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Wednesday, March 6, 2019

कश्मीर में भिखारी क्यों नहीं होते?

8 जुलाई, 2016 को जब कश्मीरी आतंकवादियों के पोस्टर बॉय बुरहान वानी को सुरक्षा बलों ने एक मुठभेड़ में मार गिराया था. उस वक्त मैं श्रीनगर में था और हफ्ते भर पहले अमरनाथ यात्रा शुरू हुई थी. मैंने अमरनाथ गुफा तक की यात्रा बालटाल और पहलगाम दोनों रास्तों से की थी और तब घाटी के विभिन्न इलाकों में रिपोर्टिंग के वास्ते घूमा भी था.

उस साल ईद 6 या 7 तारीख की हुई थी और मैं कश्मीरी सिवइयों का स्वाद लेने डल झील के पास के बाजार में घूम रहा था और वहीं एक भिखारी कुछ मांगने आ गया. कश्मीरी पंडित मूल की एक साथी पत्रकार ने तब मुझे बताया था कि कश्मीरी लोग भीख नहीं मांगते और बाहरी (खासकर बिहारी लोग) आकर कश्मीर की समृद्ध फिजां में भीख मांगने की रवायत शुरू कर रहे हैं.

वैसे, मैंने कश्मीर घाटी में कहीं मकान झोंपड़ानुमा नहीं देखे. हर जगह मकान बढ़िया बने थे. जबकि इसकी तुलना में उत्तर भारतीय राज्यों का लैंडस्केप ज्यादा टेढ़ा-मेढ़ा है, गुरबत और धूल-धक्कड़ से भरा है.

तब से यह सवाल मेरे जेहन में लगातार घूम रहा था कि क्या वाकई कश्मीरी लोग भीख नहीं मांगते? और अगर उस पत्रकार की बात सच थी तो क्यों नहीं मांगते?

जबकि, सरकारी आंकड़े कश्मीर की आर्थिक स्थिति का कुछ और ही खुलासा दे रहे हैं. आंकड़े बता रहे हैं कि कश्मीर में 2014 के बाद से आतंकवाद में इजाफा हुआ है. सिर्फ 2018 की बात करें तो कश्मीर घाटी में 614 आतंकी घटनाएं हुईं हैं. जबकि 2014 में 222 हुई थीं. 2018 में 257 आतंकवादी मारे गए हैं और 2014 में 110 आतंकवादी ढेर किए गए थे.

इसीतरह पाकिस्तान ने भी घाटी में अपनी गतिविधियां तेज की हैं. 2016 से 2018 के बीच 398 आतंकियों ने कश्मीर में घुसपैठ की. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर के मुताबिक, 686 आतंकवादी मारे गए और 56 पकड़ लिए गए.

वैसे, कश्मीर में वहां बेरोजगारी की दर भी बाकी देश के औसत से कहीं अधिक है. पर्यटन के आंकड़े भी गोते लगा रहे हैं. कश्मीर में 18 से 29 साल के आयु वर्ग में बेरोजगारी की दर 24.6 फीसदी है. जबकि बेरोजगारी में यह राष्ट्रीय औसत कोई 13.2 फीसदी है. जुलाई 2016 से जून 2017 के बीच 130 कार्यदिवसों का नुक्सान घाटी में हड़ताल और कर्फ्यू से हुआ था. इसकी अनुमानित लागत करीब 13,261 करोड़ रु. आंकी गई है.


जहां तक आर्थिक वृद्धि की बात है कश्मीर में वित्त वर्ष 2017 में 8.2 फीसदी की विकास दर दर्ज की गई थी. जबकि इसी अवधि के लिए राष्ट्रीय औसत 10.8 फीसदी रहा. कश्मीर का 2019 में राज्य जीडीपी करीबन 25 अरब डॉलर का है और देश के तमाम राज्यों के लिहाज से विकास की सीढ़ी पर कश्मीर 21वें पायदान पर है.

घाटी में पर्यटन भी गोते लगा रहा है. साल 2018 में कश्मीर में 8.5 लाख देशी और विदेशी सैलानी आए थे. 2017 की तुलना में यह 23 फीसदी कम है.

दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर घाटी में आए बाढ़ के बाद राहत और ढांचागत विकास और स्वास्थ्य कल्याण और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 80,000 करोड़ रु. का पैकेज दिया था. फिर भी, इन आंकड़ो से एक बात साफ होती है कि कश्मीर की आर्थिक हालत खराब ही है.

सवाल है कि क्या बेहतर आर्थिक वृद्धि और विकास कश्मीर के नौजवानों में बढ़ते अलगाव को थामने में कामयाब होगा? संकेत हैं कि आर्थिक गतिविधियों के साथ ही खुले मन से बातचीत के रास्ते भी बढ़ाए जाने चाहिए. सवाल यह है कि केंद्र सरकार के पास बातचीत की कोई गुंजाइश बची है?

खराब आर्थिक हालत, बेरोजगारी और पर्यटन जैसे एकमात्र उद्योग के बिखरने के बावजूद कश्मीर में भिखारी क्यों नहीं हैं और बिहार-यूपी-झारखंड-बंगाल के लोग घाटी में जान जोखिम में डालकर भीख क्यों मांगते हैं, इसका उत्तर मिलना बाकी है.

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Saturday, July 16, 2016

अमरनाथ को केदारनाथ बनने मत दीजिए

बाबा बर्फानी यानी बाबा अमरनाथ लाखों हिन्दुओं की श्रद्धा के केन्द्र रहे हैं और भारत में श्रद्धा पर सवाल खड़े करना बेहद खतरनाक है। लेकिन इन दिनों मैं बाबा अमरनाथ की यात्रा को बड़े गौर से देख रहा हूं। 2 जुलाई को
जिस दिन यात्रा की शुरूआत हुई थी, नौ हज़ार यात्री थे, और श्रद्धालुओं की यह संख्या दूसरे ही दिन बढ़कर सोलह हजार हो गई।

जम्मू-कश्मीर के जिस हिस्से में बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा है, उसे पारिस्थितिकी के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील माना जाता है। लोगों की बढ़ती तादाद से उस इलाके में, उस ऊंचाई पर सामान्य तापमान में बढोत्तरी हो जाती है। और बर्फ से बनने वाला शिवलिंग कई दफा पूरा नहीं बन पाता। 

इस इलाके में हरियाली बहुत तेज़ी से कम हो रही है और यात्रा के लिए नए रास्ते बनाए जा रहे हैं। रास्ते में अधबनी सड़कों की वजह से धूल के बगूले उठते हैं। असल में, बाबा अमरनाथ तक जाने के दो रास्ते हैं, एक है पारंपरिक पहलगाम-चंदनबाड़ी होकर जाने का रास्ता। इस रास्ते की लंबाई अधिक है, करीब 38 किलोमीटर का सफ़र तय करना होता है। लेकिन पारंपरिक रास्ता तो यही है। इसी रास्ते पर आतंकवादी हमले का खतरा भी अधिक होता है।

लेकिन दूसरा रास्ता भी बना लिया गया है। हालांकि, लोग बताते हैं कि इस रास्ते का उपयोग 18वीं सदी से होता आय़ा है लेकिन पिछले 15-16 साल में बालटाल होकर जाने वाला रास्ता अधिक लोकप्रिय हुआ है। बालटाल के रास्ते बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा तक जाने में सिर्फ 14 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। सो, फटाफट पुण्य कमाने वालों के लिए यह रास्ता अधिक मुफीद साबित हो रहा है।

बालटाल से हेलिकॉप्टर भी उड़ते हैं। तो अमीर लोगों के लिए बाबा बर्फानी का दर्शन ज्यादा आसानी से उपलब्ध हो गया है। लेकिन यात्रा शुरू होने से पहले मेरी नजर उन कूड़ों पर पड़ ही गई जो पिछले साल के यात्रियों ने यहां छोड़ दिए थे। उनकी सफाई नहीं हो पाई थी।  अब इस साल का कूड़ा उस ढेर को और बड़ा कर देगा और इस कूड़े में प्लास्टिक-पॉलीथीन की थैलियां बहुतायत में हैं।

