Thursday, October 1, 2009

बादलों में गुस्ताख़

रावण दहन का दिन था.. घर के लोग पूरा जोर लगा रहे थे कि रावण के पुतला दहन हो तो उसका चश्मदीद मैं भी बनूं। लेकिन मुझे रावण से बहुत सहानुभूति रही है। सहानुभूति के कारणों का हवाला बाद में दूंगा लेकिन सच तो यह है कि रावण दहन का दॉश्य मुझसे झेला नहीं जाता।

राम की ड्रेस में सजा कोई बच्चा.. और उसके पीछे दारु पीकर झूमते लोग। रावण का बहुत बड़ा पुतला बनाया हुआ। मेरे शहर के लोगों ने तो इस बार हद ही कर दी थी। उनने रावण के नौ सिर ही लगाए थे। अब उसका फोटो भी है मेरे पास...तो जो राम नहीं कर पाए त्रेता में, वह मेरे तुच्छ शहर के शराबी रामभक्तों ने कर दिखाया।

बहरहाल, आतिशबाजी का पूरा इँतजाम रहा। बांस के ढांचे पर खड़ा राॠम फुलझडियों के छूटने के बीच पटपटाकर जल गया। इस पूरे ठनगन में पंद्रह मिनट भी नहीं लगे। बाकी राॠम को मारने में राम को कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी, ये कोई राम से ही पूछे।

तो जनाब खलनायक हो तो रावण जैसा..खलनायक का खलनायक और चरित्र में बेदाग..। जो करता रहा सीना ठोंक के, ये ले ये मैंने करा है, तैनूं जो करना है कर ले।

बाद में उसके चरित्र के साथ और भी क्षेपक जोड़ दिए गए। लेकिन रावण जैसे कद्दावर राष्ट्राध्यक्ष को सद्दाम की तरह पंद्रह मिनट में निपटा देना मुझे सुहाया नहीं।

बहरहाल, रावण के प्रति सहानुभूति से भरा मैं मूंगफलियां तोड़ता घर पहुंचा। अगले दिन अल्लसुबह मुझे ट्रेन पकड़नी थी ताकि दिन दो बजे कोलकाता से गुवाहाटी की फ्लाइट पकड़ सकूं। कोलकाता पहुंचा तो वहां सड़कों प सन्नटा। लोग दुर्गापूजा की थकान उतारने में लगे थे। फ्लाइट के आसमान में पहुंचते ही मैं भी सातवे आसमान में पहुंच गया, आसमान बादलों से भरा था। मेरी पहले की उड़ानो में ऐसा नही था कि प्लेन ठीक बादलों के बीच से होकर गुजरे।

किताबों में पढ़ा था, कि बादलों के भी कई पर्कार होते हैं। ऐसे में जिन बादलों को मैं ऊपर देख रहा था वह कपासी बादल थे। रुई-से सफेद एकदम झक्क, बुर्राक उजले। इतनी ऊंचाई पर पानी के महीन कण जम जाते हैं और बरफ में तब्दील हो जाते हैं। जाहिर है आसमान में हिलते डुलते भी कम ही हैं। सच कहें तो गोभी के फूलों जैसे आकार वाले बादल... गाना याद आ रहा था आज मैं ऊपर.......।

फिर पता नहीं क्यों मन में स्वर्ग का खयाल आया। सोचा अगर प्लेन अभी क्रैश करता है तो कहां जाऊंगा? मेरी स्वर्ग की यात्रा कैसे होगी। सीधे स्वर्ग (अथवा नरक? मैं खुद को नरक का भागीदार ही मानता हूं, क्योंकि जिन कार्यों में मैं संलिप्त हूं उसे तो धर्म के ठेकेदार पाप कहते हैं। जैसे रावण की प्रशंसा,) बहरहाल, यह तय रहा कि मरा तो शरीर नीचे जाएगा और आत्मा ऊपर जाएगी।

अर्थ यह कि शरीर को नीचे ले जाने से आत्मा का उत्थान होता है। पता नहीं दर्शन क्या कहता है? पहले अगरतला और बाद में गोहाटी को ऊपर से देखा तो लगा कि हमारे देश का यह हिस्सा कितना खूबसूरत है यार। ऊपर से ही मजा आ गया। लगा, किसी ने हरे काग़ज़ को मरोड़ कर रख दिया है और उस पर काई जम गई है। ( अजी हज़रत, एरियल व्यू में पेड़ तो काई जैसे ही दिखेंगे न?)

तो अब कल सुबह में मुझे टीम के साथ डिब्रूगढ़ के लिए कूच करना है और फिर वहां से तेज़ू के लिए तेज़ू म्यांमार और चीन की सरहद के पास है। और लोहित जिले में हैं। सुना है कृष्ण की पहली पत्नी रुक्मिणी मिस्मी जनजाति की थी, जो लोहित जिले की जनजाति है। यह जानकर तेज़ू मेरा ननिहाल हो गया है, मेरी मां का नाम भी रुक्मिणी ही है।

आगली पोस्ट तेज़ू से..

मंजीत

1 comment:

Pankaj Mishra said...

राम की ड्रेस में सजा कोई बच्चा.. और उसके पीछे दारु पीकर झूमते लोग। क्या काहने ऐसे समाज के