Monday, December 11, 2017

राहुल अब शहज़ादे नहीं रहे!

तेरह साल तक टालते रहने के बाद नेहरू-गांधी खानदान के वारिस ने आखिरकार कांग्रेस की कमान तो संभाली लेकिन सवाल यही है कि क्या वह इस सबसे पुरानी औप पस्त पड़ी पार्टी में नई जान फूंक पाएंगे? खासकर तब, जब मौजूदा समय में सियासी परिस्थितियां तकरीबन कांग्रेसमुक्त भारत की तरफ ही बढ़ रही हैं.

16 दिसंबर से (संयोग है कि यह विजय दिवस भी है) राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष का पदभार संभालेंगे. अब यह और बात है कि यह जिम्मेदारी उनके लिए पद की तरह रहता है या भार की तरह. हाल तक, गाहे-ब-गाहे कुछ मौकों को छोड़कर राहुल गांधी ने ज्यादा कुछ ऐसा किया नहीं कि उन पर भरोसा किया जा सके.

उनके लिए पहली चुनौती तो यही होगी कि वह खुद पर नेहरू-गांधी खानदान के छठे सदस्य के रूप में बने अध्यक्ष का तमगा छुड़ा सकें. भाजपा ने उन पर नाकामी का ठप्पा चस्पां करने में सोशल मीडिया मशीनरी का बखूबी इस्तेमाल किया है.

हालांकि, पिछले तेरह साल में राहुल गांधी लगातार कमजोर और हाशिए पर पड़े वंचित तबके की आवाज बनने की कोशिश करते रहे. लेकिन उनकी कोशिशें बड़े कदम की बजाय प्रतीकात्मक ही रहीं.

जरा तारीखवार गौर करें,

2008 में राहुल गांधी ओडिशा के कालाहांडी जिले के नियामगिरि में डंगरिया कोंध आदिवासियों के साथ खड़े हुए और कांग्रेस ने उनको नियामगिरि का सेनापति घोषित किया. बाद में, नियामगिरि में वेदांता को खनन पट्टा रद्द कर दिया गया. अगले साल 2009 में उन्होंने भारत की खोज यात्रा शुरू की था और यूपी के दलितों के यहां खाना खाकर खुद को जमीन से जुड़ा नेता साबित करने की कोशिश की. इसका फायदा 2009 के लोकसभा चुनावों में मिला.

साल 2011 में राहुल किसानों के भूमि अधिग्रहण के खिलाफ भट्टा पारसौल में आंदोलन के हिस्सेदार बने. बाद में केंद्र की यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना कानून पारित कराया.

इसके अलावा राहुल ने मौका बेमौका कभी मुंबई लोकल में सफर करके, कभ केदारनाथ मंदिर जाकर, कभी अरूणाचल के छात्र नीडो तानियम के लिए खड़े होकर, कभी केरल के मछुआरे के यहां खाना खाकर खुद को स्थापित करने की कोशिश की. कभी वे पटपड़गंज में सफाई कर्मचारियों के साथ धरने पर बैठे तो रोहित वेमुला की खुदकुशी के बाद भाजपा पर टूट पड़े. कन्हैया मामले में भी राहुल गांधी ने सक्रियता दिखाते हुए जेएनयू में जाकर छात्रों से मुलाकात की थी.

लेकिन उनके कुछ कदमों से उनकी भद भी पिटी है.

नोटबंदी के दौरान 4 हजार रु. निकालने के लिए कतार में खड़ा होने और एक बार फटी जेब दिखाने की वजह से वे सोशल मीडिया पर ट्रोल हुए.

राहुल गांधी ट्रोल होने की वजह से भी लोकप्रिय हैं.

लेकिन हालिया महीनों में ट्विटर पर तंज भरे और तीखे ट्वीट करने की वजह से राहुल ने सबको हैरत में डाल दिया है.

लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष बने राहुल गांधी के सामने कई चुनौतियां दरपेश हैं. 1999 से लेकर 2014 तक ही देखें तो कांग्रेस का प्रदर्शन गर्त में चला गया है. 1999 में कांग्रेस को 114 सीटें थी, जो 2004 में 145, 2009 में 206 और अब 2014 में महज 44 रह गई है. इसके बरअक्स भाजपा 182, 138, 116 और 282 पर आई है. कांग्रेस का वोट शेयर भी इन्ही सालों मे क्रमशः 28, 27,29 और 20 फीसदी रहा है.

अब कांग्रेस सुप्रीमो बने राहुल को कुछ काम प्राथमिकता के स्तर पर करने होंगे. इनमें संगठन में नई जान फूंकने से लेकर नई टोली का गठन करना, राज्यों में ताकतवर नेताओं को आगे बढ़ाना, 2019 के लिए कार्यकर्ताओं में जोश लाना, गुटबाजी पर लगाम लगाना और भरोसेमंद और निरंतर सक्रिय (जी हां, छुट्टियों पर विदेश सरक जाने की अपनी आदत छोड़नी होगी) नेता के रूप में पेश होना होगा.

राहुल गांधी के एक भाजपा विरोधी गठजोड़ तैयार करना होगा. लेकिन बिहार में वह नीतीश के अपने पाले में रोक नहीं सके. पीएम बनने की ख्वाहिशमंद ममता उनके लिए दूसरी चुनौती होंगी जो वाम दलों के साथ एक मंच पर शायद ही आएं. दूसरी तरफ, मायावती और मुलायम भी शायद ही हाथ मिलाना पसंद करें.

2019 से पहले राहुल के लिए 2018 भी एक चुनौती बनकर मुंह बाए खड़ा है. जब चार बड़े राज्यों के चुनाव होने हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ भाजपा के सूबे हैं, कर्नाटक में उनकी अपनी सरकार है. मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास 230 में से 58 सीटें हैं, 37 फीसदी वोट शेयर है, सूबे के लोकसभा की 29 सीटों में से महज दो कांग्रेस के पास हैं और वोट शेयर 35 फीसदी हैं (यानी वोट शेयर इंटैक्ट है)

राजस्थान में 200 विधानसभा सीटें हैं, इनमें कांग्रेस के पास महज 21 हैं. वोट शेयर भी 33 फीसदी है. राजस्थान से लोकसभा में एक भी सीट कांग्रेस के पास नहीं, लेकिन 31 फीसदी वोट जरूर मिले थे.

छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा सीटें हैं. कांग्रेस के पास इनमें से 39 सीटें हैं. वोट शेयर जरूर बढ़िया 40 फीसदी है लेकिन लोकसभा चुनाव में पासा पलट गया था जब राज्य की कुल 11 लोस सीटों में से कांग्रेस 20 फीसदी वोट हासिल कर सकी और सिर्फ 1 सीट पर जीत दर्ज कर सकी.

कर्नाटक में मामला थोड़ा अलग है. 224 विधानसभा सीटों वाले सदन में कांग्रेस के 122 सदस्य हैं. वोट शेयर 37 फीसदी है. वहां की 28 लोस सीटों में से कांग्रेस ने 9 जीती और वोट शेयर भी 41 फीसदी हासिल किया. यानी कर्नाटक में बहुत सत्ताविरोधी रूझान न हुआ तो कांग्रेस मजबूत स्थिति में रह सकती है. क्योंकि मोदी लहर (कर्नाटक में भाजपा ने 17 सीटें जीती हैं और 43 फीसदी वोट शेयर हासिल किया है) के बावजूद कांग्रेस का वोट शेयर भाजपा से महज 2 फीसदी कम रहा और इसी दो फीसदी वोट ने दोनों पार्टियों के बीच 8 सीटों का अंतर पैदा कर दिया.

बहरहाल, राहुल गांधी अब शहजादे से एक नेता में बदल रहे हैं. वह अब कांग्रेस अध्यक्ष हैं. सत्ता को जहर कहने वाले राहुल को अब पार्टी के ढांचे को नया रंग-रूप देने के साथ-साथ चुनावों में जीत दिलानी ही होगी. क्योंकि सत्ता से ज्यादा दिन दूर रही पार्टी का जनाधार ज्यादा तेजी से खिसकता है.

Sunday, December 3, 2017

निपट अकेला मैं

मैं
निर्जन में,
झुकते कंधों वाला बरगद.
मोनोलिथ पहाड़ में
थोड़ी सी जगह में उग आया.

मैं,
निपट सुनसान में
खुद से बातें करता.
मेरी शाखों पर आकर बैठते तो हैं परिन्दे
मुझे भाता है
उनका आना-बैठना-कूकना-उछलना
पर, परिन्दें नहीं समझते मेरी भाषा
पेड़ की भाषा मैं मौन मुखर होता है.
जो समझ सके
पेड़ की भाषा
इंतजार कर रहा हूं
मैं

Wednesday, October 25, 2017

गुस्सैल नौजवान विजय अब फेंके हुए पैसे भी उठाता है, बांटता भी है

उस दौर में जब राजेश खन्ना का सुनहरा रोमांस लोगों के सर चढ़कर बोल रहा था, समाज में थोड़ी बेचैनी आने लगी थी. आराधना से राजेश खन्ना का आविर्भाव हुआ था. खन्ना का रोमांस लोगों को पथरीली दुनिया से दूर ले जाता, यहां लोगों ने परदे पर बारिश के बाद सुनसान मकान में दो जवां दिलों को आग जलाकर फिर वह सब कुछ करते देखा, जो सिर्फ उनके ख्वाबों में था.

राजेश खन्ना अपने 4 साल के छोटे सुपरस्टारडम में लोगों को लुभा तो ले गए, लेकिन समाज परदे पर परीकथाओं जैसी प्रेम कहानियों को देखकर कर कसमसा रहा था. इस तरह का पलायनवाद ज्यादा टिकाऊ होता नहीं. सो, ताश के इस महल को बस एक फूंक की दरकार थी. दर्शक बेचैन था. उन्ही दिनों परदे पर रोमांस की नाकाम कोशिशों के बाद एक बाग़ी तेवर की धमक दिखी, जिसे लोगों ने अमिताभ बच्चन के नाम से जाना.

मंहगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और पंगु होती व्यवस्था से लड़ने वाली एक बुलंद आवाज़ की ज़रुरत थी. ऐसे में इस लंबे लड़के की बुलंद आवाज़ परदे पर गूंजने लग गई. इस नौजवान के पास इतना दम था कि वह व्यवस्था से खुद लोहा ले सके और ख़ुद्दारी इतनी कि फेंके हुए पैसे तक नहीं उठाता.

गुस्सैल निगाहों को बेचैन हाव-भाव और संजीदा-विद्रोही आवाज़ ने नई देहभाषा दी. उस वक्त जब देश जमाखोरी, कालाबाज़ारी और ठेकेदारों-साहूकारों के गठजोड़ तले पिस रहा था, बच्चन ने जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों के ज़रिए नौजवानों के गुस्से को परदे पर साकार कर दिया.
विजय के नाम से जाना जाने वाला यह शख्स, एक ऐसा नौजवान था, जो इंसाफ के लिए लड़ रहा था, और जिसको न्याय नहीं मिले तो वह अकेला मैदान में कूद पड़ता है.

कुछ लोग तो इतना तक कहते है कि अमिताभ के इसी गुस्सेवर नौजवान ने सत्तर के दशक में एक बड़ी क्रांति की राह रोक दी. लेकिन बदलते वक्त के साथ इस नौजवान के चरित्र में भी बदलाव आया. जंजीर में उसूलों के लिए सब-इंसपेक्टर की नौकरी छोड़ देने वाला नौजवान फिल्म देव तक अधेड़ हो जाता है. जंजीर में उस सब-इंस्पेक्टर को जो दोस्त मिलता है वह भी ग़ज़ब का. उसके लिए यारी, ईमान की तरह होती है.

बहरहाल, अमिताभ का गुस्सा भी कुली, इंकलाब आते-आते टाइप्ड हो गया. जब भी इस अमिताभ ने खुद को या अपनी आवाज को किसी मैं आजाद हूं में या अग्निपथ में बदलना चाहा, लोगों ने स्वीकार नहीं किया.

तो नएपन के इस अभाव की वजह से लाल बादशाह, मत्युदाता, और कोहराम का पुराने बिल्लों और उन्हीं टोटकों के साथ वापस आया अमिताभ लोगों को नहीं भाया. वजह- उदारीकरण के दौर में भारतीय जनता का मानस बदल गया था. अब लोगो के पास खर्च करने के लिए पैसा था, तो वह रोटी के मसले पर क्यों गुस्सा जाहिर करे.

उम्र में आया बदलाव उसूलों में भी बदलाव का सबब बन गया. देव में इसी नौजवान के पुलिस कमिश्नर बनते ही उसूल बदल जाते हैं, और वह समझौतावादी हो जाता है.

लेकिन अमिताभ जैसे अभिनेता के लिए, भारतीय समाज में यह दो अलग-अलग तस्वीरों की तरह नहीं दिखतीं. दोनों एक दूसरे में इतनी घुलमिल गए हैं कि अभिनेता और व्यक्ति अमिताभ एक से ही दिखते हैं. जब अभिनेता अमिताभ कुछ कर गुज़रता है तो लोगों को वास्तविक जीवन का अमिताभ याद रहता है और जब असल का अमिताभ कुछ करता है तो पर्दे का उसका चरित्र सामने दिखता है.

अमिताभ का चरित्र बाज़ार के साथ जिस तरह बदला है वह भी अपने आपमें एक चौंकाने वाला परिवर्तन है. जब ‘दीवार के एक बच्चे ने कहा कि उसे फेंककर दिए हुए पैसे मंज़ूर नहीं, पैसे उसको हाथ में दिए जाएं, तो लोगों ने ख़ूब तालियां बजाईं.

बहुत से लोगों को लगा कि यही तो आत्मसम्मान के साथ जीना है. उसी अमिताभ को बाज़ार ने किस तरह बदला कि वह अभिनेता जिसके क़द के सामने कभी बड़ा पर्दा छोटा दिखता था, उसने छोटे पर्दे पर आना मंजूर कर लिया.

फिर उसी अमिताभ ने लोगों के सामने पैसे फ़ेंक-फेंककर कहा, ‘लो, करोड़पति हो जाओ.’ कुछ लोगों को यह अमिताभ अखर रहा था लेकिन ज्यादातर लोगों को बाज़ार का खड़ा किया हुआ यह अमिताभ भी भा गया. अपनी फिल्मों के साथ आज अमिताभ हर मुमकिन चीज बेच रहे हैं. वह तेल, अगरबत्ती, पोलियो ड्रॉप से लेकर रंग-रोगन, बीमा और कोला तक खरीदने का आग्रह दर्शकों से करते हैं. करें भी क्यों न, आखिर उनकी एक छवि है और उन्हें अपनी छवि को भुनाने का पूरा हक है. दर्शक किसी बुजुर्ग की बात की तरह उनकी बात आधी सुनता भी है और आधी बिसरा भी देता है.

बहरहाल, अमिताभ आज भी चरित्र निभा रहे हैं, लेकिन उनके शहंशाहत को किसी बादशाह की चुनौती झेलनी पड़ रही है. हां, ये बात और है कि शहंशाह बूढा ज़रुर हो गया है पर चूका नहीं है. बाज़ार अब भी उसे भाव दे रहा है क्योंकि उसमें अब भी दम है.

Thursday, October 5, 2017

अर्थव्यवस्था की ढलान के दिनों में कोजागरा की रात लक्ष्मी पूजा


(यह लेख आइचौक डॉट कॉम में प्रकाशित हो चुका है)


आइए कि लक्ष्मी की पूजा करें. गुरुवार की रात शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी को पूजना जरूरी है.

आप चाहें तो अपनी छत पर या आंगन में खड़े होकर चांद की निहारिए. आप चलेंगे तो चांद चलेगा, आप भागेंगे तो चांद साथ भागेगा, इसी को तो कविताई में कहा है किसी नेः

'चलने पर चलता है सिर पर नभ का चन्दा.
थमने पर ठिठका है पाँव मिरगछौने का.

कभी धान के खेतों में फूटती बालियों के बीच खड़े होकर चांद को निहारा है आपने? खेतिहर इलाकों में जाइए तो धान की बालियों से निकलती सुगंध से मतवाले हो जाइएगा. दूर-दूर तक छिटकी हुई चाँदनी थी और अपूर्व शीतल शान्ति. बस यों कहिए कि 'जाने किस बात पे मैं चाँदनी को भाता रहा, और बिना बात मुझे भाती रही चाँदनी.

