राजस्थान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजस्थान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

राजपूत, गुर्जर और जाट के गुस्से ने ढहाया महारानी का किला

अगर पार्टी ने वसुंधरा का साथ दिया होता तो तस्वीर थोड़ी और बेहतर होती. मोदी अपनी जनसभाओं में कांग्रेस, राहुल, नीम कोटेड यूरिया की बात करते रहे, लेकिन वसुंधरा का नाम लेने से बचते रहे. अमित शाह ने भरे मंच से कहा था कि वसुंधरा आपने काम तो किया है, लेकिन अपना काम बता नहीं पाईं.


राजस्थान में कुल 200 सीटें हैं, इसमें से 199 सीटों पर चुनाव हुए थे. एक उम्मीदवार की मौत हो जाने के कारण 1 सीट पर मतदान नहीं कराया जा सका था.

आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस और उसके साथी 101 सीटें जीत गए हैं. वहीं, बीजेपी 75 सीटों पर आगे चल रही है. राजस्थान में 26 सीटों पर निर्दलीय और छोटी पार्टियों के उम्मीदवार आगे हैं जिससे तय है कि भाजपा से नाराजगी वाले सारे वोट कांग्रेस को ट्रांसफर नहीं हुए हैं. अगर ऐसा होता तो कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिल सकता था.

दूसरा, ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि राजस्थान में भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाएगा, वैसा भी होता नहीं दिख रहा है. रुझानों को देखकर तो ऐसा लग रहा है कि अगर पार्टी ने वसुंधरा का साथ दिया होता तो तस्वीर थोड़ी और बेहतर होती. मोदी अपनी जनसभाओं में कांग्रेस, राहुल, नीम कोटेड यूरिया की बात करते रहे, लेकिन वसुंधरा का नाम लेने से बचते रहे.

अमित शाह ने तो भरे मंच से कह दिया था कि वसुंधरा आपने काम किया है, लेकिन अपना काम बता नहीं पाईं. राजस्थान में कांग्रेस को सीटें भले ही ज्यादा मिलती दिख रही हों, लेकिन दोनों के वोट प्रतिशत में मामूली अंतर है. कांग्रेस को 39.2 फीसदी मत मिले हैं वहीं भाजपा को 38.8 फीसदी वोट मिले हैं.

तो फिर भाजपा की संभावित हार की वजहें क्या रही हैं?

वसुंधरा राजे और भाजपा ने राजस्थान में पिछले चार साल में अपने वोट बैंक (जाट, गुर्जर और राजपूत) को हर तरह से दुलारकर रखने की कोशिश की. पर यह तीनों ही जातियां (जो राजस्थान की आबादी में करीबन 20 फीसदी हैं और जिनका असर पड़ोसी राज्यों हरियाणा और मध्य प्रदेश में भी है) भाजपा से नाराज हैं. सचिन पायलट के आने से गुर्जर समुदाय भी भाजपा से दूर हो रहा है.

जाटः मारवाड़ क्षेत्र समेत राज्य के 100 विधानसभा सीटों पर जाटों का असर है. यह समुदाय भाजपा से गुस्सा है, क्योंकि पार्टी में इनकी कोई खास जगह नहीं है. किसान होने की वजह से कृषि संकट भी एक सबब है. राजपूतों के मुकाबले कम तवज्जो मिलने से भी इस समुदाय में नाराजगी थी.

राजपूतः यह समुदाय अमूमन भाजपा का वफादार रहा है. हर विधानसभा में 15-17 राजपूत भाजपा के टिकट पर विधायक बनते रहे हैं. 2013 में कुल 27 राजपूत विधायकों में से 24 भाजपा से थे. पर इस जाति में बेचैनी है क्योंकि राजपूत नेताओं के खिलाफ मुकदमे किए गए. गैंगस्टर आनंदपाल की मुठभेड़ में मौत के बाद भी इस समुदाय में रोष है और करणी सेना पद्मावत मसले के बाद से सरकार से नाराज है.

जाटों के साथ राजपूतों का संघर्ष भी चल रहा है. भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे जसवंत सिंह की उपेक्षा और मानवेंद्र सिंह का कांग्रेस में जाना भी बड़ा फैक्टर है. राजपूत समुदाय करीब 100 विधानसभा सीटों पर मौजूद है.

गुर्जरः 50 सीटों पर इस समुदाय की मौजूदगी है. आरक्षण के मुद्दे पर गूजर भाजपा से नाराज थे. पुलिस फायरिंग और आपसी संघर्ष में 2007 के बाद से 70 से अधिक गूजर मारे गए हैं. सचिन पायलट को भावी मुख्यमंत्री के रूप में संभावना से कांग्रेस की तरफ इनका चुनाव अभियान में झुकाव बढ़ता देखा गया था. इन सारे फैक्टर भाजपा की संभावनाओं में पलीता लगाने वाले साबित हुए हैं.

चुनावी लिहाज से राजस्थान को मोटे तौर पांच क्षेत्रों में बांटा जाता है.

इनमें से एक तो जयपुर ही है. इस क्षेत्र में 19 सीटें हैं जिनमें शाम 6 बजे तक के रुझानों के मुताबिक, भाजपा के पास 6, कांग्रेस के पास 11 और अन्य के पास 2 सीटें जाती दिख रही हैं.

दूसरे चुनावी क्षेत्र मध्य राजस्थान में भी तीन इलाके हैं. धूंधड़ इलाके में अजमेर, सवाई माधोपुर, करौली, टोंक और दौसा 5 जिले हैं. इस इलाके में मीणा फैक्टर प्रभावी है. ऐसा माना जाता है कि मीणाओं का झुकाव भाजपा की तरफ था लेकिन इस इलाके में भाजपा को 8, कांग्रेस को 13 और अन्य को 3 सीटों पर बढ़त/जीत हासिल हुई है. ऐसे में आंकड़े कुछ और ही कहानी बयान करते हैं.

मध्य राजस्थान के मत्स्यांचल में 3 जिले हैं, भरतपुर, अलवर और धौलपुर. इनमें 22 सीटें हैं. यह इलाका सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का इलाका है. मीणा फैक्टर भी यहां काम करता है. फिर भी, यहां भाजपा 4, कांग्रेस 10 और अन्य 7 सीटों पर आगे है. तो इसका अर्थ है कि मंदिर मुद्दा यहां चला नहीं.

