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शनिवार, 10 अगस्त 2013

किसान आत्महत्याः कर्नाटक भी है किसानों की क़ब्रगाह

कर्नाटक में गुलबर्गा जिले के जाबार्गी बाजार में हूं...दरअसल बाजार से थोड़ी दूर है वह जगह। आप चौराहा जैसी जगह कह सकते हैं। सड़के के किनारे बीजेपी के निवर्तमान मुख्यमंत्री (चुनाव के वक्त के मुख्यमंत्री) और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार लिंगायत नेता जगदीश शेट्टार की रैली है।

सूरज ढल रहा है, गरमी बरकरार है। जगदीश शेट्टर मंच पर हैं, सड़कों पर धूल उड़ रही है, रैली खचाखच भरी है। आसपास अपनी गहरी नज़र से देखता हूं, क्या यह भीड़ खरीदी हुई है...लोगों के चेहरे से पता नहीं लगता। हर चेहरा पसीने से लिथड़ा है...किसी चेहरे पर कुछ नहीं लिखा है। सौम्य जगदीश शेट्टर मंच से कन्नड़ में कुछ कहते हैं, (बाद में पता चला, वो कह रहे थे एक लिंगायत को वोट देंगे ना आप?) जनता की तरफ से आवाज़ आती है आवाज नहीं, हुंकार।

स्थान परिवर्तन। जगहः बेल्लारी जिला. हासनपेट, राहुल गांधी की रैली। बांहे चढ़ाते हुए राहुल हिंदी में भाषण दे रहे हैं। पूछते हैं, घूसखोर और बेईमान येदुयरप्पा और उनकी पार्टी (चुनाव से पहले की) बीजेपी को हराएँगे ना आप..जनता फिर हुंकार भरती है। 

यहां भी लोगों के चेहरे पर उदासीनता थी। लेकिन हेलिकॉप्टर की आवाज ने  एक उत्तेजना तो फैलाई ही थी।

इस दौरे में उत्तरी कर्नाटक के जिस भी जिले में गया, चुनावी भागदौड़ के बीच हर जगह एक फुसफुसाहट चाय दुकानों पर सुनने को मिली। कन्नड़ समझ में नहीं आता था, लेकिन स्वर-अनुतानों से पता चल जाता था कि खुशी की बातें तो हैं नहीं।

कारवाड़, बीजापुर, गुलबर्गा, बीदर...सूखा था। किसानों की आत्महत्या के किस्से भी। 

बीजापुर के एक गांव नंदीयाला गया। इस गांव में पिछले साल एक किसान लिंगप्पा ओनप्पा ने आत्महत्या की थी। उसके घर जाता हूं, दिखता है भविष्य की चिंता से लदा चेहरा। रेणुका लिंगप्पा का। अब उनपर अपने तीन बच्चों समेत सात लोगों का परिवार पालने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। पिछले बरस इनके पति लिंगप्पा ने कर्ज के भंवर में फंसकर और बार-बार के बैंक के तकाज़ों से आजिज आकर आत्महत्या का रास्ता चुन लिया। 

लिंगप्पा ने खेती के काम के लिए स्थानीय साहूकारों और महाजनों और बैंक से कर्ज लिया था, लेकिन ये कर्ज लाइलाज मर्ज की तरह बढ़ता गया। बीजापुर के बासोअन्ना बागेबाड़ी में आत्महत्या कर चुके चार किसानों के नाम हमारे सामने आए। इस तालुके के मुल्लाला गांव शांतप्पा गुरप्पा ओगार पर महज 31 हजार रूपये का कर्ज था। नंदीयाला वाले लिंगप्पा पर साहूकारों और बैंको का कुल कर्ज 8 लाख था। इंगलेश्वरा गांव के बसप्पा शिवप्पा इकन्नगुत्ती  और नागूर गांव के परमानंद श्रीशैल हरिजना को भी मौत की राह चुननी पड़ी।


पूरे बीजापुर जि़ले में पिछले साल अप्रैल के बाद से अब तक 13 किसानों ने आत्महत्या की राह पकड़ ली है। पूरे कर्नाटक में यह आंकड़ा इस साल 187 तो 2011 में 242 आत्महत्याओं का रहा था। इस साल, बीदर में 14, हासन मे दस, चित्रदुर्ग में बारह किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। गुलबर्गा, कोडागू, रामनगरम, बेलगाम कोलार, चामराजनगर, हवेरी जैसे जिलों से भी किसान आत्महत्याओं की खबरें के लिए कुख्यात हो चुके हैं।

खेती की बढ़ती लागत और उत्तरी कर्नाटक का सूखा किसानों की जान का दुश्मन बन गया है। पिछले वित्त वर्ष में कुल बोई गई फसलों का 16 फीसद अनियमित बारिश की भेंट चढ गया। और कर्नाटक सरकार ने सूबे के 28 जिलों के 157 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया था। लेकिन राहत कार्यो में देरी ने समस्या को बढ़ाया ही। किसानों की आत्महत्या कर्नाटक में नया मसला नहीं है। पिछले दस साल में 2886 किसानों ने अपनी जान दी है। 

पिछले दशक में बारह ऐसे जिले हैं जिनमें सौ से ज्यादा किसान आत्महत्याएं हुई हैं, ये हैं. बीदर, 234. हासन 316, हवेरी 131, मांड्या 114, चिकमंगलूर 221, तुमकुर 146, बेलगाम 205, शिमोगा 170 दावनगेरे, 136, चित्रदुर्ग 205 गुलबर्गा 118, और बीजापुर 149
लेकिन, किसानों की आत्महत्याएं अब आम घटना की तरह ली जाने लगी हैं और विकास की अंधी दौड़ में हाशिए पर पड़े गरीब किसानों की जान की कीमत अखबार में सिंगल कॉलम की खबर से ज्यादा नही रही हैं। 

कर्नाटक दौरे में यह इलाका, अब मुझे परेशान करने लगा है। गरमी तो झेल लेगा कोई, लेकिन समस्याओं की यह तपिश नहीं झेली जाती।


रविवार, 17 फ़रवरी 2013

किसान ने राष्ट्रपति से की मौत की फ़रियाद

किसान आत्महत्या की खबरे सुनते हैं तो आमतौर पर बुंदेलखंड और विदर्भ याद आते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश आत्महत्या के मानक पर मुझे लगता था कि थोड़ा संपन्न है।

लेकिन, क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश, क्या मेवात, क्या बुंदेलखंड और क्या विदर्भ..देश भर में किसानों की हालत बदतर ही होती जा रही है। मुज़फ़्फ़रनगर से थोड़ी ही दूरी पर है शामली ज़िला। वहीं याहियापुर के दलित किसान हैं, चंदन सिंह।

चंदन सिंह ने भारत के राष्ट्रपति को अर्ज़ी भेजी है कि उन्हें सपरिवार आत्मदाह की अनुमति दी जाए। बुंदेलखंड के उलट याहियापुर के इन किसान चंदन सिंह की आत्महत्या की कोशिश की एक वजह कुदरत नहीं है।

चंदन सिंह गरीबी और तंत्र से हलकान हैं।

हुआ यूं कि सन् 1985 में ट्यूब वैल लगाने के लिए चंदन सिंह मादी ने भारतीय स्टेट बैंक से 10,000 रूपये कर्ज़ लिए। वो कर्ज़ मर्ज़ बन गया। उस रकम में से चार किस्तों में चंदन सिंह ने 5,700 रुपये का कर्ज़ चुका भी दिया था।

लेकिन, इसी वक्त केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बन गई। यूपी में मुलायम मुख्यमंत्री बने। सरकार ने ऐलान किया कि दस हज़ार रूपये से कम के सार कृषि ऋणों की आम माफ़ी की जाएगी। चंदन सिंह का बुरा वक़त वहीं से शुरू हुआ।

चंदन सिंह को लगा कि कर्ज माफी में उनका नाम भी आएगा। चंदन सिंह याद करते हुए बताने लगते हैं, कि किसतरह बैंक के लोगों ने उनसे दो हजा़र रूपये घूस के लिए मांगे थे। घूंघट की आड़ से उनकी पत्नी बताती हैं कि गांव का अमीन भी शामिल था। लेकिन, बहुत हाथ पैर मारने के बाद भी चंदन सिंह 700 रूपये ही जुगाड़ पाए।

जाहिर है, उनका नाम कर्ज माफी की लिस्ट में नहीं आ पाया।

चंदन सिंह इसके बाद किस्तें चुकाने में नाकाम रहे तो पुलिस उन्हें पकड़ कर ले गई। चौदह दिन तक जेल में भी बंद रहे। अनपढ़ चंदन सिंह को लगा कि जेल जाने से शायद कर्ज़ न चुकाना पड़े आगे।

