलखंड, नियामगिरि, सतभाया, कूनो-पालपुर और जंगल महल जैसे हाशिए के इलाकों की कहानियां हैं.

बुंदेलों की धरती बुंदेलखंड को अपनी प्यास बुझाने लायक पानी हासिल हो पाएगा या दशकों लंबा सूखा हमेशा के लिए आत्महत्याओं और पलायन के अंतहीन सिलसिले में बदल जाएगा? 

मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर के जंगलों के सरहदी इलाके में बसा टिकटोली गांव डेढ़ दशक में दोबारा जमीन से उखड़ेगा या बच जाएगा? उड़ीसा का नियामगिरि पहाड़ अपनी उपासक जनजातियों के बीच ही रहेगा या अल्युमिनियम की चादरों में ढल कर मिसाइलों और बमबार जहाजों के रूप में देशों की जंग की भट्ठी में झोंक दिया जाएगा? 
उड़ीसा का ही सतभाया गांव अपनी जादुई कहानियों के साथ समुद्र की गोद में दफ्न हो जाएगा, या उससे पहले ही उसे बचा लिया जाएगा? मैंने इन्ही सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की है. कोशिश की है कि इसे दिलचस्प तरीके से लोककथाओं के सूत्र में पिरोकर आप तक पहुंचाया जाए.

आप इसे पढ़कर फीडबैक देंगे तो मेरा उत्साहवर्धन होगा.

दिल्ली के विश्व पुस्तक मेला में किताब के साथ प्रवीण कुमार झा

Wednesday, January 10, 2018

जेल में भी चल रहा है लालू का 'हथुआ राज'

#ठर्राविदठाकुर
(मेरा यह लेख आइचौक.इन में प्रकाशित हो चुका है)

ठंड में सिकुड़ता हुआ मैं अंग्रेजी के आठ की तरह हुआ जा रहा था. फिजां में धूप थी लेकिन देश की व्यवस्था की तरह होते हुए भी नहीं थी. बिलकुल नाकाफी किस्म की धूप. देश की पुलिस की तरह बेअसर.

मैंने देखा, गुड्डू भैया झूमते हुए अपनी देह में सरसों का तेल मल रहे हैं. उनकी तेल पिलाई लाठी बगल में रखी है. मैं भौंचक्का रह गयाः "क्या भिया, इस ठंड में मारपीट की तैयारी?"

"करना नहीं है, सिर्फ दिखाना है. वह भी हम नहीं करेंगे हमारे दोनों नौकर लडेंगे. "

मेरे हैरत की सीमा न रही, "काहे भिया."

गुड्डू मुस्कुराएः "पत्रकार महोदय, फ्रेंडली फाइट का नाम सुना है? चुनाव में होता है. "

मैंने हामी भरी तो गुड्डू ने कहा, कि पड़ोसी के मटर के खेत में उनकी भैंस घुस गई थी. तो अब इसके एवज़ में उनके जेल जाना पड़ रहा है.

मैं समझ गया कि गुड्डू निरे काहिल हैं और उनके जेल प्रवास के दौरान सुविधाओं के लिए अपने सेवकों की जरूरत होगा.

मैंने बस इतना पूछाः "य़ह आइडिया कहां से आया भैय्या? "

गुड्डू लंगोट कसकर योगमुद्रा में विराजमान हो चुके थेः "देखो बे ठाकुर, इस देश में आइडियों की कमी नहीं है. चुराने से लेकर उस चोरी को लॉजिक देने तक. पहले अपराध करो, फिर पकड़े जाओ तो कहो कि मैं अमुक जाति से हूं इसलिए फंसाया जा रहा है. फिर भी सज़ा-वज़ा मिल जाए, तो सेवकों को ले जाओ. यह मैंने अपने नेताओं से सीखा है. एक तर्क यह भी है कि आप दोषी साबित होने पर और दूसरे के छूट जाने पर तर्क दे सकते हैं कि पंडिज्जी को बेल हमको जेल...जैसा लालूजी ने किया. "

"लेकिन वह तो कह रहे हैं कि उनको पिछड़ी जाति का होने की वजह से परेशान किया जा रहा है"...मैंने कहा.

"लेकिन, जब सूबे के मुख्यमंत्री बने तब तो यह तर्क न दिया, जब रेल मंत्री बने और काम की तारीफ बटोरी तब तो यह तर्क न दिया"...गुड्डू खिसियाए से लग रहे थे.