मिथिला में नवविवाहित वर-वधू के लिए शरद पूर्णिमा का बड़ा महत्व है. चांदनी रात में गोबर से लिपे और अरिपन (अल्पना) से सजे आंगन में माता लक्ष्मी और इन्द्र के साथ कुबेर की पूजा और अतिथिय़ों का पान-मखान से सत्कार और वर-वधू की अक्ष-क्रीड़ा (जुआ खेलना) कोजागरा पर्व का विशेष आकर्षण है.

नव विवाहित जोड़ों के आनंद के लिए दोनो को कौड़ी से जुआ खेलाया जाता है. चूंकि वधू अपनी ससुराल में नई होती है, जहां वरपक्ष की स्त्रियां अधिक होती हैं, इसलिए मीठी बेइमानी कर वर को जिता भी दिया जाता है.

लक्ष्मी-पूजन के बाद नवविवाहित जोड़े पूरे टोले भर के लोगों को पान-मखान बांटते हैं. कोजागरा के भार (उपहार) के रूप में वधू के मायके से बोरों में भरकर मखाना आता है. मखाने मिथिलांचल के पोखरों में ही होते हैं. दुनिया में और कहीं नहीं. इनके पत्ते कमल के पत्तों की तरह गोल-गोल मगर काँटेदार होते हैं. उनकी जड़ में रुद्राक्ष की तरह गोल-गोल दानों के गुच्छे होते हैं, जिन्हें आग में तपाकर उसपर लाठी बरसाई जाती है, जिससे उन दानों के भीतर से मखाना निकलकर बाहर आ जाता है. बड़ी श्रमसाध्य प्रक्रिया है, जिसे मल्लाह लोग ही पूरा कर पाते हैं.

शरद के चंद्रमा की इस भरपूर चांदनी का मजा सिर्फ मिथिलांचल में ही नहीं लिया जाता बल्कि मध्य प्रदेश, गुजरात, बंगाल और महाराष्ट्र में भी इस दिन लक्ष्मी की पूजा की जाती है. इन इलाकों में खीर के पात्र को रात भर चांदनी में रखकर सबेरे खाया जाता है. कहते हैं, शरद पूर्णिमा की रात में खुले आकाश के नीचे चांदी के पात्र में खीर रखने से उसमें अमृत का अंश आ जाता है.

असल में शरद पूर्णिमा या कोजारगी पूर्णिमा या कुआनर पूर्णिमा एक फसली उत्सव है. आसिन (आश्विन) के महीने में जब खेती-बाड़ी के सारे कामकाज खत्म हो जाते हैं, मॉनसून का बरसता दौरे-दौरा समाप्त हो जाता है, तब यह उत्सव आता है और इसे कौमुदी महोत्सव भी कहते हैं. कौमुदी का अर्थ चांदनी होता है. यह उत्सव गोपियों के साथ कृष्ण के रास का उत्सव है.

दंतकथाएं कहती हैं कि एक राजा अपने बुरे दिनों में दरिद्र हो गया और उसकी रानी ने जब कोजागरा की रात को जागकर लक्ष्मी पूजन किया तो राजा की समृद्धि लौट आई. कोजागरा की रात देवताओं के राजा इंद्र को भी पूजा जाता है.

अब कई लोगों का यह भी विश्वास है कि इन दिनों चांद धरती के ज्यादा नजदीक होता है और औषधियों के देवता चंद्र इन दिनों अपनी चांदनी में देह और आत्मा को शुद्ध करने वाले गुण भर देते हैं.

वेद कहता है कि चन्द्रमा का उद्भव विराट पुरुष के मन से हुआ -'चन्द्रमा मनसो जात:, चक्षो: सूर्यो अजायत (पुरुषसूक्त). चन्द्रमा और सूर्य, इन्हीं दोनो से तो सृष्टि है. चन्द्रमा हमारे जीवन को कई रूपों में प्रभावित करता है. उसका सम्बन्ध पृथ्वी के जलतत्व से है. इसीलिए समुद्र में ज्वार-भाटा चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार घटता-बढ़ता है. पूर्णिमा की रात समुद्र का ज्वार अपनी चरम सीमा पर रहता है.

यह कैसा अभिशाप, चांद तक
सागर का मनुहार न पहुंचे,
नदी-तीर एकाकी चकवे का
क्रन्दन उस पार न पहुंचे.

समुद्र-मंथन के बाद महारत्न के रूप में एक साथ निकलने के कारण चन्द्रमा और लक्ष्मी भाई-बहन हुए. चूंकि संसार के पालनकर्ता विष्णु की पत्नी लक्ष्मी जगन्माता हैं, इसलिए उनके भाई चन्द्रमा सबके मामा हैः चन्दा मामा. शास्त्र कहता है कि लक्ष्मी अगर विष्णु के साथ आती हैं, तो उनका वाहन गरुड़ होता है, लेकिन जब अकेली आती हैं तो उनका वाहन उल्लू होता है. मिथिला में कोजागरा की रात की लक्ष्मी-पूजा में त्रिपुरसुन्दरी लक्ष्मी का युवती के रूप में सांगोपांग वर्णन करते हुए उनसे हमेशा अपने घर में रहने की विनती की जाती हैः

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी
गंभीरावर्तनाभि: स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया।
लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रै: मणिगणखचितै: स्नापिता हेमकुम्भै:
नित्यं सा पद्महस्ता वसतु मम गृहे सर्वमांगल्ययुक्ता॥

कभी पूजा विधि को गौर से देखिए तो समझ में आएगा कि सामान्य पूजा के बाद बाकी देवताओं को तो अपने-अपने स्थान पर चले जाने का अनुरोध किया जाता है (पूजितोऽसि प्रसीद, स्व स्थानं गच्छ), लेकिन लक्ष्मी को सभी अपने पास ही रहने का आग्रह करते हैं (मयि रमस्व).

कोजागरा की रात महाराष्ट्र का उत्सव थोड़ा अलग होता है. इसमें परिवार के सबसे बड़ी संतान को सम्मान दिया जाता है.

गुजरात में यह शरद पूनम है, जहां गरबा और डांडिया के साथ लोग इसे मनाते हैं., तो बंगाल के लिए यह कोजागरी लक्खी पूजो है. ओडिशा में यह शिव के पुत्र कार्तिकेय की पूजा का दिन है. इसलिए वहां इसे कुमार पूर्णिमा कहते हैं. कार्तिकेय ने इसी दिन तारकासुर के साथ युद्ध किया था. ओडिशा की लड़कियां कार्तिकेय जैसा वर पाने के लिए पूजा करती हैं, क्योंकि कार्तिकेय या स्कंद (जिनको तमिलनाडु में मुरुगन कहते हैं) देवों में मोस्ट एलिजिबल बैचलर हैं. सबसे दिलेर, हैंडसम और खूबसूरत भी. लेकिन विचित्र है कि कार्तिकेय जैसा वर मांगने का दिन होने के बावजूद ओडिशा में इसका कोई कर्मकांड नहीं है. इसकी बजाय सुबह में सूर्य की ही पूजा 'जान्हीओसा' होती है. शाम में चांद की पूजा होती है और उनके लिए खास भोग चंदा चकता बनता है. इसको घी, गुड़, केला, नारियल, अदरक, गन्ने, तालसज्जा, खीरा, मधु और दूध से बनाया है और फिर इसको कुला (पंखे) पर रखा जाता है.

कोजागरा के दिन कटक से आगे केंद्रपाड़ा के तटीय इलाको में गजलक्ष्मी की पूजा भी होती है.

इलाके अलग-अलग है तरीके भी अलग, लेकिन पूजा लक्ष्मी की ही होती है. जीएसटी और नोटबंदी से हलकान देश में पूरे देश को कोजागरा मनाना चाहिए, क्या पता जीडीपी की विकास दर संभल ही जाए.



Saturday, September 30, 2017

रामलीलाः चीर कर रख दूंगा लकड़ी की तरह

दृश्य 1ः
मंच सजा था, बिजली की लड़ियों ने चकाचौंध मचा रखी थी। महागुन मेट्रो मॉल की विशाल इमारत की छत पर मैकडॉनल्ड का लाल रंग का निशान चमक रहा था। इस मॉल की आधुनिकता की चमक के ऐन पीछे मैदान में था मंच. बल्बों की नीली-पीली रौशनी के बीच भगवा रंग के कपड़ो में एक किशोर-सा अभिनेता लक्ष्मण बना हुआ था।

मंच पर मौजूद सारे अभिनेता, जिनमें एक विदूषक, कई वानर लड़ाके और कई राक्षस थे। हनुमान भी। सारे अभिनेता मंच पर हमेशा चलते रहते, तीन कदम दाहिनी तरफ, फिर वापस मुड़कर, तीन कदम बाईं तरफ।

बीच बीच में कोई पंडितजीनुमा आदमी कोई निर्देश दे आता मंच पर जाकर। फिर मंच पर आवाज आती, उद्घोषक की, जिसे अपनी आवाज़ सुनाने में ज्यादा दिलचस्पी थी।

काले कपड़ो में सजे मेघनाद की आवाज़ में ज़ोर था, भगवा कपड़े में सजे लखन लाल की आवाज़ नरम थी। लेकिन तेवर वही...दोनों के बीच संवाद में शेरो-शायरी थी। एक ललकारता...दूसरा उसका जवाब देता।

लखन लाल चीखे, अरे क्या बक-बक करता है बकरी की तरह, चीर कर रख दूंगा, लकड़ी की तरह
भीड़ ने जोरदार ताली बजाई. मैदान में धूल-धक्कड़ है. प्रीतम की धुन बजाता पॉपकॉर्न बेचने वाला है. लकड़ी की तलवारें, गदाएं, तीर-धनुष हैं.

सोच रहा था कि क्या दिल्ली में भी लोग इतने खाली हैं, या फिर कुछ तो ऐसा है इन आधुनिक शहरियों को अपनी ओर खींच रहा है। रामलीला के बगल में, एक जगह ऑरकेस्ट्रा का आय़ोजन है। लडकी बांगला गाने गा रही है, और लगभर सुर के बाहर गा रही है. रामलीला में दृश्य बदलता है, रावण का दरबार सजा है और दो लड़कियां (समझिए अप्सराएं) नाच रही हैं. उनका कमर और कूल्हे मटकाना कुछ भड़कीला ही है. अप्सराएं रावण से कह रही हैं- अमियां से आम हुई डार्लिंग तेरे लिए...


वह भीड़ से पूछती है, केनो, हिंदी ना बांगला...भीड़ के अनुरोध पर वह हिंदी में गाती है। लौंडिया पटाएंगे, फेविकोल से...मेरे मित्र सुशांत को पूजा के पवित्र पंडाल में यह शायद अच्छा नहीं लगा होगा। मैं तर्क देता हूं कि यह मास कल्चर है। मास को पसंद कीजिए, हर जगह तहज़ीब की पैकेजिंग नहीं चलेगी. 

पिछले साल इसी जगह रामलीला में अप्सराएं फेविकोल वाला गाना गा रही थीं.


यह सही है। यही सही है। आम आदमी, जिसके लिए राम लीला के पात्रों ने हिंदुस्तानी बोलना शुरू कर दिया। संवादों के बीच में ही, मानस की चौपाईयां आती है, जो माहौल में भक्ति का रंग भरने के सिवा कुछ और नहीं करतीं।

अगल बगल गुब्बारे, हवा मिठाई, गोलगप्पे...प्लास्टिक के खिलौने...चाट, भेलपूरी। मुझे मधुपुर की याद आई।

दृश्य़ दोः 
हमारे घर के पास ही एक दुर्गतिनाशिनी पूजा समिति है। दुर्गा की मूर्त्ति के सामने बच्चों के नाच का एक कार्यक्रम है। यह समिति पहले उड़िया समुदाय के लोगों के हाथ में थी, अब उस समिति में बिहारी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, यूपी के सभी समुदायों के लोग है।

सभी घरों के बच्चे नाच रहे हैं, महिलाएं हैं...मेयर साहब आते हैं..। जय गणेशा गाने पर नाचने वाला लड़का बहुत अच्छा नाच रहा है। मैं पहचानता हूं उसे, वह बिजली मिस्त्री है। रोज पेचकस कमर में खोंसे शिवशक्ति इलेक्ट्रिकल्स पर बैठा रहता है। मुसलमान है।

अब किसी को फर्क नहीं पड़ा कि नाचने वाला लड़का किस धर्म का है। किसी को फर्क नहीं पड़ा कि दुर्गा जी ने जिस महिषासुर को मारा है मूर्ति में...उसकी जाति और उसके समुदाय को लेकर बौद्धिक तबका बहस में उलझा है। जनता को फर्क नही पड़ता कि दुर्गा ने किसको मारा है।

देश उत्सवधर्मियों का है, उत्सव मनाते हैं हम।

इसमें विचारधारा को मत घुसेडिए। दुर्गा पूजा को एक प्रतीक भर रहने दीजिए। इसके सामाजिक संदर्भों को देखिए, इसमें और समुदायों को मिलाइए...और सांप्रदायिकता, राम को सांप्रदायिक बना दिया है आपने, अब दुर्गा को भी मत बनाइए।

यह आम लोगों को उत्सव है...उत्सव ही रहे। ऑरकेस्ट्रा बजता रहे, सुर बाहर लगे, कोई दिक्कत नहीं, जय गणेसा पर नाचते रहें लोग...बस।

Thursday, September 21, 2017

शांतनु हत्याकांडः प्रधानमंत्री मोदी के नाम एक खुला खत

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

आप बेहद व्यस्त रहते हैं. आपको व्यस्त रहना चाहिए क्योंकि व्यस्त प्रधानमंत्री होने का सगुन देश के लिए अच्छा होता है. हम छोटे थे तो हमने एक और प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के बारे में सुना था, और हमने अखबारों में पढ़ा था कि देवेगौड़ा कैबिनेट की बैठकों में झपकी लिया करते थे.

मोदी जी आप देवेगौड़ा नहीं हैं. आपने करीब 57 योजनाएं देश के लिए लागू की हैं. 2014 में जब चुनाव हो रहे थे तब पूरे देश के साथ मुझे भी उम्मीद थी कि आप देश के बदलने वाले कदम उठाएंगे. मुझे विकास, जीडीपी की वृद्धि दर, नोटबंदी, जनधन खातों और जीएसटी पर कुछ नहीं कहना है. मैं आपका ध्यान खींचना चाहता हूं पत्रकारों की हत्याओं की तरफ. त्रिपुरा के पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या हो गई है. नौजवान ही था. यह हत्या एक और पत्रकार की हत्या है.

वह नौजवान त्रिपुरा के एक लोकल चैनल का रिपोर्टर था. रिपोर्टर, जी हां, रिपोर्टर. वह संपादक नहीं था. वह किसी सरकार या पार्टी के लिए या उसके खिलाफ़ एजेंडा सेटर नहीं था. मुझे पता है कि शांतनु जैसों के लिए वामी आंदोलनकारी आंसू नहीं बहाएंगे, न फेसबुक पर अपनी डीपी बदलेंगे, न उसकी तस्वीर लेकर जंतर मंतर पर छाती पीटेंगे. कोई मोमबत्ती लेकर मार्च भी नहीं करेगा, क्योंकि वह किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करता था. शांतनु की मौत पर किसी टीवी चैनल का स्क्रीन काला नहीं हुआ है.

लेकिन, यहीं आकर आपको ज़रा कदम बढ़ा देना होगा. प्रधानमंत्रीजी, आप तो लोकसभा में प्रवेश करने से पहले उसे मंदिर की तरह उसकी सीढ़ियों पर सिर नवाकर गए थे. लोकतंत्र का चौथा खंभा बुरी तरह हमलों से परेशान है. यह हमले पिछले तीन साल में कुछ ज्य़ादा हो गए हैं. 2014 और 2015 में 142 पत्रकारों पर हमले हुए हैं और यह राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड्स ब्यूरो का आंकड़ा है.

2014 में पत्रकारों पर 114 घटनाएं हुई थीं उसमें 32 गिरफ्तारियां हुईं. यह आंकड़ा मेरा नहीं है, यह जानकारी गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर की दी हुई है. 1992 से लेकर आजतक पत्रकारों के काम के सीधे विरोध में 28 पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है. यह आंकड़ा भी खामख्याली नहीं है. यह पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनी कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है.

एनसीआरबी का एक और आंकड़ा है जिसमें कहा गया है कि पिछले 3 साल में 165 लोगों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. जी नहीं, जम्मू-कश्मीर के पत्थरबाज या आतंकी होते तो मैं इस आंकड़े के पक्ष में खड़ा होता, इनमे ले 111 बिहार, झारखंड, हरियाणा और पंजाब से हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच (मैं इनके दुचित्तेपन से ऊब गया हूं) कहता है कि भारत में इस साल जून तक 20 दफा इंटरनेट बंद किया गया है. और प्रेस फ्रीडम सूचकांक में भारत 136वें पायदान पर है.

