Thursday, December 29, 2011

सनीः भारतीय पुरुषों के सपनों की नई रानी

नी लियोनी...ने बिग बॉस में धमाल मचाने के बाद एक नया करिश्मा कर दिया है। टीवी के रियलिटी शो से चुपके से निकल कर इस पॉर्न स्टार ने भारतीय पुरुषों के सपनों में घुसपैठ कर ली है। हाल तक शीला की जवानी मर्दों के सपनों में धमाल मचाती रहती थीं...लेकिन करीना, कतरीना, ऐश्वर्य..सबको पीछे छोड़ दिया, करण मल्होत्रा उर्फ करणजीत कौर वोहरा उर्फ सनी लियोनी ने।
सनी परदे पर हों तो लोग सुनना नहीं, देखना पसंद करते हैं
भारत जैसे देश में जहां आज सेक्स पर बात करना भी वर्जित माना जाता है, वहां बिग बॉस के आयोजकों को भी सनी के सीधे प्रवेश पर शक हो रहा था। उन्हें लग रहा था कि शायद भारतीय लोग सनी के विरोध में सड़कों पर उतर आएं। लेकिन मेरे एक नजदीकी दोस्त की तरह सनी के शैदाई भी कम नहीं।

मेरे सहयोगी और मित्र को सनी की मादक काया के साथ ही उसका मासूम चेहरा तो भाता है ही, हजरत सनी की मीठी आवाज के कायल भी है। कभी लीगल कॉरेस्पांडेंट रहे मेरे इस दोस्त के सपनों पर सनी का कब्जा हो गया है।

मेरे इन रिपोर्टर साथी की आंखों में सनी की कशिश अकेली उनकी ही समस्या नहीं है। इस सूची में सनी को सराहने वाली भारतीय युवा पीढ़ी की एक पूरी तादाद है।

इंटरनेट के जमाने में पॉर्न सामग्री कोई वर्जित फल की तरह नहीं है। ऐसे में सनी लियोनी और प्रिया अंजलि राय, गंदे माने जानेवाले इस धंधे में भारतीय परचम की तरह है।
क्या सनी लियोनी विद्या बालन के इश्कि़या और डर्टी पिक्टर वाले देसी सौन्दर्य का एनआरआई जवाब है?

मैं सनी के सौन्दर्य का निश्चित रुप से प्रशंसक हूं, लेकिन साफ कर दूं कि मैं पॉर्न को महिमा मंडित करने कोशिश नहीं कर रहा। साथ ही उसका विरोध भी नहीं कर रहा।

सवाल है कि एडल्ट फिल्मों में काम कर रही इस सुपरस्टारनी के कदम अब बॉलिवुड में भी पड़ चुके हैं। इससे किसे चिंतित होना चाहिए। महेश भट्ट ने जिस्म-2 सनी को ऑफर भी कर दिया है। इसके साथ ही दर्जनों निर्माता भी सनी से संपर्क साध रहे हैं।

हमें सनी की अभिनय क्षमता पर संदेह नहीं होना चाहिए। लेकिन, भारतीय सेंसक बोर्ड अभिनय के जिन मानकों को पास करता है सनी उस तरह का अभिनय कर पाएंगी, यही सवाल लाख टके का है। क्योंकि सनी के अभिनय के मानक भारतीय सेंसर और दर्शक शायद ही खुले तौर पर हजम कर पाएँ।
कतरीना करीना की नींद उड़ा दी है सनी ने

फिर भी, गूगल पर सर्च के मामले में सनी ने भारतीय पुरुषों के सपनों की रानियों को पछाड़ दिया है। सनी को कतरीना  से दस गुना ज्यादा बार सर्च किया गया है।

भारतीय फिल्म उद्योग में संभावनाओं के देखते हुए सनी ने अपने तमाम वीडियो विभिन्न वेब साइटों से डिलीट करवा दिए हैं। हमें पता है कि हम जैसे चित्रांगदा सिंह के मर मिटने वाले प्रशंसकों को छोड़ दें ( देसी बॉयज़ जैसी दो कौड़ी की फिल्म हमने महज चित्रांगदा के लिए देखी) साथ ही एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की भी है, जिनके लिए सनी के लटके-झटके, चेहरे के अलमस्त हाव-भाव ही काफी हैं।

तो क्या विद्या बालन के देसी सेक्स अपील के जवाब में विदेशी खुलेपन के साथ एनआरआई सेक्स अपील आयात की गई है...क्या एक सिल्क स्मिता पुरानी कहानी में नए ट्विस्ट की तरह फिर से इंडस्ट्री में लाई गई है। जो मजबूरी में नहीं मनमर्जी से हार्डकोर पॉर्न व्यवसाय को करिअर बनाती है।

भारतीय पुरुष नेट पर सनी को तलाश रहे हैं...फिल्मवाले बेकरारी से एक मसाला आय़टम को रुपहले परदे पर पेश करने को तैयार हैं...और सपनों में एक नया मादक रंग आ गया है...यह रंग गुलाबी नहीं, सनी है।


Tuesday, December 27, 2011

मंगल ठाकुर की मैथिली कविता

धानक फुनगी पर मकड़ा के जाली,
जाली में ओसक बून्द,
चमचम चमकै ओसक जाली,
वसुधा ओढ़ने छथि मोतिक चून
ताहि बगल में छोट-छिन डबरा
डबरा में पोठिया के झुंड

डबरा में ठाढ़ भेलि कुमुदिनी लजायल,
सूर्यसन पुरुष के देखितहिं कुमुदनी
लाजे लेलन्हि अपन आंखि मूंदि

कासक  पुष्प, 
सेहो ओघांयल सन
नींदक मातल सन,
भोरक भकुआयल सन
लागल जेना कुमुदिनी के लेता चुमि

इ छैक मिथिला के भोरका सुंदरता
एकरा नजरि ककरो नहिं लागै





हिंदी अनुवादः मंजीत ठाकुर

धान की फुनगी पर,
मकड़े की जाली,
जालों पर शबनम की बूंद...
खेत के पास
छोटा-सा डबरा...
डबरे में खेलती पोठि मछलियों के झुंड...

वहीं खड़ी थी कुमुदिनी लजाई,
सूरज-से प्रिय देख,
आंखें लीं मूंद...

कास के फूल, वो भी अघाए-से,
निंदाया-भकुआया, अल्लसुब्बह लगा कि लेगा
लाज से लाल कुमुदिनी को चूम

(डबरा-पोखरा, पोठी-मछलियों की एक प्रजाति, कास-बरसात के अंत में खिलने वाला घास का एक फूल)

Thursday, December 22, 2011

चंद्रशेखर आजाद की दुर्लभ तस्वीर


क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की मृत देह का ब्रिटिश पुलिस ने सार्वजिनक प्रदर्शन किया था

 क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की ये तस्वीर बेहद दुर्लभ है। उनकी पार्थिव देह को ब्रिटिश पुलिस ने सार्वजनिक तौर पर पेश किया था। यह चेतावनी थी उन क्रांतिकारियों के लिए जो ब्रिटिश सरकार के लिए परेशानियां पैदा कर रहे थे। 27 फरवरी 1931 को एक धोखेबाज मुखबिर की वजह से इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश टुकडी ने चंद्रशेखर आजाद को घेर लिया।

चंद्रशेखर आजाद आखिरी गोली तक लडते रहे। कोई विकल्प सामने न पाकर चंद्रशेखर आजाद  ने आत्मसमर्पण की बजाय ने अपनी जान देनी बेहतर समझी। उनने आखिरी गोली खुद को मार ली थी।

समाज के बेहद अराजक दौर में चंद्रशेखर आजाद  जैसे सपूतों को प्रणाम। इस तस्वीर को शेयर करें, ब्लॉग लिखे...मेल करें।

(तस्वीरः फेसबुक पर जितेन्द्र रामप्रकाश सर के सौजन्य से)

Monday, December 19, 2011

दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्रः बूंद बूंद को तरसेंगे शहर


डीएमआईसी ने नदी के पानी के इस्तेमाल के लिए जो मानदंड तय किए हैं, वो सही हैं और अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान के मानकों के मुताबिक ही हैं। यानी नदी साफ रहे और पर्यावरण सुरक्षित रहे इसके लिए जरुरी है कि नदी में कुल बहाव का आधा पानी बहने दिया जाए। आधे या इससे कम पानी का ही इस्तेमाल किया जाए।



स्कॉट विल्सन के दस्तावेज में बताया गया है कि दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र में पडने वाली नदियों में कुल कितना पानी है, और कुल कितने पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है। केन्द्रीय जल आयोग के आँकडों के मुताबिक दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र में कुल 6 नदियां हैं। यमुना, चंबल, माही, साबरमती, नर्मदा और लूनी। इन छहों नदियो का कुल प्रवाह 134 क्युबिक मीटर है। सिद्धांततः इनमें से आधा यानी 67 अरब क्युबिक मीटर पानी इस्तेमाल किया जा सकता है।



लेकिन कठिनाई यह है कि दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र की इन 6 नदियों में से पहले ही 70 अरब क्युबिक मीटर पानी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तथ्य़ की अनदेखी दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र प्रपत्र में की गई है।



दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र परियोजना की रिपोर्ट लिखने वालों ने शायद यह मान लिया है कि पूरब की तरफ बहने वाली नदियों का पानी भी इस गलियारे के शहरों के लिए उपलब्ध है।



दस्तावेज में सुझाव दिया गया है कि अगर इंजीनियरिंग के जरिए मुमकिन हो पाए तो, पूरब की तरफ बहने वाली नदियों को 600 मीटर तक ऊंचा उठाकर उसका पानी दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र के नए बस रहे शहरों के लिए उपलब्ध कराया जाए। अगर इन नदियों का पानी 600 मीटर उठा दिया जाए तो गलियारे में बहुत दूर तक ले जाया जा सकता है।



दरअसल, पूरब की तरफ बहने वाली नदियों गोदावरी और कृष्णा का पानी का बंटवारा महाराष्ट्र और आंध्र् प्रदेश के बीच होता है। इऩ राज्यों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर झगडा है, दोनों ही राज्यों में किसान सिंचाई की जरुरतो के लिए पानी की कमी से आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे में दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र के लिए दोनों  में से कोई भी राज्य पानी छोड़ेगा, इसकी दूर-दूर तक संभावना भी नहीं है।



दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र परियोजना में जिस तरह से संसाधनों और संभावनाओं को लेकर पूर्वानुमान लगाए गए हैं, उस पर पुनर्विचार की जरुरत है। इन तथ्यों का सत्यापन बहुत सावधानी से करना होगा, और उनका मिलान जमीनी हकीकत से भी कराना होगा।



दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र में शहरों का विकास या उनकी स्थापना की कहानी में कोई नई बात होनी चाहिए, इन शहरों को आकार में छोटा होना चाहिए और साथ ही हरा-भरा भी। पर्यावरण से छेड़छाड होगी, तो दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा क्षेत्र पीने के पानी को बूंद-बूंद तरसती आबादी से भरे भीड भाड़ वाले इलाके से ज्यादा कुछ नहीं होगा।


Thursday, December 15, 2011

उत्तर-पश्चिम औद्योगिक गलियारे का प्रस्ताव-कितना मुफीद

यह बेहद महत्वपूर्ण फैसला साबित होने जा रहा है। केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा-डीएमआईसी- परियोजना के लिए 90 अरब डॉलर मंजूर किए हैं। इस परियोजना की परिकल्पना पांच साल पहले की गई थी और इसे जापान की मदद से अमल में लाया जाएगा।

इससे दिल्ली और मुंबई के रास्ते में औद्योगिक गलियारा बनेगा। इस प्रोजेक्ट को मैंकेंजी ग्लोबल इंस्टिट्यूट ने अनुमोदन किया है और स्कॉट विल्सन ने इसकी रुपरेखा बनाई है। परियोजना के तहत कई नए शहर बसाएं जाएंगे और ये शहर जाहिर है मुंबई दिल्ली के बीच बसेंगे।

इस गलियारे में 24 औद्योगिक शहर, तीन बंदरगाह, 6 हवाई अड्डे, और डेढ हजार किलोमीटर लंबी हाइ स्पीड रेल लाईन और सडके बनाई जाएँगी। यह गलियारा 6 राज्यों से होकर गुजरेगी।
प्रस्तावित दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर


2009 में इस इलाके की आबादी 23.10 करोड़ थी, जो 2019 में 31 करोड और 2039 में करीब 52 करोड हो जाएगी। मैंकेजी की भविष्यवाणी है कि भारत को जल्द ही ऐसी कई परियोजनाओं की जरुरत होगी, क्यों कि पलायन के बढ़ते चलन और शहरीकरण की दर में आ रही तेजी से ऐसा करना जरुरी भी होगी।

वैसे मुझ जैसे शंकालुओं को इस योजना के इतनी तेजी से बढाए जाने पर शक हो रहा है। इस बारे में ज्यादा लोगों को पता भी नहीं है। शहरी भूगोल के पारंगत भी इस बारे में शायद ही कुछ ज्यादा जान पाएं, आप खुद भी देख लें कि इस बारे में जो दस्तावेज www.scottwilsonindia.com नाम की वेबसाइट पर डाली है।

मुझे इस परियोजना के कामयाब होने में इसलिए भी संदेह है क्योंकि ऐसी परियोजनाओं के लिए जरुरी पानी इस इलाके में शायद बहुत ज्यादा या पर्याप्त मात्रा में नहीं है। डीएमआईसी की इस परियोजना के लिए-यानी नए बसे शहरों और आबादी के लिए पानी नदी से -कुल जरुरत का दो-तिहाई-और पहले से ही रिस रहे भू-जल(कुल जरुरत का एक तिहाई) से लिया जाएगा।

उत्तर-पश्चिम भारत में नदियां प्रदूषित हैं और भू-जल रिस चुका है

नदियां पहले से ही प्रदूषित है और भू-जल दूषित भी है और जरुरत से ज्यादा निकाला भी जा रहा है। शक इसलिए भी है क्योंकि नासा और श्रीलंका के अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान-आईड्ब्ल्यूएमआई- के आंकडों के मुताबिक, उत्तर-पश्चिम भारत का यह दिल्ली-मुंबई गलियारा दुनिया के भूमिगत पानी के कमी वाले इलाकों में से एक है।

मालूम हो कि इस इलाके में 6 नदियां बहती हैं, यमुना, चंबल, माही, साबरमती, लूनी, तापी और नर्मदा। इन सभी नदियों का कुल प्रवाह 134 अरब क्युबिक मीटर है।

-----जारी

Monday, December 12, 2011

दिल्ली कैसे बनी राजधानी


साल 1911, 12 दिसंबर, दिन मंगलवार, किंग जॉर्ज पंचम के राज्यारोहण का उत्सव मनाने और उन्हें भारत का सम्राट स्वीकारने के लिए दिल्ली में एक दरबार आयोजित किया गया। दरबार में ब्रिटिश भारत के शासक, भारतीय राजकुमार, सामंत, सैनिक और अभिजात्य वर्ग के लोग बड़ी संख्या में मौजूद थे। दोपहर बाद 2 बजे वायसराय लॉर्ड हॉर्डिंग ने उपाधियों और भेंटों की घोषणा के बाद राजा जॉर्ज पंचम को एक दस्तावेज़ सौंपा। अंग्रेज राजा ने वक्तव्य पढ़ते हुए पूर्व और पश्चिम बंगाल को दोबारा एक करने समेत कई प्रशासनिक बदलावों का ऐलान किया, लेकिन सबसे हैरतअंगेज फैसला था राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का।





इस घोषणा ने एक ही झटके में एक सूबे के शहर को एक साम्राज्य की राजधानी में बदल दिया, जबकि 1772 से ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता थी। 1899 से 1905 के दौरान भारत के वॉयसराय रहे लॉर्ड कर्ज़न, ने इस खबर पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया दी थी। कर्जन ने दिल्ली कोवीरान खंडहर और कब्रों का ढेर कहा था।


यह सच है कि अपने समृद्ध और गौरवशाली अतीत के बावजूद जिस समय दिल्ली को राजधानी बनाने का फ़ैसला किया गया, उसवक्त वह किसी भी लिहाज़ से एक प्रांतीय शहर से ज़्यादा नहीं थी। किंग जॉर्ज पंचम की घोषणा से हर कोई इसलिए भी हैरान था, क्योंकि यह पूरी तरह गोपनीय रखी गई थी।


जॉर्ज पंचम की भारत यात्रा के छह महीने पहले ही ब्रिटिश भारत की राजधानी के स्थानांतरण का फैसला किया जा चुका था लेकिन इससे इंग्लैंड और भारत में दर्जन भर व्यक्ति ही वाक़ि़फ थे।



सात दिसंबर, 1911 को जार्ज पंचम और क्वीन मेरी दिल्ली पहुंचे। शाही दंपत्ति को एक जुलूस की शक्ल में शहर की गलियों से होते हुए विशेष रूप से लगाए गए शिविरों के शहर यानी किंग्सवे कैंप में गाजे-बाजे के साथ पहुंचाया गया। एक बहुत बड़े अर्द्धचंद्राकार टीले से क़रीब 35,000 सैनिक और 70,000 दर्शक दरबार के चश्मदीद गवाह बने।


25 गुणा 30 मील के घेरे में फैले क्षेत्र में 223 तंबू लगाए गए, जहां 60 मील की नई सड़कें बनाई गईं और क़रीब 30 मील लंबी रेलवे लाइन के लिए 24स्टेशन। दरअसल, दिल्ली दरबार का आयोजन एक जनवरी, 1912 को होना था,पर इस दिन मुहर्रम होने की वजह इसे कुछ दिन पहले करने का फैसला किया गया।


बहरहाल, 15 दिसंबर, 1911 किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मेरी ने नई दिल्ली शहर की नींव के पत्थर रखे। लेकिन असली समस्या शहर बसाने की जगह को लेकर आई।


लॉर्ड हार्डिंग, रॉबर्ट ग्रांट इर्विंगंस की पुस्तक-इंडियन समर में कहते हैं, हमें मुगल सम्राटों के उत्तराधिकारी के रूप में सत्ता के प्राचीन केंद्र में अपने नए शहर को बसाना चाहिए. वायसराय ने बतौर राजधानी दिल्ली के चयन का ख़ुलासा करते हुए कहा कि यह परिवर्तन भारत की जनता की सोच को प्रभावित करेगा।





नई दिल्ली के लिए कई जगहों के बारे में सोचा और नामंजूर किया गया। दरबार क्षेत्र को अस्वास्थ्यकर माना गया जहां बाढ़ का भी ख़तरा था। अपेक्षाकृत बेहतर सब्जी मंडी के इलाक़े को फैक्ट्री मालिकों और सिविल लाइंस में यूरोपीय आबादी की नाराज़गी के डर से अपनाया नहीं गया।


बहरहाल, इमारत निर्माण से जुड़ी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का जिम्मा अंग्रेज वास्तुकार एडविन ल्युटियन्स और उनके मित्र हार्बर्ट बेकर को सौंपा गया। लुटियन के नेतृत्व में मौजूदा पुराने शहर शाहजहांनाबाद के दक्षिण में नई दिल्ली के निर्माण का कार्य 1913 में शुरू हुआ, जब नई दिल्ली योजना समिति का गठन किया गया।


-----जारी

Monday, December 5, 2011

देवानंद के साथ मेरी मुलाकातः एक यादगार शाम

...देव साहब चले गए। सबको जाना होता है एक दिन। लेकिन हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाले शख्स के ऐसे जाने का ग़ुमां किसी को नहीं था। अभी कुछ ही दिन पहले मैं नीता प्रसाद से बात कर रहा था, इस साल हमने बहुत से बड़े लोगों को खो दिया है। जगजीत सिंह, पंडित भीमसेन जोशी...उस्ताद सुलतान अली खां..हमसे दूर चले गए लोगों की लिस्ट बड़ी लंबी हो गई है। साल 2011 बहुत बुरा गुजरा है।
देव साहब सिर्फ आप हैं, आप  हैं और आप...


