Tuesday, September 21, 2010

खुले बालों वाली लड़की- दूसरी किस्त

पहले अंक से आगे...

कजरारे आंखो ने कहा, अनामिका मैं ही हूं।

उस वक्त अभिजीत के पास कहने के लिए कुछ खास था भी नही, ना दिमाग में, ना ही ज़बान पर। मन ही मन नाम दोहराता वह सीढियों की ओर निकल गया। लोहे की काली सीढियों पर जंग लग गया था। सीढियों पर बैठकर सिगरेट सुलगाने और काले बैकग्राउंड में सफेद धुआं छोड़ने का मजा ही कुछ और है।

जब से सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान की मनाही हुई है, यह काम अभिजीत को बार-बार करने का मन करता है।

अभिजीत को बचपन से ही हर ऐसे काम से रोका जाता रहा। बड़े भाई खानदान के पहले एमए पास थे। उन्हें पता था कि किसतरह की पढाई करने से दुनिया में चीजे मिलती हैं। बचपन से ही डॉक्टर बनने के ख्वाहिशमंद लड़के को गणित की ओर धकेला गया...अभिजीत को चित्रकारी का शौक था..बड़े भाई को लगता था कि पेंटिंग-वेंटिंग वक्त और करिअर दोनों की बरबादी है....।

अभिजीत की बरबादी वही से शुरु हुई थी...और आज मेट्रो, बसों और उनसे भी ज्यादा कारों की रेलमपेल से भरे शहर में एक मेसेज ने औपचारिक रुप से उसकी बरबादी का ऐलान कर दिया। हालांकि, यह सब कुछ बहुत दिनों से चल रहा था।

... जस्ट फॉरगेट  द पास्ट...

स्साला, जितना भी निकलना चाहो अतीत पीछा ही नही छोड़ता। उसे प्यास लग आई थी। ऐसी प्यास ...जिसे न दारु बुझा पाई..पानी-वानी से तो खैर ऐसी प्यासों का रिश्ता ही नही होता।

अभिजीत लड़खड़ाते कदमों से किचन तक गया..फ्रिज से बोतल निकाल कर गटक गया। उसे लगा कि एक बार बाथरुम भी हो ही आना चाहिए। उसने पेट में जलन को नजरअंदाज करते हुए भी सोचा, "स्साला, अल्कोहल चीज ही ऐसी है।"

यूरिनल में धार गिर रही था..और वह सोच रहा था....."अल्कोहल...वेसोप्रेसिन..एटीडाययूरेटिक....हाहाहा...नशे में हंसना कितना नशीला होता है...अतीत भी नशा ही है, शराबनोशी की तरह अतीत भी पीछा नही छोडता।

एक मेसेज से तमाम रिश्ते..तमाम वायदे...साथ गुजारे लम्हे..नही भुला सकते। मेसेजेज डिलीट किए जा सकते हैं...यादों को डिलीट करने का सॉफ्टवेयर है क्या किसी इंटेल-फिंटेल के पास..?."

अभिजीत ने दवाओं के  ढेर की तरफ देखा। वह हंसा। रात को तो दवा लेना भूल ही गया था। अना..होती तो भड़क जाती, होती क्या ...है ही...शादी की तैयारियों में व्यस्त होगी। शादी के नाम से ढेर सारी कड़वाहट उसकी ज़बान पर उतर आई..लगा किसी ने खाली पेट में ही नीट पिला दिया हो।

अना शादी क्यों न करे। अभि के जेह्न में सवाल उठा। लेकिन उसका दिमाग किसी भी सवाल का जवाब देने की स्थिति में था नही। उसका दिमाग शुरु से किसी के सामने खड़े होने की स्थिति मे नही था।

बड़े भाई और भाभी के सामने उसकी रुह कांपती थी। उसकी मां को अचारों के मर्तबान, लाल मिर्ची, दालों और चनों को धूप में रखने, शाम को वापस छत से उतार लाने, और व्रत उपवास अंजाम देने के सिवा दुनिया से कोई और मतलब नही था।

मेट्रिक और फिर बारहवी में वह कुछ ठीक-ठाक नंबरों से पास हो गया था। भाई साहब ने डिमांड रखी, आईआईटी की परीक्षा में बैठो। लेकिन परीक्षा में शामिल होना एक बात होती है, उसमें कामयाब होना दूसरी। अभिजीत को न कामयाबी मिलनी थी और ना ही मिली।

एआई ट्रिपल ई में फिसड्डी रैंक के बावजूद दोयम दर्जे के कॉलेज में इंजीनियरिंग में दाखिला मिल ही गया। यह दाखिला भी उसके लिए कोई यातना से कम न था..लेकिन घर के माहौल से, घुटन से मुक्ति थी। एक उजास-सा आ गया कॉलेज के हॉस्टल मेंआने से।

पूरब में उजास छा रहा था। अभि की नींद खुल गई। सिर दर्द से भारी हो  रहा था। प्रशांत आज तो नही आएगा। आज वह अकेला हो जाएगा फिर..से...

और अकेले में खाना बहुत बड़ी मुश्किल होती है। डॉक्टर की तमाम हिदायतों के बावजूद वह हर तरह का खाना खा लेता है क्योकि ढाबों के मेन्यू में सादा खाना बमुश्किल ही शामिल होता है।

तो अकेले में खाना बहुत मुश्किल होता था...

उसी कजरारे आंखों वाली लड़की ने उसके लिए टिफिन का बंदोबस्त किया। क्यों किया..ये तो उस वक्त बताना बजाहिर बहुत मुश्किल की बात थी।

मॉनसूनी बारिश के ऐसे ही दिन थे। वायरसों के हमले से सभी बीमार हो रहे थे। अभि भी।.......और इस बात की चुगली फेसबुक के अपडेट ने सबको कर दी थी।

अगले ही दिन कैंटीन की तरफ बढ़ते कदमों को मोबाईल की घंटी ने रोका, कोमल थी,  पूछा, "खाना खा लिया अभि?"

" नही"

"सुनो तुम्हारा खाना लेकर अनामिका आई है, उससे अपना टिफिन ले लो "

ऐसी दयादृष्टियों का आदी अभिजीत हॉस्टल के दिनों से ही था। लेकिन यहां उसे बहुत झिझक महसूस हो रहीथी। कमान की तरह खिंचे भौंहो वाली और झील जैसी गहरी आंखो वाली से वह बात की शुरुआत कैसे करे...कोई देखेगा तो सोचेगा क्या?

आमतौर पर बदतमीज माने जाने वाले अभिजीत से इस तरह लजाने की उम्मीद कोई भी नही करता था।

7 comments:

Udan Tashtari said...

ओह! शानदार....फिर आता हूँ.

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
मराठी कविता के सशक्त हस्ताक्षर कुसुमाग्रज से एक परिचय, राजभाषा हिन्दी पर अरुण राय की प्रस्तुति, पधारें

vidhi mehta said...

starting is best.
Hope middle part and ending will be the best.
By the way u write story very well.
Interesting story.
keep it up.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बढ़िया चल रही है कहानी ....दोनों कड़ियाँ एक साथ पढ़ीं ..आगे इंतज़ार है

नीरज गोस्वामी said...

अत्यधिक रोचक लेखन...प्रभावशाली....वाह
नीरज

avinash kumar singh said...

Hey Buddy really nice mate keep it up....all the best you will go long ways..
If you have some bandwidth please visit my blog I have also tried to say something in my own way :-)
That too in a pretty amateur style :-)
Heartly admirations for your great expressions...:-)will wait for the next part..

avinash kumar singh said...

sorry forgot to type in my blog's address its
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