जिन 142 पत्रकारों पर हमले हुए हैं उस सिलसिले में अबतक एक भी आदमी गिरफ्तार नहीं हुआ है.

प्रधानमंत्री जी, आपके विकास और सुशासन के नाम पर जनता ने उमड़ कर वोट किया था. आप साबित कर दीजिए कि देश के करोड़ो लोगों का विश्वास मिथ्या नहीं था. मुझे आपके राजनीतिक फैसलों पर कुछ नहीं कहना है. लेकिन पत्रकारों पर हो रहे हमले विधि-व्यवस्था (हालांकि यह राज्य का विषय है) पर सवालिया निशान लगा रहे हैं. लेकिन 2014 के बाद से हमलों में आई तेजी से आपका नाम खराब हो रहा है. मुझे उम्मीद है कि आप पत्रकारों और चौथे खंभे के निचले स्तर पर काम करने वाले रिपोर्टर्स और मीडियाकर्मियों के लिए कल्याण और सुरक्षा का कोई कदम जरूर उठाएंगे.

प्रधानमंत्रीजी, शांतनु की हत्या पर कुछ कहिए, क्योंकि देश में जो थोड़ी बहुत पत्रकारिता बाक़ी हैं इन्हीं 'शांतनुओं' की बदौलत बची है.

एक पत्रकार



Thursday, September 14, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः जलते हैं दुश्मन तो खिलते हैं फूल

गुड्डू भैया अपने दालान में लकड़ी की कुरसी पर उकडूं बैठे हुए थे. मेरे वहां जाते ही
चिल्लाएः ओ ठाकुर ब्रो, कम एंड हैव टी विद मी.
मैं चकरा गयाः भिया आज चौदह सितंबर है. हिंदी दिवस है आज अंग्रेजी क्यों छांट रहे हैं?गुड्डू मुस्कुरा उठे. बोले,
30 के फूल 80 की माला,
बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला
अरे, भैया हिंदी को बचाने वाले दिन आप क्या सड़कछाप शायरी कर रहे हैं. यह तो ट्रक और ऑटो वगैरह पर लिखा होता है. आपको तो पंत-निराला-प्रसाद-बच्चन जैसो की बात करनी चाहिए. इनकी वजह से हिंदी बची हुई है.
गुड्डू ने गिलास में मौजूद सोमरस का लंबा घूंट भरा और कहाः हिंदी कौन सी मर रही है बे? बाजार में कामयाब होगी तो हिंदी बची रहेगी. तुम सेमिनार करके हिंदी नहीं बचा पाओगे. अगर हिंदी का सिनेमा चल रहा है, तो हिंदी बची हुई है. अगर ट्रक, बसों और ऑटो के पीछे हिंदी में कविताएं लिखी जा रही हैं तो समझो आम आदमी की हिंदी वही है. बाकी तुम जो कर रहे हो वह हिंदी की चिंदी है.
क्या बात कर रहे हैं आप, इन गाड़ियों पर लिखे की आप उच्चस्तरीय साहित्य से तुलना कर रहे हैं?उन्होंने तपाक से जवाब दिया: क्यों न करें? सड़क पर लिखी हर इबारत का अपना समाजशास्त्र होता है. देश में इतनी भीड़ है तो लिखाः
जय शिव शंकर, भीड़ ज़रा कम कर
देश में इतनी नफरत है कि गाड़ियों के पीछे लिखना पड़ाः
देखो मगर प्यार से
मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता कि इन गाड़ियों पर लिखे कई जुमले बड़े पुराने और घिसे-पिटे हो चुके हैं. लेकिन तुम ड्राइवरों और कंडक्टरों में छिपे उस शायर के आगे क्यों सजदा नहीं करना चाहते जो ऐसी चीजों को चुनने की और उन्हें गाड़ी पर लिखवाने की नजर रखता है. तुम उनके अनगढ़ मगर सच्चे काव्यबोध से इत्तफाक क्यों नहीं रखते?
नीयत तेरी अच्छी है तो किस्मत तेरी दासी है
कर्म तेरे अच्छे हैं तो घर में मथुरा काशी है
या फिर यह देखो,
फानूस बनकर जीसकी हीफाजत हवा करे
वो शमां क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करे
देखो ठाकुर, हिज्जे पर मत जाना पर सड़क के तनाव को कम करने में इन कविताओं का भारी योगदान है. रोड रेज से तपती सड़कों पर ये फुटकर शेर ठंडी छांव का काम करते हैं. हल्की, कच्ची और रूखी तुकबंदी ही सही, लेकिन कविता तो इन लाइनों में होती ही है. ये लोग अपने किस्म के कबीर हैं भाई. कहते तो थे कबीरः जो जो करूं सो पूजा. तो यह जो लिखें, सो कविता….
हमें जमाने से क्या लेना, हमारी गाड़ी ही हमारा वतन होगा
दम तोड़ देंगे स्टियरिंग पर, और तिरपाल ही हमारा कफन होगा…
यह क्या आत्मवंचना और दया नहीं है? क्या यह तुम्हारे साहित्य का के लघु मानव का बयान नहीं है? अनजान और अंदेशों से भरी लंबा यात्राओं में किस तरह ड्राइवर भाई सिर पर कफन बांध लेते हैं, इसका जायजा भी लोः
रात होगी, अंधेरा होगा और नदी का किनारा होगा
हाथ में स्टियरिंग होगा, बस मां का सहारा होगा….
पता नहीं यह पंक्ति जन्म देने वाली मां के लिए है या किसी देवी मां के लिए लेकिन उसके जोखिम कबूल करने का अंदाज तो देखो.चिलचिलाती धूप में जब तपते बोनट की बगल में बैठे ड्राइवरों-हेल्परों को देखो तो पता चलेगा कि सबसे मुश्किल, सबसे खानाबदोश नौकरी इनकी ही होती है. उनकी तकलीफ ‌सिर्फ जिस्मानी ही नहीं होती, उसमें बाल-बच्चों से दूर होने की टीस भी घुली मिली होती है… तुमने भी तो देखा ट्रकों के पीछे बनी तस्वीर में नदी किनारे एक युवती अपने घुटनों में सिर छिपाए बैठी है. साथ में लिखा होता है… घर कब आओगे…और शेर भी हैः
जब परदेस लिखा है किस्मत में
तब याद वतन की क्या करना…
भावनाओं की इस दुनिया में हमें भोगा हुआ यथार्थ और जीवन-दर्शन भी मिलता है, खूब सारी नसीहतें भी. कुल मिलाकर सड़कीय जीवन की सूक्तियां और सुभाषित हैं ये नारे, जिसमें 'स्ट्रीट-स्मार्ट विज़्डम' अर्थात गली-सुलभ बुद्धि है. सुनोः
अपनों से सावधान
दोस्ती पक्की, ख़र्चा अपना-अपना
मांगना है तो ख़ुदा से मांग बंदे से नहीं,
दोस्ती करनी है तो मुझसे कर, धंधे से नहीं.
देते हैं रब, सड़ते हैं सब,
पता नहीं क्यों.
'दुनिया मतलब की' जैसे नारे अगर ज़माने से ठोकर खाए लोगों का चीत्कार है, तो 'अपनों से बचकर रहेंगे, ग़ैरों को देख लेंगे' में एक साथ अपने अस्तित्व का निचोड़ है, तो धमकी भी.
मतलब की है दुनिया कौन किसी का होता है,
धोखा वही देते हैं जिन पर ऐतबार होता है.
नेकी कर जूते खा,
मैंने खाए तू भी खा.
ठाकुर, यह जो ट्रक-साहित्य है न, इसे हल्के में मत लो. इसमें विज़डम है तो मां-बाप जैसी हिदायतें भी. मोहल्लों में, जब ऑटो धीरे चल रहे होते हैं तो बच्चे उसमें लटकने की कोशिश करते हैं. उन्हें वैसे ही डांटा गया है, जैसे हमारे समाज में बच्चों को डांटते हैः
चल हट पीछे!
-लटक मत टपक जाएगा!
-लटक मत पटक दूंगी!
इसका एक झारखंडी संस्करण भी है:
बेटा छूले त गेले
सटले त घटले!
मुझे लगा कि गुड्डू को सही रास्ते पर लाने का यही एक वक्त है. उनसे शराब छुड़वाने वाली शायरियां बुलवा कर. मैंने कहाः भिया, आप शराब छोड़ दीजिए फिर तो, काहे कि गाड़ियों में हर जगह तो इसकी बुराई ही लिखी है.पीकर जो चलाएगा, परलोक को जाएगा
चलाएगा होश में तो ज़िंदगी भर साथ दूंगी,चलाएगा पीकर तो ज़िंदगी जला दूंगी.
बड़ी ख़ूबसूरत हूं नज़र मत लगाना,ज़िंदगी भर साथ दूंगी पीकर मत चलाना.
राम जन्म में दूध मिला, कृष्ण जन्म में घी,
कलयुग में दारू मिली, सोच समझ कर पी.
और भी है,
ऐ दूर के मुसाफ़िर, नशे में चूर गाड़ी मत चलाना।
बच्चे इंतजार में है, पापा वापस ज़रूर आना।।
गुड्डू हंसने लगे. इस ख़राब दुनिया में जो माशूकाएं दिल तोड़ती हैं तो पीसी बरुआ के देवदास से लेकर संजय लीला भंसाली के देवदास और अनुराग कश्यप के देवडी से मुझ जैसे आशिक तक, सहारा सिर्फ इसी मय का है ठाकुर. सुन लो,
शराब नाम ख़राब चीज़ है, जो कलेजे को जला देती है,
उसे बेवफ़ा से तो सही है, जो ग़म को भुला देती है.
ठाकुर तुम ख्वामखा शराब को बदनाम कर रहे हो. एक ट्रक के पीछे लिखा थाः
नशा शराब में होता तो नाचती बोतल.
और,
खुशबू फूल से होती है, चमन का नाम होता है,
निगाहें क़त्ल हैं, हुस्न बदनाम होता है.
बूझे? मैंने समझने का इशारा देते हुए सिर हिलाया. तो गुड्डू भैया बोले, जब तक आम आदमी के पास हिंदी जिंदा है तब तक हिंदी-फिंदी दिवस से कुछ नै होगा. हिंदी जिंदा है और जिंदा रहेगी. और तुम जो हर बात पर शराब की बुराई करते हो, जाओ पंकज उधास की आवाज में मशहूर गज़लें सुनोः जिसके बोल हैः
हुई महंगी बहुत ही शराब कि थोड़ी-थोड़ी पिया करो.
फूंक डाले जिगर को शराब, कि थोड़ी थोड़ी पिया करो...
मैं समझ गया कि गुड्डू भैया काले कंबल है. इन पर कोई रंग न चढ़ेगा. मैं जाने के लिए मुड़ा तो गुड्डू भैया कि आवाज़ आई. अऱे ठाकुर गुस्सा हो कर जा रहे हो, तो एक ट्रक साहित्य का शेर पेश-ए-नजर हैः
चलती है गाड़ी तो उड़ती है धूल
जलते हैं दुश्मन तो खिलते हैं फूल !

Tuesday, September 12, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर

पेड़ के नीचे बैठे गुड्डू भईया तकरीबन ध्यान की मुद्रा में थे. मैं गुजर रहा था तो सोचा चुपके से निकल लूं. आखिर गुड्डू भैया अभी ब्लेसिंग स्टेट में होंगे तत्व सेवन के बाद. सुबह-सुबह उठकर ह्विस्की के घूंट भर लेना गुड्डू जी की आदत थी और गुड्डू उसे आचमन कहते.

मेरे कदमों की आवाज सुनकर गुड्डू ने आंखें खोल दीः ठाकुर कहां भगे जा रहे हो, तनिक मैनाक पर विश्राम-सा कर लो. अब भागने की कोई राह न थी, मैं उनके कदमों में कुछ ऐसे बैठ लिया जैसे पुराने जमाने में छात्र गुरुओं के पैरों के पास बैठते थे. ज्ञान हासिल करने के लिए.

गुड्डू भैया अभी प्रकृतिस्थ हो पाते कि मैंने कहाः शिक्षक दिवस की मुबारकवाद हो गुड्डू भिया.

हैप्पी टीचर्स डे. मैं चौंका, अरे भिया आप और अंग्रेजी!

गुड्डू कुछ वैसे ही चौंके जैसे कबूतर की तरफ पत्थर उछालिए तो वह चौंकता हैः अबे ठाकुर, हम तो क्या चीज़ हैं चचा ग़ालिब तक अंग्रेजी के शौकीन थे. उनको तो एक स्कॉच से ऐसी मुहब्बत थी कि पटियाला नरेश के न्योते के बावजूद नहीं गए थे. वह स्कॉच सिर्फ दिल्ली छावनी में मिलती थी.

वह तो ठीक है गुड्डू भिया. आज शिक्षक दिवस के मौके पर भी शराबनोशी!

गुड्डू ने अपनी सींकिया काया को जितना मुमकिन था उतना फुलाकर कहाःल हर शब पिया ही करते हैं मय जिस कदर मिले...चचा ग़ालिब का ही कहा हुआ है. और तुम यह न दिवस वगैरह मना करके कैलेंडर मत बन जाओ. देखो यूं समझो कि जिस आदमी के लिए कुछ नहीं कर सकते उसका डे मना लो... सुनो कि एक दीवाने लेखक मंटो ने क्या लिखा है दुनिया में बड़े-बड़े सुधारक हुए हैं। उनकी शानदार शिक्षाएं भी रही हैं। शिक्षाएं वक्त के साथ घिस-मिट जाती हैं, खो जाती है। रह जाती हैं तो सलीबें, धागे, यज्ञोपवीत, दाढ़ियां, बग़लों के बाल...

लेकिन गुरुओं के योगदान को भुला सकता है कोई जीवन में?

क्यों भुलाएगा भाई? तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा शिक्षक नहीं रहा जिसने तुमसे 27 का पहाड़ा न पूछा हो? खैर, जानना चाहते हो तो जानो कि शिक्षा का अधिकार कानून देशभर में अब तक नौ फीसदी से भी कम स्कूलों में लागू हो पाया है. यह कानून कहता है कि आठवीं तक तो सभी बच्चों को शिक्षा जरूरी तौर पर मुहैया कराई जाए. लेकिन यह तब होगा जब गांव-गांव स्कूल खुले, शिक्षकों की समस्याओं का समाधान हो, और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए.

देखो, देशभर में करीब 50 फीसदी शिक्षक संविदा आधारित हैं...संविदा नहीं समझते? ठेके पर काम करने वाले शिक्षक. चिंदी भर की तनख्वाह मिलती है, पिर क्या पढ़ाएगा वह? शुक्राचार्य, वृहस्पति और द्रोण को ठेके पर रखकर देखते तो कभी न दानव स्वर्ग जीत पाते, न देवता दानवों से स्वर्ग छीन पाते, न तुमको अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, दुर्योधन जैसे रणबांकुरे मिल पाते. संदीपनि सुखी थे तो कृष्ण वासुदेव बने. पढ़ाई लिखाई भी कोई अनुबंध और ठेके पर देने की चीज है? ऐसे करवाओगे देश के भविष्य का निर्माण?

गुरुओं को क्यों नाराज कर रहे हो तुम लोग? कबीर को सुनोः

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥


गुड्डू भैया का सवाल सदी के सवाल की तरह छा गया. मैं चुप था कि गुड्डू भैया ज्ञानमुद्रा से वापस आएः पता है ह्विस्की की टीचर्स ब्रांड पौने दो सौ साल पुरानी है और इसको विलियम टीचर नाम के शख्स ने शुरू किया था.

मुझे नहीं मालूम था. मैंने कहाः आज के शिक्षक वेतन तो लेते है लेकिन पढ़ाने में फांकी मारते हैं.