देव साब का जाना पेड़ से एक हरी टहनी के टूटने जैसा है। उन जैसी सदाबहार शख्सियत के लिए 88 की उम्र है ही क्या..। सामने इंडियन एक्सप्रैस पड़ा है...कवर पर पहली ही खबर है। सिनेमा के फॉरएवर यंग का जाना....। देव,साब का हंसता, शोख मुस्कुराहट भरा चेहरा। श्वेत-श्याम।

देव साहब की जिंदादिली की बात कईय़ों ने की है। कल शाम यानी रविवार की शाम 8 बजे हमने एक खास कार्यक्रम किया था..रोमांसिंग लिद लाइफ। देव साब जिदंगी के साथ रोमांस ही तो करते रहे। संदीप सिंह ने उनकी जिंदादिली पर उम्दा पैकेज लिखा था। रात को साढे ग्यारह बजे इसे रिपीट टेलिकास्ट किया गया। रितु जी पहले 8 बजे वाले प्रोग्राम में थोड़ा हिचकिचाते हुए लिंक्स पढ़ रही थी, बाद में खुल गईं।

देव साहब की जिंदादिली पर, उनके व्यक्तित्व पर टिप्पणी करने के लिए मैं शायद बहुत जूनियर हूं। लेकिन उनके साथ मुलाकात का जिक्र करता हूं। गोवा में साल 2007..भारत का अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव। फेस्टिवल की रिपोर्टिंग के लिए मैं अकेला गया था दिल्ली से। डीडी की तरफ से।

देव साहब से आधे घंटे के विशेष इंटरव्यू के लिए मैंने उनके सेक्रेटरी से बातें की। शाम को बुलावा आय़ा। जब मैं डीडी की टीम लेकर पहुंचा, एक कैमरामैन, एक लाइटिंग असिस्टेंट  और एक साउंड इंजीनियर...। झुटपुटा होने लगा था। देव साब होटल ताज में रुके थे। सामने समंदर लहरा रहा था। उनने पूछा, लाइटिंग कैसी है। हमारी लाइटिंग बहुत उम्दा नहीं थी, क्योंकि किसी को अंदाजा नहीं था कि वह बाहर बैठ कर इंटरव्यू देंगे।

मेरा चेहरा उतर गया। लेकिन मुझे देखकर देव साब हंस पड़े। बोले, यंगमैन, निराश मत होओ, मै तुम्हे इंटरव्यू दूंगा और जरुर दूंगा। लेकिन पहले चाय पियो। फिर मेरी पूरी टीम को चाय-नाश्ता करवाया। मुझसे ही पूछते रहे कहां से हो, फिल्मों में इंटरेस्ट कैसे हुआ। फिर लाहौर से बॉम्बे की अपनी पूरी जर्नी के बारे में बताया।

मैंने यूं ही पूछ भी लिया, सर आप इस उम्र में भी काम क्यों करते हैं, जबकि आपकी उम्र के लोग रिटायर हो गए। जवाब में वही चिरपरिचित मुस्कान। यंगमैन, मै काम क्यों करता हूं, जो लोग देवानंद नहीं है वो इसे नहीं जान सकते।

फ्लॉप पर फ्लॉप फिल्मों के बाद भी नई फिल्में बनाते जा रहे है। उन्होंने तब बताया कि  जब वो लाहौर से बॉम्बे आए थे तो उनकी जेब में महज 30 रुपये थे। देवसाहब बहुत भावुक होकर बताते रहे कि यही 30 रुपये उनके हैं, बाकी तो सब इसी इंडस्ट्री का है, जिसे अपने योगदान से वापस करने की कोशिश करते है वो।

...और भी बहुत सी अनौपचारिक बातें। गलीउन्होंने मुझे अगली सुबह 7 बजे आने का कहा। उन्हें 8 बजे मडगाव जाना था, नेवी के यहां कुछ कार्यक्रम था। मुझसे पूछा, 7 बजे आ तो जाओगे ना...। मैंने हां कह दिया, लेकिन मुझे खुद पर भरोसा नहीं था।

इतना ही नही अगली सुबह 6 बजे मोहन जी का फोन आया, आप जाग तो गए ना। देवसाब पूछ रहे हैं। मैं अभिभूत हो गया। बहरहाल, मुझे आधे घंटे से ज्यादा का इंटरव्यू उन्होंने दिया..। वो पल मेरे लिए अनमोल हैं, जो मैंने उनके साथ बिताए।

इतना ही नहीं अगले साल जब मै अपने बाकी के सहयोगियों, वीडियो एडिटर मनीष शर्मा, और प्रोडक्शन एक्जीक्यूटिव श्रीकांत तिवारी के साथ गोवा गया, तो उन्होंने न मुझे सिर्फ पहचाना, बल्कि हमने उऩके साथ तस्वीरें खिंचवाने की इच्छा प्रकट की तो बड़ी खुशी से साथ भी आ खड़े हुए।

ये तस्वीरें श्रीकांत के पास है, उनसे कहूंगा कि फेसबुक पर पोस्ट करे।

आखिर, मुझ जैसे न्यूकमर जर्नलिस्ट के लिए उन्होंने इतना प्रेम भाव क्यों दिखाया...जो देवानंद नहीं है, उन्हें इसका अंदाजा भी नहीं होगा। देवसाहब, मैं ताजिंदगी आपको कभी भुला नहीं पाऊगा।

Sunday, November 27, 2011

फलक- फेसबुक लघु कथाएँ उम्दा रचनाएँ

मेट्रो मुहब्बतः

कुलदीप मिश्रा
कथाकारः कुलदीप मिश्रा

(कुलदीप मिश्रा दैनिक भास्कर में चंडीगढ़ में सह-संपादक हैं। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर चुके कुलदीप सीएऩईबी टीवी चैनल में भी काम कर चुके हैं)
शंका, उम्मीद, एक्साइटमेंट। कुछ कॉकटेल सा था दोनों के मन में। फर्स्ट टाइम मिलना बड़ा अजीब होता है। बाइ गॉड। सोचते हुए वो पीतमपुरा मेट्रो पहुंच गई। ये भी शमशेर बहादुर पढ़कर तैयार हुआ। कटवारिया का मुंशी प्रेमचंद पीतमपुरा की लेडी गागा से मिलने वाला था। बीच की कहानी रिकॉर्ड में नहीं है।

वो कुर्ते और चप्पल पर भड़की थी और ये उसके भड़कने पर।

आठ बजे की दिल्ली। सड़कों पर धुंधली रौशनी थी। दिल्ली के ऑफिस वालों के साथ लौट रहे थे दोनों। ख़्यालों के कॉकटेल से लबालब।



2. रोना  
विनायक काले
कथाकारः विनायक काले

( विनायक काले हैदराबाद विश्वविद्यालय में पढाते हैं, और फेसबुक लघुकथा मंच के सक्रिय सदस्य हैं)

 उसने कहा,
“किसी के मृत्यु पर
रोते क्यों नहीं तुम?”
मैंने कहा,
“ब्रेकींग न्यूज़ देखकर उब गया हूँ मैं।”

3. सेल

कथाकारः विनायक काले
सने कहा,
“सुनामी के समाचारों के बीच आते
साबुन और कंडोम के ऐड के बारे में क्या कहोगे तुम?”
मैंने कहा,
“बाजार में इन्सान खोज रहा हूं मैं"



4. वफादारी

कथाकारः मंजीत ठाकुर

दोपहर को भयंकर गरमी थी। जोरों की लू चल रही थी। मैं एक बाईट के चक्कर में कांग्रेस दफ्तर गया। वहां मीडिया सेंटर वाले कमरे में कुरसी पर बैठे नेता ने जोरों से हवा देते पंखे का रुख अपनी बजाय, सोनिया गांधी की तस्वीर की ओर कर रखा था.

Wednesday, November 23, 2011

कभी पूजे जाते थे पलायन करने वाले-भाग दो

....पिछली पोस्ट से आगे...

क्षिणी मध्य-प्रदेश और खानदेश के सिवनी, छिंदवाडा, चंद्रपुर के गोंड साम्राज्य में तालाब बनवाने के लिए बनारस के कारीगरों को बुलवाया गया था. ये लोग विस्थापित होकर यहीं बस गए और उन्होंने न सिर्फ गांव-गांव में हजारों तालाब बनाए, बल्कि पानी के वितरण की एक चाकचौबंद व्यहवस्था भी निर्मित की. इस व्यवस्था में तालाब के कारण विस्थापित होने वालों को तालाब के पास की जमीन देने और गांव के भूमिहीन को पानी के वितरण की समिति का मुखिया बनाने जैसे प्रावधान थे.

मर्जी और मजबूरी में पलायन, विस्थापन की ऐसी कहानियां ऊपरी तौर पर भले ही दाल-रोटी के लिए रोजगार के लिहाज से की गई लगती हों, लेकिन इनमें वैसी गरीबी, दयनीयता दिखाई नहीं देती जैसी आज के थोकबंद पलायन में पग-पग पर दिख जाती है. परदेस जाकर रोजी-रोटी कमाना तो हमेशा मजबूरी में ही हुआ करता है, मगर यह आज की तरह अपने आत्मसम्मान को बेचकर नहीं होता था. आमंत्रित या जजमानी करने वाला समाज भी पलायन करने वालों की मजबूरी का उपहास उडाने के बजाए उनकी क्षमताओं, हुनर का सम्मान करता था.

ऐसा पलायन, विस्थापन समाज को आपस में एक-दूसरे को समझने का मौका देता था. जहां एक तरफ खेतिहर मैदानी समाज पहाड़ी आदिवासियों के रहन-सहन, खान-पान और कठिन हालातों से निपटने की आदतें सीखता था, वहीं दूसरी तरफ सुदूर आंध्र, उत्तराखंड या ओडीशा के लोग उसे नई तकनीकें सिखाते थे. कुंए से पानी निकालने के लिए रहट की तकनीक मध्य-प्रदेश के किसानों को पंजाब से करीब सौ साल पहले विस्थापित होकर आए लोगों ने सिखाई थी.