"लेकिन सज़ा सुनाने वाले जज को क्या यह कहना चाहिए था कि ठंड लगती है तो तबला बजाइए! " मैंने पीछे हटना ठीक नहीं समझा.

"आपसी बातचीत को मीडिया में उछालना और उसको मुद्दा बनाना तुम मीडियावालों का काम है. किसने किसको कहां चुम्मा ले लिया, किस खिलाड़ी ने शादी में कितने खर्च किए, देश में ब्याह किया कि इटला जाकर इस पर विमर्श करो तुम लोग...बलिहारी है बे तुम पे. और अब जज साहब ने कह दिया कि लालूजी पशुपालन के एक्सपर्ट हैं तो उसको भी मुद्दा बना लो. अदालत जिसको सज़ा दे उसको शहीद बनाने के काम में लग गए हो. और तो और, जब जेल प्रशासन अभी तक सजायाफ्ता लालू के लिए काम तय नहीं कर पाया है. वहीं उनके जेल पहुंचने से दो घंटे पहले ही उनका रसोइया लक्ष्मण कुमार और सेवक मदन फर्जी केस के जरिए जेल पहुंच गए. अब इसका क्या अर्थ है? पता है, जेल जाने के लिए इन दोनों की ही चुना गया क्योंकि दोनों रांची के ही रहने वाले हैं और लालू के खास विश्वासपात्र हैं. मालिक से पहले सेवक के जेल जाने का यह मसला भी पहली बार नहीं हुआ. पहले भी होटवार जेल में बंद लालू के लिए मदन जेल पहुंच गया था. "

"इस बार तो क्या गजब का आइडिया चुना इन लोगों ने. दोनों ने मारपीट का एक फर्जी मामला गढ़ा. मदन ने पड़ोसी सुमित कुमार को इसके लिए तैयार किया. उसने लक्ष्मण पर मारपीट करके 10 हजार रु. लूटने का आरोप लगाते हुए डोरंडा थाने में शिकायत दर्ज कराई. फटाफट एफआइआर दर्ज हुआ, वकील ने दोनों का आत्मसमर्पण करवाया और जेल भी भेज दिए गए. भाई, जैसे जेल लालूजी गए वैसे सब जाएं. बुढ़ापे का तर्क देते हुए ओपन जेल में रहे, रसोइए से खाना बनवाएं, सारी सुविधाएं भोगे. ऐसा क्यों नही करते कि उनको जेल जाने से माफी ही दे दो. उनकी नेकचलनी के नाम पर! "

"गुड्डू भैया गुस्सा क्यों हो रहे हैं, आखिर वह जनता के सेवक हैं. "

"जनता का सेवक जब राजनीतिक बंदी होता है तब उसे ऐसा सुविधाएं दी जानी चाहिए, आपराधिक कृत्य के लिए नहीं. वित्तीय घोटाला कब से राजनीतिक मसला हो गया जी? "

"देखो बाबू, इस देश में किसी ने आम लोगों को कभी कैटल, कभी मैंगो पीपल कहा था, तब तो बहुत मिर्ची लगी थी तुम्हें. जरा बताओ कि जेल में ठंड क्या सिर्फ चारा घोटाले में सजायाफ्ता पूर्व-मुख्यमंत्री को ही लगती है या दूसरे कैदियों को भी ठंड लगती होगी? जब ठंड सबको लगती है तो सबको बजाने के लिए तबला क्यों नहीं मुहैया कराती सरकार? "

गुड्डू अब रंग में आ चुके थे. मेरे पास खिसक आए और लबनी से ताड़ी का बड़ा घूंट लगाते हुए बोलेः "देखो ठाकुर, आम आदमी हो तो औकात में रहा करो. कभी पुलिस और अदालत में चक्कर में पड़ोगे तब समझ में आएगा. समझे! लालूजी पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तभी अपनी मां को पद के बारे में समझाते हुए कह चुके हैं कि, माई हथुआ राज मिल गईल (मां, हथुआ राज मिल गया) तो समझो कि वह असल में राजा ही हैं. उनकी सुविधा का ख्याल रखना हम सबका परम-पावन और पुनीत कर्तव्य है. जब जेल में शशिकला, शहाबुद्दीन, कनिमोई, ए राजा सबको सुविधा मिल सकती है तो क्या सिर्फ लालू को न मिले क्योंकि वह पिछडी जाति से हैं! धिक्कार है बे तुम पे, धिक्कार है. "

गुड्डू भैया ने मुझ पर धिक्कारों की बौछार कर दी और सारे धिक्कार समेटता हुआ मैं चुपचाप अपनी राह चल दिया.