तीसरे क्षेत्र हाड़ौती में 4 जिले हैं, जिनमें कोटी बूंदी बाराँ और झालावाड़ हैं. इसमें 17 सीटें हैं और कांग्रेस बनाम भाजपा के सीधी टक्कर वाली 13 सीटें हैं, 4 सीटें बहुकोणीय मुकाबले वाली रही हैं. लेकिन भाजपा 9 और कांग्रेस 8 सीटों पर जीतती दिख रही है. यानी बाकी को कोण वाली पार्टियों को कुछ खास हासिल नहीं हुआ है.

तीसरा चुनावी इलाका, दक्षिणी राजस्थान है, जिसे मेवाड़ भी कहा जाता है.

यह इलाका हर पांच साल पर जनादेश बदल देता है. माना जाता है कि जो पार्टी मेवाड़ जीत लेती है वही सरकार बनाती है. खासकर सालुम्बर सीट खास सलिए है क्योंकि 1977 से जो पार्टी यह सीट जीतती है सरकार उसी की बनती आई है. मेवाड़ में 7 जिले हैं और 35 सीटें हैं. इनमें उदयपुर, डुंगरपुर, भीलवाड़ा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा के इलाके हैं. यहां 27 सीटों पर सीधी टक्कर थी. भीलवाड़ा सीपी जोशी के प्रभाव का इलाका है. 2009 में यहां भाजपा 9 और कांग्रेस 24 सीटों पर जीती थी. लेकिन इस बार भाजपा 19, कांग्रेस 13, अन्य 3 सीटों पर जीतती नजर आ रही है.

पश्चिमी राजस्थान का इलाका कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलोत का है. यहां किसी तीसरी सियासी पार्टी का कोई वजूद नहीं है. कुल 43 सीटें इस इलाके में हैं जिनमें से 33 सीटों पर सीधी टक्कर थी. इस इलाके में ओबीसी और जाट वोट बेहद निर्णायक होते हैं. इसके अलावा मेघवाल, राजपुरोहित और राजपूतों का वोट भी अहम होता है.

इस इलाके के तहत जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, नागौर, जालौर, पाली और सिरोही जिले आते हैं. 2008 में भाजपा को 19 और कांग्रेस को 20 सीटें मिली थीं. अन्य को 4 सीटें हासिल हुई थीं. लेकिन इस बार 2018 में भाजपा को 15, कांग्रेस को 26 और अन्य को 3 सीटें मिलती दिख रही हैं.

उत्तरी राजस्थान में शेखावटी और बीकानेर दो जोन हैं. शेखावटी में सीकर, झूंझनूं और चुरू जिले हैं जिनमें 21 सीटें हैं. इस जोन में कांग्रेस को 14, भाजपा को 5 और अन्य को 2 सीटें मिलती दिख रही हैं.

बीकानेर जोन में बीकानेर, गंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में कुल 18 सीटें हैं. यहां भाजपा को 9, कांग्रेस को 6 और अन्य को 2 सीटें मिलती दिख रही हैं.

इस इलाके के जाट वोटबैंक का कांग्रेस की तरफ झुकाव था जबकि राजपूत अमूमन भाजपा को वोट करते रहे है.

वैसे, राजस्थान में अब बहस यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बनेंगे या सचिन पायलट, लेकिन कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, सीटों की संख्या के मद्देनजर जादूगर कहे जाने वाले गहलोत को ही कमानी सौंपी जा सकती है. युवा सचिन थोड़ा और इंतजार करने के लिए कहे जा सकते हैं.

***

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

राजनीतिक पार्टियों को आरटीआइ के दायरे में क्यों नहीं लाती सरकार?

अभी हाल ही में एक मीम आया था, जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लोगों से चंदा मांगते दिखते थे और बाद में वेलकम-2 का एक सीन और परेश रावल का एक संदे्श आता है. यह मीम अरविंद केजरीवाल की हंसी उड़ाने के लिए था. और कामयाब रहा था. 

पर आपको और हमें, सोचना चाहिए कि आखिर राजनीतिक दलों को चंदा कौन देता है, उनका खर्च कैसे चलता है? आपने कभी किसी पार्टी को चंदा दिया है? कितना दिया है? चुनावों पर उम्मीदवार और सियासी दल कितना खर्च करते है? जितना करते हैं उतना आपको बताते है और क्या वह चुनाव आयोग की तय सीमा के भीतर ही होता है? और अगर आपके पसंदीदा दल के प्रत्याशी तय स्तर से अधिक खर्च करते हैं (जो करते ही हैं) तो क्या वह भ्रष्टाचार में आएगा? प्रत्याशी जितनी रकम खर्च करते हैं वह चुनाव बाद उन्हें वापस कैसे मिलता है? और आपके मुहल्ले को नेता, जो दिन भर किसी नेता के आगे-पीछे घूमता रहता है उसके घर का खर्च कौन चलाता है?

अभी चार महीनों के बाद लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. इन दिनों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में चुनाव प्रक्रिया चल रही है. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले चुनावी वादा किया था, न खाऊंगा न खाने दूंगा. ऐसा नहीं कि सरकार ने शुचिता के दायरे में राजनीतिक दलों को लाने की कोशिश नहीं की, पर प्रयास नाकाफी रहे. सरकार के हालिया प्रयासों के बावजूद भारत में चुनावी चंदा अब भी अपारदर्शी और काले धन से जुड़ी कवायद बना हुआ है. इसकी वजह से चुनाव सुधारों की प्रक्रिया बेअसर दिखती है.

अभी आने वाले लोकसभा चुनाव में अनुमान लगाया जा रहा है कि 50 से 60 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे. यह खर्च 2014 में कोई 35,000 करोड़ रु. था. जबकि हाल के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 9.5 से 10 हजार करोड़ रु. खर्च हुआ. 2013 में कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव में इसकी ठीक आधी रकम खर्च हुई थी. 

जरा ध्यान दीजिए कि राजनैतिक पार्टियां चंदा कैसे जुटाती हैं. आमतौर पर माना जाता है कि स्वैच्छिक दान, क्राउड फंडिंग (आपने कभी दिया? मैंने तो नहीं दिया) कूपन बेचना, पार्टी का साहित्य बेचना (उफ) सदस्यता अभियान (कितनी रकम लगती है पता कीजिए) और कॉर्पोरेट चंदे से पार्टियां पैसे जुटाती हैं. 

निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक, पार्टियां 2000 रु. से अधिक कैश नहीं ले सकतीं. इससे ज्यादा चंदे का ब्योरा रखना जरूरी है. ज्यादातर पार्टियां 2000 रु. से ऊपर की रकम को 2000 रु. में बांटकर नियम का मखौल उड़ाती हैं क्योंकि 2000 रु. तक के दानदाता का नाम बताना जरूरी नहीं होता. एक जरूरी बात है कि स्थानीय और ठेकेदार नकद और अन्य सुविधाएं सीधे प्रत्याशी को देते हैं न कि पार्टी को.