ऐसा नहीं है कि आज के पलायनकर्ता, विस्थापित हुनरमंद नहीं हैं. अपने-अपने इलाकों में खेती-किसानी और दूसरे रोजगार करने वाले ये लोग सीखने, समझने में माहिर होते हैं. आखिर बुंदेलखंड में बेहद संवेदनशील पान, परवल और सब्जियों की खेती और हाल में आया पीपरमेंट ऐसे लोगों की बदौलत ही फला-फूला है.

दूसरे इलाकों की तरह शिक्षा में बदहाल, लगभग पिछड़ा माने गए पर्यटन क्षेत्र खजुराहो के दर्जनों युवा आजकल फ्रेंच, जर्मन, पुर्तगाली जैसी भाषाएं सीख रहे हैं. इसी बुंदेलखंड में कपड़े, धातु और मिट्टी के कलात्मक कामों की लंबी परंपरा रही है. ऐसी हुनरमंद आबादी को उनके घर के आसपास ही काम उपलब्ध करवाया जा सकता है. सरकारें विकास को केवल भारी-भरकम बजट आकर्षित करने का जरिया मानती हैं, लेकिन क्या समाज और उसके साथ जुड़ी ढेरों औपचारिक-अनौपचारिक संस्थाएं ऐसा कर सकती हैं?
 

कभी पूजे जाते थे पलायन करने वाले

---राकेश दीवान
( भोपाल में राकेश दीवान जी से मुलाकात हुई, एक सेमिनार मेँ। मेरी फिल्म पर उनकी प्रतिक्रिया वाकई उत्साह बढाने वाली थी। उनका यह लेख बिना छापे मन नहीं मान रहाः गुस्ताख)


पलायन की चपेट में चकरघिन्नी होते लोगों को यह जानकारी चौंका सकती है कि एक जमाने में हुनरमंद पलायन करने वालों को पूजा भी जाता था. अपने-अपने इलाकों की मौजूदा बदहाली के बवंडर में फंसकर दाल-रोटी कमाने के लिए सैकडों मील दूर, अनजान इलाकों में जाने वाले आज भले ही शोषित, गरीब और बेचारे कहे-माने जाते हों, लेकिन एक समय था जब उन्हें उनकी श्रेष्ठ कलाओं, तकनीक के कारण सम्मान दिया जाता था. 

महाकौशल, गोंडवाना और बुंदेलखंड समेत देश के कोने-कोने में बने तालाब, नदियों के घाट, मंदिर इसी की बानगी हैं. सुदूर आंध्रप्रदेश के कारीगर पत्थर के काम करने की अपनी खासियत के चलते इन इलाकों में न्यौते जाते थे. काम के दौरान उनके रहने, खाने जैसी जरूरतों की जिम्मेदारी समाज या घरधनी उठाता था और काम खत्म हो जाने के बाद उनकी सम्मानपूर्वक विदाई की जाती थी. गोंड रानी दुर्गावती के जमाने में बने जबलपुर और उसके आसपास के बड़े तालाब, नदियों पर बनाए गए घाट इन पलायनकर्ताओं की कला के नमूने हैं. 
गुजरात से ओडीशा तक फैली जसमाओढन की कथा किसने नहीं सुनी होगी? इस पर अनेक कहानियां, नाटक लिखे, प्रदर्शित किए गए हैं, लेकिन कम लोग ही जानते हैं कि यह जसमाओढन और उनका समाज पलायन करने वालों का समाज था. परंपरा से ओडीशा, छत्तीसगढ़ के कारीगर मिट्टी के काम में माहिर माने जाते हैं. बडे तालाबों, कुओं की खुदाई के लिए इन्हें आमंत्रित किया जाता था और इनके साथ भी आंध्र के पत्थर के कारीगरों की तरह सम्मानजनक व्यवहार किया जाता था.
कभी पूजे जाते थे पलायन करने वाले


तालाब बनाने वाले पलायनकर्ताओं में छत्तीसगढ़ के रमरमिहा संप्रदाय के लोग भी शामिल हैं, जो अपने पूरे शरीर पर रामनाम के गोदने गुदवाते हैं. तालाब रचने के अपने बेहतरीन काम के कारण इन्हें दूर-पास के इलाकों में सादर बुलाया जाता है.

एक जमाने में दुरूह यात्राओं की कठिनाइयों को झेलते बंजारे देश भर में पालतू पशुओं और मसालों के व्यापार की गरज से लंबी दूरियां तय किया करते थे. बीच-बीच में उनका बसेरा तो हो जाता था, लेकिन जानवरों को पानी पिलाने कहां जाएं? ऐसे में वे अपनी हर यात्रा के ठौर-ठिकानों के आसपास तालाब खोदते जाते थे. लाखा बंजारे का बनवाया बुंदेलखंड के सागर का विशाल तालाब इन्हीं में से एक है. ऐसे अनेक जलस्रोत इन पलायनकर्ता बंजारों के पारंपरिक मार्ग पर आज भी देखे, उपयोग किए जाते हैं.

छत्तीसगढ़ के जशपुर में पानी के तेज बहाव से बनी बरसों पुरानी आटा पीसने की चक्की उत्तराखंड से पलायन करके आए पंडितों की सलाह पर बनी थी. ये पंडित आदिवासी, मराठा राज्यों, जमींदारियों में पंडिताई के लिए आते थे और अपने जजमानों को हिमालय के पहाड़ों में आजमाई गई कुछ-न-कुछ नई तकनीक दे जाया करते थे.

खेती को उद्योग का दर्जा दिलाने और इस नाते कटाई, बोनी, निंदाई, गुड़ाई आदि के लिए तरह-तरह की मशीनों की तरफदारी करते लोगों की नजरों से कुछ साल पहले तक दिखाई देते चैतुए अब ओझल हो गए हैं. पलायन की मार से बदहाल हो रहे बुंदेलखंड, मालवा, महाकौशल इन्हीं चैतुओं की दम पर अपनी खेती किया करते थे. आसपास के अपेक्षाकृत कम पानी के एकफसली और आमतौर पर आदिवासी इलाकों से ये लोग कटाई के चैत मास में आते थे और इसीलिए उन्हें चैतुआ कहा जाता था. 


पलायन या प्रवास

साल के दो-तीन महीने पलायन करने वाले इन चैतुओं को रबी के संपन्न इलाकों से न सिर्फ भरपूर अनाज और मजदूरी मिलती थी, बल्कि उनके रहने, खाने की व्यवस्था भी की जाती थी. कई जगहों पर तो साल-दर-साल आते रहने की वजह से उनका स्थायी नाता तक बन जाता था.

आमतौर पर सुंदर, गहरे रंगों के परिधानों से सजे-धजे राजस्थान के गाडिया लुहार सडकों के किनारे आज भी दिखाई पड़ जाते हैं. कहा जाता है कि कभी किसी राजा से अनबन हो जाने के कारण इन लोगों ने विरोधस्वरूप काले कपड़े पहनकर लगातार घुमन्तू बने रहने का प्रण लिया था. यह प्रण आज भी बरकरार है और उंट, बकरी समेत अपने बाल-बच्चों, घर-गृहस्थी के साथ सतत पलायन करते ये गाडिया लुहार गांव-गांव में खेती, कारीगरी के लोहे के जरूरी औजार बनाते दिख जाते हैं.

ऐसा नहीं रहा है कि लोग अपनी-अपनी जड़-जमीनों को छोडकर केवल मौसमी पलायन के लिए ही दो-चार महीने का प्रवास करते रहे हैं. अपनी काबिलियत के बल पर उन्हें बिना प्रमाणपत्र के स्थायी निवासी बनने का निमंत्रण भी दिया जाता था और कभी-कभी तो वे उन इलाकों के राजा तक बन जाते थे. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव राज का इतिहास ऐसे ही बैरागियों के बसने का इतिहास रहा है.

ये बैरागी हरियाणा, पंजाब से उनी कपड़े, कंबल आदि लाकर गांव-गांव बेचते थे और फुरसत मिलने पर भजन गाया करते थे. गर्म कपड़ों के व्यापार ने उनकी गृहस्थी संभाली, लेकिन भजन गायन ने उन्हें राजा बना दिया. असल में सुरीले भजन गाने पर उन्हें समाज से जो एक-एक पैसा मिलता था, उसे वे जोड़ते जाते थे और कई बार तो यह रकम इतनी अधिक हो जाती थी कि छोटे-मोटे राजा, जमींदार उनसे कर्ज तक ले लिया करते थे.

राजनांदगांव से सटी छूरा रियासत के आदिवासी राजा द्वारा अपने राजपाट को गिरवी रखकर लिए गए ऐसे ही कर्ज में स्थिति कुछ ऐसी बनी कि चुकारा नहीं हो पाया. कर्ज में डूबते-उतराते महाबली अमरीका से लेकर टुटपुंजिए पाकिस्तान तक से उलट छूरा के राजा को कर्ज में डूबी रियासत नामंजूर थी, लेकिन गली-मुहल्ले में भजन गाने वाले बैरागियों को भी राजपाट की झंझटों से कोई मोह नहीं था. भारी मान-मनुहार के बाद बैरागियों ने आखिर राजनांदगांव में अपना चमीटा गाड़ दिया और सबसे पहला काम किया-विशाल रानीताल बनवाने का. बाद के इतिहास में इन बैरागी राजाओं के रेल लाइन डलवाने, अनेक तालाब खुदवाने, अकाल में देश की शुरूआती कपडा मिल ‘सेंट्रल क्लॉथ मिल’ (जो बाद में शॉ वालेस कंपनी की मिलकियत में ‘बंगाल-नागपुर क्लॉथ मिल’ उर्फ ‘बीएनसी’ के नाम से मशहूर हुई) बनवाने जैसे अनेक लोकहित के काम दर्ज हुए.

लगभग ऐसी ही कहानी मंडला जिले के उत्पादक हवेली क्षेत्र की भी है, जहां गोंड राजाओं ने कृषि में पारंगत लोधी जाति को बसाया था. लोधियों ने जंगल साफ करके खेत-तालाब बनाने की तजबीज के जरिए इलाके को बेहतरीन पैदावार का नमूना बना दिया. यहां भी बाद में इन्हीं लोधियों ने राज स्थापित किया और वीरांगना अवंतिबाई जैसी रानियां बनीं. ये वे ही अवंतीबाई हैं, जिनके नाम पर आज का विशाल बरगी बांध बनाया गया है. 