लेकिन, अगले तीन साल तक कोई ख़बर नहीं आई।

सन् 1996 में, बैंक ने उनके 21 बीघे ज़मीन की नीलामी की सूचना उन्हें दी तो वो सन्न रह गए। फिर शुरू हुआ गरीबी का चक्र। कर्ज़ की रकम बढ़कर बीस हज़ारतक पहुच गई। 21 बीघे ज़मीन महज 90,000 रूपये में नीलाम कर दी गई।

भारतीय किसान यूनियन के स्थानीय नेता योगेन्द्र सिंह बताते है कि आत्महत्या के लिए गुहार का फ़ैसला बिलकुल सही है। अगर चंदन सिंह की जमीन उसे वापस ही नहीं मिली तो इसके 13 लोगों के परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा। ये क्या, इसके साथ तो हमें भी मरना होगा।'

चंदन सिंह की पत्नी भी कहती है, जमीन न रही तो बच्चे फकीरी करेंगे, फकीरी से तो अच्छा कि मर ही जाएं। गला रूंध आता है। आंखों के कोर भींग आते हैं। मैं कैमरा मैन से कहता हूं, क्लोज अप बनाओ।

चंदन सिंह का परिवार अब दाने दाने को मोहताज है। बड़े बेटे ने निराशा में आकर आत्महत्या कर ली, बहू ने भी। चौदह साल की बेटी दो सला पहले, कुपोषण का शिकार होकर चल बसी।

चंदन सिंह दलित किसान हैं। लेकिन दलितों की नेता मायावती के वक्त में भी उनकी नहीं सुनी गई। कलेक्ट्रेट में ही उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की थी। पखवाड़े भर फिर जेल भी रह आए, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।

बाद में कमिश्नर के दफ्तर से उन्हें सत्तर हज़ार रूपये (नीलामी के बाद उनके खाते में गई रकम) की वापसी पर ज़मीन कब्जे का आदेश मिला। उन्होंने वो रकम वापस भी कर दी। लेकिन सिवाय उसकी रसीद के कुछ हासिल नहीं हुआ।  कमिश्नर का आदेश भी कागजो का पुलिंदा भर है।


अब चंदन सिंह अपने हाथों में मौत की फरियाद वाले हलफ़नामे लेकर खड़े हैं।

स्टील के गिलासों में चाय भरकर आती है। कैमरामैन अनिल चाय पीने से इनकार करने के मूड में है। मेरे कहने पर पी लेता है।

सूरज तिरछा होकर पश्चिम में गोता का रहा है। सामने खेत में गेहूं की फसल एकदम हरी है। लेकिन चंदन सिंह का मादी की निगाहें खेत को हसरत भरी निगाहों से देख रही है।

सूरज की धूप...पीली है, बीमार-सी।

बुधवार, 7 नवंबर 2012

काश...नया रायपुर की बजाय नया छत्तीसगढ़ गढ़ते रमन

पिछले दो दिन मैं छत्तीसगढ़ में रहा। रायपुर से हटकर रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में एक नया रायपुर गढ़ डाला है। हालांकि, मंच से यह बात भी मंजूर की गई कि यह योजना अजीत जोगी के मुख्यमंत्रित्व काल में बनाई गई थी, इस पर खुश होने और भारत माता की जय और छत्तीसगढ़ महतारी (माता) की जय के तुमुल नाद में भावुक होने के बीच एक बात किरिच की तरह सीने में घुस गई।

रमन सिंह ने नया रायपुर क्यों बसाया। अगर यह इस बात की प्रतीक है की गरीबी से बदहाल देवभूमि उत्तराखंड और नेताओं की घटिया राजनीति झेल रहे राजनैतिक रूप से नाकाम झारखंड के सामने छत्तीसगढ़ को खुद को साबित करना है, तो इस महज एक नया शहर बसाकर साबित करने की जरूरत नहीं थी।

अगर, इक्कीसवीं सदी में देश का पहला योजनाबद्ध शहर बसाना छत्तीसगढ़ के विकास की दिशा दिखाने के लिए है, तो मूलतः गरीबी और बेरोजगारी की वजह से पैदा हुए और आंतक का पर्याय बन चुके नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने की ऐसी ही बड़ी कोशिश बीजेपी सरकार ने क्यों नहीं की।

देश का बाकी का हिस्सा, छत्तीसगढ़ को धान के कटोरे के रूप में भूलने लगा है और अगर आप मध्य प्रदेश से नहीं है तो कलेजे को हाथ लगाकर कहिए क्या आपको पता है कि छत्तीसगढ़ में राम ने अपनी जिंदगी के दस साल बिताए थे, या कि यह राम की मां कौशल्या का मायका यानी राम की ननिहाल है। शायद पता  न हो। हम और आप, और ज्यादातर लोग छत्तीसगढ़ को दंतेवाड़ा, बस्तर और अबूझमाड़ के लिए जानते हैं।

मुख्यमंत्री का दावा है कि छत्तीसगढ़ ने पिछले दस साल में दो अंकों में विकास हासिल किया है। मुख्यमंत्री जी, छोटा सा सवाल है..इस वृद्धि मेंआपने समाज के कमजोर वर्ग को कितना शामिल किया है। या आप भी अर्थशास्त्रियों की तरह मानने लगे हैं कि ऊपरी तबका विकास कर ले, तो रिस-रिस कर वो विकास निचले तबके तक भी पहुंच ही जाएगा।

मुझे नारायणपुर तक जाने का मौका मिला। अबूझमाड़ के पहाड़ और जंगल को आसमान से देखा...और उसी शाम हमारे काफिले के दोनों तरफ नाच-गा रहे आदिवासियों के चेहरे भी। रायपुर के राजभवन में जनजातियों को नृत्य के लिए बुलाया गया था।

जनजातीय नृत्य अपने उछाह और उत्साह के लिए जाने जाते हैं...मुझे राजभवन में आदिवासियों के नाच में से वो उत्साह गायब नजर आया। लगा कि तहज़ीब की पैकेजिंग की जाएगी, तो हश्र कुछ ऐसा ही होने वाला है।

नया रायपुर में नजारा दीवाली से बेहतर था...लाखो की तो आतिशबाजी छोड़ी गई। रमन सिंह जी, काश इतने का केरोसिन खरीद कर मुफ्त बंटवा देते गरीबों में तो उनकी दीवाली भी रौशन हो जाती।

जिस इनक्लूज़िव ग्रोथ की बात आप और पीएम दोनों करते है, उस ग्रोथ को आप विकास में तब्दील क्यों नहीं करते। रायपुर में नया टर्मिनल बना है एयरपोर्ट का, यहां अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी आएंगी, लेकिन कतार में सबसे पीछे खड़ा आदमी आसमान में हवाई जहाज़ को देखकर आखिर करेगा क्या। शायद सिर धुने।

हवाई जहाज की उड़ानें हो, ऊंची इमारतें हो, मुझे इनके होने से कोई उज्र नहीं, लेकिन अबूझमाड़, दंतेवाड़ा, नारायणपुर...और सारे प्रदेश की जनता के लिए कोई रोजगारपरक काम शुरु करवाते रमन सिंह जी, तो सदियां आपकी शुक्रगुजा़र होतीं।


बुधवार, 25 जनवरी 2012

पंजाबः गड्डमड्ड समीकरण

पंजाब मैं पहले भी आय़ा था, लेकिन इसे इतने करीब से देखने का मौका नहीं मिला था। चुनावी हलचल हवा में है, लेकिन बड़े पैमाने पर कहीं भी पोस्टर नहीं दिखे, जो दृश्य पिछले अप्रैल में मैने पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के दौरान देखे थे वो यहां नदारद हैं। 


पंजाब की चुनावी फिजां का रंग जरा हटके है। शिरोमणि अकाली दल (बादल)-शिअद और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन को उम्मीद है कि वह अपनी पिछली कामयाबी को दोहरा पाएंगे। चुनावी रैलियों में भी वो जनता के सामने बिहार और गुजरात का हवाला देते हैं, जहां विकास के मुद्दे पर जनता ने उन्हें दोबारा सत्ता की कुरसी नवाजी।
मोगा में भाजपा-शिअद की रैली


जालंधर की बीजेपी-शिअद रैली में बधिया रोड विच चलावांगा गड्ड़ी हम्मर नूं, यूके वाल बनात्तां शहर जलंधर नूं..का गीत बज रहा था। यानी, निवर्तमान सरकार के नुमाइँदे विकास को मुद्दा बना रहे हैं, वही कांग्रेस ने धीमी विकास दर को चुनावी मुद्दा बनाया है। दोनों ही पार्टियां एक ही मुद्दे् पर वोट मांग रही है। पहली बार धर्म और जाति पीछे और विकास आगे की कतार में है।


इधर, कांग्रेस जीत को लेकर आश्वस्त है। इतनी आश्वस्त कि 25 जनवरी को जालंधर में युवराज राहुल गांधी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को भावी मुख्यमंत्री कह कर पुकारा। हालांकि यह तय था कि होना ऐसा ही है और कैप्टन की पत्नी परणीत कौर का नाम महज ऐंवईं हवा में उछला है-लेकिन अब यह औपचारिक हो गया है।
कपूरथला में सोनिया गांधी ने कहा, केन्द्र की योजनाएँ पंजाब नहीं करता लागू 


