Friday, November 20, 2009

क्योतो से कोपनहेगन


क्योतो में जिन मुद्दों पर सहमति हुई थी, उस पर अंकल सैम का अड़ियल रवैया जारी है। चीन जाकर ओबामा ने भी कोपनहेगन से ज्यादा उम्मीदें न रखने की सलाह दे दी है। क्या था क्योतो नयाचार में...


ऐसा भी नहीं कि अपनी ही आबो-हवा को जहरीला और तवे की तरह गरम बना दे रहे इंसानों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। इसकी सबसे ताजी मिसाल है १९९७ क्योटो में हुआ सम्मेलन जिसमें दुनिया भर के 184 देशों ने हवा में शामिल हो रहे कुल कार्बन की मात्रा में ५.२ फीसद की कमी लाने का मसौदा तैयार किया।


अपनी ज़मीन और हवा को साफ-सुथरा रखने का यह पहला मामला नहीं था।


जिन दिनों इंगलैंड में आद्योगिक क्रांति अपने शबाब पर थी, उन्हीं दिनों 1824 में फ्रांस के साइंसदान जोसेफ फुरियर ने ग्रीन हाउस गैसों के बारे में बताया।


1896 में स्वीडन के रसायनशास्त्री स्वांते अरहेनियस हों या 1938 में ब्रिटिश इंजीनियर गे कैलेंडर, विद्वानों ने पर्यावरण के लिए नुकसानदेह ग्रीन हाउस इफैक्ट के प्रति आगाह करना शुरु कर दिया था।


सन 1965 में पहली बार किसी सरकार ने पर्यावरण पर सलाह देने का काम कि.या और अमेरिकी सलाहकार समिति ने ग्रीन हाउस गैसों को चिंता का कारण बताया।


1972 में स्टॉकहोम में पहला जलवायु सम्मेलन हुआ। पर्यावरण को लेकर जाकरुकता की शुरुआत भी हुई। फिर 1988 में मांट्रियल प्रोटोकॉल सामने आया, जिसमें सीएफसी यानी क्लोरोफ्लोरो कार्बन और एचएफसी यानी हाइड्रोफ्लोरो कार्बन के कम उत्सर्जन का संकल्प लिया गया था।


1992 में रियो डि जिनेरो मे पृथ्वी सम्मेलन हुआ, लेकिन चिंताएं बरकरार रही। फिर,मौसम परिवर्तन के ख़तरों से निपटने के लिए 1997 में जापान के क्योटो में यह तय हुआ कि अलग-अलग चरणों में विकसित, विकासशील और पिछड़े देश तापमान बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले गैसों का ऊत्सर्जन कम करेंगे।


क्योटो प्रोटोकॉल के तहत चालीस औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए 1990 के आधार पर मानक तय किए गए । भारत और चीन जैसे विकासशील देशों पर यह पाबंदी बाध्यकारी नहीं थी। अब तक 184 देश इस पर अपनी सहमति जता चुके हैं। लेकिन ग्रीन हाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने अब तक क्योटो संधि को लागू नहीं किया है।


अमेरिका अब भी अपने पुराने रुख पर कायम है कि प्रोटोकाल के तहत विकासशील देशों के लिए भी लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए। उसकी दलील है कि चीन और भारत जैसे देशों पर भी बाध्यकारी पाबंदियां होनी चाहिए।


अमेरिका, कनाडा और जापान जैसे विकसित देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन कम करने की कोई तय सीमा मानने को तैयार नहीं, वहीं भारत,चीन और ब्राजील जैसे देश विकसित देशों की और उंगलियां उठा रहे हैं। ऐसे में मामला पहले आप-पहले आप पर फंसा हुआ है।


भारत और चीन की दलील है कि उनका ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन विकसित देशों की बनिस्पत काफी कम है और इस वक्त उत्सर्जन पर रोक लगाना विकास पर पाबंदी जैसा होगा।


चीन और भारत दोनों का मानना है कि विकसित देशों और विकासशील देशों के लिए उत्सर्जन में कटौती के मानक अलग-अलग होने चाहिए, हालांकि विकासशील और विकसित देशों का यह विवाद पुराना है और जलवायु परिवर्तन की हर बैठक में उठता रहा है।


अमरीका और ऑस्ट्रेलिया ने संयुक्त राष्ट्र के क्योतो प्रोटोकॉल पर सिर्फ़ इसीलिए हस्ताॿर नहीं किए क्योंकि वे इस बात का विरोध कर रहे हैं कि इसमें भारत और चीन के लिए कार्बन गैस उत्सर्जन का कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया गया है और यह भी एक सच है कि इस समय कार्बन गैसों के उत्सर्जन में चीन का नंबर अमरीका के बाद दूसरा है।


लेकिन चीन का तर्क है कि अमीर देशों के अब तक किए गए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की वजह से ही जलवायु परिवर्तन हुआ है.


इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज,--आईपीसीसी-- में रखे गए अपने प्रस्ताव में चीन धनी देशों के ग्लोबल वार्मिंग में योगदान का उल्लेख रिपोर्ट में चाहता है। चीन के मुताबिक 1950 से पहले अमीर देश 95 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार थे, जबकि 1950 से 2000 के बीच वे 77 प्रतिशत गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं, ऐसे में उत्सर्जन कम करने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी विकसित देशों पर होनी चाहिए। उधर, विकसित देश चीन की इस दलील से सहमत नहीं हैं।


अमेरिका के साथ-साथ यूरोपीय संघ भी चाहता है कि विकासशील देशों को भी इस मामले में जिम्मेदारी लेनी चाहिए। यूरोपीय संघ मानता है कि विकासशील देश धनी देशों को दोषी ठहराना छोड़कर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम करने के लिए प्रयास करना शुरु करें।


यानि मामला अब भी वहीं अटका है जहां क्योटो में था।


बहरहाल, क्योटो प्रोटोकॉल का पहला दौर 2012 में खत्म हो रहा है। विकसित देशों को जिम्मेदारी दी गई थी कि वह 2012 तक उत्सर्जन के स्तर को 1990 के स्तर से नीचे ले जाएं। इसके लिए नई तकनीकें अपनाने की पैरवी की गई है जिसके लिए क्योटो प्रोटोकाल में क्लीन डिवेलपमेंट मैनेजमेंट (सीडीएम) का प्रावधान है।


लेकिन उत्सर्जन अभी भी जारी है।


अब तक क्योटो प्रोटोकॉल पर भारत समेत 184 देशों ने दस्तखत किए हैं,जो कुल 70 फीसदी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। 16 फरवरी 2005 से इसे दस्तख्वत करने वाले सभी देशों ने लागू कर दिया है। लेकिन दुनिया की 35 फीसदी ग्रीन हाउस उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने इसे लागू नहीं किया।


डेनमार्क के कोपेनहेगन में होने वाली युनाइटेड नेशंस क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में अब तक के हालात की समीॿा के साथ आगे की कार्रवाई पर विचार होगा। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इस साल अक्टूबर मेंो बैंकॉक में हुई क्लाइमेट चेंज टॉक में क्योटो प्रोटोकॉल को तकरीबन खारिज करने वाले अमेरिका का कोपेनहेगन में क्या रवैय्या रहता है।


भले ही देशों के बीच तकरार जारी है लेकिन इस बार अपने मतभेदों को दूर कर सबको इस बात पर सहमत होना चाहिए कि धरती को जलवायु परिवर्तन के बुरे असर से कैसे बचाया जाए।


उम्मीद करनी चाहिए की कोपनहेगन में देशों के बीच आम राय बनेगी, क्योंकि वक्त हाथ से निकला जा रहा है।

Wednesday, November 18, 2009

गरम होता धरती का मिजाज़


धरती के गर्म होने की प्रक्रिया ग्रीन हाउस एफेक्ट कहलाती है। दरअसल ग्रीन हाउस ठंडे इलाकों में कांच के घर होते हैं, जिनके अंदर खेती की जाती है। कांच के इस घर की दीवारें धूप को अंदर आने देती हैं, जिसे धरती सोख लेती है लेकिन कांच की छत और दीवारों की वजह से ये किरणें वापस नहीं जा पातीं। इससे कांच के घर के भीतर का तापमान बाहर के वातावरण के मुकाबले ज्यादा हो जाता है, और बर्फीले इलाकों में भी सब्जियां उगाना मुमकिन हो पाता है।