....जारी


Thursday, November 17, 2011

मय सूरज, शबनम साकी हैः कविता

एक शाम,
सूरज मचल गया,
किसी के प्यार में पिघल गया,
पहले लाल हुआ
फिर सुनहरा होकर
गिलास में ढल गया
बन गया
एक जाम
एक शाम।

एक भोर,
अलसाई नींद में
दूबों की नोंक पर
जमा हुई शबनम
पहले ठिठकी ज्यादा
फिर कम
शबनम, गिलास के सूरज से मिल गई
पाकर मुहब्बत
गुलाब-सी खिल गई।
बजने लगे जलतरंग
चहुं ओर
एक भोर।

एक दिन
कड़कती धूप से थके तीन दोस्त
सीढियों पर बैठ
हवा के साथ समझकर मय
सूरज औ शबनम को पी गए
लगा कि जिंदगी जी गए
पर सपनों के सूरज को पचाना
कहां आसान है,
कितना भी पिघल ले,
सूरज बर्फ तो नहीं होता,

मुश्किल है जीना सूरज बिन
एक भी दिन।


Saturday, November 12, 2011

अंधेर नगरी, चौपट चैनल

एक बार क्या हुआ कि वाकया बहुत दिलचस्प हुआ। अंधेर नगरी नामक राज्य के राजा को- जो कि एक बब्बर शेर था- एक चैनल की जरुरत महसूस हुई। ताकि वह चैनल जंगल राज के किस्सों को दिखा सके।

जंगल राज में कई किस्म की योजनाएं चलाई जाती थीं। बब्बर शेर चूंकि शेर था लेकिन उनके पिता- जो उनके जैविक पिता भी थे- ने उनका नाम चौपट सिंह रखा था। जंगल राज में नाम से ज्यादा महत्व काम का था और काम से भी ज्यादा महत्व उस चीज का था, जिसे अंग्रेजी में चीज, अथवा बटर या मक्खन कहते हैं। यहां चमचागिरी अकेले कारगर नहीं थी, उसमेंम बटरिंग यानी मक्खनबाजी की जरुरत थी। बहरहाल, बजाय देश की महिमा का बखान करने के, हम आपको सीधे चैनल में लिए चलते हैं।

तो उस चैनल का नाम भी देश के नाम पर ही अंधेर चैनल ही रखा गया। अंधेर चैनल में समान रुप से घोड़े -गधे भरे गए। वहां घोड़ों गधों में कोई फर्क नहीं था। लेकिन क्राइसिस आइडेंटिटी की थी। ये ठीक से पता ही नहीं चलता था कि घोड़ा कौन है और गधा कौन..।

दरअसल, घोड़े गधों को गधा समझते थे और गधे घोड़ों को...। गधे एक समान थे एक ही रंग के घोड़ों का रंग अलग-अलग था। कोई घोड़ा काला, कोई सफेद, कोई भूरा या कोई चितकबरा था। किसी घोड़े से काम लेने के दिन भी नियत नहीं थे। तो गधे जो घोड़ो को गधा समझते थे, उनको स्थायी तौर पर चैनल में रहने नहीं दिया गया।

चूंकि जंगल राज में प्रायः दंगल हुआ करते तो दूसरे महकमों को भी गधों की समान आवश्यकता हुआ करती थी। देश को घोड़ो की आवश्यकता तो थी लेकिन जंगल घने होने के साथ ही घोड़ा होना आसान होता गया था और गधा होना मुश्किल।

चूंकि गधे काम के बोझ से दबे हुए थे और उनको प्रोत्साहित करना जरुरी था। इसलिए अंधेर चैनल उनको हर साल सम्मानित करता था। चूंकि घोड़ों को वक्त पर घास दे दी जाती, कभी कभार कुछ वफादार घोड़ों को चना और गुड़ भी दिया जाता।

....जारी।

Wednesday, November 9, 2011

भूली-बिसरी चंद यादें

परसों शाम को अचानक पीयूष का फोन आया। फेसबुक, मोबाईल फोन, इंटरनेट ने दुनिया न जाने कितनी बदल दी है। पीयूष से पिछले आठ सालों से बात नहीं हुई थी। बचपन का दोस्त है मेरा। फोन आजकर बरेली में है।

बारहवीं तक विज्ञान पढ़ने के बाद एक तरफ मैं परिवार के मेरे डॉक्टर बनने के ख्वाब के झूले पर हिलकोरे ले रहा था, मेरा मन दूसरी और जा रहा था, वहीं पीयूष ने अपनी मां के सामने बिना लाग लपेट के अपना बात सामने रख दी थी। उसे चित्रकार बनना था। वह बन गया।

लखनऊ चला गया वो। मैं खेती बाड़ी पढ़ने लगा। यह बाद की बात है। उसके फोन ने मुझे अतीत की खिड़की पर खड़ा कर दिया है।

महज 30 की उम्र में स्साला यह अतीत क्यों खड़ा हो जाजा है मेरे सामने..? बचपन की कई चीजें एकसाथ साकार हो जा रही हैं।

उन दिनों जब हम नौजवान थे ( माशा अल्लाह जवान तो हम अब भी हैं, मेरे एक दोस्त ने कहा कि आप अपने लिए एक उम्र स्थिर कर लें, तो ताउम्र उसी उम्र का मिज़ाज बना रहता है, उन्हीं की सलाह पर हमने अपने लिए पहले 22 और बाद में संशोधित कर 26 की उम्र तय कर रखी है) उन दिनों गरमियों की लंबी छुट्टियों के साथ दुर्गा पूजा की छुट्टी भी होती थी, कॉलेज सीधे छठ की छुट्टियों के बाद खुलते थे।

यानी पहले 30- दिन की गरमी की छुट्टी फिर एक महीने क्लास और फिर 40 दिन छुट्टी। इन छुट्टियों का सदुपयोग होता। गरमी की दोपहर मैदान में क्रिकेट खेलने के लिए विकेट तैयार करने में इस्तेमाल में आता।

हमारे झारखंड में ज़मीन काफी कठोर हुआ करती है। तो विकेट बनाने के लिए हम उसे ईटों से घिसा करते थे। उसमें स्टंप्स आसानी से गाड़े नहीं जा सकते थे, हम उस जगह पर कई रावणों (खलनायक नहीं, आगे पढ़े) का इस्तेमाल करते।

स्टंप्स आसानी से गाड़े जा सकें, इसके लिए उस स्थान पर टीम के सदस्य मूत्र विसर्जन किया करते थे। देवघर में शिवगंगा के बारे में मान्यता है कि वह रावण के मूत्र से बना सरोवर है। इस मान्यता का इतना प्रैक्टिकल अप्रोच हम अपनाते थे लेकिन किसी ने हमें पुरस्कृत करने की कोई कोशिश तक नहीं की है। खैर...

मैदान में शीशम के कई पेड़ थे। हम फुनगियों तक चढ़ जाते। गिल्ली डंडा बनाने के लिए उपयुक्त शाखाओं की खोज की जाती। सारी दोपहर गिल्ली डंडे का खेल होता। सूरज थोड़ा तिरछा होता तो क्रिकेट शुरु किया जाता।

शाम को धूल-धूसरित हम घर पहुंचते। उसके बाद हमारे कड़क भाई साब हमारी कस के कुटाई करते। लेकिन उस पिटाई का भी अपना मजा था। मधुपुर बहुत याद आ रहा है।

दिल्ली में गाड़ियों की चिल्लपों के बीच छोटा-सा मधुपुर बहुत याद आ रहा है। दो साल हो गए मधुपुर जा नहीं पाया हूं। पहले मधुपुर का था, दिल्ली आ गया हूं, यहां का होने की कोशिश में कहीं का नहीं रहा..।



Friday, November 4, 2011

सप्तपर्णी का मौसम

सप्तपर्णी के फूल खिल गए हैँ। उसकी मादक गंध मेरे दिलोदिमाग में छाती जा रही है। यह गंध मुझे अपने दस साल पीछे अतीत में ले जाती है।

दिल्ली खुद से न जाने किस तरह लोगों को जोड़ती है। मुझे इसने सप्तपर्णी की मादक खुशबू से जोड़ा है। हर जगह आपको किसी न किसी तरह जोड़ती होगी। दिल्ली का ख्याल मन में आते ही विजुअल्स अलग लोगों के मन में अलग अलग आते होंगे...किसी के मन में दिल्ली का मतलब लाल किला होगा, कोई इंडिया गेट से तो कोई कुतुब मीनार से जोड़ता होगा, किसी के लिए दिल्ली संसद भवन से आगे कुछ नहीं। जैसे खयालात वैसे विजुअल्स...लेकिन किसी जगह को लेकर कोई खुशबू कौंधती है मन में...??