सोनिया हों या मनमोहन सिंह या फिर राहुल गांधी सबने केन्द्र की सरकार के कामकाज के आधार पर ही वोट मांगे हैं। मुझे एंटी-इंकम्बेन्सी का उतना असर तो दिखा नहीं कहीं, क्योंकि ग्रामीण पंजाब में अकाली के मजबूत आधार से निबटना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रही है। हालांकि, मनप्रीत बादल ने अकालिय़ों को हलकान जरुर किया है और इतना तय है कि अकालियों के वोट इससे कटेंगे। 

एक सर्वेक्षण के मुताबिक, पंजाब में अकाली-शिअद गठबंधन को 7 फीसद वोटों को नुकसान और कांग्रेस को 2 फीसद वोट का फायदा हो सकता है। इसका मतलब है कि गठबंधन को करीब 27 सीटों का नुकसान झेलना पड़ सकता है और कांग्रेस की 25 सीटें बढ़ जाएंगी। लेकिन यह सर्वे जनवरी के पहले हफ्ते में किया गया था। और अभी के हालात थोड़े बदले-से हैं।


कांग्रेस को सबसे नुकसान होने वाला है दलित वोटों के खिसकने से। जितना नुकसान अकालियों को मनप्रीत की पीपीपी ( पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब) से होने वाला है । तकरीबन उतना बहुजन समाज पार्टी भी कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने वाली है। दूसरी तरफ, कांग्रेस के 23 बागी प्रत्याशी भी मैदान में डटे हैं, जिनमें से एक दर्जन को कैप्टन ने पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया है।


वैसे, यह तय है कि भाजपा अपना पिछला प्रदर्शन दोहरा नहीं पाएगी। उसका जनाधार पहले के मुकाबले थोड़ा खिसका है। मेरा अनुमान है कि इस बार उसे 23 सीटों में से 10 से संतोष करना होगा। अकाली अपना आधार भले बचा लें जाएं, लेकिन सरकार बनाने में उन्हें मुश्किल होगी। 


वाम दलों और पीपीपी का साझा मोर्चा अभी खेल में किसी की नजर में नहीं, लेकिन मुझे लगताहै कि वो किंगमेकर बन सकते हैं। भले ही इनके पास 5-6 विधायक ही हों। 


मौजूदा हालातों में, जिनमें मैं मालवा इलाके की बात बिलकुल नहीं कर रहा क्यों कि मैं उधर गया ही नहीं हूं, माझा-दोआबा के हालातों के मद्देनजर फिलहाल तो मुकाबला बराबरी का लग रहा है। वोटर मुंह खोलने को तैयार नहीं, ऐसे में आखिरी क्षणों में स्विंग होने वाले वोटर ही तय करेंगे कि कमान आखिरी पारी खेल रहे बादल के हाथों जाएगी, या कैप्टन बादलों के बीच से सूरज की तरह उभरकर सामने आएंगे। 

पंजाब में कुल सीटें-117, बहुमत के लिए चाहिए-64
मेरा अनुमान- कांग्रेस-55
शिअद-भाजपा- 52
साझा मोर्चा-6
अन्य- 4





बुधवार, 31 अगस्त 2011

बुंदेलखंड की बेटियां

सरकारी योजनाओं का जंजाल अनपढ़ गांववालों के लिए एक उलझाऊ तानाबाना है।

इसी तानेबाने में फंस कर रह गई उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष वृक्षारोपण योजना। साल 2008 में यूपी सरकार ने 10 करोड़ पेड़ लगाने की योजना बनाई। इस काम में वन विभाग के साथ-साथ विद्युत विभाग, पीडब्ल्यूडी, सिंचाई विभाग, पंचायतें और प्राइवेट ठेकेदार लगे। हर पेड़ की लागत बैठी तकरीबन 600 रुपये..पैसा था मनरेगा और वन विभाग का..लेकिन बुंदेलखंड के किसी जिले में वो 10 करोड़ पेड़ कहीं नहीं दिखते।

इस वृक्षारोपण की मॉनीटरिंग करने वाले पी के सिंह कहते हैं कि उन्हें ज्यादातर पौधे पॉलीथीन बैग समेत ही मिले, उन पर मिट्टी डालने की जहमत भी नहीं उठाई गई थी, उन्हें यूं ही गड्ढों में फेंक दिया गया था।

केंद्र सरकार ने 7,277 करोड़ रुपए का पैकेज पिछले साल नवंबर में बुंदेलखंड को दिया। इनमें से 3,506 करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के हिस्से आएंगे। हालांकि इस रकम से उम्मीदें बढनी चाहिए थीं...लेकिन उम्मीदों से अधिक चिंताओं ने सिर उठाना शुरू कर दिया है।

ये चिंताएं इतनी बड़ी राशि की लूट से जुड़ी चिंताएं हैं, क्योंकि यह रकम भी उसी चैनल के जरिए और उन्हीं योजनाओं पर खर्च होनी है जिनकी कहानी हमने आपको दिखाई है।

2010-11 में केन्द्र सरकार ने बुंदेलखंड को दिए पैकेज से मिले पैसों में राज्य सरकार के 10 विभाग शामिल किए गए। इनकी योजनाओं को 2 साल के लिए मंजूरी मिली। उम्मीद तो जगी लेकिन प्रबंधन की असलियत कुछ और ही है।

बांदा जिले को 2010-11 के लिए 213 करोड़ रुपये आवंटित हुए। जिनमें से पहले साल 10 सरकारी महकमों को 40 करोड़ दिए गए।

पशुपालन विभाग 1.75 करोड़ रुपयों में से महज 4 लाख रुपये खर्च कर पाया। जबकि, भूमि विकास विभाग 5.22 करोड़ में से 2.37 करोड़, लघु सिंचाई विभाग 12.01 करोड़ में से 7.95 लाख, कृषि विभाग 5.30 लाख में से 3.20 करोड़, सिंचाई विभाग 12.89 करोड़ में से 9.72 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाया।

इस तरह बांदा जिले को आवंटित 40.38 करोड़ रुपयों में महज 29.73 करोड़ ही खर्च हो पाए और 10.65 करोड़ रुपये बगैर खर्च हुए वापस चले गए। पशुपालन विभाग को पैकेज के तहत 28 कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र खोलने थे और इसके लिए 1 करोड़ 44 लाख रुपये उसे मिले भी, लेकिन पशुपालन विभाग एक भी गर्भाधान केन्द्र खोलने में नाकाम रहा।

जिस क्षेत्र में और जिस काम में सरकारी मशीनरी नाकाम रही, वहीं कुछ लोगों के व्यक्तिगत प्रयासों ने साबित किया कि हिम्मत और लगन हो, इच्छा हो तो कोई भी काम नामुमकिन नहीं रहता।

हालांकि, इन व्यक्तिगत प्रयासों से बुंदेलखंड की हर समस्या का स्थायी समाधान मुमकिन नहीं, लेकिन ये प्रयास उम्मीद जगाते हैं..और नई राह दिखाते हैं।

नई राह दिखाने वाली शख्सियतों में से एक हैं नीतू सक्सेना। उनकी दुबली काया पर मत जाइए, एमए पास यह लड़की बुंदेलखंड की असली बेटी है। फौलादी इरादों वाली नीतू ने अपने आस-पास आत्महत्याओँ का दौर देखा। पिता के भी उसी राह चले जाने के डर ने उनके अंदर एक नई राह को रौशनी दिखाई।

नीतू सक्सेना ने अपनी सहेलियों रीना और गुड़िया परिहार के साथ घर-घर जाकर पहले तो कर्जदारों और भूखे परिवारों की सूची बनाई। इनमें से उनके गांव में छह परिवार बूखमरी के शिकार निकले। नीतू ने इसके लिए नई राह खोज निकाली।

महिलाओं को दादरा यानी गाने बजाने के लिए इकट्ठा किया। बुंदेलखंड में दादरा के दौरान आखत की परंपरा है। यानी गाने के लिए आने वाली महिलाएं अपने साथ अनाज लाकर इकट्ठा करती है, जो बुलावा देने वाले नाई का होता है। लेकिन यहीं नीतू ने एक छोटा-सा बदलाव किया।

आखत में आने वाला अनाज नीतू ने भूखे परिवारों में बांट दिया। नीतू का यह प्रयास आज अगल-बगल के 58 गांवों में फैल चुका है। लेकिन, नीतू सिर्फ अनाज बांट कर ही चुप नहीं बैठी..। उन्होंने महिलाओं को साथ लेकर आसपास के नलों के पास बेकार पड़े पानी को जमा करने के लिए वॉटर रिचार्ज पिट बनाए। इससे सूखे पड़े नल भी जी उठे।


