Wednesday, September 9, 2009

बारिश के बहाने

आज दिल्ली का आसमान बेतरह काला है, रात, नहीं भोर में बरसात हुई थी। दफ्तर की ओर चला तो सड़कें गीली-गीली थी। ऐसे मानों किसी मां ने पैर छितरा कर रोते हुए चंट बेटे की कुटम्मस की हो, और उसके आंसू गालों पर अभी भी छितरे हों। बचपन में हम देखते थे कि आसमान हठात् काले रंग का हो जाता था। और बौछारें शुरु..। कमरे में बैठे हैं.. उजाला घटने लगा.. मां ने आदेश दिया.. आंगन से कपड़े उठा लाओं ... जबतक कपड़े उठाने गए.. तब तक तरबतर..। बड़ी बड़ी बूंदें.. ऐसी मानो किसी बंगालन कन्या के बड़े-बड़े नैन हों।

हमेशा मैंने बरसात को अपने भीतर महसूस किया है। उमड़-घुमड़ कर बरसते बादल आने से पहले ऐसी समां बांधते बस पूछिए मत...ताजी हवा कि गुनगुनती सिहराने वाली खुनक... दरअसल गरमी के बीच थोड़ी भी हवा की ठंडक मजेदार लगती है।

कई बार तो धूल भरी आंधी आती और बादलों के पीछे से झांकते सूरज महाराज की किरणें अजीब माहौल पैदा करती। अगर हम क्रिकेट खेल रहे होते तो चिल्लाते एक पैसा की लाई बजार में छितराई बरखा उधरे बिलाई... लेकिन कभी बरखा बिला जाती तो कभी हम जैसे नालायकों की दुआ में बिलकुल असर नहीं होता। ताबड़तोड़ बारिश शुरु हो जाती। हम भींगते हुए घर पहुचे नहीं कि मां ने उसी बारिश वाले अंदाज में हमें धोया नहीं।

बरसात होती तो हमारे घर के चारों तरफ जो खाली ज़मीन थी उसमें अरंडी वगैरह के झाड़ उग जाते॥ हमारे खेल के मैदान में घास की हरी चादर बिछ जाती। मैदान के एक किनारे पर पोखरा था, पोखरे में पानी लबालब भर जाता।

एक झाडी़, जिसका नाम पता नहीं उसमे पीले-पीले फूलों को देखकर मन खिल जाता। भटकटैया के फूल चूसते, मीठेपन का अहसास होता। बॉल बिरयिंग की गोलियों जैसे भटकटैया के फल जमा करना हमारे मनोरंजन का साधन होता। बरसात मे हम ड्रैगन फ्लाई पकड़ने उसके पीछे-पीछे घूमा करते। दूब की चादर पर लाल-लाल बीर बहूटियों को पकड़ लेते।

असली मज़ा तो तब आता, जब स्कूल जाने के वक्त जोरदार बारिश हो रही हो, सुबह से ही। माताजी, फिर भी नहीं मानती और छाता लेकर स्कूल के अंदर तक खदेड़ आतीं। बदले में हम वापसी में काले रंग के चमड़े के जूतों में मिट्टी लपेसकर लाल कर आते। गीले जूतों से अगले दिन स्कूल जाने की आशंका प्रायः खत्म हो जाती। लेकिन उसेक बाद घर आते ही जूतों की हालत देखकर माताजी उन्हीं जूतों से हमें दचककर कूटतीं।

हमारे मन में आज भी बरसात का मतलब जमकर बरसना होता है। दिल्ली में तो महज फुहारें होती है। बाद में जब हमने सिगरेट पीना शुरु किया तो चोरी छिपे बारिश होते हुए और अपने दोस्त की प्रेमिका के घर के सामने से भींगते हुए सिगरेट पीने का मज़ा ही कुछ और होता। हां, मीरा के घर के सामने हम सिगरेट को अपने होंठों में ले लेते। ताकि दोस्त की इमेज पर असर न पड़े।

हम लोग कई बार दूर गांव की तरफ निकल जाते थे। झारखंड का ये इलाका हरियाली के लिए मशहूर है, और उस हरियाली को मैं आज भी अपने अंदर जिंदा महसूस करता हूं। हरियाली तो दिल्ली में भी है लेकिन पता नहीं क्यों झारखंड की हरियाली में जो गंध थी, यहां महसूस नहीं हो पाती। झारखंड में इस वक्त पलाश के जंगल में पत्ते आ जाते हैं। और साल के पेड़ की हरियाली में अलग-अलग शेड्स आ जाते हैं।

तो बरसात के इन्हीं दिनों कई बार ओले भी पड़ते। कई बार तो ओले की बौछारों से सड़क कि किनारे और घास सफेद लगने लगा जाता। कहावत थी कि ओले खाने चाहिए फायदा होता है। उस फायदे की आड़ में हम खूब बऱफ के टुकड़े चुनते फिरते।

दिल्ली में ओले गिरे भी तो हम कभी चुनकर खा नहीं पाए। कभी सम्मान के नाम पर..कभी बड़ा हो गया हूं यह सोच कर। बारिश के नाम पर रोमांस के टुकड़े तो हमने खूब देखे, लेकिन कभी यह सोचा है कि बारिश में आसमान के आंसू गिरते हैं।?

अरे हां, याद आया। एक बार उड़ीसा में महाचक्रवात आया था.. शायद ९७ में। हमारे शहर में सात दिनों तक लगातार बारिश होती रही। पहले दो दिन तो मजा आया, लेकिन बाद में लगातार बिजली गुल रहने, बाहर दोस्तों से नहीं मिल पाने और कई दूसरी वजह से बारिश बोझ लगने लग गई।

फिर भी, बारिश अपने चंद्रमुखी स्वरुप में बेहतर होती है। वह ज्वालामुखी न बने तो ही बेहतर।

4 comments:

अनिल कान्त : said...

आपकी यादें और आपकी बारिश के बारे में पढ़कर अच्छा लगा

Udan Tashtari said...

भटकटैया के फूल, आंगन से कपड़े उठा लाओं, मां ने उसी बारिश वाले अंदाज में हमें धोया नहीं- भाई, अपना बचपन लिखो न...हमारा काहे टीप दिये. क्या हम सबके बचपन एक से थे...वाकई. डुबो दिया. लाजबाब!!

sushant jha said...

बेहतरीन संस्मरण...हर बार तुम्हे पढ़कर जलन होती है...इस बार कुछ ज्यादा ही हुई।

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत खूब... शानदार रचना...