कंपनियां चुनावी बॉन्ड या चुनाव ट्रस्ट की मार्फत सीधे चंदा दे सकती हैं, दानदाता के लिए यह बताना जरूरी नहीं है चंदा कि पार्टी को दिया, पार्टियों के लिए भी किससे चंदा लिया यह जाहिर करना जरूरी नहीं है.

तो अब यह भी जान लीजिए कि सियासी दल पैसे को खर्च कहां करती हैं. दल, पार्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में, चुनावी रैली, खाना, परिवहन, और ठहरने में, कार्यकर्ताओं को तनख्वाह देने में, प्रिंट, डिजिटल और टीवी में विज्ञापन देने में खर्च करते हैं. चुनाव के दौरान प्रत्याशी नकद, सोना, शराब और अन्य चीजें भी बांटते हैं. मसलन फोन, टीवी. फ्रिज वगैरह. नया तरीका लोगों के मोबाइल रिचार्ज कराना और बिल भरना भी है. अब आप बताएं कि यह किसी एजेंसी की पकड़ में नहीं आएगा.

मोदी सरकार के उपाय

नरेंद्र मोदी सार्वजनिक जीवन में शुचिता का समर्थन करते रहे हों, पर उनकी सरकार के उपायो से भी यह शुचिता आई नहीं है. मसलन, सरकार ने पार्टियों द्वारा बेनामी नकद चंदे की सीमा पहले के 20,000 रु. से घटाकर 2,000 रु कर दी लेकिन नकद बेनामी चंदा लेने के लिए पार्टियों के लिए एक सीमा तय किए बगैर यह उपाय किसी काम का नहीं है.

पहले विदेशों से या विदेशी कंपनियों से चंदा लेना अपराध के दायरे में था. कांग्रेस और भाजपा दोनों पर विदेशों से धन लेने के आरोप थे. मोदी सरकार ने 1976 के विदेशी चंदा नियमन कानून में संशोधन कर दिया है जिससे राजनीतिक दलों के विदेशों से मिलने वाले चंदे का जायज बना दिया गया. यानी 1976 के बाद से राजनैतिक पार्टियों के चंदे की जांच नहीं की जा सकती. राजनैतिक दल अब विदेशी कंपनियों से चंदा ले पाएंगे. लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि इससे दूसरे देश हमारे चुनावों में दखल देने लायक हो जाएंगे? 

शायद भारतीय चुनाव अभी तक विदेशी असरात से बचा रहा है, लेकिन चुनावों पर कॉर्पोरेट के असर से इनकार नहीं किया जा सकता. पार्टियों को ज्ञात स्रोतों से मिले चंदे में 2012 से 2016 के बीच कॉर्पोरेट चंदा कुल प्राप्त रकम का 89 फीसदी है.

मोदी सरकार ने 2017 में कॉर्पोरेट चंदे में कंपनी के तीन साल के फायदे के 7.5 फीसदी की सीमा को हटा दिया. कंपनी को अपने बही-खाते में इस चंदे का जिक्र करने की अनिवार्यता भी हटा दी गई.  हटाने से पार्टियों के लिए बोगस कंपनियों के जरिए काला धन लेना आसान हो जाएगा. लग तो ऐसा रहा है कि यह प्रावधान फर्जी कंपनियों के जरिए काले धन को खपाने का एक चोर दरवाजा है.

कुल मिलाकर राजनैतिक शुचिता को लेकर भाजपा से लेकर तमाम दलों में कोई दिलचस्पी नहीं है. इसको लेकर भी एक आंकड़ा है, 2016-17 में छह बड़ी राजनैतिक पार्टियों के कुल चुनावी चंदे का बेनामी स्रोतो से आया हिस्सा 46 फीसदी है. समझ में नहीं आता कि अगर सरकार वाक़ई पारदर्शिता लाना चाहती है तो सियासी दलों को आरटीआइ के दायरे में क्यों नहीं लाती?

***

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

आभूषण उद्योग की फीकी पड़ती चमक

सामान्य ज्ञान की किताबों में हम-आप बरसों से पढ़ते आ रहे हैं कि भारत के निर्यात में बड़ा हिस्सा रत्न और आभूषण उद्योग का है। इस उद्योग में करीब बीस लाख लोग सीधे या परोक्ष रूप से रोज़गार पाते हैं। लेकिन देश के विदेशी मुद्रा भंडार में हर साल करीब 16 फीसद का योगदान करने वाला रत्न और आभूषणों का कारोबार इन दिनों मंदी की मार से ठिठका हुआ है। बाज़ार के जानकारों को उम्मीद थी कि साल 2016 तक रत्न और आभूषणों का भारतीय निर्यात करीब 58 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचेगा। हम भारतीय भी गहनों और रत्नों के बड़े खरीदार हैं लिहाजा घरेलू कारोबार के भी 40 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंचने की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन अब इस उद्योग को थोड़े संरक्षण की दरकार लग रही है।

जयपुर रत्नों और आभूषणों का बड़ा केन्द्र माना जाता रहा है। वहां घर-घर में आभूषणों की कटाई का काम चलता है। लेकिन नई पीढ़ी को इस उद्योग में कम रूचि है, क्योंकि नफे का मार्जिन कम होता जा रहा है।

भारत में रत्नों का कटाई का कारोबार श्रम आधारित है। इसका मतलब हुआ कि इस काम में बड़े पैमाने पर मजदूर लगे हुए हैं। लेकिन इस उद्योग में भी चीन का हौव्वा आन खड़ा हुआ है। भारत में जितनी देर में एक रत्न की कटाई होती है, चीन में उतनी ही देर में मशीनों से सौ रत्नों की कटाई कर दी जाती है। यह बात और है कि कटाई में महीन काम भारत में ही मुमकिन है। और मशीनों से जिन रत्नों की कटाई की जाती है उनमें वो खास बात पैदा नहीं होती है। शायद इसलिए भारत का रत्न उद्योग अभी तक बाजार में टिका हुआ है। लेकिन अब चीन के हौव्वे से मुकाबला करने के लिए तकनीक का साथ चाहिए तो सस्ती बिजली की मांग भी उत्पादक कर रहे हैं।

सस्ती बिजली की जरूरत इसलिए भी है कि कुटीर उद्योग के रूप में रत्नों की कटाई करने वाले परिवार 8 रूपये यूनिट की दर से बिजली की कीमत चुकाने के बाद अपने लिए कुछ खास बचा नहीं पाते।

