Wednesday, October 31, 2012

एक अच्छी कविता

दुर्गम वनों और ऊंचे पर्वतों को जीतते हुए,
जब तुम अंतिम ऊंचाई को भी जीत लोगे,

जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब,
तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में,
जिन्हें तुमने जीता है।

जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे,
और कांपोगे नहीं...
जब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क नहीं
सब कुछ जीत लेने में..
और अंत तक हिम्मत न हारने में...


---कुंवर बेचैन

5 comments:

रश्मि प्रभा... said...

बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति

आहुति said...

बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

Unknown said...

💯

Unknown said...

Wahhh kya likha h kavi n

Unknown said...

Truly inspiring ❤️❤️