...सवाल है कि बुंदेलखंड को क्या चाहिए...बुंदेलखंड को ईमानदार कोशिशों की जरुरत है। साफ-सुथरी सरकारी मशीनरी अगर आम लोगों को साथ लेकर कोशिश करे तो सूखता जा रहा बुंदेलखंड शायद फिर जी उठे। समाज को पानीदार बनाने की कोशिशे...और लोगो के साथ की जरुरत है बुंदेलखंड को। वरना अकाल पड़ने से ज्यादा खतरनाक है अकेले पड़ जाना। 

संकट के समय समाज में एक दूसरे का साथ निभाने की परंपराएं पूंजी की तरह थीं...संवेदना की इस पूंजी के सहारे हमने कई बड़े संकट पार किए हैं। लेकिन सवाल है कि मशीनरी में आए ईमानदारी के अकाल का क्या करें..सवाल ये भी है कि संवेदना की पूंजी हमारे पास बची भी है या नहीं।



गुरुवार, 18 अगस्त 2011

राहत के सूखे चैक- बुंदेलखंड का सच

बुंदेलखंड का त्रासदी सिर्फ बारिश की कमी ही नहीं है। प्रशासन में समझदारी और संवेदनशीलता की कमी हालात को बदतर बना रहे हैं। सरकारी मशीनरी के चक्कर में आम जनता चकरघिन्नी बनी है।सूखा राहत में 12 रुपये के चैक किसानों को दिए गए हैं..ये आखिर माजरा क्या है?


2002 से ही सूखे की स्थिति से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने सूखा राहत अभियान चलाया..और किसानों को इसके लिए मुआवजा भी दिया। लेकिन..10 बीघे के काश्तकार के लिए सूखा राहत की रकम अगर 12 रुपये हो तो... तो आपको ये एक मज़ाक लग सकता है।

..थोड़ा कड़वा सही, लेकिन सच यही है कि सूखा राहत के नाम पर किसानों को 12, 15, 27, 30 और 39 रुपये के चैक राज्य सरकार ने दिए हैं। मालूम हो कि इन चैकों को भुनाने के लिए खुलने वाले बैंक खाते का खर्च 500 रुपये आता है।

सुशील कुमार, मंझोले किसान हैं। उनके तीन भाईय़ों को सरकार ने 30-30 रुपये के सूखा राहत चैक दिए। चैक तुलसी बैंक का है। सुशील कहते हैं, ये राज्य सरकार ने हमारे साथ अच्छा मजाक किया है, सूखा राहत के नाम पर।

लेकिन बुंदेलखंड में सूखे से राहत पाना कोई मजाक नहीं।

पानी की समस्या से निजात पाने के लिए ही बड़े किसानों ने ट्यूब वैल का सहारा लिया। ट्यूब-वैलों के बढ़ते चलन से भूमिगत जल का दोहन बढता गया...और अब यह जलस्तर खतरनाक तरीके से नीचे जा रहा है। 

 
पूरे यूपी-बुंदेलखंड में समूचे खेती लायक ज़मीन का 41 फीसदी ही सिंचित है। कुल सिंचित भूमि का 48 फीसद नहरों से, 4 फीसद कुओं से, 7 फीसद निजी स्रोतों से और 41 फीसद बाकी के दूसरे साधनों से सींचा जाता है। ट्यूब वैल और पंपिंग सैट इन्ही बाकी के 41 फीसद में आते हैं।

जाहिर है, भूमिगत जल पर दबाव काफी बढा है।

साल 2003 में बांदा में भूमिगत जलस्तर 0.75 मीटर, चित्रकूट में 1.05 सेमी, महोबा में 2.11 सेमी, और हमीरपुर में 1.55 सेमी था। साल 2005 में भूमिगत जलस्तर घटकर बांदा में 1.02 सेमी, चित्रकूट में 1.79 सेमी, महोबा में 1.89 सेमी, और हमीरपुर में 1.59 सेमी हो गया। जबकि, 2006 में इसी ट्रेंड में बांदा में यह 1.62 सेमी, चित्रकूट में 2.19 सेमी, महोबा में 2.09 सेमी, और हमीरपुर में 1.69 सेमी तक चला गया।

बारिश की कमी से भूमिगत जलस्तर रिचार्ज नहीं हो पा रहा..और सूखे की वजह से लगातार हो रहे दोहन ने धरती का कलेजा तार-तार कर दिया।

अब यह कुदरत का कहर है या धरती के भीतर से लगातार खींचे जा रहे पानी की वजह, बुंदेलखंड में धरती कई जगहों पर फट पड़ी है। सूखे के बाद कुदरत का ये एक और क़हर बुंदेलखंड के लोगों को डरा रहा है। 

क्या बुंदेलखंड को सूखे से बचाने का एकमात्र ज़रिया बारिश ही है..? क्या कोई और उपाय नहीं..? उपाय है..और था।

बुंदेलों ने इस सूखे इलाके को हरा रखने के पुख्ता इंतजाम किए थे। तालाब बनाकर। लेकिन बदलते राज और समाज ने तालाबों को बिसरा दिया।


सूखे की वजह से पूरे बुंदेलखंड के करीब 2 लाख 80 हजार कुओं में से अधिकतर बेकार पड़ गए हैं। हालांकि, कुछ खर्च से उन्हें फिर से इस्तेमाल के लायक बनाया जा सकता है। लेकिन, ठेकेदारों और अधिकारियों के लिए नए कुएं-तालाब खुदवाना फायदे का सौदा होता है।

इसकी मिसाल हैं कुलपहाड़ तहसील के बरजोरा करन। बुंदेलखंड में सरकार की 30,000 कुएं खोदने की योजना के तहत बरजोरा करन की जमीन में कुएं खोदने को मंजूरी मिली। लेकिन पानी नहीं निकला...क्योंकि बरजोरा करन के बेटे ने 5 हजार की रिश्वत देने से इनकार कर दिया था।

ठेकेदार ने उनके पहले से ही खुदे हुए सूखे कुएं में थोड़ी खुदाई कर दी, और फिर उसे वैसे ही छोड़ गए।

बरजोरा के भाई इस समझौते के लिए तैयार थे...ऐसे में थोड़ी ही दूर पर उनके खेत में खुदे कुएं में पानी निकल आया।


ऐसी गड़बडियों का विस्तार तालाब की तरह चौड़ा है। राज्य सरकार की योजना थी, 30 हजार तालाब खुदवाने की। नारा था, खेत का पानी खेत में। इसके तहत ठेकेदारों के ज़रिए मॉडल तालाब खुदवाए गए।

इन मॉडल तालाबों के चारों ओर बाड़ लगी है। तर्क ये कि इससे तालाबों के किनारे लगाए गए पेड़ सुरक्षित रहेगे। ..लेकिन बाड़ से घिरी इस जमीन से पेड़ भी अदृश्य हैं, पानी भी..। इस जमीन को तालाब कहना बहुत मुश्किल है..जब तक कि यहां मॉडल तालाब का साइन बोर्ड न लगा हो।

खेत का पानी खेत में के नारे ने कई छोटे किसानों के खेत छीन लिए। तालाब खुदवाने के दौरान स्थानीय लोगों के तजुरबे को तवज्जो नहीं दी गई। नतीजा ये कि तालाब सबसे ऊंची जमीन पर खोद डाले गए। नतीजतन ये तालाब बारिश का पानी मापने के कटोरे बनकर रह गए हैं। कई किसान अब इन तालाबों की वजह से अपना सर पीट कर रह गए हैं।


तालाबों के ये काम मनरेगा के पैसे से किए गए थे। सोच ये थी कि शायद इससे सूखे से त्रस्त लोगों को थोड़ी राहत मिल जाएगी।

लेकिन महोबा जिले में मनरेगा लागू करने वाली पंचायत ही गड़बडियों की जड़ साबित हो रही है। जिले के बेलाताल विकास खंड के बमहोरी गांव में कच्ची सड़क बनाने का काम चल रहा है। लोग मनरेगा में काम तो कर रहे हैं...लेकिन उनके पास जॉब कार्ड नहीं है। सवाल है कि अगर जॉब कार्ड नहीं है तो मजदूरों को भुगतान कैसे होता है..? भुगतान होता है नकद, जो कि मनरेगा के निर्देशों का खुला उल्लंघन है।

मनरेगा के तहत काम कर रहे मजदूरों में महिलाएं भी हैं। लेकिन, न तो पानी पिलाने वाले की व्यवस्था है न बच्चों की देखभाल करने वाले की। मेडिकल किट की बात तो भूल ही जाइए। पंचायत सदस्य खुद काम के मेट बने हैं..इसके लिए रोजाना सौ रुपये उन्हें मिलते भी हैं, लेकिन हमें उनसे सवालों के जवाब नहीं मिलते। 

इस काम में बच्चे भी लगे हैं। काम में बच्चों का लगाना भी मनरेगा के निर्देशों का खुला उल्लंघन है। बच्चों का पैसा उनके मां बाप को मिलता है। खाता नहीं है, जॉब कार्ड नहीं है..