***

Tuesday, January 9, 2018

पंचम दा की याद में

मुझे याद है कि मैं अक्षय कुमार की कोई मसाला फिल्म देख रहा था. शायद खिलाड़ी 786 थी. अक्षय अपनी कन्यामित्र असिन के साथ एक डिस्कोथे में जाते हैं और पंचम दा उर्फ राहुलदेव बर्मन की तस्वीर देखकर नाचने से पहले जूते उतार देते हैं.

पंचम दा को यह सम्मान वाकई पूरा फिल्मोद्योग देता है. वह उसके हकदार भी थे.

फिर याद आते हैं कुछ गाने, जो हममें से हरेक ने कभी न कभी, दोस्तों के कहने पर जबरिया या कभी अकेले में खुद ब खुद गुनगुनाए जरूर होंगे. चिनगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाए..यह गाना तो तकरीबन बेसुरे लोग भी गा ही लेते हैं. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना..यह गाना भी बेहद लोकप्रिय है, और हर पाठक को याद होगा. इसी तरह, पिया अब तो आजा... की तड़कती-फड़कती धुन हर एफएम पर हफ्ते में चार बाज बज ही जाता है.

राहुल कोलकाता में जन्मे थे. इनके बारे में यही कहा जाता है बचपन में जब ये रोते थे तो इनकी रूलाई में संगीत का पांचवां सुर सुनाई देता था और शायद इसीलिए इनको पंचम कहा गया. इनको पंचम पुकारने वाले भी लीजेंड ही थे. अशोक कुमार.

पंचम दा की पीठ पर परंपरा का बक्सा लदा था. पिता सचिन देव बर्मन जैसे नामी-गिरामी संगीतकार थे, जिनकी धुनों में अमूमन त्रिपुरा और बंगाल के किसानों मछुआरों की करूण तान पहचानी जा सकती हैं. एसडी बर्मन की आवाज में भी वो दर्द था, कि जब वो ओ रे मांझी कहकर आलाप लेते, तो कलेजा बिंध जाता. उनमें लोकगीतों का सोंधापन था.

राहुलदेव को अपने पिता की साया से निकलना था. साथ ही, उस विरासत को साथ ले चलना था जो बालीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल कोलकाता से ली थी और बाद में उस्ताद अली अकबर खान से सरोद सिखते वक्त रखा था.

पंचम दा का संगीत देखिए तो उसमें जैज़, हिंदुस्तानी और सुगम का सुखद मिश्रण दिखेगा. आखिर हम में से कितने लोग हैं जिनके दिलों के तार जावेद अख्तर की लिखी और पंचम दा के सुरों में पिरोई, एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा से झनझना न जाते हों.

पिता सचिन देव बर्मन ने बचपन से ही आरडी को संगीत के दांव-पेंच सिखाने शुरू कर दिए थे. वरना, नौ साल का बच्चा क्या संगीत सुरों के पेचो-खम को साधकर धुन तैयार कर सकता है!

पंचम ने किया था.

उनका पहला कंपोजिशन महज नौ साल की उम्र में आया था. गीत था, ”ऐ मेरी टोपी पलट के”. इसे फिल्म “फ़ंटूश” में उनके पिता ने इस्तेमाल किया. छोटी सी ही उम्र में पंचम दा ने “सर जो तेरा चकराये …” की धुन तैयार कर लिया जिसे गुरुदत्त की फ़िल्म “प्यासा” में ले लिया गया.

लेकिन कहा न, जो चुनौती थी पिता के साए से निकलने की, उसे उन्होंने निभाया. उनका संगीत उनके पिता के संगीत से अलहदा था. दोनों की शैली अलग थी. आरडी हिन्दुस्तानी के साथ पाश्चात्य संगीत की मिलावट भी करते थे. तीसरी मंजिल के ओ हसीना जुल्फों वाली जाने जहां से शुरू करिए और शोले के महबूबा होते हुए 1942 अ लव स्टोरी तक आइए. आपको सब दिख जाएगा.