मेरे मन में दिल्ली, खासकर दिल्ली की रात की गंध सोचते ही यह एक खूशबू में तब्दील होती है।

आप अगर दिल्ली में रहते हैं, तो एक मादक गंध ने आपका ध्यान भी ज़रूर आकर्षित किया होगा। खासतौर यह गंध अक्तूबर के आखिरी महीनों और नबंवर के आखिर तक के कुछ सप्ताहों में ही नाकों तक पहुंचती हैं।

इस मनमोहक गंध ने मुझे शुरु से अपनी ओर खींचा। पहले तो पता ही नहीं चला कि आखिर वो पेड़ है कौन सा। मैं साल 2002 में भैया के घर आश्रम से अपने एक सीनियर के घर जाता था। नॉर्थ में। पहले वो विजयनगर में रहते थे, फिर मुखर्जीनगर की तरफ शिफ्ट हो गए।

मैं महारानी बाग से बस पकड़ता था...रिंग रोड तीव्र मुद्रिका। मुद्रिका सर्विस की ब्ल्यू लाईन की बस के भीतर बदबुओँ का भभका होता था। लेकिन एक बार बस सराय काले खां बस अड्डे को पार कर गई तो खिड़की से इस मादक हवा के झोंके आने लगते थे। मैं प्रायः शाम को जाता था और रात 11 बजे तक लौटता, कुछ पढाई-वढाई करके। जाते समय यह खुशबू कम तेज होती...वापसी का सफर इस खूशबू की वजह से बेचैन रहता।


लगता कि कोई मुझे, मेरे पूरे वजूद को कही से पुकार रहा है, पुकार ही नही रहा, झकझोर कर अपनी तरफ खींच रहा है। बहुत खोज के बाद वह पेड़ पता चल ही गया, जो योजनगंधा की तरह मुझे अपना बनाए हुए थी।

छोटा था तो मां कहती थी रात को इत्र, सेंट खुशबू वगैरह न लगाया कर या देर रात अकेले जाते समय, कही कोई खूशबू पता चले, तो उसकी चर्चा मत किया कर। परियां रात में खुशबू लगाकर कुंवारों को रिझाती हैं। सच तो यह है कि अगर अंगरेज जिस पेड़ को डेविल्स ट्री कहते हैं, या मां के मुताबिक जो खुशबू परी की या अप्सरा की, या किसी चुड़ैल की ही हो..वह रिझाती है, तो सच तो यह है कि सप्तपर्णी ने मुझे रिझा लिया था।


 इस  वृक्ष को भारत में सामान्यतः सप्तपर्णी के नाम से जाना जाता है और इसका वैज्ञानिक नाम एलस्टॉनिया स्कॉलरिस है। अंग्रेज इसे अगर इसे डेविल्स ट्री कहते हैं तो गलत नहीं कहते। कभी कभार इसे  ब्लैकबोर्ड ट्री के रूप में भी जाना जाता है। बॉट्नी वाले जानते होंगे कि यह पेड एपोसाएनेसी परिवार का है।


कभी इतिहास में हमने कही पढ़ा था, सप्तपर्णी की गुफाओं के बारे में। क्या इन्हीं पेड़ो के नाम पर गुफा समूहों का नाम पडा़ था..। जो भी हो, अब जब इस पेड़ से पहचान हो गई है, सप्तपर्णी के पेड़ जहां कहीं देखता हूं, किसी भी मौसम में, बड़ा अच्छा लगता है।

लगता है किसी ऐसे चाहने वाले से मिल रहा हूं, जो मुझसे कुछ मांग नही रही, जिसकी कोई शर्त नहीं है। जो सिर्फ खुशबू दे रही है। जो बड़ी बड़ी आंखों, घनेरी जुल्फों से मेरी तरफ देख तो रही है..लेकिन शिकायत उसकी इतनी ही है, हम काट मत देना।

घनेरी जुल्फें इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि सप्तपर्णी का पेड़ बहुत हरियाला होता है। एक हरा, कचोर, घना। आप को दिखे, ये पेड़, आपको कभी खुशबू मिले इसकी, तो कहिएगा, मंजीत बहुत याद करता है तुम्हे सप्तपर्णी...।

Sunday, October 30, 2011

भदेस फॉर्मुला वन कविता

कारी कारी सड़कों पर
मोट मोट चक्का
32 रुपये पर गुजर वाले देश में
विकास को लगा धक्का (आगे की ओर)

मर्सिडीज फरारी से
प्रसन्न हुए माल्या
चौड़े चक्कों से
खुश हुए मोंटेक सिंह अहलूवालिया
एफ वन जैसी तेज मंहगाई से
खुश हुए मनमोहन

जेतना तेज सरकार
ओतना ही तेज दौड़ रहा है कार

बाकी सब बेकार
बाकी सब बेकार।।

लेकिन हमरा है चुनौती
खडंजा पर चलाके देखिएगा
मर्सिडीज फरारी पुआल का बोझा से
जहां ओभरलोड होता है ट्रॉली
उसी देस में..
फॉर्मुला वन रेस में।।


Saturday, September 24, 2011

अजीब `मौसम` है ये , बिखरा-बिखरा बिगड़ा-बिगड़ा सा...

मौसम किसी का भी मूड बिगाड़ने की काबिलियत खुद में समेटे है। कॉमेडी , ट्रेजेडी, रोमांस का ये दमघोंटू कॉकटेल पंजाब के मल्लूकोट, कश्मीर , अहमदाबाद, स्कॉटलैंड और स्विटजरलैंड के बीच दर्शकों को चकरघिन्नी के माफिक नचाती है।

पंकज कपूर की इस चिरप्रतिक्षित फिल्म से लोगों को किसी भी मौसम और मूड में निराशा ही हाथ लगेगी, अभिनय के महारथी पंकज कपूर फिल्म निर्देशन के अखाड़े में पस्त हो गए। पंजाब और कश्मीर से शुरु हुआ फिल्म का सफर अहमदाबाद जाकर ही खत्म हुआ ।


जादू की कमी इस मौसम में, पंकज कपूर ने निराश किया

शाहिद और सोनम के गंगा-जमुनी प्यार की गाड़ी जब भी रफ्तार पकड़ती , जहरीला जमाना अयोध्या , बंबई, कारगिल , 9/11 की शक्ल में प्यार के इन पंछियों को मानो साजिशन विपरीत दिशा में उड़ने को मजबूर कर देता... खैर मासूम रज्जो के अनवरत प्रेम ने भी कुछ कम नुकसान नही पहुंचाया ।

अन्त तक आते आते दर्शकों का दिल घबड़ाने लगा कि शाहिद-सोनम के अटूट प्यार को दिल्ली हाइकोर्ट की नजर न लग जाए... पंकज कपूर को धन्यवाद कि आशंका आशंका ही रही और शाहिद-सोनम के प्यार को दिल्ली की नजर नही लगी।

शाहिद ने अदाकारी के जलवे, लेकिन फिल्म घटनाजाल में उलझी

हकीकत फिल्म के एक मशहूर गाने की लाइन है- कहीं ये वो तो नही , लेकिन दर्शकों के सामने दूर-दूर तक ऐसा कोई कंफ्यूजन नही। दर्शक पंकज कपूर से काफी कुछ ज्यादा की उम्मीद लगाए थे, और खासकर तब जबकि मुख्य किरदार के चोले में खुद उनके सुपुत्र हों ।




पोस्ट स्क्रिप्ट-- कुछ घोर टाइप के दर्शक गौरी, गजनबी, मुगल और सन सैंतालीस की कमी महसूस करते दिखे और सुनाई भी दिए।
 
( इस समीक्षा के लेखक रजनीश प्रकाश हैं। फिल्मों के शौकीन और प्रायः हर फिल्म देख लेने वाले रजनीश मौसम देखने के बाद से बहके-बहके और परेशान से घूम रहे हैं। कहते हैं पंकज कपूर ने उन्हें ठग लिया)

Friday, September 23, 2011

चलो हमहूं यात्रा कै आई


एक रहें निरहू, एक रहें घूरहू। दुनू जने के सपन आवा कि यात्रा कै लेबा तौ तोहार भाग चमक जाई। भई योजना बनी, दूनो जने समय और जगह तै कै लेहैं लेकिन निरहू के रथयात्रा में पेंच आई गा। 
अपने बड़े भाई के आज्ञा के बिना कैसे करैं यात्रा, काहे कि साजो सामान तौ बड़े भैया ही तैयार कराइहैं। बिचारै मिलैं गएं पर कौनौ बड़ा आश्वासन नहीं मिला, आपन एस मुंह लेके रह गयें। बेचारे मुल्लही बनके रह गएं। 
काव करैं अब...तो मुनादी पिटवाइन देहे रहैं यह बेर यात्रा तो होबै करे ऐसा सोच के लौट आए, जोन ख्वाब मन रहन सब तो नहीं लेकिन कुछ तौ मटियामेट होइन गवा। बड़े बुजुर्ग कहे अहैं कि जब ज्यादा उनर होई जाय तो कंठी माला लै लेक चाही, बुढौती मा ससुर सठिआय गवा है। अब केहू का करै जब निरहू आपन भद्द पिटावई मा लगा अहै। जा तोहार रामव मालिक नहीं रहे गए। खाली डोल पीटा और मंजीरा बजावा। कुछ उखाड़ न पाउबा।
अब बात घुरहू कै सेवा यात्रा करत अहैं, अरे भएवा, पहले ठीके से सेवा तौ कै लिआ, फिर सेवा यात्रा निकाल्यो। जनता जैसे चढ़ावथै वैसे उतारुय देत है, विकास वाला मनई बना रहा, घूरे मा फैंके मा देर न लागे।
 तोहरे शौंक चढ़ा अहै पूरा कै लिया, गांव-गांव घूमे कै बरै बूता चाही, दस परग चलबा, कांच निकर आए। 

इनके विरोध मा ेक जनै लोटा प्रसाद पोल-खोल यात्रा निकालत अहैं। अरे पहले अपने खोल मा झांक लिया जहां केवल पोलै-पोल अहै। सरऊ कुछ कै नही पाए तो डुगडुगी बजावत अहैं। जनता के खून चूस के समानता लावत अहैं, बहुड़बक कहीं का।
ेक जनै कैं परिवार कऊ साल से राज करत अहैं। पीढी दर पीढी उनके परिवार के वंदना होत अहैं। उनके परिवार से ेक जने पदयात्रा करत रहथैं और घूमत थै गाड़ी से। 
हालचाल पूछै कै दावा करत थै, अरे अपने घरौ मा झांक लेवा करा, रोज-डेली जाथ्या लेकिन कुछ होइन नहीं पावत तो का फायदा। 
भाट चारण लाग अहैं, उनका राजकुमार बनाबै का बरे, उनकै हाल तौ बहुतै बुरा अहै, अपने मन सोचिन नहीं पावत। देखकै पढईस तबो गड़बड़ाई दिहिस। अरे मुंहचोट्टा के कहे रहा इ सब करै का, जब बोल नहीं पउता तो चुप रहता। 

