Sunday, September 23, 2018

क्या कोई आकर हमें हिंदुत्व का पाठ पढ़ाएगा?

ध्रुवीकरण और एकता की संघीवादी खोज के पीछे हिंदू धर्म को वह सब बनाने की ललक भी है जो वह नहीं हैरू उसे 'सेमिटाइज' करने की ललक, ताकि वह 'आक्रमणकारियों' के धर्मों की तरह दिखाई दे—संहिता और रूढ़ सिद्धांतों से बंधा धर्म, जिसका एक पहचानने लायक भगवान (संभवतः राम) हो, एक प्रधान पवित्र ग्रंथ (गीता) हो.

अमूमन माना जाता है कि हिंदुओं को सहिष्णु होना चाहिए. इसलिए जब हिंदुओं को ग़ुस्सा आता है तो लोग स्तब्ध रह जाते हैं. वो समझते हैं कि ये तो हिंदू धर्म का मूल नहीं है. ऐसे में एक तबका सामने आता है, जो ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, पर असल में वे हिंदू धर्म के विरुद्ध हैं. इन लोगों के लिखने में या बोलने में हिंदू विरोधी पूर्वाग्रह दिखाई देता है.

बीबीसी हिंदी में लिखे एक स्तंभ में पौराणिक कहानियों के लेखक देवीदत्त पटनायक कहते हैं, "अगर आपको ईसाइयत को समझना हो तो आप बाइबिल पढ़ सकते हैं, इस्लाम को समझना है तो क़ुरआन पढ़ सकते हैं, लेकिन अगर हिंदू धर्म को समझना है तो कोई शास्त्र नहीं है जो यह समझा सके कि हिंदू धर्म क्या है. हिंदू धर्म शास्त्र पर नहीं बल्कि लोकविश्वास पर निर्भर है. इसका मौखिक परंपरा पर विश्वास है."

वो आगे कहते हैं कि इन्हीं कतिपय कारणों से हिंदुओं में गुस्सा है. मुझे लगता है कि अगर हिंदुओं में कोई हीन भावना है, या गुस्सा है, और आज के दौर में जिस तरह वॉट्सऐप के जरिए गलतबयानियां फैलाना आसान हो गया है, उसमें हिंदुओं की छवि आक्रामकता भरी हो गई है. पर मेरा एक और सवाल है, क्या आज के हिंदुत्व में बहुलदेववाद (समझ में न आए तो कमेंट बॉक्स में कूड़ा न फैलाएं, आपको आपके इष्ट देव की कसम) का स्थान है?

क्या मांसाहार करना हिंदुओं के लिए वर्जित है? लेकिन भारतीय संस्कृति की रक्षा करने वाले ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि असल में भारतीय संस्कृति है क्या? संस्कृति का प्रस्थान बिंदु कहां से तय किया जाएगा? क्या आज भी, और पहले भी, उत्तर भारत का हिंदू धर्म, दक्षिण भारत के हिंदू धर्म से अलग नहीं है? यकीन मानिए, हजार बरस पहले का हिंदू धर्म आज के हिंदू धर्म से बहुत अलग था. हर जाति, हर प्रांत और भाषा में हिंदू धर्म के अलग-अलग रूप हैं. यह विविधता ज़्यादातर लोगों की समझ में नहीं आती. या आती भी होगी तो उसे मानना उनके लिए सुविधाजनक नहीं होगा.

आज कारों के पीछे गुस्साए हुए हनुमान कुछ लोगों को प्रिय लग रहे होंगे. पर सच यह है कि हमारे प्यार हनुमान तो वह है जो तुलसी के मानस पाठ में चुपचाप बैठकर रामकथा श्रवण करते थे. जो संजीवनी लाए वह थे हनुमान. राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा...

पर आज अगर हिंदू आक्रामक है या उसे आक्रामक बनाने में कुछ लोगों को समर्थन मिल रहा है तो उसके पीछे वह वामपंथी बुद्धि है जिसने एक पूरे धर्म को हमेशा अपमानित किया है. एक पूरे धर्म को समझने की बजाए उसको सुधार कर एक नया रूप देने की कोशिश की गई.

आज भी हिंदू संगठन वैसा ही करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके नियम और शास्त्र स्पष्ट करने की कोशिश की जा रही है. राम के एकमात्र देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया जा रहा है. (सीता तस्वीरों से गायब हैं) गीता को एकमात्र धार्मिक किताब के रूप में स्थापित किया जा रहा है (मानस व्यापक स्वरूप में है उसे भाव नहीं दे रहे, जबकि वाल्मीकि रामायण तो उन लोगों ने देखी भी नहीं होगी जो इस पोस्ट पर रायता फैलाने कल आएंगे, और वाल्मीकि रामायण में देवत्व वाला भाव भी कम है.)