भुगतान होता कैसे हैं..मेट साहब के पास फिर से जवाब नहीं..। मजदूरों का पिछला भुगतान भी बकाया है.. मेट साहब के पास इसका भी जवाब नहीं. वो ब्लॉक दफ्तर पर टालते हैं।

कुलपहाड़ तहसील में ही कर्रा गांव कौशल किशोर चतुर्वेदी बैंक के हाथों ट्रैक्टर और साढे तीन एकड़ जमीन गंवाने के बाद कौशल खेती छोड़कर मजदूरी में लगे। अब मनरेगा की मजदूरी उनके उसी बैंक के खाते में आई जिससे उन्होंने कर्ज लिया था। अब बैंक पहले उनसे कर्ज चुकाने को कह रहा है, उसके बाद ही वह मनरेगा की मजदूरी का भुगतान करेगा।

अब कौशल किशोर बकाया रकम केलिए बैंक का चक्कर काटने का भी कोई फायदा नहीं देखते। निराश आंखों से अपने बाकी के खेतों की तरफ देखते हैं।

कर्रा गांव के ही अमर सिंह, 2008-09 से ही मनरेगा के तहत किए गए अपने काम की मजदूरी के लिए भटक रहे हैं..वह न तो उनके जॉब कार्ड में दर्ज है न वन विभाग वाले बता रहे हैं। टालमटोल का यह खेल, चिंता पैदा करता है।

बेसहारा हनसू की वृद्धावस्था पेशन पिछले तीन साल से बंद है। उनकी सुनने वाला कोई नहीं। अनपढ़ गांववालों के लिए यह सब एक उलझाऊ तानाबाना है।

जारी....

सोमवार, 15 अगस्त 2011

चल उड़ जा रे पंछीः बुंदेलखंड का सच

पिछले पोस्ट से आगे...

बांदा जिले में ही सूखे की कहानी का यह सबसे बुरा किस्सा है। गांव में सारे पानी के स्रोत सुख गए। एक धनी-मानी घर को छोड़कर, सिर्फ एक तालाब बचा था, जिसमें पानी गड्ढे में बचा था। उसके लिए भी मारा-मारी।

पानी की मारामारी में कभी पानी मिल पाता कभी नहीं। उस पैसेवाले के घर के पास ही रहती थी वह महिला। पड़ोस से पानी, जेट पंप से लेना आसान भी था, और साफ पानी भी मिल जाता था। एक दिन मौका देखकर उस घर के मनचले नौजवान ने महिला को छेड़ दिया। महिला चुपचाप चली आई। तीन-चार दिन वह पडोसी के घर पानी लेने नहीं गई। लेकिन कोई रास्ता न था।

पानी फिर लेने गई तो वह नौजवान ढीठाई पर उतर आया था। आखिरकार, एक बाल्टी की पानी एक महिला की इज्जत बैठी।

इस खबर ने बुंदलेखंड के लोगों को आंदोलित किया, और कई गांवों में तालाब खोदने जैसे प्रयास शुरु हुए। लेकिन प्यास बुझाने का कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं हो पाया।


भूख और प्यास ने बुंदेलखंड के लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल की आंतरिक समिति की रपट के मुताबिक झांसी जिले से 5 लाख 58 हजार, ललितपुर से 3 लाख 81 हजार, हमीरपुर से 4लाख 17 हजार, चित्रकूट से 3 लाख 44 हजार, जालौन से 5 लाख 38हजार, बांदा से 7 लाख 37 हजार, और महोबा से 2 लाख 97 हजार किसान अपना घर-बार छोड़कर बाहर निकल चुके हैं।

यानी सात जिलों की 82 लाख की आबादी में से 32 लाख लोग बुंदेलखंड से बाहर रह रहे हैं। यह पूरी आबादी का 40 फीसदी से ज्यादा है।

वीर आल्हा-ऊदल की धरती....जिन्होंने कभी मैदान में पीठ नहीं दिखाई। उन्हें पानी अपनी धरती छोड़ने पर मजबूर कर रहा है। जिन्हें हमलावरों की फौजे हरा नहीं पाई...उन्हें पानी ने हारने पर मजबूर कर दिया है।

पानी की कमी ने बुंदेलखंड के अतर्रा इलाको को भी बदल डाला है।  अतर्रा डेढ़ दशक पहले तक एशिया की दूसरी सबसे बड़ी धानमंडी हुआ करती थी। उस वक्त तक यहां 37 चावल की मिलें हुआ करती थीं। लेकिन आज की तारीख में सारी की सारी बंद हो चुकी हैं।

अतर्रा के मिलों के सारे पल्लेदार (चावल मिलों में काम करने वाले) बेरोज़गार हो गए हैं। जाहिर है, वह अब अगल बगल के शहरों इटावा के ईंट भट्ठों का रुख कर रहे हैं, या फिर दि्ल्ली जैसे शहरों में रिक्शा चला रहे हैं। दरअसल,. पिछले कुछ साल में बुंदेलखंड में नहरों का कमांड एरिया सिकुड़ गया है। 

बुंदेलखंड का यह इलाका एशिया में बांधों की सबसे ज्यादा घनत्व के लिए जाना जाता है। बांध की तली में जमी गाद  से बांधों की क्षमता बहुत कम हो गई है। साथ ही नहरों में भी जमा गाद की बरसों से सफाई नहीं हुई है। ऐेसे में पानी कम खेतों तक ही पहुंच पा रहा है। 

राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बांदा जिले में पिछले साल कुल 3.4 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में से सिर्फ 27 हजार हेक्टेयर भूमि को ही इन बांधों से पानी मिल पाया था।


सिंचाई विभाग के लोग ऐसे में किसानों को बताना भी ठीक नहीं समझते। पहले जब बारिश ठीक होती थी, या नहरों का पानी इतना कम नहीं आता था तो किसान धान की फसल के लिए बीज खेतों में डालते थे, लेकिन जब बिचड़े खेतों में ही सूख जाने लगे, तो पता लगा नुकसान बहुत गहरा है। 

(पंद्रह साल पहले तक बुंदेलखंड में 54 दिन बरसात के होते थे। लेकिन अब ...बरसात के ये 54 दिन घटकर 20 हो गए हैं।)

नहरों और बांधों की क्षमता पहले से 65 प्रतिशत कम हो गई है, और धान का उत्पादन पहलेसे महज 30 फीसद ही रह गया है। ...अतर्रा का मशहूर सेला चावल बीते दिनों की बात हो गई है। यहां के किसान पुराने जमाने की शरबती और ऐसी ही दुर्लभ धान की नस्लों को याद कर आह भरते हैँ। 



बुधवार, 10 अगस्त 2011

बेपानी होते समाज की कहानीः बुंदेलखंड का सच

पिछली पोस्ट से आगे...

 पानी की कमी ने बुंदेलखंड के समाज को बेपानी बना दिया है। बादल रुठे, तो केत वीरान हो गए। हर गांव में कई बदोलन बाई हैं, जो भूख से रिरियाती फिर रही हैं, कहीं बच्चों को घास की रोटी खाने पर मजबूर होना पड़ रहा है..यह सब उस देश में जहां पॉपकॉर्न और पित्सा कल्चर पॉपुलर कल्चर के नाम से जाना जा रहा है। क्या हमें शर्मिन्दा होना चाहिए?

हमारे एक ब्लॉगर दोस्त राहुल सिंह ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि क्या बुंदेलखंड में यह समस्या हमेशा से रही है? क्या यह इलाका पहले से खुशहाल रहा है...?

मुमकिन है मेरे पोस्ट से उन्हें एक एक कर जवाब मिलता जाएगा। 
बुंदेलखंड के ज्यादातर लोग खेती करते हैं...तकरीबन 85 फीसदी लोगों के पेट भरने का ज़रिया खेती ही है। लेकिन, पिछले कई साल से बादल रुठ गए..खेत वीरान हो गए। 

सूखा...जिसने किसानों के हलक सुखा दिए। हालांकि, सूखा बुंदेलखंड के लोगों के लिए नई बात नहीं है, नई बात जो है वह है इससे होने वाली तबाही। सूखे ने उत्तर प्रदेश के हिस्से के बुंदेलखंड की आधी से ज्यादा खेती को तबाह कर दिया है। 

गहराते सूखे को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2008 में एक केंद्रीय टीम बनाई। 2008 में आई उसकी रिपोर्ट के मुताबिक, 19वीं और 20वीं शताब्दी के 200 वर्षों में इस इलाके में केवल 12 साल सूखे के थे। यानी इस दौरान  सूखा हर 16 साल में एक बार पड़ता था। लेकिन 1968 से लेकर पिछली सदी के आखिरी दशक में हर पांचवां साल सूखा रहने लगा। 

....और अब तो पिछले दस साल से बुंदेलखंड पानी की बूंद-बूंद को तरस रहा है।

पिछले दशक भर से बारिश की मात्रा साल दर साल कम होती गई है। बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश के सात जिलों की बारिश की मात्रा बताती है कि स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैँ।

साल 2 हजार तीन-चार में औसत सालाना बारिश की मात्रा 987 मिलीमीटर थी, जबकि साल 2 हजार 4-05 में यह 530 मिलीमीटर, 2005-06 में 424 मिलीमीटर, 2006-07 में 330 मिलीमीटर, 2007-08 में 240 मिलीमीटर ही हुई।


सूखे की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बुंदेलखंड के अधिकतर किसान पिछले साल खरीफ फसल की अपनी लागत भी हासिल नहीं कर पाए। खेती चौपट होने के कारण आपदा जैसी स्थितियां तो बननी ही हैं।

..आपदा जैसी इस स्थिति ने बदोलन बाई का परिवार ही उजाड़ दिया। 
बदोलन की भूख से देश को शर्मिन्दा होना चाहिए.