आखिर पर्यावरण की चिंता किसे है? श्रीनगर से बालटाल जाने के रास्ते में, आपको कंगन के बाद से ही दोनों तरफ ग्लेशियर दिखने लगते हैं। आपको इन ग्लेशियरों को देखकर स्वर्गीय आनंद आएगा और आपको इस बात का इल्म भी नहीं होगा कि सालों भर जमने वाली इस बर्फ की नदी (ग्लेशियर) में से तीन हमेशा के लिए खत्म हो चुके हैं।

बालटाल पहुंचकर हजारों गाड़ियां पार्किंग में लगी दिखती हैं। इनके डीज़ल के जलने से निकला धुआं, और अधजले कार्बन से इस साफ-सुथरी हवा में ज़हर घुल रहा है। कनाते और तंबू लगे हैं। बेस कैंप में 16 सौ तंबू हैं और हर तंबू में औसतन छह बिस्तर हैं। लेकिन पीने के पानी का सिर्फ एक नल। शौचालय के नाम पर सिर्फ एक ढांचा है। जिनमें पांच कमोड हैं। पांच में से एक कमोड टूटा-फूटा है, बाकी इतने गंदे हैं कि शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। ऐसे में यात्री कितना साफ-सुथरा होकर दर्शन के लिए आगे बढ़ेगा, यह कहना मुश्किल है।
यात्रियों में ऐसे लोगों की गिनती ज्यादा लग रही है मुझे जो पुण्य कमाने कम और पिकनिक मनाने आए लगते हैं। बेस कैंप में थोड़ा और आगे बढ़ें तो भारत की महान धार्मिक परंपरा का एक और उदाहरण मिलता हैः लंगर। यात्री, मीडियावाले कोई भी यहां आकर मुफ्त खा सकता है। जी नहीं, रूकिए, अगर आप दूर-दराज से आए ड्राइवर हैं तो आपका प्रवेश निषेध है।

फिर यह भी पता चला कि यह लंगर उन चंदों पर चलाकर पुण्य कमाए जाते हैं, जो पंजाब-हरियाणा के विभिन्न शहरों में पुण्य के अभिलाषी लोगों से जुटाए जाते हैं। तो यह लंगर भी एक तरह से घोटाला ही है। चंदे की रकम में से बाकी किधर जाती है, यह तो बगल में बहती झेलम ही बता पाए।

यह लूट-खसोट तो हर तरफ है, लेकिन बाबा अमरनाथ तक जाकर पुण्य बटोरने से पहले यह ध्यान रख लिया जाता कि उससे इस इलाके के पर्यावरण, नदियों और हिमनदियों को कितना नुकसान हो रहा है, तो अधिक पुण्य के भागीदार होते। हम सब।

मंजीत ठाकुर

Friday, November 20, 2015

लेह में आवारगी पार्ट 2

लेह के जिस सर्किट हाउस में हम ठहरे थे वह सरकारी था और जाहिर है उसमें टीवी था तो लेकिन उसके डीटीएच का पैसा नहीं दिया गया था। यानी टीवी देखना बेकार था।


फोटोः तेजिन्दर सिंह
एक पूरा दिन आराम व दूसरा पूरा दिन वहीं लेह में घूमना सबसे अच्छा तरीका है लेकिन हमारे पास वक्त बेहद कम था, और काम काफी ज्यादा। दूसरे दिन सुबह-सुबह मेरी नींद खुल गई। दिल्ली में जब तक दफ्तर न जाना हो मैं आदतन साढ़े 8 तक सोता रहता हूं और उगता हुआ सूरज कम ही देख पाता हूं। लेकिन यहां तो रात को खिड़की का पर्दा लगाना भूल गया था और 6 बजे बिस्तर पर पड़े-पड़े ही आंखें चौंधिया गईं।

सूर्य की पहली किरण भूरे पहाड़ों के शिखर पर जमी बर्फ पर पड़ रही थी। ऐसा लग रहा था मानो किसी सुनहरी काया पर मलमल का आंचल भर डाल दिया हो। 15 मिनट तक मैं बस सब कुछ भूल कर इस नजारे को देखता ही रह गया। साथ ही खिड़की से बाहर लॉन में आसमान जाने किस नस्ल की चिड़िया गा रही थी।

सुबह को, सर्किट हाउस के केयर टेकर ने हमारे लिए ऑमलेट और ब्रेड का नाश्ता तैयार कर दिया था। उस दिन शायद लेह में बाजार कुछ बंद थे।