गुड्डू उकडूं बैठ गएः देखो ठाकुर, हमारे यहां लोगों में यह गलतफहमी है कि शिक्षक को वेतन अधिक मिलता है, जबकि हालात इसके लट हैं. मौजूदा समय में देश के बजट का करीब 3.4 फीसदी शिक्षा पर खर्च किया जाता है. इसमें से करीब 65 फीसदी आमदनी सरकार को विविध उपकरों से होती है. यानी शिक्षा में हमारा खर्चा बहुत कम है. अच्छे वेतन की जो बात तुम कर रहे हो न, वैसे टीचर बहुत कम हैं...देशभर में 50 फीसदी शिक्षक वेतन से जूझ रहे हैं. जितने शिक्षक हैं उनमें से आधों को 6 हजार रु. से भी कम तनख्वाह मिलती है. शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए गठित किये गये कोठारी आयोग ने इस बात की सिफारिश की थी कि शिक्षक का वेतन कम-से-कम इतना तो हो ही कि उसे किसी तरह की आर्थिक परेशानियों से जूझना नहीं पड़े. आयोग ने शिक्षकों को एक सम्मानित वेतन देने की बात कही थी. लेकिन, सल में उनका वेतन न्यूनतम मजदूरी के बराबर है. अनुबंध पर काम करने वाले अधिकतर शिक्षकों की ट्रेनिंग नहीं हुई है. देशभर में करीब 11 लाख शिक्षक ट्रेंड नहीं हैं तो बताओ क्या पढ़ाएं ये लोग?

मैं संतुष्ट नहीं हुआः भिया, मास्टर लोग स्कूल छोड़कर धनरोपनी कराने निकल जाते हैं..

गुड्डू भिया मुस्कुरा उठेः वेतन दोगे मजदूर वाला और काम द्रोणाचार्य का लोगे? खाली मास्टर लोगों से उम्मीद करोगे कि वह पढ़ाई के बीच में धनरोपनी कराने न जाए. ग्रामीण इलाकों में अब भी करीब 10 फीसदी स्कूल ऐसे हैं, जहां एकमात्र शिक्षक हैं.

बेचारे एक ही मास्टर को बच्चों की हाजिरी देखनी होती है, सारे विषय और वर्गों को पढ़ाना होता है, अब तो दुपहरिया में खाने का इंतजाम भी करवाना होता है. और सरकार! एनसीइआरटी जैसे सरकारी शिक्षा संस्थानों को मजबूत बनाने के बजाय सरकार शिक्षा के लिए प्राइवेट सेक्टर की ओर देख रही है, इससे बेड़ा गर्क ही होगा न..

पता है सरकार ने 5 दिसंबर 2016 को लोकसभा में शिक्षा के आंकड़े पेश किए थे. उसके मुताबिक, सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में 18 फीसदी और माध्यमिक विद्यालयों में 15 फीसदी शिक्षकों के पद खाली हैं. देश भर में कुल मिलाकर करीब 10 लाख शिक्षकों की कमी है. देश के 26 करोड़ स्कूली छात्रों का करीब 55 फीसदी हिस्सा सरकारी स्कूलों में पढ़ता है. सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में माध्यमिक स्कूलों की सर्वाधिक रिक्तियां झारखंड में है, जो कि 70 फीसदी है. इस राज्य में प्राथमिक स्कूलों के लिए यह आंकड़ा 38 फीसदी है. उत्तर प्रदेश में माध्यमिक शिक्षकों के आधे पद खाली हैं, जबकि बिहार और गुजरात में यह कमी एक-तिहाई है. 60 लाख शिक्षकों के पदों में करीब नौ लाख प्राथमिक स्कूलों में और एक लाख माध्यमिक स्कूलों में खाली हैं.

लेकिन ठाकुर, जनगणना करवाना हो, मुर्गी, मवेशी, सूअर गिनवाना हो, मिड डे मील का भोजन बनवाना हो, ...बिना छत वाले स्कूल में पढ़ाना हो, बिना ब्लैक बोर्ड और खड़िया के पढ़ाना हो...बीडीओ से लेकर पंचायत सदस्य तक की जूती चटवाना हो...सारे काम शिक्षकों से करवा लो...

इतने के बाद शिक्षक अगर जिंदा रहकर पढ़ा रहा है ना, तो इसके लिए इस देश के तमाम प्रतिभावान् और कामचोर दोनों वर्गों के शिक्षकों का मेरा नमन.

गुड्डू संजीदा हो गए. आज मैंने उनके लिए शेर पढ़ाः

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए


गुड्डू मुस्कुरा उठे, उनने अपने पैंताने छिपा रखी टीचर्स का एक खंभा निकाला और जोर से कहाः हैप्पी टीचर्स डे.



Friday, September 8, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः एवरीबडी लव्स अ गुड बाढ़

एवरीबडी लव्स अ गुड बाढ़
ठर्रा विद ठाकुरः दूसरी किश्त 
(डिस्क्लेमरः पाठक अपना पव्वा-चखना साथ लाएं)

गुड्डू भैया पूरे ताव में थे. अपने छप्पर पर खड़े होकर जितना लाउडस्पीकर हुआ जा सकता था उतना होकर कृष्ण कल्पित की सूक्तिय़ों को चीखकर गा रहे थेः

स्वप्न है शराब!
जहालत के विरुद्ध
गरीबी के विरुद्ध
शोषण के विरुद्ध
अन्याय के विरुद्ध
मुक्ति का स्वप्न है शराब!

भाई गुड्डू आपने शराब को मुक्ति का स्वप्न बता दिया? गुड्डू ने इशारा किया कि 'इनकिलास जिंदाबाघ' कहने के लिए फूस की छत से मुफीद जगह कोई नहीं. गुड्डू आम आदमी थे और उनकी छत ही उनका मंच थी. हालांकि उनकी छत उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि नीचे बाढ़ के पानी ने गजब का समां बांध रखा था और उनके घर का हर बरतन मछली हो चला था.

गुड्डू भैया तो महज नुमाइंदे हैं, जो यह सब झेल रहे हैं, वरना गुजरात, असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा समेत देश के 26 राज्य और केंद्रशासित क्षेत्र बाढ़-बारिश की चपेट में हैं और 508 जानें जा चुकी हैं, देश की 2.8 लाख हेक्टेयर फसली जमीन बाढ़ से आई आपदा की चपेट में है और 63 लाख से ज्यादा घर क्षतिग्रस्त हो गए हैं. सबसे ज्यादा जान-माल का नुक्सान इस बार गुजरात को उठाना पड़ा, जहां 200 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है.

ऐसा कैसे कह सकते हैं भिया?

गुड्डू ने जांघ पर जोर से तलहत्थी मारते हुए कहाः अपनी क्या औकात रे ठाकुर. इ तो कैग कह रहा है.

मेरा मन खिन्न हो गया. आदमी हर काम के लिए सरकार को दोषी क्यों ठहराता है? क्यों गुड्डू भिया, सरकार ने बाढ़ की सूचना देने के लिए टेलीमीट्री स्टेशन नहीं बनाए हैं?

बोतल में बची आखिरी बूंद को बोतल उल्टा करने के बाद उसे जीभ से हिलकोर कर चाटते हुए गुड्डू बोलेः बनाया क्यों नहीं है ठाकुर...बनाया तो है. लेकिन करीब 60 फीसदी स्टेशन काम ही नहीं कर रहे हैं. बारहवीं पंचवर्षीय योजना में 219 टेलीमीट्री स्टेशन लगाए जाने का लक्ष्य था. 2016 तक सिर्फ 56 स्टेशन ही लगाए गए. कुल 375 टेलीमीट्री स्टेशनों में से 222 ठप पड़े हैं, तो रियल टाइम डेटा के लिए एक ही जगह बचती हैः भगवान इंद्र का दफ्तर.

मैं अभी बहस खत्म करने के मूड में नहीं था. मैंने कहा गुड्डू भिया, तो क्या बाढ़ खत्म करने के लिए कोई उपाय नहीं किया गया है?

गुड्डू मेरी तरफ मुड़कर चुप हो गए. दो मिनट तक के नाटकीय सिनेमाई साइलेंस के बाद फूटेः शराब छोड़ दी तुमने कमाल है ठाकुर/ मगर ये हाथ में क्या लाल-लाल है ठाकुर

मेरे मुंह से वाह निकलने ही वाला था कि उन्होंने हाथ से रोक दिया. मेरे लिए वाह न करो, जाकर राहत इंदौरी के लिए वाह करो. उन्हीं का है.

मैं चुप.

देखो, संकट असल में पानी का नहीं, संवेदनशीलता का है. राज्य सरकारें और केंद्र एक पटरी पर चलते ही नहीं. अगस्त से लेकर सितंबर 2011 तक 20 दिनों में छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भारी बारिश से महानदी का जलस्तर बढऩे की चेतावनी केंद्रीय जल आयोग ने कई बार जारी की थी लेकिन बांध के अफसरों ने ध्यान नहीं दिया और सितंबर में भारी बाढ़ आ गई, जिससे ओडिशा के 13 जिले प्रभावित हुए और दो हजार करोड़ रु. का आर्थिक नुकसान हुआ.

2014 में यही कहानी फिर दोहराई गई. नतीजा भी वही रहाः महानदी बेसिन में बाढ़ आ गई. जून 2013 में उत्तराखंड में अलकनंदा में बाढ़ की कोई पूर्वसूचना नहीं दी गई. मार्च 2016 तक 4,862 बड़े बांधों में से मात्र 349 (7 फीसदी) के लिए ही इमरजेंसी ऐक्शन प्लान/डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान तैयार किया गया. इनमें से भी 231 (पांच फीसदी) में ही ऑपरेटिंग मैनुअल तैयार किया गया. उत्तर प्रदेश के 115 में से सिर्फ 2, मध्य प्रदेश के 898 में 2, महाराष्ट्र के 1,693 में से 181 जबकि ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा, हरियाणा ने कोई इमरजेंसी ऐक्शन प्लान बनाया ही नहीं. 17 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में से सिर्फ दो ने मॉनसून के पहले और बाद में बांधों का पूरी तरह निरीक्षण कराया जबकि 12 राज्यों में किसी तरह का कोई निरीक्षण नहीं हुआ.

मेरा मन दुखी हो गया. तो क्या बाढ़ से बचा नहीं जा सकता?

देखो, बाढ़ कत्तई नुकसानदेह नहीं. खेतों के लिए तो फायदेमंद है. लेकिन तब, जब जान-माल सुरक्षित बना लिया जाए. फिर भी, जानलेवा बाढ़ से बचने के उपायों में कई अड़ंगे हैं, जैसे बांध सुरक्षा विधेयक 2010 से लटका हुआ है. राष्ट्रीय जल नीति के अलावा महकमे बहुत बन गए हैं, जैसे केंद्र सरकार के अधीन-केंद्रीय जल आयोग, गंगा फ्लड कंट्रोल मिशन (1972), ब्रह्मपुत्र बोर्ड (1980), राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (1976), टास्क फोर्स (2004) नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी और राज्यों में स्टेट टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी, राज्य बाढ़ नियंत्रण बोर्ड आदि, फिर भी बाढ़ का पानी हर साल सिर चढ़कर बोलता है.

गुड्डू भैया इस बीच फूस की छत से उतर गए थे. और मेरी नाव पर आकर चढ़ गएः ठाकुर, पत्रकार आदमी हो, थोड़ी-थोड़ी पिया करो. सुनो कल्पित की ही बात, खासकर तेरे लिए,

देवदास कैसे बनता देवदास
अगर शराब न होती.
तब पारो का क्या होता
क्या होता चंद्रमुखी का
क्या होता
रेलगाडी की तरह
थरथराती आत्मा का?
बाढ़ उतर जाए, तो अगले हफ्ते आना. काले चने की घुघनी (छोले) के साथ हंडिया पीने की कला सिखाऊंगा. चलो, एक पटियाला बना दो अभी. 

(यह लेख आईचौक.कॉम में प्रकाशित हो चुका है)

Thursday, September 7, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः पहली किस्त

ठर्रा विद ठाकुरः (अपना पव्वा साथ लाएं)
इंडिया@70 और घीसू का पसीना

(आईचौक पर 14 अगस्त को लिखा गया कॉलम)

आजादी का दिन आ रहा है. सत्तर साल बीत गए आजाद हुए. रामधारी सिंह दिनकर की बच्चों वाली वह कविता तो आपको याद ही होगी, जिसमें चूहा चुहिया से कहता हैः

सो जाना सब लोग लगाकर दरवाजे में किल्ली,
आज़ादी का जश्न देखने मैं जाता हूँ दिल्ली।

भारत में आम आदमी (पार्टी नहीं) कॉमन मैन ब्रो...की हैसियत चूहे जैसी है और बिल्लियों का उस पर राज है.

हमारे एक दोस्त हैं, गुड्डू भैया जो अपनी सींक-सरीखी काया में तब तक दारा सिंह होते हैं जब तक देसी का असर रहता है. इस मामले में पूरे देशभक्त हैं और उनका दावा है कि चाहे किसी की रगों रम का निवास हो उनकी धमनियों में कंट्री बहती है.
गुड्डू भैया आम आदमी हैं. तकरीबन अमिताभ के विजय दीनानाथ चौहान अवतार में आकार उसने हाथ नचाते हुए पूछा था मुझसेः क्या भाई, ये देश किसका है, आजादी किसकी है?

यह सवाल ऐसा शाश्वत है कि चाहे-अनचाहे सत्तर साल से देश का हर कोना एक बार और अमूमन कई बार पूछ ही लेता हैः आजादी किसकी है, किसके लिए है. जिसके लिए भी हो, हमारे आपके लिए आजादी का मतलब ही कुछ और है. अब जबकि हम पंद्रह अगस्त के पावन मौके पर फेसबुक, ट्वीटर और तमाम ऐसे ही सोशल साइट्स पर अपनी डीपी तिरंगा करने पर उतारू हैं, तमाम जगहों पर अपनी आजादी का जश्न मना रहे हैं.

फेसबुक पर लिखे, ट्वीट कीजिए, सराहा पर परदे के पीछे रहकर किसी को मन भर गरिया दीजिए, खुले में शौच जाइए, सड़क किनारे मूत्र-विसर्जन कीजिए..मल्लब हर तरीके से हम आजाद हैं. तो जैसी प्रजा वैसा राजा. नेताजी भी आजाद हैं. जब मन आए पार्टी बदलिए, अंतरात्मा बदलिए, जो जो मन हो सब बदलिए. दलाली खाइए. रोका किसने है, और कोई रोक भी कैसे पाएगा...

लेकिन यह गलत है. गुड्डू भैया चौथे पैग से हवा में उड़ने लगते हैः अब खरीद-फरोख्त के मामले में लोग दलाली नहीं खाएंगे तो क्या यज्ञ-हवन में खाएंगे? ...और दुनिया में बहुत सारे काम भविष्य सुरक्षित करने के लिए भी तो किए जाते हैं। कुछ लोग बचत करते हैं, कुछ बीमा करवाते हैं, कुछ अपने बेटे-बेटियों, नाती-पोतो के लिए घोटाले कर लेते हैं।

कुछ लोग आज फिर से बोफोर्स-बोफोर्स चिल्लाने लगे हैं. यह तो गलत है न ठाकुर. सरासर नाइंसाफी! बोफोर्स में 64 करोड़ का घोटाला हुआ था. इतने पैसे तो रेज़गारी के बराबर हैं। चिंदीचोरी जैसी बात है यह, और इस पर आप होहल्ला मचा रहे हैं। शराफत तो छू भी नहीं गई आपको! मधु कोड़ा को देखिए, उन पर 4000 करोड़ के घोटाले का आरोप है, लालू प्रसाद का चारा घोटाला तक 800 करोड़ का था।

ज़रा तुलना कीजिए। कुछ आंकड़े बता रहा हूं। आजादी के सत्तर बरस हुए अपने देश के, और तब से लेकर आज तक, भ्रष्टाचार की भेंट हुई रकम है, 462 बिलियन डॉलर। जी, यह रकम डॉलर में है। चूंकि हम हर बात पश्चिम से उधार लेते हैं, सो यह आंकड़ा भी उधर से ही है।

वॉशिंगटन की ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, आजादी के बाद से ही भ्रष्टाचार भारत की जड़ों में रहा है, जिसकी वजह से 462 बिलियन डॉलर यानी 30 लाख 95 हजार चार सौ करोड़ रूपये भारत के आर्थिक विकास से जुड़ नहीं पाए।

तो भ्रष्टाचार और घूसखोरी की हमारी इस अमूल्य विरासत पर, जो हमारी थाती रही है, आप सवाल खड़े कर रहे हैं? गुड्डू चौकी पर से नीचे उतर गए.

