Monday, January 5, 2026

फिल्म समीक्षाः मानवीय संबंधों पर बनी बेहतरीन फिल्म केडी

इन दिनों मुझे तमिल फिल्में देखने का चस्का लग गया है. बेशक, दक्षिण भारतीय फिल्मों में पर लाउड होने का आरोप लगता है और ज्यादातर मामलों में सही हो होता है. पर अब हिंदी फिल्में लाउड हो रही हैं और ज्यादातर हिंदी फिल्मों में कथानक गुम हो रहा है.

बहरहाल, मैंने एक तमिल फिल्म के.डी. देखकर खत्म की. फिल्म नई है, 2019 में रिलीज हुई थी. लेकिन मुझे नहीं पता कि हम उत्तर भारतीय लोगों में से कितने लोगों ने इसे देखा है.

मेरा सुझाव, और मेरी सिफारिश है आप इस फिल्म को देखें.

फिल्म केडी का एक दृश्य. तस्वीरः प्राइम वीडियो


असल में, यह फिल्म कुरुप्पु दुर्रै नाम के एक बुजुर्ग की कहानी है. दुर्रै लंबे समय से कोमा में होता है और उसके घर वाले उसकी बीमारी बर्दाश्त नहीं पा रहे होते हैं. उसके बेटे दुर्रै को मार डालने की योजना बनाते हैं, आप चाहें तो इसे मर्सी कीलिंग कर सकते हैं. संयोग से उसी वक्त दुर्रै होश में आ जाता है और इस पूरी योजना को अपने कानों से सुन लेता है. कुरुप्पा दुर्रै मरने के डर से कम और बेटों की इस योजना से व्यथित होता है और उसी वक्त घर छोड़ देता है.

अगर आप फिल्मों के मिजाज को रंग के जरिए सूंघने लायक दर्शक हैं तो आप इस वक्त बीमारी भरे पीलेपन के कलर टोन को देखकर खुद बहुत उदास-से हो जाएंगे. बहरहाल, फिल्म में यह रंग ज्यादा देर तक तारी नहीं रहता. फिल्म रोने-धोने वाली या नैतिक शिक्षा देने वाली विज्ञापन सरीखी नहीं है. आगे कड़वे-मीठे आते हैं. मजा तो इसके बाद आता है.

घर से निकले कुरुप्पु दुर्रै एक मंदिर में कुट्टी से मिलते हैं. नागा विशाल ने कुट्टी की भूमिका की है. कुट्टी अनाथ है और वह मंदिर के बारामदे पर ही रहता है. दोनों एक-दूसरे के अकेलेपन के दोस्त बन जाते हैं. कुट्टी ही कुरुप्पु दुर्रै का नाम केडी रखता है और वह उसका मानवीय संबंधों पर फिर से भरोसा जगाने का काम करता है. कई बार तो मुझे कुट्टी को देखते हुए प्रेमचंद के किरदार हामिद की याद आई जो बूढ़ी अमीना का दादा जैसा बर्ताव करता है. यहां भी कुट्टी केडी के लिए बकेट लिस्ट तैयार करता है और कहता है कि मरने से पहले इनको पूरा करना है.

यह फिल्म इन दोनों दादा-पोते जैसे रिश्ते को बिल्कुल निजी और जीवन के निकट लाकर परदे पर उकेरती है और इन दोनों किरदारों की यात्रा में हंसी, उदासी, प्रेम, डर, और यहां तक कि गुस्से से भरे पल भी हैं. कुल मिलाकर निर्देशक मधुमिता ने जीवन को परदे पर ही उकेर दिया है. केडी के किरदार में मु रामास्वामी बेहद सहज और विश्वसनीय हैं और खासकर बकेट लिस्ट की एक विश यानी पसंदीदा व्यंजन मटन बिरयानी खाते वक्त उनके चेहरे पर अव्यक्त तृप्ति के जो भाव आते रहते हैं, उससे बढ़िया भाव मैंने क्लोज शॉट में बेहद कम ही देखे हैं.

फिल्म में कुछ भी फ्लैशी नहीं है, बल्कि कैमरे और संपादन की गतियों ने फिल्म की गति बनाए रखी है. संपादन और पृष्ठभूमि का संगीत इतना जादुई है कि अगर आप इसका व्याकरण पकड़ पाए तो खो जाएंगे. कुट्टी के किरदार में नाग विशाल ने क्या सामर्थ्य दिखाया है! यह एक आत्मविश्वास से भरे अनाथ बच्चे की भूमिका है, आत्मविश्वास न रहे तो वयस्कों की यह दुनिया उसे जीने भी देगी?

इन दो मुख्य कलाकारों के साथ पटकथा में कहानी के प्रवाह को बनाए रखने में कई और किरदार आते हैं. इसमें कोथू कलाकार, बिरयानी दुकानवाला, मंदिर का पुजारी और यहां तक कि केडी का पता खोजने के लिए लगाए गए प्राइवेट जासूस, सबने प्रवाह को बनाए रखा है.

कहानी में आपको अगर कुछ चुभ सकता है कि केडी के बाल-बच्चे इनते हृदयहीन कैसे हो सकते हैं? उनके किरदारों की कुछ और परते हो सकती थीं, पर यह बहुत बारीक-सा सवाल है. फिर भी ऐसा लगता ही नहीं कि परिवार मे किसी को केडी की कोई फिक्र थी या उससे जरा भी प्यार था. जबकि बाकी के सभी लोग मानते हैं कि केडी एक अच्छा इंसान और एक अच्छा पिता था. 

एक झोल यह भी है कि जब परिवार वालों को पता लगता है कि केडी कोमा से बाहर आ गया तब भी वे लोग उसको खोजने के लिए जासूस लगवाते हैं, वह भी इसलिए ताकि उसको पकड़कर यूथेनेशिया वाला अधूरा कर्मकांड पूरा किया जा सके. बहरहाल, पटकथा की इस कमजोरी से आंखें मूंद सकें तो बाकी फिल्म आला दर्जे की है. हो सके तो देखिए और बताइए कि आपको कैसी लगी.

ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइमवीडियो पर फिल्म मौजूद है.

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