बदोलन बाई का घर किसी भी कोण से झोंपड़ा भी नहीं लगता। तीन तरफ की गिरी हुई दीवारों ने घर को खंडहर कहलाने लायक नहीं छोड़ा है। 

चित्रकूट जिले के पवा गांव की बदोलन के पति भूमिहीन मजदूर थे। कई साल से चल रहे सूखे ने जब 2007 में भयावह रुप अख्तियार किया तो बदोलन के पति को मजदूरी मिलनी भी बंद हो गई। पूरा परिवार भुखमरी की चपेट में आ गया।

..आखिरकार बदोलन के पति को आखिरी बार भूख लगी...। पिता की मौत के बाद बदोन का बड़ा लड़का दिमागी संतुलन खो बैठा, छोटा दिल्ली जाकर रिक्शा चलाने लग गया।

अब गांव में बदोलन अकेली भूख से जूझ रही है। उसके विक्षिप्त हो चुके लड़के को गांववाले दया से कुछ खिला देते हैं। लेकिन, ये सारी स्थिति बयान करते समय विगलित होने का दौर आता है। उम्र में मेरी दादी जैसी बदोलन कभी मेरे तो कभी अभय निगम (कैमरामैन) के पैरों पर गिरी जाती है। 'सब राज-काज चलत दुनिया में, एक हमारे सुधि न ले है कोई...' उसकी शिकायत में भारतीय प्रजातंत्र का पोस्टमॉर्टम हो जाता है।




मेरे मन में एक साथ शर्मिंन्दगी और गुस्से के भाव आते हैं। व्य़वस्था के खिलाफ़ मेरे मन में एक और परत बैठ जाती है।

लेकिन भूख से जूझने वाली बदोलन अकेली नहीं है। चित्रकूट के पाठा इलाके में कई ऐसे घर हैं, जहां के बच्चों को खर-पतवार यानी चौलाई की रोटी खानी पड़ रही है। घर में आटे की कमी है, लेकिन भूखों की पेट का क्या करें...जंगली खर-पतवार को पीसकर आटे में मिलाकर खाने का बंदोबस्त किया जा रहा है। 

तीन-चार घरों में जाता हूं, महिलाएं सिल-बट्टे पर चौलाई कूटती हैं, उसे आटे में मिलाकर रोटियां तैयार करती हैं। दिखने में यह रोटीपालक-परांठे जैसा ही है, लेकिन घास की रोटी मूलतः घास की रोटी होती है। दिखने में चाहे जैसी हो...।


मुझे याद आते हैं दिल्ली के मॉल्स में घूमते वो बच्चे, कैप्री पहने बच्चे, कई सौ रुपये की आइसक्रीम पर हाथ साफ कर जाने वाले, सिनेमा देखने जाएं तो मल्टीप्लेक्स में पॉपकॉर्न के साथ कोक के कॉम्बो ऑफर के लिए सैकड़ों खर्च कर देने वाले, अपनी ही उम्र के न जाने कितने बच्चों की रोटी का हिस्सा खा जा रहे हैं। 



मौज-मजे के लिए पॉपकॉर्न खाने के आदी हो रहे देश में यह घटना दिल दहला देने वाली है।

बेपानी होते समाज की कहानी
यह भूख अकेली नहीं, इसका साथ दे रही है प्यास..।


यूपी-बुंदेलखंड के सात जिलों के कुल 4551 गावों में से करीब 3 सौ में ही साल भर पीने का पानी रहता है, जबकि 74 गांवों में सिर्फ एक महीने पीने का पानी मिलता है।

पानी के संकट का सबसे बडा असर पड़ता है महिलाओं पर। उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी का बड़ा हिस्सा पानी ढोने में गुज़र जाता है। 

पूरे बुंदेलखंड के लगभग 2 लाख 80 हजार कुओं में से अधिकतर बेकार पड़ गए हैं - या तो मरम्मत के अभाव में वे गिर गए हैं या वे सूख गए हैं। 

पानी का संकट पूरे बुंदेल समाज को बेपानी बना रहा है। पूरा समाज पानी के लिए तरस रहा है। लोग गंदा पानी पीने के मजबूर हैं। 

आपने शायद पहले कभी देखा न होगा...कि एक ही गड्ढे से सूअर और इंसान दोनों ही पानी पी रहे हैं। लेकिन सड़क के एक ओर गड्ढे से पानी लेती लड़की को देखता हूं, पानी बेहद गंदा है। उससे भी जुगुप्सापूर्ण बात ये कि लड़की के ठीक पीछे पानी पी रहा सूअर दिखता है। 

सारी मानवीयता भूलकर मैं राजकुमार पर चिल्लाता हूं, शूट कर, शूट कर, विजुअल बना। वह पूरी ईमानदारी से अपना काम करता है। मेरे अंदर का आदमी धीमी मौत मर रहा है उस वक्त। उस वक्त मैं सिर्फ एक रिपोर्टर की तरह देख रहा हूं। 

बोतलबंद पानी के बढ़ते बाजार भारत में मैं अगर अमानवीय रुख अपना रहा हूं, तो यह घटना अमानवीयता से कुछ ज्यादा ही है। 

हम केन नदी तक पहुंचते हैं। कुछ लोग पीने के लिए पानी ढोकर ले जा रहे हैं। पानी बैलगाडियों से ढोई जा रही हैँ। किनारे गंदा पानी है, मछलियां मरी पड़ी है, बगल में बैल भी पानी में घुसे हैं, कुछ लोग नदी की बीच धारा से पानी ले कर आ रहे हैं, कमर भर पानी में घुस कर...इन लोगों को लग रहा है कि शायद नदी की बीच धारा से पानी लाने पर उसकी गुणवत्ता बोतलबंद पानी जैसी हो जाएगी। 

पानी ढो रहगी महिला शिकायत करती है, सारे नल और कुएं सूख चुके हैं। इसी पानी में मुरदे पड़े रहते हैं...लेकिन पानी कहीं और मिलता ही नहीं। पानी के इसी संकट ने कई बार आबरु का व्यापार भी करवाया है। एक बाल्टी पानी रके लिए एक महिला को अपनी इज़्ज़त तक दांव पर लगानी पड़ी। लेकिन वह कहानी अगली कड़ी में।




जारी....

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

बुंदेलखंड का सच-अंतर्गाथा चौथी किस्त


पिछली पोस्ट से जारी...

देश की प्रतिव्यक्ति आमजदनी से यूपी-बुंदेलखंड की प्रतिव्यक्ति आय तीन गुनी कम है। यह तो सिर्फ आंकड़ा है, जमीनी हकीकत ज्यादा बदतर है

गढा़ गांव से हम निकले तो बारिश ने इलाके की काली चिकनी लसेदार मिट्बुंटी से गठजोड़ कर लिया था। हमारी गाड़ी घुटनों (पहियों ) तक धंस चुकी थी। आसपास के गांववालों ने मदद की। खुद पुष्पेन्द्र भाई भी कपड़े घुटनों तक चढा कर मैदान में कूदे। कार को धकेलते घसीसते हम उसे पक्की सड़क तक ले आए। 


लेकिन इस कसरत में जितना तन थका, उससे ज्यादा मन थका था। वापसी में में सोचता रहा कि आखिर क्या वजह है इस इलाके में बढी हुआ आत्महत्याओं के पीछे। 


बैंक और साहूकारों के कर्जों को इऩ आत्महत्याओं के पीछे मानने की खासी वजहें हैं।

मिसाल के तौर पर, बांदा जिले के खुरहंड गांव के इंद्रपाल तिवारी को अपने 9 बीघे जमीन के लिए ट्रैक्टर की कोई खास जरूरत नहीं थी, लेकिन एक ट्रैक्टर एजेंट के दबाव में आकर उन्होंने 2004 में अतर्रा स्थित भारतीय स्टेट बैंक से इसके लिए 2 लाख 88 हजार रुपए कर्ज लिए। फसलों से बीज तक न निकल पाने के कारण उनकी हालत खस्ता थी इसलिए वे उसकी किस्तें नहीं चुका पा रहे थे। 