जब भी मैं भ्रष्टाचार की अपने देश की शानदार परंपरा का जिक्र करता हूं, हमेशा मुझे नेहरू दौर के जीप घोटाले से लेकर मूंदड़ा घोटाले, इंदिरा के दौर में मारुति घोटाले से लेकर तेल घोटाले, राजीव गांधी के दौर में बोफोर्स, सेंट किट्स, पीवी नरसिंह राव के दौर में शेयर घोटाला, चीनी घोटाला, सांसद घूसकांड, मनमोहन के दौर में टूजी से लेकर कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला याद आता है। यह एक ऐसी फेहरिस्त है, जिसको इतिहास हमेशा संदर्भ की तरह याद रखेगा।

संयोग देखिए, अब इसमें कुछ ऐसे लोगों के नाम भी जुड़ रहे हैं, जिनकी समृद्धि देखकर पूरा देश रश्क़ करता था. विजय नाम से याद आया, एक विजय था, जिसको ग्यारह मुल्कों की पुलिस खोज रही थी और दूसरा विजय है जिसको देश के बैंक प्रबंधक खोज रहे हैं.

बहरहाल, मेरा मानना है कि घोटालों पर संसद में चर्चा कराना टाइम खोटी करना है। आजादी के बाद से संसद में 322 घोटालों पर चर्चा हो चुकी है, नतीजा क्या निकला, मैं आज भी जान नहीं पाया हूं।

यकीन मानिए, नतीजे आ भी गए तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा. इस देश में 400 लोगों के पास चार्टड विमान हैं, 2985 परिवार अरबपति से भी अधिक हैं, देश के किसानों पर ढाई हज़ार करोड़ का कर्ज है और वह आत्महत्या करते हैं तो देश के 6 हजार उद्योगपतियों ने सवा लाख करोड़ का कर्ज ले रखा है. उनमें से कोई आत्महत्या नहीं करता.

पाठकों, घोटाले हुए हैं। यकीनन हुए हैं। यह भी पता है कि लिया किसने है? बस सुबूत नहीं हैं. और सुबूत मिल भी जाए तो क्या होगा?

चूहा दिल्ली में आजादी का जश्न देखने आएगा, बिल्ली पीछे सब चट कर जाएगी. कुछ बरस पहले एक योजना आयोग था. उसके उपाध्यक्ष भी थे. वह कहते थेः शहर के आदमी के लिए 32 रु. और गांव के आदमी के लिए 26 रु. रोजाना की आमदनी काफी है. उपाध्यक्ष महोदय औरंगजेब रोड (तब के) पर एक बंगले में रहते थे जिसकी कीमत इतनी थी कि अगर लॉन के घास के दाम भा लगाए जाते तो हर घास की कीमत 32 रु. से ज्यादा बैठती. अस्तु. आज सड़कें फटाफट तैयार हो रही हैं. इमारतें और मॉल्स चमचमा रहे हैं. दाल-टमाटर-प्याज की कीमत बढ़ने पर हो-हल्ला है लेकिन बढ़ी हुई कीमत किसान को नहीं मिलती. किसान अपनी पैदावार सड़क पर फेंक रहा है. वह सड़कों पर दूध उड़ेल रहा है. आजादी के मौके पर राजा की पालकी जाने वाली है. एलइडी बल्बों से रोशनायित सड़कें हीरे-मोती की तरह चमकती है. और इस हर मोती के पीछे घीसू का पसीना है.

आज आईचौक पर खड़े होकर एक शेर बहुत जोर से आ रहा हैः

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से।


चलो. चखना निकालो यार. लगता है चढ़ गई.

Monday, August 28, 2017

टाइम मशीनः विद्यापति की जिद

#टाइममशीन #गंगा #एकदा #विद्यापति

चार कहार पालकी लिए जा रहे थे. पालकी में थे आखिरी सांसे गिन रहे मैथिल-कोकिल विद्यापति. गंगाभक्त विद्यापति अपने आखिरी दिन गंगातट पर बिताना चाहते थे. सो दुलकी चाल चल रहे कहार पालकी लिए सिमरिया घाट को जा रहे थे.

आगे-आगे पालकी लेकर कहरिया और पीछे-पीछे महाकवि के सगे-सम्बन्धी। अलसभोर से चलते-चलते सांझ ढल आई तो विद्यापति ने कहारों से पूछा: "गंगा और कितनी दूर हैं?"
"ठाकुरजी, करीब पौने दो कोस।" कहरियों ने जवाब दिया। महाकवि एकाएक बोल उठे: "पालकी यहीं रोक दो। गंगा यहीं आएंगी।"
"ठाकुरजी, गंगा यहां से दो कोस दूर हैं। वह यहां कैसे आएगी? धीरज धरिए, एक घंटे के अन्दर हमलोग सिमरियाघाट पहुंच जाएंगे।"
विद्यापति अड़ गएः "अगर एक बेटा जीवन के अन्तिम क्षणों में अपनी मां से मिलने इतनी दूर आ सकता है तो क्या गंगा पौने दो कोस भी न आएंगी?"
खैर, लोगों ने इसको विद्यापति का बुढ़भस समझा. लेकिन आश्चर्य! सुबह जब सब जगे तो देखा गंगा हहराती हुई वहां से कुछ ही दूर बह रही थी.
विद्यापति मुदित मन गा उठेः 
बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे
छोड़इत निकट नयन बह नीरे।।
विद्यापति ने वहीं प्राण त्यागे. लेकिन आज भी समस्तीपुर से थोड़ा आगे मऊबाजितपुर नाम की जगह पर गंगा अपनी मूल धारा से थोड़ा उत्तर खिसकी दिखती है.

Tuesday, August 8, 2017

टाइम मशीनः शिवः अमर्ष

सती के अथाह प्रेम में डूबे शिव उनकी बेजान देह लिए हिमालय की घाटियों-दर्रों में भटकते रहे. न खाने की सुध, न ध्यान-योग की. सृष्टि में हलचल मच गई, सूर्य-चंद्र-वायु-वर्षा सबका चक्र गड़बड़ हो गया.

तारकासुर ने हमलाकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था. प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठी थी. तारकासुर की अंत केवल शिव की संतान ही कर सकती थी, सो ब्रह्मा चाहते थे कि अब किसी भी तरह शिव का विवाह हो जाए. बिष्णु ने अपने चक्र से सती की देह का अंत तो कर दिया, लेकिन महादेव का बैराग बना रहा. 

चतुर इंद्र ने प्रेम के देवता कामदेव को बुलाया था. 

कामदेव जानते थे शिव को. उनकी साधना के स्तर को और उनके प्रचंड क्रोध को भी. इंद्र का आदेश था तो कामदेव ने डरते-डरते हां कर दी थी।
कामदेव कैलाश पहुंचे तो वहां का बर्फ़ीला वातावरण देखकर निराश हो गए. इस निर्जन में साधना-तपस्या तो की जा सकती है, प्रेम के लिए यह जगह उपयुक्त नहीं. कामदेव ने कैलाश के इस बर्फीले मौसम को वसन्त में बदल दिया. हल्की-हल्की बयार बहने लगी, पत्थरों की जगह फूल खिल गए, भौंरो की गुनगुनाहट गूंजने लगी, हवा में खुशबू तैरने लगी और पूरे माहौल में फगुनाहट चढ़ आया. नदियों का कल-कल बहता पानी, फूलों की क्यारियां...प्रेम के लिए ज़रूरी हर चीज पैदा कर दी थी कामदेव ने।

लेकिन कामदेव भूल गए थे शिव को कौन बांध सका है आजतक...जिसकी मरजी से हवाएं चलती हों, सूरज निकलता हो, चांद-सितारे जगमगाते हों, धरती घूमती हो, समंदर में लहरें उछाहें मारती हो, उसको कामदेव बांधने चले थे!

कामदेव ने अपने प्रेम की प्रत्यंचा पर पुष्पबाण चढ़ाकर शिव की तरफ मोड़ा ही था कि अचानक मौसम बदल गया. नदियों का पानी खौलने लगा, धरती में दरारें पड़ गई और उनसे लावा बहने लगा. भयानक भू-स्खलन हुआ. जोर के बवंडर में शिव की तीसरी आंख खुल गई थी।

पलभर में कामदेव की देह में आग लग गई और वह भस्म होकर राख बन गए. 

Friday, July 28, 2017

बिहारः क्या शरद पर आएगा वसंत?

नीतीश के पाला बदलने और आनन-फानन में शपथ-ग्रहण करके भाजपा के साथ सरकार बना लेने पर कुछ सवाल उठने लाजिमी है. पहला स्वाभाविक सवाल तो यही उठता है कि आखिर नीतीश प्रधानमंत्री द्वारा किए गए डीएनए वाले बिहारी अस्मिता पर चोट से आहत थे वह फिर से भाजपा की शरण में क्यों आ गए. सवाल है कि आखिर भाजपा ने नीतीश को अपने पाले में क्यों करना चाहा? क्या 2019 के लोकसभा में उसे बिहार में आधार खिसकने का इतना डर था? तीसरा सवाल है कि आखिर नीतीश के विरोधी माने जाने वाले और महागठबंधन से बाहर निकलने की मुखालफत करने वाले शरद यादव का क्या होगा?

चूंकि मोदी युग के उदय के बाद मोदी-शाह के अश्वमेघ यज्ञ में सिर्फ बिहार और दिल्ली विधानचुनाव ही असली कांटे साबित हुए हैं और बिहार का झटका ज्यादा बड़ा था जिसमें भारत की पिछड़ी जातियों के दो बड़े नेता शामिल थे और मंडल से जुड़े हुए थे. ऐसे में बिहार में मोदी की सत्ता स्वीकार्यता का एक विशेष अर्थ है और मोदी की सर्व-व्यापकता की तस्वीर बिना बिहार में एनडीए की सत्ता के पूरी नहीं होती थी. ऐसे में ये जरूरी था कि नीतीश कुमार को अपने पाले में लाया जाए और जिसके लिए वे तनिक-तनिक तैयार भी दिखने का संकेत कर रहे थे.

साथ ही ऑपरेशन बिहार इसलिए भी हड़बड़ी में जरूरी था क्योंकि लालू और नीतीश में जो मतभेद हो रहे थे, उसके बाद राजनीतिक गलियारों में ये कानाफूसी थी कि लालू, जद-यू के कुछ विधायकों पर भी निशाना साधने की तैयारी में थी. इसीलिए आनन-फानन में नीतीश ने इस्तीफा दिया और अगले दिन सुबह-सुबह फिर से शपथ ले ली!

नीतीश कुमार के पाला बदलने के सवाल के कुछ बेहद सामान्य उत्तर हैं, उनमें से एक है नीतीश भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने वाली अपनी चट्टानी छवि को नई ऊंचाईयों पर ले जाना चाहते थे. लेकिन यह हिमशैल का सिर्फ दिखने वाला सिरा है. असल में इसकी भीतरी वजहे और भी हैं. सूत्रों के हवाले से खबर है कि लालू प्रसाद ने नीतीश का तख्तापलट करने की तैयारी कर ली थी. इसके साथ ही जेडी-यू में टूट भी हो जाती. जाहिर है, नीतीश ज्यादा तेज निकले और उन्होंने ब्रह्मास्त्र चला दिया. नीतीश कुमार महागठबंधन में मुख्यमंत्री तो थे लेकिन उनकी हैसियत 80 के मुकाबले 71 विधायकों के साथ जूनियर पार्टनर की ही थी. भाजपा के साथ अब नीतीश पहले की तरह बड़े भैया हो जाएंगे.

हालांकि, बिहार भाजपा में हर कोई नए गठजोड़ से खुश नहीं है लेकिन सुशील मोदी एक बार फिर उप-मुख्यमंत्री बनकर प्रसन्नचित्त होंगे. दूसरी बात, उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत को नीतीश ने कायदे से पढ़ लिया है. यूपी में भाजपा को उन पार्टियों ने भी वोट दिया है जिसे समाज में दुर्बल जातियां कहा जाता है. बिहार में नीतीश भी उन्हीं जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. अगर 2019 में भाजपा यूपी की तरह बिहार में भी उन जातियों को अपने पाले में कर लेती तो नीतीश के पास जमापूंजी क्या रह जाती? क और वजह तेजस्वी यादव भी रहे. नहीं, उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप नहीं. नीतीश तेजी से सीखते तेजस्वी को पैर जमाते देख रहे थे और उनको विवादित करके छोटा कर देना भी एक मकसद रहा होगा.

दूसरी तरफ, भाजपा के लिए 2019 से भी फौरी जरूरत थी गुजरात के चुनाव. भाजपा गुजरात विधानसभा को खोने नहीं देने के लिए कितनी बेताब है इसका अंदाजा हालिया महीनों में वहां बढ़ गए प्रधानमंत्री के दौरों से लग जाता है. गुजरात में भाजपा के वोट बैंक रहे पटेल पार्टी से नाराज चल रहे हैं और सड़कों पर सरकार के खिलाफ पटेलों की उमड़ी भीड़ भाजपा के लिए अनिष्टसूचक प्रतीत हो रही थी. गलियारों में चर्चा थी कि हार्दिक पटेल के सिर पर नीतीश कुमार का हाथ था. अब यह महज संयोग नहीं होगा कि नीतीश कुमार उन्हीं कुर्मियों के नेता हैं, जिसे गुजरात में पटेल कहा जाता है. भाजपा को उम्मीद है कि इससे गुजरात में पटेलों के विरोध को एक हद तक साधा जा सकेगा. इस बात को भी संयोग नहीं माना जा सकता है कि राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार (और अब राष्ट्रपति) रामनाथ कोविंद कोली जाति के हैं, जिसकी तादाद गुजरात में करीब 18 फीसदी है. नीतीश के साथ कोविंद के मीठे संबंध रहे हैं.

अब बच रहे शरद यादव. शरद यादव के बारे में बिना हील-हुज्जत के यह माना जा सकता है कि वह अपने सियासी करियर के आखिरी दौर से गुजर रहे हैं. हालांकि शरद महागठबंधन तोड़ने की मुखालफत कर रहे थे लेकिन उनके राजनीतिक जीवन में वसंत तभी आएगा जब वह भाजपा के साथ जद-यू के इस गठजोड़ को मान लेंगे. जद-यू के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि केंद्र सरकार में शरद यादव के लिए कबीना मंत्री के पद का प्रस्ताव है और शरद इसके लिए सहमत भी हैं.

वैसे राजनीतिक पंडित इस बात के कयास लगा रहे हैं कि जद-यू के 18 मुस्लिम और यादव विधायक टूट के लिए तैयार हैं. लेकिन वैधानिक टूट के लिए 24 विधायकों का होना जरूरी है. अगर यह टूट हुई और कुछ न्य विधायकों को जोड़कर लालू सरकार बनाने का दावा भी करें तो भी शरद यादव को राज्यसभा सीट गंवानी पड़ेगी. उनको दोबारा राज्यसभा में भेजना कठिन होगा. आरजेडी ने मायावती को राज्य सभा में भेजने का वचन पहले ही दे दिया है. ऐसे में बस एक और नाम ख्याल में आता है ममता बनर्जी का, जो मायावती को राज्य सभा भेजने पर हामी भर सकती हैं. लेकिन यह गणित सियासी खामख्याली भी हो सकती है, क्योंकि विश्वस्त सूत्र दावा कर रहे हैं कि शरद जल्दी ही कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं. दूसरी तरफ, आरजेडी के कई विधायक तेजस्वी का इस्तीफा चाहते थे और इस टूट से नाराज होकर उन्होंने गुरुवार की बैठक में मौजूद रहना मुनासिब नहीं समझा. एक और कोण कांग्रेस का है और अगर जेडी-यू में कोई टूट होती है तो कांग्रेस में भी तोड़-फोड़ होगी. अभी भाजपा 2019 की तरफ देख रही है तो नीतीश की नजर उससे आगे 2020 (बिहार विधानसभा चुनाव) पर भी होगी. कुल मिलाकर मामला दिलचस्प है, कुछ-कुछ अंकगणित और ज्यामिति के मिले-जुले समीकरण जैसा.

मंजीत ठाकुर

Tuesday, July 25, 2017

टाइम मशीनः अनुरक्ति


शिव सीरीजः अनुरक्ति

गौरी के लिए रात-दिन बराबर हो गए. न नींद, न भूख-प्यास. आंखों में आंसू भरे रहते थे और हृदय में शिवजी। कभी कन्द-मूल-फल का भोजन होता, कभी जल और कभी तो कई-कई दिनों का उपवास. प्रेम में पड़ी गौरी के बचपने ने उनको उमा बना दिया तो भोजन के लिए पत्तों का भी त्याग करके वह ‘अपर्णा’ बन गईं.