अब इस उद्योग को स्पेशल टर्नओवर टैक्स में छूट मिलने की उम्मीद है। सरकार ने 2 लाख रूपये के हर लेनदेन के लिए पैन कार्ड की जरूरत को जरूरी बना दिया है। पहले यह सीमा 5 लाख रूपये थी। यह रोक इस साल की पहली जनवरी साथ ही लागू हुआ है और इससे कारोबार पर उलटा असर हुआ है और लेनदेन करीब बीस फीसद तक कम हो गया है।

रत्न और आभूषणों के कारोबार को आप सिर्फ बड़े लोगो का कारोबार न मानिए। इसमें ऐसे लोग भी लगे हैं जिनकी दो जून को रोटी भी बमुश्किल मिल जाती है। दुनिया भर में आई मंदी से रत्न और आभूषण कारोबार को झटका लगा है। ऐसे में निर्यात में अव्वल रहे इस उद्योग को बढ़ावा देने के वास्ते बाहर से आने वाले तैयार आभूषणों पर आयात शुल्क बढ़ाना उद्योग के लिए मरहम का काम करेगा। गौरतलब है कि सोने के आभूषणों पर मौजूदा आयात शुल्क 15 फीसद और चांदी पर 20 फीसद है लेकिन निर्यातकों की मांग है कि इसे बढ़ाकर 20 और 25 फीसद किया जाए।

इसके साथ ही रत्न कारोबारियों की मांग है कि इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए वित्त मंत्री इसे फौरी तौर पर टैक्स में कुछ छूट दें।

आखिर, सोने पर आय़ात शुल्क 10 फीसद है। इसे कम करने के बाद आभूषण निर्माताओं को कच्चे माल पर लागत कम करने में मदद मिलेगी।

आखिर, सोन-चांदी और रत्नों को बाहर से मंगाकर भारत में तैयार किया जाता है और इन तैयार माल को दुबई, सिंगापुर, बैंकाक, जर्मनी, रूस और फ्रांस जैसे कई देशों को भेजा जाता है। जाहिर है, भारत में हम सिर्फ उत्पाद तैयार करते हैं। इस लिहाज से यह कारोबार मेक इन इंडिया की बेहतरीन मिसाल है। इसलिए केन्द्र सरकार को बजट में इसके लिए कुछ करना ही चाहिए। आखिर इस उद्योग में रोज़गार की भी अपार संभावनाएं जो हैं।


मंजीत ठाकुर

रविवार, 1 मार्च 2015

दो टूकः माटी की सेहत


सौजन्यः गांव कनेक्शन
पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजस्थान के सूरतगढ़ में थे। विभिन्न राज्यों और देशभर के किसानों को प्रधानमंत्री ने अधिक अन्न उपजाने के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार दिए। मुझे अच्छी तरह से याद है, पहले यह पुरस्कार कहीं और नहीं, बेहद उबाऊ सरकारी आयोजन की तरह दिल्ली के विज्ञान भवन में दिए जाते थे। अच्छा हुआ, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर पदयात्रा की खबरों के बीच सरकार किसानों के बीच पहुंची।

सूरतगढ़ में एक और गौरतलब शुरूआत हुई। यह शुरूआत थी किसानों को उनके खेतों की मिट्टी की सेहत से वाकिफ कराने के लिए सेंट्रल सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम की। इसके ज़रिए किसानों को उनकी खेतों की मिट्टी के बारे में लैब में जांच करके बताया जाएगा। केंद्र सरकार ने इस योजना के लिए फिलहाल तरीब 600 करोड़ रुपये का इंतजाम किया है।

अब इस स्कीम के लॉन्च के बरअक्स मैं दूसरी खबर के बारे में बताना ठीक समझता हूं। ख़बर उत्तर प्रदेश के दनकौर की है। दनकौर और जेवर ब्लॉक के करीब 8 हजार खेतों से लिए गए मिट्टी के नमूनों की जांच ने सबको चौंका दिया है।

रासायनिक उर्वरक और नमक यहां की जमीन को बंजर कर रहा है। बिलासपुर की लैब में लिए गए मिट्टी के नमूनों के आधार पर कृषि विशेषज्ञ कह रहे हैं कि खेतों में अच्छी पैदावार लेने के लिए केमिकल फर्टिलाइजर, नमक और कीटनाशक दवाइयों के ज्यादा इस्तेमाल से जमीन बंजर बनती जा रही है। इलाके की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बेहद ही कम पाई गई है। इसके अलावा जीवांश की मात्रा न्यूनतम, फास्फोरस अति न्यूनतम और पोटाश की मात्रा भी न्यूनतम ही पाई गई है। इन सभी की मात्रा 80 से लेकर 100 पर्सेंट तक होनी जरूरी है। कृषि एक्सपर्ट की मानें तो अच्छी पैदावार लेने के लिए मिट्टी में 16 पोषक तत्व होने अति आवश्यक हैं। यहां किसानों को सिर्फ जिंक व सल्फर डाइआक्साइड जैसे ही पोषक तत्व मिल रहे हैं। आने वाले दिनों में यह भी कम होते चले जाएंगे। इसकी वजह है खेतों में केमिकल फर्टिलाइजर, नमक और कीटनाशक दवाओं का भारी प्रयोग।

प्रधानमंत्री से जुड़ी एक और योजना का जिक्र यहां मैं करना चाहता हूं, वह है गंगा की सफाई का। गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए सरकार अपने तरह से कोशिशें शुरू कर चुकी है और इसके तीन मुख्य मानक होते हैं पानी में जैव-रासायनिक ऑक्सीजन की मांग, घुलनशील ऑक्सीजन और कॉलिफॉर्म बैक्टिरिया की प्रति सौ मिलीलीटर संख्या।

एक मिसाल लेते हैं। अगर गंगा के तट से पचास-साठ किलोमीटर के दायरे में कोई किसान अपनी खेतों में जरूरत से अधिक उर्वरक का इस्तेमाल करता है। तो यह उर्वरक खेतों में पड़ा रह जाता है। बरसात में खेतों के पानी में घुलकर यह उर्वरक बरास्ते सहायक नदियों के, गंगा में आ मिलता है।

इस उर्वरक की वजह से गंगा में शैवालों की बढ़ोत्तरी सामान्य से ज्यादा तेजी से होती है। मूल रूप से ये शैवाल पानी के बहाव को बाधित करते हैं और प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए ऑक्सीजन पानी में छोड़ते भी हैं। इससे पानी मेम घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाएगी, लेकिन साथ ही पानी में जलीय जीवों का खात्मा हो जाएगा।