ध्रुवीकरण और एकता की संघीवादी खोज के पीछे हिंदू धर्म को वह सब बनाने की ललक भी है जो वह नहीं हैरू उसे 'सेमिटाइज' करने की ललक, ताकि वह 'आक्रमणकारियों' के धर्मों की तरह दिखाई दे—संहिता और रूढ़ सिद्धांतों से बंधा धर्म, जिसका एक पहचानने लायक भगवान (संभवतः राम) हो, एक प्रधान पवित्र ग्रंथ (गीता) हो.

क्या मांसाहार करना हिंदुओं के लिए वर्जित है? लेकिन भारतीय संस्कृति की रक्षा करने वाले ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि असल में भारतीय संस्कृति है क्या? संस्कृति का प्रस्थान बिंदु कहां से तय किया जाएगा? क्या आज भी, और पहले भी, उत्तर भारत का हिंदू धर्म, दक्षिण भारत के हिंदू धर्म से अलग नहीं है? यकीन मानिए, हजार बरस पहले का हिंदू धर्म आज के हिंदू धर्म से बहुत अलग था. हर जाति, हर प्रांत और भाषा में हिंदू धर्म के अलग-अलग रूप हैं. यह विविधता ज़्यादातर लोगों की समझ में नहीं आती. या आती भी होगी तो उसे मानना उनके लिए सुविधाजनक नहीं होगा.


हिंदुत्व के पोस्टरों में कृष्ण को राधा के बिना, राम को सीता के बिना और शिव को पार्वती के बिना दिखाया जाता है. उनकी बहसों में शंकराचार्य के ब्रह्मचर्य का गुणगान किया जाता है जिनके बारे में वे यह दावा करते हैं कि उन्होंने एक हजार साल पहले लड़ाकू नागाओं का जत्था तैयार किया था ताकि विदेशी हमलावरों से विनम्र साधुओं को बचाया जा सके.

यही वह दावा है जिससे हिंदुत्व गुंडों या ''हाशिये के समूहों" के अस्तित्व को वाजिब ठहराता है. हालांकि वे उस किंवदंती को नजरअंदाज कर देंगे जब उसी शंकराचार्य ने मंडन मिश्र की पत्नी उभया भारती की सलाह पर अपनी गुप्त शक्तियों का इस्तेमाल करके राजा अमारु के शरीर में जाकर यौन अनुभव लिया था.

हिंदुत्व का स्त्रैण भाव और कामुकता को खारिज करना उन अब्राहमी मिथकों को ही प्रतिध्वनित करता है जिनमें ईश्वर स्पष्ट रूप से पुरुष है, उसके दूत भी पुरुष हैं और जहां उसका पुत्र बिना किसी यौन संबंध के किसी कुंआरी महिला से पैदा होता है.

लेकिन एक हिंदू के रूप में मैं उनकी बंदिशें क्यों स्वीकार करूं? मैं एक सवर्ण हूं, ब्राह्मण हूं, मेरे खानदान में सैकड़ों सालों से शिव, भैरव, काली और दुर्गा के विभिन्न रूपों की उपासना होती रही है. मिथिला हमारा इलाका है. जहां हम लोग सगर्व मांसाहार करते हैं और मछली हमारे भोजन के अहम हिस्सा है. जबकि देश के दूसरे हिस्सों में (जैसे पश्चिमी यूपी, राजस्थान गुजरात में मांसाहार का प्रचलन कम है) तो यही विविधता है न.

विडंबना यह है कि हिंदुत्व का नए सिरे से बढ़-चढ़कर दावा आत्मविश्वास के बजाए असुरक्षा की झलक देता है. यह अपमान और पराजय की बार-बार याद दिलाने की बुनियाद पर खड़ा किया जाता है, मुस्लिम फतह और हुकूमत की गाथाओं से इसे मजबूत किया जाता है, तोड़े गए मंदिरों और लूटे गए खजानों के किस्से-कहानियों से इसे हवा दी जाती है.

इस सबने बेहद संवेदनशील हिंदुओं को नाकामी और पराजय के अफसाने में कैद कर दिया है, जबकि उन्हें आत्मविश्वास से भरे उस धर्म की उदार कहानी का हिस्सा होना चाहिए था जो दुनिया में अपनी जगह की तलाश कर रहा है. अतीत की नाकामियों की तरफ देखने से भविष्य की कामयाबियों के लिए कोई उम्मीद नहीं जागती.

मैं हिंदू धर्म के एकेश्वरवादी बनाए जाने की कोशिशों का विरोध करता हूं.


***

Friday, September 14, 2018

हैप्पी हिंदी डे डूड

हिंदी को लेकर कई तरह की दुकानदारियां चल रही हैं, चलती आ रही हैं और चलती ही रहेंगी. आम जन हिंदी में लिखने को साहित्य समझता है. साहित्यकार भी मठाधीशी करते हुए हिंदी को अपनी बपौती समझने लगे हैं. विश्व हिंदी दिवस से लेकर तमाम विमर्श हैं हिंदी में, पर ज्ञान की भाषा अभी भी अंग्रेजी क्यों है?