नीद न भूख पियास सरिस निसि बासरु/नयन नीरु मुख नाम पुलक तनु हियँ हरु।।
कंद मूल फल असन, कबहुँ जल पवनहि/सूखे बेल के पात खात दिन गवनहि।।


यह कमसिन उम्र और ऐसी घोर तपस्या. एक पैर पर खड़ी गौरी ने देखा एक साधु सामने खड़े थे, ये किसके प्यार में पड़ गई हो तुम बेटी! न रहने का ढंग, न खाने का शऊर, खुद क्या खाएगा तुम्हें क्या खिलाएगा? भांग-धतूरा?

एकउ हरहिं न बर गुन कोटिक दूषन/नर कपाल गज खाल ब्याल बिष भूषन।।
कहँ राउर गुन सील सरूप सुहावन/कहाँ अमंगल बेषु बिसेषु भयावन।

न रूप, न गुण...सिर के सारे बाल सफेद...देह में राख मली हुई..हुंह अघोरी कहीं का...गौरी की आंखें क्रोध से लाल हो गईं. लेकिन साधु से कुछ न बोलते हुए वह कहीं और तपस्या करने जाने लगीं. लेकिन यह क्या, वही साधु सामने रास्ता रोककर खड़ा था. गौरी को गुस्सा आ गयाः क्यों जी, बड़े ढीठ हो। इतनी बातें कहीं, फिर भी समझ नहीं आता? किसने भेजा है तुम्हें, मुझे बहकाने के लिए?

साधु ने मुस्कुराते हुए बांहे फैला दीं। गौरी का गुस्सा बांध तोड़ने के लिए बेताब हो गयाः अरे दुष्ट साधु, तुम बातों से नहीं मानोगे? जानते नहीं मन ही मन मैं शिव को पति मान चुकी हूं और मेरे सामने ऐसी ओछी हरकत कर रहे हो? इससे पहले कि मैं तुम्हें शाप देकर भस्म कर दूं, निकलो यहां से। साधु मुस्कुरा उठे थे। लेकिन साधु को तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआः साधु बने शिव ने खुद को देखा...और फिर असली रूप में आए. प्यार से पुकारा था उन्होंनेः देवि!

गौरी ने सिर उठाकर देखा तो सामने शिव...उनकी पूरी दुनिया. उनके जीवन का लक्ष्य़...वह ख़ुद. शिव कौन? खुद गौरी ही तो!

गौरी और शिव एक हो गए. प्रेम की बेल हरी हो गई.

Friday, July 21, 2017

दरभंगा में हवाई अड्डा अभी हवाई किला है

आज दरभंगा से संभावित हवाई सेवा पर लिखूंगा जिसे हाल ही में "उड़ान" योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है, हालांकि अभी सिर्फ सहमति पत्र पर दस्तखत हुए हैं और मीलों लंबा सफर तय करना है. भारत सरकार की उड़ान योजना क्षेत्रीय कनेक्टीविटी के लिए है.

बहुत सारे अन्य एयरपोर्ट की तरह ही दरभंगा एयरपोर्ट भी रक्षा मंत्रालय के अतर्गत आता है जिसके मंत्री अभी अरुण जेटली हैं. जेटली का नीतीश कुमार से मधुर संबंध है और दरभंगा के सांसद कीर्ति आजाद से कटु. लेकिन दरभंगा से सन् 2014 में JD-U के लोकसभा प्रत्याशी रहे Sanjay Jha, अरुण जेटली के नजदीकी माने जाते हैं. बिहार सरकार के सूत्र बताते हैं कि ये भी एक वजह थी कि दरभंगा एयरपोर्ट पर रक्षा मंत्रालय ने तत्काल NOC दे दिया.

(यों दो साल पहले जब सोशल मीडिया पर दरभंगा एयरपोर्ट के लिए अभियान चल रहा था तो उस समय कीर्ति आजाद कुछ सांसदों संग PM से मिलने भी गए थे लेकिन बाद में वे BJP में खुद ही अलग-थलग पड़ते गए).
फिलहाल जिस सहमति पत्र पर दस्तखत हुए हैं उसमें दरभंगा से पटना, गया और रायपुर पर सहमति बनी है. चूंकि इस बार नॉन-मेट्रो सिटी से ही कनेक्टिविटी की योजना थी, तो उसमें पटना, गया, रायपुर, बनारस और रांची आ सकते थे. अभी शुरू के तीन पर सहमति बनी है. रायपुर का नाम जुड़वाने में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की व्यक्तिगत रुचि थी, उन्होंने बैठक में कहा कि 'रायपुर और छत्तीसगढ़ में मिथिला समाज के लाखों लोग रहते हैं, कनेक्टिविटी से उनका भला होगा'. रही बात रांची और बनारस की तो अभी मंत्रालय की योजना में वो नहीं था, आगे उस पर विचार किया जा सकता है.

जब दो साल पहले हमारे ढेर सारे मित्र सोशल मीडिया और अखबारों के माध्यम से दरभंगा से हवाई सेवा शुरू करवाने के लिए अभियान-रत थे तो उस समय मैंने JD-U नेता संजय झा से इस मामले में पैरवी करने के लिए आग्रह किया था. वे सहमत तो थे लेकिन व्यवहारिकता और नौकरशाही की अड़चन को लेकर सशंकित थे. उन्होंने कहा था कि बेहतर हो कि राजधानी जैसी कुछ सुपरफास्ट ट्रेन या ऐसी ही कनेक्टिविटी का कुछ इंतजाम किया जाए.

लेकिन भारत सरकार जब "उड़ान" योजना लेकर सामने आई तो दरभंगा के लिए संभावना अचानक प्रकट हो गई. सोशल मीडिया में हमारे अभियान से उस समय सरकार के कान पर तो जूं नहीं रेंगी लेकिन समाज में कुछ हलचल जरूर मची. लोग तो पहले सोचते तक नहीं थे, उन्हें लगता था कि यह अभिजात्य माध्यम है, जिसका विकास से कोई लेनादेना नहीं. हाल यह था कि उस इलाके में एक जमाने में विकास-पुरुष के तौर पर सम्मानित एक प्रख्यात कांग्रेसी नेता के सुपुत्र विधायकजी ने तो यहां तक कहा कि दरभंगा वाले बस में ही बैठने की सलाहियत सीख लें,यही बहुत है!

दरभंगा एयरपोर्ट का रनवे बिहार में सबसे बड़ा है, पटना से भी बड़ा. महाराज दरभंगा का बनवाया हुआ है. छोटा-मंझोला विमान अभी भी उतर सकता है, अगर 2000 फीट रनवे और लंबा हो जाए तो भविष्य के लिए भी, बड़े विमानों के लिए भी पक्की व्यवस्था हो जाएगी. दरअसल, किसी शहर से विमानन सुविधा वन-टाइम डील होता है. हुआ तो हुआ, नहीं तो बीस-तीस साल नहीं होता. मनीष तिवारी जब केंद्र में मंत्री बने तो दिल्ली-लुधियाना शुरू हुआ, सुना कि उनके हटने के बाद बंद हो गया. इलाहाबाद में एक जमाने में था, फिर बंद हुआ और फिर जाकर मुरलीमनोहर जोशी के समय शुरू हुआ. यानी जिसकी लाठी, उसकी भैंस. वो तो भला हो उड़ान का जो दरभंगा जैसे शहर इसमें शामिल हुए.

दरभंगा एयरपोर्ट मौजूदा हाल में भी उड़ान योजना के लिए फिट था लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दरभंगा एयरपोर्ट के रनवे विस्तार के लिए जमीन अधिग्रहण हेतु सहमत हो गए हैं, ताकि भविष्य में बड़े विमान भी उतर सकें. उसके लिए पचास एकड़ जमीन चाहिए और उन्होंने कैबिनेट सचिवालय के प्रमुख सचिव ब्रजेश मेहरोत्रा को इस बाबत निर्देश दे दए है.

लेकिन इस हवाईअड्डे में कई पेंच हैं और इसमें इतनी दौड़-धूप या कहें कि ब्यूरोक्रेटिक लाइजनिंग की जरूरत है जिसके लिए ऊर्जावान नेतृत्व चाहिए. ये बात जगजाहिर है कि दरभंगा के सांसद कीर्ति आजाद की हवाईअड्डे में कितनी दिलचस्पी है और अगर होगी भी तो अरुण जेटली उनकी कितनी सुनेंगे! दरभंगा डिवीजन के अन्य दो सांसद हुकुमदेव नारायण यादव और बीरेंद्र चौधरी या तो हवाईसेवा के प्रति उदासीन हैं या इसका महत्व नहीं समझते. हां, एक बार बीरेंद्र चौधरी ने संसद में इसे उठाया था. लेकिन उस
समय 'उड़ान' जैसी कोई योजना नहीं थी. इस बार योजना तो अनुकूल है लेकिन पेंच नौकरशाही का है और वो पहाड़ जैसा है. देखिए जिस सहमति पत्र पर दस्तखत हुए हैं, उसमें किन-किन चीजों की आवश्यकता बताई गई है:
1. एयर हेड-क्वार्टर से एनओसी लेना(यानी फिर से डिफेंस मिनिस्ट्री के बाबू और वायुसेना अधिकारियों की तेल-मालिश करना)
2. AAI को एयर हेडक्वार्टर से एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करना होगा(बाबुओं को इसके लिए फिर से मनाना)
3. सिविल इन्क्लेव के लिए AAI ने जमीन अधिग्रहण करने का आग्रह किया है (झंझट का काम है. हालांकि जमीन पचास एकड़ ही चाहिए लेकिन ये "आजकल" मजाक नहीं है. बिहार सरकार के सबसे बड़े बाबू से लेकर जिलाअधिकारी, पुलिस कप्तान, मुआवजा, वित्त विभाग इत्यादि शामिल हैं)
4 रनवे एज लाइटिंग
5 एप्रन और टैक्सी वे का निर्माम
7 NA AIDS(ILS, VOR) का इंस्टालेशन- यानी रेडियो नेविगेशन सिस्टम, इस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम इत्यादि.
और ये जितने काम हैं, उसमें करीब 2000 करोड़ रुपये का खर्च है, क्योंकि 'उड़ान' स्कीम के तहत* बिहार सरकार को इसके सकल खर्च या छूट का 80 फीसदी वहन करना है! अब असली पेंच समझिए कि एक गरीब राज्य का खजाना जिसका बजट सन् 2016-17 के लिए महज 1.44 लाख करोड़ था वह सिर्फ दरभंगा हवाईअड्डे के लिए उसमें से दो हजार करोड़ निकाल दे तो पटना के बाबू लोग कितना नखरा करेंगे! (* उड़ान योजना में VGF यानी वायवेलिटी गैप फंड के तहत घाटे की भरपाई और सुविधाओं के निर्माण में केंद्र और राज्य का हिस्सा 20 औ 80 फीसदी का है.)

विद्वानों को मालूम है कि महज सहमति पत्र से कुछ नहीं होता, सहमति पत्र तो ऐसे-ऐसे हैं जो तीस-तीस साल से धूल फांक रहे हैं-उन पर काम आगे हुआ ही नहीं-फाइल आगे बढ़ी ही नहीं. असली बात है कि क्रियान्वयन होना और एक पिछड़े इलाके में इतने बड़े प्रोजेक्ट को जमीन पर उतार देना. 

यह पोस्ट सिर्फ दरभंगा एयरपोर्ट पर केंद्रित है, पूर्णिया, सहरसा, रक्सौल और किशनगंज का अलग संदर्भ है. लंबा हो जाएगा. आज के समय में एयरपोर्ट का क्या महत्व है, इस पर पोस्ट लिखना जरूरी नहीं. आप ये समझिए कि किसी पूंजीपति या सरकारी बाबू को अगर 20-25 करोड़ का भी प्रोजेक्ट लेकर उत्तर बिहार जाना हो तो वो ट्रेन से नहीं जाएगा. मैं खुद ही साधारण सी नौकरी में हूं, ट्रेन में 25-30 घंटे की सफर से बचता हूं.

मैंने ब्लॉग के जमाने में लिखा था कि ईस्ट-वेस्ट NH कॉरीडोर को मधुबनी-दरभंगा से होकर बनवाने में झंझारपुर और सहरसा के सांसद देवेंद्र प्र. यादव और दिनेश यादव का बड़ा रोल था, उन्होंने उसके लिए जमकर वाजपेयी सरकार में लॉबी की थी. नतीजतन वो मिथिला की लाइफलाइन साबित हुई.

ऐसे में दरभंगा से अगर वाकई 'उड़ान' होता है, तो बधाई के पात्र नीतीश कुमार होंगे, मोदी सरकार होगी और संजय झा होंगे जो इसमें व्यक्तिगत रुचि ले रहे हैं. दरभंगा और उत्तर बिहार के उस इलाके के लोगों को चाहिए कि वो दबाव और समर्थन बनाए रखे. वहां के मौजूदा सांसद-गण भी कुछ जोर लगाएं तो यह जल्दी फलीभूत हो जाएगा. सिर्फ हवाईअड्डा ही क्यों, रेलवे और अन्य योजनाएं भी फलीभूत हो जाएंगी.

--अपने फेसबुक वॉल पर लिखा सुशांत झा का लेख.

Wednesday, July 19, 2017

टाइम मशीनः शिवः खंड चारः भस्मांकुर

 भस्मांकुर 


बारात शहर के ठीक बीचों-बीच बाज़ार से गुज़र रही थी. बारात में, भूत-प्रेत- राक्षस- किन्नर-चुड़ैलें- किच्चिनें...बैताल, ब्रह्मराक्षस हैं...कोई दांत किटकिटाता...कोई शंख बजाता...कोई दुंदुभी पीटता...

गौरा तोर अंगना/ बड़ अजगुत देखल तोर अंगना
एक दिस बाघ-सिंह करे हुलना/ दोसर बरद छह सेहो बऊना...
गौरा तोर अंगना



उधर, महल में बड़ी गहमा-गहमी थी। बारात दरवज्जे पर आ गई है. गौरी की सखियां बेहद हैरत में थीः दूल्हा! मत मूछो दिदिया। पूरी देह में राख, माला की जगह नाग, बाल तो जाने कब से नहीं धोए...रथ की जगह बैल पर सवार हैं दूल्हे शिव.

सखियां ठठाकर हंस पड़ीं. लेकिन गौरी की आंखों में खुशियां दमक रही थीं. शिव को जो नहीं जानता, वह उनके रूप पर जाएगा, जो जानता है वह मन को पढ़ेगा. मेरे शंकर! मेरे भोलेः गौरी का मन हो रहा था वह भी झरोखे में जाकर नंदी बैल पर सवार भोलेनाथ को देखे,
सखियां गा उठी थीं,
शिव छथि लागल दुआरी, गे बहिना,
शिव छथि लागल दुआरी
इंद्र चंद्र दिग्पाल वरूण सब,
चढ़ि-चढ़ि निज असवारी गे बहिना
शिव छथि लागल दुआरी...

पिता पर्वतराज ने शिव से उनका वंश पूछा था. शिव कहीं शून्य में ताकते चुपचाप बैठे रहे. फुसफुसाहटें तेज़ हो गईं. सन्नाटा खिंच गया।

गौरी की मां मैना ने नारद को टहोका दियाः अब कुछ बोलते क्यों नहीं? बताइए न पहुना के खानदान के बारे में?

नारद ने कहाः ‘पर्वतराज, भगवान महादेव स्वयंभू हैं. इन्होंने खुद की रचना की है. इनका एक ही वंश है – ध्वनि. प्रकृति में अस्तित्व में आने वाली पहली चीजः ध्वनि... यह ध्वनि है- ओम्...

नारद ने कहा ओम्...और उसके साथ ही पूरी प्रकृति से आवाज़ आई
ओम...हवा ने, नदियो ने, पेड़ों ने, समंदर ने, पत्थरों ने, चिड़ियो ने, तितलियो ने...सबने एक साथ दोहरायाः ओम्...

पर्वतराज समझ गए. वक्त जयमाला का आ पहुंचाः लेकिन गौरी
एक पल के लिए रुकी थी. जयमाला से ठीक पहले गौरी ने शिव के
सामने अपनी हथेली खोल दी थी. उनकी हथेली में थोड़ी राख थी।
कामदेव की देह की राख.

शिव मुस्कुराए और उन्होंने वह राख चुटकियों मे उठाकर विवाह मंडप के नीचे डाल दियाः सबने देखा, वहां एक अंकुर निकल आया था.

फिर शिव ने सबको कहाः कामदेव बिना शरीर जगत के हर जीव में मौजूद रहेंगे...प्रेम के रूप में. गौरी ने शिव को और शिव ने गौरी को जयमाला पहनाई तो गणों ने जयघोष कियाः हर-हर महादेव!