इस परिस्थिति को आप पारिस्थितिकीय जटिलता की श्रेणी में रख सकते हैं। इससे गंगा को साफ करने के सामान्य तरीके बेअसर साबित होते जाएंगे और फिर जटिल वैज्ञानिक तरीकों का विकल्प ही बच रहेगा।

यानी, मिट्टी की सेहत बचानी हो और लंबे वक्त तक पैदावार लेना हो, तो पानी, उर्वरक और रसायनों का बहुत सोचसमझ कर इस्तेमाल करना होगा। दनकौर हो या पानी से जूझता राजस्थान का कोई जिला, इन संसाधनों का किफायती इस्तेमाल खेती की लागत को कम ही करेगा। टिकाऊ विकास की रणनीति भी यही कहती है।

मंजीत ठाकुर


(यह लेख गांव कनेक्शन में मेरे स्थायी स्तंभ, दो-टूक में प्रकाशित हो चुका है)

शनिवार, 19 अप्रैल 2008

रेगिस्तान में फंसने का सुख

अगर आप रेगिस्तान गए। उसमें फंसे नहीं। रेगिस्तानी रेत के असीम चादर पर फैली चांदनी का सागर नहीं निहारा तो क्या रेगिस्तान गए गुरु। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। बीकानेर से ४५ किलोमीटर पश्चिम की तरफ है गांव लाडेरा। हम जब लाडेरा के लिए निकले, तो राह में मिले मोरों के कुनबे। उन्हे कैमरे में क़ैद करने का लालच मैं रोक न पाया। जाड़ो में धूप तापते मोरों के झुंड बेहतरीन लग रहे थे।

बहरहाल, खानाबदोश परिवारो और दूर दूर बसे गांवो के बीच में से हम लाडेरा पहुंचे। वहां उंट महोत्सव का आयोजन किया जा रहा था। कार्यक्रम खत्म होते न होते, रात के साढे ग्यारह बज गए। साढे ग्यारह बजना दिल्ली के लिए कुछ न हो लेकिन गांव में यह बेहद रात होती है। बहरहाल, रेत के टीलों से घिरे उस रेगिस्तान में गाडि़यों का काफिला आहिस्ता-आहिस्ता रेग-रेगं कर निकलने लगा। हमारा ड्राइवर बेहद चालाक था, उसने कहा कि हम बाद में निकलेंगे। सरकारी गाडि़यां निकल लीं। लोग बाग भी कल्टी हो लिए। बच गए हम लोग, यानी हमारी पूरी टीम। बाद में जब गाड़ी निकालने की बारी आई, तो काफिले के निकलने की बजह से पैदा हुई रेतीली धंसान मे ंहमारी गाड़ी फस गई। चालाक ड्राईवर होने का खामियाजा कभी-कभी भुगतना पड़ता है। उसने गाड़ी निकालने की जो तरकीब लगाई, उससे गाड़ी के चारो पहिए रेत के अंदर चले गए।

वह िलाका सुनसान हो चुका था। विदेशी मेहमान चले गए थे। रात सवा बारह बजे वहां किसी का रुकना ठीक भी न था। चांदनी रात, चांद सिर पर। मुझे लगा कि जनवरी की इस कड़ाके की सरदी वाली रात, हम रेगिस्तान मे ठिठुरेंगे। अगर बच गए, तो कल की शूटिंग भी कर पाएंगे।

सारा रस निकल गया। थोड़ी देर पहले सवर्ग नज़र आ रहा रेगिस्तान का वह हिस्सा नरक लगने लगा। ऐसे मौके पर भूख भी लग आती है, प्यास की तो पूछिए ही मत। और भी कई तरह की शंकाएँ सर उठाने लगती हैँ। जूते के अंदर गया रेत पसीने से भींग कर ठिठुरन पैदा करने लगा, एक अजीब सी दशा। एक रिपोर्टर को इन सबका सामना करने की कूव्वत रखनी चाहिए, उपर से मैं सामान्य दिखने की कोशिश कर रहा था। ताकि मेरे बाकी के साथी भी हल्ला न करें। अपने तईं हमने गाडी़ को रेत से बाहर निकालने की कोशिश भी की। लेकिन अपने स्वास्थय को लेकर हमें कभी कोई मुगालता नहीं रहा है। ऐसे में गाड़ी रेत से नहीं निकलनी थी, नहीं निकली।

पर ईश्वर पर अनास्था रखने के बावजूद वह मुझ पर ऐसे मौको पर कृपालु रहा है। एक ट्कैर्टर आता दिखा। उस पर सवार कम-अज-कम पचीस लड़के। ट्रैक्टर को गाड़ी से बांधा गया। लड़कों ने ज़ोर लगाया। गाड़ी निकल आई। एवज में मालासर तक जाने वाले उन लड़कों को हमने वहां तक लिफ्ट दी। गाड़ी के अंदर तो जगह थी नहीं, छत पर। रात ढाई बजे वापस हम बीकानेर पहुंचे। अगले दो दिन तक घूम-घूमकर शूट करत रहे। अच्छा लगा। खूब बीकानेरी रसगुल्ले चाभे। मज़ा आया।

वापसी में जयपुर की राह में राजलदेसर नाम की जगह पर चाय के लिए रुके। गांव के चौधरी ने मीडिया के लोग कह कर अपने घर आने की दावत दी। चौधरी के घर पर चाय और पापड़ का नाश्ता हुआ। चौधरी ने महमें खाने का ऑफर दिया । हम भोजनभट्ट हैं और इससे इनकार नहीं कर पाए। खाने में आया, बाजरे की रोटी, सेव की सब्जी, राबरी गुड़ और छाछ। भाईसाहब मज़ा आ गया। यह भोजन मेरा अब तक का खाया सबसे शानदार खाना है। बाजरे की रोटी इतनी स्वादिष्ट भी हो सकती है, मैंने इसका अनुमान तक नहीं लगाया था कभी।

बहरहाल, तीन बजे दोपहर बाद हम जयपुर लौटे और शताब्दी से दिल्ली वापसी आ गया। अपने कार्यक्रम की पटकथा सोचता हुआ।

सोमवार, 7 अप्रैल 2008

बीकानेर की करणी माता


हम बीकानेर से जोधपुर की ओर निकले तो 30 किलोमीटर के बाद हमें मिला एक क़स्बा, देशनोक। ये क़स्बा करणी माता के 6 सौ साल पुराने मंदिर के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इस मंदिर में एक खास बात है जिसने इसे दुनिया में अलग जगह खडा कर दिया है। वो है मंदिर में पाये जाने वाले हजारों चूहे।