राहुलदेव ने क्या हिंदी क्या बंगला, न्होंने तो तमिल, तेलुगू, मराठी न जाने कितनी भाषाओं में गीतों को संगीतबद्ध किया. करियर की शुरूआत में वह अपने पिता के संगीत सहायक थे.

उनकी खुद की आवाज का जादू तो घलुए (फाव में) में है.

उन्होंने अपने पिता के साथ मिलकर कई सफल संगीत दिए, जिसे बकायदा फिल्मों में प्रयोग किया जाता था.

बतौर संगीतकार आर डी बर्मन की पहली फिल्म 'छोटे नवाब' (1961) थी जबकि पहली सफल फिल्म तीसरी मंजिल (1966) साबित हुई. जिसमें शम्मी कपूर के डांस स्टेप्स कहर बरपा कर रहे थे.

लेकिन असल में एक तिकड़ी थी. राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आरडी बर्मन की. इस तिकड़ी ने 70 के दशक में पूरे भारत में धूम मचा दी थी.

इस दौरान सीता और गीता, मेरे जीवन साथी, बांबे टू गोवा, परिचय और जवानी दीवानी जैसी कई फ़िल्मों आईं और उनका संगीत फ़िल्मी दुनिया में छा गया.

सत्तर के दशक की शुरुआत तक आर डी बर्मन भारतीय सिनेमा जगत के एक लोकप्रिय संगीतकार बन गए थे. उन्होंने लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे बड़े कलाकारों से अपने फिल्मों में गाने गवाए. 1970 में उन्होंने छह फिल्मों में अपना संगीत दिया, जिसमें कटी पतंग काफी कामयाब रही.

बाद में, यादों की बारात, हीरा पन्ना, अनामिका जैसी बड़ी कामयाब फिल्में भी राहुल देव के संगीत से सजी.

लेकिन आरडी बर्मन ने संगीत प्रेमियों को जितना दिया, उससे कहीं ज़्यादा देने के काबिल थे. हमें उनसे जो मिला वो तो उनके ख़ज़ाने का छोटा सा हिस्सा था.

असल में, जीनिसय लोगों के साथ ऐसा होता ही है कि गुजरते वक्त के साथ उनकी महत्ता बढ़ती जाती है. इसलिए झनकार बीट से लेकर खिलाड़ी 786 तक अगर फिल्मी दुनिया उनकी श्रद्धा के फूल भेंट कर रही है, तो इसमें हैरत की बात कुछ भी नहीं.

चलते-चलते उनकी संगीतबद्ध फिल्म इजाज़त के गीत की कुछ पंक्तियां आपके लिए, जो शायद उनकी परंपरा में अलहदा किस्म का इजाफा करती हैं,

एक सौ सोलह चांद की रातें,

एक तुम्हारे कांधे का तिल,

गीली मेंहदी की खुशबू,

झूठ-मूठ के शिकवे कुछ.

वो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो.



Monday, December 25, 2017

मधुपुर का तिलक विद्यालय

मधुपुर. अपने कस्बाई खोल से शहरी ढांचे में ढलने के लिए यह शहर ज़रूर छटपटा रहा होगा, लेकिन जो लोग शहरों में रहते हैं, वे ही बता सकते हैं कि महानगरों के जीवन में जो संकीर्णता और भागमभाग होती है, वह अपनी जड़ों की याद दिलाती है. दिलाती रहती है.

हर किसी को अच्छा लगेगा कि उनका शहर आगे बढ़े और तरक्की करे.

लेकिन अगर नगर नियोजन सही हो, तो भी सपनों और हकीकत में फासले कम रखने चाहिए. आखिर हर शहर, क़स्बे और गांव की एक आत्मा होती है. नकल में वह मर जाएगी. आपको अच्छा लगेगा कि आपके शहर के दूसरे मुहल्ले या अपने ही मुहल्ले को लोग आपसे अनजान रहें!

तो एक सवाल यही उठता है कि क्या सब ठीक ठाक है? क्या मधुपुर एक बेहतर शहर के रूप में विकसित हो रहा है? पर इसकी परीक्षा कभी कभी अतीत के उन 'टिप्स' से मालूम हो सकता है जो हमारे महान लोगों ने दिया था. खासकर जो लोग शहर का 'मास्टर प्लान' बनाते हैं, बनाना चाहते हैं या बना रहे हैं.