ऐसा जोश मा आया कि रहा सहा लगा सगा सब गंवाय बैठा। और सुने भूकंप वारे गांव मा गा रह्या। सब बताबत रहै, हवा आंसू पौंछे के बजाय मुस्कियात रह्या, और युवा रैली करत अहा। कुछ तो सहूर सीख लिया।  न हुऔ तो, अपनी महतारी से पूछ ल्या। कुछ आवत जात नहीं, बागडौर पकड़िहैं। 
जा एहि देस कै नैया ऐसे डूबत अहै तूहू थोड़के गड्ढा मा ढकेर देबा तौ फरक का पड़ जाए।
तौ भैय्या ऐसे का सीख मिली, यात्रा करा, लेकिन जोन यै सबे करते अहैं ऊ बाली नहीं। उठास खड़ा हुआ, जागा विचार करा, अपने जीवन के विकास के बरै यात्रा करा। आत्मिक उन्नति करा। कहावत अहै, आप भला तो सब भला। चला राम राम। 
इतना कह कर चचा ने घड़ी देखी। रात के दस बज रहे थे। फटाफट पान कल्ले में दबाकर गुस्ताख को राम जोहार कर रामलला के रामल्ला की ओर निकल पड़े। 
(भाषा -अवधी, लेखकः कौशल जी, डीडी न्यूज में मेरे सहयोगी, वरिष्ठ कॉपी एडिटर हैं)

Monday, September 19, 2011

मोदीः विचारक, प्रचारक या विकासपुरुष

नरेन्द्र मोदी अपने राजनैतिक उपवास पर बैठें हैं। गुजरात में उनकी राजनीति चमक रही है, सफेदी की चमकार से वह बीजेपी के दूसरे नेताओं को चमत्कृत कर रहे हैं। तीन दिनों का उनका उपवास उनके प्रायश्चित के रुप में देखा जाना चाहिए, या प्रधानमंत्री की कुरसी तक के लॉन्च-पैड के रुप में, इस पर गहन विश्लेषण करना होगा।

प्रश्न यह भी है कि मोदीत्व को क्या बीजेपी ने एक राजनीतिक दर्शन के रुप में स्वीकार कर लिया है? ऐसी परिस्थिति में जब अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ के तौर पर सन्यास ले चुके हैं, और आडवाणी का कद लगातार छीज रहा है, सुषमा और जेटली पर बढ़त बनाने के लिए मोदी का यह दांव सामने आया है। वह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट ने दंगे के एक मामले की जांच के लिए इनकार करते हुए इसे निचली अदालत को ही निबटाने को कहा। मोदी एंड कंपनी इसे अपने लिए क्लीन चिट मान रही है, इसके बाद ही उपवास का फ़ैसला सामने आया।


अपने उग्र हिंदुत्व के लिए मशहूर (बदनाम) मोदी के इस उपवास के मकसद को राजनैतिक बताया जा रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री मोदी इन आरोपों से विचलित नहीं दिखाई दिए और बात बात पर गुजरात के विकास की दुहाई देते रहे। इन तीन दिनों में टीवी चैनलों के साथ इंटरव्यू में उन्होंने बार बार यही कहा कि लोग गुज़रात में हो रहे विकास पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हमारे कई पत्रकार मित्रों को भी ऐसा ही लगता है।

डीडी न्यूज़ में वरिष्ठ राजनैतिक संवाददाता और मेरे सहयोगी संदीप झा ने मोदी के विकास पुरुष की छवि पाने की कोशिशों पर अपने फेसबुक अपडेट में लंबा-सा नोट लिखा है। झा लिखते हैं, "नरेंद्र मोदी के उपवास का मकसद राजनीतिक है। इसमें कोई शक नहीं। लेकिन क्या इससे पहले इस देश में राजनीतिक मकसद से उपवास या अनशन नहीं किया गया ? क्या किसी विकासशील देश में जो , जो देश राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहा है, वहाँ राजनीति को अप्रसांगिक मान लिया जाए ? क्या किसी राजनेता को अपना आधार व्यापक करने का अधिकार नहीं है ? क्या सामाजिक सुधार और आर्थिक सुदृढ़ता के लिए राजनीति प्रस्थान बिंदु नहीं है ?" 


निश्चित रुप से विकास के तमाम मॉडलो के लिए राजनीति से ही रास्ता खुलता है। संदीप अपने लेखांश में इस बात पर ज़ोर देते हैं कि नरेन्द्र मोदी ने विकास के रास्ते को चुना है और अपने कद को बढाने के लिए ऐसे राजनैतिक स्टंट करना कोई गलत बात नही। संदीप आगे कहते हैं, "नरेंद्र मोदी के उपवास पऱ जो लोग हाय-तौबा मचा रहे हैं, उन्हें राहुल गाँधी की नौटंकी और सोनिया गाँधी का दोमुंहापन नहीं दीखता। उस वक्त बोलती बंद हो जाती है, या संविधान का अनुच्छेद 19 क काल कवलित हो जाता है। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में जो काम किया, कांग्रेस की सरकार ने पिछले पचास साल में देश में तो छोड़िए अपनी बपौती कही जाने वाले संसदीय क्षेत्र रायबरेली अमेठी और सुल्तानपुर में भी किया होता तो बात समझ में आती। अगर राहुल बेबी जैसे नौसिखिए को राष्ट्र की राजनीति में प्रधानमंत्री पद का स्वभाविक उम्मीदवार मान लिया जा रहा है तो नरेंद्र मोदी ने तो अपनी काबिलियत साबित की है"

निश्चित तौर पर मोदी प्रशासनिक तौर पर एक काबिल नेता हैं। गुजरात का आर्थिक विकास भी हुआ है। लेकिन क्या सिर्फ यही बात उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनने के योग्य बना देता है? क्या भारत के आगे के सभी प्रधानमंत्री बिजली सड़क पानी के मुद्दे पर काम करने लायक लोगों में ही चुने जाएँगे। और एऩडीए का समीकरण मोदी के पक्ष में ज्यादा जुटेगा या नीतीश के पक्ष में।


नीतीश पर बाद में बात पहले मोदी की करें। हिंदुत्ववादी मीडिया ने एक विचारक के तौर पर उनको पेश करने की कोशिश की है। यानी उग्र हिंदुत्व की उनकी टेक को मोदीत्व का नाम दिया गया। गुजरात में केशुभाई पटेल और शंकर सिंह बाघेला के बीच झगड़े की जड़ मोदी ही बताए जाते हैं।

इन्ही मोदी की वजह से बाघेला को-जिन्होंने आरएसएस और बीजेपी की जड़े गुजरात में जमाने में अहम भूमिकी निभाई थी- को बीजेपी छोड़नी पड़ी। तब मोदी के हिमाचल भेजा गया जहां ये पुनः प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार के बीच युद्ध के सू्त्रधार बने।

अपने मुख्यमंत्री बनने तक मोदी संघ के प्रचारक थे। उन्हें कुछ ऐसे ही लाया गया था जैसे उत्तर प्रदेश में रामबाबू गुप्ता, मध्य प्रदेश में बाबू लाल गौड़, और दिल्ली में सुषमा स्वराज लाई गई थीं। मोदी के मोदीत्व के लिए उनकी विचारधारा को जिम्मेवार बताया जाता है। लेकिन, दंगों के दौरान उनके कार्यकलाप साबित करते हैं कि गोधरा की घटना को उन्होंने न सिर्फ एक मौके के तौर पर लिया। और रातों-रात कथित तौर पर हिंदू हृदय सम्राट हो गए। गुजरात अस्मिता के नाम पर मोदी ने अपनी दुकान खड़ी की। विचारधारा के अंदर अगर मोदी होते तो गुजरात में आरएसएस को कमजोर नहीं बनाते।

मोदी ने गुजरात बीजेपी में भी विकल्पहीनता की स्थिति पैदा कर दी है। संगठन निष्ठा को मोदी-निष्ठा ने रिप्लेस कर दिया है। मोदी के खिलाफ सोचने वाले हरेन पांड्या बन गए।

अब मोदी में प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब जागा है। कुछ उसी तरह जैसे कुछ पहले आडवाणी में जागा था। लेकिन इसके लिए उन्हे अपनी छवि को नील-टिनोपॉल से धोकर चमकदार बनाना होगा। जाहिर है, मोदी अपनी छवि बनाने के लिए उपवास वगैरह कर रहे हैं। लेकिन, अब वे प्रचारक और विचारक तो नहीं रहे। ऐसे में मोदीत्व शुद्ध फासीवादी रवैये के सिवा और क्या कहा जा सकता है, जहां उनका पितृ-संगठन आरएसएस भी ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

रही बात उनके विकास पुरुष होने की...दावे चाहे जितना करें। नीतीश उनके सामने प्रबल दावेदार के रुप में सामने आएँगे। नीतीश ने मोदी के उपवास पर कोई टिप्पणी नहीं करके अपनी मंशा जता भी दी है। वो सब...अगली पोस्ट में।.