Saturday, July 8, 2017

टाइम मशीन चारः अमर्ष

सती के अथाह प्रेम में डूबे शिव उनकी बेजान देह लिए हिमालय की घाटियों-दर्रों में भटकते रहे. न खाने की सुध, न ध्यान-योग की. सृष्टि में हलचल मच गई, सूर्य-चंद्र-वायु-वर्षा सबका चक्र गड़बड़ हो गया.
तारकासुर ने हमलाकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था. प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठी थी. तारकासुर की अंत केवल शिव की संतान ही कर सकती थी, सो ब्रह्मा चाहते थे कि अब किसी भी तरह शिव का विवाह हो जाए. बिष्णु ने अपने चक्र से सती की देह का अंत तो कर दिया, लेकिन महादेव का बैराग बना रहा.
चतुर इंद्र ने प्रेम के देवता कामदेव को बुलाया था.
कामदेव जानते थे शिव को. उनकी साधना के स्तर को और उनके प्रचंड क्रोध को भी. इंद्र का आदेश था तो कामदेव ने डरते-डरते हां कर दी थी।

कामदेव कैलाश पहुंचे तो वहां का बर्फ़ीला वातावरण देखकर निराश हो गए. इस निर्जन में साधना-तपस्या तो की जा सकती है, प्रेम के लिए यह जगह उपयुक्त नहीं. कामदेव ने कैलाश के इस बर्फीले मौसम को वसन्त में बदल दिया. हल्की-हल्की बयार बहने लगी, पत्थरों की जगह फूल खिल गए, भौंरो की गुनगुनाहट गूंजने लगी, हवा में खुशबू तैरने लगी और पूरे माहौल में फगुनाहट चढ़ आया. नदियों का कल-कल बहता पानी, फूलों की क्यारियां...प्रेम के लिए ज़रूरी हर चीज पैदा कर दी थी कामदेव ने।
लेकिन कामदेव भूल गए थे शिव को कौन बांध सका है आजतक...जिसकी मरजी से हवाएं चलती हों, सूरज निकलता हो, चांद-सितारे जगमगाते हों, धरती घूमती हो, समंदर में लहरें उछाहें मारती हो, उसको कामदेव बांधने चले थे!
कामदेव ने अपने प्रेम की प्रत्यंचा पर पुष्पबाण चढ़ाकर शिव की तरफ मोड़ा ही था कि अचानक मौसम बदल गया. नदियों का पानी खौलने लगा, धरती में दरारें पड़ गई और उनसे लावा बहने लगा. भयानक भू-स्खलन हुआ. जोर के बवंडर में शिव की तीसरी आंख खुल गई थी।
पलभर में कामदेव की देह में आग लग गई और वह भस्म होकर राख बन गए.

Friday, July 7, 2017

ये जो देस है मेराः बूंद चली पाताल

बुंदेलखंड हमेशा से कम बारिश वाला इलाका रहा है, लेकिन 2002 से लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया है. यह जमीनी रिपोर्ट बताती है कि बुंदेलखंड को ईमानदार कोशिशों की ज़रूरत है. साफ-सुथरी सरकारी मशीनरी अगर आम लोगों को साथ लेकर कोशिश करे तो सूखता जा रहा बुंदेलखंड शायद फिर जी उठे.

मैंने देश के विभिन्न इलाकों में माइनर विस्थापनों पर और अल्पविकसितइलाकों की स्थिति पर बहुत लंबे समय तक नजर रखने के बाद एक किताब लिखी हैः ये जो देस है मेरा। इस किताब का पहला अध्याय, 'बूंद चली पाताल' बुंदेलखंड की समस्या पर आधारित है.

किस तरह पानी ने बुंदेलखंड को बेपानी बना दिया है, उसकी रपट में मैंने केस स्टडीज और आंकड़ो का सहारा लिया है. कुछ परंपरा की बातें भी हैं, हल्के फुल्के इतिहास की भी.  इसमें, जरूरी आंकड़े भी हैं, ताकि सनद रहे और वक्त पड़ने पर काम आए. कोशिश की है, ज़रूर कुछ न कुछ छूट गया होगा, लेकिन उसे मानवीय भूल माना जाए.

इस किताब के छपने में रेणु अगाल जी के साथ, रेयाज़ुल हक़ का भारी योगदान है. जिन्होंने तकरीबन डांट-डांटकर मुझसे लिखवाया. अन्यथा मैं पर्याप्त या पर्याप्त से भी अधिक आलसी हूं.

पुस्तक अंशः

बुंदेलखंड का नाम हमेशा सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियों की याद दिलाता रहा है, बुंदेले-हरबोलों के मुंह सुनी गई कहानियों वाला बुंदेलखंड। जिसके नाम से आल्हा-ऊदल याद आते रहे, जा दिन जनम लियो आल्हा ने, धरती धंसी अढाई हाथ...। महोबे का पान, और चंबल का पानीः बुंदेलखंड के बारे में अच्छा-अच्छा सा बहुत कुछ सुना था।
बुंदेलखंड की जिस माटी के गुण कवि गाते नहीं थकते थे, लगता है वह माटी ही थक चली है। सुजला, सुफला, शस्य-श्यामला धरती बंजर बनती जा रही है। कुछ तो सूखे ने, कुछ सूखे की वजह से कर्ज़ ने, और बाकी बैंकों-साहूकारों के छल-कपट-प्रपंच ने बुंदेलखंड को किसानों की नई क़ब्रगाह बना दिया है।

बुंदेलखंड की धरती का सच, अब न तो आल्हा-ऊदल जैसे वीर हैं, न कीरत सागर, मदन सागर जैसे पारंपरिक तालाबों वाली उसकी पहचान। अब शायद किसानों की आत्महत्या और व्यापक पलायन ही इसकी पहचान बन गया है। बुंदेलखंड की अंदरूनी तस्वीर भयानक और अंदर तक हिला देने वाली है। बुंदेलखंड के किसानों में आत्महत्या की एक प्रवृत्ति हावी होने लगी है। बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट, छतरपुर ज़िलों में न जाने कितने गांव हैं, जहां ज़्यादातर घरों में दरवाज़ों पर ताले लटक रहे हैं। हर गांव में ऐसे घर हैं, जिनमें अकेले बुज़ुर्ग बचे हैं और जो भूख से रिरियाते फिर रहे हैं। गांव के कई घरों में सिर्फ़ महिलाएं बची हैं। सात ज़िलों के चालीस फ़ीसदी से ज़्यादा लोग इलाक़े से पलायन कर गए हैं। इतनी बड़ी आबादी दिल्ली में रिक्शा चलाती है, इटावा में ईंट-भट्ठों पर काम करती है, सूरत में मज़दूरी करती है।
खाली घरों और घरवालों को अपने प्रियजनों की वापसी की इंतज़ार है और धरती को पानी का।

जीने की जानलेवा शर्तः कर्ज़

गढ़ा गांव में ही सुराजी का घर भी है। उनके घर में दो मौतें हुई हैं। राज्य सरकार के अधिकारी उनके घर की आत्महत्याओं को भी ‘गृह-कलह’ से हुई मौतें बताते हैं। सुराजी के घर में नितांत अकेलापन पसरा रहता है। बीवी बहुत पहले भगवान को प्यारी हो गई। सुराजी की एकमात्र पोती का ब्याह हो गया तो सुराजी ने चैन की सांस ली थी। 2010 में एक दिन जब पोती अपने पति के साथ घर आई तो हालात सूखे की वजह से बदतर हो चुके थे।
बताते हुए सुराजी की आंखें डबडबा जाती हैं, ‘पिछले ही साल, पोती और उसके पति पहली बार अपने घर आए, घर में सेर भर भी गल्ला (अनाज) नहीं था।’ इसी अपमान से भरे सुराजी के बेटे ने पास के नीम के पेड़ से फांसी लगा ली। सुराजी तर्जनी से सामने नीम का पेड़ दिखाते हैं। पिता की आत्महत्या के अपराधबोध में पोती ने भी जान दे दी। सुराजी के दुख में सारा गढ़ा गांव साथ है। लेकिन गांव के हर किसी के साथ परिस्थितियां कमोबेश ऐसी ही हैं।
नीम का वह पेड़ गांव भर के लिए अपशगुन का प्रतीक बन गया है, और यह अब भी हरा है, उस पर सुराजी की आहों का कोई असर नहीं हुआ है।

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बुंदेलखंड में आत्महत्या करने वाले किसानों की गिनती उत्तर प्रदेश सरकार के आंकड़ों से काफी ज़्यादा है। राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में 56 और 2016 में 163 किसानों ने आत्महत्या की और उनकी मौत की वजहें भी कुछ अलग ही रहीं। लेकिन, इलाके में काम कर रहे किसान नेता शिवनारायण सिंह परिहार के पास एक ऐसी डायरी है जिसमें तस्वीरों के साथ किसानों के नाम-पते दर्ज़ हैं जिन्होंने कर्ज़ के मर्ज़ से छुटकारा पाने का रास्ता मौत को ही समझा। शिवनारायण ने काले रंग की इस डायरी को ‘मौत की डायरी’ नाम दिया है और यह राज्य सरकार के आंकड़ों को मृतक किसानों के नाम-पते के साथ झुठलाती है। इस डायरी के मुताबिक, पिछले 20 महीनों में उप्र के तहत बुंदेलखंड के सात ज़िलों में करीब साढ़े आठ सौ किसानों ने आत्महत्या कर ली है।

पिछले दो साल भी खेती की हालत कुछ ठीक नहीं रही है और उत्तर प्रदेश सरकार भी अपनी रिपोर्ट में 2015-16 में खरीफ की फसल में 70 फीसदी का नुकसान मान रही है। अकेले बांदा में 95,184 हेक्टेयर रकबे में दलहन और तिल की खेती चौपट हुई है। यहां छोटे सीमांत किसानों ने 68,241 हेक्टयेर में तिल, ज्वार, बाजरा, अरहर और धान बोया था, जिसकी लागत भी वसूल नहीं हो सकी।
बुंदेलखंड के सभी तेरह ज़िलों में साल 2010-2015 के बीच कुल मिलाकर करीब 3000 किसानों ने आत्महत्या की है। यह आत्महत्याओं का आधिकारिक आंकड़ा है जो राष्ट्रीय मीडिया में कभी-कभार और उस इलाके में अमूमन सुर्ख़ियां पाता रहता है। इसमें आत्महत्या की कोशिशों के मामले शामिल नहीं हैं, क्योंकि आत्महत्याओं की गिनती करते वक़्त उन्हें नहीं गिना जाता। इसके बावजूद अगर नज़र रखी जाए, तो बुंदेलखंड में हर तीसरे दिन किसी न किसी ज़िले से किसी न किसी किसान की आत्महत्या की ख़बर आ ही जाती है।

इस किताब को पूरा पढ़ने के लिए जैगरनॉट के लिए लिंक पर चटका लगाइए और किताब को खरीदकर पढ़िए. कीमत सिर्फ 10 रु. है.

Tuesday, July 4, 2017

टाइम मशीन 3ः शिवः बैराग

अपने घर विशाल यज्ञ की सफलता से सम्मोहित दक्ष प्रजापति ने समारोह में दामाद शिव को न्योता नहीं दिया था. अभिमान से बेटी सती को सुनाया था दक्ष नेः "अघोरी शिव देवताओं में उठने-बैठने लायक नहीं. देवताओं से लकदक कपड़े, सुगंधित तेल-फुलेल और कीमती गहने...कुछ भी तो नहीं पाखंडी शिव के पास." सती की बहनें ओट से खिलखिला पड़ी थीं।

सती का चेहरा गुस्से और अपमान से लाल पड़ता चला गया। उसके खुद के पिता ने त्यागी, सहनशील, सबसे प्रेम करने वाले शिव को पाखंडी कहा! सती गुस्से में भर उठीः मान-अपमान से परे शिव विषपायी हैं तो वह तांडव भी करते हैं!

मानो यह चेतावनी थी आने वाले विनाश की...और देखते ही देखते सती विशाल यज्ञकुंड के भीतर कूद गई थीं.

सन्नाटा छा गया। ऋषियों का मंत्रजाप रुक गया। मंडप के किनारे बज रही वीणाओं की झनकार थम गई। लोगो की मानो सांस रूक गई। सूरज की रौशनी का तेज खत्म हो गया, हवा भी स्थिर हो गई।

दक्ष को काटो तो खून नहीं। वह शिव के विरोधी तो थे लेकिन उनकी अपनी ही बेटी उनकी दुश्मनी की बलि चढ़ गई थी। सती की मां आंगन में पछाड़े खा-खाकर रोने लगी थीं।

पता नहीं कैसे, अचानक चारों तरफ से काले-काले बादल घिर आए थे। घुप्प अंधेरा छा गया। तेज़ हवाएं चलने लगीं। इस मौसम में बारिश नहीं होती थी कभी दक्ष के राज्य में, लेकिन आसमान से कड़कती बिजली के बीच न जाने कैसे मोटे-मोटे बड़े-बड़े ओले गिरने लगे, और बारिश की तो मत पूछिए। धारासार! इतनी जोरदार बरसात कि एक हाथ दूर कुछ नजर न आता था। सारे देवता और आम लोग मंडप से उठकर ओट की तलाश करने लगे थे।

अंधेरे और बरसात के बीच कुछ भी तभी नजर आता था, जब बादलों में तेज़ बिजली कड़कती थी। महल और मंडप की सारी रौशनियां पहले ही बुझ गई थीं। घुप्प अंधेरे में बस एक रौशनी थी, उस हवन कुंड की, जिसमें सती ने कूदकर जान दे दी थी। पवित्र माहौल अचानक डरावना हो गया था।

हवन कुंड की बुझी हुई आग में से बस लाल रंग के अंगारों की रौशनी थी और उसी रौशनी में सबने देखाः जटाएं खोले, हाथों में त्रिशूल लिए, बाघों की खाल कमर में लपेटे, एक भयानक-सा साया वहां खड़ा है। भयानक सायाः जी नहीं, यह तो गुस्से में भरे शिव खुद आ पहुंचे थे। रुद्राक्ष की मालाएं टूटकर नीचे बिखर गईं थी। जिधर देखो सांप ही सांप नजर आ रहे थे।

सती के अंगरक्षक बनकर आए वीरभद्र के ललकारते ही शिव के गण डमरू बजाते हुए पूरे आंगन में फैल गए। लोग सिहर उठे। डमरू की आवाज उस वक्त हमेशा की तरह आशीर्वाद जैसी नहीं, बल्कि दहशत लाने वाली लग रही थी और लग रहा था शिव डमरू की ताल पर नाच रहे होः तांडव नाच।

हर कोई बस अपनी सांस रोके अगली घटना का इंतजार कर रहा था।

पलक तक नहीं झपका सका था कोई कि दक्ष प्रजापति का कटा हुआ सिर आंगन में लुढ़कता हुआ नज़र आया। हर कोई खामोश था। सब जानते थे गलती दक्ष की थी। सबने उसके बाद इतना ही देखाः शिव ने हवनकुंड में सती की बेजान देह उठाकर कंधे पर रखी और चल दिए। 


इसकी पूरी कहानी को आप यहां य़ू-ट्यूब पर सुन सकते हैं---
शिव-सती की कहानी

Friday, June 30, 2017

टाइम मशीन 2ः क़िस्सा नल-दमयंती

नल को दमयंती से प्यार था और दमयंती को नल से. न कभी मिले, न कभी देखा...बस आवाज़ सुनी. दोनों सपनों में एक-दूसरे को देखते, कभी कश्मीर की वादियों में मिलते. चिनार के नीचे बिछी बर्फ़ीली चादर पर अंधेरी रातों में चलते, नश्तर चुभोती हवा में हाथ थामे सबसे चमकते तारे को निहारते और फिर सीसीडी के भीतर जाकर हॉट-चाकलेट और ब्राउनी ऑर्डर करते. 

वे कभी जंगलों में मिलते, कभी रेगिस्तान में. कभी दमयंती नल को अपने हाथों से आलू के परांठे खिलाती, कभी दोनों साथ झूले पर झूलते हुए अतीत और भविष्य बतियाते.
लेकिन दोनों कभी मिले नहीं थे. 

...और अब दमयंती का स्वयंवर था. स्वयंवर में दिलेर और सुंदर राजकुमारों, कमनीय देवताओं की भीड़ में नल कहीं दुबका हुआ था.
देवताओं को भी दमयंती पसंद थी और उनतक दमयंती के मुहब्बत के क़िस्से पहुंच चुके थे. आनन-फानन में देवताओं ने नल का बाना धर लिया. दमयंती परेशान. पांच-पांच नल जैसे लोग! कौन है असली?
दमयंती पास गई तो देखाः पांच में से सिर्फ एक की परछाईं है, माथे पर पसीने की बूंद है, देह की एक ख़ास गंध है, जिसे सूंघकर दमयंती ने कहा था- "मुझे तुम पसंद हो. तुम्हारी गंध भी."