आखिरकार 2006 में झांसी स्थित मेसर्स सहाय एसोसिएट्स के कुछ लोग तिवारी के पास आए और खुद को बैंक का आदमी बताकर उनका ट्रैक्टर छीन कर ले गए। तिवारी ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से आरटीआई कानून के तहत बैंक से जानकारी मांगी। पता चला, बैंक ने रिकवरी एजेंसी सहाय एसोसिएट्स के जरिए ट्रैक्टर को तिवारी से लेकर 1 लाख 99 हजार रु में नीलाम कर दिया था।
यह तो एक बानगी भर है...ऐसे कई मामले हैं, जिनमें बैंको का मनमाना रवैया सामने आता है।

बुंदेलखंड के ग्रामीण बैंकों की किसानों पर मौजूदा कुल बकाया रकम 4,370 करोड़ रुपये से ज्यादा ही है। यह 2010 के कुल बकाया रकम 3,613 करोड़ रुपये से 21 फीसदी ज्यादा है।

बांदा जिले में मार्च 2011 तक बैंक की रकम वापस करने में नाकाम रहने वाले कर्जदारों में एक लाख से ज्यादा लोग छोटे और सीमांत किसान हैं, और इन पर बैंकों का 453 करोड़ रुपया बकाया है। बांदा जिले में 31 मार्च 2011 तक खेती के काम के लिए दिए गए कुल बकाया कर्ज की रकम 740 करोड़ से ज्यादा थी।

पड़ोसी जिलों जालौन, ललितपुर, झांसी हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट में भी स्थिति इतनी ही बदतर है। जालौन जिले में किसानों पर बैंको का करीब 866 करोड़, झांसी में 776 करोड़, ललितपुर में 645 करोड़, हमीरपुर में 575 करोड़, महोबे में 455 करोड़ और चित्रकूट में 311 करोड़ रुपये बकाया है।

आखिर, बुंदेलखंड की यह हालत कैसे हुई..। लोग बैंको का कर्ज क्यों नहीं चुका पा रहे।

कहते हैं कि प्रतिव्यक्ति आय से इलाके की खुशहाली का पता चलता है। बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले सात जिलों में चित्रकूट जिले में प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 9106 रुपये है। जबकि इन सात जिलों में बांदा में यह 14,117 रुपये, जालौन में 16,711 रुपये, महोबा में 15,744 रुपये, हमीरपुर में 15,984 रुपये, ललितपुर में 14,872 रुपये और झांसी में 21,397 रुपये हैं।

जबकि भारत के प्रतिव्यक्ति आय की बात करें तो जिस दौरान के आँकड़े मैंने दिए हैं, उस दौरान यानी 2009-10 में 46, 533 रुपये था। 2011 के फरवरी में देश की प्रतिव्यक्ति आमदनी 54 हजार रुपये के आसपास है। 

लेकिन प्रतिव्यक्ति आय का यह आंकड़ा भी महज एक झलकी भर है। ज़मीनी हक़ीक़त इन आकड़ों को और भी डरावना बनाते हैं...

शनिवार, 30 जुलाई 2011

बुंदेलखंड का सच-अंतर्गाथा तीसरा हिस्सा

पिछले पोस्ट से आगे---

सिर्फ प्रह्लाद सिंह जैसे जीवट वाले इंसान ही हैं, जो त्रासदी से निपट रहे हैं। उन्ही के गांव गढ़ा की राजकिशोर ने जीने की हर उम्मीद छोड़ दी है। राजकिशोर के पति ने अपनी खेती को बेहतर बनाने के लिए एजेंटों के झांसे में आकर ट्रैक्टर खरीद तो लिया, लेकिन साल-दर-साल के सूखे ने जिंदगी को भी नीरस बना दिया। तिस पर, ट्रैक्टर नीलामी के लिए हर हफ्ते आने वाले नोटिसों ने जीना हराम कर रखा था।

एक दिन ऐसा हुआ कि राजकिशोर के पति का ट्रैक्टर चोरी हो गया। शाम को वे घर तो लौटे लेकिन देर रात उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। अब राजकिशोर और उनकी युवती होती बेटी के लिए रोजी-रोटी मुहाल है। इज्जतदार किसान की विधवा घर-घर जाकर झाडू-कटकी करती है। लेकिन जिनके घर में वह झाडू-कटकी करती हैं, उनकी भी हालत कोई अच्छी नहीं। राजकिशोर अपनी बेटी के विवाह की चिंता में घुली जाती हैं। हमसे बातें करते समय उनकी आंखों से उनकी मजबूरी बह निकलती है।

हमारे बगल में ही सुरादी बैठे हैं। उनके घर में दो मौते हुई हैं। राज्य सरकार के अधिकारी उनके घर की आत्महत्याओं को गृहकलह का नाम देती है।

सुराजी के घर में अब कोई नहीं। बीवी बहुत पहले भगवान को प्यारी हो गई। एकमात्र पोती को ब्याह कर उऩका बेटा निश्चिंत हो गया था। लेकिन, एक दिन जब बेटे के बेटी दामाद घर आए तो सूखे की वजह से हालात बदतर हो चुके थे। पिछले ही साल की बात है।
बुंदेलखंड में किसानों की मौत का जिम्मेदार कौन है?


....सुराजी की आंखें डबडबा जाती हैं। पिछले ही साल, पोती और उसके पति पहली बार अपने घर आए, घर में सेर भर भी गल्ला नहीं था। इसी संकोच के मारे सुराजी के बेटे ने पास के नीम के पेड़ से फांसी लगा ली। ...सुराजी तर्जनी से सामने नीम का पेड़ दिखाते हैं। पिता की आत्महत्या के अपराधबोध से पोती ने भी जान दे दी। सुराजी के साथ-साथ वहां दालान पर जमा पूरा समुदाय रो पड़ा।

नीम का पेड़ अब भी हरा है, उस पर सुराजी की आहों का कोई असर नहीं..।

हमारी पूरी टीम स्तब्ध होकर देखती रहती है। बाहर दालान में हम बैठे हैं। बारिश हो रही है। पुष्पेन्द्र भाई के कहने पर गांववाले हमारे लिए रोटी और करेले की सब्जी लेकर आते हैं। घर पर में खाने के मामले में बहुत नकचढा माना जाता हूं...आजतक कभी करेला खाया नहीं।

पहली बार जिंदगी में खाने की अहमियत सामने दिखती है। (पढा और सुना बहुत था) मां की हिदायत को पोटली याद आ जाती है। मां आज भी कहती है, बेटा, अन्न अन्नपूर्णा है। इसे बेकार न जाने दो।

पता नहीं क्यों मैं रुआँसा हो उठता हूं। सामने प्रह्लाद सिंह है, राजकिशोर हैं...सुराजी हैं। निवाला अंदर नहीं जा रहा..पहली बार करेला कड़वा नहीं लग रहा। मैं खाना खत्म करता हूं। आशुतोष शुक्ला भी संजीदा हैं..।

खाने की थाली समेटने आती है सोनू। पुष्पेन्द्र भाई बताते हैं, इसने भी जान देने की कोशिश की थी। वजहः सोनू के पिता रामकिशोर बैंक के कर्जदार हैं। बड़ी बहन की शादी में दो-तीन लाख और चढ़ गए। 8वीं में पढ़ने वाली सोनू ने सोचा अगर वही न रहे, तो पिता को शादी की चिंता भी न करनी होगी, और न ही कर्ज लेना पड़ेगा।

कर्ज के बोझ और उसके बाद आत्महत्या से बचाने के लिए एक रात सोनू डाई ( बाल रंगने वाले रसायन) को पीकर सो गई। वक्त रहते ही उसका उपचार शुरु कर दिया गया और सोनू बचा ली गई।
सोनू के पिता घटना बयान करते-करते अचानक चुप होकर शून्य में निहारने लगते हैं।

सोनू भी हमसे बात करने सो थोडा़ कतराती है। आशुतोष पूछते हैं, मरने की कोशिश कर क्या साबित करना चाहती थी, वह मासूमियत से बताती है, जब हमहीं ना रहेगें तो पापा को कर्ज नहीं लेना पडेगा ना। आशुतोष के पास जवाब नहीं है, मैं कैमरामैन राजकुमार को कुछ प्रोफाइल और क्लोज-अप शॉट्स लेने के निर्देश देने में खुद को व्यस्त कर लेता हूं।

आखिर उम्र से पहले बड़ी हो गई, इस लड़की से क्या पूछूं...क्या टीवी माध्यम का सबसे बदनाम सवाल....? मरते वक्त कैसा लग रहा था?