करणी माता देवी दुर्गा की अवतार मानी जाती हैं लेकिन मंदिर की खासियत है कि यहां हज़ारों चूहे रहते हैं और उनकी पूजा की जाती है। मंदिर में मौजूद हज़ारों चूहे यहां-वहां बेरोकटोक घूमते रहते हैं। प्रसादों पर तो इन्हीं की कृपा होती है।

इस अनोखे मंदिर को देखने की दिलचस्पी देशी लोगों के साथ विदेशियों में भी बराबर ही है।


श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस मंदिर में सिर्फ बेहद भाग्यशाली लोग ही सफेद चूहे देख सकते हैं। इस लिहाज से हमारी टीम की किस्मत के तारे बेहद बुलंद रहे कि हममें से हरेक ने सफेद चूहे का दर्शन किया।
चूहे इस मंदिर में सदियों से रहते आ रहे हैं।


करणी माता बीकानेर राज घराने की कुल देवी हैं। कहा जाता है उनके आर्शीवाद से ही बीकानेर की स्थापना राव बीका ने की थी। इन चूहों को मां का सेवक माना जाता है इसलिए इनको कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाता।

यहां रहने वाले इन चूहों के काबा कहा जाता है। मां को चढाये जाने वाले प्रसाद को भी पहले चूहे ही खाते है उसके बाद ही उसे बांटा जाता है। मंदिर हर तरफ चूहे चूहे दिखाई देते हैं। यहां पर अगर सफेद चूहा दिखाई दे जाए तो उसे भाग्यशाली माना जाता है। मुझे भी सफेद चूहे के दर्शन हो ही गये।


खास बात ये भी है कि इतने चुहे होते हुए भी मंदिर परिसर में बदबू का एहसास भी नहीं होता है। इतने चूहे होते हुए भी आज तक कोई भी मंदिर में आकर या प्रसाद खा कर बीमार नहीं पडा है। ये अपने आप में आश्चर्य है। यहां के पुजारी के घर में तो मैने चूहे किसी बच्चे की तरह ही घूमते देखे। उनके घर के कपडों से लेकर खाने के सामान तक सबमें चूहे ही चूहे दिखाई दे रहे थे।

इसके अलावा मंदिर का स्थापत्य भी देखने के लायक है।मंदिर का मौजूदा स्वरूप बीसवीं सदी में अस्तित्व में आया। इस मंदिर की शैली में उत्तरवर्ती मुगल शैली की झलक दिखती है संगमरमर का बेहद खूबसूरत इस्तेमाल मंदिर में किया गया है। मंदिर के जालीदार झरोखों पर किया बारीक कुराई का काम बेहद सुन्दर है। मंदिर के विशाल मुख्य दरवाजे चांदी के बने हैं।

अब मंदिर में चूहों को लेकर जो भी श्रद्धा और विश्वास हो, लेकिन यहां शूटिंग के लिए मंदिर के रखवाले कड़ी रकम वसूल करते हैं और यह खलने वाली बात लगी। बहरहाल, ये उनका एक्सक्लूसिव अधिकार है। मंदिर में आस्था के अलावा जो बात मुझे बहुत अच्छी लगी वह है इंसान और कुदरत का गहरा रिश्ता जो आज की दुनिया से गायब सा होता जा रहा है।

बीकानेरी भुजिया का स्वाद


बीकानेर कहते ही मन में भुजिया कौंद जाता है। मेरे मुंह में पानी आ जाता है. तो आपने भी ज़रूर चखा होगा। बीकानेर और इसके आसपास के इलाकों में भुजिया और पापड़ तैयार करने की साढे चार सौ से भी ज्यादा छोटी-बड़ी इकाईयां काम कर रही है।

मैंने अपने बीकानेर दौरे में उन कारखानों का भी रुख किया। सोचा आमने-सामने देखते हैं कि स्वादिष्ट भुजिए को बनाने की तरकीब क्या है।

बीकानेरी भुजियों की कई किस्में होती हैं। लेकिन इसे बनाने में बहुत सावधानी बरती जाती है। शिवदीप इंडस्ट्रीज के कारखाने में हमने देखा कि कारखाने के अंदर इलाके में ही पैदा होने वाली मोठ की दाल से बेसन तैयार किया जाता है।

इस बेसन में तेल और एक मसालों का मिश्रण तैयार किया जाता है। इस मिश्रण का राज़ बेहद गुप्त रखा जाता है। कर्मचारियों तक को मसाले बनाने का रहस्य पता नहीं। फिर गूंथे गए बेसन के मिश्रण से तैयार होता है भुजिया।

कारखाने के अंदर ही कड़कते तेल में छन-छन छनते भुजिया की खुशबू से नाक भर गया।

इसी कारखाने में लजीज़ मीठे और नरम-नरम बीकानेरी रसगुल्ले भी तैयार होते हैं। अठारहवीं सही के आखिर में कोलकाता में खोजे गए रसगुल्लों का फॉर्मूला अपने शुरुआती दौर में ही बीकानेर तक आ गया और फिर बीकानेरी रसगुल्लों ने अपनी अलग पहचान बना ली, लोगों की ज़बान पर चढ़कर। कोलकाता के रसगुल्लों से बीकानेर के रसगुल्लों में एक अंतर होता है, वह है मिठास का अंतर।

बीकानेर प्रवास के दौरान मैंने खूब छककर रसगुल्ले उडाए। हमारी टीम के लोगों ने ५-५ किलों रसगुल्ले वापसी के वक्त बंधवा लिए अपने परिवार के लिए। मैंने अपनी ब्राह्मण वृत्ति के ही अनुसार खाने के काम में अपरिग्रह का परिचय दिया, साथ ही माना कि कल पर कोई काम नहीं छोड़ा जाना चाहिए, और रौज़ाना के हिसाब से बड़ी मात्रा में रसगुल्ले उदरस्थ किए। वैसे मजा़ आ गया।

अगले दिन लिखूंगा, हमारे डॉक्यूमेंट्री शूट करने का अनुभव। लाडेरा गांव जाने का तज़रबा और एक स्थानीय शख्स के यहां बाजरे की रोटी उडा़ने का नायाब मौका कैसे मिला यह भी।