दमयंती ने पसीने-देहगंध और परछाईं वाले इंसान नल को चुन लिया.

#टाइममशीन #एकदा #प्रेमकहानी

Monday, June 19, 2017

टाइम मशीन 1ः फौलाद

दोनों बालकों को दीवार में चिनवाया जा रहा था. मिस्त्री एक-एक ईंट रखता और दीवार ऊंची हो जाती. सरहिन्द के दीवान सुच्चा सिंह ने कई बार दोनों को समझाने की कोशिश की थीः इस्लाम अपना लो. आखिर, दोनों की उम्र ही क्या थी? बड़ावाला जोरावर सिंह करीब आठ साल का, और दूसरा फतेह तो सिर्फ छह का. लेकिन दोनों बालक तो मानो फौलाद के बने थे. डिगे तक नहीं. डिगते भी क्यों? आखिर दोनों फौलादी शख्सियत गुरु गोविन्द सिंह के बेटे थे. 

इनके दो भाई चमकौर में वीरगति हासिल कर चुके थे और इनके दादा गुरू तेगबहादुर ने दिल्ली में शहादत दी थी.
अचानक जोरावर की आंखों से आंसू बहने लगे थे. धारासार.
सुच्चा सिंह को लगा, शायद बच्चा डर गया हो, अब बात मान ले.
सुच्चा सिंह ने पूछाः क्यों जोरावर डर लग रहा है? रो क्यों रहे हो?
“दीवान साहब, डरते तो मुर्गे-तीतर हैं. हम क्यों डरें, हम तो दशमेश के बेटे हैं. ये आंसू तो इसलिए निकल रहे हैं क्योंकि मैं पैदा तो फतेह के बाद हुआ लेकिन आज शहादत की बारी आई, तो वह मुझसे पहले शहीद का दर्जा पा लेगा. मैं लंबा हूं न...”
सुच्चा सिंह अवाक् रह गया. दीवार चिनती गई, ऊंची...और ऊंची.

Tuesday, June 13, 2017

धूप लिफाफे में

दिल्ली में मौसम मां-बाप की लड़ाई सरीखा हो गया है।

दिल्ली की धूप हमारे जमाने के मास्टर की संटी सरीखा करंटी हुआ करती है। हमारे जमाने इसलिए कहा, काहे कि आज के मास्टर बच्चों को कहां पीट पाते हैं?

दिन की धूप में बाप-सा कड़ापन है। होमवर्क नहीं किया, ज्यादा देर खेल लिए, पड़ोसी के बच्चे से लड़ लिए, किसी के पेड़ से अमरूद तोड़ लाए...ले थप्पड़, दे थप्पड़। बस बीच में मां के आंचल की तरह कहीं से झोंका आता है बारिश का...मां का लाड़ बीच में कूद पड़ता है। यों कि अब बाबू जी के अनुशासन और मां के लाड़ के खींचतान में बच्चे की तो दुविधा द्विगुणित हो जाए।

अब धूप का रंग बाबूजी से मिला ही दिया है तो उसके भी कई तेवर हैं...सुबह की धूप, सुबह 11 बजे की धूप, दोपहर की सिर पर तैनात धूप...खेल के वक्त की कनपटी पर पड़ती धूप, ड्रिल मास्टर सरीखी...शाम की धूप विदा कहती प्रेमिका-सी, जाड़े की धूप, भादो के दोपहर की धूप...और न जाने कितने रंग हैं।


रघुवीर सहाय को ये रंग तो कई तरीके का नजर आया हैः

‘एक रंग होता है नीला,
और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है,
इसी तरह लाल भी लाल नहीं है,
बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग,
दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है,
सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है,
और कोई एक रंग जो तेरी बांह पर पड़ा हुआ है।’


धूप पिताजी के अवतार में है, पापा के भी, डैडी के भी...अलग अलग लोगों के लिए अलग-अलग संबोधन..अलग चरित्र। मोंटेक की धूप, मनमोहन की धूप, जेटली-मोदी और शाह की धूप, शिवराज की धूप और विजय माल्या की धूप...मेरे, आपके और एक मजदूर की धूप में अंतर तो होगा ना।

धूप में पसीना बहाना...कुछ ऐसा मानो कह रहा हो, आदमी जब तक हारता रहता है जिंदा रहता है। जब जीतने लगता है आदमी नहीं रहता।

लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित ही है...धूप बाप-सा तीखा क्यों हो गया।लेकिन जो भी हो, यह धूप इंसान को लड़ना सिखाता है। कनपटी से बहता पसीनी बेरोकटोक यहां-वहां, जहां-तहां जा रहा है। आपकी मेहनत का द्रवीकृत रूप पसीना है तो वाष्पीकृत रूप आपके देह की गंध।


इस गंध का आनंद लीजिए जब बालो में बेला के फूल खोंसे आपकी प्रेयसी आपसे कान में फुसफुसाते हुए कहे, मुझे तुम्हारी देह की गंध पसंद है, तुम डियो मत लगाया करो।


आखिर में, शाहरुख खान को याद कीजिए, हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी, धूप है कभी कभी है छांव जिंदगी...जिंदगी में अभी धूप वाला दौर है।

Sunday, May 21, 2017

भावनाएं आहत होने की मूर्खता के पैमाने

सोशल मीडिया पर मूर्खता के तय पैमाने नहीं हैं। अगर मैं ऐसा कह रहा हूं तो इसके पीछे वैलिड रीज़न है। कई मिसालें है, लेकिन आज मिसाल दूंगा हालिया एक पोस्ट पर मचे हड़कंप की।

हड़कंप मचा है मुजफ्फरपुर नाउ नाम के एक फेसबुक ग्रुप पर। हड़कंप क्यों मचा और उसके बाद क्या हुआ उससे पहले ज़रूरी है कि अनु रॉय नाम की मुंबईवासी लेखिका का ओरिजिनल पोस्ट पढ़ा जाए।

अनु रॉय का ओरिजिनल पोस्टः

फेसबुक में एक ग्रुप पर लिखा अनु रॉय के पोस्ट का स्क्रीन शॉट


वो सारी लड़कियाँ चरित्रहीन होती हैं जो,

- शॉर्ट्स में घूमतीं हैं
- जिनके ब्रा का स्ट्रेप दिखता है
- जो सिगरेट पीती हैं नुक्कर पर खड़ी हो कर
- जो मंगलसूत्र टाँग कर नहीं घूमतीं
- जिनके पैरों में बिछुय्ये नहीं होते
- जो पिरीयड पर बात करती है खुले में
- जो शादी के बाद भी पुरुषों से बात करती है
-जिनके पुरुष मित्र शादी के बाद बनते है
- जो सिंदूर नहीं लगाती
- जो पति का फ़ोटो कलेजा से सटाये नहीं घूमतीं
- जो समाज के बनाए नियमों को तोड़ कुछ अलग करना चाहतीं हैं!


वो सबकी सब चरित्रहीन होती है! मुझे चरित्रहीन लड़कियाँ पसंद हैं क्यूँकि वो ज़िंदा हैं, सिर्फ़ साँस लेती चलती फिरती कठपुतलियाँ नहीं हैं। चरित्रहीनता से अगर तुम्हारा अस्तित्व है तो चरित्रहीन होने में कुछ ग़लत नहीं है। बाक़ी तो सीता को भी एक गँवार धोबी जज करता है और उसका पति छोड़ देता है उसे। और वही पति भगवान है! ख़ैर!

PS :- लिस्ट में कुछ रह गया हो तो बता देने कष्ट करें हम अप्डेट कर देंगे
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बहरहाल, लड़कियों के कपड़े पहनने पर मुजफ्फरपुर के लोगों के इस ग्रुप की भावनाएं आहत हो गईं। संभवतया लड़कियों का खुलकर बोलना इस ग्रुप के करीब एक लाख पैंसठ हजार लोगों को ठीक नहीं लगा। या यह भी हो सकता है, कि सीता पर उंगली उठाने वाले धोबी का गंवार कहना लोगों को पसंद नहीं आया। या राम पर उठा कोई भी सवाल ही नही जंचा लोगों को।

इस पोस्ट के बाद उस ग्रुप में अनु रॉय को दी जाने वाली धमकियां, निन्दात्मक टिप्पणियों, गाली-गलौज और इनबॉक्स में की जाने वाली अश्लील बातों से क्या साबित होता है? जो भी हो, लेकिन उस ग्रुप में कुछ लोगों ने कानूनी कार्रवाई की धकी दी तो ग्रुप के एडमिन ने पोस्ट डिलीट कर दी, पर मुझे नहीं लगता कि उस पोस्ट में ईशनिन्दा जैसा कुछ था। या राम के जिस काम पर उनके भक्त भी सवाल उठाते हैं, उस पर सवाल खड़ा किया जाना कहां से भावनाएं आहत करने वाला हो गया।

मैं एक बात और कहना चाहूंगा, उन मूर्खों से जो इस बात को राम का अपमान समझ बैठे। एक बार जरा मिथिला का दौरा कर आएं। राम मिथिला के जमाई हुए क्योंकि सीता से बियाहे गए। सो मिजाज़ के हिसाब से मिथिलावाले राम को अपने तरीके से बधाई देते हैं। लेकिन राम के लिए मिथिला के लोग आज भी उदासीन हैं।

रामचंद्र आज तक जवााब नहीं दे पाए कि वह सीता को अपनी मर्यादा पुरुषोत्तम वाली छवि की खातिर जीवन भर क्यों प्रताड़ित करते रहे। एक धोबी के बोल पर पत्नी को घर से निकाल दिया। यह भी नहीं सोचा कि वह आठ महीने की गर्भवती हैं, जबकि आठ महीने की गर्भवती स्त्री को लोग एहतियातन घर की चौखट से कदम बाहर नहीं करने देते। न कोई फरियाद का मौका दिया।

आज की तारीख में अगर यह सब होता तो भगवान् राम आज मिथिला के किसी कोर्ट में मुकदमे की हाजरी दे रहे होते। उन्हें खुद पर ही विश्वास नहीं था, जबकि वह एक बार खुद ही सीता की अग्नि-परीक्षा ले चुके थे।

यह तो रामचंद्र का खानदानी दोष है। पिता ने एक नौकरानी के कहने पर पुत्र को वनवास दे दिया और पुत्र ने एक धोबी के कहने पर वाइफ को। मिथिला के लोग, न तो अपनी बेटी की शादी विवाह-पंचमी के दिन करते हैं और ना ही बेटी को सीता जैसे भाग्य का आशीर्वाद देते हैं।

मिथिला के लोग विष्णु के इस अवतार के प्रति इतने उदासीन रहे कि मिथिला में रामायण 19वीं सदी के उत्तरार्ध में लिखा गया, जब चंदा झा विरचित रामायण को तत्कालीन दरभंगा नरेश लक्ष्मीश्वर सिंह ने छपवाया था। लेकिन इसका कारण धार्मिक कतई नहीं था। उस समय मैथिली को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए अभियान चल रहा था। लेकिन मैथिली विरोधी हिंदी की लॉबी ने तर्क दिया कि जिस भाषा (मैथिली) में रामायण जैसे क्लासिक की रचना नहीं की गयी हो, उस भाषा को स्कूली शिक्षा का माध्यम कैसे बनाया जा सकता है।

यह भी कहा जाता है कि कृतिवास ओझा की रचित रामायण मैथिली में ही लिखी गयी थी लेकिन आम लोगों की उदासीनता की वजह से वह रामायण लोगों के चित्त पर नहीं चढ़ पायी फलतः कृतिवास बंगाल चले गए। एक समय था कि जब अयोध्या रामाश्रयी संप्रदाय और ऐसे ही अन्य संप्रदायों का आध्यात्मिक केंद्र हुआ करता था लेकिन जब बाबर ने राम मंदिर तोड़ा और दूसरे धर्मांध मुगल शासकों ने धार्मिक उत्पीड़न शुरू किया, तब इन धर्मावलंबियों ने सीता के जन्मस्थल मिथिला का रुख करना शुरू कर दिया। लेकिन राम और उनको पूजने वाले वैष्णव मत को मिथिला ने आत्मा से स्वीकार नहीं किया।

वैष्णव अपने माथे पर तीन लकीरनुमा तिलक लगाते हैं तो आज भी उन्हें मिथिला में उपहास में 111 एक सौ ग्यारह और राम फटाका वाला महात्मा कहा जाता है। वह गले में तुलसी की माला पहनते हैं तो लोग उन्हें उपहास में कंठमलिया बोलते हैं। वैष्णव गुरु जब कभी भी किसी को मत में दीक्षित करते हैं तो उस व्यक्ति के कान में कुछ मंत्र पढ़ते हैं। और मिथिला में उन वैष्णव गुरुओं को कनफुसकी बाबा बोलते हैं। कभी कोई मैथिल हुआ करते थे जो शायद राम के प्रति अपने आशक्ति की वजह से विष्णुपुरी नाम से जाने जाते थे जब उन्होंने संन्यास ग्रहण करने का विचार किया तो समाज के लोगों ने उन्हें समाज से ही बहिष्कृत कर दिया। योगी जी को अयोध्या में राम मंदिर जरूर बनवा देना चाहिए, काहे कि पता नहीं कब किस दिन कोई चोटाया हुआ मैथिल लव-कुश की तरफ से टाइटल केस कर दे। जो सीता से बियाहे गये, सो भगवान् हुए वरना कहलाते रामचंद्र वल्द दशरथ 
जय सीता माई रहेगा।
पिछले दो दशक की राजनीति ने राम को सांप्रदायिक बना दिया है वरना उस ग्रुप के अहमकों को पता होता कि पहले मुसलमान भी राम-राम कहकर अभिवादन किया करते थे। आपने अपनी हिन्दुत्ववादी आक्रामकता को जय श्री राम में बदल दिया है। 

अनु रॉय की इस पोस्ट पर टिप्पणी करने वाले ज्यादातर लोग अनपढ़ ही लगे  मुझे। साक्षरता के संदर्भ में नहीं, दिमागी परिपक्वता के संदर्भ में। इनमें से ज्यादातर ने रामचरित मानस या रामायण (इसके बारे में छोड़ ही दीजिए, यह संस्कृत में है) पढ़ा नहीं होगा। राम के बारे में इनका अधिकतम ज्ञान रामानंद सागर या बाद के चैनलों पर चलने वाले धार्मिक सीरियलों से आय़ा होगा। 

एक बात तय है, पहली बात कि सीता के चरित्र पर सवाल करने वाला धोबी गंवार नहीं था, गंवार तो वे लोग है जिनका मर्दवादी अहंकार शॉर्ट्स पहनने वाली लड़की के पोस्ट को स्वीकार नहीं कर पाया. आहत हुए इन लोगों में ज्यादातर लोग सुबह सुबह वॉट्सएप पर जीजा-साली के जोक शेयर करने वाले लोग हैं। 

अब ग्रुप के एडमिन ने एक माफीनामा भी पोस्ट किया है। सोशल मीडिया पर बढ़ती इस--मैं असहिष्णुता नहीं कहूंगा--अहमकपने, मूर्खता और नीचता ने एक बात साबित कर दिया है। उसकी मिसाल मैं एक छोटी सी कहानी से दूंगा, जो आपने पहले सुन रखी होगीः
पानी में भींगते-ठिठुरते बंदर को चिड़िया ने देखा तो कहा, बंदर भैया आप भी अपना घर क्यों नहीं बनाते। जवाब में बंदर ने चिड़िया का घोंसला उजाड़ दियाः बड़ी आई, मुझे उपदेश देने वाली. 

फिलहाल सवाल यह है कि सोशल मीडिया पर इन ट्रोल या साइबर बुलीज़ पर कैसे नकेल कसी जाए। अनु रॉय के पास एक विकल्प है कि वह धमकी देने वालों के खिलाफ साइबर क्राइम समेत एफआईआर दर्ज करवाएं, ताकि मुजफ्फरपुर के इन कथित आहत लोगों को दो चार बार मुंबई पुलिस का लाफा पड़े तो भावनाओं के साथ कनपटी भी आहत हो।

बहरहाल, ट्रोल करने वाले इन बंदरों के हाथ में सोशल मीडिया का टूल आ गया है,  और इन्हें अदरक का स्वाद तो बिलकुल पता नहीं।