धरती को सूरज से प्रति वर्ग मीटर ३४३ वाट सौर विकिरण मिलता है। ऊर्जा की यह मात्रा बहुत ज्यादा है, हमारी कायनात को जलाकर राख कर देने के काबिल...लेकिन हम सुरक्षित हैं क्योंकि इस ऊर्जा का ज्यादातर हिस्सा अंतरिक्ष में वापस चला जाता है।


सूरज से आने वाली किरणों का करीब तीस फीसद हिस्सा बादलों से टकरा कर अंतरिॿ में वापस लौट जाता है। करीब बीस फीसद हिस्सा धरती की कुदरती कामकाज यानी पौधों के खाना बनाने की प्रक्रिया यानी प्रकाश संश्लेषण , और दूसरी भौतिक-रासायनिक बदलावों में खर्च होता है।


बचे हुए 50 प्रतिशत विकिरण में से तकरीबन 49 फीसद हिस्से को धरती की सतह सोख लेती है और और फिर उसे इंफ्रारेड किरणों यानी ताप किरणों में बदलकर वापस अंतरिक्ष में भेज देती है।


लेकिन हमारे वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाइ ऑक्साइ़ड, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन, कार्बन मोनोक्साइड और जलवाष्प इस ऊर्जा को रोकने का काम करती हैं। ऐसे में वायुमंडल में इन गैसों मौजूदगी बढ़ने से धरती गर्म हो रही है तय है। तापमान में इस बढो़त्तरी से ध्रुवों पर बर्फ तेजी से पिघलती है जिसके साथ शुरु होती है प्राकृतिक असंतुलन की एक लंबी श्रृंखला।


इस मुश्किल की शरुआत हूई 18 वीं सदी में यूरोप की औद्योगिक क्रांति के बाद से। पूरी दुनिया में तेजी से कल कारखानों का विकास हुआ और हमने वायुमंडल में धुआं और दूसरी जहरीली गैस छोड़नी शुरु कर दीं।


हवा को जहरीला बनाने के साथ ही धरती द्वारा अंतरिक्ष में छोड़ी जा रही इंफ्रारेड ताप किरणों का पहले से ज्यादा हिस्सा इन गैसों की वजह से वायुमंडल में ही रुकने लगा है। धरती का बढ़ता तापमान इसी प्रक्रिया का नतीजा है।


पृथ्वी का औसत तापमान 18 वीं सदी के बाद अब तक 0.6 डिग्री सेन्टीग्रेट तक बढ़ गया है। समुद्र का जलस्तर बीसवीं सदी में औसतन 10 से 20 सेमी तक बढ चुका है। 21वी सदी के पहले दशक के अंत तक इस स्तर में 10 सेमी और इजाफा होने की आशंका जताई जा रही है।


धरती के गरम होते जाने से आर्कटिक की बर्फ लगातार पिघल रही है।


अनुमान है कि बीसवीं सदी के दौरान उत्तरी गोलार्ध में सात फ़ीसदी बर्फ पिघल चुकी है। हिमालय की चोटियां भी इसकी जद से दूर नहीं.....


ग्लेशियर हर साल घटते जा रहे हैं जिससे बाढ़ औरभूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं आने की आशंका भी पहले से काफी ज्यादा हो चुकी हैं।


हिमालय की बर्फ पिघलने की अगर यही रफ्तार रही तोे मैदानी इलाकों को सींचने वाली नदियों में पहले बाढ़ आएगी और फिर वो सूखने के कगार पर पहुंच जाएंगी। भारत, चीन, नेपाल, बांग्लादेश और म्यामां इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।


जलवायु परिवर्तन की अगली मार होगी खाद्यान्न के उत्पादन पर, धरती के गर्म होने से गेहूं और धान की पैदावार पर असर पड़ेगा और फसल चक्र पूरी तरह गड़बड़ा जाएगा।


जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया, अफ्रीका और लातिन अमरीकी देशों में होने वाली खेती में दिक्कतें आएंगी। इसका सबसे ज्यादा असर उन छोटे किसानों पर पड़ेगा जो कई पीढ़ियों से खेती के लिए मौसमी बरसात पर ही निर्भर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से आने वाले दशकों में बरसात के पैटर्न में बदलाव आएगा और इसके चलते खाद्यान्न उत्पादन में तेजी से गिरावट आएगी।


समस्या ये है कि इसका सबसे ज्यादा असर उस आबादी पर पड़ेगा जिसका वैश्विक तापमान बढ़ाने में सबसे कम योगदान है।