मुझे नहीं मालूम कि मधुपुर के लोग मधुपुर को कितना बड़ा शहर बनाना चाहते हैं, लेकिन मैं चाहता हूं कि मधुपुर सभी शहरी सुविधाओं से युक्त तो हो लेकिन उतना ही छोटा, उतना ही प्यारा, उतना ही हरा-भरा बना रहे. नदियों में पानी रहे, झरने बहते रहे, लोग प्यारे रहें, कुछ सड़कें कच्ची रहें, धान के खेत रहे, भेड़वा और गोशाला मेला बना रहे...

कुछ दिन पहले भाई रामकृपाल झा ने मधुपुर के इतिहास के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की थी. इस विषय पर उमा डॉक्यूमेंटेशन सेंटर के सर्वेसर्वा उत्तम पीयूष ने बहुत काम किया है. लेकिन मैंने अपने स्तर पर जो जानकारी जुटाई है उसे साझा करने की कोशिश कर रहा हूं. अपने पहले के पोस्ट में मैं तिलक विद्यालय के दिनों की चर्चा कर रहा था, वह चर्चा जारी रहेगी और कोशिश करूंगा कि इसी बहाने कुछ इतिहास भी आए.

आपमें से अधिकतर को पता होगा कि अपने कस्बेनुमा शहर में कितनी विशिष्टता थी. सन् 1925 में जब महात्मा गांधी मधुपुर पधारे और उन्होंने तब एक 'राष्ट्रीय शाला '(नेशनल स्कूल) तिलक विद्यालय और नगरपालिका का उद्घाटन किया था. यह बड़ी और ऐतिहासिक घटना है मधुपुर के संदर्भ में. एक ज्ञान और राष्ट्रीयता का अलख जगाने वाले केंद्र और एक शहरी जीवन को सिस्टम देने वाला केंद्र. यह बड़ी बात थी. बड़ा संयोग.

तिलक कला विद्यालय अपने पीछे स्वर्णिम इतिहास लिए खड़ा है. बापू उस दौरान आजादी की लड़ाई के साथ-साथ लोगों में स्वदेशी और खादी अर्थशास्त्र के प्रति भी जागरूकता फैला रहे थे. एक पत्र से इस बात की जानकारी मिली है. इससे पता चलता है कि छात्रों के जरिए सूत कताई को लोकप्रिय बनाने के प्रति वे काफी संजीदा थे. पत्र के अनुसार, बापू आठ अक्टूबर 1934 को पहली बार मधुपुर आए थे. उन्होंने नौ अक्टूबर 1934 को ऐतिहासिक तिलक कला विद्यालय के विषय में पत्र लिखा था. उसमें इस विद्यालय के बारे में जिक्र किया गया है. कहा गया है कि यहां पर राष्ट्रीय शाला का आयोजन किया गया था. वहीं प्रधानाध्यापक ने अभिनंदन पत्र के माध्यम से तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का जिक्र करते हुए विद्यालय की समस्याओं की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया था.

इसमें कहा गया था कि सूत कताई के कारण विद्यालय में लड़कों की उपस्थिति कम हो रही है. साथ ही लोगों की तरफ से विद्यालय को कम आर्थिक सहायता मिल रही है. कुछ लोगों ने अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए हटा लिया है क्योंकि कार्यशाला में सूत कताई का विषय अनिवार्य कर दिया गया है. इस अभिनंदन पत्र में बापू से मुश्किलों से बाहर निकलने का मार्ग पूछा गया था.

बापू का जवाब थाः यदि शिक्षकों को अपने कार्य में श्रद्धा है तो उन्हें निराश नहीं होना चाहिए. सभी संस्थाओं को भले बुरे दिन देखने पड़ते हैं और यह स्वाभाविक ही है. उनकी ये कठिनाई उनकी परीक्षा है. दृढ़ विश्वास के बल पर भीषण तूफान का भी सामना किया जा सकता है. यदि शिक्षकों को पूर्ण विश्वास है कि वे पाठशाला के जरिए आसपास के लोगों को विकास का संदेश दे रहे हैं तो उन्हें बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए. कुछ ही दिनों में उन्हें वहां के अभिभावकों से अनुकूल सहयोग मिलने लगेगा. लेकिन यदि उनके इस कार्य में वहां के लोगों का जल्दी सहयोग नहीं मिले तो उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है. पाठशाला में एक भी छात्र रहे तो उन्हें उसे चलाते रहना है, क्योंकि नए विचार का शुरूआत में लोग विरोध जरूर करते हैं.