फोटोः सौरभ, मैं और तेजिन्दर, ऑमलेट के इंतजार में


इसी से गुज़ारा करना था। हमें लेह के आसपास के हिस्सों में कुछ शूटिंग पूरी करनी थी और इसके लिए हम शांति स्तूप से लेकर न जाने कितने गोम्फाओं के दर्शन कर लिए। सड़क के बाईं तरफ पहाड़, नीचे हरा-भरा लेह, और पूरा शहर...मानो घरौंदों की बस्ती हो।


शांति स्तूप फोटोः सौरभ
फिल्म 3 इडियट्स ने इस जगह को और भी चर्चा में ला दिया है। कैसे इसकी चर्चा तो आगे, लेकिन शहर से पूर्ब सात-आठ किलोमीटर बढ़ते ही एक स्कूल हैः रैंचो स्कूल। जी हैं, आमिर खान का नाम थ्री इडियट्स में रैंचो ही था और अब एक स्कूल है जिसको उनके ही नाम से जाना जाता है।

इस स्कूल तक जाने के लिए आप एक सड़क पकड़ते है, जो सीधे मनाली की तरफ जाती है। शहर से बाहर निकलते ही इस सड़क को कई बारे आड़ी काटती हुई एक पतली सी नहर है, जो शहर के लिए पानी की आपूर्ति का शायद एकमात्र साधन है।


फिर बाई तरफ आप देखते हैं, रेतों के ढूह...पथरीले पहाड़। न जाने कितने मोड़ हैं उसमें। ऐंठन से भरे चट्टान। लगता है किसी ने मचोड़कर-मरोड़कर रख दिया हो। जाहिर कुदरत ने मरोड़ा है। कुदरत से बड़ी ताकत है क्या कोई।

इंसान कितना भी ताकतवर हो ले, आखिरी बोली तो कुदरत की होती है। यह बात, चाहे आप दिल्ली-मुंबई-अहमदाबाद-बंगलुरू में शायद महसूस न कर पाएं लेकिन लेह-लद्दाख जाकर आप इस बात से इतफाक रखेंगे।

रैंचो स्कूल के बगल में ही स्तूप जैसी सफेद आकृतियां बनाई गई है। सैकड़ो की संख्या में। फिल्मों के शौक़ीन हैं तो बंटी और बबली फिल्म का गीत देख लीजिए, जिसमें अभिषेक और रानी इन्ही आकृतियों के बगल में प्रेम भरे गीत गा रहे हैं। फिल्म दिल से में, शाहरुख और मनीषा कोईराला के प्रेम का उद्गार भी इधर ही व्यक्त हुए हैं।

बहरहाल, सूरत तेजी़ से ढल रहा था और हम वहां से फोटो खिचवाकर, क्योंकि शूटिंग हमने निबटी ली थी, शांति स्तूप की तरफ चल पड़े। वह हमारे सर्किट हाउस से ढाई किलोमीटर उत्तर था।

शांति स्तूप तक पहुंचते-पहुंचते थकान हम पर तारी हो चुकी थी। ढलते हुए सूरज का सौन्दर्य..सफेद स्तूप पर। वाह क्या दृश्य था। और जब हम हांफते हुए ऊपर शांति स्तूप तक पहुंचे...दक्षिण में बादलों का साम्राज्य हिममंडित शिखरों को अपने आगोश में ले चुका था।

फिर भी हमने हिस्से के काम निबटाए। शूटिग का। लेकिन उसके साथ अपने फोटो शूट भी तो जरूरी काम हुआ करते हैं। वह भी किया गया।

शाम को 7 बजे तक हमें वापस सर्किट हाउस पहुंचना था, क्योंकि डॉक्टर साहब आकर हमारी जांच करने वाले थे कि क्या हमारा मैदानी इलाके की जलवायु का अभ्यस्त शरीर आगे ऊंचाई पर चढ़ाई के लायक है या नहीं।

मैं डरा हुआ था। काश कि मेडिकल रिपोर्ट मुझे लेह में रूकने को मजबूर न कर दे। जिस हिमालय के बारे में हमने किताबों में पढ़ा था उसको एकदम नजदीक से देखने का मौका मैं गंवाना नहीं चाहता था।