शनिवार, 5 अप्रैल 2008

खतरे में बीकानेर का ऊन उद्योग


बीकानेर ही नही आसपास का पूरा इलाका भेड़ों के लिए बेहद मुफीद है। भेडो़ को पलने बढ़ने के लिए जैसा माहौल चाहिए, ठीक वैसा ही बीकानेर के आसपास है। ऐसे में बीकानेर में ऊन उद्योग का खूब विकास हुआ है। यह शहर दुनिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी है। बीकानेर में कच्चे ऊन से यार्न यानी धागा बनाया जाता है। और इस यार्न से कालीन और कंबल बनाए जाते हैं। बीकानेर ऊन उत्पादक संघ के अध्यक्ष कन्हैया लाल बोथरा ने बताया कि बीकानेर का उन उद्योग भदोई के कालीन उद्योग के लिए कच्चा ऊन मुहैया कराता है। और इस इलाके के दस लाख लोगों को रोज़गार देकर उनके लिए रोजी-रो‍टी का बंदोबस्त करता है।

बीकानेरी ऊन के धागे क्वॉलिटी में बेहतर मानी जाती है, लेकिन इसके कुछ तकनीकी पेंच भी हैं। न्यूजीलैंड के ऊन तकनीकी तौर पर ज्यादा सफाई से चुने गए होते हैं। जाहिरे है, उनके बुनाई में ज्यादा आसानी होती है। लेकिन बीकानेरी ऊन के साथ तकनीकी दिक्कत है और इनमें वह पेशेवर सफाई नही आ पाई है। दूसरी तरफ पिछले कुछ सालों से ऊन उत्पादन में गिरावट भी दर्ज की जा रही है। १९९५ में जहां इस इलाके में १ करोड़ ७० लाख भेडें थीं वहीं २००८ तक पड़े बारंबार के अकाल की वजह से भेड़ों की गिनती में लगातार कमी आती जा रही है। २००७ में भेडो़ की गिनती घटकर महज ५० लाख रह गई है।

पहले इस इलाके से चलकर भेड़ों का रेवड़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक चरने के लिए चला जाता था। और किसान इन्हें अपने खेतों में बैठने की छूट देते थे ताकि खेतों का कुदरती खाद मिलता रहे। भेड़ों का रेवड़ अब भी जाता है, लेकिन खेतों में चरने के लिए नहीं, बल्कि मांस की खातिर कटने के लिए। ज़ाहिर है इस इलाके के ऊन उद्योग को बचाने के लिए कुछ मजबूत कदम उठाए जाने ज़रूरी हैं।

खुद बोथरा भी कुछ उपाय सुझाते हैं। मसलन, इंदिरा गांधी नहर के दोनों किनारों पर अगर अल्फा-अल्फा जैसी घास को योजनाबद्ध तरीके से उगाया जाए तो भेड़पालन को एक नया जीवन मिल सकता है। लेकिन फिलहाल तो भेड़पालक चरवाहे सरकार की तरफ से नजरअंदाज किए जाने का दंश झेल रहे हैं।

गुरुवार, 20 मार्च 2008

बीकानेर शहर जूनागढ़ किला



बीकानेर शहर की सभी इमारतों में राजस्थानी वास्तुकला शैली का दीदार होता है। लाल बलुआ पत्थर से बनी इमारतें बीकानेर के सौंदर्य को अद्भुत विस्तार देती हैं।

वक्त बदलने के साथ-साथ शहर ने भी आधुनिकता का रुख किया, लेकिन बीकानेर ने तहज़ीब का दामन नहीं छोड़ा है। इस शहर के आम लोगों की ज़िंदगी भी कमोबेश वैसी ही है जैसी किसी और शहर की होती है। लेकिन इन सबके बावजूद इस शहर की आत्मा है जिसे आप यहां आकर ही महसूस कर सकते हैँ।

बीकानेर के बीचों बीच है जूनागढ़ किला। इसे यहां के छठे शासक राजा रायसिंह ने बनवाया था। राजस्थान में बहुत कम ही क़िले समतल ज़मीन पर बने हैं। जूनागढ़ किले की मजबूती का आलम यह है कि इसे भीषण लड़ाईयों के दौर में भी कभी जीता नहीं जा सका।

१५८८ से १५९३ के बीच बनाया गया जूनागढ़ क़िला राजा राय सिंह की भारत को दी गई अनमोल देन है। राय सिंह मुगल बादशाह अकबर के सेनाधिकारी थे। ९८६ मीटर लंबी पत्थर की दीवार से घिरे किले में ३७ बुर्ज हैं।किले को दो मुख्य दरवाजे हैं , जिसे दौलतपोल और सुराजपोल कहा जाता है। दोलतपोल में सती हुई राजपूत महिलाओं के हाथों की छाप है। किले के दूसरे दरवाजे चांद पोल वगैरह है।

बीकानेर आए और यहां की हवेलियां नहीं देखीं तो आपकी सैर अधूरी मानी जाएगी। पुराने बीकानेर शहर में तंग गलियों के बीच इनकी शानदार मौजूदगी है। बल खाती गलियों के ठीक ऊपर इनके झरोखों की छटा बेहतरीन होती है।

लाल पत्थर से बनी ये हवेलियां अपने आसपास एक जादू-सा बिखेरती हैँ। इनके दरवाज़े हों, नक्काशीदार खिड़कियां हों या फिर बारामदे , इन सबमे कुछ ऐसा है, जिसे राजसी कहा जाता है।

पुराने वक्त मे ये हवेलियां धन्ना सेठों के रहने की जगह हुआ करती थी। यहां के साहूकार साल के नौ महीने कमाने के लिए बाहर सफर करते रहते थे, और तीन महीने के लिए इन शानो-शौकत भरी हवेलियों में अपने परिवार के पास आते थे।

बीकानेर की हवेलियों में से रामपुरिया हवेलियां खासी मशहूर हैं। इन हवेलियों को देखकर आपको जैसलमेर की पटवा हवेली की याद आएगी। वैसे, बीकानेर की रामपुरिया हवेलियां लाल डलमेरा पत्थरों की बनी हैं।

हवेलियों की दीवारों और झरोखों पर पत्तियां और फूल उकेरे गए हैं। कमरों के भीतर सोने की जरी का बेशकीमती काम देखकर आप दांतो तले उंगली दबा बैठेगें।


विरासत को सहेजने का अपना अनोखा अंदाज कहें या फिर विरासत से कमाई करने वाली व्यापारिक बुद्धि - नई पीढी ने इन हवेलियों को कमाऊ जायदाद में तब्दील कर दिया है। रामपुरिया हवेलियों के मालिक प्रशांत मारपुरिया के मुताबिक, हवेलियों को होटल में तब्दील करने की वजह से उनका रखराखाव आसान हो जाता है। कमाई के साथ-साथ ही विरासत भी सहेजा जा सका है इस वजह से।