सुना है मधुपुर के इस ऐतिहासिक तिलक विद्यालय में महात्मा गांधी और भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी कई स्मृतियां आज उपेक्षा की वजह से संकट में हैं. आजादी से पहले 1925 से 1942 तक तिलक विद्यालय मधुपुर के स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजों ने कुछ प्रमुख सेनानियों को कैद करने की कोशिश की थी तो वे लोग भूमिगत हो गए और गुस्से में अंग्रेजों ने विद्यालय के पुस्तकालय को ही जला दिया.

1936 में डॉ राजेंद्र प्रसाद मधुपुर आए थे. यहां उनको आजादी के दीवानों से मुलाकात करनी थी. इसी स्कूल में राजेंद्र बाबू ने एक रात बिताई थी. पुआल का बिछौना लगा और पाकशाला में भोजन बना. बाद में प्रांतीय चुनावों (1937) के वक्त भी राजेंद्र बाबू मधुपुर आए थे.

गांधी जी ने तिलक विद्यालय से जाकर उन्होंने मधुपुर, मधुपुर के कुदरती सौंदर्य और नगरपालिका पर जो कुछ लिखा वह आज भी 'संपूर्ण गांधी वांङमय', खंड- 28 (अगस्त-नवंबर 1925) में सुरक्षित है. आप और हम समझें कि कोई महानायक कैसे छोटी से छोटी लगती बातों पर गौर करते हैं, उसे समझते और लिखकर या बोलकर समझाते हैं. और उसके निहितार्थ आप भी समझें कि आखिर इस छटपटाते से शहर को कैसे विकसित करें. गांधीजी ने मधुपुर के संदर्भ में, नगरपालिका के दायित्व से जुड़ी बातें लिखी थी. क्या ये बातें जो मधुपुर के प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय स्वशासन से जुड़ी हैं क्या आज भी प्रासंगिक हैं?

उन्होंने कहा था, "हमलोग मधुपुर गए. वहां मुझे एक छोटे से सुंदर नए टाउन हाल का उद्घाटन करने को कहा गया था. मैंने उसका उद्घाटन करते हुए और नगरपालिका को उसका अपना मकान तैयार हो जाने पर मुबारकबाद देते हुए यह आशा व्यक्त की कि वह नगरपालिका मधुपुर को उसकी आबोहवा और उसके आसपास के कुदरती दृश्यों के अनुरूप ही एक सुंदर जगह बना देगी. मुंबई व कलकत्ता जैसे बड़े शहरों को सुधार करने में बडी मुश्किलें पेश आती हैं मगर मधुपुर जैसी छोटी जगहों में भी नगरपालिका की आमदनी बहुत ही थोड़ी होते हुए भी उन्हें अपनी अपनी हद में आने वाले क्षेत्र को साफ सुथरा रखने में मुश्किलों का सामना भी नहीं करना पड़ता."

1925 के बाद शहर, साधन और सुविधाएं काफी बदल गयी है. जनसंख्या का दबाब और शहरीकरण की दिक्कतें भी बढ़ी हैं. नेता भी बदल गए हैं. आज का आक्रामक नेतृत्व क्या यह जानता भी है कि गांधी ने मधुपुर के बारे में क्या कहा था? नगरपालिका के कर्ता-धर्ताओँ ने कभी सोचा भी कि हमें महात्मा गांधी के मधुपुर के संदर्भ में कहे गए विचारों को न केवल वर्तमान 'नगरपर्षद' पर कहीं शिलालेख पर उत्कीर्ण कराना (लिखाना) चाहिए बल्कि उनके विचारों को समझने और अनुकरण करने का भी प्रयास करना चाहिए?

उन्हें न तो समझ होगी, न फुरसत होगी. होती तो करा दिए होते.

तिलक विद्यालय के मजेदार पलो पर पोस्ट अगली दफा.