Saturday, September 17, 2011

क़िस्सा कहानी-दाल बिरयानी उर्फ धर्मात्मा सेठ जी

एक थे सेठ जी। जैसा कि आमतौर पर कहानियों में होता है, सेठ जी बड़े दयालु थे और प्रायः पुण्य इत्यादि करने के वास्ते हरिद्वार वगैरह जाते रहते थे। एक बार वह गंगासागर की यात्रा पर गए। कहते हैं, सब धाम बार-बार, गंगासागर एक बार। 
ये भी मान्यता है कि गंगासागर जैसी पवित्र जगह में अपनी एक बुरी आदत छोड़कर ही आना चाहिए। इस बाबत सेठ जी अपने दोस्त से बातें कर ही रहे थे, और उसे बता रहे थे कि इस बार वह अपने बात-बात में गुस्सा हो जाने की आदत को गंगासागर में ही छोड़ आए हैँ।

सेठ जी का दोस्त बड़ा खुश हुआ, हमेशा की तरह सेठानी भी मन ही मन नाच उठी कि अब तो सेठ जी उसे हर बात पर नहीं डांटेंगे। जैसा कि आमतौर पर होता है, सेठ जी लोगों का एक नौकर होता है और आमतौर पर उसका नाम रामू ही होता है। इन सेठ जी के भी नौकर का नाम भी रामू ही था।

तो, उसी मुंहलगे रामू से सेठ जी ने पीने के लिए पानी मंगवाया। रामू ने सेठ जी के लिए पानी का गिलास रखते हुए सेठजी और उनके दोस्त के बीच में टांग अडाई और पूछा, "सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ?" सेठ जी जवाब दिया- गुस्सा छोड़ आया हूं। रामू पानी रखकर चला गया।
फिर छोड़ी देर बाद जब वह ग्लास उठाने आया तो उसने फिर पूछा, "सेठ जी, आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ?" सेठजी ने मुस्कुराते हुए कहा, "गुस्सा छोड़ कर आया हूं।"

कुछ देर और बीता रामू फिर सवाल लेकर आ गया- सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ? सेठ जी थोड़े झल्लाए तो सही लेकिन उन्होंने अपने-आपको जब्त करते हुए कहा कि मैं गंगासागर में गुस्सा छोड़कर आया हूं।

फिर रात के खाने का वक्त आया। रामू फिर खुद को रोक न पाया, पूछ ही बैठा- सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ? अब तो सेठ जी का पारा गरम हो गया। जूता उठा कर दौड़े और नौकर को पटक दिया। लातों से उसे दचकते हुए उन्होंने कहा, हरामखोर। तब से कहे जा रहा हूं कि गुस्सा छोड़कर आया हूं तो सुनता नहीं? हर जूते के साथ सेठ जी कहते सुन बे रमुए, गुस्सा छोड़ कर आया हूं, गुस्सा। गुस्सा। गुस्सा।

इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है? 
पता नहीं आपको क्या शिक्षा मिली, मुझे तो ये मिली कि नंबर 1- किसी सेठ के यहां नौकरी मत करो।
२- नौकरी करनी ही पड़ जाए तो सेठ के दोस्तों के साथ बातचीत के दौरान मत उलझो, वह नौबत भी आ जाए तो सवाल मत पूछो और नियम पालन करो कि सेठ एज़ आलवेज़ राइट
३- कभी किसी सेठ की बात का भरोसा मत करो, चाहे वह गंगासागर से ही क्यों न आया हो।

Monday, September 12, 2011

नायक तलाशता भारत

अन्ना हजारे का रामलीला मैदान में चल रहा अनशन खत्म तो हुआ, लेकिन वह कई सवाल भी छोड़ गया है। इस अनशन के दौरान मैं अन्ना हूं लिखी गांधीटोपी भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान की पहचान बन गई, और अन्ना उसके नायक। आखिर अन्ना को यह नायकत्व मिला कैसे, जबकि एक सर्वेक्षण के अनुसार जंतर-मंतर पर अनशन से पहले देश में लोग बाबा रामदेव के मुकाबले अन्ना के बारे में कम जानते थे। लेकिन, रविवार की कड़ी धूप वाली सुबह जब अन्ना हजारे ने सिमरन और इकरा, दो बच्चियों के हाथों अनशन तोड़ा तो मैदान में तिल रखने की जगह नहीं थी। 

कड़ी धूप में बेहाल दो दर्जन से ज्यादा लोग गश खाकर गिरे, लेकिन जन-सैलाब थमा नहीं। आखिर, अन्ना ने ऐसा क्या किया कि इतने लोगों का समर्थन उन्हें मिला?

जन-जन की उम्मीद बने अन्ना

दरअसल, अन्ना के आंदोलन ने जनता की आंखों में एक उम्मीद बो दी। इन आँखों में भ्रष्टाचारमुक्त समाज का सपना तैरने लगा। लहराते तिरंगों, भारतमाता की जय और वन्दे मातरम् के उद्घोष ने अन्ना के अखिल भारतीय नायकत्व को पुष्ट कर दिया।

अनशन के दौरान नारों और मीडिया ने उन्हें देश का दूसरा गांधी घोषित कर दिया। वस्तुतः, भारत के लिए नए नायक बने अन्ना हजारे के पास इसकी पूरी तैयारी थी। विज्ञापन प्रबंधन की भाषा में, अन्ना ने भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित कर पूरे मध्य वर्ग को अपने साथ कर लिया। मध्यवर्ग के तमाशाई स्वभाव, भीतर के गिल्ट और कॉरपोरेट मीडिया ने उसे रोड पर उतार कर हाथ में मोमबत्तियां थमा दीं।
अन्ना के नायकत्व के पीछे कई स्थापनाएं दी जा सकती हैं। पहली तो यही कि, हाल के वर्षों में मंहगाई के अतिरेक से निम्न और मध्य वर्ग असंतुष्ट था। स्थापित राजसत्ता के प्रति असंतोष तो आमतौर पर चुनाव में भी दिखता है। गैस, बिजली, दूध, पेट्रोल की कीमतों से जूझती जनता ने भ्रष्टाचार को मुद्दा माना, हालांकि किसी भी दल ने भ्रष्टाचार को इस पैमाने पर जनता के सामने रखा नहीं था। 
हर दौर में जनता को चाहिए होता है अपना हीरो


किसी चीज को हासिल करने या किसी बड़े बदलाव अथवा प्रतिरोध का माहौल बनाने की खातिर हम नायक तलाशते हैं। अवाम को हमेशा एक रोल मॉडल चाहिए। वह अपनी आस्था को टिकाने के लिए स्थान ढूंढ़ता है। इसी प्रक्रिया के तहत देवता अस्तित्व में आए। आदमी ने देवता को रचा। वहाँ आश्रय ढूंढ़ा। राम नायक। कृष्ण नायक। ऐसा नायक जिसमें कोई कमी नहीं। सर्व गुण संपन्न। हमेशा जीत हासिल करने वाला। मगर यह पराजित होते मनुष्यों का दौर है। आज किसी भी क्षेत्रा में असल नायक नहीं है। अवाम को लगता है कि भारत खलनायकों से भरा है।

यह भारतीय मानसिकता ही है जो हमेशा नायक की तलाश करता है। उसके अवचेतन में अवतारवाद है- एक ऐसा ईश्वर या नायक जो चमत्कार करता है।

कुछ साल पीछे चलें तो बोफोर्स घोटाले के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था। उस वक्त उन्हें भी जनता ने नायक का दर्जा दिया था और उन्हें सत्ता भी सौंपी। ये बात और है कि राजा मांडा राजनैतिक रुप से उस बढ़त को समेटकर रख  नहीं पाए।

उत्सवधर्मी भारत के मिजाज को समझना मुश्किल है। वह अलग-अलग विधाओं से अपने नायक चुनता रहा है, कभी उसने अपना हीरो विश्वकप जीतने वाले महेन्द्र सिंह धोनी में दिखता रहा, जिनका आत्मविश्वास से भरा मैचजिताऊ छक्का हाल तक ( चार टेस्ट मैच हारने तक) भारतीय गौरव का प्रतीक बना रहा। कभी महान क्रिकेटर तेन्दुलकर तो कभी सहवाग नायक बनते रहे।

वीपी से पहले राजीव गांधी थे, जिन्होंने राजनीति में पदार्पण तो हीरो तरह ही किया, जनता शुरु में उनसे हीरो की तरह बर्ताव करती रही, और इंदिरा लहर के नाम पर राजीव ऐतिहासिक बहुमत से जीते। लेकिन जल्दी ही उनकी मिस्टर क्लीन की छवि छीजती चली गई।

इसी रामलीला मैदान में जहां, अन्ना के अनशन ने लाखों लोगों को मैं अन्ना हूं कहने को प्रेरित किया, वहीं जयप्रकाश नारायण ने सिंहासन खाली करो कि जनता आती है की हुंकार भरी थी। जेपी संपूर्ण क्रांति और इमरजेन्सी के गहन विरोध के कारण जनता के हीरो बने और बने हुए हैं।

राजनैतिक शख्सियतों में गांधी पटेल और नेहरु भी नायकों जैसी हैसियत रखते हैं। आजादी के आंदोलन के दौरान जनता इनमें करिश्माई छवि देखती थी। गांधी बाबा तो मसीहा और अवतार माने जाने लगे।

आजादी के बाद के रियलिटी चैक वाले दौर में जनता ने अमिताभ बच्चन को अपना नायक माना। अमिताभ बच्चन गुस्सेवर नौजवान के रुप में देश की जनता के गुस्से को जंजीर से इंकलाब तक परदे पर साकार करते रहे।

उदारीकरण के बाद पाकिस्तान से कड़वाहट और उग्र-राष्ट्रवाद के दौर में मिसाइलमैन एपीजे अब्दुल कलाम को जनता नायक मानती रही। लेकिन, उनके राष्ट्रपति पद से अवकाश के बाद जनता एक नायक की तलाश कर रही थी, जिससे एक चमत्कार की उम्मीद की जा सके। 
हीरो मिलने पर भड़कती है देशभक्ति की भावनाएं


परदे पर स्टीरियोटाइप नायक की कमी भी जनता को खल रही थी, क्योंकि ज्यादातर अभिनेता या तो कॉमिडी कर रहे थे या फिर चॉकेलटी रोमांस। ऐसे में दबंग, रेडी और वॉन्टेड में सलमान खान ने नायकत्व को फिर से परदे पर जिंदा किया, और जनता ने उन्हें स्वीकार भी किया।

लोगों में मंहगाई, बेरोजगारी और विभिन्न मुद्दों पर गुस्सा था ही, मधु कोड़ा से लेकर राजा तक, राष्ट्रमंडल खेल से लेकर टू-जी तक, एक असंतोष और ठगे जाने के अहसास भी था जिसने समाज में एक नायक की जरुरत पैदा की। भट्टा-पारसौल जैसे मसले पर राहुल गांधी ने हस्तक्षेप जरुर किया, लेकिन नायक का रुतबा हासिल नहीं कर पाए। अन्ना ने सही वक्त पर सही तार छेड़ दिया, और उनको जनता ने नायक बनाकर सिर-आँखों पर बिठाया। आखिर, नायकत्व के लिए सादगी और त्याग दोनों की जरुरत होती है, जनता का मूड भांपने की भी।

 ( मेरा यह आलेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित हुआ था)