Friday, October 15, 2010

तेरे जैसा कौन उठे- हीरो जी की दास्तां

एक हैं हीरो जी। यूं तो उनका चेहरा थोड़ा-बहुत समोसे जैसा है और उस पर उनका मुख ऐसा, कि कोई अगर बहुत ध्यान से न देखे तो लगे कि चुंबनोद्यत है।

हीरो जी बहुत जड़ से जुड़े हुए आदमी हैं। ( आदमी हैं, यह मैंने ऐसे ही भलमनसाहत में लिखी है। इसे प्रमाणस्वरुप कहीं उद्धृत न कीजिएगा। क्योंकि उनके आदमी होने पर कईयों को संदेह है, और संदेह निराधार नही है)

बहुत साल हुए, मान लीजिए कि 3-4 साल हुए, और 3-4 साल बहुत होते हैं यह तो तय है, किसी ने हीरो जी के कान में फुसक दिया कि भई हीरो जी काला चश्मा लगाकर तुम बंबास्टिक दिखते हो। तब से ही अपने हीरो जी ने फिल्मी नायकों की तर्ज पर चश्मा आंखों पर कम और कॉलर में ज्यादा लटकाना शुरु कर दिया।

किसी ने हीरोजी  को यह भी बताया था कि आज कल की लड़कियां प्रायः दुश्चरित्र होती हैं और दुश्चरित्र लड़कियों को लड़कों ( पढें- मर्दों) की छाती के बाल बहुत आकर्षित करते हैं। चूंकि, हीरो जी मर्द थे और उनकी छाती में खासे बाल भी थे। नतीजतन, हीरो जी दफ्तर आते वक्त रास्ते में ही काला चश्मा शर्ट की कॉलर पर लटका लेते थे, और छाती के बाल तो उनकी ऊपर की दो बटनों के बीच से झांकते ही रहते हैं।

हीरो जी की दिली इच्छा थी कि स्साला टीवी पर दिखना है। हीरो जी का नाम सिर्फ हीरो नाम का ही न रह जाए। काम भी हीरो का हो जाए, तो उन्होंने सबसे पहले काम ये किया कि अपने गांव के पते से चार चिट्ठियां अपने चैनल हैड के नाम लिखवा लीं, अलग-अलग रंगो की स्याही से, अलग-अलग लिखावट में। ध्यान रहे, मैं आगाह कर रहा हूं- कोई हीरो जी को चूतिया या मूर्ख न समझे।

चिट्ठी का मजमून यह था कि आपके चैनल में जो हीरो जी नाम के शख्स काम करते हैं, उनके तेजोमय व्यक्तित्व के सम्मुख कामदेव भी पानी भरते हैं। अतएव फौरन से पेश्तर, रात नौ बजे का बुलेटिन हीरो जी से ही पढवाया जाए। 

बहरहाल, चैनल के बड़े विभाग में चिट्टी आई, गई कहीं खो गई।  हीरो जी का सपना अधूरा ही रह गया। लेकिन इस कवायद में उन्हें एक कैवल्य मिल गया। कैवल्य इस मामले में कि उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया कि चैनलों में जनता-फनता होती है ठेंगे पर। जनता की बातों का कोई महत्व नहीं।

तो सवाल यह कि महत्व किसकी बात का होता है...?

नेताओं को चैनलों की जरुरत है, चैनलों को नेताओँ की। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हीरो जी ने ताड़ लिया।
एक ऐसे ही किसी शुभ दिन, जब बाकी की दुनिया सो ही रही थी और कौओं ने गू में चोंच भी न मारा था, हीरो जी बढिया शेव करके, अपनी सबसे बढिय़ा शर्ट पहन कर, एक नेता के घर के आगे धरने पर बैठ गए।

यह वही नेता थे जिनके साथ अपने बहुत नजदीकी संबंधों का ज़िक्र वह अपने दफ्तर में अपना रोब गाफिल करने को किया करते थे। हालांकि नजदीकी संबंधों के बारे में खुद नेताजी भी अनभिज्ञ थे।

तो जैसे ही वह धरने पर बैठे, पहले तो गार्डों ने उन्हें लात मार कर बाहर कर दिया..और बमुश्किल हाथ-पैर जोड़कर जब वह नेता जी के घर के अंदर पहुंते तो घर की सफाई का काम चल रहा था। हालांकि हमारे हीरो जी कम स्वाभिमानी नही हैं , लेकिन जब उन्होंने देखा कि कई लोग काम कर रहे हैं, जिन्हें दूसरे लोग नौकर लेकिन नेता लोग कार्यकर्ता कहते हैं। तो एक झाड़ू लेकर उनने भी बुहारना शुरु कर दिया।

कुछ देर बाद संयोग ये हुआ कि वह झाडू मार रहे थे ओर उन्हीं के दफ्तर के कुछ दूसरे लोग भी वहां आ पहुंचे। हीरो जी चालाक भी हैं, लेकिन उनकी किस्मत यहां थोड़ा गच्चा दे गई। उन्हें झाड़ू देते हुए देख लिया गया। यद्यपि उनने छिपने का भरसक यत्न किया था।

हीरो जी के नेता जी के घर में मौजूद होने की बात बॉस तक पहुंच गई। बॉस समझदार था। उसने समझ लिया कि घर के अंदर तो नजदीकी रिश्तेदार ही होते हैं।

हीरो जी का आजकल बॉस से खूब पटती है। चैनल है़ड हीरो जी को पुलित्जर के लिए नामांकित करवाने की सोच रहा है।

अर्ज है---

हर दिशा में छा गए तुम,
जो भी चाहा पा गए तुम।
क्या करें हम टहनियों का
फल तो सारे खा गए तुम।
क्या गजब के आदमी हो,
फांद कर के आ गए तुम।
क्या जुगाडू लग रहे हो,
बॉस को कैसे भा गए तुम।

1 comment:

DEEPAK BABA said...

हर दिशा में छा गए तुम,
जो भी चाहा पा गए तुम।
क्या करें हम टहनियों का
फल तो सारे खा गए तुम।
क्या गजब के आदमी हो,
फांद कर के आ गए तुम।
क्या जुगाडू लग रहे हो,
बॉस को कैसे भा गए तुम



इन्ही लोगों के साथ गुज़रानी है जिंदगी अपनी----

क्या ख़ाक तैयारी करेंगे.