मेरे अंदर का शख्स मुझसे पूछ रहा था, इस व्यवस्था के खिलाफ कोई हथियार क्यों न उठा ले, मेरे अँदर का पत्रकार इस बात का पूरा समर्थन कर रहा था। दोपहर बाद हमें वहां से निकलना था, कैमरामेन कुछ शॉट्स लेने में व्यस्त हो गया।

मैं और आशुतोष सिगरेट पीने के बहाने एक कच्ची दुकान में रुक गए। उसने आदर से बिठाया, सिगरेट दी और कहने लगा कि अब तो आप लोगों के ही हाथ ही है सब..।

गढा गांव नाउम्मीदी की जीती-जागती मिसाल बन गया है। हम केन को फिर से पार कर उस जगह आ गए। रास्ते फिसलन भरे हो गए थे।मैं फिर सोचने लगा था, क्या जीने के रास्ते सच में इतने ही फिसलन भरे हो जाते हैं...??

....जारी

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

बुंदेलखंड का सच 2- 519 आत्महत्याओं का इलाका


 बुंदेलखंड-यूपी के सात जिलों में पिछले 5 महीनों, यानी जनवरी 2011 से 31 मई तक 519 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। राज्य सरकार इन आत्महत्याओं का गृहकलह जैसी वजहों से जोड़ती है। सवाल ये है कि गृहकलह तो अंबानी भाईय़ों के बीच भी हुआ था, और हजार-लाख रुपयों के लिए नहीं, कई हजार-लाख करोड़ रुपयों के लिए हुआ था। उनने आत्महत्या क्यों नहीं की, तनाव पवा गांव की रामकली को ही क्यों..कोकिलाबेन को क्यों नहीं..?

सुबह जब हम बांदा के पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस से निकले तो मेरे मन में कहीं भी यह बात नहीं थी कि आज का दिन मेरी जिंदगी, खासकर पत्रकारीय अनुभवों को एकदम से बदल देगा। हमारे पास छोटी कार थी। हमलोग, यानी मैं, कैमरामैन राजकुमार रॉकी, साथी रिपोर्टर आशुतोष शुक्ला, ड्राइवर राकेश और साथ में थे भाई पुष्पेन्द्र। 


दिल्ली से जाने वाले पत्रकारों के लिए भाई पुष्पेन्द्र मार्गदर्शक का काम करते है। स्वाति माथुर, टाइम्स ऑफ इंडिया वाली रिपोर्टर, जिनकी रिपोर्ट पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था, वो भी पुष्पेन्द्र भाई की मदद से ही रिपोर्ट लिख पाई थीं।


बहरहाल, हम बांदा जिला के आखिरी छोर पर पहुंच गए। केन नदी के किनारे। जिसके दूसरी तरफ था हमीरपुर जिला। केन नदी दोनों जिलों का बांटती तो है लेकिन वह नहीं बांट पाई है तो दोनों तरफ भूख की तस्वीर को, लोगों की तकदीर को और आत्महत्याओं के सिलसिले को। 

केन पार करने के लिए हमारी पूरी टीम को पैंट उतारनी पड़ी। पुष्पेन्द्र भाई मजाक में बोले कि वह हर पत्रकार की पैंट बुंदेलखंड दर्शन से पहले उतरवा लेते हैं। हम हंसे। लेकिन हमारी यह हंसी थोड़ी ही देर में काफूर हो गई। जब हम गढ़ा गांव में दाखिल हुए। गढ़ा गांव,  किसी भी आम हिंदुस्तानी गांव की तरह ही है...घरौंदों की तरह कच्चे-पक्के मिट्टी के घर, और आटा-चक्की से आती एक जानी-पहचानी आवाज..लेकिन इस गांव में आज की तारीख में कहीं उम्मीद की झलक तक नहीं दिखती।

उम्मीद...जिसके सहारे जिंदगी आगे बढ़ती है। शायद इसी उम्मीद ने जिंदा रखा था, गढा गांव के प्रह्लाद सिंह को। बड़ी-बड़ी शानदार मूंछों वाले प्रह्लाद सिंह ने अपनी जवानी में किसी का क़त्ल कर दिया था। कत्ल के जुर्म में 1962 में सज़ा-ए-मौत मिली। लेकिन, प्रह्लाद सिंह ने अपनी जिंदगी की उम्मीद नहीं छोड़ी थी उन्होंने राष्ट्रपति से जीवनदान की गुहार लगाई। उनकी सज़ा आजीवन कारावास में बदल गई। 

सन बहत्तर में उनकी नेकचलनी से उन्हें वक्त से पहले रिहा कर दिया गया। गांव लौटे तो नई उम्मीद के साथ जिंदगी फिर शुरु की। 

अभी एक दशक पहले तक उनके साथ कोई समस्या नहीं थी। लेकिन परिवार बड़ा हुआ तो प्रह्लाद सिंह और उनके भाई ने मिलकर ट्रैक्टर के लिए बैंक से कर्ज ले लिया...और इसी कर्ज ने उनके परिवार को बरबाद कर दिया।

पिछले साल बुंदलेखंड-यूपी में हुई सिर्फ 120 मिमी बारिश

2002 के बाद बुंदेलखंड लगातार सूखे की गिरफ्त में आता गया। पहले से ही कम बारिश वाला इलाका धीरे-धीरे अकाल की चपेट में आता गया। साल 2007 में बैंक ने भाड़े के गुंडों से प्रह्लाद सिंह के ट्रैक्टर को कब्जे में ले लिया...ट्रैक्टर नीलामी के बाद बाकी की रकम की देनदारी की आखिरी नोटिस भी निकाल दी गई। पहले तो परेशान भाई ने फिर बेटे, बच्ची सिंह ने आत्महत्या कर ली। पोती मनोरमा भी ब्याह के खर्च से बेचारे दादा को बचाने की खातिर एक दिन डाई पीकर हमेशा के लिए सो गई। 


दिवंगत बेटे और पोती की तस्वीर दिखाते प्रह्लाद सिंह कहते हैं कि उन्होंने ऐसे बुढापे के लिए क्षमादान नहीं मांगा था राष्ट्रपति से। उनके घर में उनके एक पोते का विवाहोत्सव है, लेकिन खुशियों की बूंद तक नहीं दिखती। 

हमें देखते ही गांव के कई लोगों को लगता है कि हम उनकी रिपोर्ट दिखाएंगे तो शायद उनका कर्ज माफ हो जाएगा। बुंदलेखंड का एक खुद्दार किसान,  कर्ज चुकाना तो चाहता है लेकिन प्रह्लाद सिंह की मजबूरी है कि जिस खेती पर उन्होंने अपनी जिंदगी गुजार दी वह खेती आज उनके बीज तक वापस नहीं कर पा रही। 

2002 से 2011 दस साल हो गए, उनकी खेती उन्हें दाने-दाने को मोहताज बना दे रही है। 

सात जिले, 5 महीने, 519 किसान आत्महत्याएं




प्रह्लाद सिंह की यह कहानी पूरे बुंदेलखंड की 2 करोड़ 10 लाख की आबादी की कहानी से कमोबेश मिलती-जुलती है। प्रह्लाद सिंह की ही तरह बाकी के लोगों की उम्मीदों की डोर टूटने लगी है। कर्ज एक तरह से गांव के लोगों के लिए जीने की शर्त बन गए हैं।..लेकिन ये शर्त जानलेवा है।



बुंदेलखंड के 13 में से सात जिले उत्तर प्रदेश में हैं...और उनमें सबसे ज्यादा बदहाली है बांदा में..। इस साल जनवरी से लेकर मई तक सिर्फ बांदा जिला अस्पताल में ही आत्महत्या के करीब 330 मामले दर्ज हैं। 


हालांकि, यह सिर्फ दर्ज हुए मामले ही हैं। असली तस्वीर ज्यादा भयानक हो सकती है। इस साल के पहले पांच महीने में ही बुंदेलखंड के सात जिलों में 519 मौतों की  खबर है। 
 

पिछले पांच महीने बुंदेलखंड के लोगों के लिए अच्छे नहीं रहे। 519 लोगों की आत्महत्याओं की खबर खतरे की एक घंटी है। साल 2009 में बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले हिस्से में सात जिलों, यानी महोबा, चित्रकूट, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा, झांसी और जालौन में कुल 568 मौते दर्ज की गई थीं। साल 2010 में आत्महत्याओं का आंकड़ा 583 था। जबकि, साल 2001 से 2005 के बीच 1275 आत्महत्याओं के मामले सामने आए थे। 




ध्यान देने वाली बात यह है कि इन 1275 आत्महत्याओं में साल 2002 और 2004 का वह दौर भी शामिल है, जो सूखे के सबसे भयावह साल थे। यानी आत्महत्याओं का सूखे से संबंध तो है, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं।  

आल्हा-ऊदल की धरती, जंग में हमेशा सीना तानकर लड़ने वाले जुझारु वीरों की धरती के लोग सिर्फ सूखे से ही मौत की राह चलने को मजबूर नहीं हुए हैं।

कुछ तो ऐसा है जिसने इस इलाके में आत्महत्या की सामूहिक प्रवृत्ति को बढावा दिया है। 

....जारी