अगले पोस्ट में ऊन उत्पादन की समस्याओं पर कुछ कहना है।

सोमवार, 17 मार्च 2008

बीकानेर की ओर



हमारी टीम को लेकर आई गाड़ी को होटल तक आने में एक घंटे की देर हो गई। इस बीच मैं चार-पांच सिगरेट फूंक चुका था। टीवी पर डीडी का डीटीएच फिट थी, सो मुझे बेहद कम चैनल ही मगजमारी के लिए उपलब्ध थे। बहरहाल, नीचे गाड़ी का भोंपू बजा।

टीम के ज्यादातर सदस्य पचास की उम्र की आसपास के थे, और अपनी उम्र के उस दौर में थे, जिसे टायर और रिटायर होने की उम्र कहा जाता है। मैं थोड़ा निराश हुआ, लेकिन ड्राईवर युवा था.। बहरहाल, मुझे लगता रहा है कि अनुभवों के बावजूद पुराने लोग (डीडी के) काम करने में हेठी समझते हैं। लेकिन मेरे इस भ्रम का बाद में निवारण हुआ।

हमारी गाडी़ अभी अपने पूरे रफ्तार पर थी, हम जयपुर से सौ किलोमीटर आगे निकल चुके थे। थार की निशानियां दीखने लगीं थीं। रेत के टीलों के बीच खेत झांक रहे थे। ये पूरा इलाका बबूल और कंटीली झाडि़यों से भरा पड़ा है।

रास्ते में हम सीकर में चाय पीने के लिए रूके। एक खास डाबे पर जाकर ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी। चाय अच्छी बनी थी, धुं के साथ थकान उड गई। आगे बढ़े। पेड़ों का बौनापन बढता गया। कंटीली झाडियों की आमद ज्यादा हो गई थी। साथियों ने राह में मुझे खेजड़ी के पेड़ भी दिखाए। खेजड़ी राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों का ऐसा पेड़ है, जिसके लगभग हर हिस्से का इस्तेमाल यहां के लोग कर लेते हैं। कमाल का पेड़ है खेजड़ी भी।

बीकानेर पहुंचते-पहुंचते देर हो गई। दोपहर चढ़ आया था। हम सीधे महाराजा करणी सिंहग स्टेडियम चले गए। राह में दीदार हुआ जूनागढ़ किला का। दूर से भव्य किले को जी-भर देखा.. लाल बलुआ पत्थर से बना किला बेहद खूबसूरत है।

बीकानेर.... पश्चिमी राजस्थान का एक रेगिस्तानी शहर.... जो राजपूताने के शाही गौरव का गवाह रहा है। यहां की जीवन शैली और खान-पान में राजस्थान की तहज़ीब की पूरी झलक मिलती है। बीकानेर के रूप में ये शहर सन 1488 में बसाया गया, जब जोधपुर के राजकुमार राव बीकाजी ने 1465 के आसपास इसके आसपास के इलाके को जीत लिया। मुग़ल काल से लेकर अंग्रेजी शासनकाल तक बीकानेर रियासत की अहमियत भारतीय परिदृश्य में बनी रही।

आज़ादी के बाद इस रियासत का भारत मे विलय हो गया। पूरी रियासत चार ज़िलों के रूप में भारत का हिस्सा हैं। लेकिन शहर की स्थापना के बहुत पहले से यह जगह आबाद रही है, जिसके तार सिंधु-सरस्वती सभ्यता तक जाते हैं।

जारी

रविवार, 16 मार्च 2008

बीकानेर की राह में


हाल ही में मुझे एक कवरेज के सिलसिले में बीकानेर जाना पड़ा। जयपुर तक का सफ़र तो शताब्दी से पूरा हुआ। कोई अनुभव नही, अपने-अपने खोलों में सिमटे लोगों से मुलाकात हुई। जयपुर में दिन भर रूकना था। जपुर दूरदर्शन की निदेशक प्रज्ञा जी ने अगली सुबह ४ बजे बीकानेर के लिए निकलने का कार्यक्रम तय कर रखा था। अब मेरे पास पूरा दोपहर और शाम पड़ी थी। चाय-चुक्कड़ सुड़कने के बाद जयपुर के दोस्तों से मिलने का मन बना लिया।

जयपुर के अनेक दोस्तों में से एक हैं राम कुमार। राजस्थान पत्रिका के यशस्वी पत्रकार राम से मेरी मुलाकात एफटीटीआई पुणे में हुई थी। मेरे काल पर जनाब उछल पड़े। शाम को मैं दूरदर्शन के दफ्तर में था। वहां से निपट कर राम कुमार मुझे वहां जवाहर कला केंद्र ले गए।

सर्द शाम को यह अनुभव विलक्षण रहा। प्रह्लाद सिंह टिवाणिया की पुरकशिश आवाज़ में कबीर को सुनना, आह्लादकारी क्षण थे। कबीर की बात, मक्ताकाश मंच, राम का साथ... मजा़ आ गया। जहां पत्रकार जुटें, वहां भोजन की बात न हो तो पूरा वाकया अधूरा लगता है। वहां से फिर हम सवाई मानसिंह स्टेडियम गए। आग तापते हुए राजस्थानी धुनों पर थिरकते लोग, और मनपसंद तत्वसेवन की छूट। कुक्कुट मांस अलग-अलग स्वादों में। मिष्टान्न की भरपूर उपलब्धता।

जयपुर वाले वाकई अच्छे मेहमानवाज होते हैं। गर्म जलेबी... स्वीमिंग पूल के किनारे जलाई आग की सुकूनबख्श गरमाहट..।

मैं अपने सोने की आदतों से परिचित हूं, और एफटीटीआई के दिनों में राम भी अच्छी तरह जान गए थे। तो रात एक बजे वह मुझे होटल तक छोड़ गए, इस वादे के साथ कि अगली मुलाकात और बेहतर होगी। जयपुर के मित्रों की मीठी याद को दिल से लगा कर मैं सोने की कोशिश करने लगा, लेकिन ईसी उपक्रम के दौरान हमारे साउँड ईंजीनियर का फोन आ गया। मैं तैयार होने लगा। जयपुर से बीकानेर का रास्ता तकरीबन चार सौ किलोमीटर है। सड़क के रास्ते  हमें वहां तक जाना था।

रेगिस्तान हमारा इंतजार कर रहा था। और मैंऽ जिंदगी में पहली बार मरुभूमि का दीदार करने के लिए खुद बेचैन था।

जारी